ऐसा लगता है इतिहास नई करवट लेने जा रहा है। अनु.जाति/ जनजाति वर्ग को मिले आरक्षण के भीतर वंचित रह गई जातियों के लिए अलग से कोटा तय करने का फैसला सुनाकर सर्वोच्च न्यायालय ने जाति की राजनीति करने वाले नेताओं की बोलती बंद कर दी। जरा सी बात पर पत्रकार वार्ता करने वाली वाली नेताओं की जमात ने उक्त फैसले के बाद जो मौन साध रखा है उससे स्पष्ट है कि आरक्षण की आड़ में जिस नव सामंतवाद का उदय बीते सात दशक में हुआ वह खतरे में पड़ गया है। विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा निर्णय का स्वागत किया जाना भी उनकी मजबूरी है क्योंकि यदि वे विरोध करते तो अनु. जाति/ जनजाति समुदाय का वह वर्ग नाराज हो उठता जिसके पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय खड़ा हुआ है। फैसले पर जातिवादी नेताओं की तो छोड़िये कांग्रेस और भाजपा ने भी चुप्पी साध रखी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इन दिनों जाति की राजनीति के सबसे बड़े प्रवक्ता बने हुए हैं। विषय कोई भी हो वे उसे अनु. जाति / जनजाति और ओबीसी पर ले आते हैं। जातिगत जनगणना पर उनका बहुत जोर है। संसद में उनकी टिप्पणियों के बाद सत्ता पक्ष से किये गए जवाबी हमले से राजनीतिक वातावरण गरमाया हुआ है। कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक होने से राजनेताओं का जाति प्रेम कुछ ज्यादा ही उमड़ रहा है। लेकिन आरक्षण प्राप्त वर्ग में भी जो उसके लाभ से वंचित होकर अपने लिए अलग से कुछ किये जाने की माँग उठा रहे थे उनके प्रति जुबानी हमदर्दी दिखाने के बावजूद आरक्षण के ठेकेदार बने नेता उस वर्ग को दबाकर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। उन नेताओं को समूचे आरक्षित समुदाय का सरगना मानकर कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल भी उनकी चौधराहट के विरुद्ध कुछ भी बोलने से डरते हैं। यही वजह है कि अनु. जाति / जनजाति और ओबीसी वर्ग में कुछ लोग पूरे समुदाय के मुखिया बन कर बैठ गए। धीरे - धीरे उन्होंने अपने परिवार को आगे बढ़ाया । स्व. मुलायम सिंह यादव और लालू यादव इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं। हालांकि गैर आरक्षित उच्च कही जाने वाली जातियों में परिवार को आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति आजादी के बाद से ही देखने मिलने लगी थी किन्तु उस उस समय चूंकि कांग्रेस के प्रति लोगों के मन में अंध श्रद्धा थी इसलिए कोई रोकने - टोकने वाला नहीं था। और फिर जब पंडित नेहरू ने अपनी बेटी इंदिरा गाँधी को उत्तराधिकारी के तौर पर स्थापित करने का रास्ता बनाया तब बाकी नेताओं को भी अवसर मिल गया। धीरे - धीरे सभी दलों में अपने परिवार को आगे लाने का चलन बढ़ा जिससे अनु. जाति / जनजाति और ओबीसी वर्ग भी अछूता नहीं रहा। इसका नतीजा वही हुआ जिस पर गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने चोट की। कोटे के भीतर कोटे की व्यवस्था चूंकि राज्य सरकारों के जिम्मे दी गई है इसलिए उसमें विसंगति हो सकती है लेकिन फैसले में इस हेतु जो पद्धति सुझाई गई वह बेहद सटीक है। इसीलिये आरक्षण के नाम पर नव सामंतवाद को बढ़ावा देने वालों की सिट्टी- पिट्टी गुम है। सर्वोच्च न्यायालय इस बात के लिए बधाई का पात्र है जिसने वह कर दिखाया जिसके बारे में बोलने से भी राजनेता डरते थे। इससे जातिगत जनगणना की रट लगाने वाले नेताओं के सुर भी ठंडे पड़ जाएंगे क्योंकि कोटे के भीतर कोटा तय करना अब सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। लेकिन ये दुखद है कि अधिकारियों की जाति पूछने का जो खतरनाक खेल राहुल गाँधी ने शुरू किया वह अब न्यायाधीशों तक पहुँच गया। गत दिवस ज्योंही फैसला आया भीम आर्मी नेता और उ.प्र की नगीना सीट से लोकसभा में चुनकर आये चंद्रशेखर आज़ाद ने पहले तो सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करने की बात कही और फिर उक्त फैसले को पढ़ने के बाद टिप्पणी करने के साथ ये भी जोड़ दिया कि यह संविधान के अनुच्छेद 341 का उल्लंघन है। लेकिन सबसे खतरनाक बात उन्होंने ये कही कि ये जानना जरूरी है कि फैसला देने वाली सात सदस्यों की पीठ में अनु. जाति/ जनजाति और ओबीसी वर्ग के कितने न्यायाधीश थे? यद्यपि श्री आजाद का प्रभाव पश्चिमी उ.प्र के एक क्षेत्र विशेष तक सीमित है किन्तु उनके द्वारा कही गई बात नये वर्ग संघर्ष को जन्म दे सकती है। देखना ये है कि क्या बजट बनाने वाले अधिकारियों की जाति पूछने वाले राहुल भी भीम आर्मी नेता की तरह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की जाति पूछने का दुस्साहस करेंगे? सर्वोच्च न्यायालय ने कोटे के भीतर कोटे संबन्धी जो फैसला दिया उसमें क्रीमी लेयर और पहली पीढ़ी के बाद आरक्षण न देने की जो बात कही है वह सही मायनों में आरक्षण की व्यवस्था में व्याप्त विसंगति दूर करने वाली है। आरक्षण से लाभान्वित राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को भले ही ये सुनकर अच्छा न लगे किन्तु यह व्यवस्था दलित और आदिवासियों के बीच जो विषमता बढ़ रही थी उसे दूर करने में सहायक साबित होगी। बेहतर होगा राजनीतिक दल उक्त फैसले को उसके सही परिप्रेक्ष्य में देखें क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले के जरिये सामाजिक न्याय को सही अर्थों में लागू करने का साहस दिखाया है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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