उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2017 में जब सत्ता संभाली तब यह राज्य कानून व्यवस्था के मामले में बदनाम था। हत्या, अपहरण, लूटपाट, गुंडा टैक्स, महिलाओं से छेड़छाड़, रास्ते में आभूषण छीना जाना रोजमर्रे की खबरें थीं। 2007 में मायावती मुख्यमंत्री बनीं तब उन्होंने भी प्रशासन को चाक - चौबंद किया था किन्तु भ्रष्टाचार की वजह से उनकी सरकार जनता की नजरों से उतरती चली गई । 2012 में जनता ने उनको हटाकर सपा को अवसर दिया और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। विदेश में शिक्षित स्व. मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश ने विकास कार्यों पर तो काफी ध्यान दिया किन्तु कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर होने लगी । थानों में जाति विशेष के लोग पदस्थ किये गए। जिससे सपा कार्यकर्ता अपने को प्रदेश का मालिक समझने लग गए। पूरा प्रदेश उनकी दादागिरी से त्रस्त हो उठा। सरकारी संरक्षण में माफिया सरगनाओं का आतंक व्याप्त होने लगा । सूरज ढलते ही महिलाओं का घर से निकलना दूभर हो गया। लड़कियाँ कोचिंग जाने से डरने लगीं। राहजनी, हत्या और बलात्कार राज्य की पहिचान बन गए । लोग उम्मीद करते थे कि मुलायम सिंह ने अपने भाई और सहयोगियों को उपेक्षित कर जिस अनुभवहीन बेटे की ताजपोशी करवाई वे उसे सरकार चलाने के गुर भी सिखाएंगे । लेकिन सपा से जुड़े कुछ युवकों द्वारा बलात्कार किये जाने पर उन्होंने बजाय उसकी निंदा करने के ये टिप्पणी कर डाली कि लड़के हैं इस उमर में गलती हो ही जाती है। उससे साबित हो गया कि उ.प्र को अराजकता का पर्याय बनाने के लिए पूरा मुलायम परिवार जिम्मेदार है । अंततः 2017 में उस सरकार का पतन हो गया । 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी का जो तूफान उठा उसमें उ.प्र भी शामिल था । भाजपा ने रिकार्ड तोड़ सफलता अर्जित करते हुए केंद्र में सरकार बनाई। उसके तीन साल पश्चात हुए विधानसभा चुनाव में भी वही माहौल बना और तब सभी को चौंकाते हुए भाजपा ने गोरखपुर पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया जो उस समय लोकसभा सदस्य थे । चूंकि सत्ता चलाने का कोई अनुभव उन्हें नहीं था ऐसे में उ.प्र जैसे बड़े राज्य को संभालने की उनकी क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक था । उनकी सफलता पर संदेह करने वाले उनकी अपनी पार्टी में भी कम नहीं थे। लेकिन इस सन्यासी ने दिखा दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तब गुंडागर्दी रोकना बड़ी बात नहीं होती लेकिन ईमानदारी भी उतनी ही जरूरी है। अपने को किसी दायरे में न बांधते हुए उन्होंने पुलिस और प्रशासन को ये हिदायत दे दी कि अपराधी की पहुँच कितनी भी ऊँची क्यों न हो, उस पर शिकंजा कसा जाना चाहिए। उनके कुछ फैसले आलोचना का कारण भी बने किन्तु उ.प्र जैसे सूबे की प्रशासनिक व्यवस्था को उन्होंने जिस मुस्तैदी से संभाला उसकी चर्चा पूरे देश में होने लगी। कुख्यात गुंडे जेल भेजे गए। जिन्होंने भागने की कोशिश की वे एनकाउंटर का शिकार हुए जिस पर उनकी खूब आलोचना भी हुई किन्तु उन्होंने अपना अभियान जारी रखा। आज़म खाँ जैसी ताकतवर राजनीतिक शख्सियत को जेल की हवा खिलाकर योगी जी ने सफेदपोश अपराधियों को भी ये संदेश दे दिया कि नेतागिरी को ढाल बनाकर वे बच नहीं सकते। इसीलिए वहाँ की जनता ने 2022 में उनको दोबारा सत्ता सौंप दी जिसमें महिला मतदाताओं की बड़ी भूमिका थी जो अपने को उनके राज में सुरक्षित मान बैठी थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस राज्य में भाजपा को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं और सपा - कांग्रेस गठबंधन ने बढ़त हासिल कर ली। मुस्लिम मतदाताओं के इकतरफा भाजपा विरोध तथा आरक्षण खत्म होने के मिथ्या भय के कारण दलित वर्ग के भी दूर होने से भाजपा को चोट पहुंची। हालांकि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गये किन्तु उ.प्र में ये भ्रम फैलाया जाने लगा कि योगी जी को हटाया जाने वाला है। इसके पीछे भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी है। इस कारण अपराधियों का हौसला बढ़ने लगा। जिसका प्रमाण लखनऊ में किसी स्थान पर पानी भर जाने पर वहाँ से निकलने वाली महिलाओं के साथ की गई अभद्रता से मिला। उस घटना के वीडियो प्रसारित होने से लोगों में आतंक बढ़ने लगा किन्तु योगी जी ने न केवल संबंधित थाने के समूचे स्टाफ अपितु डीसीपी सहित अनेक उच्च पुलिस अधिकारियों को निलंबित करते हुए अपराधियों की अविलंब पहिचान कर गिरफ्तारी के निर्देश दे दिये। उसका असर हुआ। कुछ लोग पकड़े जा चुके हैं और बाकी भी जल्द जेल में होंगे। इस मुस्तैदी से पूरे प्रदेश में संदेश चला गया कि लोकसभा चुनाव के नतीजों से गुंडा तत्वों को खुश होने की जरूरत नहीं है। और ये भी कि बुलडोजर बाबा किसी भी तरह ढीले नहीं पड़े हैं। इसमें दो मत नहीं है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद योगी जी ने उ.प्र की कानून व्यवस्था में जो अविश्वसनीय सुधार किया उससे अन्य राज्यों को भी सीखना चाहिए। लखनऊ में महिलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहार पर उनकी सख्त कारवाई ने निश्चित रूप से एक उदाहरण पेश किया है। थाने में बैठे स्टाफ का निलंबन तो बेहद आम है किन्तु डीसीपी सदृश अधिकारियों पर गाज गिराना साहसिक निर्णय है जिसके लिए योगी जी प्रशंसा के पात्र हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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