Friday, 30 August 2024

चुनाव खर्च के ब्यौरे पर विश्वास करना कठिन


विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयोग को सौंपे गए विवरण के अनुसार लोकसभा चुनाव में  पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों को मोटी रकम  दी। कांग्रेस और भाजपा तो राष्ट्रीय पार्टी हैं किंतु आम आदमी पार्टी द्वारा भी अपने उम्मीदवारों को 60 - 60 लाख रु. दिया जाना चौंकाता है। आयोग ने लोकसभा चुनाव में खर्च की सीमा 90 लाख रु. तय की थी। इसीलिए हर प्रत्याशी ने इससे कम ही खर्च किया क्योंकि निर्धारित राशि से अधिक खर्च करने वाले के जीतने पर भी उसका चुनाव चुनाव रद्द हो जाता है। हारने पर भी कुछ वर्षों तक चुनाव लड़ने पर पाबंदी लग जाती है। कुछ प्रत्याशी ऐसे भी हैं जो सक्षम होने से पार्टी से पैसा नहीं लेते। निर्दलीय उम्मीदवारों को स्वयं के या चंदे के पैसे से चुनाव लड़ना पड़ता है। नामांकन के दिन से ही खर्चों का आकलन होने लगता है। इस समूची कवायद का उद्देश्य चुनावी खर्च को सीमित करना है। टी. एन. शेषन के कार्यकाल में चुनाव प्रचार के परंपरागत तौर - तरीकों में काफी बदलाव किये गए थे। बैनर - पोस्टर सीमित हो गए। रात 10 बजे के बाद सभाएं प्रतिबंधित हो गईं। बिना अनुमति दीवारें पोतने पर रोक लगी। चुनाव कार्यालय से स्वीकृति लिए बगैर वाहन का उपयोग वर्जित हो गया। प्रकाशित प्रचार सामग्री पर  मुद्रण संख्या का उल्लेख अनिवार्य कर दिया गया। प्रत्याशी द्वारा  कराये जाने वाले नाश्ते तक की दरें तय कर दी गईं। कभी - कभी तो लगता है चुनाव आयोग ज्यादती कर रहा है। नगदी राशि के लाने , ले जाने में पुलिस द्वारा की जाने वाली तलाशी से व्यापारी वर्ग भी त्रस्त हो जाता है। भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात सरकारी मशीनरी चुनाव आचार संहिता लगते ही निरंकुशता की हद तक सख्त हो जाती है। इन सबका लाभ निःसंदेह हुआ है किंतु जहाँ तक बात चुनाव में खर्च कम करने की है तो वह नहीं हो सका। लोकसभा और विधानसभा चुनाव हेतु व्यय की जो उच्चतम सीमा निर्धारित की गई  उसके भीतर चुनाव लड़ने वाले वे प्रत्याशी ही होते हैं जो केवल नाम के लिए मैदान में उतरते हैं। जिन कुछ  सीटों पर बड़ी पार्टियां भी सांकेतिक चुनाव लड़ती हैं वहां उनका खर्च कम होता है। वरना कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा पानी की तरह पैसा बहाने के उदाहरण आम हैं। अनेक उद्योगपति राज्यसभा की सदस्यता हासिल करने करोड़ों लुटा देते हैं। विधायकों की बोली किस तरह लगती है  ये सर्वविदित है। लोकसभा और विधानसभा तो बड़ी बात है लेकिन नगर निगम  पार्षद के चुनाव  में कुछ लोग बेतहाशा खर्च कर देते हैं। अब वे कार्यकर्ता भी नहीं रहे जो विचारधारा के लिए तन, मन और धन तीनों झोंक देते थे। साइकिल पर प्रचार तो वे भी नहीं करते जिनका चुनाव चिन्ह ही साइकिल है। चौपहिया वाहनों का उपयोग आम हो गया है। और तो और छुटभैये नेता तक हेलीकाप्टरों में मंडराते देखे जा सकते हैं। विमानों का उपयोग भी सामान्य हो चला  है। ये सब देखते हुए चुनाव आयोग द्वारा तय सीमा में चुनाव लड़ पाना अविश्वसनीय प्रतीत होता है। इस आधार पर चुनावी खर्च के  ब्यौरे को कसम खाकर झूठ बोलने का सबसे बड़ा उदाहरण कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं  होगी। जनसेवा या विचारधारा से प्रेरित होकर राजनीति करने वाले समय के साथ लुप्त होते जा रहे हैं क्योंकि उनके लिए चुनाव जीतना आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा है। राज्यसभा भी जिस वर्ग के लिए बनाई गई थी वह उसमें नजर नहीं आता। इन्हीं सब कारणों से चुनाव उस तबके के बस के बाहर होते जा रहे हैं जिसके मन में विशुद्ध सेवाभाव है। इसके लिए राजनीतिक पार्टियां भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो उम्मीदवारी तय करते समय जीतने की क्षमता को प्राथमिकता देती हैं। सरकार बनाने के लिए  बहुमत की आवश्यकता ने इस चलन को मज़बूरी बना दिया है किंतु फिर राज्यसभा और विधानपरिषदों में निःस्वार्थ समाजसेवियों , कलाकारों, खिलाड़ियों, शिक्षाशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों को ज्यादा से ज्यादा स्थान दिये जाना चाहिए। आजादी के बाद प्रारंभिक वर्षों में ऐसा हुआ भी किंतु धीरे - धीरे उच्च सदन की गरिमा के साथ भी खिलवाड़ होने लगा। राजनीति में अच्छे लोगों के आने की बात तो खूब कही जाती है किंतु उनके लिए कितनी जगह है? अच्छा तो ये हो कि चुनाव खर्च की सीमा घटाई जावे। चुनाव प्रचार के प्रचलित तरीके और बदले जाएं। चुनाव जितना कम खर्चीला होगा उसमें जनभागीदारी उतनी ही बढ़ेगी। करोड़ों रु. के प्रचार और चुनाव आयोग के अथक प्रयासों के बावजूद मतदान का प्रतिशत कम रहना चिंता के साथ चिंतन का भी विषय है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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