Saturday, 10 August 2024

प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है कि अब भी संभल जाओ वरना....


बांग्ला देश की उथल - पुथल, संसद में सत्ता और विपक्ष के बीच रस्साकशी, ओलंपिक में विनेश फोगाट को फाइनल खेलने न मिलना, वक़्फ़ बोर्ड संशोधन विधेयक, राज्यसभा में जया बच्चन और सभापति के बीच विवाद आदि विषयों पर पूरा देश चर्चा करता है। टीवी चैनलों में बैठे अखाड़ची भी जोर  आजमाइश करते देखे जा सकते हैं। क्रिकेट सीरीज भी कुछ लोगों को बुद्धिविलास का अवसर प्रदान करती है। और फिर टीवी के परदे में ओ.टी.टी पर गाली गलौच सुनने का शौक भी पूरा हो जाता है। वरना सोशल मीडिया तो है ही जो  24 X 7 आपको व्यस्त रखने में सक्षम है । लेकिन दुख और चिंता का विषय है कि प्रकृति और पर्यावरण के बदलते स्वभाव के प्रति आम जन में जो बेफिक्री का भाव है उसके दुष्परिणाम हमारे जीवनकाल में ही देखने मिलने लगे हैं। देश के दक्षिणी सिरे केरल के पठारी जिले वायनाड में भारी वर्षा के बाद हुए भूस्खलन से जो तबाही हुई उसने ये बता दिया कि प्रकृति प्रदत्त भौगोलिक रचना के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ करने से आपदा कहीं भी आ सकती है। उत्तर भारत के उत्तराखंड इलाके से तो ऐसी खबरें साल भर आया करती हैं। विशेष तौर पर गढ़वाल अंचल में चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के लिए किये गए विकास कार्य विनाश का कारण बनने लगे हैं। केदारनाथ में आये जल प्रलय की यादें आज भी भयभीत कर देती हैं। बद्रीनाथ के रास्ते में जोशीमठ नगर तो धंसने के कगार पर है । उत्तरकाशी आदि में छुटपुट भूस्खलन रोजमर्रे का किस्सा हो गया है। उधर हिमाचल प्रदेश में शिमला का रास्ता साल दर साल खतरनाक होता जा रहा है। मनाली में भी पर्यटकों के बढ़ने से पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली खबर आई लद्दाख़ से जहाँ पहली बार तापमान 40 डिग्री तक पहुँचने से हाहाकार मच गया।  तापमान अधिक होने से उत्पन्न स्थिति के चलते लद्दाख़ हवाई अड्डे से विमान उड़ान नहीं भर सके। कई दिनों तक हवाई सेवाएं बाधित रहीं। इसकी वजह वहाँ पर्यटकों की बढ़ती संख्या है। जिन दुर्गम इलाकों तक यदाकदा कोई जाता था वहाँ प्रतिवर्ष लाखों सैलानी मौज - मस्ती के लिए जाने लगे। पहले इस क्षेत्र में केवल सैन्य वाहन ही नजर आते थे। लेकिन अब तो खारडूंगला जैसे उच्च शिखर और नुब्रा घाटी  तक लाखों पर्यटक जाने लगे हैं। इस कारण इस पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की आय में वृद्धि तो हुई किंतु वहाँ के जिम्मेदार नागरिक इस बात से चिंतित हैं कि लद्दाख़ में भी मैदान जैसी गर्मी पड़ने लगी है। हाल ही में उत्तराखंड के लोकप्रिय पर्यटन स्थल नैनीताल की टिफिन टॉप नामक पहाड़ी रात के समय धसक गई। गत वर्ष  नैनी झील का जल भी असामान्य तरीके से उछलने लगा जिससे निचली बस्तियों में जल प्लावन का खतरा उत्पन्न हो गया। ये सब बताने का आशय यह है कि प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकार और इस विषय पर कार्य रहे व्यक्तियों तथा संगठनों के जिम्मे छोड़कर निश्चिंत हो जाएं तो हम भी सह अभियुक्त कहलाएंगे । लगातार जिस तरह की खबरें आ रही हैं उन्हें देख - सुनकर अब ये कहना पड़ रहा है कि प्रकृति और पर्यावरण को बचाने में हर नागरिक को अपना योगदान देना होगा। भारतीय जीवन शैली में इसके संस्कार बचपन से दिये जाते थे। घास के तिनके से लेकर वट वृक्ष तक पूजित माना गया। नदी, तालाब, कुए सभी को गंगा का प्रतीक मानकर उनको संरक्षित करने की परंपरा है। पर्वत भी देव तुल्य माने गए। और ऐसे क्षेत्र जो प्रकृति के मूल स्वरूप को बनाये रखने के लिए उपयोगी थे उन्हें निर्जन छोड़ दिया जाता था । लेकिन विकास की वासना  ने सब कुछ उलट - पुलट कर दिया। परिणाम सामने है। ऐसा नहीं है कि हम  आने वाले खतरे से अनजान हों। लेकिन जीवन की आपाधापी में उलझे रहने से इस बारे में सोचने की प्रवृत्ति लुप्त होने लगी है। पहाड़ी पर्यटन केन्द्र की सैर करने वाले वहाँ के खुशनुमा एहसास से  तो सबको परिचित कराते हैं किंतु उनके लिए उत्पन्न खतरों के प्रति आगाह नहीं करते। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि प्रकृति का चेतावनी तंत्र लगातार  संभल जाने के संकेत दे रहा है किंतु हम उसकी उपेक्षा करने से बाज नहीं आ रहे। इसके पहले कि वायनाड, लद्दाख़ और नैनीताल  जैसे हादसे जगह - जगह होने लगें , हमें सतर्क हो जाना चाहिए वरना उससे होने वाले नुकसान के लिए सरकार से ज्यादा हम कसूरवार माने जायेंगे। कुछ और न सही अपनी संतानों की चिंता तो कर लें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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