भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित राज्य केरल के वायनाड में आई विभीषिका ने पूरे देश को हिला डाला। जिस बड़े पैमाने पर वहाँ लोग मारे गए वह अकल्पनीय है। उसी के साथ पशु भी चपेट में आ गए। गाँव के गाँव बह गए। बड़ी संख्या में लोग लापता हैं । राहत और पुनर्वास चल रहा है किन्तु भारी वर्षा की वजह से हुए भूस्खलन ने जो नुकसान किया है उसका आकलन केवल आर्थिक आधार पर करना मूर्खता होगी क्योंकि वहाँ भौगोलिक संरचना को जो क्षति पहुंची उसकी भरपाई असंभव है। वायनाड केरल का अकेला पठारी जिला है । पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला में बसा हुआ ये जिला कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर है। दर्शनीय चाय बागानों वाला यह हिल स्टेशन सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बन गया था। बीती 30 जुलाई की रात जब यहां पर लोग निद्रामग्न थे तभी अभूतपूर्व वर्षा के कारण पहाड़ी ढलानों की धरती सरकने लगी । लोग सुरक्षित जगहों की ओर भागने लगे। लेकिन तब तक अनेक कस्बे भूस्खलन के कारण अस्तित्वहीन हो गए। किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। आपदा का प्रकोप रुकने के बाद जब विशेषज्ञों ने कारणों का पता लगाना चाहा तो ये बात सामने आई कि भूस्खलन तब होता है जब पहाड़ और ढलान पर मिट्टी की कसावट ढीली पड़ जाती है। केरल के तो लगभग आधे भूभाग में 20 डिग्री से अधिक ढलान है, जिसे मिट्टी के कटाव और भूस्खलन के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है। वायनाड की तो पूरी बसाहट ही ऐसी ही है। ढलान वाले ऐसे क्षेत्रों में अधिक बरसात होने पर मिट्टी गीली होकर फिसलने लगती हैं। वर्ष 2022 में लोकसभा में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा प्रदत्त जानकारी के मुताबिक 2015 से 2022 के बीच देश में आए 3,782 भूस्खलनों में से 2,239 (करीब 59.2 प्रतिशत) केरल को झेलना पड़े। और उनमें से भी अधिकतर वायनाड और उसके इर्द - गिर्द के इलाकों में हुए। 30 जुलाई की प्रलयंकारी घटना का एक कारण इस इलाके में पिछले कुछ सालों में होटल सहित अन्य संरचनाओं का निर्माण भी है। राजनीति भी इसके लिए दोषी है। 2010 में भारत सरकार के पर्यावरण विभाग द्वारा केरल सहित समूचे पश्चिमी घाट के भू संरक्षण हेतु रणनीति बनाने के लिए जो विशेषज्ञ समिति बनाई उसकी रिपोर्ट में स्पष्ट था कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह की विकास परियोजनाओं के साथ ही खनन, ऊर्जा संयत्र और बांध बनाने पर भी रोक लगे। लेकिन उद्योगपतियों और राज्य सरकारों के विरोध के कारण उस रिपोर्ट को केंद्र सरकार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इस प्रकार गुजरात से केरल तक का पूरा पश्चिमी घाट प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वालों के लिए खुला छोड़ दिया गया। एक समिति और बनी जिसने कम से कम खनन पर पूर्णतः रोक लगाने कहा किन्तु उसकी भी अनसुनी की गई। वायनाड हादसे का स्वरूप बहुत विकराल होने से वह पूरे देश के ध्यान में आ गया किन्तु उसी समय हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी ऐसी ही प्राकृतिक विपदाएं आईं। इन सबका एक साथ विश्लेषण करें तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि सरकार चाहे किसी की हो वह प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण की बातें तो खूब करती है किन्तु खनन माफिया के हाथों खेलने के साथ ही विकास के नाम पर उनको नुकसान पहुंचाने से भी बाज नहीं आती। पूरी हिमालय पर्वत माला भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील है। टिहरी बाँध का इसीलिए शुरू से ही विरोध होता आया है। बावजूद इसके पूरे हिमालयी क्षेत्र में सैन्य जरूरतों के अलावा भी जिस प्रकार से सड़कें, बिजली उत्पादन संयंत्र, होटल आदि बनाने दिये गए वे खतरे का कारण हैं। प्रश्न ये है कि विशेषज्ञों की सलाह यदि सरकार को माननी ही नहीं होती तब उनकी सेवाएं लेने की औपचारिकता क्यों की जाती है ? यदि पश्चिमी घाट संबंधी रिपोर्ट पर अमल कर लिया जाता तो वायनाड की तबाही से काफी हद तक बचा जा सकता था। ऐसा ही हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के बारे में कहा जा सकता है। ये तो सच है कि हर प्राकृतिक आपदा का पूर्वानुमान संभव नहीं होता किन्तु प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते रहने से जब उसका धैर्य टूट जाता है तब ऐसी घटनाएं होती हैं। दुर्भाग्य ये है कि इसके बाद भी हम केवल राहत और बचाव को ही कर्तव्यपूर्ति समझ बैठे हैं। वायनाड में जो हुआ उसका छोटा स्वरूप अतीत में अनेक स्थानों पर देखने मिल चुका है किन्तु उनसे कोई सबक नहीं लेना गंभीर लापरवाही है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि प्रकृति अकारण रौद्र रूप धारण नहीं करती। जब मानवीय हरकतें उसकी सहनशक्ति के बाहर हो जाती हैं तब ही कोई वायनाड होता है।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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