Saturday, 30 November 2024

खरगे जी में बड़ा बदलाव करने का न तो साहस है और न ही हैसियत


कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अनुभवी राजनेता हैं। गाँधी परिवार के प्रति  वफादारी ही उन्हें इस पद पर लेकर आई। यद्यपि उनका बेटा कर्नाटक में मंत्री है किंतु खरगे जी को अपने गृहराज्य का मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला।राष्ट्रीय अध्यक्ष पद भी उन्हें बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा की तर्ज पर मिला क्योंकि राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने  गाँधी परिवार को धता बताते हुए  अध्यक्ष बनने के लिए सत्ता छोड़ने से एन वक़्त पर इंकार कर दिया था। अध्यक्ष बनने के बाद भी वे स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाते। यही वजह है राज्यों के कांग्रेस संगठनों की हालत बेहद खराब होती जा रही है। कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में सरकार बना लेने के बाद कांग्रेस में जो उत्साह पैदा हुआ वह लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद और बढ़ गया। यद्यपि उसका श्रेय राहुल गाँधी के खाते में गया जिस पर किसी को न आश्चर्य हुआ और न ही ऐतराज क्योंकि पार्टी का चेहरा वही थे। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को दो बड़े झटके लगे। पहला हरियाणा और दूसरा महाराष्ट्र में।  कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह  हरियाणा और महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराकर भाजपा को पटकनी देने में सफल होगी। लेकिन जब परिणाम आये तब उसको सांप सूंघ गया। गाँधी परिवार दो राज्यों में मिली जबरदस्त पराजय के लिए दुखी होने के बजाय  प्रियंका वाड्रा के लोकसभा सदस्य बन जाने के जश्न में डूबा है। बहरहाल हार की समीक्षा के लिए पार्टी के बड़े नेताओं की बैठक में खरगे जी ने जो कहा वह राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बन रहा है। उन्होंने  चुनाव लड़ने के तरीके पर उंगली उठाते हुए आगाह किया कि अच्छे माहौल से संतुष्ट होकर बैठ जाना नुकसानदेह साबित होता है। साथ ही पार्टी के भीतर गुटबाजी पर भी नाराजी दिखाई । लेकिन सबसे बड़ी बात ये कही कि कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक बदलाव की जरूरत है। उनका ये कथन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब राहुल गाँधी ने महासचिव के रूप में कांग्रेस संगठन का काम संभाला तब उन्होंने भी इसी तरह की बात कही और संगठन के चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से करवाने की पहल की। युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए एक समूह भी बना जिसे टीम राहुल का नाम दिया गया। बाद में वे स्वयं पार्टी के अध्यक्ष बने किंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद पद छोड़ दिया। उनके उस कदम की प्रशंसा भी हुई किंतु किसी नये चेहरे  को आगे लाने के बजाय उनकी माँ सोनिया गाँधी को ही बागडोर सौंपकर परिवार का कब्जा बनाये रखा गया। इसी बीच प्रियंका भी सीधे महामंत्री बना दी गई और उ.प्र जैसे राज्य का प्रभार उन्हें दे दिया गया। लेकिन बीते कुछ सालों में राहुल के करीबी युवा नेता पार्टी  से निकलते गए। राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर श्री खरगे का  चयन बाकायदे चुनाव के जरिये हुआ किंतु वे गाँधी परिवार के प्रत्याशी थे , ये सर्वविदित है। दूसरी तरफ राज्यों के कांग्रेस संगठन में आंतरिक लोकतंत्र का कोई अता - पता नहीं है। पंजाब और राजस्थान में पार्टी के दो बड़े नेताओं का विवाद रोकने की बजाय आलाकमान ने खुद आग में घी डाला। अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के अलावा अशोक गहलोत और सचिन पायलट के झगड़े न रोक पाने के कारण पंजाब और राजस्थान में कांग्रेस की नैया डूब गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आर. पी. एन. सिंह और मिलिंद देवड़ा जैसे साथी पार्टी को अलविदा कह गए और राहुल देखते रहे। असम के मुख्यमंत्री हिमन्ता बिस्वा शर्मा भी एक उदाहरण हैं। म.प्र में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की चौधराहट ने कांग्रेस का सत्यानाश कर डाला। उ.प्र और बिहार में कांग्रेस घुटनों के बल पर है जबकि प.  बंगाल में उसका नाम तक डूब चुका है। प्रश्न ये है कि खरगे जी ने भी ऐसा क्या किया जिससे संगठन मजबूत होता? और जब वे ऊपर से नीचे तक बदलाव की बात कर रहे हैं तब तो बात गाँधी परिवार से ही शुरू होगी जिसके तीन सदस्य सांसद बन गए हैं। हालांकि आंतरिक लोकतंत्र तो लगभग सभी दलों में दम तो़ड़ चुका है लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति बेहद खराब है। जिसका प्रमुख कारण उसका एक परिवार के खूंटे से बंधा रहना और दूसरा वैचारिक पहिचान खो देना। चूंकि खरगे जी में इन दो विसंगतियों को दूर करने का न तो साहस है और न हैसियत इसलिए किसी बड़े बदलाव की बात सोचना भी मन को बहलाना मात्र है। कहीं ऐसा न हो कि हार का दोष उनके मत्थे मढ़ कर किसी और को अध्यक्ष बना दिया जाए। प्रियंका के सांसद बन जाने के बाद पार्टी में एक और शक्ति केंद्र उदय हो गया है। खरगे जी के प्रति पार्टी के प्रथम परिवार का रवैया कितना उपेक्षा भरा है इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जिस बैठक में वे उक्त बातें कह रहे थे उसमें से राहुल और प्रियंका बीच से ही उठकर चले गए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 November 2024

राहुल की अडानी विरोधी मुहिम पर विपक्षी दलों में ही मतभेद



संसद का शीतकालीन हंगामे की भेंट चढ़ रहा है। 4 दिनों में महज 40 मिनिट ही कामकाज चला। उद्योगपति गौतम अडानी के विरुद्ध अमेरिका में दर्ज प्रकरण को लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी उनकी गिरफ्तारी पर अड़े हैं। जेपीसी ( सं. संसदीय समिति) की मांग भी की जा रही है। हालांकि विपक्ष द्वारा संभल सहित अन्य कुछ मुद्दे  उठाकर भी  दोनों सदनों को चलने नहीं दिया जा रहा ।  लेकिन अडानी का विरोध राहुल का सबसे प्रिय मुद्दा होने से कांग्रेस पार्टी के बाकी नेता भी चाहे - अनचाहे उनके सुर में  सुर मिलाने लगते हैं। ऐसा लगता है उनकी अडानी से कोई निजी खुन्नस है। इसीलिए वे उनके खिलाफ बोलने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। रोचक बात ये है कि इस बारे में इंडिया गठबंधन में ही  एक राय नहीं है। हिंडनबर्ग विवाद के समय भी श्री गाँधी ने जेपीसी की मांग पर संसद की कारवाई नहीं चलने दी। तब अविभाजित रांकपा के अध्यक्ष शरद पवार और प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने उस मांग से किनारा कर लिया था। जिस ताजा विवाद पर अडानी के विरुद्ध मोर्चा खोलकर संसद की कारवाई को रोका जा रहा है उसे लेकर भी विपक्ष में फूट सामने आ गई । ममता तो पहले से ही अडानी का विरोध करने से बचती आई हैं किंतु चौंकाने वाली बात ये हुई कि केरल में सत्तारूढ़ वामपंथी दलों ने भी अडानी विरोधी मुहिम में साथ देने से इंकार किया है। इसका कारण राज्य में बंदरगाह बनाने अडानी की कंपनी से हुआ अनुबंध है। गौरतलब है वामपंथी राष्ट्रीय राजनीति में तो  इंडिया गठबन्धन का हिस्सा हैं किंतु केरल में उनके और कांग्रेस  के बीच 36 का आंकड़ा है । यहाँ तक कि वायनाड लोकसभा सीट पर राहुल के खड़े होने पर वामपंथियों ने एतराज जताते हुए अपना प्रत्याशी भी उतार दिया। रायबरेली से भी जीतने के बाद श्री गाँधी ने उक्त सीट खाली कर दी जिस पर हुए उपचुनाव में उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा जीतकर आई हैं। उनके विरुद्ध भी वामपंथी उम्मीदवार खड़ा हुआ था। दरअसल देश के सभी राज्य निवेशकों को आमंत्रित करने में जुटे रहते हैं।  अडानी इस समय देश के सबसे  बड़े निवेशकों में हैं। हर राज्य चाहता है वे उसके विकास में सहभागी बनें। यही वजह है कि राहुल के खुले विरोध को नजरंदाज करते हुए कांग्रेस शासित अनेक राज्यों ने इस समूह को बड़े - बड़े काम दिये जिसका स्पष्टीकरण पत्रकारों द्वारा मांगे जाने पर श्री गांधी उन पर भाजपाई होने का आरोप लगाने लगते हैं। उनका अडानी विरोध जनता के गले भी नहीं उतर रहा। हाल के वर्षों में  कांग्रेस को जहाँ भी चुनावी सफलता हासिल हुई उनमें अडानी मुद्दे की कोई भूमिका नहीं रही। लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में भी श्री गाँधी द्वारा अडानी की आड़ लेकर प्रधानमंत्री को घेरने का भरपूर प्रयास किया किंतु मतदाताओं ने लेश मात्र ध्यान नहीं दिया। और तो और  कांग्रेस के सहयोगी दलों को भी अडानी का लगातार विरोध बोझ लगने लगा है। संसद में अनेक छोटे - छोटे दलों के सांसद भी हैं। कारवाई नहीं चलने के कारण वे अपने क्षेत्र से  जुड़े मुद्दे उठाने से वंचित रह जाते हैं। कांग्रेस बेशक विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है किंतु उसके नेता की जिद के चलते बाकी पार्टियां महत्वहीन होकर रह जाएं ये तो कहीं से भी उचित नहीं है। अडानी या अन्य किसी ने भी कानून विरुद्ध कोई कार्य किया है तो उसे सजा मिलनी चाहिए किंतु इसके लिए संसद का बहुमूल्य समय नष्ट करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करना है। जहाँ तक बात सत्ता पक्ष की है तो उसके लिए राहुल का ये रवैया फायदेमंद है क्योंकि उसे जो कुछ पारित करवाना होता है वह  हंगामे के बीच भी हो जाता है। अब तो राजनीतिक विश्लेषक भी मानने लगे हैं कि श्री गाँधी द्वारा अडानी का अंधा विरोध उनकी हताशा को दर्शाने लगा है। ये बात भी चर्चा में आने लगी है कि अमेरिका से अडानी विरोधी जो धमाके हो रहे हैं उनके पीछे व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा का हाथ है। शरद पवार और ममता बैनर्जी के बाद जब वामपंथी भी अडानी मुद्दे पर श्री गाँधी के साथ खड़े होने तैयार नहीं हैं तब उन्हें  समझ लेना चाहिए कि उनकी बात से गठबंधन के साथी ही सहमत नहीं हो रहे । जनहित से जुड़े मुद्दे उठाना नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य है। अन्य सम -  सामयिक ज्वलंत विषयों पर भी उनके अभिमत का महत्व है क्योंकि वह उनके दल की नीति स्पष्ट करता है। लेकिन अडानी से जुड़े विवादों में श्री गाँधी के विरोध का औचित्य जब सभी विपक्षी दलों को समझ नहीं आ रहा तब आम जनता उससे कितनी प्रभावित होगी ये सोचने वाली बात है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 November 2024

बांग्ला देश के हिंदुओं की सुरक्षा के लिए समुचित कदम उठाना जरूरी

बांग्ला देश में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद जो अंतरिम सरकार गठित हुई उसका भारत विरोधी रुख पहले दिन ही सामने आ गया था। और जब भारत ने हसीना को अपने यहाँ पनाह दे दी तब रिश्तों में खटास और बढ़ गई। कूटनीतिक स्तर पर ऐसी बातें होती रहती हैं किंतु इस पड़ोसी मुल्क में भारत विरोधी भावनाओं ने जिस प्रकार हिन्दू समुदाय के प्रति नफरत का रूप ले लिया वह ख़तरनाक स्थिति में आ पहुँचा है। सत्ता बदलते ही हसीना विरोधी आंदोलन हिंदुओं के दमन में बदल गया। उनके घरों, मंदिरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर हमले और आगजनी के साथ ही महिलाओं का अपहरण और बलात्कार जैसी वारदातें आम हो चलीं। जब इसकी चर्चा वैश्विक स्तर पर हुई तब वहाँ की सरकार ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का दिखावा शुरू किया। हमला करने वालों पर कारवाई का नाटक भी हुआ। साथ ही ये सफ़ाई भी दी कि हिंदुओं पर हमलों की खबरों को बढ़ा - चढ़ाकर पेश किया जा रहा है जिससे कि बांग्ला देश की छवि  खराब हो। चौतरफा हमलों से परेशान हिंदुओं ने जब एकजुट होकर प्रदर्शन किये और सरकार पर दबाव बनाया तो मुस्लिम उग्रवादियों ने रणनीति बदलते हुए हिंदुओं के धार्मिक संगठनों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। मंदिरों के पुजारियों की धरपकड़ शुरू हो गई। इस्कान नामक संस्था के स्वामी चिन्मय कृष्ण दास पर देशद्रोह का आरोप लगाते हुए उनको जेल में बन्द करने के बाद इस्कान को धार्मिक कट्टरपंथी  संगठन घोषित करने की सरकार प्रायोजित मुहिम शुरू हो गई है। उल्लेखनीय है इस्कान एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जिसकी शाखाएं दर्जनों देशों में हैं। वह भव्य मंदिर बनाने के साथ ही  जन कल्याण के अनेक प्रकल्प संचालित करती है। आज तक  किसी भी देश में उसके बारे में शिकायत नहीं मिली। इसमें दो मत नहीं कि बांग्ला देश मुस्लिम बहुल है। लेकिन वहाँ के लोगों को ये नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान के शिकंजे से उन्हें भारत ने ही मुक्ति दिलाई थी। 1971 में अस्तित्व में आने के कुछ साल बाद ही वहाँ राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीब को मौत के घाट उतारकर कट्टरपंथी ताकतें सत्ता में आ गईं जिससे भारत विरोधी भावना को  संरक्षण मिलने लगा। हालांकि हसीना के सत्ता में रहने के दौरान भी हिंदुओं के दमन का अभियान जारी रहा। हालिया सत्ता परिवर्तन के बाद तो ऐसे हालात बना दिये गये जिनमें हिंदुओं के पास देश छोड़कर भारत आने के सिवाय और कोई चारा न बचे। यद्यपि उन्होंने  संगठित होकर विरोध शुरू कर दिया है किंतु सरकार ही जब मुस्लिम कट्टरपंथियों की पीठ पर हाथ रखे हो तब हिंदुओं का  भयभीत होना स्वाभाविक है। भारत की मजबूरी ये है कि वह  नये शरणार्थियों को स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि बांग्ला देश से सटे सीमावर्ती राज्यों की जनता इसके विरोध में है। 1971 में आये बांग्ला देशी शरणार्थियों को वापिस भेजने के काम में कोई सफलता मिली नहीं और उसके बाद भी उनका अवैध तरीके से आना जारी रहा। इसके परिणाम स्वरूप पूर्वी भारत के राज्यों में कई जिले पूरी तरह मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। वोट बैंक की राजनीति ने शरणार्थियों को नागरिकता दिलवाने में मदद की । केंद्र सरकार जब नागरिकता सम्बन्धी कानून लेकर आई तो विपक्षी दल उसके विरुद्ध खड़े हो गए। बांग्ला देश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहे हैं उनका विरोध केवल कूटनीतिक स्तर पर करना ही पर्याप्त नहीं है। समय आ गया है जब बांग्ला देश से आए शरणार्थियों को वापिस उनके देश भेजने का अभियान शुरू किया जाए। वे आसानी से जाने वाले नहीं हैं। ऐसे में उनसे मताधिकार छीनने  के साथ ही आधार कार्ड के जरिये मिल रही सुविधाएं रद्द की जाएं। देश हित में जरूरी है कि सभी राजनीतिक पार्टियों को बांग्ला देशी घुसपैठियों के विरोध में खड़ा होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक बांग्ला देश में हिंदुओं की सुरक्षा खतरे में ही रहेगी। वैसे  किसी देश के अंदरूनी मामलों में दखल देना तो उचित नहीं होता किंतु उनसे हमारे हित प्रभावित होते हों और सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगे तब बड़ा कदम उठाने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। हालांकि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद बांग्ला देश के वर्तमान सत्ताधारी चिंता में हैं किंतु भारत विरोधी हर देश को चूंकि चीन का समर्थन हासिल होता है इसलिए हमें ज्यादा सतर्क रहना होगा। इसके पहले कि मुस्लिम कट्टरपंथी अपने मकसद में कामयाब हों भारत को वहाँ के हिंदुओं की सुरक्षा के लिए समुचित उपाय करना चाहिए क्योंकि दुनिया भर में फैले हिंदुओं के लिए मुसीबत के समय यही एक सहारा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 27 November 2024

जीते तो नेता और नीतियाँ अच्छीं किंतु हारे तो ईवीएम जिम्मेदार




हरियाणा के बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो जाने के बाद कांग्रेस पूरी तरह हताश है। लोकसभा चुनाव के बाद  उसका जो उत्साहवर्धन हुआ था वह 6 माह के भीतर ही फुस्स होने लगा। न संविधान पर खतरे का नारा काम आया, न ही जातीय जनगणना। मतदाताओं को लुभाने वाली गारंटियां भी बेअसर रहीं। हरियाणा में जाटों और महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की भाजपा से नाराजगी के बूते चुनाव जीतने की उम्मीद भी धोख़ा दे गई। हालांकि जम्मू - कश्मीर में विजयी रही  नेशनल काँफ्रेंस और झारखंड में  जीते झामुमो के साथ गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल थी किंतु श्रेय क्रमशः उमर अब्दुल्ला और हेमंत सोरेन के हिस्से आया। जो राजनीतिक  विश्लेषक 4 जून के बाद राहुल गाँधी को सुपर स्टार की तरह पेश करने लगे थे वही अचानक उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाने लगे।  लेकिन कांग्रेस की मजबूरी ये है कि सफलता का श्रेय उसे गाँधी परिवार को देना ही पड़ता है जबकि पराजय के लिए  बलि के बकरे  खोजे जाते हैं। और ऐसा ही महाराष्ट्र के परिणाम के बाद देखने मिल रहा है। गत दिवस कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ईवीएम ( इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन )  पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए उसके विरुद्ध भारत जोड़ो यात्रा की तर्ज पर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने की घोषणा के साथ ही मतपत्रों से चुनाव करवाए जाने की मांग दोहराई। लेकिन  गत दिवस ही सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका रद्द करते हुए ईवीएम का विरोध करने वालों को जमकर लताड़ा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जहाँ जीत मिलती है वहाँ ईवीएम में कोई दोष नहीं निकालता किंतु हारने के बाद उसमें हेराफेरी की आशंका जताई जाती है। स्मरणीय है  लोकसभा चुनाव में उ.प्र और महाराष्ट्र में विपक्ष को जबरदस्त सफलता मिली जिसे मुद्दों की जीत बताकर ढोल पीटे गए । इसी तरह जम्मू - कश्मीर के नतीजों को धारा 370 हटाये जाने के विरुद्ध जनादेश कहकर उसका स्वागत किया गया। झारखंड में भी झामुमो की सफलता का कारण हेमंत सोरेन को जेल भेजने से आदिवासी समुदाय में उपजी नाराजगी के अलावा उनकी सरकार द्वारा संचालित जन कल्याणकारी योजनाओं को बताया गया। ऐसे में  हरियाणा और महाराष्ट्र में विपक्ष की पराजय के लिए ईवीएम पर संदेह किया जाना सच्चाई से मुँह मोड़ने जैसा है। चुनाव में निष्पक्षता और पारदर्शिता लोकतंत्र की सफलता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग से यही अपेक्षा की जाती है कि वह सत्ताधारी दल के नियंत्रण से मुक्त रहकर चुनाव प्रक्रिया को प्रामाणिक बनाये रखे। इसीलिए विभिन्न पार्टियों द्वारा उठाई गई शंकाओं के बाद आयोग ने उन्हें बुलाकर वोटिंग मशीनों में हेराफेरी साबित करने का अवसर दिया किंतु विपक्ष ने उसमें रुचि नहीं ली जिससे ये स्पष्ट हो गया कि उसके आरोपों में कोई दम नहीं है। उसके बाद हुए अनेक चुनावों में विपक्ष को उल्लेखनीय सफलता मिली जिस पर उसने जश्न भी मनाया। ऐसे में केवल हारने पर वोटिंग मशीन पर ठीकरा फोड़ना खीझ नहीं तो और क्या है ? किसी इलेक्ट्रानिक उपकरण में गड़बड़ी नहीं हो सकती ये दावा पूरी तरह सच नहीं है किंतु हजारों ईवीएम में एक साथ छेड़छाड़ संभव नहीं लगती। रही बात दुनिया के अनेक देशों द्वारा उनका उपयोग  बंद कर दोबारा मतपत्रों से चुनाव करवाने की तो उनकी आबादी और भौगोलिक आकार का ध्यान भी रखना होगा। यदि ईवीएम में राष्ट्रीय स्तर पर हेराफेरी संभव होती तो प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पंजाब का राजनीतिक परिदृश्य कुछ और होता। बेहतर हो विपक्ष इस मामले में बचकाना रवैया त्यागे। खरगे जी ईवीएम के विरोध में भारत जोड़ो यात्रा जैसा आयोजन करें  ये उनका अधिकार है। लेकिन इस मुद्दे पर उन्हें जनसमर्थन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि चुनाव हारने पर ईवीएम पर आरोप लगाना और जीतने पर अपने नेता और नीतियों को श्रेय देने की बात गले नहीं उतरती। हालिया चुनाव परिणामों के विश्लेषण में ज्यादातर लोगों का मानना है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा का चुनाव प्रबंधन काफी बेहतर रहा। दरअसल उसने लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद अपनी मैदानी तैयारियों पर ध्यान दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस 99 सीटें मिलने से ही खुशफहमी का शिकार हो गई। लगातार दो राज्यों में मिली हार के बाद उसे अपने संगठन पर ध्यान देने के साथ ही एक परिवार के स्तुति गान की बजाय नये ऊर्जावान नेतृत्व को प्रोत्साहित करना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक उसके पुनरुद्धार की कोई संभावना नहीं हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र में बुरी तरह मात खाने के बाद अब तो इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच भी उसका दबदबा कम हो गया। इसलिए खरगे जी को चाहिये वे ईवीएम का विरोध करने के बजाय अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करें क्योंकि  बतौर पार्टी अध्यक्ष चुनावी विफलताओं के लिए वे भी जिम्मेदार हैं। 

-रवीन्द्र वाजपेयी



Tuesday, 26 November 2024

संविधान की आड़ में समाज को टुकड़ों में बांटने का षडयंत्र चिंता का विषय


आज भारत के संविधान की 75 वीं वर्षगांठ है। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने इसके प्रारूप को स्वीकृत किया जिसके बाद 26 जनवरी 1950 को यह विधिवत लागू हुआ । संसदीय प्रजातंत्र उसी संविधान द्वारा प्रदत्त है। इसमें उल्लिखित मौलिक अधिकार  प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता प्रदान करते हैं। समाजवाद को अपनी प्रस्तावना में स्थान देने के बाद भी हमारे संविधान ने निजी संपत्ति के अधिकार को मान्यता प्रदान की। विश्व के सबसे बड़े  लिखित संविधान   का निर्माण जिन महानुभावों ने किया वे चूंकि समाज के प्रत्येक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले थे इसीलिए उसे किसी एक व्यक्ति या विचारधारा के बजाय हम भारत के लोगों द्वारा निर्मित बताकर आत्मप्रशंसा से बचा गया। हमारे साथ ही आजाद हुए पाकिस्तान ने भी अपना संविधान बनाया किंतु उसे इतनी मर्तबा तोड़ा - मरोड़ा गया कि उसकी मौलिकता दफन हो गई। बदलाव तो भारत के संविधान में भी बहुत हुए और आगे भी होंगे लेकिन सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विषमता के बावजूद भारत की एकता और अखंडता अब तक यदि अक्षुण्ण है तो इसका श्रेय देश की जनता को है जो अपनी अनगिनत और अनसुलझी परेशानियों के बाद भी धैर्य का परिचय देती आई है। वरना हमारे सभी पड़ोसी देशों में जनता का गुस्सा तख्ता पलट के रूप में देखने मिला। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त हमारी व्यवस्था संविधान आधारित है इसलिए किसी व्यक्ति या  विचारधारा का प्रभुत्व स्वीकार्य नहीं है। हालांकि  ऐसा करने का दुस्साहस हुआ किंतु जनता ने  उस कोशिश को नाकाम कर दिया और वह भी शांतिपूर्ण तरीके से अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है 1977 का लोकसभा चुनाव। 1975 में अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनका चुनाव अवैध घोषित किये जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने लोकतंत्र को कुचलकर संविधान की मर्यादा भंग करने की कोशिश की थी। विपक्ष को जेल में ठूंस दिया गया। समाचार माध्यमों पर सेंसर लगाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खत्म करने जैसा पाप हुआ। मौलिक अधिकार निलंबित कर दिये गए और अनुशासन पर्व के नाम पर देश को तानाशाही के शिकंजे में कसने की चाल चल दी गई। और कोई देश होता तो  उस अलोकतांत्रिक कदम के विरुद्ध वैसा ही कुछ होता जैसा पाकिस्तान, बांग्ला देश, म्यांमार और श्रीलंका में देखने मिला। लेकिन जनता ने संयम  से काम लेते हुए देश को गृह युद्ध से बचा लिया। जब श्रीमती गाँधी को लगा कि  विपक्ष को जेल भेजने पर जनता ने किसी प्रकार का रोष नहीं दिखाया तब उन्होंने 1977 में चुनाव का ऐलान करते हुए तानाशाही पर लोकशाही की मोहर लगवाने का दांव चला किंतु  19 महीने तक शांत रही जनता ने मतदान के जरिये क्रांति कर दी। इंदिरा जी की सत्ता तो गई ही वे खुद भी चुनाव हार गईं। उसके बाद से किसी शासक ने वह गलती तो नहीं दोहराई किंतु संघीय ढांचे के साथ ही सामाजिक  समरसता को छिन्न भिन्न करने का जो खतरनाक अभियान बीते तीन दशकों से देखने मिल रहा है वह चिंताजनक है। सत्ता हासिल करने के लिए देशहित को बलि चढाए जाने का अपराध जिस बेखौफ तरीके से हो रहा है उससे देश की एकता और अखंडता पर खतरा मंडरा रहा है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में संविधान की आड़ लेकर समाज में ज़हर फैलाने का दुष्कृत्य किसी षडयंत्र का हिस्सा ही था। समाज को जाति के नाम पर टुकड़े - टुकड़े करने का पाप उन्हीं लोगों द्वारा किया जा रहा है जो विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान की शपथ लेते हैं। संसद में जिस प्रकार अवरोध उत्पन्न किये जाते हैं वह संविधान का अपमान नहीं तो क्या है ? दुःख की बात ये है कि सभी राजनीतिक दल इसके लिए बराबरी से दोषी हैं। आज़ादी के 77 साल बीतने के बाद भी भाषा और प्रांत के बीच जो विवाद उत्पन्न किये जाते हैं वे संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है के नारे को अर्थहीन साबित करने का सुनियोजित प्रयास हो रहा है। संविधान में जिस लोक कल्याणकारी राज्य की कल्पना की गई थी वह कितनी साकार हो सकी इस पर गंभीर विमर्श आज की सबसे बड़ी जरूरत है। एक तरफ देश के करोड़ों लोग रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत जरूरतों से वंचित हैं, वहीं दूसरी तरफ एक वर्ग समृद्धि के कीर्तिमान बनाता जा रहा है। ऊपरी तौर पर  देखें तो भारत, दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर बढ़ता नजर आता है किंतु आर्थिक विषमता के चलते जमीनी स्थितियाँ असंतोषजनक हैं। केंद्र और राज्यों की सरकारें वैसे तो जनता के लिए खजाने खोलने में जुटी हुई हैं । ये तात्कालिक हल भले हो किंतु इससे असमानता को मिटाने में सफलता नहीं मिलने वाली। लोकतंत्र को बाजार और मतदाता को उपभोक्ता समझने का जो चलन आजकल प्रचलित है वह संविधान निर्माताओं की कल्पना के सर्वथा विपरीत है। इसलिए संविधान निर्माण के 75 साल पूरे होने के अवसर को रस्म अदायगी तक सीमित न रखते हुए लोकतंत्र को उसका वास्तविक स्वरूप प्रदान करने के बारे में राष्ट्रीय सहमति बनाने की जरूरत है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 November 2024

भाजपा क्षेत्रीय दलों के वर्चस्व को तोड़ने की रणनीति अपना रही


राजनीति संभावनाओं का खेल है। लेकिन उसमें  संकेतों का भी बड़ा महत्व है। इसीलिए महाराष्ट्र और झारखंड  के परिणाम भविष्य का संकेत कहे जा सकते हैं। हालांकि एक - दो राज्यों के चुनाव से भावी राष्ट्रीय राजनीति की कल्पना करना जल्दबाजी लगती है क्योंकि विभिन्न राज्यों की राजनीति एक दूसरे से अलग  है। लेकिन  जिस तरह के हालात बन रहे हैं उनके आधार पर ये कहा जा सकता है कि भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में  मुख्य भूमिका निभाने की पात्रता हासिल कर चुकी है। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि उसने कांग्रेस से वह हैसियत छीन ली जो केवल हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना में ही सत्तारूढ़ है। कुछ अन्य राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों पर आश्रित हो गई है। बीते कुछ दशकों के भीतर अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों का जो वर्चस्व बढ़ा उसने कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दिया। शेष, जहाँ भी उसकी भाजपा से सीधी टक्कर है वहाँ उसके पाँव उखड़ते जा रहे हैं जिसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। उसका समूचा ध्यान गाँधी परिवार के इर्द - गिर्द केंद्रित होकर रह गया है। लोकसभा चुनाव में उ.प्र और महाराष्ट्र ने भाजपा को स्पष्ट बहुमत से पीछे रहने बाध्य कर दिया था। उसके बाद से  ये अवधारणा स्थापित करने का प्रयास सुनियोजित ढंग से होने लगा कि  नरेंद्र मोदी का प्रभाव घटने लगा है। लेकिन महज 6 माह के भीतर ही भाजपा ने हरियाणा और महाराष्ट्र में शानदार प्रदर्शन करते हुए  साबित कर दिया कि उसका हौसला कायम है। यद्यपि जम्मू - कश्मीर और झारखंड के नतीजे उसके मुताबिक नहीं रहे किंतु दोनों में क्षेत्रीय दल ही सत्ता में आये। जम्मू - कश्मीर में भाजपा प्रमुख विरोधी पार्टी बनने में कामयाब रही जो बड़ी बात है। इसी तरह झारखंड में भी क्षेत्रीय पार्टी सरकार बचाये रखने में सफल रही। महाराष्ट्र में भाजपा ने जहाँ सफलता का कीर्तिमान बनाया वहीं लोकसभा चुनाव में राज्य में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली कांग्रेस का प्रदर्शन अब तक का सबसे दयनीय है। एक समय था जब महाराष्ट्र उसका गढ़ हुआ करता था परंतु पहले  वह शरद पवार की राकांपा से गठजोड़ करने मजबूर हुई और फिर  उस शिवसेना को गले लगा लिया जो हिंदुत्व को लेकर भाजपा से भी ज्यादा मुखर रही। हालांकि  उसकी संगत में आने से उद्धव ठाकरे तो डूबे ही किंतु खुद उसके पास भी  मुँह छिपाने की जगह नहीं बची। इस बारे में भाजपा की रणनीति पूरी तरह कामयाब रही जिसने पहले शिवसेना और बाद में राकांपा को तोड़ दिया। पार्टी नेतृत्व को ये बात समझ में आ गई है कि कांग्रेस को हराना उतना कठिन नहीं है जितना क्षेत्रीय दलों को। दरअसल वे स्थानीय मुद्दों और भावनाओं का प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय पार्टियों से बेहतर करते हैं। इसीलिये उसके निशाने पर अब क्षेत्रीय पार्टियां हैं। स्मरणीय है जम्मू कश्मीर में जब भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई तब उसके कट्टर समर्थकों में भी गुस्सा था किंतु कालांतर में स्पष्ट हो गया कि वह दूरगामी रणनीति का हिस्सा था। बिहार में भी नीतीश कुमार को लालू से दूर करने में भाजपा सफल हो गई। इस सबके पीछे उसकी कार्ययोजना यही है कि क्षेत्रीय दलों की शक्ति को छिन्न - भिन्न कर दिया जाए। महाराष्ट्र के मुकाबले के बाद अब दिल्ली, बिहार, प. बंगाल, तमिलनाडु  जैसे बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इनमें या तो कांग्रेस विपक्ष में है या फिर क्षेत्रीय पार्टियों के आसरे। भाजपा नेतृत्व जिस योजना पर काम कर रहा है उसमें क्षेत्रीय दल के मुकाबले खुद को बतौर विकल्प पेश करना और फिर सत्ता हासिल करना है। महाराष्ट्र में उसने शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे मजबूत स्तंभों को उन्हीं के सेनापतियों से हरवा दिया और खुद सबसे बड़ी और प्रभावशाली पार्टी बन बैठी। बिहार में भी उसके विधायक नीतीश कुमार से ज्यादा हैं। प. बंगाल में 10 सालों के भीतर भाजपा ने कांग्रेस और वामपंथियों को पूरी तरह अप्रासंगिक बनाते हुए तृणमूल कांग्रेस के विकल्प की स्थिति प्राप्त कर ली।  तमिलनाडु में वह अपनी पहिचान बनाने में कामयाब होती दिख रही है जबकि केरल में  तीसरी ताकत के रूप में कांग्रेस और वामपंथी मोर्चे की चिंता बढ़ा रही है। इसके विपरीत कांग्रेस के कर्ता - धर्ता ये समझ ही नहीं पाए कि उसका सत्यानाश करने में क्षेत्रीय दलों की ही भूमिका रही। इसके बाद भी वह  उ.प्र में अखिलेश यादव और बिहार में तेजस्वी की पिछलग्गू बनी हुई है। भाजपा ने तेलंगाना में बीआरएस को पीछे धकेलकर  भविष्य का रास्ता साफ कर लिया है। हालांकि पंजाब जैसा राज्य अभी भी उसकी पकड़ से बाहर है। लेकिन वहाँ अकाली दल के सिमटने के बाद वही आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बाद तीसरा विकल्प है। लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र और उ.प्र ने भाजपा को जोरदार झटका दिया था लेकिन पिछले हफ्ते आये परिणामों के बाद उन दोनों में उसने उस हार का बदला लेकर अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। दूसरी तरफ कांग्रेस इस बात पर ही खुश है कि वायनाड में प्रियंका वाड्रा जीत गईं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 23 November 2024

हरियाणा के बाद महाराष्ट्र में भाजपा की जीत से हिन्दू ध्रुवीकरण और तेज होगा

 

महाराष्ट्र और झारखंड दोनों के चुनाव परिणाम लगभग तय हो चुके हैं। महाराष्ट्र में भाजपा, एकनाथ शिंदे और अजीत पवार की महायुति ने लोकसभा चुनाव में लगे झटके से उबरकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर लिया है। इस राज्य में कांग्रेस  तो चारों खाने चित्त हुई ही शरद पवार और उद्धव ठाकरे की राजनीतिक यात्रा पर भी पूर्ण विराम लग गया। 200 से अधिक सीटों पर महायुति जीतने जा रही है। भाजपा, शिंदे और अजीत तीनों ने धमाकेदार प्रदर्शन करते हुए महा विकास अगाड़ी के सारे दावों की हवा निकाल दी। महाराष्ट्र में इस चुनाव जितनी कशमकश शायद ही पहले कभी दिखी हो। दोनों गठबंधनों ने पूरा जोर लगाया। भाजपा और कांग्रेस के अलावा शिवसेना और रांकापा के विभाजित धड़े दोनों गठबंधनों में बँटे हुए थे। इस चुनाव में ये तय होना था कि असली शिवसेना और राकांपा कौन सी है। एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के भाजपा के साथ जुड़ने के बाद ये कहा जा रहा था कि सहानुभूति क्रमशः उद्धव ठाकरे और शरद पवार के पक्ष में है। लोकसभा चुनाव परिणाम ने उस अवधारणा की पुष्टि भी की । लेकिन उसमें शिंदे गुट का प्रदर्शन संतोषजनक रहा जबकि अजीत खेमा कमजोर पड़ा। इसीलिए विधानसभा चुनाव में उसे महायुति की सबसे कमजोर कड़ी कहा जा रहा था। लेकिन भाजपा ने तो जबरदस्त प्रदर्शन किया ही शिंदे की शिवसेना और अजीत की राकांपा ने भी उम्मीद से ज्यादा सीटें जीतकर साबित कर दिया कि अब उनकी पार्टी ही असली है। राकांपा के संस्थापक शरद पवार के जीवन के आखिरी पड़ाव में उसी राजनीतिक दांव से चित्त हुए जिसके बल पर वे महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिकार माने जाते थे। बाला साहेब ठाकरे के पुत्र को कांग्रेस के साथ बिठा देना उन्हीं के बस की बात थी। इस चुनाव में श्री पवार ने बहुत कुछ खोया किंतु उनको ये संतोष रहेगा कि उनके किले पर फहराने वाला झण्डा अभी भी किसी पवार का ही होगा जबकि उद्धव ठाकरे अपने पिता के उत्तराधिकारी बनने के बाद उनकी विरासत को सहेजकर नहीं रख सके। आज उनकी स्थिति न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे  वाली होकर रह गई। मुसलमान उनको घास नहीं डालेंगे और हिंदुओं  से वे  खुद दूर हो गए। महाराष्ट्र के इन नतीजों को म.प्र की तर्ज पर शुरू की गई लाड़की बहन योजना का कमाल कहा जा रहा है जो काफी हद तक सही भी है किंतु बंटेंगे तो कटेंगे और एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे जैसे नारे ने भी हिन्दू मतदाताओं को गोलबंद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोकसभा चुनाव में आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष द्वारा किये गए प्रचार ने दलित और पिछड़े वर्ग को भाजपा के विरुद्ध खड़ा करने का काम किया था किंतु भाजपा ने रास्वसंघ की मदद से उन वर्गों का मत दोबारा हासिल कर लिया। मुस्लिम धर्मगुरुओं ने जिस प्रकार खुलकर महा विकास अगाड़ी के पक्ष में प्रचार किया उसने भी महायुति के पक्ष में हिन्दू ध्रुवीकरण करने में मदद की। महाराष्ट्र की ये जीत भाजपा के लिए जबरदस्त उत्साहवर्धक है। राजनीतिक  दृष्टि से दूसरे सबसे बड़े राज्य में सत्ता पर काबिज रहने का असर राष्ट्रव्यापी होगा। शरद पवार और उद्धव ठाकरे की शिकस्त से विपक्ष की राजनीति में खालीपन आ जायेगा। इंडिया  गठबंधन में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती मिलेगी। हरियाणा  के तुरंत बाद महाराष्ट्र की बड़ी हार से राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता  फिर से सवालों के घेरे में आ गई। उन पर चुनाव प्रचार ठीक से नहीं करने का आरोप भी लगा। कहते हैं उन्होंने ज्यादा समय वायनाड में प्रियंका वाड्रा को जिताने में लगाया। दूसरी तरफ झारखंड में हेमंत सोरेन  अपनी सरकार बचाने में कामयाब हो गए दिखते हैं। उनकी इस जीत में महिलाओं को प्रति माह दी जा रही धनराशि का योगदान पूरी तरह अपेक्षित था। बची - खुची कसर हेमंत के जेल जाने से संथाल समुदाय में उपजी नाराजगी ने पूरी कर दी। लेकिन झारखंड में भाजपा ने अपने स्थापित नेताओं को कमजोर करने की जो गलती की उसका दुष्परिणाम उसे भोगना पड़ा। हालांकि झारखंड छोटा सा राज्य है किंतु उसके नतीजे आगामी वर्ष होने वाले बिहार के चुनाव को प्रभावित करेंगे। लगातार दूसरी बार सरकार बनाने के बाद हेमंत आदिवासी समुदाय में बतौर नेता मजबूती से अपना प्रभाव जमाने में कामयाब हो  गए हैं। अभी तक ये गौरव उनके पिता शिबू सोरेन को हासिल रहा। भाजपा ने बाबूलाल मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष तो बना दिया किंतु मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं करने की गलती कर दी। काँग्रेस के लिए प्रियंका की जीत खुश होने का कारण हो सकती है किंतु देश भर में हुए उपचुनावों के जो परिणाम आये उनमें उसका प्रदर्शन बेहद निरशाजनक रहा। आगामी दो वर्षों में जिन राज्यों में चुनाव होंगे उनमें कांग्रेस केवल केरल में मुकाबले में है। भाजपा ने उ.प्र , म.प्र और राजस्थान में उपचुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर अपना आत्मविश्वास साबित कर दिया। विशेष रूप से उ.प्र में योगी सरकार ने उपचुनाव जीतकर अपना दबदबा कायम रखा। इन चुनावों की विस्तृत समीक्षा तो कई दिन चलेगी किंतु आज का दिन भाजपा को बल्ले - बल्ले और कांग्रेस के लिए मुँह छिपाने का है। लोकसभा में मिली 99 सीटों को लेकर उसको जो खुशी मिली वह हरियाणा और महाराष्ट्र ने फीकी कर दी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 November 2024

राहुल को भाजपा के सवालों का जवाब भी देना चाहिए


देश के सबसे चर्चित उद्योगपति गौतम अदाणी फिर विवाद में हैं।  इस बार भी  शुरुआत अमेरिका से  हुई। हिंडनबर्ग द्वारा किये  खुलासों के बाद अदाणी समूह संकट में आ गया था। उसके शेयर जमीन पर आ गिरे थे। देश में राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी तो अदाणी को घेरने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। जेपीसी  (संयुक्त संसदीय समिति ) गठित करने की मांग को लेकर संसद ठप कर दी गई। दरअसल अदाणी के जरिये श्री गाँधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हैं। लेकिन  वह मुहिम फुस्स होकर रह गई जब शरद पवार और ममता बैनर्जी ने उस मांग से किनारा कर लिया। उसी दौरान अदाणी और श्री पवार के बीच हुई मुलाकात भी चर्चा का विषय बन गई। धीरे - धीरे अदाणी समूह  उस झटके से उबर गया। कुछ समय पूर्व सेबी अध्यक्ष को लेकर अमेरिका में हुए खुलासे का असर भी  समूह के व्यवसाय पर हुआ किंतु वह हिंडनबर्ग जितना गम्भीर न होने से ज्यादा असर न डाल सका। बावजूद श्री गाँधी उस पर हमलावर बने हुए हैं। महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में श्री मोदी द्वारा एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे के नारे के जवाब में राहुल ने प्रधानमंत्री और अदाणी का एक पोस्टर जारी कर कटाक्ष किया कि उक्त नारे के जरिये श्री मोदी ने अदाणी को साथ रहने का संदेश दिया। मतदान के बाद कल अमेरिका में अदाणी और उनसे जुड़े कुछ लोगों के विरुद्ध अपराधिक प्रकरण दर्ज होने के साथ गिरफ्तारी वारंट जारी होने की खबर आ गई। आरोप ये है कि भारत में ऊर्जा आपूर्ति सम्बन्धी व्यवसाय हासिल करने  दी गई घूस के लिए अदाणी समूह ने  सरकारी  अधिकारियों को रिश्वत देने के लिए अमेरिका के पूंजी बाजार से निवेश प्राप्त किया जिसके लिए निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की गई। खबर आते ही श्री गाँधी ने अदाणी  की गिरफ्तारी की मांग  के साथ ये भी जोड़ दिया कि ऐसा नहीं होगा क्योंकि श्री मोदी उन्हें बचाते हैं। साथ ही इस मामले में भी जेपीसी गठन की बात छेड़ दी। 25 तारीख से संसद का सत्र शुरू होने वाला है। इसलिए कांग्रेस नेता को सरकार की घेराबंदी का बड़ा मुद्दा हाथ लग गया। उधर शेयर बाजार में अदाणी की कंपनियों के शेयर गोता खाने लगे।  दूसरी तरफ अदाणी समूह ने आरोपों से इंकार करते हुए कानूनी स्तर पर स्थिति से निबटने की बात कही। आगे क्या होगा ये कहना कठिन है किंतु ये बात ध्यान देने योग्य है कि अदाणी समूह के विरुद्ध अमेरिका से ही हमले क्यों हो रहे हैं? भारत के अन्य उद्योगपति भी विदेशों में बड़े पैमाने पर काम कर रहे हैं। उनके बारे में इस कभी कोई विदेशी एजेंसी इतनी गहराई में नहीं जाती जिससे ये संदेह होता है कि अदाणी  के विरुद्ध योजनाबद्ध तरीके से अभियान चलाया जा रहा है। यद्यपि इसके पीछे व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा है या राजनीतिक खुन्नस, ये निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता किंतु श्री गाँधी जिस तरह अदाणी को लेकर आक्रामक रहते हैं वह साधारण बात नहीं है। उनको इस बात की नाराजगी है कि अदाणी और प्रधानमंत्री बेहद करीब हैं और उन्हीं के संरक्षण में गौतम अदाणी का औद्योगिक साम्राज्य बीते दस सालों में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा। वैसे श्री गाँधी के निशाने पर अंबानी समूह भी रहता है। अक्सर वे एक साथ दोनों का नाम लेते हैं किंतु उनकी तोप का मुँह ज्यादातर अदाणी की ओर ही रहता है। लेकिन श्री गाँधी द्वारा अमेरिका में गौतम अदाणी और सहित अन्य लोगों के विरुद्ध गिरफतारी वारंट जारी होने के बाद जब प्रधानमंत्री को लपेटने का दांव चला गया तब भाजपा ने भी उन पर मिसाइलों की बौछार करते हुए कांग्रेस सहित उन गैर भाजपा शासित राज्यों के नाम गिना दिये जिनके संदर्भ में घूसखोरी का आरोप अदाणी समूह पर लगा है। अब तक भाजपा श्री गाँधी द्वारा अदाणी पर लगाए जाने वाले आरोपों पर जवाब देने से बचती रही है। खुद प्रधानमंत्री ने भी कभी मुँह नहीं खोला। हालांकि वे अंबानी और अदाणी से अपने रिश्तों को छिपाते भी नहीं हैं। हाल ही में मुकेश अंबानी के बेटे की शादी में भी वे शामिल हुए जबकि गाँधी परिवार को मुकेश द्वारा व्यक्तिगत रूप से न्यौता दिये जाने के बाद भी वह नहीं गया जबकि अंबानी समूह का उत्थान स्व.इंदिरा गाँधी के जमाने में हुआ था। इसीलिए  कांग्रेस के तमाम नेता अंबानी की दावत में नजर आये जिनमें सत्ता और संगठन दोनों से जुड़े दिग्गज थे। भाजपा ने कल जो सवाल पूछे उसका आधार भी यही दोहरा रवैया है। श्री गाँधी को भाजपा द्वारा उठाये गए उन सवालों का जवाब देना चाहिए कि अदाणी यदि गलत व्यक्ति हैं तो कांग्रेस के अलावा इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियों की राज्य सरकारों ने उन पर मेहरबानियों की बरसात क्यों की? और क्या श्री गाँधी में इतना साहस है कि वे श्री पवार और ममता से पूछें कि वे अदाणी के प्रति नर्म क्यों हैं ? हाल ही में अजीत पवार ने ये खुलासा किया कि भाजपा के साथ जाने का निर्णय जिस बैठक में लिया गया उसमें चाचा शरद पवार और गौतम अदाणी भी थे। क्या कांग्रेस उस बैठक के लिए श्री पवार से स्पष्टीकरण मांग सकती है? इस सबसे साफ होता है कि राहुल अभी भी परिपक्वता के उस स्तर से बहुत नीचे हैं जो देश लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष में अपेक्षित भी है और आवश्यक भी। शायद इसीलिए ऐसे मामलों में वे अकेले पड़ जाते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 21 November 2024

चुनाव खर्च कम करने के लिए किये गए उपाय कागजों तक सीमित


चुनाव आयोग द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार गत दिवस संपन्न दो  राज्यों में विधानसभा चुनाव के दौरान जप्त की गई नगदी का आंकड़ा 2019  की तुलना में काफी अधिक है। चुनाव में उपयोग हुआ जो काला धन , शराब , मादक पदार्थ और उपहार सामग्री   चुनाव आयोग की पकड़ से बाहर रहीं , उनका मूल्य कई गुना अधिक होगा। इससे स्पष्ट  होता है कि आयोग की सख्ती  के बाद भी मतदाताओं को लुभाने या सीधे तौर पर कहें तो खरीदने के लिए नगद राशि , शराब और अन्य चीजें बांटने जैसे तरीकों में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ। वह भी तब, जब अचार संहिता घोषित होते ही प्रशासन जबर्दस्त घेराबंदी करने लगता है। वाहनों को रोककर  छापेमारी जैसी कार्रवाई भी की जाती है जिसके परिणामस्वरूप  करोड़ों रुपयों  की जप्ती हो सकी।  चुनाव के दौरान आती रहीं खबरों के अनुसार  जमकर नगद रुपया , शराब आदि बांटी गई। मतदान के कुछ घंटों पूर्व तक गरीबों की बस्तियों में उक्त अवैधानिक कार्य खुलकर होते रहे। इसके लिए किसी एक पार्टी या प्रत्याशी को कटघरे में खड़ा  करना तो अनुचित  होगा क्योंकि चुनाव जीतने के लिए इस तरह के तरीके आम हो चुके हैं है। वाहनों की जो संख्या प्रत्याशी चुनाव कार्यालय को लिखकर देते हैं उससे ज्यादा का उपयोग होता है क्योंकि मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल निर्दलीय प्रत्याशियों के कोटे से अपने वाहन चलवाते हैं। सबसे बड़ा फर्जीबाड़ा तो प्रत्याशियों के खर्च का ब्यौरा है ।  चुनाव के दौरान ही उन्हें बीच - बीच में   उसकी  जानकारी  और मतदान के बाद चार्टर्ड अकाउंटेंट से ऑडिट करवाकर कुल खर्च का विवरण निर्वाचन अधिकारी के पास  जमा करना होता है। जिसे  देखकर हंसी आती है। निर्दलीय उम्मीदवार  कम खर्च दर्शाएं तो बात समझ में आती है किंतु भाजपा और कांग्रेस सहित अन्य दलों के प्रत्याशी जितना कम खर्च  दर्शाते हैं उसके सत्यापन की कोई सूक्ष्म व्यवस्था नहीं है । जब  कोई चुनाव याचिका पेश  होती है तभी  खर्च संबंधी विवरण का संज्ञान लिया जाता है। सही बात ये है कि  चुनाव के दौरान  तो सख्ती ऊपरी तौर पर नजर आती है किंतु हकीकत  ये है कि चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच तुम डाल - डाल तो हम पात - पात वाली स्थिति है। इसीलिए चुनावों में  बेतहाशा खर्च  रोकने  के उपाय उम्मीद पर खरे नहीं उतरते।  और फिर नगदी , शराब , नशीले पदार्थ और उपहार सामग्री जिनसे जप्त होती है उनमें से कितनों को और कितनी सजा मिली ये रहस्य है।  पकड़े जाने वाले कब छूट जाते हैं , पता ही नहीं चलता। नतीजा ये है कि चुनाव में काला धन , शराब और सामान बांटने वाले पूरी तरह से बेखौफ रहते हैं। मतदान के समय भले ही अन्य राज्यों का पुलिस बल तैनात किया जाता है किंतु प्रारंभिक दौर में तो स्थानीय प्रशासन और पुलिस ही चूंकि चुनाव का संचालन करते हैं जिनका नेताओं और शराब माफिया से  रिश्ता बताने की जरूरत नहीं हैं । दरअसल वे पूरी तरह ईमानदार हों तो चुनाव में अपनाए जाने वाले अनुचित और अवैध तरीकों पर काफी हद तक  रोक लग ही सकती है।  वर्तमान स्थिति  वाकई  हास्यास्पद है क्योंकि जिस बेरहमी से प्रत्याशी और राजनीतिक दल चुनाव में  पैसा लुटाते  हैं उसका आधा भी आयोग को दिए जाने वाले विवरण में नहीं दर्शाया जाता। स्व.टी. एन.शेषन ने चुनाव सुधार का जो हौसला  दिखाया था उसे आयोग द्वारा आगे तो बढ़ाया गया किंतु उसके जितने दावे  किये जाते हैं उतने जमीन पर नजर नहीं आने से चुनावी खर्च बढ़ता जा रहा है।  यही वजह है कि राजनीति में आने के इच्छुक बुद्धिजीवी और पेशेवर लोगों को मजबूरन किसी पार्टी का दामन थामना पड़ता है । लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब समाज का वह वर्ग भी चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा सके जिसके पास  बेतहाशा खर्च  का सामर्थ्य नहीं है। अन्यथा चुनावों का जो स्वरूप सामने आने लगा है वह और विकृत होता जाएगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 November 2024

उबाऊ होता जा रहा है कभी न खत्म होने वाला चुनावी सिलसिला

ज झारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की प्रक्रिया पूरी हो जायेगी। 23 नवम्बर को मतगणना के बाद ये स्पष्ट हो जाएगा कि जनता ने किसे सत्ता संभालने का अवसर दिया है। झारखंड में जहाँ झामुमो के हेमंत सोरेन को अपनी सत्ता बचाने संघर्ष करना पड़ रहा है वहीं महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे का राजनीतिक भविष्य दांव पर है। राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से देखें तो इन दोनों चुनावों के नतीजों से भाजपा की अगुआई वाले एनडीए और कांग्रेस के नेतृत्व में बने इंडिया  गठबंधन की भावी तस्वीर भी काफी कुछ साफ हो जाएगी। लोकसभा चुनाव के अप्रत्याशित परिणामों से एक तरफ जहाँ भाजपा को जबरदस्त धक्का लगा वहीं कांग्रेस 100 सीटों के करीब पहुँचने के बाद आत्मविश्वास से भर उठी। राहुल गाँधी  के प्रति राजनीतिक विश्लेषक अपनी धारणा में संशोधन हेतु मज़बूर हुए। लोकसभा में उनके भाषणों में जो आक्रामकता दिखी उससे विपक्ष को लगने लगा कि उसे प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की टक्कर का नेता मिल गया है। लेकिन कांग्रेस कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास में आ गई जिसके कारण उसने हरियाणा विधानसभा चुनाव में  गठबंधन के अन्य घटक दलों के लिए सीट छोड़ने से इंकार कर दिया। इससे नाराज होकर आम आदमी पार्टी ने 88 प्रत्याशी उतार दिये। हालांकि सबके सब जमानत गँवा बैठे किंतु इसकी वजह से कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ। यादव बहुल इलाकों में समाजवादी पार्टी को भी कांग्रेस ने उपकृत न करने की गलती की। हरियाणा वैसे तो  90 सीटों वाला राज्य है किंतु तमाम सर्वेक्षणों को झुठलाते हुए भाजपा ने वहाँ स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाकर अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को लोकसभा चुनाव नतीजों से उपजी निराशा से उबार लिया। दूसरी तरफ कांग्रेस और राहुल गाँधी के लिए हरियाणा चुनाव ने मुश्किलें बढ़ा दीं। इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों ने कांग्रेस को उलाहने देने शुरू कर दिये। इसका असर महाराष्ट्र में देखने मिला जहाँ शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को ज्यादा हिस्सा देने से इंकार कर दिया और   प्रत्येक को 85 सीटें मिलीं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस  इस राज्य की सर्वाधिक सीटें जीतकर महा विकास अगाड़ी में बड़े भाई की भूमिका में आ गई थी किंतु हरियाणा की हार ने उससे वह रुतबा छीन लिया। इसीलिए महाराष्ट्र का चुनाव राष्ट्रीय राजनीति की भावी दिशा तय करेगा । आगामी जितने भी विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें ज्यादातर में कांग्रेस सहयोगी दलों के भरोसे है। प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और और केरल में वाम दलों से उसका मुकाबला होगा जो  इंडिया गठबंधन में शामिल हैं। झारखण्ड में भी कांग्रेस झामुमो के पीछे चलने बाध्य है। यही स्थिति भाजपा के सामने भी है। महाराष्ट्र उसके लिए भी जीवन - मरण का सवाल बन गया है। इस राज्य में यदि उसको दोबारा सत्ता नहीं मिली तब हरियाणा में जीत की चमक फीकी पड़ते देर नहीं लगेगी। महाराष्ट्र में भी हरियाणा की तरह से ही भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति सरकार के बारे में  ज्यादातर सर्वेक्षणों का अनुमान नकारात्मक आने के बाद रास्वसंघ ने मोर्चा संभाला है क्योंकि उसे भी ये अंदेशा है कि इस राज्य में यदि एनडीए सत्ता में नहीं लौटा तो उसका असर मोदी सरकार के भविष्य पर  पड़ सकता है। इसी तरह झारखंड के नतीजे अगले वर्ष होने वाले बिहार के चुनाव को प्रभावित करेंगे। लेकिन इन चुनावों से एक बार फिर ये बात सामने आ गई कि कभी न रुकने वाली चुनाव प्रक्रिया न सिर्फ जनता बल्कि राजनीतिक दलों को भी बोझ लगने लगी है। इसीलिए नीति - सिद्धांतों की  बजाय मुफ्त उपहार बांटने की होड़ मची रहती है। स्टार प्रचारक बने नेता बजाय अपनी पार्टी का पक्ष रखने के विरोधी की आलोचना करने में अपना समय  खर्च करते हैं। सबसे बड़ी बात धन की बरबादी है।  लाखों -  करोड़ों की बात अब पुरानी हो चुकी है। अरबों - खरबों से कम किसी राज्य का चुनाव नहीं होता। इन दो राज्यों के चुनाव संपन्न होते ही दूसरे मोर्चे खुल जाएंगे। इनकी वजह से राष्ट्रहित में लिये जाने वाले नीतिगत निर्णय लंबित पड़े रहते हैं। काले धन का प्रवाह राजनीति का अपराधीकरण कर रहा है। दुर्भाग्य से इन मुद्दों पर विमर्श की किसी को फुर्सत नहीं है। इसीलिए एक देश एक चुनाव की चर्चा छिड़ते ही उसका विरोध शुरू हो जाता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 19 November 2024

व्यवस्था के निकम्मेपन की सजा भोग रही दिल्ली की जनता

देश का दिल कहे जाने वाली राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली  में वायु प्रदूषण खतरे के सारे मापदंडों को तोड़कर गंभीर होता जा रहा है। जो काम प्रदूषण नियंत्रण मंडल को करना चाहिए वह सर्वोच्च न्यायालय को करना पड़ रहा है। लेकिन वह भी डाँट - फटकार  के आगे कुछ भी करने में असमर्थ है। केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच क्षेत्राधिकार का झगड़ा सर्वविदित है। लिहाजा दोनों तरफ से आरोप - प्रत्यारोप का चिर - परिचित सिलसिला जारी है। सबसे ज्यादा ठीकरा फोड़ा जाता है पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा खेतों में जलाई जाने वाली पराली के धुएं पर।  इसके लिए  जुर्माने का प्रावधान किये जाने के बाद भी पराली जलाये जाने में कमी नहीं आई।  इसमें भी दो मत नहीं हैं कि किसान समुदाय की नाराजगी से बचने के लिए कोई भी सरकार उन पर कड़ी कारवाई करने से डरती है। इस मामले में ये पेच भी है कि जहाँ केंद्र और हरियाणा में भाजपा की सरकार है वहीं पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी सत्ता में है। ऐसे में पराली के मामले में दोनों पार्टियां बराबरी से जिम्मेदार मानी जायेंगी क्योंकि उनके द्वारा शासित राज्य की सरकार यदि सख्त हो तो कोई वजह नहीं  पराली जलाने पर लगी रोक को लागू न  किया जा सके। हालांकि इसके लिये किसान संगठनों को भी भरोसे में लेना होगा जो जरा - जरा सी बात पर ट्रैक्टर खड़े कर रास्ते जाम कर देते हैं। राजनीतिक पार्टियों का रुख भी चूँकि क्षणिक स्वार्थों से निर्देशित  होता है इसलिए वे दूरगामी हितों को नजरंदाज कर देती हैं। दिल्ली में एक साल चले किसान आंदोलन के दौरान ये बात स्पष्ट हो गई । उस दौरान तमाम विपक्षी नेताओं के अलावा न जाने कहाँ - कहाँ के संगठनों ने किसानों के धरने में घुसपैठ करते हुए उसे पटरी से उतार दिया।  इसी तरह पराली की समस्या के अलावा दिल्ली में वायु प्रदूषण के ख़तरनाक स्तर के भी ऊपर चले जाने के लिए भी राजनीति को जिम्मेदार मान लेना गलत नहीं है। उल्लेखनीय है कि पराली जलाये जाने की समस्या फसल कटने के बाद अर्थात वर्ष में दो या अधिकतम तीन बार ही उत्पन्न होती है जबकि दिल्ली में  बरसात वाले दिन छोड़ दें तो पूरे साल ही हवा में ज़हर घुला होता है। इसके कारण अज्ञात हों ऐसा भी नहीं नहीं है। वाहनों की बेतहाशा संख्या और  औद्योगिक इकाइयां भी वायु प्रदूषण की वजह है। राजधानी की शान कही जाने वाली यमुना की जो दुर्दशा है उसे दूर करने के लिए किये गए सरकारी वायदे जिस तरह धूल खा रहे हैं वह इस बात का प्रमाण है कि सरकार नामक व्यवस्था यमुना से अधिक सड़ी हुई है। दिल्ली में राष्ट्रीय राजधानी और सर्वोच्च न्यायालय होने से उसकी चर्चा देश भर में हो जाती है। लेकिन देश के बाकी महानगरों में भी वायु प्रदूषण की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के अंतर्गत जब शहरों के बीच स्वच्छता प्रतियोगिता रखी गई तब उसका मजाक भी उड़ाया गया। हालांकि उसके सकारात्मक परिणाम भी निकले। अनेक शहरों  में स्वच्छता को लेकर प्रशंसनीय जागरूकता देखने मिली और उन्होंने साल दर साल अपनी रैंकिंग में सुधार किया। म.प्र का इंदौर नगर लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर बना हुआ है। असलियत  ये है कि दिल्ली को प्रदूषण रहित बनाने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं किया गया जिससे वहाँ के लोगों में भी पर्यावरण सुधारने के प्रति इंदौर वासियों जैसी ललक पैदा होती। केजरीवाल सरकार द्वारा ऑड - ईवन फार्मूले का प्रयोग कर सड़कों पर वाहन कम करने की जो मुहिम चलाई वह भी फुस्स होकर रह गई। दरअसल दिल्ली केंद्र और राज्य सरकार के बीच रस्साकशी की सजा भोग रही है। भाजपा की तरफ से आम आदमी पार्टी की सरकार पर दिल्ली को गैस चेंबर बनाये जाने का आरोप मढ़ा जा रहा है। वहीं आम आदमी पार्टी केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय की भी अपनी सीमा है। इस सबके बीच फंसे  दिल्ली वासियों के फेफड़ों में ज़हर का बेरोकटोक प्रवेश जारी रहेगा । दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी होने का कलंक दिल्ली के माथे पर लगा रहना विकास की तमाम उपलब्धियों पर संदेह पैदा करता  है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 18 November 2024

आम आदमी पार्टी : ताजी हवा का झोका भी प्रदूषण का शिकार



हालांकि आजकल कौन सा नेता अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी में चली जाए, कहना  मुश्किल है क्योंकि सिद्धांत और विचारधारा का तो कोई महत्व रहा नहीं। लेकिन 2014 की मोदी लहर के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में धूमकेतु की तरह चमकी आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में ताजी हवा का झोंका माना जाने लगा क्योंकि उसमें अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया को छोड़ दें तो बाकी दूसरा चेहरा नहीं था जिसकी जनता के बीच कुछ पकड़ हो। नई नवेली पार्टी ने अति साधारण किस्म के लोगों को उम्मीदवार बनाकर जिस धमाकेदार अंदाज में दिल्ली का चुनाव जीता उसकी पूरे विश्व में चर्चा हुई। कांग्रेस का सफाया हो गया वहीं भाजपा भी  3 विधायकों तक सिमट गई। यही करिश्मा 2020 में भी दोहराया गया। और फिर दिल्ली नगर निगम भी आम आदमी पार्टी के कब्जे में चली गई। इन सबके कारण श्री केजरीवाल को प्रधानमंत्री का दावेदार माना जाने लगा। पंजाब में भारी बहुमत से सरकार बनाने के बाद तो उनकी महत्वाकांक्षाएं आसमान छूने लगीं । पार्टी ने रिकार्ड समय में राष्ट्रीय दल होने का गौरव भी हासिल कर लिया। हालांकि अन्य राज्यों में उसकी जमानत जप्ती का सिलसिला जारी रहा। जिसका ताजा उदाहरण हरियाणा का चुनाव है। कुछ राज्य में जरूर उसके विधायक जीते किंतु कांग्रेस का विकल्प बनकर भाजपा को चुनौती देने की जो उम्मीद श्री केजरीवाल ने पाल रखी थी वह तब फुस्स होकर रह गई जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरने के बाद पार्टी कांग्रेस की अगुआई में बने इंडिया गठबंधन में शामिल हो गई। जिन भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी कर श्री केजरीवाल अपने को ईमानदारी का पुतला बताते नहीं थकते थे उन्हीं से गले मिलकर उन्होंने ये साबित कर दिया कि ताजी हवा होने का दावा कर रही आम आदमी पार्टी भी दिल्ली के प्रदूषण का शिकार हो गई। बीते दो सालों में उसकी छवि लगातार दागदार होती गई। दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सहित कुछ और नेता भ्रष्टाचार के आरोप में जेल चले गए। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करने के बाद भी दिल्ली में उसे कुछ हासिल न हुआ। ऐसा लगता है राष्ट्रीय नेता बनने के फेर में श्री केजरीवाल अपने गढ़  में ही कमजोर होने लगे। हाल ही में दिल्ली के महापौर चुनाव में पार्टी के 10 विधायकों ने भाजपा प्रत्याशी का समर्थन किया। गत दिवस प्रदेश  सरकार के वरिष्ट मंत्री कैलाश गहलोत  वायदे पूरे नहीं करने के साथ ही मुख्यमंत्री आवास पर किये बेतहाशा खर्च के लिए श्री केजरीवाल पर तीखे आरोप लगाने के बाद आज भाजपा में शामिल हो गए। हालांकि वे मुख्यमंत्री न बनाये जाने से नाराज थे किंतु उन जैसे नेता का सरकार और  पार्टी छोड़ना इस बात का संकेत है कि  श्री केजरीवाल का दबदबा पहले जैसा नहीं रहा। इसका कारण उनकी  साफ - सुथरी छवि पर दाग लगना है। दिल्ली सरकार जिन जनकल्याणकारी नीतियों के चलते प्रसिद्ध हुई थी वे भी पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं। सबसे बड़ा धक्का लगा शराब घोटाले से मिली बदनामी से। वरना अपने गृहराज्य हरियाणा में श्री केजरीवाल की इतनी फजीहत न हुई होती। पार्टी छोड़ते समय श्री गहलोत ने जो आरोप लगाए उन्हें मुख्यमंत्री पद न मिलने से उत्पन्न खीझ भी कहा जा सकता है किंतु उनकी ये बात में पूरी तरह सही है कि श्री केजरीवाल ने केंद्र सरकार से लड़ने में काफी समय बर्बाद किया। हालांकि दूसरी पार्टी से नेताओं का आम आदमी पार्टी में आना भी जारी है। विशेष रूप से कांग्रेस से ज्यादा लोग आ रहे हैं। लेकिन स्वाति मालीवाल के बाद कैलाश गहलोत के बाहर निकलने से श्री केजरीवाल की वजनदारी घटी  क्योंकि ये दोनों उनके बेहद करीबी रहे हैं। हालांकि कुछ नेताओं के इधर - उधर होने से किसी पार्टी के भविष्य पर सवाल उठाना जल्दबाजी होगी किंतु ये तो मानना पड़ेगा कि आम आदमी पार्टी की कमीज भी बेदाग नहीं रही। जिस नई राजनीति से देश को परिचित करवाने का श्री केजरीवाल श्रेय लेते थे वह दिल्ली की यमुना जैसी होकर रह गई है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी भी देश की अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह ही सत्ता की अंधी दौड़ में शामिल नजर आने लगी है। इसीलिए उसे न भ्रष्टाचार से परहेज रहा और न ही भ्रष्ट नेताओं के साथ गलबहियाँ करने में। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 16 November 2024

न वैसे नेता रहे और न ही श्रोता: हाईटेक प्रचार में डूब गया विचार

समय के साथ सभी चीजें बदलती हैं। इसलिए चुनाव भी नए रंग और नए रूप में नजर आने लगे हैं। सघन जनसंपर्क अब औपचारिकता में बदल गया है। मतदाताओं की बढ़ती संख्या और निर्वाचन क्षेत्र के फैलाव ने प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसीलिए घर - घर जाकर दरवाजा खटखटाने वाले प्रचार की जगह अब हाईटेक संचार माध्यमों ने ले ली है। मोबाइल पर धड़ाधड़ संदेश आते हैं , प्रत्याशी का रिकॉर्डेड अनुरोध भी सुनाई देता है। सोशल मीडिया के सभी मंच चुनावी प्रचार से भरे हैं । बड़े  नेताओं के तामझाम भरे रोड शो होने लगे हैं। कुछ विशिष्ट हस्तियों के नाम पर भीड़ जमा करने का तरीका भी अपनाया जाने लगा है किंतु इस सबके बीच देर रात तक चलने वाली छोटी - बड़ी सभाएं अतीत बन चुकी हैं जिनमें विभिन्न दलों के नेता घंटों अपनी विचारधारा का बखान करते हुए मतदाताओं से समर्थन की अपील करते थे। वे नेता  हेलीकॉप्टर और चार्टर्ड विमानों से नहीं अपितु रेल या सड़क मार्ग से आते। उनके आने में  देर होने पर भी जनता उनको सुनने घंटों प्रतीक्षा करती रहती थी। नुक्कड़ सभाओं में प्रादेशिक या स्थानीय नेतागण अपनी पार्टी का पक्ष रखते थे। आज की तरह रैलियों में शामियाना और कुर्सियां नहीं लगती थीं । आगे बिछी कुछ दरियों पर पहले से आए श्रोता कब्जा जमा लेते और पीछे हजारों श्रोता खड़े -खड़े भाषण सुनते थे। प्रधानमंत्री के अलावा अनेक ऐसे राष्ट्रीय नेता भी थे जो भले सांसद - विधायक न रहे हों किंतु जनता उनको सुनने बेताब रहा करती थी। सबसे बड़ी बात ये थी कि उन नेताओं को सुनने के लिए वे लोग भी आते जो उनकी विचारधारा से सहमत नहीं होते थे । नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से प्रादेशिक नेता छोटे - छोटे श्रोता समूह से मुखातिब होते और लोग भी धैर्यपूर्वक उन्हें सुनते थे। समय बीतने के साथ चुनाव महंगे होते जा रहे हैं। चुनाव आयोग ने बीते कुछ दशकों में उनका रंग - रूप पूरी तरह बदल दिया। खर्च कम करने के लिए किए गए उपाय कितने सफल हुए ये बड़ा सवाल है क्योंकि धन का उपयोग पहले से कई गुना बढ़ गया है। रात 10 बजे सभाएं बंद कर दी जाती हैं। आयोग एक - एक कुर्सी और वाहन का हिसाब रखता है। चाय , समोसे तक का खर्च जोड़ा जाने लगा है। अखबारी विज्ञापन के अलावा सोशल मीडिया पर भी  हेट, फेक और पेड समाचार पर 24 घंटे निगाह रखी जाने लगी है। वृद्ध और निःशक्त मतदाताओं को घर पर मतदान की सुविधा भी शुरू हो गई है। मतदाता सूचियां बनाने और मतपर्चियां घर - घर भेजने का सरकारी इंतजाम  मत प्रतिशत बढ़ाने में  सहायक हुआ है। लेकिन चुनावी सभाओं का  असली आनंद  लुप्त हो गया है। न वैसे ओजस्वी वक्ता रहे और न ही प्रतिबद्ध श्रोता। इसका मुख्य कारण ये भी है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल और उनके नेता सत्ता में रह चुके हैं। ऐसे में वे केवल अपने विरोधी की आलोचना कर जनता को प्रभावित नहीं कर सकते। उन्हें सरकार में रहते हुए जनहित में किए गए कामों का हिसाब भी देना होता है।  वह पीढ़ी भी धीरे - धीरे समाप्त होती जा रही है जो किसी पार्टी  या नेता की अंधभक्त होती थी। नेहरू जी ,  डा.लोहिया और अटल जी जैसे जननेताओं के विरोधी भी उनके प्रति सम्मान का भाव रखते थे। धीरे - धीरे नेताओं का स्तर गिरने लगा जिसके परिणामस्वरूप राजनीति के प्रति समाज में व्याप्त आदर भाव में  भी कमी आती गई। आज देश में शायद ही कोई नेता बचा हो जिसको सुनने स्वस्फूर्त जनता उमड़ पड़ती हो। गांव और कस्बों में हेलीकॉप्टर देखने जरूर लोग जमा हो जाते हैं किंतु नेताओं को सुनने का लालच खत्म होने लगा है। और हो भी क्यों न , बीते 75 साल से भाषण सुनती आई जनता जब देखती है कि साधारण परिस्थिति का व्यक्ति तो चुनाव जीतने के बाद अपार धन संपत्ति अर्जित कर लेता है किंतु उसकी अपनी  दशा नहीं बदलती तब उसके मन में गुस्सा जागता है। और इसी गुस्से ने नेताओं के प्रति असम्मानजनक संबोधनों को जन्म दिया । जो राजनीति समाज को दिशा देती थी वह खुद ही दिशाहीन हो चली है । इसी तरह जिन नेताओं को जनता अपना पथ प्रदर्शक माना करती थी वे खुद भटकाव का शिकार  हैं। ये स्थिति अच्छी नहीं है जिसका प्रमाण राजनीति से अच्छे  लोगों का दूर होते जाना है। हालांकि सभी पार्टियों और नेताओं को कठघरे में खड़ा करना न्यायोचित नहीं होगा किंतु अधिकांश की साख में कमी आई है , जो लोकतंत्र के लिए शुभ  संकेत नहीं है। चूंकि हमारा समाज काफी धैर्यवान है इसलिए अपनी उपेक्षा और बदहाली पर उत्तेजित नहीं होता। हर चुनाव के बाद लोकतंत्र की मजबूती और मतदाताओं की समझदारी का बखान तो खूब होता है किंतु  अधिक मतदान और चुनाव के निर्विघ्न संपन्न हो जाने को ही सफलता और संतोष का पैमाना माना लेना सच्चाई से आंखें चुराने जैसा है। भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भले हो किंतु वह अपनी नैसर्गिक खूबसूरती खोता जा रहा है। कृत्रिमता , बाजारवाद और नीतिगत भटकाव उसकी पहिचान बन चुके हैं। चुनावों के  लगातार महंगे होने से भी उनकी गंभीरता और गरिमा में कमी आई है। नेताओं के आकर्षण में कमी आने का ही प्रमाण है कि पहले उनको देखने - सुनने जनसैलाब उमड़ा करता था किंतु अब वही नेता रोड शो के माध्यम से खुद को दिखाते नजर आते हैं।


-रवीन्द्र वाजपेयी

झांसी अग्निकांड : गलतियों से सबक न लेने का दुष्परिणाम


बात 3 साल पुरानी है। म.प्र की राजधानी भोपाल के  हमीदिया मेडिकल कालेज के शिशु रोग वार्ड में आग लगने से 4 नौनिहालों की दर्दनाक मौत ने इस अस्पताल की व्यवस्था की पोल खोल दी। उल्लेखनीय है यहाँ अति विशिष्ट लोगों की चिकित्सा भी होती है। चूंकि बात राजधानी की थी लिहाजा शासन - प्रशासन सब  चुस्त - दुरुस्त हो गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने  फरमान जारी कर दिया कि प्रदेश भर के अस्पतालों और ऊँची इमारतों में आग बुझाने के प्रबंधों की जाँच के बाद उपयुक्त इंतजाम न होने पर कड़ी कारवाई की जाए। फिर क्या था पूरे प्रदेश में फायर ऑडिट नामक मुहिम चल पड़ी। स्थानीय निकायों के अग्निशमन विभाग द्वारा अस्पतालों, ऊँची इमारतों और होटलों सहित व्यवसायिक परिसरों को आग बुझाने के पुख्ता प्रबंध होने का अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया जाता है। इसमें लापरवाही  के चलते ही इस तरह की दुर्घटनाएं होती हैं। लेकिन इसे विडंबना ही कहना  होगा कि उसी विभाग को फायर ऑडिट का जिम्मा दिया गया। कुछ दिनों तक तो पूरे प्रदेश में  खूब हल्ला मचा किंतु  कितने प्रतिष्ठानों अथवा भवनों पर अपर्याप्त अग्नि शमन  व्यवस्था  के चलते कारवाई हुई ये शायद ही कोई जानता होगा। 1997 में दिल्ली के एक सिनेमा हाॅल में आग लगने से भी बड़ी संख्या में मौतें हुईं थीं। इस तरह के हादसों के बाद सरकार और उसके मातहत चलने वाली व्यवस्था जिस प्रकार की उदासीनता दिखाती है वह किसी अपराध से कम नहीं है। मृतकों और घायलों को मुआवजा देकर लोगों के गुस्से पर पानी डालने का कर्मकांड होता है। राजनेता भी ऐसे अवसरों पर बनावटी आँसू बहाते दिख जाते हैं। हादसे के फ़ौरन बाद जनता के मन में उठा गुस्सा भी बुलबुले की तरह ही क्षणजीवी होता है। गत रात्रि उ.प्र के झाँसी शहर के मेडिकल कालेज में भी भोपाल के हमीदिया अस्पताल जैसा हादसा घट गया , जब शिशुओं के वार्ड में आग भड़कने से 10 नवजात बच्चे काल के गाल में समा गए। हालांकि वहाँ भर्ती काफी बच्चों को सुरक्षित निकाल लिया गया । राज्य के मुख्यमंत्री के निर्देश पर उपमुख्यमंत्री सरकारी अमले के साथ घटनास्थल पर पहुँच गए और त्रिस्तरीय जाँच की घोषणा कर दी। नियमानुसार मुआवजे का ऐलान भी हो गया। दोषियों को बख्शे नहीं जाने की हुंकार भी भरी जा रही है किंतु अव्यवस्थित व्यवस्था में सुधार करने की ईमानदार सोच के अभाव में किसी सकारात्मक परिणाम की उम्मीद करना बेमानी है। जिन नवजात शिशुओं का जीवन शुरू होते ही आग की लपटों में झुलस गया उनके माता - पिता और परिजनों को उक्त हादसा जो दर्दनाक यादें दे गया उनकी क्षतिपूर्ति कुछ लाख या करोड़ों रुपयों में संभव नहीं है। ये बात पूरी तरह सच है कि इस तरह की दुर्घटना को ऐसा कोई भी इंसान जान बूझकर अंजाम नहीं देता जिसके मन में थोड़ी सी भी मानवीयता है। लेकिन ये बात भी उतनी ही सच है कि उसके पीछे मानवीय लापरवाही अवश्य रहती है। यद्यपि ऐसे  हादसे उन विकसित देशों में भी होते हैं जहाँ सब कुछ चाक - चौबंद होता है। लेकिन वहाँ इस बात की चिंता की जाती है कि उसकी पुनरावृत्ति न हो। साथ ही जो व्यक्ति उसके लिए जिम्मेदार पाया जाता है वह  कितने भी बड़े ओहदे पर हो , दंड से नहीं बच सकता। उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ काफी सख्त प्रशासक माने जाते हैं। सरकारी अमले में उनका खौफ भी है। लेकिन जिस नौकरशाही के भरोसे सब कुछ छोड़ रखा जाता है वह अपनी जिम्मेदारी के पालन में कितनी ईमानदार है , इस प्रश्न का उत्तर अच्छे - अच्छों के पास नहीं है। और इसीलिए बड़े से बड़े हादसे कुछ दिन तक सुर्खियां बने रहने के बाद विस्मृतियों का शिकार हो जाते हैं। झांसी में हुई दुर्घटना के कारण तो जाँच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे किंतु प्रारम्भिक पूछताछ में ही ये स्पष्ट हो गया है कि आग बुझाने वाले संयंत्र चले ही नहीं क्योंकि वे एक्सपायर हो चुके थे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 15 November 2024

आदिवासियों के विकास में उनके नेता ही बाधा बन गए

जनजातीय समुदाय के महान नेता बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के तौर पर मनाया जाना पूरी तरह उचित है। झारखंड में जन्मे बिरसा ने अपने समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ते हुए अंग्रेजी सत्ता को जो चुनौती दी वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। जल, जंगल और जमीन से  जनजातीय समुदाय का जुड़ाव केवल अधिकार तक नहीं बल्कि भावनात्मक होता है। विकास की अंधी दौड़ के बावजूद यदि आज भी जो वन्य संपदा बची है उसका श्रेय इस समुदाय को ही है, जिसे आदिवासी भी कहा जाता है। बिरसा मुंडा ने गुलामी के उस दौर में भी शहरी चमक - दमक से दूर रहने वाले वन बंधुओं में जो जागृति उत्पन्न की वह किसी क्रांति से कम नहीं थी। ये बात भी धीरे - धीरे ही सही किंतु सामने आ ही गई कि आजादी के आंदोलन में आदिवासी समुदाय का योगदान भी भरपूर था। जबलपुर में इस समुदाय के ही रघुनाथ शाह  और शंकरशाह को अंग्रेजों ने मौत की सजा दी थी। ऐसे महान देशभक्तों को सम्मानपूर्वक याद करना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। आजादी के बाद से ही दलितों के साथ ही आदिवासी समुदाय को भी आरक्षण के जरिये मुख्य धारा में लाने का अभियान प्रारंभ हो गया था। संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधितित्व सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्र सुरक्षित किये गए। उन्हें सरकार में भी हिस्सेदारी दी जाने लगी। इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्रों के विकास पर भी ध्यान दिया गया। वहाँ शिक्षा,  चिकित्सा, सड़क, पेयजल और बिजली आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराने विशेष बजट रखा जाने लगा।  आरक्षण का लाभ मिलने से न सिर्फ संसद और विधानसभाओं में उनकी भागीदारी नजर आती है बल्कि प्रशासन में भी आदिवासी महत्वपूर्ण पदों तक पहुँच सके। शासकीय योजनाओं के चलते विकास की रोशनी भी धुंधली ही सही किंतु  दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों तक पहुँच सकी। बीते एक - दो दशकों में उनमें राजनीतिक तौर पर भी  जागृति आई है। अपने अधिकारों के लिए वे भी दलित समुदाय की तरह लामबंद होना सीख गए हैं। अंग्रेजी राज के जमाने में ही ईसाई मिशनरियों ने आदिवासी समुदाय में मतांतरण की मुहिम प्रारंभ की जिसके चलते सुदूर क्षेत्रों में भी चर्च बनते गए। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के जरिये मिशनरियों ने उन्हें ईसाई बनाना शुरू किया। पूर्वोत्तर राज्यों में तो  रिकार्ड ईसाईकरण हुआ। उसके अलावा झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, म.प्र , छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र सहित देश के हर उस अंचल में ईसाई मिशनरियों  ने अपना जाल बिछाया जिनमें  आदिवासी बाहुल्य था।  सत्तर के दशक में पनपे  नक्सलवादी गुटों ने भी आदिवासियों पर ही ध्यान केंद्रित किया। उनके मन में व्यवस्था के प्रति विद्रोह के अलावा ये धारणा भरी गई कि वे हिन्दू नहीं हैं। इसके पीछे  आदिवासी समाज को मुख्य धारा से अलग करने का षडयंत्र  ही था। ये मानने में कुछ भी बुराई नहीं है कि ईसाई मिशनरियों के साथ ही नक्सलवादियों ने जनजातीय समुदाय में अपनी पैठ काफी गहराई तक कायम कर ली। लेकिन इसके लिए केवल उनको दोषी देना अन्याय होगा। हिन्दू समाज के साधु - संतों ने इन वन बंधुओं की जो उपेक्षा की उसके कारण ही देश विरोधी ताकतें उनको मुख्यधारा से दूर ले जाने में सफल हुईं। इससे भी बढ़कर आदिवासियों के नाम पर नेता बने लोग कसूरवार हैं जिन्होंने सत्ता तो उनके समर्थन से हासिल की लेकिन उसके बाद उनको उपेक्षित करते हुए अपना और परिवार का विकास किया। नरेन्द्र मोदी सरकार ने भले ही द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर आदिवासी समुदाय को गौरव की अनुभूति करने का अवसर दिया हो किंतु जमीन पर स्थिति बहुत ही अलग है। जो लोग आदिवासियों को मिले आरक्षण का लाभ लेकर ऊँचे पदों पर जा बैठे उन्होंने केवल अपने कुनबे का भविष्य संवारने पर ध्यान दिया। इसके चलते शासन और प्रशासन दोनों में कुछ सीमित लोग ही आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते देखे जा सकते हैं, सर्वोच्च न्यायालय ने जब क्रीमी लेयर का मुद्दा उठाया और आरक्षण का लाभ ले चुके लोगों से दूसरों के लिए त्याग करने की अपेक्षा की तो लाभान्वित वर्ग एकजुट होकर विरोध करने लगा। यही कारण है कि आठ दशक बाद भी आदिवासी समुदाय का जितना विकास होना था नहीं हो सका। जनजातीय गौरव दिवस की धूमधाम के साथ ही इस बात पर भी चिंतन - मनन होना चाहिए कि इस वर्ग के उत्थान के लिए किये गए प्रयासों का समुचित लाभ उस तक क्यों नहीं पहुंचा ? जब तक इस प्रश्न का उत्तर तलाशकर उचित समाधान नहीं निकलता तब तक आदिवासी समाज को मुख्यधारा में लाने  का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा और ईसाई मिशनरियों के साथ ही नक्सलियों को भी देश को कमजोर करने का अवसर मिलता रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 14 November 2024

झोपड़ बस्तियाँ विकास के दावों पर सवालिया निशान हैं


देश की आर्थिक राजधानी मुंबई  अनेक बातों के लिए चर्चा में रहती है । अरब सागर के किनारे बसे मुंबई का फिल्म उद्योग अभिनय करने के इच्छुक युवक - युवतियों को यहाँ खींच लाता है। पूरे देश से आकर बसे लोगों ने इस महानगर को लघु भारत का रूप दे दिया है। एक समय था जब शिवसेना जैसी राजनीतिक पार्टी ने पहले दक्षिण भारतीय और बाद में उत्तर भारतीयों के विरुद्ध बेहद आक्रामक रवैया दिखाया। यहां तक कि नौकरी के लिए परीक्षा और साक्षात्कार के लिए आने वाले अन्य राज्यों के युवाओं पर हमले भी हुए। हालांकि बाद में वोट बैंक के दबाववश वह मुहिम ठण्डी पड़ती गई। इसीलिए  आज की  मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी होते हुए भी केवल मराठियों की नहीं रही। उद्योग -  व्यवसाय के सिलसिले में पूरे देश के उद्यमी इस महानगर में आकर अपना भाग्य चमकाते हैं। देश और दुनिया के हजारों  धन कुबेर यहाँ बसे हुए हैं। लेकिन दूसरी तरफ इस नगर में लाखों लोग ऐसे भी हैं जिनके पास रहने का स्थान न होने से वे फुटपाथ पर ही गुजारा करने मजबूर हैं। इसी तरह  मुंबई की तमाम शान - शौकत के साथ यहाँ एशिया की सबसे बड़ी और विश्व की तीसरे नम्बर की झुग्गी बस्ती धारावी भी है जिसमें 60 हजार परिवारों के 10 लाख लोग बेहद दयनीय हालातों में रहते हैं । धारावी अपने आप में एक शहर है जिसमें लोग रहते ही नहीं बल्कि यहाँ करोड़ों का कारोबार भी होता है। सैकड़ों छोटे - छोटे कल -  कारखाने भी यहाँ से संचालित होते हैं। इस झोपड़ बस्ती में अपराधों को भी संरक्षण मिलता है। धारावी में माफिया राज भी धड़ल्ले से चलता है। कुल मिलाकर धारावी इस महानगर के माथे पर कलंक की तरह है जिसे मिटाने के लिए लम्बे समय से योजनाएं बनाई जाती रहीं किंतु नतीजा शून्य ही रहा। राज्य और केंद्र में सरकारें बदलती रहीं किंतु उसका दुर्भाग्य दूर नहीं हो सका तो उसका बड़ा कारण राजनेताओं में ईमानदारी और इच्छाशक्ति का अभाव ही रहा। कुछ बड़े उद्योगपतियों ने भी धारावी  के उद्धार की पहल कि परंतु वह भी राजनीतिक खींचातानी में उलझकर रह गई। डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मुंबई को चीन के शंघाई शहर जैसा व्यवस्थित बनाने के ख्वाब भी दिखाये गये किंतु वे साकार नहीं हो सके। महाराष्ट्र विधानसभा के मौजूदा चुनाव में धारावी का विकास बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इसके पुनरोद्धार के लिए अडानी उद्योगसमूह को ठेका मिला है। धारावी में स्थायी रूप से बसे लोगों को फ्लैट बनाकर देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि अडानी को काम मिलने का गैर भाजपा पार्टियां विरोध भी कर  रही हैं। ये भी सुनने में आ रहा है कि मुंबई का भू माफिया भी धारावी को विकसित नहीं होने देना चाहता जिसके पीछे ज्ञात - अज्ञात अनेक कारण हैं। दरअसल इस बस्ती में कुछ माफिया सरगनाओं के कब्जे में बड़ी संख्या में घर हैं जिनका वे किराया वसूलते हैं। उनको डर है कि धारावी से झोपड़ पट्टियां हटने से उनकी आय का स्रोत बंद हो जाएगा। विरोध का एक कारण धारावी का अपराधियों की कर्म भूमि होना भी हैं। इसकी सघनता इतनी ज्यादा है कि पुलिस के लिए यहाँ चल रही अपराधिक गतिविधियों को रोक पाना और उनसे जुड़े लोगों को पकड़ना बेहद कठिन है। ये भी कहा जाता है की धारावी मुंबई पुलिस की अवैध कमाई का बड़ा जरिया है। यही वजह है कि राज्य और केंद्र की सरकारों द्वारा समय - समय पर धारावी को विकसित करने की जो योजनाएं बनाई गईं वे कागजों से आगे नहीं बढ़ सकीं। ऐसे में यदि वर्तमान महायुति सरकार सत्ता में लौटी तब धारावी के विकास की संभावना जीवित रहेगी किंतु  महा विकास अगाड़ी सत्ता में आई तो अडानी से खुन्नस के चलते रोड़े अटकाए जाने की आशंका प्रबल हो जाएगी। सही बात ये है कि  धारावी जैसी विशाल झोपड़ बस्ती मुंबई के अलावा अन्य किसी महानगर में भले न हो किंतु छोटे  आकार में ही सही उनकी मौजूदगी वहाँ है। ये बात निःसंकोच कही जा सकती है कि ये  झोपड़ बस्तियाँ विकास के समूचे दावों की पोल खोल देती हैं। साथ ही राजनेताओं के निकम्मेपन का जीता - जागता प्रमाण भी हैं जो सत्ता में आते ही अपने रहने के लिए तो शानदार घर बनवा लेते हैं किंतु गरीबों की बदहाली दूर करने में उनको कोई रुचि नहीं है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री आवास योजना लागू कर साधनहीन जनता की आवास समस्या दूर करने की जो पहल की उसके अच्छे परिणाम निकल रहे हैं। लेकिन उनके निर्माण में गुणवत्ता का जबरदस्त अभाव है। बेहतर हो धारावी के विकास जैसी योजना पूरे देश के लिए बने और उस पर तेजी से काम हो । वरना सबका साथ, सबका विश्वास का नारा भी गरीबी हटाओ की तरह झांसेबाजी में बदलकर रह जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 13 November 2024

सैकड़ों राजाओं की जगह पैदा हो गए हजारों नेता


महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस बात से भन्नाए हुए हैं कि चुनाव आयोग ने उनके बैग की तलाशी ले ली। उन्होंने इसे अपनी तौहीन मानते हुए कहा कि पहली बार उनके साथ ऐसा हुआ । साथ ही आयोग को चुनौती दी कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बैग की जांच करने की हिम्मत भी दिखाए। जवाब में आयोग ने बताया कि वह श्री शाह के साथ ही भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के बैग की तलाशी भी कर चुका है। ये जानकारी भी आई कि ऐसी ही जाँच केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की भी की जा चुकी है। आचार संहिता लगने के बाद चुनाव आयोग के निर्देश पर पुलिस राह चलते वाहनों को रोककर जाँच करती है कि कहीं उनमें नगद रुपये या शराब तो नहीं ले जाई जा रही। आम जनता और व्यापारी इससे परेशान भी होते हैं । लेकिन  साधारण से राजनीतिक नेता तक को  ये बर्दाश्त नहीं होता कि उसके साथ सामान्य नागरिक जैसा व्यवहार हो। चुनाव के समय  शासन में बैठे मंत्रियों तक को विशिष्ट सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है। सरकारी वाहन और विश्राम गृह की व्यवस्था भी स्थगित रहती है।  चूंकि काले धन का उपयोग चुनाव में धड़ल्ले से होता है लिहाजा उसे रोकने के लिए नेताओं और आम जनता के वाहनों और सामान की तलाशी ली जाती है। इस दौरान बड़ी मात्रा में नगदी बरामद भी होती रही है। हालांकि इसके लिए कितने लोग दंडित हुए ये पता नहीं चलता। इसीलिए इस कारवाई को रस्म अदायगी माना जाता है। आयकर और ईडी भी चुनाव के समय छापेमारी  करते हैं। उसका उद्देश्य भी काले धन की पतासाजी करना ही  है किंतु विपक्ष का आरोप होता है कि सरकार इन संस्थाओं के जरिये उसके समर्थकों को प्रताड़ित करती है। वहीं सरकार इसे सामान्य प्रक्रिया  बताकर बचाव करती है।लेकिन इस सबके बीच सवाल उठता है कि श्री ठाकरे को उनके बैग की जाँच पर इतना बुरा क्यों लगा ? उनका ये कहना कि जीवन में पहली बार ऐसा हुआ इस बात का परिचायक है कि वे अपने को कानून से ऊपर मानते हैं। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ इसलिए इस बार होने पर  अपमान महसूस होना ही वह सामंती मानसिकता है जिससे अधिकांश राजनीतिक नेता ग्रसित हैं। इसका प्रगटीकरण केवल चुनावों के दौरान ही होता हो ऐसा नहीं है। आये दिन कहीं न कहीं नेतागण अपनी शान में गुस्ताखी का रोना रोते हुए नजर आते हैं। टोल नाके में उनसे टोल मांगे जाने पर तोड़ - फोड़ और मारपीट सामान्य बात है। यातायात नियमों को तोड़ना उनके लिए प्रतिष्ठा सूचक होता है। यदि किसी  पुलिस वाले ने उनका चालान करने का दुस्साहस किया तो नेताजी उसकी वर्दी उतरवाने की धमकी देकर रौब दिखाने से बाज नहीं आते। सत्ता में बैठे महानुभावों की अकड़ देखकर दूसरे भी उसकी नकल करने में पीछे नहीं रहते। इस सबका परिणाम ही है कि लोकतंत्र  के बाद भी एक बड़ा वर्ग अपने को राज परिवार का सदस्य मानकर अहंकार में डूबा रहता है।  वाहन की  नंबर प्लेट पर नंबर की बजाय अपने पद का नाम लिखकर  श्रेष्ठता प्रदर्शित करना आम बात है। उद्धव इस प्रकार की अकड़ दिखाने वाले अकेले नेता नहीं हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राजनीतिक बिरादरी के ज्यादातर लोग नव सामंतवाद के जीवंत प्रतीक हैं। अभी हाल में केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक जबलपुर आये थे। उन दिनों दीपावली की खरीदी की वजह से बाजारों में काफी भीड़ होने से चार पहिया तो क्या दो पहिया वाहन ले जाना तक कठिन था। मंत्री जी ने बजाय अपना रुतबा दिखाने के पार्टी कार्यकर्ताओं के स्कूटर / मोटर साइकिलों पर लोगों के घर जाने का निर्णय लिया और बिना तामझाम के कब आये कब चले गए किसी को पता नहीं चला। श्री खटीक अपने निर्वाचन क्षेत्र में भी इसी तरह लोगों के बीच आते - जाते हैं। सांसद रहते हुए स्टेशन से ऑटो में आते हुए उन्हें देखा जाना सामान्य बात थी। ऐसे नेताओं की तारीफ उनके संगी - साथी ही नहीं बल्कि विरोधी भी करते हैं किंतु जब अनुसरण की बात उठती है तो कन्नी काट लेते हैं। राहुल गाँधी और शिवराज सिंह चौहान के रेस्टारेंट में भोजन करने के फोटो समाचार बन जाते हैं , जबकि इसमें अनोखा क्या है ? इंदिरा गाँधी ने  जब 500 से अधिक राजा - महाराजाओं के प्रीवीपर्स बंद किये तो उसे समाजवाद की दिशा में बड़ा कदम माना गया था किंतु आज नेताओं की शक्ल में जहाँ देखो वहाँ नव सामंत नजर आते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 12 November 2024

महाराष्ट्र के चुनाव में अनेक नेताओं का राजनीतिक भविष्य दांव पर


महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव पर पूरे देश की निगाह लगी है क्योंकि  वह अनेक सितारों से भरी किसी हिन्दी फिल्म जैसा एहसास करवा रहा है। इसका परिणाम नई सरकार का फैसला ही नहीं बल्कि अनेक राजनेताओं का राजनीतिक भविष्य भी तय कर देगा। मुख्य रूप से  वे हैं शरद पवार, उद्धव ठाकरे, अजीत पवार और एकनाथ शिंदे। भाजपा नेता देवेंद्र फड़नवीस के लिए भी ये  महत्वपूर्ण चुनाव है क्योंकि यदि महायुति को बहुमत मिला और शिंदे गुट अच्छी खासी सीटें जीत गया तब भाजपा श्री फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाने का खतरा शायद ही मोल ले क्योंकि वैसा करने पर श्री शिंदे भी पाला बदल सकते हैं। और यदि केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें महाराष्ट्र से हटाकर दिल्ली बुलाया तब प्रदेश में उनका स्थान लेने अन्य नेता सामने आये बिना नहीं रहेंगे। चिंता की लकीरें श्री शिंदे के माथे पर भी कम नहीं हैं क्योंकि सत्ता गई तब वे कितने समय तक अपने साथ आये नेताओं और  शिवसैनिकों को अपने पाले में रख पाएंगे, ये बड़ा सवाल है। यद्यपि इस तरह की चिंता उद्धव ठाकरे को भी सोने नहीं दे रही । उन्हें  डर है कि  परिणाम  महा विकास अगाड़ी के विपरीत गए तब मातोश्री का  रहा - सहा दबदबा भी जाता रहेगा और जो शिवसैनिक अब तक उनके प्रति वफादार बने हुए हैं वे भी शिंदे गुट के साथ जाने में नहीं हिचकेंगे। ये आशंका भी उन्हें सता रही है कि बहुमत मिलने की स्थिति में भी पवार और कांग्रेस इस बार उनकी ताजपोशी नहीं होने देंगे और इसीलिए अगाड़ी ने किसी को भावी  मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं किया। अपने भविष्य को लेकर चिंता पवार परिवार में भी कम नहीं है क्योंकि कोई भी गठबंधन जीते चाचा और भतीजे में से किसी एक के सियासी सफर का  अंत  होना तय है। सबसे ज्यादा खतरे में हैं अजीत क्योंकि उनको विधानसभा में जाने से रोकने के लिए शरद पवार ने जिस प्रत्याशी को उतारा है वह उनका भतीजा है। इस दांव से बुजुर्ग पवार ने लोकसभा चुनाव में अजीत द्वारा उनकी बेटी सुप्रिया सुले के विरुद्ध पत्नी को लड़ाये  जाने का बदला लिया है। लेकिन अजीत को सफलता मिली तो वे पवार परिवार के अघोषित मुखिया बन जाएंगे। यद्यपि उनका राजनीतिक वर्चस्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वे कितने विधायक जितवाकर लाते हैं। यदि उनका प्रदर्शन लोकसभा जैसा रहा तब सत्ता में आने के बाद भी भाजपा उनसे छुटकारा पाने में देर नहीं करेगी। अजीत के कारण उसे अपने कार्यकर्ताओं के बीच भी नाराजगी झेलनी पड़ रही है। भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके  नवाब मलिक को टिकिट देकर अजीत ने भाजपा नेतृत्व की आपत्ति को जिस तरह अनसुना किया उसके बाद श्री फड़नवीस को सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि भाजपा कार्यकर्ता उस सीट पर उनका काम नहीं करेंगे। इस प्रकार महाराष्ट्र का चुनाव राजनीतिक दलों से अधिक उनके  नेताओं के गले की फांस बन गया है। काँटे की टक्कर माने जा रहे इस मुकाबले में एक और व्यक्ति है जो किसका खेल बिगाड़ेगा ये फ़िलहाल किसी की समझ में नहीं आ रहा और वह है मराठा आरक्षण के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले मनोज जराँगे पाटिल । उनका अनशन शिंदे सरकार के आश्वासन के बाद टूटा था किंतु आरक्षण की मांग मंजूर नहीं होने पर उन्होंने चुनाव में प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया जिससे महायुति में राहत थी। मनोज ने तीसरा मोर्चा  बनाने भी हाथ पाँव मारे लेकिन सफलता नहीं मिलने पर ये कहते हुए मैदान छोड़ दिया कि अकेले एक जाति के बल पर चुनाव जीतना संभव नहीं है। उनके रुख पर सबकी नजर टिकी हुई है किंतु गत दिवस उन्होंने भाजपा के विरुद्ध बयान देकर  शिंदे सरकार गिराने की बात तो कही किंतु साथ में ये भी जोड़ दिया कि कोई जीते - हारे उन्हें फर्क़ नहीं पड़ेगा।  श्री जराँग ये भी बोल गए कि श्री फड़नवीस जातिवादी हैं और मराठाओं से चिढ़ते हैं। दूसरी तरफ शरद पवार को वे भरोसे लायक नहीं मानते। महाराष्ट्र में मराठा जाति राजपूतों के समकक्ष मानी जाती है। श्री जराँगे  का दावा है पहले उनको आरक्षण मिलता था।  आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तक होने से अब मांग हो रही है कि उसे बढ़ाया जाए। हालांकि कोई भी पार्टी खुलकर मराठा आरक्षण का समर्थन नहीं कर पा रही क्योंकि वैसा करने से दूसरी जातियाँ नाराज हो सकती हैं। इस प्रकार इस चुनाव में मनोज के दबाव और प्रभाव की भी परीक्षा हो जाएगी।अंदर की बात ये है कि शरद पवार खुद को सबसे बड़ा मराठा नेता मानते हैं और उन्हें ये बर्दाश्त नहीं है कि कोई और इस जाति का चौधरी बने। इस प्रकार ये चुनाव उक्त शख्सियतों के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने वाला होगा। यद्यपि शरद जी महाराष्ट्र के सबसे वरिष्ट नेता हैं किंतु  उनकी स्थिति अब बूढ़े शेर जैसी हो गई है। इस चुनाव में बाल ठाकरे के रुतबे और प्रमोद महाजन के राजनीतिक कौशल का अभाव भी महसूस हो रहा है।  दांव पर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की प्रतिष्ठा भी लगी है क्योंकि हरियाणा चुनाव के बाद दोनों के लिए महाराष्ट्र की बाजी जीतना और जरूरी हो गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 11 November 2024

राजनीतिक दलों की डिस्काउंट सेल बनकर रह गये चुनाव


महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए दोनों पक्षों ने अपने घोषणापत्र जारी कर दिये। इनकी जो मुख्य बातें समाचार माध्यमों के जरिये प्रचारित हुईं उनमें महिलाओं और युवाओं को हर माह निश्चित धनराशि के अलावा मुफ्त स्वास्थ्य बीमा , सस्ती या मुफ्त बिजली तथा आधी कीमत पर रसोई गैस सिलेंडर शामिल हैं। किसानों के कर्ज माफी का वायदा भी घोषणापत्र का हिस्सा है। कोई पार्टी इसे वचन पत्र कह रही है तो किसी ने उसे गारंटी का नाम देकर अपनी विश्वसनीयता साबित करने का प्रयास किया है। सत्ता में आते ही लाखों सरकारी नौकरियों का आश्वासन देकर बेरोजगारों को लुभाने का दांव भी चला गया है।  ये चुनावी वायदे भारतीय राजनीति की पहिचान बन चुके हैं। इसलिए इन पर किसी को आश्चर्य नहीं होता।  सर्वोच्च न्यायालय इस पर रोक लगाने में असमर्थता व्यक्त करते हुए गेंद चुनाव आयोग के पाले में सरका चुका है जबकि आयोग को इस बारे में ध्यान देने की फुरसत ही नहीं है। यही वजह है कि हर चुनाव में वायदों की रकम बढती जा रही है। मुफ्त शिक्षा,  चिकित्सा और कानून व्यवस्था किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। इसके साथ ही बिजली, पानी, सड़क जैसे कार्य भी सरकार के कर्तव्यों में हैं। ये बात सच है कि हर किसी को नौकरी देना किसी भी सरकार के लिये असंभव है किन्तु रोजगार के अवसर उत्पन्न हों इसके लिये अनुकूल नीतियाँ और वातावरण बनाने की जिम्मेदारी तो हुक्मरानों की होती है। राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिये तरह - तरह के वायदे मतदाताओं से करते हैं। ये चलन केवल भारत में ही हो ऐसा नहीं है। हाल ही में संपन्न अमेरिका के  चुनाव में भी ये देखने मिला। और जब सत्ता बदलती है तब उसका बड़ा कारण सरकार द्वारा मतदाताओं से चुनाव के समय किये गए वायदे पूरे न किये जाना ही होता है। हालांकि भारत में अब जाति और धार्मिक  ध्रुवीकरण भी चुनावों को काफी हद तक प्रभावित करते हैं जिसका उदाहरण पिछले लोकसभा चुनाव में  उ.प्र जैसे राज्य में देखने मिला। लेकिन ये भी सही है कि नगद राशि जैसे वायदे चुनावी बाजी पलटाने में कारगर साबित हुए हैं। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की गारंटियाँ उसे सत्ता दिलवाने में कामयाब रहीं वहीं म.प्र में भाजपा ने लाड़ली  बहना  योजना लागू कर सत्ता विरोधी रुझान को बेअसर कर दिखाया। उसके बाद से हुए हर चुनाव में मुफ्त में दी जाने वाली सुविधाओं की होड़ सी लग गई है। एक दल जितने का वायदा करता है दूसरा उससे बढ़कर देने का वायदा उछाल देता है। महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने म.प्र की लाड़ली बहना जैसी योजना कुछ महीने पहले शुरू कर महिलाओं को अपने पाले में आकर्षित करने का जो दांव चला उससे प्रतिद्वंदी महा विकास अग़ाड़ी की बढ़त पर असर पड़ने लगा। आरक्षण न मिलने से नाराज  जो मराठा मतदाता सरकार के विरोध में बताये जा रहे थे अब उनमें महिलाओं का झुकाव सरकार के पक्ष में होने के संकेत मिलने लगे। इसीलिये विपक्ष भी महिलाओं को उक्त योजना से अधिक देने का वायदा कर बैठा। झारखंड में भी ज्यादा से ज्यादा मुफ्त बांटने की प्रतिद्वंदिता है। ये सिलसिला कहाँ जाकर रुकेगा ये  कोई नहीं बता सकता क्योंकि किसी भी राजनीतिक  दल को अपने चंदे से तो वायदे पूरे करने नहीं पड़ते। सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणी तो की वायदे करने वालों से ये भी पूछा जाना चाहिए कि उनको पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन कैसे जुटायेंगे किंतु उसकी बात बुद्धि विलास में उलझकर रह गई। वास्तविकता ये है कि भाजपा शासित  हो या अन्य किसी दल द्वारा शासित राज्य, सभी मुफ्त योजनाओं को जारी रखने के लिये हर माह रिजर्व बैंक से कर्ज लेते जा रहे हैं जिसकी अदायगी भी अंततः जनता पर करों का बोझ बढ़ाकर ही की जाएगी। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की सरकारों के सामने तो जबरदस्त आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार ने भी जो मुफ्त योजनाएं चला रखी हैं उनके कारण ही वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल के दाम कम होने पर भी भारत में पेट्रोल - डीजल की कीमतें कम नहीं की जा रहीं। समय आ गया है जब मुफ्त योजनाओं का लालच देकर मतदाताओं को लुभाने के इस तरीके पर गंभीरता से चिंतन होना चाहिए क्योंकि मौजूदा स्थिति में उसको  लालच देकर खरीदने जैसा जो खेल चल रहा है उसने चुनाव को बाजार बनाकर रख दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 November 2024

दबावों के आगे बिना झुके जारी रहेगा ये सफर


35  वर्ष पूर्व  9 नवम्बर 1989 को मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का  प्रकाशन जबलपुर से प्रारंभ  हुआ था | उस दौर में मंडल और मंदिर जैसे मुद्दों के कारण राजनीतिक माहौल बेहद गर्म था। अतृप्त महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की खातिर समाज को जातियों में बाँटने के प्रयासों के साथ ही सिद्धांतविहीन गठबंधनों के जरिए नए चेहरों को स्थापित करने के प्रयास आकार ले रहे थे । अविश्वास  और अस्थिरता सर्वत्र व्याप्त थी। ऐसे में संस्कारधानी जबलपुर में जब एक नए सांध्य दैनिक का प्रादुर्भाव हुआ तब उसके लिए अपनी जगह बनाना सरल नहीं था | लेकिन शीघ्र  ही मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों का प्रिय बन गया। उसकी निर्भीकता ने उसे  हर वर्ग में  लोकप्रिय बना दिया। पत्रकारिता के प्रति  अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में पाठकों का समर्थन हमारा संबल बना।  35 वर्ष  के इस सफ़र में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने  दायित्वबोध से कभी मुँह नहीं फेरा। स्वस्थ पत्रकारिता के रास्ते पर हम जिस आत्मविश्वास से चलते रहे  उसने  हमें  जो पहिचान दी , उसे बनाए रखने के लिए हम सदैव जागरूक रहे। ये सर्वविदित है कि इसके लिए हमें न जाने कितनी मुसीबतों  और  विरोध का सामना करना पड़ा | बीते वर्षों में टेक्नालॉजी में हुए ताबड़तोड़ उन्नयन के कारण लघु और मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों के समक्ष संसाधनों का जबरदस्त संकट आ खड़ा हुआ है | इसके अलावा डिजिटल माध्यम ने गलाकाट प्रतिस्पर्धा को जन्म  दे दिया  । इस सबके  बावजूद मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस निरंतर आगे बढ़ता गया । हमारे असंख्य पाठकों और प्रशंसकों का विश्वास  हमारी शक्ति का स्रोत है । बिना किसी अतिरिक्त अपेक्षा के  सहयोग देने वाले विज्ञापनदाताओं की सहयोगात्मक भावना  हमारा संबल है | पत्रकारिता के जो आदर्श हमारी पितृ पीढी़ ने निर्धारित किये उनका निष्ठापूर्वक पालन करना हमारा संकल्प है। मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस को पाठकों द्वारा , जिसे पढ़े बिना शाम अधूरी है , जैसा जो  विशेषण प्रदान किया गया उसे  जीवंत रखने हम हर पल प्रतिबद्ध हैं | मौजूदा समय बेहद चुनौतीपूर्ण है | देश के भीतर  राजनीतिक  उथलपुथल है | संघीय ढांचे के साथ ही सामाजिक समरसता को कमजोर करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। भारत के विश्व की महाशक्ति बनने जैसी उपलब्धि एक वर्ग विशेष को बर्दाश्त नहीं हो रही। व्यवस्था के प्रति विद्रोह को भड़काकर अराजक स्थितियाँ उत्पन्न करने का प्रयास चल रहा है। हमेशा से विदेशी शक्तियों के इशारे पर नाचने वाले भारत की प्राचीनता और मौलिकता पर ही सवाल खड़े करने से बाज नहीं आ रहे। इन परिस्थितियों में समाचार माध्यमों का दायित्व और बढ़ जाता है क्योंकि जन साधारण तक सही जानकारी पहुंचाना उनका कार्य है। लेकिन उनको अपनी विश्वसनीयता और छवि बचाए रखने के प्रति गंभीर रहना होगा | जिस प्रकार से उन पर आरोपों  की बौछार की जा रही है वह भी प्रायोजित है जिससे  उनकी आवाज बंद की  जा सके।  यद्यपि  इसके लिए पत्रकार बने  धंधेबाज किस्म के लोग भी कसूरवार  हैं | हम विश्वास दिलाते हैं कि मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस पाठकों के विश्वास और पत्रकारिता की प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रखने  पूरी ईमानदारी और साहस के साथ खड़ा रहेगा  |  35 साल के इस सफर में हमने हर तरह के दबावों का सामना किया किंतु उनके आगे झुके नहीं। आगे भी हमारी ये शैली  जारी रहेगी । सकारात्मक पत्रकारिता के प्रसार हेतु हम पूरी प्रतिबद्धता के साथ डटे रहेंगे इस आश्वासन के साथ आप सभी के अमूल्य सहयोग हेतु विनम्र आभार। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 November 2024

370 की वापसी : कांग्रेस ने अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली


जम्मू - कश्मीर विधानसभा चुनाव में सभी क्षेत्रीय दलों ने धारा 370 की वापसी और पूर्ण राज्य का  का मुद्दा उठाकर घाटी के मतदाताओं को गोलबंद करने का दांव चला था। इसका सर्वाधिक लाभ मिला नेशनल काँफ्रेंस को । यद्यपि उसकी  साझेदार कांग्रेस ने हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में नुकसान के भय से पूर्ण राज्य का समर्थन करने के बाद भी 370 पर मौन साधे रखा। चुनाव के बाद नेशनल काँफ़्रेंस के उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बन गए किंतु कांग्रेस सरकार में शामिल नहीं हुई। तब  ये माना गया कि वह 370  को लेकर किसी भी विवाद से बचना चाह रही है। वहीं मुख्यमंत्री बनते ही उमर ने  पूर्ण राज्य  की मांग  में तो देर नहीं लगाई किंतु  370 की वापसी को ये कहते हुए ठंडे बस्ते में डाल दिया कि वे केंद्र से समन्वय बनाकर चलना चाहते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि फिलहाल 370 की वापसी संभव नहीं  लिहाजा वे सत्ता परिवर्तन तक प्रतीक्षा करेंगे। इस पर पीडीपी  ने उन पर हमला बोलते हुए घाटी के मतदाताओं को धोख़ा देने का आरोप लगाया। हालांकि मुख्यमंत्री ने उस पर  ध्यान नहीं दिया और तो और विधानसभा में पीडीपी द्वारा 370 की वापसी संबंधी प्रस्ताव लाने की बात कहने पर  बरसते हुए कहा कि वह मेरी सरकार के लिए खतरा पैदा करना चाह रही है। उनका आशय केंद्र सरकार की संभावित नाराजगी को लेकर था। उससे लगा कि वे वाकई 370 पर केंद्र सरकार से भिड़ना नहीं चाहते। लेकिन अपने दादा शेख अब्दुल्ला और पिता फारुख के पद चिन्हों पर चलते हुए उन्होंने भी दोगलापन दिखाने में संकोच नहीं किया। कहाँ तो वे  370  पर पीडीपी को आड़े हाथ ले रहे थे और कहाँ पलटी मारते हुए अपने ही उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी से  370 की वापसी का प्रस्ताव पेश करवा दिया जिसमें उल्लिखित है कि यह विधानसभा विशेष दर्जे और संवैधानिक गारंटी के महत्व की पुष्टि करती है।विशेष राज्य के दर्जे को एकतरफा तरीके से हटाए जाने पर चिंता के साथ प्रस्ताव में कहा गया है कि  विधानसभा इस बात पर जोर देती है कि बहाली की किसी भी प्रक्रिया में राष्ट्रीय एकता और जम्मू-कश्मीर के लोगों की वैध आकांक्षाओं  की रक्षा होनी चाहिए। प्रस्ताव पेश होते ही भाजपा विधायकों ने प्रस्ताव की प्रतियाँ फाड़ते हुए हंगामा शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि वह  सदन की कार्यसूची में नहीं था किंतु अध्यक्ष ने  उसे ध्वनि मत से पारित घोषित कर दिया। भाजपा अध्यक्ष पर उक्त कारवाई को निरस्त करने का दबाव बना रही है किंतु वे राजी नहीं हैं। इस प्रकार उमर की वह बात गलत निकली कि वे 370 की वापसी पर केंद्र से टकराव नहीं लेंगे । यदि पीडीपी या अन्य क्षेत्रीय विधायक द्वारा उक्त प्रस्ताव पेश किया जाता तब बात अलग थी। नेशनल काँफ्रेंस का भी कोई विधायक वैसा करता तब उसकी निजी राय  कहकर भी मुख्यमंत्री पल्ला झाड़ सकते थे परंतु उपमुख्यमंत्री द्वारा प्रस्ताव पेश करना इस बात का प्रमाण है कि उसे  उनका समर्थन था। लेकिन इस विवाद का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि जो कांग्रेस पूरे चुनाव में धारा 370 पर  बोलने से कतराती रही और अपने घोषणापत्र में भी इस मुद्दे को शामिल करने से परहेज किया , उसने भी 370 की वापसी के प्रस्ताव को समर्थन देकर अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली। जहाँ तक बात उमर और उनकी पार्टी के अलावा  घाटी के अन्य  दलों की  है तो उनका देश विरोधी रवैया किसी से छिपा नहीं है।  विशेष तौर पर अब्दुल्ला परिवार का दोगलापन ही कश्मीर समस्या को उलझाने का सबसे बड़ा दोषी है। उक्त प्रस्ताव के जरिये उमर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सांप का बच्चा ज़हरीला ही होता है। लेकिन कांग्रेस के इस षडयंत्र में भागीदार हो जाने से  लग गया कि शेख अब्दुल्ला के जमाने से धोख़ा खाते आने के बाद भी  इस पार्टी के कर्ताधर्ता गाँधी परिवार को अक्ल नहीं आई। उसे ये समझना चाहिए कि धारा 370 से केवल अब्दुल्ला परिवार को ही फायदा मिला। राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस आज भी इसी परिवार की मोहताज है। हालिया चुनाव में भी उसे घाटी में महज 1 सीट मिलना काफी कुछ कह गया। जम्मू अंचल में भी उसका प्रदर्शन बेहद निरशाजनक रहा। धारा 370 की वापसी का प्रस्ताव अब्दुल्ला परिवार के राजनीतिक अस्तित्व के लिए तो जरूरी हो सकता है लेकिन कांग्रेस की कौन सी नस इस परिवार ने दबा रखी है ये रहस्यमय है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 7 November 2024

ट्रम्प की जीत भारत के लिए फायदेमंद


अमेरिका  दुनिया को किस प्रकार प्रभावित करता है उसका अंदाज वहाँ के राष्ट्रपति चुनाव में पूरे विश्व की रुचि  देखकर लग जाता है। लोकतांत्रिक देश तो फ्रांस और ब्रिटेन भी हैं किंतु वहाँ हुए चुनाव की उतनी चर्चा नहीं हुई। दरअसल अमेरिका न केवल आर्थिक और सैन्य महाशक्ति है अपितु वह  दुनिया के राजनीतिक  संतुलन को भी प्रभावित करने में सक्षम है। यही वजह है कि उसके राष्ट्रपति की वजनदारी से कोई इंकार नहीं कर सकता। गत दिवस संपन्न चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दोबारा चुना जाना इसलिए महत्वपूर्ण बन गया क्योंकि 2020 में जो बाइडेन से परास्त होने के बाद उन पर तरह - तरह के आरोप लगे। यहाँ तक कि उन्हें जेल भेजे जाने की संभावना भी व्यक्त की जाने लगी थी। लेकिन तमाम विवादों के बावजूद उन्होंने सबको चौंकाते हुए रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल की  और फिर बड़े ही आक्रामक तरीके से लड़कर जीत हासिल की। आम तौर पर अमेरिका में राष्ट्रपति को उसकी पार्टी लगातर दूसरी मर्तबा भी चुनाव में उतारती है क्योंकि  उसे  अधिकतम दो कार्यकाल ही मिल सकते हैं। ट्रम्प को भी वह अवसर दिया गया किंतु वे हार गए। बढ़ती आयु को देखते हुए  लगा था कि उनकी राजनीतिक यात्रा का पूर्ण विराम हो गया किंतु चौतरफा घेराबन्दी से  विचलित हुए बिना उन्होंने अपनी वापसी हेतु प्रयास किया और  चार साल बाद एक बार फिर अमेरिका के सत्ता सूत्र संभालने जा रहे हैं। चुनाव अभियान की शुरुआत में डेमोक्रेट प्रत्याशी और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के साथ हुई बहस में ऐसा लगा था कि ट्रम्प उनके सामने टिक नहीं पाएंगे किंतु एक जनसभा में उन पर गोली चलने के बाद से उनके प्रति रुझान बढ़ा और फिर वे लगातार अपने प्रतिद्वंदी के बराबर आते गए तथा अंततः बाजी उनके हाथ लग गई। ट्रम्प की जीत में उनकी जीवटता की बड़ी भूमिका रही वरना अपेक्षाकृत कम आयु की हैरिस को हराना कठिन था। इस चुनाव ने अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में महिलाओं की पराजय का सिलसिला जारी रखा। इस बारे में रोचक तथ्य ये है कि ये दूसरा  अवसर है जब राष्ट्रपति चुनाव में  महिला उम्मीदवार मैदान में उतरी। 2016 में पहली बार हिलेरी क्लिंटन को ये अवसर मिला जबकि इस चुनाव में कमला हैरिस ने मोर्चा संभाला। संयोगवश दोनों हार गईं और दोनों को हराने का श्रेय ट्रम्प को ही मिला। हिलेरी  बराक ओबामा के प्रशासन में विदेश सचिव रहीं। वहीं  हैरिस भी निवर्तमान राष्ट्रपति बाइडेन के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति बनीं। इस बार उनकी विजय की संभावना काफी बताई जा रही थीं किंतु ट्रम्प ने आखिरी क्षणों में चुनाव अपने पक्ष में कर लिया। वे उन राज्यों में भी जीते जो डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक रहे। ऐसा लगता है अमेरिकी मतदाता यूक्रेन को युद्ध हेतु मदद देने की बाइडेन की नीति से नाराज हो उठे जो अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बोझ बनती जा रही है। ट्रम्प ने युद्ध रुकवाने का जो  वायदा किया वह कारगर रहा। इसके अलावा उन्होंने अमेरिकी युवकों के रोजगार को सुरक्षित करने का आश्वासन देकर  जीत की राह बनाई। लेकिन आखिरी दिनों में उन्होंने अमेरिका में बसे भारतीय मूल के हिंदुओं को लुभाने का दांव चलते हुए बांग्ला देश में पर हो रहे अत्याचारों का विरोध कर हैरिस को पिछले पाँवों पर धकेल दिया जो इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचती रहीं। शुरुआत में  भारतीय मूल की होने के कारण कमला को भारतीय समुदाय का समर्थन सुनिश्चित माना जा रहा था लेकिन ट्रम्प ने आखिरी दौर में ताबड़तोड़ हमले कर डाले जिनकी वजह से पांसा उनके पक्ष में गिर गया। ये बात भी सही है कि बतौर राष्ट्रपति बाइडेन अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सके। ट्रम्प ने अमेरिका प्रथम का नारा उछालकर राष्ट्रवाद को जिस तरह प्राथमिकता दी उसकी वजह से भारत  में उनके चुनाव पर सबकी नजरें थीं। वामपंथियों के अलावा कांग्रेस सहित विपक्ष को को जहाँ कमला हैरिस में अनुकूलता नजर आ रही थी वहीं भाजपा  ट्रम्प की जीत चाह रही थी। इसके पीछे ट्रम्प और नरेंद्र मोदी के निजी सम्बन्ध बताये जाते हैं। लेकिन मोदी विरोधी लॉबी ये प्रचार करने में जुट गई है कि ट्रम्प के दोबारा सत्ता में आने के बाद भारतीय विद्यार्थियों और पेशेवरों को परेशानी हो जायेगी। इसके अलावा वे भारतीय सामान पर ज्यादा ड्यूटी लगाकर दबाव बनाएंगे। ये आशंकाएँ निराधार नहीं हैं क्योंकि ट्रम्प की पहली प्राथमिकता अपने देश और उसके लोगों की भलाई होगी किंतु दूसरी तरफ ये भी सही है कि वैश्विक राजनीति में  भारत इस स्थिति में आ गया है कि उसे उपेक्षित करना किसी  भी महाशक्ति के लिए आसान नहीं रह गया। यूक्रेन और रूस की जंग के अलावा पश्चिम एशिया में  इसराइल की अनेक देशों से हो रही लड़ाई में भारत सरकार ने जिस कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया उसके कारण ट्रम्प और पुतिन तो क्या जिनपिंग तक भारत के महत्व को स्वीकार करने बाध्य हैं। ट्रम्प के सत्ता में लौटने के बाद चीन भी दबाव में है। वहीं बांग्ला देश की सत्ता में बैठे भारत विरोधी तत्वों में भी घबराहट है जिन्हें  बाइडेन का समर्थन बताया जा रहा था। ट्रम्प की जीत में एलन मस्क जैसे धनकुबेर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नव निर्वाचित राष्ट्रपति खुद भी व्यवसायी हैं और भारत में भी उनके अनेक औद्योगिक घरानों से निकट संबंध हैं। ये सब देखते हुए भारत - अमेरिका संबंध और मजबूत होने की उम्मीद की जा सकती है। आगामी वर्ष क्वाड की बैठक में भारत आने की बात कहकर उन्होंने इसका संकेत भी दे दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 November 2024

मुफ्तखोरी के वायदों ने राजनीतिक दलों की सैद्धांतिक पहिचान नष्ट कर दी


हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार द्वारा  मुफ्त योजनाओं की समीक्षा किये जाने संबंधी बयान  पर नसीहत दी थी कि वायदे वही करें जो पूरे किये जा सकें। उनकी टिप्पणी पर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि वह झूठे वायदे करती है। पलटवार कांग्रेस की तरफ से भी हुआ। चूँकि महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव का प्रचार जोरों पर है इसलिए सभी पार्टियों में वायदों की प्रतिस्पर्धा चल रही है। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा  है मुफ्त दी जाने वाली सुविधाओं की जिनमें प्रतिमाह महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के बैंक  खाते में नगद राशि जमा करने के अलावा, सस्ता रसोई गैस सिलेंडर और मुफ्त बिजली जैसे वायदे हैं। सबसे रोचक बात बात ये है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समय - समय पर मुफ्त उपहारों की योजनाओं का विरोध किये जाने के बावजूद उनकी अपनी पार्टी भाजपा ही चुनाव वाले राज्यों में खैरात बाँटने में किसी से पीछे नहीं है। कांग्रेस को  कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में मुफ्तखोरी  पर आधारित वायदों के कारण बहुमत मिल गया था इसलिए अब वह उन्हें गारंटी का नाम देकर हर चुनाव में दोहराने लगी है। हालांकि लोकसभा चुनाव में उसके खटाखट वाले वायदे पर जनता ने भरोसा नहीं किया। ऐसा ही हरियाणा में  भी देखने मिला जहाँ सतह पर सत्ता विरोधी माहौल साफ नजर आने के बावजूद भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने में सफल हो गई। लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड में कांग्रेस अभी भी अपनी गारंटियों के बल पर वैतरणी पार करना चाह रही है। पार्टी नेतृत्व को न जाने ये बात क्यों समझ नहीं आ रही कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसकी सरकारें अनाप - शनाप मुफ्त योजनाएं और कार्यक्रम चलाने के बाद भी सत्ता से बाहर हो गई। इसी तरह भाजपा को भी आज तक ये  बात हजम नहीं हो रही कि उ.प्र में अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे मुद्दे होने के बाद भी उसकी लोकसभा सीटों में जबरदस्त कमी आ गई। इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि मुफ्त उपहार वाली रणनीति हर चुनाव  में कारगर हो जाए ये जरूरी नहीं है। इसी तरह जो मतदाता मुफ्त योजनाओं, का भरपूर लाभ ले रहे हैं वे उसके प्रति कृतज्ञता स्वरूप सत्तारूढ़  पार्टी को एक बार सत्ता में लाएं ये भी  जरूरी नहीं। पिछले  लोकसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय  भाजपा को हराने के लिए पूरी तरह गोलबंद  हो गया। अनेक राज्यों में दलितों ने भी भाजपा के विरुद्ध मोर्चेबंदी की जबकि उक्त दोनों वर्ग मोदी सरकार द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं का जमकर लाभ  उठा रहे हैं। इतना सब देखने के बाद भी न कांग्रेस को अक्ल आई और न ही भाजपा को। लगातार तीन बार दिल्ली की सातों लोकसभा सीटें हारने के बावजूद अरविंद केजरीवाल  के दिमाग में इतनी छोटी सी बात नहीं आई कि हर चुनाव का अपना गणित होता है। दिल्ली से सटे हरियाणा में आम आदमी पार्टी विधानसभा चुनाव में मुफ्त बिजली  , पानी  जैसे उन्हीं वायदों के साथ मैदान में उतरी जिनके बल पर वह दिल्ली की सत्ता में बनी हुई है। लेकिन हरियाणवी मतदाताओं ने केजरीवाल जी के 90 फीसदी उम्मीदवारों की जमानत जप्त करवा दी। ये सब देखकर लगता है कि राजनीतिक दलों के पास मुद्दों का अकाल पड़ गया है। वैचारिक आधार तो वैसे भी नहीं बचा। टिकिट की लालच में दूसरी पार्टी छोड़कर आये दलबदलू को उपकृत करने में कोई भी दल पीछे नहीं है। इसके चलते उसके अपने पुराने कार्यकर्ता भले नाराज हो जाएं किंतु उसकी चिंता नहीं की जाती। महाराष्ट्र में अजीत पवार को साथ लेने से भाजपा के प्रतिबद्ध समर्थकों में निराशा है। दूसरी तरफ बालासाहेब ठाकरे के कारण शिवसेना के साथ जुड़े मतदाताओं का बड़ा वर्ग इस बात को नहीं पचा पा रहा कि उद्धव ठाकरे ने उन  शरद पवार और कांग्रेस से हाथ मिला लिया जो मुस्लिम परस्ती के लिए बदनाम हैं। सैद्धांतिक पहिचान खत्म हो जाने के कारण ही राजनीतिक दल मुफ्तखोरी के वायदों के साथ चुनाव में उतरने लगे हैं। मतदाताओं की स्थिति उस उपभोक्ता जैसी हो गई है जो किसी भी चीज की गुणवत्ता की बजाय उसकी कम कीमत को महत्व देता है। दुःख और चिंता का विषय ये है कि न तो सत्ता और न ही विपक्ष में बैठे लोगों को इस बात की फिक्र है कि राजगद्दी हासिल करने के लिए वे जिस बेरहमी से खजाना लुटाने पर आमादा हैं वह देश को आर्थिक दिवालियेपन की ओर ले जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 November 2024

भारत में तो संभव नहीं किंतु कैनेडा में जरूर बन जायेगा खालिस्तान


कैनेडा में हिन्दू मंदिरों पर खालिस्तानी उग्रवादियों द्वारा हमला और हिन्दू धर्मावलम्बियों के साथ हिंसा की घटना से दोनों देशों के बीच पहले से खराब चल रहे रिश्तों में और खटास आ गई है। जो समाचार मिल रहे हैं उनके मुताबिक पुलिस बजाय उग्रवादियों को  रोकने के तमाशबीन बनी रही। हालांकि  कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने हमले की निंदा की किंतु उसके लिए उनके भारत विरोधी रवैये को ही जिम्मेदार माना जाएगा। एक खालिस्तानी उग्रवादी निज्जर की हत्या के लिए भारत सरकार पर आधारहीन आरोप लगाने वाले ट्रूडो की हरकतें  किसी राष्ट्रप्रमुख से कतई अपेक्षित नहीं है । आरोप लगाते - लगाते ट्रूडो सरकार भारतीय गृह मंत्री अमित शाह को भी कठघरे में खड़ा करने का दुस्साहस कर बैठी।  दो देशों के बीच  विवाद की स्थिति में कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग होता है। राष्ट्र प्रमुख एक दूसरे से सीधे बातचीत भी कर लेते हैं। लेकिन ट्रूडो का आचरण किसी तानाशाह सरीखा है । अपने देश के नागरिक की हत्या की जाँच करना सरकार की जिम्मेदारी है किंतु निज्जर को मारने में भारत सरकार और कैनेडा में पदस्थ राजनयिक शामिल थे, इसका ठोस प्रमाण दिये बिना ट्रूडो ने जो गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी की  वह चौंकाने वाली है क्योंकि  दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत रहे। सबसे बड़ी बात भारतीय मूल के लाखों लोगों का वहाँ कई पीढ़ियों से बसा होना है जिसमें सिखों की संख्या बेशक ज्यादा है जिन्होंने  अपना धार्मिक और राजनीतिक प्रभाव काफी बढ़ाया है। गुरुद्वारों की विशाल संख्या और कैनेडा  सरकार में सिखों का दबदबा गैर सिख भारतीय मूल के लोगों की तुलना में ज्यादा है। 80 और 90 के दशक में जब भारत में खालिस्तानी आतंकवाद चरम पर था तभी से अनेक खालिस्तानी संगठन वहाँ से भारत विरोधी गतिविधियों और दुष्प्रचार में लगे रहे। अपने को अति लोकतांत्रिक दिखाने के फेर में कैनेडा सरकार उनकी  हरकतों को उपेक्षित करती रही। परिणामस्वरूप वह  खालिस्तानी मानसिकता की शरण स्थली बन गया। लोकतांत्रिक देशों में वोट बैंक के लालच में अक्सर अवांछित तत्वों को फलने - फूलने का अवसर दिया जाता है। भारत में भी बांग्ला देश के लाखों घुसपैठियों को पहले वामपंथियों और फिर ममता बैनर्जी सदृश राजनेताओं ने जिस तरह सिर पर बिठा लिया वही काम कैनेडा के शासकों द्वारा खालिस्तानी उग्रवादियों को छूट देकर  किया जाता रहा है। हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हुए ताजा हमलों के बाद कैनेडा वासी हिन्दू भी संगठित होने लगे हैं। ऐसे में भारतीय मूल के दो समुदायों के बीच संघर्ष  की आशंका बढ़ रही है जिसकी चिंगारी अमेरिका  और ब्रिटेन तक फैल सकती हैं। स्मरणीय है अमेरिका में बैठा पन्नू नामक खालिस्तान समर्थक भारतीय विमानों में बम रखने जैसी धमकी  खुले आम दे रहा है। वहीं ब्रिटेन के तमाम गुरुद्वारों में जरनैल सिंह भिंडरवाले के बड़े पोस्टर प्रदर्शित किये गए हैं। वहाँ भी सिख उग्रवादियों द्वारा हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमले की वारदातें हो चुकी हैं। यहाँ तक कि भारतीय दूतावास पर तिरंगे के स्थान पर खालिस्तानी झंडा लगाने की हरकत भी की गई। हो सकता है उक्त देशों की सरकार में बैठे कुछ लोगों को भारत विरोधी  खालिस्तानी उग्रवादियों की गतिविधियां रास आ रही हों किंतु वे याद रखें  कि  जिन सांपों को वे दूध पिला रहे हैं वही उनको  डसेंगे। जिन - जिन देशों ने अपने यहाँ  उग्रवादियों को पनाह दी उन सबको  खामियाजा भोगना पड़ा।  यदि कैनेडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो चुनाव जीतने के लिए उनको संरक्षण देने से बाज नहीं आये तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि भारत में तो खालिस्तान कभी नहीं बन सकता किंतु कैनेडा में अवश्य उसकी कल्पना साकार हो जाएगी । कैनेडा की प्रगति में भारतीय मूल के अप्रवासियों की महती भूमिका रही है। यदि खालिस्तानी  इसी तरह आतंक फैलाते रहे तो उसकी छवि खराब होना तय है जिसका प्रभाव  अर्थव्यवस्था के अलावा वहाँ की आंतरिक सुरक्षा पर पड़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन भारत में जो देशभक्त सिख समुदाय  है उसको भी चाहिए कि कैनेडा के खालिस्तान समर्थक सिखों की हरकतों का खुलकर विरोध करे क्योंकि इससे पूरे समुदाय की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचता है। 


- रवींद्र वाजपेयी

जहरीली होती हवा : जनता उदासीन और नेता मौन



दीपावली के पूर्व से ही देश की राजधानी दिल्ली में हालात गंभीर हैं। लोगों को सांस लेने में कठिनाई होने लगी  है।  शुद्ध हवा के लिये सुबह सैर पर निकलने वालों के फेफड़ों में जहर समाने लगा है। अस्थमा  से ग्रसित लोगों के लिए ऐसी स्थितियां जानलेवा  हो सकती हैं। घरों में तो वायु शुद्ध करने वाले उपकरण लगाए जा सकते हैं किंतु बाहर निकलने पर प्रदूषित  सांस ही लेनी पड़ती है। और फिर जो लोग झुग्गियों में रहते हैं उनकी तकलीफ का अंदाजा लगाया जा सकता है। देश का दिल कहे जाने वाले  महानगर पर दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहर होने का कलंक लग ही चुका है। वहाँ यमुना नदी में फैक्ट्रियों से निकले प्रदूषित जल और रसायनों के कारण झाग तैरता दिखता है जिसमें छठ पूजा की जाएगी। पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यमुना को स्वच्छ रखने की समय सीमा कई बार घोषित की किंतु कुछ नहीं हुआ। पंजाब से आने वाले पराली के  धुएं के अलावा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषण  दिल्ली के वायुमंडल को जहरीला बनाता है। वाहनों के धुएं को रोकने  सीएनजी और बैटरी चलित वाहनों  को बढ़ावा दिया गया। 10 वर्ष पुरानी गाड़ियों को सड़क से बाहर करने का नियम भी लागू हुआ। मेट्रो ट्रेन चलने के बाद कुछ उम्मीद जागी थी। लेकिन बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या के कारण आगे पाट - पीछे सपाट की स्थिति बनती रही है।  सर्वोच्च न्यायालय , केंद्र और राज्य सरकार के अलावा तमाम स्वयंसेवी संगठन पर्यावरण सुधारने में लगे हैं ।  लेकिन नतीजा शून्य है। उल्टे स्थितियां खराब हो रही हैं। पहले दिल्ली सरकार पंजाब को कोसती थी जहां के किसान फसल कटने के बाद खेतों में आग लगा  दिया करते हैं। लेकिन अब तो उस राज्य में भी आप आदमी पार्टी की ही सरकार है। ऐसे में दोनों को मिलकर रास्ता निकालना चाहिए था । यद्यपि ये स्थिति पूरे देश की है। चंडीगढ़ जैसे  शहर ही अपवाद हैं वरना क्या मुंबई और क्या कोलकाता , सभी में हालात चिंताजनक हैं। दो दशक पहले तक बेंगुलुरु का मौसम बेहद सुहावना हुआ करता था किंतु सायबर सिटी बनने  के साथ ही वह भी प्रदूषित हो गया। दुर्भाग्य से पर्यावरण संरक्षण का अभियान दिखावा होकर रह गया है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी  पर्यावरण संरक्षण  पर गंभीर नहीं है। दूसरी तरफ  ये भी सही है कि जनता भी इस मुद्दे पर उदासीन है। इसका प्रमाण है कि  कि आज तक एक भी चुनाव  प्रदूषण दूर करने के नाम पर नहीं हुआ। इसी महीने  जिन 2 राज्यों में विधानसभा चुनाव  हैं वहां भी मुफ्तखोरी  से मतदाता को आकर्षित करने  की प्रतिस्पर्धा चल रही है ।  नगदी  , सस्ती गैस, मुफ्त बिजली , सायकिल आदि  चुनावी वायदों में है । लेकिन पर्यावरण संरक्षण  प्रमुख विषय नहीं है।  जनता की रुचि न होने से नेता भी इस तरफ ध्यान नहीं देते।  औद्योगिकीकरण और आबादी , प्रदूषण का बड़ा कारण है।  सुविधाभोगी जीवन शैली भी पर्यावरण को क्षति पहुंचाती है। ये विडंबना ही है कि आजादी मिले 77 साल से ज्यादा बीत गए किंतु लोगों को शुद्ध पीने का पानी नसीब न होने से बोतल बन्द पानी का कारोबार फल रहा है । सवाल ये है कि क्या विकास के बदले आम जनता को जहरीली हवा और प्रदूषित जल ही नसीब होगा ? दिल्ली में देश और प्रदेश दोनों की सरकार के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय है। देश में प्रदूषण नियंत्रण करने के लिए जिम्मेदार शीर्ष सरकारी एजेंसियों के मुख्यालय भी वहीं हैं किंतु जब वे सब मिलकर उस महानगर के पर्यावरण को ही नहीं सुधार पा रहे तब देश के बाकी हिस्सों में क्या होता होगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। 

-रवीन्द्र वाजपेयी