कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अनुभवी राजनेता हैं। गाँधी परिवार के प्रति वफादारी ही उन्हें इस पद पर लेकर आई। यद्यपि उनका बेटा कर्नाटक में मंत्री है किंतु खरगे जी को अपने गृहराज्य का मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला।राष्ट्रीय अध्यक्ष पद भी उन्हें बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा की तर्ज पर मिला क्योंकि राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गाँधी परिवार को धता बताते हुए अध्यक्ष बनने के लिए सत्ता छोड़ने से एन वक़्त पर इंकार कर दिया था। अध्यक्ष बनने के बाद भी वे स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाते। यही वजह है राज्यों के कांग्रेस संगठनों की हालत बेहद खराब होती जा रही है। कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में सरकार बना लेने के बाद कांग्रेस में जो उत्साह पैदा हुआ वह लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद और बढ़ गया। यद्यपि उसका श्रेय राहुल गाँधी के खाते में गया जिस पर किसी को न आश्चर्य हुआ और न ही ऐतराज क्योंकि पार्टी का चेहरा वही थे। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को दो बड़े झटके लगे। पहला हरियाणा और दूसरा महाराष्ट्र में। कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह हरियाणा और महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराकर भाजपा को पटकनी देने में सफल होगी। लेकिन जब परिणाम आये तब उसको सांप सूंघ गया। गाँधी परिवार दो राज्यों में मिली जबरदस्त पराजय के लिए दुखी होने के बजाय प्रियंका वाड्रा के लोकसभा सदस्य बन जाने के जश्न में डूबा है। बहरहाल हार की समीक्षा के लिए पार्टी के बड़े नेताओं की बैठक में खरगे जी ने जो कहा वह राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बन रहा है। उन्होंने चुनाव लड़ने के तरीके पर उंगली उठाते हुए आगाह किया कि अच्छे माहौल से संतुष्ट होकर बैठ जाना नुकसानदेह साबित होता है। साथ ही पार्टी के भीतर गुटबाजी पर भी नाराजी दिखाई । लेकिन सबसे बड़ी बात ये कही कि कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक बदलाव की जरूरत है। उनका ये कथन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब राहुल गाँधी ने महासचिव के रूप में कांग्रेस संगठन का काम संभाला तब उन्होंने भी इसी तरह की बात कही और संगठन के चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से करवाने की पहल की। युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए एक समूह भी बना जिसे टीम राहुल का नाम दिया गया। बाद में वे स्वयं पार्टी के अध्यक्ष बने किंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद पद छोड़ दिया। उनके उस कदम की प्रशंसा भी हुई किंतु किसी नये चेहरे को आगे लाने के बजाय उनकी माँ सोनिया गाँधी को ही बागडोर सौंपकर परिवार का कब्जा बनाये रखा गया। इसी बीच प्रियंका भी सीधे महामंत्री बना दी गई और उ.प्र जैसे राज्य का प्रभार उन्हें दे दिया गया। लेकिन बीते कुछ सालों में राहुल के करीबी युवा नेता पार्टी से निकलते गए। राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर श्री खरगे का चयन बाकायदे चुनाव के जरिये हुआ किंतु वे गाँधी परिवार के प्रत्याशी थे , ये सर्वविदित है। दूसरी तरफ राज्यों के कांग्रेस संगठन में आंतरिक लोकतंत्र का कोई अता - पता नहीं है। पंजाब और राजस्थान में पार्टी के दो बड़े नेताओं का विवाद रोकने की बजाय आलाकमान ने खुद आग में घी डाला। अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के अलावा अशोक गहलोत और सचिन पायलट के झगड़े न रोक पाने के कारण पंजाब और राजस्थान में कांग्रेस की नैया डूब गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आर. पी. एन. सिंह और मिलिंद देवड़ा जैसे साथी पार्टी को अलविदा कह गए और राहुल देखते रहे। असम के मुख्यमंत्री हिमन्ता बिस्वा शर्मा भी एक उदाहरण हैं। म.प्र में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की चौधराहट ने कांग्रेस का सत्यानाश कर डाला। उ.प्र और बिहार में कांग्रेस घुटनों के बल पर है जबकि प. बंगाल में उसका नाम तक डूब चुका है। प्रश्न ये है कि खरगे जी ने भी ऐसा क्या किया जिससे संगठन मजबूत होता? और जब वे ऊपर से नीचे तक बदलाव की बात कर रहे हैं तब तो बात गाँधी परिवार से ही शुरू होगी जिसके तीन सदस्य सांसद बन गए हैं। हालांकि आंतरिक लोकतंत्र तो लगभग सभी दलों में दम तो़ड़ चुका है लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति बेहद खराब है। जिसका प्रमुख कारण उसका एक परिवार के खूंटे से बंधा रहना और दूसरा वैचारिक पहिचान खो देना। चूंकि खरगे जी में इन दो विसंगतियों को दूर करने का न तो साहस है और न हैसियत इसलिए किसी बड़े बदलाव की बात सोचना भी मन को बहलाना मात्र है। कहीं ऐसा न हो कि हार का दोष उनके मत्थे मढ़ कर किसी और को अध्यक्ष बना दिया जाए। प्रियंका के सांसद बन जाने के बाद पार्टी में एक और शक्ति केंद्र उदय हो गया है। खरगे जी के प्रति पार्टी के प्रथम परिवार का रवैया कितना उपेक्षा भरा है इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जिस बैठक में वे उक्त बातें कह रहे थे उसमें से राहुल और प्रियंका बीच से ही उठकर चले गए।
- रवीन्द्र वाजपेयी