Tuesday, 5 September 2017

सफल कूटनीति : डोकलाम के बाद ब्रिक्स

क्रिकेट में हर गेंद पर चौका या छक्का मारना बड़े से बड़े बल्लेबाज के लिये नामुमकिन होता है। इसीलिये वह एक-दो रन बना-बनाकर अपना स्कोर बढ़ाता रहता है। कूटनीति भी ऐसा ही क्षेत्र है। यहां धैर्य के साथ टिके रहने वाला वह बल्लेबाज ही अंतत: सफल होता है जो मौका पाते ही अपना स्कोर बढ़ाता चले। पिछले दिनों डोकलाम विवाद में भारत को मिली कूटनीतिक सफलता इसी धैर्य का परिणाम रही। चीन में शुरू हुए ब्रिक्स सम्मेलन में जाने के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से डोकलाम गुत्थी सुलझाने का जो दबाव बनाया उसका असर गत दिवस साफ नजर आ गया जब सम्मेलन के घोषणा पत्र में पाकिस्तान में पल और चल रहे जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा द्वारा फैलाए जा रहे आतंकवाद के विरुद्ध चिंता व्यक्त करते हुए निंदा की गई। आश्चर्य इस बात का रहा कि कहां तो चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने श्री मोदी से अपने भाषण में आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान का विरोध नहीं करने की समझाईश दी थी और गत दिवस वही चीन पाकिस्तान में चल रही आतंकवाद की फैक्टरियों के विरुद्ध जारी संयुक्त घोषणा पत्र का हस्ताक्षरकर्ता बन गया। कूटनीति के जानकार इसे सफलता तो मान रहे हैं किन्तु उतनी बड़ी भी नहीं जिससे ये कहा जो सके कि पाकिस्तान के प्रति चीन का प्रेम कुछ कम हो गया है लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि जो जिनपिंग गत वर्ष गोवा में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत के आग्रह पर पाकिस्तान के विरुद्ध घोषणा पत्र में एक शब्द रखने तक पर राजी नहीं थे वे ही अपने देश में उसकी खुली निंदा को नहीं रोक सके। ब्रिक्स घोषणा पत्र में आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान को लपेटने का ये कदम इसलिये और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हस्ताक्षरकर्ताओं में वह रूस भी शामिल है जिसके बारे में ये हवा उडऩे लगी थी कि मोदी सरकार द्वारा अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने के कारण रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने चीन और पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत विरोधी रूख अपना लिया है। इसकी एक वजह ये भी बताई गई कि रक्षा उपकरणों की खरीदी में भारत द्वारा एक देश से बंधकर रहने के बजाय पूरी तरह से व्यापारिक नीति पर अमल किया जाने लगा लेकिन बीते कुछ दिनों से जो संकेत मिल रहे थे उनके अनुसार रूस भी चीन और पाकिस्तान को लेकर काफी सतर्क हो चला था। ब्रिक्स में शामिल ब्राजील और द.अफ्रीका तो वैसे भी पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी नहीं रखते। दरअसल चीन और रूस के रूख में थोड़ी सी ही सही किन्तु जो नरमी आई उसकी एक वजह इस्लामी आतंकवाद का बीज उनकी धरती पर भी अंकुरित होना है। सोवियत संघ से टूटकर अलग हुए मध्य एशिया के तमाम देश इस्लाम के अनुयायी हैं। वहीं चीन के सिकियांग प्रांत में मुस्लिम चरमपंथी रह-रहकर सिर उठाया करते हैं। यद्यपि चीन सरकार ने देश में ईद-मोहर्रम मनाने, रोजा रखने तथा हज यात्रा आदि पर काफी सख्ती लगा रखी है परन्तु ये डर भी सता रहा है कि देर सबेर उसकी पाकिस्तान समर्थक नीति गले में साँप लपेटने जैसी न हो जाए। काफी समय से चीन सं.रा.संघ की सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान के कुख्यात  आतंकवादी मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने का विरोध करता आया है किन्तु गत दिवस वह ब्रिक्स देशों के घोषणा पत्र में पाक प्रवर्तित आतंकवादी संगठनों की हरकतों के उल्लेख को नहीं रोक पाया। हॉलांकि इसे दूसरे कोण से देखें तो इसमें भी चीन की कूटनीतिक चालबाजी हो सकती है जिसका उद्देश्य भारत को खुश करना तथा पाकिस्तान को अपने पक्ष में और दबाना भी हो सकता है। असलियत जो भी हो लेकिन सतही तौर पर तो ये माना ही जा रहा है कि ब्रिक्स घोषणा पत्र आतंकवाद के विरुद्ध भारत के दृष्टिकोण की उल्लेखनीय सफलता है। प्रधानमंत्री श्री मोदी के चीन पहुंचने पर उनकी अगवानी चीन सरकार के राज्य मंत्री स्तर के नेता द्वारा किये जाने पर भाजपा विरोधी खेमे ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री का खूब मखौल उड़ाया था किन्तु सम्मेलन की शुरुवात में ही जो साझा घोषणा की गई वह पूरी तरह भारत के पक्ष में मानी जाएगी और इसका श्रेय श्री मोदी के कूटनीतिक चातुर्य को देना हर दृष्टि से सही होगा। डोकलाम विवाद के दौरान चीन के जबर्दस्त उकसावे के बाद भी भारत सरकार ने जरा भी हड़बड़ाहट या गुस्सा प्रगट नहीं किया तथा सीमा पर चीन की धमकियों से हर तरह निपटने की तैयारी कर ली। जिनपिंग के साथ श्री मोदी के पुराने रिश्तों को लेकर विपक्ष ने काफी तंज भी कसे किन्तु कूटनीति और सैन्य स्तर पर हर तरह से डटने के साथ ही व्यापारिक मोर्चे पर भी चीन को घेरने की नीति ने अपना असर दिखा दिया और अंतत: डोकलाम में एक भी गोली चले बिना तनाव पर विराम लग गया। ब्रिक्स सम्मेलन के पहले रक्षा सलाहकार अजीत डोमाल की चीन यात्रा ने भी काफी अच्छा क्षेत्ररक्षण जमा दिया था। भले ही चीन की सदाशयता को स्थायी मानना बड़ी भूल होगी किन्तु उ. कोरिया द्वारा उत्पन्न संकट के कारण भी वह दबाव में आ गया है। उसे मालूम है कि यदि अमेरिका ने उ. कोरिया को निशाना बनाया तब उसकी लपटों से चीन भी थोड़ा तो झुलसेगा ही। फिलहाल द.एशिया के छोटे-छोटे अधिकतर देश भारत को अपने संरक्षक के तौर पर जिस तरह स्वीकार करते जा रहे हैं उससे भी चीन की चिंताएं बढ़ चली है। ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान के विरोध के लिये तैयार हो जाना उसकी मजबूरी हो सकता है किन्तु इससे भारत को जबर्दस्त फायदा   हुआ है जिसका असर पर आने वाले दिनों में साफ नजर आयेगा। घरेलू राजनीति में लगातार ताकतवर होने के बाद अब वैश्विक स्तर पर भी बतौर प्रधानमंत्री श्री मोदी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान को हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग करने की कोशिशें जिस तरह रंग लाती जा रही हैं ब्रिक्स घोषणा पत्र उसका ताजा तरीन उदाहरण है।

-रवींद्र वाजपेयी

Monday, 4 September 2017

उस अनजान भविष्यवक्ता को भी नमन....


--------------------------------------------------------
ये बात तकरीबन 46 वर्ष पुरानी है। मैं जबलपुर विवि. के शिक्षण विभाग से एम.ए कर रहा था।
सायकिल से जाना-आना होता था। कभी-कभार पिता जी बाहर चले जाते तब स्कूटर की शाही सवारी नसीब हो जाया करती थी।एक दिन दोपहर में विवि.से लौट रहा था तभी सिविल लाइंस में स्व.पं.द्वारिका प्रसाद मिश्र के बंगले से निकलकर शहर की तरफ आते एक बुजुर्ग पर निगाह गई।
एक झोला लिए,गांधी टोपी धारी वह बूढा अत्यंत साधारण  या यूं कहें कि मध्यमवर्गीय गरीब लग रहा था।
मैं उसके बगल से गुजर गया और फिर थोड़ी दूर जाकर अचानक लगा उससे पूछें कि कहां जाना है?
ज्योंही वे मेरे करीब आये मैंने पूछा बाबा कहाँ जाओगे तो वे अत्यंत कातर भाव से बोले बेटा बाई के बगीचे में रहता हूँ। मैने कहा कैसे जाओगे तो हंसकर बोले पैदल आया था  और वैसे ही जाऊंगा।
तब मैनें कहा चलिए में छोड़ देता हूँ तो संकोच में पहले मना करने के उपरांत स्कूटर पर किसी तरह पीछे बैठे और गिरने के भय से मेरे दोनों कंधे जोर से पकड़ लिए।
सफर शुरू हुआ तो मैंने कुरेदा मिश्र जी के यहां काम करते हो तो बोले नहीं पुराना परिचय है।कभी कांग्रेस का काम करता था।उन्होंने सरकारी मास्टर बनवा दिया। रिटायर हूं।कभी-कभी दर्शन हेतु आ जाता हूँ। आज आराम कर रहे थे तो मिलना न हो सका।
हाइकोर्ट चौक आते ही बोले बस यहीं छोड़ दें मैं चला जाऊंगा किन्तु मैने उन्हें घर के पास वाली सड़क तक छोड़ा और चलते समय स्कूटर खड़ा कर उनके चरण छुए तो वे बोले बेटा मैनें तुम्हें पहिचाना नहीं।
मैंने उनसे कहा जानता तो मैं भी आपको नहीं हूँ लेकिन आप शिक्षक रहे हैं उस नाते आपका आशीर्वाद लेना मेरा कर्तव्य है।
बुजुर्गवार की आंखों में चमक सी आ गई। झुकी गर्दन कुछ सीधी हुई औऱ बोले कहाँ से पढ़े हो तब मैंने उस फूटाताल सरकारी प्राथमिक शाला का नाम बताया जिसकी टाट पट्टी पर बैठकर मेरा विद्यार्थी जीवन शुरु हुआ था।
सिर पर हाथ रखकर उन्होंने आशीष देते हुए कहा किसी अच्छे घर के लगते हो। पिता जी क्या करते हैं?
मैने बताया तो खुश होकर बोले अरे वे तो बड़े पत्रकार हैं,उन्हें नमस्कार कहना और आओ चाय पीते जाओ।
मैने विनम्रता से इनकार किया तो कहा बेटा अच्छे से पढ़ना और अपने पिता जैसा बनना।
मुझे उनकी आखिरी बात तनिक भी रुचिकर नहीं लगी क्योंकि तब ज़िन्दगी में सपनों का कोई अंत न था।
वक़्त बढ़ता गया। विवि. से मिली राजनीति शास्त्र की किताबी शिक्षा और घर में व्याप्त उसके प्रायोगिक अनुभव के बाद भी अपनी पृष्ठभूमि और स्वभाव के विपरीत मैं बैंक की सेवा में आ गया।अच्छा खासा भविष्य था किंतु प्रारब्ध ने वह अफसरी छुड़वा दी और मैं बन गया पत्रकार। अपने पिता के संघर्ष और अभावों को देखने के बाद में इसके बारे में कभी सोचता तक न था किन्तु अंततः मैं उसी क्षेत्र में स्थायी रूप से आ गया।
कभी-कभी सोचता हूँ कहीं मेरे जीवन की दिशा को मोड़ देने में उस बुजुर्ग शिक्षक का वह आशीर्वाद " अपने पिता जैसा बनना" तो काम नहीं कर गया।
सचमुच जीवन में ऐसी कई छोटी - छोटी घटनाएँ होती हैं जिनका प्रभाव चमत्कारी होता है।
मुझे अपने शिक्षकों का स्नेह और आशीर्वाद सदैव मिला।वे सभी मेरे हितचिंतक रहे किन्तु उस अनजान शिक्षक के शब्दों में मेरा भविष्य छिपा था ये बहुत बाद में समझ सका।
आज भी कभी विवि जाता हूँ तो मिश्र जी के उस बंगले की तरफ देखता हूँ जो टूटकर कालोनी में बदल गया है और उस सड़क पर चलते हुए उस बूढ़े मास्टर को भी याद करता हूँ जिसने थोड़ी दूर के सफर में साथ चलते हुए मेरी मन्ज़िल जान ली थी।
उनके निवास के इलाके से गुजरते हुए भी  पूरा दृष्टांत मानस पटल पर तैर  जाता है।
आज शिक्षक दिवस पर  सभी अपने  शिक्षकों  के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त कर  रहे हैं तब मैं उस अपरिचित शिक्षक का  आदरयुक्त स्मरण करना अपना फर्ज समझता हूं  जो किसी सिद्धहस्त भविष्यवक्ता से कम नहीं था।

-रवींद्र वाजपेयी

विकास दर चुनौती है चिंता नहीं

नोटबंदी के अधिकृत आंकड़ों के खुलासे के एक दिन बाद ही खबर आ गई कि वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर बीते साल की आखिरी तिमाही से भी कम अर्थात् 5.7ज् रह गई। ये तीन साल में सबसे कम बताई जा रही है। जनवरी से मार्च 2017 के दौरान विकास दर 6.1 फीसदी रही थी। तब ये माना गया था कि नोटबंदी के असर के चलते उसमें गिरावट आई जो अति स्वाभाविक था परन्तु अपै्रल से जून 2017 के बीच उसमें और गिरावट आने का सीधा-सीधा अर्थ यही निकलेगा कि आर्थिक क्षेत्र में ठहराव की स्थिति जारी है। यद्यपि इस तिमाही में नगदी की उपलब्धता जैसी कोई अड़चन तो नहीं रही किन्तु जीएसटी के लागू होने की वजह से छाई अनिश्चितता से औद्योगिक इकाइयों के साथ ही बड़े व्यापारियों में अपना स्टॉक खत्म करने की आपाधापी मची रही। जीएसटी की दरों को लेकर चल रही खींचातानी तथा नियम कायदों के बारे में अनिश्चितता ने भी कारोबार में ठंडक की स्थिति बना दी। ऐसे में पहली तिमाही में 5.7ज् की विकास दर भी संतोषजनक न सही किंतु व्यवहारिक रूप से सामान्य कही जाएगी। इस बारे में गत रात्रि प्रसारित एक ट्वीट ने ध्यान आकर्षित किया जिसमें कहा गया था कि विकास दर में वृद्धि के आंकड़ों को अतिरंजित मानने वाला विपक्ष उसमें आई गिरावट पर भरोसा करता है या नहीं? इस टिप्पणी के परिपे्रक्ष्य में वाजपेयी सरकार के पतन के बाद विकास दर में आई गिरावट पर डॉ. मनमोहन सिंह और पी. चिदम्बरम दोनों ने कहा था कि उसकी सही स्थिति वही है। उससे ये आभास भी हुआ था कि पिछली सरकार ने विकास संबंधी आँकड़ों में बाजीगरी कर डाली। ऐसी ही बात डॉ. सिंह ने डॉलर के मुकाबले रूपये की कीमत में हुई अप्रत्याशित गिरावट को लेकर भी कही थी। अर्थशास्त्र में एक उक्ति काफी उक्ति काफी प्रचलित है- झूठ, सफेद झूठ और आंकड़ा। ये एक तरह का तंज है जिसका अभिप्राय ये है कि अपनी उपलब्धियों के झूठे प्रचार हेतु आंकड़ों का सहारा लिया जाता है। मोदी सरकार पर भी पहले दिन से ही ये आरोप लगता रहा है कि वह आर्थिक प्रगति के दावे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है। लेकिन जनवरी से मार्च और फिर अपै्रल से जून के दौरान दो तिमाहियों में विकास दर में आई गिरावट के बाद केन्द्र सरकार कम से कम उस आरोप से तो बच ही गई। हालांकि इससे घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये गिरावट परिस्थितिजन्य है। नोटबंदी के कारण बाजार में नगदी का अभाव होने से लेन-देन प्रभावित हुआ ये सर्वविदित था। लेकिन जब नगदी की कमी दूर हो गई तब भी अर्थव्यवस्था की गति धीमी इस बात का संकेत है कि कालेधन का उपयोग कठिन हो जाने से व्यापारिक गतिविधियों में उछाल रुक गई। रही-सही कसर पूरी कर दी जीएसटी को संसद की मंजूरी मिलने से। ज्यों ही बाजार को लगा कि जीएसटी का लगना तय है उसने उसके लिए खुद को तैयार करना शुरू कर दिया जिसका असर उत्पादन ठप्प होने तथा मांग रुक जाने के रूप में सामने आया। दूसरी बात ये हुई कि नोटबंदी के प्रभाव से उबरने की कोशिश कर रहे उद्योग-व्यापार जगत पर पूरा कारोबार हिसाब-किताब से करने की बंदिश आ गई। नोटबंदी के बाद यद्यपि 99ज् पुराने नोट रिजर्व बैंक में लौट आये किन्तु काले धन से कारोबार रखना दिन ब दिन कठिन होता गया। जीएसटी के प्रारंभिक चरण में ही नंबर दो का कारोबार करने वालों का हौसला काफी टूटा है। भविष्य में ई वे बिल व्यवस्था लागू होने के बाद तो बिना बिल के ऊपर-ऊपर होने वाले कारोबार पर और भी लगाम लगेगी। इससे हो सकता है औद्योगिक उत्पादन और बाजार से आने वाली मांग जून से दिसंबर तक की दो तिमाहियों में भी 6च् के आसपास ही रहे परन्तु एक बार जीएसटी के पूरी तरह चलन में आने के बाद अंतिम तिमाही में वह 7ज् तक पहुंच सकती है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि नोटबंदी और जीएसटी को लागू करने से मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का पता तो चला ही लेकिन उससे भी ज्यादा लाभ भारत की वैश्विक छवि में सुधार के रूप में हुआ जिसके परिणामस्वरूप दुनिया भर के निवेशकों ने चीन की बजाय भारत को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। इसकी एक वजह राजनीतिक स्थिरता भी है। बीच-बीच में हिचकोले खाने के बावजूद मोदी सरकार ने अपना प्रभाव कायम करते हुए पूरे देश में अपने लिये राजनीतिक समर्थन जुटा लिया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का एनडीए में लौटना और अब अन्नाद्रमुक का भी जुड़ जाना केन्द्र सरकार और भाजपा के पांव मजबूती से जमने का प्रमाण है। उद्योग जगत भी सरकार की नीतियों और निर्णयों से संतुष्ट है। जहां तक बात विपक्ष की है तो वह अब तक अपनी दिशा ही तय नहीं कर पा रहा। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिन आर्थिक अनिश्चितता को दूर करने में मददगार होंगे। डोकलाम विवाद को जिस सूझबूझ और साहस के साथ मोदी सरकार ने सुलझाया उसकी तारीफ शशि थरूर और उमर अब्दुल्ला सरीखे भाजपा विरोधी नेताओं तक को करनी पड़ गई। राजनीतिक स्थिरता, नेतृत्व की दृढ़ इच्छा शक्ति तथा नीतिगत स्पष्टता आर्थिक प्रगति की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। उस दृष्टि से पिछली दो तिमाहियों की गिरावट से घबराने की कोई जरूरत नहीं है। भले ही कालाधन प्रत्यक्ष तौर पर उजागर नहीं हुआ परन्तु मोदी सरकार उसकी घेराबंदी करने में जरूरत कामयाब हो गई है। अब या तो वह कर ढांचे में आकर अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में शामिल होगा या फिर चोरी के माल की तरह पकड़ा जाएगा। भारतीय अर्थव्यवस्था एक बहुत बड़े संक्रांति काल से गुजर रही है। इसे प्रसव पीड़ा भी कहा जा सकता है परन्तु इससे शुभ समाचार निकलकर आयेगा ये सुनिश्चित है क्योंकि निर्णय लेने वाले दबाव में आए बिना काम करने की हिम्मत दिखा रहे हैं जो विश्वस्तरीय अर्थशास्त्री होने के बाद भी पिछली सरकार का प्रधानमंत्री नहीं दिखा सका। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने मौजूदा गिरावट के लिये चुनौती शब्द का उपयोग कर सही किया क्योंकि यदि वे चिंता कहते तब शायद गलत होता।

-रवींद्र वाजपेयी

मंत्रीमंडल : कम समय में ज्यादा काम करने की चुनौती

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत दिवस मंत्रिमंडल का तीसरा विस्तार और पुनर्गठन किया। इसमें शिवसेना, अद्रमुक तथा जद (यू) को चँूकि जगह नहीं मिली इस कारण एक बार फिर ये एनडीए की बजाय भाजपा का आयोजन बनकर रह गया किन्तु श्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने चौकाने वाले फैसले लेने की परंपरा जारी रखते हुए नये चेहरों के चयन, कुछ राज्यमंत्रियों की पदोन्नति तथा मंत्रालयों में परिवर्तन के जरिये ये दर्शा दिया कि ये खाली स्थान भरे की कवायद मात्र नहीं थी। जिस तरह कई राज्य मंत्री अपने काम के कारण केबिनेट में लाये गये तथा प्रदर्शन के आधार पर मौजूदा केबिनेट मंत्रियों के विभागों में फेरदबल किया गया उससे यह साफ हो गया कि प्रधानमंत्री सरकार के कामकाज को लेकर गंभीर और सतर्क दोनों हैं। जिन नये चेहरों को शामिल किया यद्यपि वे सभी राज्यमंत्री बनाये गये लेकिन उनमें से कुछ को स्वतंत्र प्रभार देना उनके अनुभव और दक्षता का सम्मान करना है। आर.के. सिंह, सत्यपाल सिंह, अल्फांजो कन्ननथनम एवं हरदीप पुरी के रूप में जिन चार नौकरशाहों को मंत्री बनाए जाने की सर्वाधिक चर्चा हुई वे सभी अपने सेवाकाल में काफी प्रसिद्ध हुए। उनकी कार्य के प्रति ईमानदारी तथा निर्णय क्षमता को सभी ने स्वीकार किया था। प्रधानमंत्री जिस कार्यशैली की अपेक्षा मंत्रियों से रखते हैं उसका एहसास कराने के लिये ही पार्टी के नेताओं को छोड़ चार पूर्व ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों को सरकार का हिस्सा बनाया गया जो अपनी विशिष्ट कार्यक्षमता के कारण सम्मानित रहे। इनमें भी श्री पुरी और श्री कन्ननथनम तो सांसद तक नहीं हैं। लेकिन जो सबसे बड़ा धमाका प्रधानमंत्री ने किया वह रहा निर्मला सीतारमण को केबिनेट मंत्री पदोन्नत कर रक्षामंत्री जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंप देना। श्री पार्रिकर और फिर अरुण जेटली समान वरिष्ठ तथा अनुभवी नेताओं के जिम्मे रखा गया रक्षा मंत्रालय अचानक श्रीमती सीतारमण सदृश अपेक्षाकृत कम अनुभवी मंत्री को सौंप देना प्रधानमंत्री की उस सोच का प्रमाण है जिसमें नई प्रतिभाओं की खोज कर उसे और संवारना है। वैसे तो रक्षा मंत्रालय का काम हर समय महत्वपूर्ण रहता है किन्तु मौजूदा स्थितियों में जब पाकिस्तान  के अलावा चीन के साथ भी सीमा पर तनाव का माहौल हो तब निर्मला जैसी साधारण सी नजर आने वाली महिला को इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना खतरा उठाने जैसा है लेकिन श्री मोदी ऐसा करने के लिये ही जाने जाते हैं। मंत्रिमंडल में विभागों की अदला-बदली में जहां नितिन गड़करी को गंगा सफाई जैसा विभाग अतिरिक्त दिया गया वहीं उमाश्री भारती के स्तीफे की पेशकश के बाद चिरपरिचित शैली में रूठने की स्थिति के कारण यद्यपि उनकी छुट्टी तो नहीं की गई परन्तु पेयजल तथा स्वच्छता जैसा विभाग थमा दिया गया जो वैसे तो बेहद महत्वपूर्ण है परन्तु साध्वी को शायद उतनी चर्चा में नहीं रख सकेगा,  जितनी गंगा सफाई में मिलती थी। इसी तरह पियूष गोयल को ऊर्जा विभाग में उल्लेखनीय कार्य के पुरस्कार स्वरूप रेल मंत्रालय देना भी सही लगता है। लगातार हुई रेल दुर्घटनाओं से चौतरफा आलोचनाओं के शिकार हो गये सुरेश प्रभु की ईमानदारी का सम्मान करते हुए प्रधानमंत्री उन्हें मंत्री बनाए रखा तथा व्यापार और वाणिज्य मंत्रालय सौंप दिया जो अभी तक श्रीमती निर्मला सीतारमण के पास था। संयोग ये है कि श्री गोयल और श्री प्रभु दोनों ही पेशे से चार्टड अकांउटेंट हैं। धर्मेन्द्र प्रधान की पदोन्नति भी उनके बेहतर काम की वजह से होने के साथ उड़ीसा में भाजपा का जनाधार बढ़ाने का प्रयास है। श्री मोदी ने कई मंत्रियों को जहां अच्छे काम के लिये ईनाम दिया वहीं कुछ के पर कतरने के बाद भी संभलने का अवसर दिया। राजस्थान के गजेन्द्र सिंह शेखावत अपने जमीनी काम के चलते सरकार का हिस्सा बने जबकि अनंत कुमार हेगड़े भी कनार्टक विधानसभा के चुनाव के मद्देनजर एक दमदार चेहरे के तौर पर पेश किये जाने के कारण मंत्री बनाए गए। राज्यवर्धन राठौड़ को खेल विभाग में लाने के फैसले का तो विपक्ष भी विरोध नहीं कर सकेगा। राधामोहन सिंह से कृषि विभाग नहीं लेना जरूर चौंकाने वाला रहा। इस फेरबदल के पीछे 2019 के महा-मुकाबले की तैयारी के साथ-साथ पार्टी के परंपरागत मतदाताओं को साधे रखने का प्रयास भी है। उ.प्र. में एक ब्राम्हण को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के बाद कलराज मिश्रा की छुट्टी के एवज में गोरखपुर के शिवप्रताप शुक्ल को शामिल किया गया वहीं बिहार से पार्टी के पुराने नेता अश्विनी चौबे को लाकर ब्राम्हण वर्ग के सम्मोहन का प्रयास किया गया जिसे ये लगने लगा था कि भाजपा भी मतों की लालच में दलित और पिछड़ी जातियों को ज्यादा महत्व देने लगी है। वैंकेया नायडू को उप राष्ट्रपति बनाने के बाद निर्मला  की बतौर रक्षामंत्री नियुक्ति के द्वारा प्रधानमंत्री ने दक्षिण भारत में भाजपा के अपने बूते खड़े होने की कार्ययोजना को स्पष्ट कर दिया। केरल के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी श्री कन्ननथनम का मंत्री बनना भी इसी का हिस्सा रहा। यद्यपि म.प्र. से आदिवासी कोटे के फग्गन सिंह कुलस्ते की विदाई के बदले टीकमगढ़ के सांसद वीरेन्द्र कुमार का चयन सबको आश्चर्यचकित कर गया क्योंकि दमोह सीट के सांसद प्रहलाद पटेल का नाम लगभग तय था। वीरेन्द्र कुमार छह बार के सांसद हैं तथा काफी पढ़े-लिखे हैं किन्तु न तो वे म.प्र. में दलित नेता के तौर पर धाक रखते हैं और न ही पार्टी संगठन में उनकी जोरदार पकड़ है। ऐसा लगता है प्रारंभिक ना-नुकुर के बाद उमाश्री भारती द्वारा मंत्री पद से नहीं हटने की जिद के चलते प्रहलाद पटेल की गाड़ी रुक गई क्योंकि दोनों लोधी जाति के नेता हैं। श्री कुलस्ते के क्षेत्र से आदिवासी महिला संपतिया उइके को राज्यसभा में भेजकर भाजपा ने पहले ही दाँव खेल दिया था, किन्तु वीरेन्द्र कुमार की लॉटरी लगने के पीछे उमाश्री की जिद ही रही वरना श्री पटैल को लंबे अरसे बाद मंत्री पद मिलना तय था। वे वर्तमान में भले ही बुंदेलखंड क्षेत्र से सांसद हों किन्तु म.प्र. के महाकौशल अंचल में  भाजपा के सबसे मजबूत जनाधार वाले नेता हैं, ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है।उ.प्र. से संजीव बालियान सरीखे विवादित मंत्री को हटाकर सत्यपाल सिंह जैसे जाट को जगह देकर श्री मोदी ने अजित सिंह की सियासत को भी धक्का दिया है। बागपत से उन्हें हराकर ही श्री सिंह सांसद बने। रिश्ते में अजित उनके साले होते हैं। कुल मिलाकर मंत्रिमंडल का पुनर्गठन तथाा फेरबदल समय की जरूरत के मुताबिक किया गया है। प्रधानमंत्री की इच्छा ये है कि मंत्रीगण तेजी के साथ ऐसा काम करें जिससे जनता को उसका लाभ न सिर्फ दिखाई दे, बल्कि महसूस भी हो। 2014 के वायदों को जमीन पर उतारने के लिये अब ज्यादा वक्त इस सरकार के पास नहीं है। नोट बंदी और जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था की गति धीमी पडऩा भी बड़ी चुनौती है। गुजरात सहित अनेक राज्यों के चुनाव 2019 की रिहर्सल के तौर पर होंगे। हताशा में डूबा विपक्ष संयुक्त होकर भाजपा को रोकने का जो प्रयास कर रहा है उससे निपटने के लिये भी प्रधानमंत्री को सतर्क रहना पड़ेगा। भले ही तमाम सर्वेक्षणों तथा आंकलनों के मुताबिक श्री मोदी तथा भाजपा  की स्थिति  अब भी काफी मजबूत है किन्तु संचार क्रांति के इस दौर में छोटी सी घटना भी हवा का रुख बदल सकती है। नरेन्द्र मोदी के बारे में ये प्रसिद्ध है कि वे सदैव भविष्य की चुनौतियों से निपटने के बारे में योजना बनाते रहते हैं तथा उनका हर कदम दूरगामी लक्ष्यों की तरफ होता है। डोकलाम विवाद पर चीन को कूटनीतिक शिकस्त देने के बाद प्रधानमंत्री की छबि और मजबूत हुई है। कल शपथ विधि के फौरन बाद वे ब्रिक्स सम्मेलन हेतु चीन चले गये किन्तु उसके पहले सभी मंत्रियों को विभागों का बंटवारा करने जैसा निर्णय ये दर्शाता है कि वे केवल दूसरों से ही अपेक्षा नहीं करते वरन स्वयं भी कार्यकुशलता का उदाहरण पेश करते हैं। उनका यही गुण उन्हें औरों से अलग और ऊंचा बना देता है। वैसे अभी 7-8  मंत्रियों की जगह है जो सहयोगी दलों के खाते में देर-सबेर जाना तय है।

- रवींद्र वाजपेयी