गत सप्ताह इंदौर में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी द्वारा आयोजित छात्रों की गूँज में जमा हजारों की भीड़ में वास्तविक छात्र कितने थे इसे लेकर संशय है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को छात्र बनाकर भीड़ बटोरी गई। वहीं कांग्रेस का दावा है कि राहुल के बढ़ते आकर्षण के कारण अपेक्षा से अधिक छात्रों ने आयोजन के लिए अपना पंजीयन करवाया था। हालाँकि उक्त आयोजन में छात्रों और युवाओं की संख्या काफी थी। श्री गाँधी उनसे जुड़े मुद्दे उठा भी रहे थे किंतु इसी दौरान एक स्टैंड अप कामेडियन धड़धड़ाते हुए मंच पर आया और राहुल से लिपटकर अजीब सी हरकतें करने लगा । पहले - पहल तो किसी को कुछ समझ नहीं आया किंतु जब श्री गाँधी ने उसे मोदी जी कहकर संबोधित किया तब स्पष्ट हुआ कि वह नौटंकी दरअसल प्रधानमंत्री के विदेशी नेताओं से मिलने का मजाक बनाने के लिए की गई। उसी दौरान कामेडियन बार - बार श्री गाँधी से लिपटता रहा और वे भी उसे गले लगाते रहे । फिर कामेडियन ने भद्दे अंदाज में माँ को कुर्सी दो जैसी बात दोहराई। स्मरणीय है कुछ समय पहले एक सभा में किसी वृद्ध महिला को खड़ा देख श्री मोदी ने उन्हें कुर्सी देने की बात मंच से कही थी।कामेडियन ने उसी की नकल का भौंड़ा प्रयास किया। और फिर कुछ बड़बड़ाते हुए वह कामेडियन लौट गया। उस फूहड़पन के वीडियो सोशल मीडिया पर आ जाने से छात्रों की गूँज कार्यक्रम की चर्चा तो ठंडी पड़ गई और उस स्तरहीन कामेडी की गूँज सर्वत्र सुनाई दे रही है। दिल्ली में कांग्रेस के एक बड़े आयोजन में पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने भी इसी तरह राहुल से गले मिलकर प्रधानमंत्री की नकल करने का नाटक रचा था जिसकी काफी निंदा हुई। इंदौर में तो उसकी और भी बेहूदे तरीके से पुनरावृत्ति हुई। जिस कामेडियन को छात्रों की गूँज नामक आयोजन में प्रधानमंत्री की नकल करने बुलाया गया वह पूरे समय हें... हें... हें करता रहा। माँ को कुर्सी दो जैसे वाक्य का भी कोई अर्थ उपस्थित श्रोता नहीं समझ सके। वो तो जब राहुल ने उसे मोदी जी कहकर संबोधित किया तब लगा कि पूरी नौटंकी का मकसद क्या था? चूंकि श्री गाँधी भी उस कामेडियन के साथ सह अभिनेता बने रहे इसलिए उस सस्तेपन के लिए वे भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं। यदि वे उस व्यक्ति को माँ को कुर्सी दो कहने पर भी रोक देते तब भी नुकसान की कुछ भरपाई हो जाती किंतु ऐसा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप जिस उद्देश्य से उतना बड़ा जलसा हुआ वह तो गौण होकर रह गया लेकिन उस नौटंकी की गूँज सर्वत्र सुनाई दे रही है। कांग्रेस समर्थक लाॅबी ये कहते हुए इसका बचाव कर रही है कि प्रधानमंत्री और भाजपा का प्रचारतंत्र भी तो कांग्रेस नेताओं का मजाक बनाने में नहीं चूकता। लेकिन श्री गाँधी जिस मुद्दे को लेकर इंदौर में छात्रों के बीच गए वह गंभीर और सामयिक था। वे उसके जरिये छात्रों की भावनाओं को समझने और अपनी बात उनसे कहने तक सीमित रहते तब वह आयोजन सार्थक हो जाता। लेकिन ये बात स्पष्ट हो गई कि श्री गाँधी में दो दशक के संसदीय अनुभव के बाद भी अपेक्षित परिपक्वता का अभाव है। इसीलिए उनकी समूची उठापटक का नतीजा निराशाजनक ही रहता है। कांग्रेस इन दिनों उन्हें प्रधानमंत्री का चेहरा बनाने के लिए पूरे पेशेवर अंदाज में प्रयासरत है। लेकिन श्री गाँधी खुद अपनी छवि खराब कर लेते हैं। कांग्रेस में इमरान प्रतापगढ़ी जैसे युवा शायर हैं जो ऐसे आयोजनों में छात्रों को प्रभावशाली तरीके से आकर्षित कर सकते हैं। लेकिन लगता है श्री गाँधी इस बात से भयभीत रहते हैं कि दूसरा कोई उन पर भारी न पड़ जाए। इसीलिए वे फूहड़पन फैला रहे स्टैंड अप कामेडियन की सेवाएं लेने मजबूर हुए। ऐसा लगता है उनको सही राह दिखाने वाला कोई नेता पार्टी में नहीं है। जो दो - चार वरिष्ट हैं भी तो उनमें इतना साहस नहीं कि वे उनकी गलतियों पर टोक सकें। यह भी संयोग ही रहा कि जब इंदौर के आयोजन में श्री गाँधी की सहभागिता से प्रधानमंत्री का उपहास हो रहा था , उसी समय दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एन.एस.यू.आई का सूपड़ा साफ हो रहा था। किसी ने कहा है - आजकल रंगमंच पर अच्छे अभिनेता इसलिए नहीं मिलते क्योंकि राजनीति फूहड़पन को भी श्रेष्ठ अभिनय का पुरस्कार दे देती है। लगता है कांग्रेस में भी आजकल यही हो रहा है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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