एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने कुछ मामलों में अपनी असहमति दिखाई जिसे नजरंदाज कर दिया गया। साथ ही कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना ले लिए गए जिसके बारे में उन्होंने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव को पत्र भी लिखा था। अखबार के मुताबिक उक्त आपत्तियां एस. आई. आर से जुड़ी हुई थीं। रिपोर्ट प्रकाशित होते ही राजनीतिक तूफान आ गया। राहुल गाँधी, ममता बैनर्जी और अरविंद केजरीवाल का बोलना तो समझ में भी आता है लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी भी बहती गंगा में हाथ धोने लगी। इन सबका निशाना बने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। कोई उन्हें देशद्रोही कह रहा है तो कोई गिरफ्तारी और त्यागपत्र की मांग कर रहा है। आयोग ने स्पष्टीकरण दिया कि आयुक्तों के बीच विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा और विमर्श के दौरान असहमति होने के बाद भी अंतिम निर्णय एक राय से होते हैं। लेकिन विपक्ष ने जिस तरह से ताबड़तोड़ हमले मुख्य चुनाव आयुक्त पर किये उससे लगता है मानो उसे इस बारे में पहले से ही जानकारी थी। नीट परीक्षा को लेकर आया उबाल ठंडा पड़ चुका है। पंजाब और दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में अभाविप की जीत से जंतर मंतर आंदोलन की हवा निकल चुकी है। अंबानी और अडानी के विरुद्ध उठाये गए मुद्दे भी फुस्स साबित हुए। रक्षा सौदों पर किया शोर- शराबा भी जनता को प्रभावित नहीं कर सका। ब्रिक्स सम्मेलन से प्रधानमंत्री की छवि और चमकी है। अभी तक जितने भी चुनाव सर्वे आये उनमें उ.प्र, और उत्तराखंड में भाजपा की वापसी तय मानी जा रही है। वहीं पंजाब में आम आदमी पार्टी और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के हाथ से सत्ता खिसकती दिख रही है। विपक्ष में कोई एकजुटता नहीं हो पा रही। जंतर मंतर आंदोलन पर आम आदमी पार्टी और वामपंथियों के कब्जे ने कांग्रेस को तनाव में डाल दिया । उसके साथ कोई गठबंधन को तैयार नहीँ है। केजरीवाल को भी चिंता है कि दिल्ली से पैर उखड़ने के बाद पंजाब में भी हार सिर पर मंडरा रही है। ममता बैनर्जी ने इंडिया गठबंधन में सांस फूंकने की असफल कोशिश की । शरद पवार , सोनिया गाँधी और लालू प्रसाद यादव का स्वास्थ्य आड़े आ रहा है। राहुल गाँधी और अखिलेश यादव के बीच अघोषित प्रतिस्पर्धा चल रही है। आरक्षण पर भाजपा से नाराज सवर्ण जातियाँ इस असमंजस में हैं कि किसके साथ जाएं क्योंकि राहुल गाँधी का बस चले तो 100 प्रतिशत आरक्षण कर दें। वहीं सपा, राजद और बसपा का तो आधार ही आरक्षण टिका हुआ है। शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का जनाधार भी कम हुआ है। कुल मिलाकर विपक्ष को कुछ सूझ नहीं रहा था। ऐसे में चुनाव आयोग के बारे में प्रकाशित एक खबर पर होहल्ला शुरू कर दिया गया। आयोग की कार्यप्रणाली में यदि कमी है तो उसकी जाँच होनी चाहिए। लेकिन लंबे समय से वोट चोरी का ढोल पीटने वाले राहुल उसका एक भी प्रमाण नहीं दे सके। ईवीएम पर लगाए गए आरोप भी हवा हवाई होकर रह गए । गत दिवस श्री गाँधी ने अपनी खीझ ये कहते हुए निकाली कि 1971 का चुनाव जीतने के दो वर्ष बाद ही स्व. इंदिरा गाँधी के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर पैदा हो गई थी किंतु भाजपा सरकार के विरुद्ध नहीं होती। इसके साथ ही उन्होंने बचकानेपन का परिचय देते हुए पहले तो ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही बताया और फिर उन्हें सरकार के विरुद्ध गवाह बनने का सुझाव देने लगे। इस बारे में जब तक संदर्भित दोनों चुनाव आयुक्त सामने आकर कुछ नहीं बोलते तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना बेमानी है। ये सवाल भी उठता है कि यदि ज्ञानेश कुमार अपनी मर्जी थोप रहे थे तब दोनों चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति से शिकायत करनी थी अथवा त्यागपत्र देकर अपनी बात रखनी चाहिए थी। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसके सर्वोच्च पदाधिकारी को देशद्रोही कहना किसी को भी शोभा नहीं देता। इसी तरह 2024 में वोट चोरी से बनी संसद द्वारा बनाये सभी कानूनों को अवैध बता देना भी समझ से परे है। यदि श्री गाँधी को लगता है वर्तमान लोकसभा गलत तरीके से चुनी गई तब उन्हें उसकी सदस्यता से त्यागपत्र देकर एक उदाहरण पेश करना चाहिए। लेकिन उनका रवैया केवल शोर मचाना रह गया है। फ्रांस से रक्षा सौदे , हिंडनबर्ग रिपोर्ट और पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की किताब को लेकर श्री गाँधी द्वारा मचाया गया हल्ला व्यर्थ साबित हुआ। संसद के कई सत्र बर्बाद होने के बाद भी विपक्ष कुछ साबित नहीं कर सका। जब भी कोई चुनाव आता है श्री गाँधी एक नया मुद्दा पकड़कर बैठ जाते हैं। लेकिन जनता उनकी बात को अनसुना करती आई है और आगे भी करती रहेगी क्योंकि वे किसी भी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में सफल नहीं हुए । चुनाव आयोग संबंधी जितने भी विवाद हैं उन पर सर्वोच्च न्यायालय में बहस जारी है। बेहतर होगा उसके फैसले का इंतजार किया जाए।
-रवीन्द्र वाजपेयी
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