Friday, 18 September 2026

हम तो डूबे हैं , तुम को भी ले डूबेंगे की नीति पर चल रहा ईरान



इजराइल और हमास के बीच चली जंग का विस्तार अब पूरे अरब जगत  में हो चुका है। इसका प्रथम दृष्ट्या दोषी ईरान को ही माना जाएगा क्योंकि जब उसके ऊपर अमेरिका और इसराइल का हमला हुआ तब पलटवार करते हुए उसने उन खाड़ी देशों पर भी मिसाइलें दागने में लेशमात्र संकोच नहीं किया जिनमें अमेरिकी  सैन्य अड्डे हैं। वहाँ तक भी बात ठीक थी । लेकिन ईरान ने इससे आगे बढ़कर उन देशों के तेल शोधन संयंत्रों पर हमले शुरू कर  दिये। दुबई में तो दुनिया की सबसे ऊँची इमारत सहित होटलों को भी निशाना बनाकर वहाँ आने वाले पर्यटकों के साथ ही उन निवेशकों को भी भयभीत कर दिया जिन्होंने यहाँ अपना काफी पैसा रखा था। इसके अलावा कतर और ओमान जैसे देश भी ईरान के हमलों का शिकार हुए तो दूसरी तरफ से भी जवाबी कारवाई होने लगी। ईरान ने इसराइल  के हवाई सुरक्षा चक्र को तोड़कर अपनी आक्रामक क्षमता का लोहा मनवाया ही किंतु उसके गुस्से का सबसे बड़ा शिकार हुआ सऊदी अरब जो अपनी अपार तेल संपदा के बल पर प. एशिया का सबसे संपन्न और शक्तिशाली मुस्लिम देश माना जाता है। मुसलमानों का सबसे पवित्र स्थल मक्का भी चूंकि सऊदी अरब में स्थित है लिहाजा पूरे विश्व से मुस्लिम तीर्थयात्री हज  करने सऊदी अरब आते हैं। और फिर सऊदी अरब मुस्लिम जगत में अमेरिका का सबसे निकटस्थ देश है। कहा जाता है यहाँ के शाही परिवार ने खरबों डॉलर का निवेश वहाँ कर रखा है। इसीलिए कट्टर मुस्लिम देश होने के बावजूद शाही परिवार और अमेरिका के बीच काफी मजबूत रिश्ते रहे हैं । विशाल तेल भंडारों के साथ ही  तेल शोधन संयंत्रों के चलते सऊदी अरब, तेल  व्यापार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दुनिया भर में इस्लाम के प्रचार - प्रसार हेतु इसका शाही परिवार काफी धन उपलब्ध करवाता है। लेकिन ईरान चूंकि इस्लाम के शिया संप्रदाय का पालन करता है इसलिए उसकी सऊदी शाही खानदान से पटती नहीं है। उसे ये भी लग रहा था कि इस लड़ाई में अमेरिका के कूदने में सऊदी अरब का भी हाथ है । इसका खुलासा तब हो गया जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तमाम खाड़ी देशों से अमेरिकी संरक्षण के एवज में धन की मांग की तब सबसे पहले सऊदी अरब ने ही हाथ बढ़ाया। इसीलिए ईरान उससे बुरी तरह चिढ़ गया और उसके तेल शोधन संयत्रों को चुन - चुनकर निशाना बनाया। इसके बाद उसने होर्मुज नामक जल मार्ग में रोड़ा अटकाकर तेल उत्पादक सभी देशों की आर्थिक  हालत खराब कर दी। इससे बचने के लिए जब सऊदी अरब ने वैकल्पिक समुद्री मार्ग से तेल निर्यात की तैयारी की तो ईरान ने हूती नामक कट्टरपंथी इस्लामिक लड़ाकों को सऊदी अरब पर हमले के लिए उकसा दिया। स्मरणीय है हमास की तरह से हूती भी ईरान पालित इस्लामिक उग्रवादी हथियारबंद संगठन है। बीते कुछ दिनों से हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब की जिस तरह घेराबंदी कर रखी है उससे वहाँ दहशत का माहौल है। वहाँ के शाही परिवार ने पाकिस्तान और अमेरिका से मदद की गुहार लगाई किंतु वह भी काम नहीं आई। इसके कारण ईरान का हौसला और बुलंद हो गया। हूती का बढ़ता दबाव इसका प्रमाण है। अमेरिका और इसराइल के साथ जंग में ईराक भी खंडहर हो चुका है। उसकी तेल उत्पादन क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसराइल और अमेरिका भले ही ईरान में सत्ता परिवर्तन करवाने में विफल रहे किंतु उन्होंने  उसके अर्थतंत्र को इतना तबाह तो कर ही दिया कि आने वाले कई दशकों तक वह पहले जैसे खड़ा नहीं हो सकेगा। इसीलिए ईरान के मौजूदा हुक्मरान इस पर आमादा हो गए हैं कि तेल उत्पादक बाकी देशों को भी आर्थिक तौर पर कमजोर कर दिया जाए। सऊदी अरब चूंकि सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है इसलिए ईरान ने हूती लड़ाकों को उसके विरुद्ध उतार दिया। परिणाम स्वरूप दुनिया भर में कच्चा तेल महंगा होने लगा।  ईरान द्वारा हम तो डूबेंगे, तुम को भी ले डूबेंगे वाली रणनीति पर चलने से समूचा अरब जगत तबाही के रास्ते पर बढ़ता लग रहा है। दुनिया में कच्चे तेल और गैस के जो दूसरे उत्पादक देश हैं उनका व्यापार जिस तरह से चमक उठा उससे वैश्विक आर्थिक व्यवहार बदलने की राह पर है। अमेरिका और इसराइल ने जिस तरह ईरान को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया उसी तरह ईरान भी बदले की भावना से बाकी तेल उत्पादक देशों को तबाही की खाई में धकेलने ओर आमादा है। यदि यही चला तो इस आपसी लड़ाई में प. एशिया का कच्चे तेल  रूपी ये हथियार बेअसर होकर रह जाएगा। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

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