Tuesday, 29 September 2026

वोट चोरी तो बहाना है असली मकसद परिसीमन रुकवाना है




नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 12 वर्ष से ज्यादा हो गए। ऐसा नहीं है कि इस दौरान वे कभी दबाव में न आये हों। भूमि अधिगृहण और कृषि कानून उन्हें वापिस लेने पड़े। शिवसेना और अकाली दल जैसे  पुराने साथियों से अलगाव हुआ। देश  ही नहीं विदेश में हुए घोटालों को लेकर उनकी घेराबंदी करने की हरसंभव कोशिश हुई किंतु  उनके दबदबे और लोकप्रियता में कमी नहीं आई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रह जाने की वजह ने उन्हें चंद्रबाबू नायडू व नीतीश कुमार का सहारा लेना पड़ गया। उसके बाद ये आशंका व्यक्त की जाने लगी कि ये सरकार इस बार कार्यकाल पूरा नहीं कर सकेगी। यद्यपि प्रधानमंत्री ने सरकार को अस्थिरता से बचाये रखा है और आगे भी उसकी कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। लेकिन ये बात स्वीकार करनी होगी कि बीते दो वर्षों  में विपक्ष ने संसद और उसके बाहर आक्रामक अंदाज दिखाते हुए सरकार विशेष तौर पर श्री मोदी  को घेरने के लिए काफी व्यूह रचना की। भले ही वह पूरी तरह से सफल नहीं हो सका किंतु पहली बार ऐसा लगा  कि सरकार और प्रधानमंत्री रक्षात्मक हैं। हालांकि इसके लिए केवल विपक्ष को श्रेय नहीं दिया जा सकता क्योंकि सरकार को परेशानी में डालने के उसके प्रयासों से ज्यादा प्रभावशाली तो युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दे रहे। सरकार के लिए चौंकाने वाली बात ये रही कि विपक्ष के धारधार हमलों को तो वह झेल गई किंतु पिछले कुछ महीनों में कुछ ऐसे मुद्दे उठे जिनके पीछे राजनीतिक दल तो उतने नहीं खड़े हुए लेकिन युवाओं और छात्रों के गुस्से ने सरकार को पिछले पाँवों पर धकेल दिया। सबसे पहले  यूजीसी अधिसूचना को लेकर युवाओं के एक बड़े वर्ग में गुस्सा फूटा। सवर्ण समुदाय में इसे लेकर जबरदस्त आक्रोश देखा गया । हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उस अधिसूचना पर रोक लगा रखी है किंतु  उस मूर्खतापूर्ण कदम से समाज का  वह वर्ग भी अपनी नाराजगी जाहिर करने में पीछे नहीं रहा जो श्री मोदी का परंपरागत समर्थक रहा है ।  चूंकि ये विवाद आरक्षित जातियों से जुड़ा था लिहाजा विपक्षी दल तटस्थ रहते हुए दूर से तमाशा देखते रहे। लेकिन इसके बाद नीट परीक्षा पेपर लीक हो जाने के कारण सरकार के ऊपर जो संकट आया उसने ज्यादा परेशानी खड़ी कर दी।  शुरुआत में भले ही विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोला हो किंतु काॅकरोच जनता पार्टी बीच में कूदकर युवाओं और छात्रों की रहनुमा बन गई। वैसे तो जंतर मंतर पर हुआ धरना, प्रदर्शन, अनशन, संसद मार्च, अश्लील नारेबाजी पूरी तरह वामपंथियों का प्रायोजित कार्यक्रम था किंतु पेपर लीक के बाद कुछ छात्रों द्वारा आत्महत्या किये जाने से ज्यादातर  छात्रों के मन में शिक्षा मंत्रालय के विरुद्ध आक्रोश था। यदि तब के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेपर लीक होते ही नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कुर्सी छोड़ दी होती तब सरकार को इतनी शर्मिंदगी नहीं  उठानी पड़ती किंतु एक बात  उसे राहत देने वाली रही कि मुख्य विपक्ष चाहकर भी उसका श्रेय न ले सका। जंतर मंतर आंदोलन के खाते में तो एक मंत्री की कुर्सी छीन लेने जैसी उपलब्धि दर्ज हो गई किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी आंदोलनकारियों की पिटाई को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के त्यागपत्र के लिए पूरी ताकत लगाने के बाद भी नाकामयाब रहे। इस बीच राम मंदिर चंदा घोटला जैसा बड़ा मुद्दा भी सरकार के लिए सिरदर्द बना परंतु जंतर मंतर आंदोलन के शोर में वह  दबकर रह गया। फिलहाल राहुल एक बार फिर वोट चोरी के नाम पर मुख्य चुनाव आयुक्त  ज्ञानेश कुमार  के बहाने सरकार की घेराबंदी करना चाह रहे हैं । संसद के अगले सत्र में उनके विरुद्ध महाभियोग लाने की बात भी कही जा रही है किंतु जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार वोट चोरी और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग महज दिखावा है। विपक्ष जानता है कि एस.आई.आर की प्रक्रिया रुकने से रही। लेकिन इस होहल्ले के जरिये वह सरकार द्वारा लाये जाने वाले परिसीमन विधेयक को किसी भी कीमत पर रोकना चाहता है। संसद के मानसून सत्र में हुए हंगामे के पीछे भी यही रणनीति थी। चूंकि सरकार इसके लिए विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है इसलिए श्री गाँधी बाकी सब मुद्दों को भुलाकर वोट चोरी का राग फिर अलापने लगे। देखना ये है कि वे कितने सफल होते हैं क्योंकि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री भी ये चाहेंगे कि बजाय दूसरे मामलों में ताकत खर्च करने के परिसीमन विधेयक पारित करवा लें जिसे वे 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए ब्रह्मास्त्र मानकर चल रहे हैं। 



- रवीन्द्र वाजपेयी




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