म.प्र में ओबीसी आरक्षण का मामला बीते अनेक वर्षों से विवादों में फंसा हुआ है। वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी जातियों का आरक्षण बढ़ाकर 14 से 27 फीसदी कर दिया था । इसकी वजह से प्रदेश में सभी आरक्षण मिलकर 50 फीसदी की संवैधानिक सीमा से अधिक हो गए। इसके विरुद्ध दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने उस पर रोक लगा दी। 2020 में वह सरकार गिर गई और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गई। कानूनी रोक के कारण राज्य में 87:13 के फॉर्मूले के तहत चयन परीक्षाओं के 87% पदों पर परिणाम जारी किए जा रहे हैं और 13% पद रोके (होल्ड) गए हैं। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा जिसने उच्च न्यायालय को नियमित सुनवाई कर इस विवाद का निपटारा करने का निर्देश दिया। लेकिन अभी तक बात कानूनी बहस में ही उलझी हुई है। दरअसल उच्च न्यायालय में अनु. जनजाति वर्ग की ओर से ये ऐतराज जताया गया कि ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने से कुल आरक्षण 73% हो जाएगा। इससे अनारक्षित श्रेणी के साथ-साथ उन अनु. जनजाति उम्मीदवारों के लिए मौके घट जाएंगे जो अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य श्रेणी में चुने जाते हैं। इसके अलावा ये आपत्ति भी है कि बिना पर्याप्त सामाजिक और संख्यात्मक आंकड़ों के आरक्षण की सीमा में वृद्धि अनुचित है। स्मरणीय है प्रदेश में अनु. जाति के लिए 16, जनजाति के लिए 20, ओबीसी के लिए 14 और EWS के लिए 10 फीसदी आरक्षण लागू है। ऐसे में ओबीसी आरक्षण 14 से 27 प्रतिशत होने पर यह सीमा करीब 73 फीसदी हो जाएगी, जिस पर कानूनी और संवैधानिक चुनौतियां चल रही हैं। म. प्र उच्च न्यायालय में इस पूरे मामले पर नियमित सुनवाई में आरक्षित और अनारक्षित दोनों पक्ष अपने तर्क रख रहे हैं। लेकिन इस मामले में अदालत से बाहर भी राजनीतिक दांव - पेच चले जा रहे हैं। कांग्रेस का आरोप है कि उसने ओबीसी को न्याय देते हुए उनके आरक्षण का प्रतिशत 14 से बढ़ाकर 27 किया था किंतु भाजपा ने सत्ता में लौटते ही उसमें रोड़े अटकाते हुए अदालत में फंसा दिया और सुनवाई के दौरान भी जवाब देने में विलंब करते हुए मामले को जबरन खींच रही है। लेकिन प्रदेश सरकार के सामने भी ये समस्या है कि ओबीसी को खुश करने के फेर में अन्य जाति समूह मुँह फुलाकर बैठ जाएंगे। अदालत में तो जो होगा सो होगा किंतु लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र भेजकर ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के साथ ही जिन 13 फीसदी उम्मीदवारों की नियुक्तियाँ रुकी पड़ी हैं उन्हें तत्काल नियुक्ति पत्र देने की मांग की है। श्री गाँधी को ऐसा करने की सुध शायद न आती यदि इंदौर में छात्रों की गूँज कार्यक्रम के दौरान एक युवती ने ये मुद्दा न छेड़ा होता। इस पत्र के जरिये श्री गाँधी ने प्रदेश के ओबीसी वोट बैंक को अपने पाले में खींचने का पांसा फेंका है जो कि भाजपा का प्रतिबद्ध मतदाता रहा है। भाजपा ने भी इस वर्ग को लुभाने के लिए 2003 से अब तक जिन उमा भारती, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया, वे सभी ओबीसी हैं। और ये भी कि ओबीसी आरक्षण के विवाद के बावजूद भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत हासिल करने के बाद लोकसभा की सभी 29 सीटें कब्जा लीं। सवाल ये है कि क्या कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त संवैधानिक पद पर आसीन श्री गाँधी अदालत में विचाराधीन किसी मामले के बारे में ऐसा पत्र लिख सकते हैं? छात्रों और बेरोजगारों के पक्ष में आवाज उठाना नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य है लेकिन श्री गाँधी चूंकि एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं इसलिए उन्हें आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर सोच - समझकर अपनी राय रखनी चाहिए। इस समय देश का जो वातावरण है उसे देखते हुए राजनेताओं को गंभीरता के साथ जिम्मेदारी का भी प्रदर्शन करना चाहिए क्योंकि सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में छोटी सी बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती। म.प्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर श्री गाँधी ओबीसी वर्ग की सहानुभूति भले बटोर लें किंतु अनु. जाति / जनजाति और सवर्ण जातियाँ उनसे नाराज हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से सत्ता की अंधी दौड़ में सभी राजनीतिक दल कमोबेश देश को जातीय संघर्ष में धकेलने में जुटे हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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