दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए आंदोलन के कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को त्यागपत्र देना पड़ा था। केन्द्र सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों को दूर करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति भी बना दी। उसके बाद वह आंदोलन तो समाप्त हो गया किंतु उसमें मनुवाद को लेकर जो गालीबाजी हुई उसकी प्रतिक्रियास्वरूप जिस आरक्षण विरोधी आंदोलन का सूत्रपात हुआ उसकी चर्चा पूरे देश में है। शिक्षा संस्थानों में कम अंकों के बाद भी आरक्षित श्रेणी के छात्र को प्रवेश दिया जाना और अधिक अंक प्राप्त करने वाले सवर्ण को वंचित किये जाने से छात्र के साथ ही उनके माता - पिता ही नहीं बल्कि समूचे सवर्ण समाज में भारी नाराजगी है। यूजीसी अधिसूचना से भड़का गुस्सा नीट पेपर लीक के बाद और बढ़ गया। आजकल सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म पर केन्द्र सरकार के विरोध में जो हवा बह रही है उसके पीछे आरक्षण और अनु. जाति/ जनजाति कानून भी है। कहा जा रहा है कि राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को अनेक शहरों में मिली कड़ी टक्कर का कारण उसके परंपरागत सवर्ण मतदाताओं का छिटकना रहा जिसके कारण बड़ी संख्या में निर्दलीय जीतने में सफल रहे। हालांकि एक को छोड़कर सभी बड़े शहरों में भाजपा के महापौर बन गए किंतु बहुमत जुटाने के लिए उसे जोड़ - तोड़ का सहारा लेना पड़ा। इसी तरह दिल्ली वि.वि छात्र संघ चुनाव में भाजपा समर्थित अभाविप को तीन पदों पर जीत तो हासिल हो गई किंतु अंतर कम होने के पीछे भी सवर्णों की नाराजगी बताई जा रही है। इसीलिए उ.प्र विधानसभा के आगामी चुनाव भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण माने जा रहे हैं जहाँ ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका निर्णायक हो सकती है। यदि उनमें थोड़े से भी खिसके तब पार्टी के लिए संकट खड़ा हो सकता है। इस बारे में विचारणीय बात ये है कि अनु. जाति/ जनजाति कानून को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सवर्ण विरोधी छवि बनाने की सुनियोजित कोशिश वह वर्ग कर रहा है जो दलित और पिछड़ी जातियों को सवर्णों के विरुद्ध भड़काने में आगे - आगे रहता है। राजनीतिक नेताओं द्वारा फैलाये जा रहे ज़हर के चलते जातिगत भेदभाव विद्वेष से बढ़कर दुश्मनी का रूप ले चुका है। ताजा उदाहरण बॉम्बे आई.आई.टी का है जहाँ एक दलित छात्र द्वारा आत्महत्या किये जाने के बाद पूरा माहौल तनावपूर्ण है। जो जानकारी आई उसके अनुसार एक अध्यापक ने उक्त दलित छात्र को नकल करते पकड़ लिया। उसके बाद उसने छात्रावास के कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली। निश्चित रूप से ये अत्यंत दुखद घटना है। छात्र किसी भी जाति का हो उसका इस तरह चला जाना न केवल परिवार अपितु समाज के लिए भी आघात है। हालांकि ये बात भी चिंता के साथ चिंतन योग्य है कि आई. आई. टी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में प्रतिवर्ष दर्जनों छात्र आत्महत्या करते हैं जहाँ कड़ी मेहनत के बाद प्रवेश मिलता है। बॉम्बे आई. आई.टीके जिस छात्र की आत्महत्या का मामला सुर्खियों में है उसके माता - पिता ने उस अध्यापक पर अनु. जाति/जनजाति के तहत प्राथमिकी दर्ज करवाते हुए उसकी गिरफ्तारी की मांग कर डाली। आरोप है कि अध्यापक संस्थान के निदेशक के दबाव में उक्त छात्र को पहले से प्रताड़ित करते आ रहे थे। आत्महत्या करने वाला छात्र चूंकि दलित था इसलिए राजनीतिक दल रोटी सेंकने सक्रिय हो गए। अध्यापक को फांसी देने तक की मांग उठने लगी। चंद्रशेखर आजाद जैसे दलित सांसद ने भी भड़काऊ बयान दे डाला। इस बीच उक्त अध्यापक को डीन के दायित्व से मुक्त कर दिया जिसके बाद देश भर के आई.आई.टी संस्थानों के ज्यादातर अध्यापक उनके समर्थन में मैदान में आ गए। इस प्रकार पूरे मामले की दिशा ही बदल गई। आत्महत्या प्रकरण की जांच शुरू हो चुकी है। उसके निष्कर्षों के लिए प्रतीक्षा करने के बजाय जिस प्रकार का शक्ति प्रदर्शन चल पड़ा है उसके बाद शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण की व्यवस्था के साथ ही अनु. जाति/जनजाति कानून के औचित्य पर भी सामाजिक स्तर पर बहस होने लगी है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य शोषित और वंचित वर्ग को मुख्यधारा में लाने के साथ ही उन पर होने वाले अत्याचारों को रोकना है। लेकिन इस बात की समीक्षा नहीं की जाती कि वह उद्देश्य किस हद तक पूरा हुआ ? ये सवाल भी है कि दलितों को जो कानूनी संरक्षण दिया गया उसके दुरूपयोग को रोकने के लिए क्या कदम उठाये जा रहे हैं ? बॉम्बे आई. आई. टी से उठा विवाद एक छात्र की आत्महत्या और अध्यापक की भूमिका तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय स्तर पर समाज को टुकड़ों में बाँटने और आपस में लड़ाने की स्थिति उत्पन्न न कर दे इस बात की चिंता सभी को करना होगी। आरक्षित वर्ग को संरक्षण और सहयोग मिलना ही चाहिए किंतु इसके चलते यदि सामाजिक ढांचा चरमराने लगे तो ये देश के लिए ख़तरनाक होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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