Tuesday, 12 September 2017

सरकारी विद्यालयों में पढ़ें अफसरों और जजों के बच्चे



राजधानी दिल्ली का ही हिस्सा कहे जाने वाले गुरूग्राम (गुडग़ांव) के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में एक 7 वर्षीय बालक की हत्या का मामला केवल एक अपराध नहीं रहा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी गत दिवस ठीक कहा कि ये एक स्कूल का नहीं वरन् पूरे देश का मामला है। जिस बच्चे की हत्या की गई उसके पिता ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया तो केन्द्र और हरियाणा सरकार के साथ ही सीबीएसई को नोटिस भेजकर निजी विद्यालयों में सुरक्षा आदि को लेकर जानकारी मांगी गई है। रेयान इंटरनेशनल एक बड़ा समूह है जिसके अनेक विद्यालय देश भर में चलते हैँ। इसकी संचालक श्रीमती पिंटो काफी प्रभावशाली महिला हैं जो शासन-प्रशासन के उच्च पदस्थ लोगों तक पहुंच रखती हैं। ईसाई पृष्ठभूमि के बावजूद काफी समय से उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया है। यही वजह है कि ग्रुरुग्राम हादसे के बाद विद्यालय के विरुद्ध कार्रवाई में देरी को लेकर हरियाणा की भाजपा सरकार पर भी आरोप लगे। सामान्य दृष्टि से इसे महज एक हत्या का प्रकरण मानकर पुलिस आगे बढ़ती किन्तु बच्चे की लाश शौचालय में मिलने जैसी बात ने विद्यालय के भीतर व्याप्त अव्यवस्थाओं तथा लापरवाहियों का चि_ा खोल दिया। अपने जिगर के टुकड़े के इस तरह से चले जाने के बाद कोई भी मां-बाप मानसिक तौर पर टूट जाते हैं किन्तु इस मामले में बच्चे के पिता ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाकर एक नये मुद्दे को राष्ट्रीय एजेन्डा बना दिया। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी इस दृष्टि से बेहद अर्थपूर्ण है। जिन महंगे विद्यालयों में अपने नौनिहालों का भविष्य संवारने अभिभावक मोटी रकम खर्च करने के बाद प्रबंधन के नखरे आये-दिन उठाते हुए तरह-तरह के दबावों को चाहे-अनचाहे सहते हैं, उनकी बाहरी चमक-दमक के पीछे की बदरंग तस्वीर कैसी है इसकी एक झलक उक्त हादसे से मिली। इसकी खबर को लोग भुला पाते उसके पहले ही एक मासूम बच्चे के साथ कुकर्म और फिर हत्या का मामला उजागर हो गया। इसके बाद देश भर में निजी क्षेत्र के उन विद्यालयों की पोल-पट्टी खुलने लगी जिन्होंने शिक्षा जैसे पवित्र पेशे को विशुद्ध दुकानदारी में बदलकर रख दिया है। रेयान समूह अकेला ऐसा कर रहा हो ये कहना सही नहीं होगा। पूरे देश में तमाम ऐसे संस्थान है जिन्होंने शिक्षा के साथ ही अनुशासन और बेहतर प्रबंधन के जरिये पहले तो प्रतिष्ठा अर्जित की और जब उनकी मांग बढ़ी तब व्यावसायिकता ने उनकी मानसिकता को दूसरी तरफ घुमा दिया। परिणाम स्वरूप ऐसे विद्यालयों की संख्या एक से दो और फिर देखते-देखते बढ़ती चली गई।  बीते कुछ वर्षों में सुप्रसिद्ध विद्यालयों की फ्रेंचाइजी बांटने का धंधा चल पड़ा जिसके बाद विशुद्ध कारपोरेट शैली में पूरे देश में बतौर ब्राण्ड उनका विस्तार हुआ तथा शिक्षा पूरी तरह बाजार में बेची जाने वाली चीज बनकर रह गई। मध्यमवर्ग के जीवन स्तर में आये सुधार एवं शिक्षा के बढ़ते महत्व ने निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों की मानों लॉटरी खोल दी। इसकी वजह रही सरकारी शिक्षा के ढांचे का बुरी तरह चरमरा जाना। विशेष रूप से माध्यमिक स्तर तक के सरकारी विद्यालयों की स्थिति दुर्दशा का पर्याय हो गई। इस बारे में सभी को सब कुछ पता है। जिन नेताओं और अधिकारियों पर सरकारी शिक्षण संस्थानों को सुधारने एवं संवारने का दायित्व है उनके बच्चे चूंकि निजी क्षेत्र के महंगे विद्यालयों में पढ़ते हैं इस वजह से उनकी चिंता में सरकारी क्षेत्र के संस्थान होते ही नहीं। समाज के अन्य प्रभावशाली लोगों की औलादें भी सरकारी शिक्षण संस्थानों से दूर रहती हैं इस कारण इनकी स्थिति दयनीय से दयनीय बनती चली गई। ये कहना गलत नहीं होगा कि ऐसा करने के पीछे निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों को लाभ पहुंचाने का उद्देश्य भी रहा जिनका संचालन बड़े-धन्ना सेठों या राजनेताओं के हाथों में है। रेयान इंटरनेशनल जैसे विद्यालयीन शिक्षा के अन्य बड़े ब्राण्डों को नोट छापने की मशीन के रूप में बदलने का काम एक दिन में नहीं हुआ। लेकिन सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों के गिरते स्तर एवं उनमें आधारभूत ढांचे की कमी के कारण प्रतिस्पर्धा नाम की चीज ही खत्म हो गई तथा निजी क्षेत्र को खाली मैदान मिल गया। शुरु-शुरू में निजी क्षेत्र के विद्यालयों में शिक्षा के साथ ही अन्यचीजों का स्तर भी गुणवत्ता के अनुरूप रहा किन्तु ज्यों-ज्यों उनमें भीड़ बढ़ी वे पूरी तरह से पैसा बंटोरने वाली मशीन बनते चले गये। ये स्थिति उन कान्वेंट विद्यालयों तक की होने लगी जिनका संचालन ईसाई मिशनरियां करती हैं। कुल मिलाकर जैसा सर्वोच्च न्यायालय ने कहा गुरूग्राम और उसी के फौरन बाद घटित हादसे केवल एक या कुछ विद्यालयों का नहीं बल्कि पूरे देश का मामला है। सीबीआई जांच हेतु हरियाणा की खट्टर सरकार भी तैयार हो गई है। रेयान के प्रबंधन पर मामला भी दर्ज हो जाएगा। ज्यादा दबाव बना तो बड़ी बात नहीं उसकी मान्यता पर भी तलवार लटका दी जाए किन्तु ये समस्या का इलाज नहीं है। तमाम बदनामियों के बावजूद दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने सरकारी विद्यालयों पर काफी ध्यान दिया जिससे वे प्रतिस्पर्धा में खड़े होने की स्थिति में आ गए। उनमें पढ़ रहे विद्यार्थियों ने परीक्षा में अच्छे अंक लाकर बड़े-बड़े नामों वाले विद्यालयों के कान काट लिये किन्तु ऐसा देश के अन्य हिस्सों में करने की सोच नहीं है। राजनीतिक दलों की चिंता का केन्द्र केवल वोट हासिल करना है। इसके लिये वे बच्चों को मुफ्त बस्ता, किताबें, गणवेश और सायकिलें बांटने की सौजन्यता तो दिखाते हैं किन्तु विद्यालयों की बाकी जरूरतों को नजरंदाज किये जाने की वजह से मोटी तन्ख्वाह पाने वाले शिक्षकों में भी दायित्व बोध का अभाव बढ़ता गया। गुरूग्राम के हादसे ने महंगे ब्राण्ड बन चुके विद्यालयों में व्याप्त अव्यवस्थाओं को उजागर कर दिया है किन्तु जैसा हमारे देश का चलन है उसके अनुसार सारी सहानुभूतियां और संवेदनाएं तभी तक जीवित रहती हैं जब तक दूसरा बड़ा हादसा न हो जाए। रेयान समूह के कर्ता-धर्ता ऊंची पहुंच वाले हैं। इसलिये उनके ऊपर गाज गिरना आसान नहीं होगा। ज्यादा सख्ती हुई तो पूरे देश भर के निजी  शिक्षण संस्थान गिरोहबंदी कर समूची व्यवस्था पर दबाव बना लेंगे।  अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने किसी मामले में सरकारी अफसरों के बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाये जाने का फरमान सुनाया था। उस पर कितना अमल हुआ ये कोई नहीं जानता लेकिन कड़वा सच ये है कि माननीय न्यायाधीशों में भी शायद इक्का-दुक्का कोई होंगे जिनके बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ते हों। समय आ गया है जब विद्यालयीन शिक्षा को टुकड़ों में देखने की बजय उस पर समग्र रूप से विचार किया जाए क्योंकि देश का भविष्य जिस बात पर निर्भर है सरकारी की नजर में वही सबसे उपेक्षित है। पूरा देश इस बात पर न्यायपालिका की जय-जयकार करेगा यदि सर्वोच्च न्यायालय सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों के साथ माननीय न्यायाधीशों को भी अपने बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने संबंधी निर्देश जारी करे। वरना तो जो चल रहा है वही चलता रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 11 September 2017

अखाड़ा परिषद : आगे भी सतर्कता जरूरी

अभा. अखाड़ा परिषद ने फर्जी बाबाओं की जो सूची जारी की है उससे शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ हो। इसमें तमाम ऐसे नाम हैं जो किसी न किसी कारण से विवादग्रस्त एवं बदनाम हो गये। कुछ तो जेल में हैं। इनमें सभी भ्रष्ट एवं चरित्रहीन हों ये जरूरी नहीं है परन्तु धर्म के नाम पर पाखंड फैलाना उनका सबसे बड़ा अपराध है। अखाड़ा परिषद साधु-सन्तों की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है परन्तु अब उसका पहले जैसा प्रभाव नहीं रहा, क्योंकि उसी के द्वारा तमाम ऐसे लोगों को महिमामंडित कर दिया गया जो किसी भी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। धर्म के नाम पर जिस तरह का ढोंग तथा व्यापार चल पड़ा है उसके कारण धर्मगुरुओं के प्रति असम्मान तथा घृणा बढ़ी है। परिषद ने फर्जी बाबाओं के नाम घोषित कर बड़ा अच्छा काम किया परन्तु अगले कदम के रूप में उसे शेष बाबाओं पर भी धर्मानुकूल आचरण हेतु दबाव बनाना चाहिए। जिन फर्जी बाबाओं के नाम गत दिवस अखाड़ा परिषद ने घोषित किये वे रातों-रात प्रसिद्ध और समृद्ध तो हो नहीं गये थे। यदि वास्तविक रूप में सन्यास एवं धर्म का पालन करने वाले साधु-सन्त समय रहते इन पाखंडियों पर नजर रखते हुए लोगों को सावधान कर देते तब शायद ये नौबत नहीं आती। खैर, देर से ही सही अखाड़ा परिषद को ये ध्यान आया कि उसका काम पाखंडियों के चेहरे बेनकाब करना भी है। उसका ताजा निर्णय नकली बाबाओं की पैदायश पूरी तरह तो नहीं रोक सकता परन्तु समय-समय पर यदि अखाड़ा परिषद इसी तरह की समीक्षा करती रहे तो हालात को बेकाबू होने से जरूर बचाया जा सकेगा।

-रवींद्र वाजपेयी

शरीयत को छेड़े बिना भी सुधार संभव

शरीयत चूंकि मुल्ला-मौलवियों की बनाई आचार-संहिता नहीं है अत: उसमें बदलाव न करने के लिये मुस्लिम समाज यदि राजी नहीं तो वह स्वाभाविक ही है। तकरीबन हर धर्म के अधिकतर लोग अपने मौलिक सिद्धान्तों एवं रस्मों-रिवाज में परिवर्तन करने के प्रति आसानी से राजी नहीं होते। यद्यपि पीढ़ी बदलने, परिवारों के सिकुडऩे, शिक्षा के प्रसार तथा मूल स्थान छोड़कर देश-विदेश में दूसरे स्थान पर जा बसने पर व्यक्ति अपने धर्म का तो पालन करता रहता है किन्तु उससे संबंधित तमाम आचरणों में शिथिलता और समझौते की स्थिति बन जाती है। इस दृष्टि से मुस्लिम समुदाय थोड़ा ज्यादा कट्टर है जो धर्म से जुड़े मामलों में सुधार या संशोधन की बात करने से दूर भागता है। मुल्ला-मौलवियों द्वारा संचालित व्यवस्था में धर्म के पालन को लेकर बरती जाने वाली सख्ती का ही परिणाम है कि अन्य धर्मों की अपेक्षा इस्लाम के अनुयायी अपेक्षाकृत ज्यादा बंधे नजर आते हैं। यद्यपि शिक्षा के प्रसार तथा संचार क्रान्ति ने इस समाज में भी परिवर्तन की सुगबुगाहट पैदा कर दी है परन्तु उसकी गति बेहद धीमी है। गत दिवस मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की जो बैठक भोपाल में संपन्न हुई उसमें मुख्य विचारणीय विषय था तीन तलाक पर हाल ही में आया सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय। बैठक यद्यपि किसी खास नतीजे पर नहीं पहुंच सकी किन्तु दबी जुबान अदालत का सम्मान किये जाने तथा ऊंची आवाज में शरीयत में किसी भी प्रकार की दखलंदाजी स्वीकार न करने की बात कहते हुए उक्त विवाद में केन्द्र सरकार की भूमिका की आलोचना अवश्य की गई। तीन तलाक संबंधी न्यायालयीन फैसले को लेकर बोर्ड के सदस्य अभी भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके। 10 सदस्यों की एक समिति बना दी गई जो फैसले की व्याख्या करेगी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को न मानने की घोषणा करने का दुस्साहस भी बोर्ड नहीं कर सका तथा ये तय हुआ कि मुस्लिम समाज के लिये एक आदर्श निकाहनामा तैयार किया जावेगा जिसमें तीन तलाक के गलत होने की बात भी उल्लिखित होगी। इस आधार पर ये मान लेना गलत नहीं होगा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का पालन करने की मानसिकता मजबूरी में ही सही परंतु बोर्ड ने बना ली है। तीन तलाक का मामला सुनते समय सर्वोच्च न्यायालय ने हलाला एवं अन्य संबंधित प्रथाओं पर बाद में विचार करने की बात कही थी। ऐसा लगता है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की चिंता इस बात को लेकर है कि तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक बताकर सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम समाज के प्रचलित रीति-रिवाजों में जो हस्तक्षेप किया, वह और आगे न बढ़ जाए। भाजपा की तीन बड़ी मांगों में एक समाज नागरिक संहिता भी रही है। यद्यपि फिलहाल वह इस पर ज्यादा हल्ला नहीं मचा रही परन्तु बीच-बीच में सर्वोच्च न्यायालय भी इस बारे में टिप्पणी करता रहा है। सोशल मीडिया में भी इसे लेकर काफी बहस चला करती है। वैसे अब मुस्लिम समुदाय के भीतर भी धार्मिक कट्टरता से आजाद होने की इच्छा का बीज अंकुरित होकर पौधे की शक्ल ले चुका है। खास तौर पर महिलाएं अपनी वर्तमान सामाजिक स्थिति में संतुष्ट नहीं हैं किन्तु पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था एवं लचीलेपन के प्रति धर्म गुुरूओं की असहमति के कारण मुस्लिम समाज में सुधार की प्रक्रिया कछुआ चाल से भी धीमी चल रही है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मेें धर्मगुरूओं के अलावा इस्लाम के अच्छे व्याख्याकार एवं ओवैसी जैसे विदेश से पढ़कर आये बैरिस्टर भी हैं परन्तु शरीयत पर विचार को लेकर जिस तरह से हाथ खड़े कर दिये जाते हैं उससे लगता है कि मुस्लिम समाज के पढ़े-लिखे तथा समझदार किस्म के लोग भी घर की खिड़कियां और रोशनदान खोलने के प्रति अनिच्छुक हैं। शरीयत की पवित्रता को स्वीकार करना गलत नहीं है किन्तु तीन तलाक सरीखी प्रथा को ढोने की जिद  समझ से परे थी क्योंकि जिस शरीयत को सभी इस्लामी देश मानते है उनमें से भी तमाम ने तीन तलाक को खत्म कर दिया था। पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ न करने की धौंस दिया जाना भी आज के समय में अव्यवहारिक लगने लगा है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को ये ध्यान रखना होगा कि भले ही भारत का मुस्लिम समाज अभी भी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पीछे हो परन्तु मोबाईल और इंटरनेट के दौर में मुस्लिम महिलाएं एवं युवा भी तेजी से बदलती दुनिया को देख-समझ रहे हैं। हमारा कहने का आशय ये नहीं है कि पर्सनल लॉ बोर्ड शरीयत को पूरी तरह अप्रासंगिक अथवा अनावश्यक मान ले परन्तु धर्म रूपी अनुशासन में पूरी तरह जड़ता आने से वह अपनी स्वाभाविकता खो देता है। उस दृष्टि से समय आ गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित मुस्लिम समाज के अन्य प्रतिष्ठित संगठन तथा उनके संचालकगण उन बदलावों पर ठंडे दिमाग से विचार करें जो आज नहीं तो भविष्य में उन्हें करना ही पड़ेंगे। तीन तलाक संबंधी फैसले पर मुस्लिम समाज की महिलाओं ने टीवी पर जिस तरह खुलकर अपने विचार व्यक्त किये वे बोर्ड के सदस्यों सहित देश भर के मुल्ला-मौलवियों ने भी देखे सुने होंगे। बेहतर हो हवा के रूख को समझकर समझदारी से आगे बढ़ा जाए। धार्मिक नियम और प्रथाएं कितनी भी पवित्र क्यों न हों परन्तु उनमें से सभी अजर-अमर हों ये जरूरी तो नहीं। जिस प्रकार समुद्र की विशेषता एवं सौंदर्य निरंतर उठती लहरों में छिपा है ठीक वैसे ही धर्म में भी सदैव चिंतन एवं विचार रूपी लहरें उठती रहना जरूरी हैं।

-रवींद्र वाजपेयी

Thursday, 7 September 2017

बेहतर होता गौरी को पत्रकार ही रहने देते

बेंगलुरू में महिला पत्रकार गौरी लंकेश की परसों रात उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या किये जाने की खबर पूरे देश में तेजी से फैली। गौरी के बारे में इसके पहले शायद कम लोग ही जानते होंगे किन्तु ज्यों ही ये प्रचारित किया गया कि वे हिन्दुत्व विरोधी लेखन करती रहीं त्यों ही ये भी कहा जाने लगा कि उनकी हत्या में हिन्दू संगठनों का हाथ है। अचानक पूरी वामपंथी लॉबी हरकत में आ गई। गौरी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का योद्धा साबित करने की होड़ लग गई। बात फासिज्म तक जा पहुंची। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने हत्या की निंदा करते-करते प्रधानमंत्री, रास्वसंघ और भाजपा सभी को लपेट लिया। देश भर में पत्रकारों पर होने वाले जानलेवा हमलों पर उपेक्षापूर्ण रवैया प्रदर्शित करने वाले दिल्ली के पंच सितारा पत्रकारों को अचानक जोश आ गया और वे गौरी के बहाने संघ, भाजपा तथा प्रधानमंत्री को इस हत्या के लिये जिम्मेदार ठहराने के अभियान में जुट गए। कारण ये बताया जाने लगा कि गौरी हिन्दुत्व और उसकी पैरोकार विचारधारा की जमकर मुखालफत अपने लेखों एवं वाणी से करती थीं। चँूकि गौरी लंकेश पेशे से पत्रकार रहीं इसलिये पूरे देश के पत्रकार अपनी वैचारिक पसंद-नापसंद से ऊपर उठकर उनकी हत्या की कड़ी निंदा एवं हत्यारों को पकड़कर दंडित करने की मांग करने लगे। जगह-जगह मोमबत्ती एवं मशाल जुलूस निकले, शासन-प्रशासन को पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु ज्ञापन सौंपे गये। यहं तक तो ठीक था किन्तु ज्यों ही मेरी मुर्गी की डेढ़ टाँग की स्थिति में आ चुके वामपंथी तबके से जुड़े पत्रकारों ने हत्या का ठींकरा हिन्दुत्ववादी संगठनों पर फोडऩे का दाँव चला, गौरी पत्रकार से हटकर एक हिन्दुत्व विरोधी, वामपंथी और उससे भी बढ़कर तो नक्सल समर्थक बन गईं। यदि उनकी हत्या किसी भाजपा शासित राज्य में हुई होती तब वहां के मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगने की होड़ मच जाती किन्तु गौरी जिस राज्य में मारी गई वहाँ कांग्रेस की सत्ता है। इसीलिये न राहुल गांधी ने कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाये और न ही सहिष्णुता के ठेकेदार किसी वामपंथी बुद्धिजीवी अथवा पत्रकार ने। हद तो तब हो गई जब कल शाम दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित शोक सभा में न सिर्फ वामपंथी दलों सहित अन्य भाजपा विरोधी नेता पहुंचे अपितु उनके भाषण भी कराए गये। यदि बात एक पत्रकार की हत्या की निंदा तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण तक सीमित रहती तब किसी को उंगली उठाने का मौका न मिला होता लेकिन शोकसभा को जिस तरह राजनीतिक रूप दे दिया गया उसको लेकर पत्रकार बिरादरी में ही खेमे बँट गए। ट्विटर पर अनेक वरिष्ठ पत्रकारों ने तत्काल लिखा कि गौरी को श्रद्धांजलि देने आये राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी  पर ऐतराज का कारण नहीं था परन्तु पत्रकारों के आयोजन में उन्हें मंच देकर शोकसभा को वोटसभा में बदलना पूरी तरह अनुचित और आपत्तिजनक था। शोकसभा में पत्रकारों और नेताओं के भाषण सुनकर ऐसा लगा मानो ये प्रेस क्लब की बजाय जेएनयू के भीतर कन्हैया कुमार एंड कंपनी द्वारा आयोजित जमावड़ा हो। इसी दौरान किसी ने गौरी लंकेश की कन्हैया तथा खालिद के साथ वाली तस्वीर सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दी। उधर कन्हैया को ये कहते हुए टीवी पर दिखाया गया कि गौरी उनकी माँ समान थीं। बात और बढ़ी तो पता चला दिवंगत पत्रकार के नक्सलियों से संबंध थे तथा वे उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिये सरकार और उनके बीच संपर्क सूत्र भी बनती रहीं। उनके हिंदुत्व विरोधी होने के साथ ये बात भी उछाली गई कि गौरी कर्नाटक सरकार के भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ करने के लिये काम कर रही थीं। जिन मंत्री के यहां गुजरात के कांग्रेसी विधायकों को छिपाया गया था वे भी गौरी के निशाने पर थे। ये सब पता चलने के बाद गौरी के कुछ ताजा ट्वीट भी सामने आये जिनमें वामपंथियों के बीच चल रही अंतर्कलह का जिक्र था। शायद इसीलिये भाजपा विरोधी माने जाने वाले दिल्ली के ही एक वरिष्ठ पत्रकार ने कनार्टक के गृहमंत्री के हवाले से शक की सुई माओवादियों की तरफ भी घुमा दी। कर्नाटक सरकार ने गौरी हत्याकाँड की जांच हेतु एसआईटी गठित कर दी है। जबकि गौरी का भाई सीबीआई जांच चाह रहा है। दो संदिग्ध गिरफ्तार भी कर लिये गये हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई नहीं जानता कि इस नृशंस हत्या के पीछे किसकी भूमिका रही किन्तु अपने निहित स्वार्थों की खातिर हॉशिये पर आ चुके वामपंथी पत्रकारों तथा उनकी पिछलग्गू लॉबी ने जल्दबाजी में पूरा मामला हिंदुत्ववादी विचारधारा के विरुद्ध बनाते हुए फैसला सुना दिया। वो तो सजा देने का अधिकार नहीं था वरना भाई लोग डॉ. मोहन भागवत और नरेन्द्र मोदी को पकड़ कर जेल में डलवा देते। गौरी लंकेश वामपंथी थीं या कुछ और ? उनका मजहब ईसाइयत था या इस्लाम ? ये सब बातें गौण हैं। वे एक पत्रकर थीं जिन्हें अपनी बात लिखने और कहने का हक देश के संविधान ने दिया। किसी विचारधारा अथवा व्यक्ति की आलोचना तथ्यों के आधार पर करना भी उनका मौलिक अधिकार था। यद्यपि ये भी पता चला कि वे एक सांसद के विरुद्ध प्रकाशित लेख या समाचार का प्रमाण नहीं दे सकीं जिस पर मानहानि  प्रकरण में उन्हें छह माह की सजा भी हो चुकी थी। लेकिन ये ऐसी बात नहीं है जिसके आधार पर उनकी हत्या का औचित्य साबित किया जा सके।  सबसे बढ़कर गौरी एक इंसान थीं जिसे जीवन का कानूनी तथा नैसर्गिंग अधिकार प्राप्त था और इस कारण उसकी हत्या चाहे हिंदूवादी द्वारा की गई, चाहे माओवादी या किसी अन्य द्वारा, सही नहीं हो सकती। हर समझदार व्यक्ति या संगठन उसकी केवल निंदा ही करेगा किन्तु उनकी हत्या को अपने निहित स्वार्थों के दोहन के लिये उपयोग करने की कोशिशों ने पूरे घटनाक्रम का रंग और रूप बदल दिया। राजनीति और उससे जुड़ा सत्ता का खेल अपनी जगह है परन्तु पत्रकारिता वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित होने के बाद भी बंधुआ नहीं होनी चाहिये। पत्रकार क्रोधित हो तो स्वाभाविक लगता है किन्तु कुंठित होने पर वह अपनी स्वाभाविकता खो देता है।एक मनुष्य होने के नाते वह पूरी तरह निष्पक्ष हो ये तो संभव नहीं किंतु बिकाऊ हो ये भी उचित नहीं होता। ऐसे में यही बेहतर होता कि गौरी लंकेश की मौत को एक पत्रकार की मौत ही रहने दिया जाता। उन्हें किसी विचारधारा या धर्म का विरोधी बताकर उनके तथाकथित समर्थकों ने भले ही तात्कालिक रूप से अपना उल्लू सीधा कर लिया हो किन्तु एक गंभीर प्रश्न को बेमतलब के विवाद में भी फंसा दिया। संघ, भाजपा और प्रधानमंत्री की आलोचना के अवसर तो और भी मिलते  रहते किन्तु कर्नाटक सरकार की जिम्मेदारी पर सवाल न उठाया जाना भी सवाल खड़े कर गया।

-रवींद्र वाजपेयी

Wednesday, 6 September 2017

भारत रेलगाड़ी का साधारण डिब्बा नहीं है

इन दिनों रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने का मामला गर्माया हुआ है। सोशल मीडिया से लेकर अदालत तक में इस पर बहस जारी है। भारत सरकार ने अपना रूख स्पष्ट करते हुए कहा कि 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को वापिस भेजने की तैयारी सरकार कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बावद पूछताछ की है। दरअसल हाल ही में प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण ने इन अवैध प्रवासियों को शरण देने हेतु याचिका लगाते हुए उन्हें जम्मू-कश्मीर में बसाने की पैरवी की। उसके बाद से ही इस मुद्दे पर बहस चल पड़ी। प्रश्न ये उठा कि जो कश्मीरी धारा 370 का हवाला देकर गैर कश्मीरी के वहां बसने की बात कर मरने-मारने उतारू हो जाते हैं वे इन विदेशियों को वहां जगह देने कैसे तैयार होंगे? फिर प्रश्न उठा कि म्यांमार (बर्मा) से खदेड़े जा रहे बांग्लादेश मूल के इन मुसलमानों को भारत क्यों शरण दें? जैसी खबर आ रही हैं उनके मुताबिक म्यांमार की सेना और सरकार सैकड़ों वर्षों से बसे रोहिंग्या मुसलमानों को घुसपैठिया मानकर निकाल बाहर करने में जुटी है। उसका आरोप है कि बौद्ध धर्म और संस्कृति के अनुयायी म्यांमार में ये मुसलमान एक तरह से वैसी ही समस्या उत्पन्न कर रहे हैं जैसी श्रीलंका में तमिलों के उग्रवादी संगठन लिट्टे ने कर रखी थी। लगता है वहां की सरकार ने भी श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति राजपक्षे से सीख लेकर रोहिंग्या मुसलमानों के सफाये का अभियान छेड़ दिया है। बांग्लादेश की सीमा से सटे म्यांमार के कुछ प्रान्तों में गृह युद्ध की परिस्थिति बन गई है। एक सप्ताह के भीतर ही एक लाख से ज्यादा रोहिंग्या बांग्लादेश आ चुके हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार 10 लाख रोहिंग्या म्यांमार में हैं जिनका दावा है कि उनके पूर्वज 400 वर्ष पूर्व यहां आए थे। बावजूद उसके म्यांमार सरकार ने अब तक उन्हें नागरिकता नहीं दी तथा अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी ही माना है। जाहिर है म्यांमार की अंदरूनी घटनाओं से भारत भी सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है। भारत में स्थायी रूप से बस चुके करोड़ों बांग्लादेशियों की पहिचान कर उन्हें वापिस भेजने की बात यदा-कदा उठती रही है। असम, बंगाल एवं बिहार के कई जिलों में तो ये बहुसंख्यक होने से चुनावी राजनीति को भी प्रभावित करने की स्थिति में हैं। पहले कांग्रेस और वामपंथी इनके संरक्षक बने और अब ममता बैनर्जी की पदलिप्सा के चलते बांग्लादेशी शरणार्थी अधिकृत तौर पर भारत के नागरिक बन गए हैं। अब तो पूरे भारत में ये फैल चुके हैं जिन्हें वापिस भेजना लगभग नामुमकिन है। यही वजह है कि ज्योंही 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने की बात उठीं त्योंही उसका जबर्दस्त विरोध शुरू हो गया। वोट बैंक के नजरिये से हर चीज का विश्लेषण करने वाला तबका वसुधैव, कुटुम्कम का हवाला दे रहा है तो किसी को मानवता की चिंता है। मणिशंकर अय्यर सरीखे अति बौद्धिकता के शिकार नेता का कहना है कि रोहिंग्या मुसलमानों को वापिस भेजने के निर्णय से शरणागत को शरण देने की हजारों वर्ष प्राचीन भारतीय परंपरा का उल्लंघन होगा। एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि तिब्बत से आये लाखों बौद्धों को जब भारत ने स्थायी रूप से शरण दे दी तथा यही रवैया अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान से आये अन्य शरणार्थियों के बारे में अपनाया गया तब रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने में क्यों आनाकानी हो रही है? सवा अरब आबादी वाले देश में 40-50 हजार और आ गये तो क्या फर्क पड़ेगा, ये मानने वाले भी कम नहीं हैं किन्तु हमारे देश में आंतरिक सुरक्षा की मौजूदा स्थिति को देखते हुए रोहिंग्या शरणार्थियों के प्रति बरती गई जरा सी नरमी नासूर बन जायेगी। निश्चित रूप से तब म्यांमार से खदड़े जा रहे शरणार्थी धर्मशाला बन चुके भारत में घुसेंगे। यही स्थिति श्रीलंका में चले गृह-युद्ध के दौरान बनी थी। जहां तक सवाल मानवीय आधार पर सोचने का है तो इसमें भी सबसे पहले राष्ट्रहित देखना जरूरी है। 1971 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान द्वारा जो अत्याचार किया गया उसके परिणामस्वरूप लाखों शरणार्थी भारत आने लगे। शुरू-शुरू में इसे गंभीरता से नहीं लिया गया परन्तु जब पानी गर्दन से ऊपर आने लगा तब भारत को सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी जिसके बाद बांग्लादेश रूपी नये राष्ट्र का जन्म तो हो गया किन्तुू जो शरणार्थी शिविरों में बसाए गए उनमें से शायद ही कोई भारत से वापिस लौटा। इससे भी बढ़कर बात ये रही कि बीते लगभग 45-46 वर्ष में उससे भी ज्यादा लोग अवैध रूप से सीमा पर कर भारत में आ बसे। उनमें से अधिकतर के पास नागरिकता संबंधी सारे दस्तावेज होने से उन्हें लौटने के लिये मजबूर कर पाना असंभव बन गया है। ऐसे में रोहिंग्या मुसलमानों के रूप में आई नई खेप के प्रति सहानुभूति रखना नई बीमारी को न्यौता देना होगा। इस बारे में हाल ही के कुछ वर्षों में प. एशियाई देशों में आईएसआईएस द्वारा उत्पन्न संकट के कारण सीरिया सहित अन्य देशों से पलायन कर यूरोपीय देशों में पहुंचे शरणार्थियों द्वारा उत्पन्न समस्या है। पहले तो ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी के अलावा अन्य देशों ने मानवीयता के आधार पर इन लोगों को पनाह दी किन्तु शीघ्र ही इसके घातक परिणाम मुस्लिम आतंकवाद के सिर उठाने के तौर पर इन पश्चिमी देशों को भुगतने पड़ गये। भारत में जनसंख्या असंतुलन को बिगाडऩे का जो सुनियोजित षडयंत्र चल रहा है उसे वोट बैंक की राजनीति खाद-पानी देकर बड़ा कर रही है। यही वजह है कि लगभग अनजानी सी रोहिंग्या मुसलमानों कौम को शरण देने का मुद्दा इतना गरमा गया। भारत इस समय जिस मजबूत स्थिति में आ गया है उसे देखते हुए उसे म्यांमार और बांग्लादेश दोनों को साफ शब्दों में समझा देना चाहिए कि हमारे यहां अब अवैध प्रवासियों को समायोजित करने की गुंजाईश नहीं है और यदि वे आते हैं तब उनके विरुद्ध भी वैसा ही व्यवहार होगा जैसा सीमा  पार कर रहे दुश्मन के साथ होता है। पूरी दुनिया को ये बताने का वक्त आ गया है कि भारत द्वितीय श्रेणी की साधरण रेल बोगी नहीं है जिसमें चाहे जितने लोग घुसते चले आयें। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प जिस तरह से अवैध प्रवासियों को निकाल बाहर करने के लिये कड़े कदम उठा रहे हैं उनसे भारत को भी सीख लेनी चाहिए।

-रवींद्र वाजपेयी