Tuesday, 17 October 2017

शमशेर : प्रसिद्धि और पैसा दोनों से वंचित

धनतेरस पर विज्ञापनों से अटे पड़े अखबारों के भीतरी पन्ने पर 1956 के मेलबोर्न ओलंपिक में तैराकी प्रतियोगिता में चौथे स्थान पर रहे शमशेर खान के निधन की खबर छपी है। आन्ध्रप्रदेश के विजयबाड़ा में 87 साल की उम्र में बेहद फटेहाली में दम तोड़ बैठे शमशेर के अंतिम दिन बेहद कष्ट में बीते। दवाईयों तक के लिये पैसे को मोहताज इस पूर्व फौजी के आखिरी समय में न तो सरकार मदद हेतु आगे आई और न ही कोई खेल संघ। पिछले ओलंपिक में चौथे स्थान पर रहे भारतीय खिलाडिय़ों पर भी जमकर धन और यश की बरसात हुई। पदक जीतने वाले तो राष्ट्रीय स्तर पर पूजे गये किन्तु भारत के पहले ओलंपिक तैराक रहे शमशेर जिस तरह गुमनामी में चल बसे वह शर्मनाक है। ये देश का दुर्भाग्य है कि उस दौर में ओलंपिक के मैदान पर तिरंगा लेकर चलने वाले खिलाडिय़ों को वह सम्मान नहीं दिया जा सका जिसके वे हकदार रहे। मेजर ध्यानचंद को भारतरत्न से न नवाजा जाना इसका उदाहरण है। इस बारे में खेल संघों की लापरवाही भी जिम्मेदार है जो गुजरे जमाने के नायकों की खोज-खबर नहीं लेते। फिल्म लाईन में भी ऐसी ही संवेदनहीनता देखी जाती है जहां भगवान दादा, भारत भूषण, ऋषिकेश मुखर्जी और ए.के. हंगल सरीखे बड़े नाम आखिरी समय मुफलिसी के शिकार होकर रह गये।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 October 2017

सर्वोच्च न्यायालय का सुधारवादी कदम

हालांकि बाल विवाह को लेकर पहले की अपेक्षा काफी सुधार हो चुका है। बालिका शिक्षा में वृद्धि के कारण भी स्थिति बदली है। लेकिन इसके बाद भी ये नहीं कहा जा सकता कि कानून में वर्णित न्यूनतम आयु सीमा का पालन लड़कियों के विवाह हेतु शत-प्रतिशत किया ही जा रहा है। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस एक फैसले में साफ-साफ कह दिया कि 18 वर्ष से कम उम्र की बालिका के साथ चाहे वह विवाहित पत्नी ही क्यों न हो शारीरिक संबंध बनाना दुष्कर्म की श्रेणी में आवेगा। इसके लिये एक वर्ष के भीतर शिकायत करनी होगी। अभी तक के जिस कानूनी प्रावधान के अनुसार 15 से 18 वर्ष के बीच की पत्नी से शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं माना जाता था उसे सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक निरूपित कर दिया। सबसे बड़ी बात उक्त फैसले में यह है कि ये सभी धर्मावलंबियों पर समान रूप से लागू होगा। उल्लेखनीय है कि हिन्दू विवाह अधिनियम में जहां विवाह हेतु लड़की की उम्र कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिये वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ में ये 15 वर्ष थी। इस आधार पर ही कतिपय उच्च न्यायालय द्वारा 15 से 18 वर्ष के बीच की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाले मुस्लिम पति को दुष्कर्म के आरोप से बरी का दिया गया था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले से पूर्व में हो चुके विवाह अप्रभावित रहेंगे किन्तु 18 वर्ष से कम की लड़की का विवाह किये जाने की शिकायत मिलने पर वह अवैध हो सकता है वहीं पति-पत्नी दोनों यदि 18 वर्ष से कम हुए तब शारीरिक संबंध बनाने को दुष्कर्म मानने संबंधी प्रकरण बाल न्यायालय के कार्यक्षेत्र में आवेगा। अभी तक मुस्लिम समाज ने इस फैसले को पर्सनल लॉ में दखलंदाजी नहीं बताया है। हो सकता है सूक्ष्म अध्ययन करने के उपरांत वहां से प्रतिक्रिया आवे लेकिन इस निर्णय के मूल में बाल विवाह को सख्ती से रोकने की सदिच्छा ही है। देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां अक्षय तृतीया के दिन गुड्डे-गुडिय़ों के खेल की तरह छोटे बच्चे-बच्च्यिों का ब्याह कर दिया जाता है। पुरानी परंपरा में भी 13 से 14 साल की लड़की की शादी करने के बाद भी उसे पति के साथ नहीं भेजा जाता था तथा कुछ वर्ष बाद गौने की रस्म पूरी कर उसकी विदाई होती थी। समय एवं परिस्थितियों के कारण समाज अपने नियम कानून बदलता रहता था। यहां तक कि एक ही धर्म के मानने वालों की सामाजिक परंपराएं पूरी तरह भिन्न होती थीं। इनका सबसे अधिक जुड़ाव और प्रभाव विवाह पर ही दिखाई देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने जाति, धर्म और क्षेत्र की संकुचित सोच से ऊपर उठकर समूचे भारत को एक इकाई मानकर जो फैसला दिया है वह हर दृष्टि से स्वागत योग्य है। विवाह का उद्देश्य महज शारीरिक संबंध बनाकर संतानोत्पत्ति करना नहीं होता। यह सभ्य समाज की पहिचान है जो एक लड़की के सम्मान और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देती है। शारीरिक तौर भले ही एक लड़की 18 वर्ष की आयु से पहले ही काफी कुछ विकसित हो जाती हो परन्तु उसे शिक्षा प्राप्त करने से वंचित कर चूल्हे-चौके में झौंक देना 19वीं सदी की सोच ही हो सकती है। हो सकता है कुछ लोगों को खासतौर पर समाज को रूढिय़ों रूपी बेडिय़ों में बांधकर रखने वाले धर्म के ठेकेदारों को उक्त फैसले से परेशानी होगी किन्तु हर समझदार और सुधारवादी सोच रखने वाला व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय से सहमत होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

तत्काल राहत : समय की मांग

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने गत दिवस अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति पर मंथन किया तथा हालात को सुधारने हेतु कई कदमों पर विचार किया। इसमें कोई दो मत नहीं है कि नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी की वजह से उद्योग-धंधों की चाल काफी धीमी हो गई है। बाजार में नगदी की कमी के कारण लेन-देन प्रभावित हो गया। उत्पादन घटा तो रोजगार भी कम होता गया। केवल सरकारी नौकरीपेशा वर्ग को छोड़ दें तो शेष पूरा समाज एक अदृश्य भय में जी रहा है। सबसे बड़ी बात ये है कि कारोबार के भविष्य को लेकर किसी के पास कोई अनुमान नहीं है। अच्छे दिन के वायदे के बाद सत्ता में आने वाली मोदी सरकार ऊपर से चाहे कितने दावे करे किन्तु उसकी छवि केवल टैक्स वसूलने वाले की बन गई है। राजस्व में वृद्धि के दावे यदि सरकार की सफलता का मापदंड हंै तो कह सकते हैं वित्तमंत्री अरूण जेटली को 100 में से 101 अंक दिये जाने चाहिए परन्तु विकास एवं रक्षा सौदों पर भारी-भरकम खर्च के बाद भी आर्थिक मोर्चे पर केन्द्र सरकार विपक्ष तो दूर अपने प्रतिबद्ध समर्थकों तक को संतुष्ट और आश्वस्त नहीं कर पा रही है। हालांकि इसके बाद भी प्रधानमंत्री के प्रति भरोसा काफी हद तक बना हुआ है। ये भी कहना गलत नहीं होगा कि लगातार विभिन्न राज्यों के चुनाव होने की वजह से सरकार अपने कड़े निर्णयों के औचित्य को लोगों के गले नहीं उतार पा रही। सलाहकार परिषद इस स्थिति को सुधारने में कितनी कारगर होती है ये अंदाज लगाना कठिन है लेकिन इतना जरूर है कि मोदी सरकार को अब ऐसे फैसले करने ही होंगे जिनसे जनता एवं उद्योग-व्यापार को तत्काल राहत मिल सके।

-रवींन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 October 2017

पुलिस के लिये विचारणीय मुद्दा

दो दिनों से सोशल मीडिया पर एक पुलिस इंस्पेक्टर की तस्वीर काफी चर्चित हो रही है जिसमें वह एक मोटर सायकिल चालक के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा है। किसी वीआईपी के सामने तो किसी पुलिस वाले की ऐसी मुद्रा आमतौर पर दिखाई दे जाती है किन्तु जिस दोपहिया वाहन चालक के समक्ष उक्त इंस्पेक्टर विनम्रता की प्रतिमूर्ति बनकर करबद्ध खड़ा रहा वह एक साधारण व्यक्ति है। आन्ध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले की जो तस्वीर देश भर में चर्चित हुई उसमें मोटर सायकिल सवार व्यक्ति दो बच्चों और दो महिलाओं को वाहन पर बिठाये मंदिर दर्शन हेतु जा रहा था। पुलिस इंस्पेक्टर ने उन्हें रोका। वह हेलमेट न लगाने और ओव्हर लोडिंग के जुर्म में चालक का चालान भी काट सकता था। या फिर प्रचलित परंपरानुसार घूस रूपी सौजन्य भेंट लेकर उसे जाने दे सकता था किन्तु उसने चालक को समझाया, बच्चों को पेट्रोल की टंकी पर बिठाने जैसे खतरे के बारे में आगाह करते हुए संभावित दुर्घटना की आशंका जताकर ऑटो रिक्शा में अतिरिक्त सवारियों को उनके गंतव्य की तरफ रवाना कर दिया। बात इतनी बड़ी नहीं लगती जिस पर देश-विदेश में घट रही तमाम बड़ी-बड़ी घटनाओं और खबरों की उपेक्षा कर संपादकीय लिखा जावे परन्तु कई मर्तबा छोटी-छोटी बातें ही बड़े बदलाव का माध्यम बन जाती हैं। आन्ध्र प्रदेश पुलिस के उक्त इंस्पेक्टर ने जो किया उससे पूरे देश में पुलिस की छवि सुधर जावेगी ये आशावाद पाल लेना पूरी तरह जल्दबाजी होगी किन्तु नकारात्मकता के इस दौर में ऐसे दृष्टांतों का अधिकतम प्रचार कर समाज में सकारात्मक प्रवृत्ति का सम्मान और प्रसार तो किया ही जा सकता है। पुलिस-जनता संबंध पर समय-समय पर विचार गोष्ठियां होती रहती हैं। सरकारी बजट को खर्च करने के लिये परंपरागत कर्मकांड भी सभी की जानकारी में हैं किन्तु एक पुलिस इंस्पेक्टर द्वारा एक आम नागरिक को बजाय डराने-धमकाने के यदि सौम्यता से समझाने-बुझाने का उदाहरण पेश किया गया तो निश्चित रूप से उसकी प्रशंसा होनी चाहिए। कहने वाले कह सकते हैं कि खाकी वर्दीधारी उक्त इंस्पेक्टर ने सब कुछ प्रायोजित तरीके से किया जिससे उसकी सर्वत्र वाहवाही हो। संदर्भित चित्र भी सोशल मीडिया पर एक आईपीएस अधिकारी द्वारा ही प्रसारित की गया था। बावजूद इसके इस तरह की खबरें उम्मीद की किरण के सामान ही हैं। डा.राहत इंदौरी ने एक शेर में कहा है, कितनी लाशें आ जाती हैं, मेरे घर में अखबारों के साथ। आशय ये है कि चोरी-डकैती, बलात्कार, भ्रष्टाचार से सराबोर समाचार माध्यमों को अब  अपनी बिक्री और टीआरपी की चिंता के साथ-साथ समाज में रचनात्मक एवं सद्भावना से भरे समाचारों पर भी ध्यान देना चाहिये। जरूरी नहीं कि रामलीला में राम का पात्र निभाने वाला निजी जीवन में पूरी तरह मर्यादा पुरुषोत्तम हो किन्तु जिस तरह रामलीला और दशहरे पर रावण दहन साल-दर-साल बुराई पर अच्छाई की विजय का भाव हमारे मन में जगाते हैं उसी तरह वक्त आ गया है जब खबरों के बाजार में कुछ अच्छा परोसने की होड़ भी लगे। उक्त पुलिस इंस्पेक्टर ने जो किया उसके लिये न तो उसे किसी पुरस्कार से नवाजा जावेगा न ही पदोन्नति मिलेगी। व्यवहारिक तौर पर तो उसने कानून तोडऩे वाले शख्स को दंडित करने की बजाय उसके प्रति प्यार-मोहब्बत का इजहार कर अपने दायित्व का समुचित पालन नहीं किया लेकिन उसके आचरण ने देश भर के पुलिस वालों को एक विचारणीय मुद्दा दे दिया है। यदि उसकी देखासीखी कुछ और पुलिस वाले अवैध कमाई करने या डंडे के जोर पर रौब झाडऩे की प्रवृत्ति त्यागकर जनता के साथ मित्रवत् पेश आने लगें तो इससे पुलिस की छवि तो सुधरेगी ही कानून का पालन करने के प्रति दायित्व बोध भी बढ़ेगा।

- रवींद्र वाजपेयी

राहुल:अनजान या अपरिपक्व


राहुल गांधी ने गत दिवस रास्वसंघ में महिलाओं को समुचित स्थान न मिलने की बात उठाते हुए कह दिया कि मुझे तो संघ में शॉर्ट (हाफ पैंट) पहने महिलाएं नहीं नजर आतीं। चूंकि संघ के गणवेश में गत वर्ष तक हाफ पैंट ही था इसलिये राहुल ने उक्त व्यंग्य कर दिया परन्तु भले ही विरोधी उन्हें पप्पू कहकर उनका मजाक उड़ाते हों परन्तु 47 साल के हो चुके राहुल से इतनी तहजीब तो अपेक्षित है  कि वे महिलाओं की वेशभूषा पर बोलते समय मर्यादा का ध्यान रखें। रास्वसंघ में प्रारंभिक तौर पर महिलाएं नहीं थीं किन्तु कालांतर में उसने राष्ट्र सेविका समिति नामक संगठन बनाया जो पूरी तरह से महिला प्रधान है और इसकी सारी गतिविधियां संघ की तरह ही संचालित होती हैं। राहुल ने संघ में महिलाओं की उपेक्षा का प्रश्न उठाकर अपनी अज्ञानता का परिचय दिया वहां तक तो ठीक था किन्तु उनके हाफ पैंट पहिने हुए नहीं दिखने जैसी बात पूरी तरह शालीनता के विरुद्ध थी हो सकता है पाश्चात्य संस्कृति और संस्कारों में पले-बढ़े राहुल बाबा महिलाओं के वस्त्रों को लेकर पारंपरिक सोच को दकियानूसी मानते हों परन्तु राष्ट्रीय स्तर की एक पार्टी के वास्तविक कर्ताधर्ता होने के नाते उन्हें अपने शब्द और विषयवस्तु दोनों का चयन सावधानी पूर्वक करना चाहिये। उन्हें स्मरण होगा कि गुजरात के पिछले विधानसभा चुनावों के अंतिम चरणों में सोनिया गांधी द्वारा मौत के सौदगार जैसी टिप्पणी के कारण कांग्रेस को कितनी क्षति उठपनी पड़ी थी। राहुल गांधी यदि संघ में महिलाओं की भागीदारी से इतने अनजान थे तथा उन्हें ये भी नहीं पता कि पुरूषों और महिलाओं के गणवेश में क्या अंतर है, तब ये उनसे ज्यादा उन प्रशिक्षकों का कसूर है जिनके सिखाए हुए संवाद वे बोलते है। संभवत: वे देश के अकेले ऐसे नेता होंगे जो राजनीति और नेतृत्व का पाठ पढऩे विदेशों में अज्ञातवास पर जाते हैं। पता नहीं संघ के बारे में की गई टिप्पणी को लेकर उन्हें कोई खेद है या नहीं लेकिन इसी तरह का बचकानापन वे आगे भी दिखाते रहे तब उनकी पार्टी को उसका नुकसान उठाने हेतु तैयार रहना चाहिये।
-रवींद्र वाजपेयी

Monday, 9 October 2017

पियूष : मंत्री हैं या शाह परिवार के प्रवक्ता

बिना सबूत आरोप लगाने पर मानहानि का प्रकरण दर्ज कराने का प्रावधान कानून में है। किसी व्यक्ति के बारे में कही गई बात का जवाब या स्पष्टीकरण वह स्वयं दे या उसका अधिकृत प्रतिनिधि ये भी स्वाभाविक होता है। इस लिहाज से अगर पीयूष गोयल बतौर चार्टर्ड अकाउंटेंट अपने पक्षकार के तौर पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पुत्र जय शाह का बचाव करते तो किसी को एतराज करने का अधिकार नहीं था किन्तु पियूष भूल गए कि वे देश के रेल मंत्री हैं और इस हैसियत से उन्हें या तो अपने मंत्रालय अथवा सरकार पर लगे आरोप की सफाई देने के लिये ही आगे आना चाहिए। एक वेबसाइट 'द वायरÓ द्वारा अमित शाह के बेटे जय के कारोबार में एक वर्ष के भीतर 16 हजार गुना वृद्धि का खुलासा करने के बाद राजनीतिक जगत में हलचल मच गई। बिना देर किये कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्षी नेताओं और उनके परिजनों के विरुद्ध ऐसे ही आरोपों का प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर विभाग तथा सीबीआई द्वारा तेजी से संज्ञान लेते हुए जिस तरह ताबड़तोड़ कार्रवाई की जाती है वही फुर्ती अमित शाह के बेटे के आर्थिक साम्राज्य में हुई अप्रत्याशित वृद्धि के मद्देनजर क्यों नहीं दिखाई जा रही? दरअसल कांग्रेस जय शाह के बहाने पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम के बेटे कार्ति के विरुद्ध दर्ज आर्थिक अनियमितताओं के मामलों में जांच एजेंसियों द्वारा की जा रही सख्ती को लेकर प्रधानमंत्री सहित भाजपा को घेरने का दाँव चल रही थी। आम आदमी पार्टी ने भी बहती गंगा में हाथ धोने में देर नहीं लगाई। मामला चूंकि सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष के पुत्र से जुड़ा था अत: देखते-देखते ही वह खबरों की मंडी में ऊँचे भाव पर चला गया। यद्यपि जय शाह की तरफ से बचाव की बजाय प्रत्याक्रमण की बात भी जल्द ही सामने आ गई थी किन्तु रेल मंत्री पियूष गोयल पार्टी अध्यक्ष के बेटे पर लगे व्यक्तिगत आरोपों पर सफाई देने क्यों सामने आये ये बड़ा प्रश्न है। जैसा शुरू में कहा गया यदि श्री गोयल बतौर चार्टड अकाउंटेट जय को पाक-साफ साबित करने के लिये मोर्चा संभालते तब वह पूरी तरह व्यवहारिक माना जाता किन्तु केबिनेट मंत्री किसी ऐसे व्यक्ति पर लगे निजी आरोपों के जवाब में मुंह खोले जिसका सरकार से कोई सीधा या परोक्ष रिश्ता न हो तो दाल में काला होने जैसी शंका का बढऩा स्वाभाविक हो जाता है । हॉलांकि शाम होते-होते जय शाह ने आरोप लगाने वाली वेबसाइट और उससे जुड़े संबंधित लोगों पर 100 करोड़ मानहानि दावा ठोंकने की बात कहते हुए तमाम आरोपों को झूठ का पुलिंदा निरूपित करते हुए अपनी व्यवसायिक गतिविधियों को पूरी तरह पारदर्शी एवं कानून सम्मत बताया। जिस तत्परता से जय ने वेबसाइट के खिलाफ कार्रवाई का ऐलान किया उससे ऐसा तो लगा कि वे अपने ऊपर लगे आरोपों से विचलित नहीं हुए हैं। उल्लेखनीय है गुजरात विधानसभा चुनाव के सिर पर होने की वजह से विपक्षी पार्टियां नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को व्यक्तिगत तौर पर घेरने का कोई अवसर नहीं गंवाना चाहेंगी। यूं भी समाचार माध्यमों का एक बड़ा तबका भाजपा और श्री मोदी के विरुद्ध हाथ धोकर पड़ा हुआ है जिसके पीछे व्यवसायिक और निजी के अलावा वैचारिक कारण भी हैं। अमित शाह की संपत्ति में भी अचानक हुई वृद्धि को लेकर बीते दिनों हल्ला मचा था परन्तु जय शाह के विरुद्ध वेबसाइट ने जो खुलासा किया उसका समय काफी महत्वपूर्ण है। उनका मानहानि का दावा अदालत में जायेगा जिसके निराकरण में लंबा समय लगना स्वाभाविक है परन्तु बेहतर यही होता कि जय स्वयं होकर पूरे आक्रमण का प्रत्युत्तर देने का साहस दिखाते। हॉलांकि 100 करोड़ का अवमानना मुकदमा ठोंकने की घोषणा के जरिये उन्होंने ये साबित करने का प्रयास जरूर किया कि वे इस आकस्मिक मुसीबत में तनिक भी घबराए नहीं हैं किन्तु पियूष गोयल को ढाल बनाकर खड़ा करना न सिर्फ अनावश्यक अपितु अनुचित भी था। पता नहीं श्री गोयल को ऐसा करने कहा गया था या फिर उन्होंने अमित शाह को खुश करने की गरज से स्वयं होकर ये पहल की परन्तु इससे जय शाह पर लगे व्यक्तिगत आरोपों से भाजपा ने अपने को चाहे-अनचाहे जोड़ लिया। यद्यपि श्री गोयल ने जिस प्रकार से वेबसाइट द्वारा किये गये खुलासे को लेकर सिलसिलेवार स्पष्टीकरण दिया उससे जय का पक्ष मजबूत हुआ है किन्तु भाजपा को इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिये कि क्या अन्य नेताओं और उनके परिजनों पर लगे निजी आरोपों की सफाई भी कोई मंत्री स्तर का व्यक्ति देगा या ये सुविधा केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष के साहेब जादे के लिये ही है?

-रवींद्र वाजपेयी

Monday, 2 October 2017

जेटली: शुभस्य शीघ्रम

तीन माह पूरे होने के उपरांत इसे प्रसव पीड़ा कहना तो गलत होगा। बहरहाल नवजात बच्चे के दाँत निकलने की शुरुवात होते ही जो तकलीफें सामने आती हैं उनसे जरूर जीएसटी की तुलना की जा सकती है। एक जुलाई से अस्तित्व में आई ये कर व्यवस्था जो उम्मीदें लेकर आई थी वे कब और कितनी पूरी होंगी ये तो भविष्य ही बता पायेगा परन्तु काफी मन्नतों के बाद जन्मा ये बच्चा फिलहाल तो माँ ही नहीं पूरे घर या यूं कहें कि मोहल्ले को भी परेशान कर रहा है। यही वजह है कि बच्चे के जन्म के समय होने वाली खुशी चिंता और परेशानी में बदल गई है। व्यवसाय और उद्योग जगत जिस तरह दिक्कत में आया उसकी वजह से कारोबार और उत्पादन में कमी आई। जिसका परिणाम रोजगार घटने के तौर पर सामने आया और इन सबका मिला-जुला नतीजा आया विकास दर गिरने के रूप में। इस बारे में पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। बहस के हर छोटे-बड़े मंच पर जीएसटी को लेकर संवाद और विवाद का दौर चल रहा है। सरकार इसे अलादीन का चिराग तो दूसरी तरफ विरोधी इसे बरबादी का सामान साबित करने पर तुले हुए हैं। पहले दो माह का कर संग्रहण यद्यपि आशाएं जगाने वाला रहा परन्तु उसका एक बड़ा हिस्सा वापसी योग्य है, ये जानते ही सारी खुशी काफूर हो गई। जो सबसे बड़ी परेशानी बताई जा रही है वह है जीएसटी में कर की चार दरें तथा विवरणी भरने में आ रही व्यवहारिक परेशानियों की। ये कहा जा रहा है कि छोटे और मध्यम श्रेणी के कारोबारी के लिये जीएसटी संबंधी कागजी खानापूरी एक बड़ा सिर दर्द बन गया है। अपने हाथ से खाता-बही लिख लेने वाला व्यापारी वर्ग अकाउटेंट तथा चार्टर्ड अकाउटेंट की सेवाएं लेने मजबूर हो चुका है जो समय और पैसा दोनों दृष्टियों से खर्चीला है। ऐसा नहीं है कि सरकार को ये सब पता नहीं है लेकिन उसमें बैठे लोग एक साथ सारी परेशानियां दूर नहीं करना चाहते क्योंकि ऐसा करने पर वे जीएसटी की सार्थकता साबित करने का अधिकार खो बैठेंगे परन्तु उन्हें ये भी समझ में आ गया है कि यदि लोगों की परेशानियां दूर नहीं की गईं तब विरोध की आवाज और बुलंद होती चली जावेगी। यही वजह है कि जीएसटी लागू होने के बाद से सरकार की तरफ से अनेक सहूलियतों और रियायतों की घोषणा आये दिन होती रहती हंै। राजनीतिक दबाव और व्यापार उद्योग जगत की तरफ से आ रहे सुझाव के मद्देनजर  जीएसटी से जुड़ी विसंगतियों को दूर करने की कोशिशें चल रही हैं। विवरणियां भरने की तिथि भी लगातार बढ़ाई जाती रही क्योंकि सरकार प्रदत्त ऑन लाईन सुविधा का दम कभी भी फूल जाया करता है लेकिन गत दिवस वित्त मंत्री अरूण जेटली द्वारा एक समारोह में जीएसटी की दरों में कमी का जो संकेत दिया वह काफी महत्वपूर्ण है। इसी के साथ अभी जो चार पायदानें हैं इन्हें भी घटाने का इरादा व्यक्त किया गया है। वित्त मंत्री ने साफ कहा कि यदि कर संग्रहण आशानुरूप रहा तथा राजस्व की स्थिति संतुलित बनी रही तब जीएसटी की चार श्रेणियों के अलावा कर की दरें घटाने जैसे बड़े सुधार की गुंजाईश रहेगी। वैसे ये आश्वासन श्री जेटली शुरुवात में ही दे चुके थे। जीएसटी की चार दरों के कारण भी व्यापारी को हिसाब रखने में काफी परेशानी आ रही है। दूसरी तरफ एक देश एक कर नामक नारा भी अर्थहीन होकर रह गया है। ये बात सही है कि भारत सरीखे देश में 12 प्रतिशत टैक्स भी कम नहीं होता। ऐसे में यदि 14 या 18 की एक दर सभी चीजों के लिये तय कर दी जावे तो भी निम्न आय वर्ग को ये नागवार गुजरेगा। बावजूद इसके जन अपेक्षा यही ै कि एक तो जीएसटी की चार श्रेणियां कम की जाएं। एक ही दर रखना तो संभव नहीं होगा किंतु 28 प्रतिशत की दर भी काफी ज्यादा प्रतीत होती है। वित्तमंत्री ने राजस्व की स्थिति को देखते हुए निकट भविष्य में टैक्स की श्रेणियां और दरें दोनों घटाने का जो दिलासा दिया उसे जितनी जल्द हो सके अमल में लाना चाहिये। यद्यपि श्री जेटली अकेले कुछ नहीं कर पायेंगे क्योंकि अंतिम निर्णय तो सभी राज्यों के वित्त मंत्रियों को लेकर बनी जीएसटी काउंसिल ही करेगी किन्तु जब 18 राज्यों में भाजपा या उसके गठबंधन की सरकारें हैं तब केन्द्र सरकार जो चाहेगी वह करवाना कठिन नहीं होगा परन्तु इस मामले में वित्तमंत्री को सैद्धांतिक और व्यवहारिक दोनों पहलुओं के बीच सामंजस्य और संतुलन बनाना होगा। व्यापार जगत को जीएसटी की दरों से कुछ खास परेशानी नहीं होती यदि हिसाब-किताब तथा विवरणियां भरने की व्यवस्था इतनी जटिल नहीं रहती। रही बात जनता की तो उसकी बस एक ही अपेक्षा है कि जीएसटी लागू होने के बाद चीजें एवं सेवाएं सस्ती हो जाएं। अरूण जेटली ने गत दिवस मन को प्रिय लगने वाले जो वचन कहे उन्हें वे कितनी जल्दी अमल में लाते हैं इसकी प्रतीक्षा रहेगी।

-रवींन्द्र वाजपेयी