Monday, 23 October 2017

जातिवाद से परहेज जातिवादियों से नहीं

रणभूमि सजने के पहले योद्धाओं को अपनी पसंद के पक्ष में खड़े होने की स्वतंत्रता रही है। बाद में पाला बदलने को अनैतिक माना जाता था। युद्ध के नियमों में आदर्श और सिद्धान्तों का भी काफी महत्व होता था। भारतीय राजनीति भी किसी युद्ध से कम नहीं है किन्तु इसमें केवल पाला बदलने वाली परंपरा को ही स्वीकार किया गया वह भी पूरी बेशर्मी के साथ। गुजरात चुनाव की रणभेरी बजने के साथ ही योद्धाओं की उछल-कूद शुरु हो गई है। हॉलांकि राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनाव के साथ ही इसकी शुरुवात हो चुकी थी। नेता प्रतिपक्ष शंकर सिंह वाघेला सहित तकरीबन दो दर्जन विधायकों ने कांग्रेस से बगावत कर दी थी। और भी तमाम छोटे-बड़े नेता इधर से उधर हुए किन्तु सभी की नजर पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटैल के साथ ही ओबीसी नेता अल्पेेश ठाकोर एवं दलित नेता जिग्नेश मेवानी पर लगी थी, जो काफी समय से भाजपा के विरुद्ध अपने मैदान में जुटे थे। पहले-पहल तो तीनों सियासत से दूर रहकर अपने-अपने जातीय और सामाजिक जनाधार को मजबूत कर उनकी मांगों को मनवाने पर जोर देते रहे परन्तु धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया कि उनके मन में भी सत्ता प्राप्त करने के लड्डू फूटने लगे हैं। ये तीनों  वैसेे तो अलग-अलग जातीय समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं किन्तु भाजपा विरोधी होने से कांग्रेस को इनमें अपनी संभावनाएं नजर आने लगीं। ये बात भी पूरी तरह सच है कि हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश अलग-अलग या मिलकर चुनाव लड़े तब भी बिना भाजपा या कांग्रेस का दामन पकड़े उन्हें सफलता नहीं मिल सकती। चूंकि भाजपा उनकी दुश्मन नं. एक बन गई है इसलिये चाहे-अनचाहे उन्हें भी कांग्रेस का कुर्ता पकडऩे की मजबूरी स्वीकार करनी पड़ी। राहुल गांधी ने बिना संकोच उनके सामने दाना डाल दिया। पार्टी की टिकिट तक ऑफर कर दी। यद्यपि तीनों नेताओं ने इस पहल का सकारात्मक उत्तर दिया किन्तु उनके मन में अपनी दूकान पर कांग्रेस का साइन बोर्ड टांगने को लेेकर हिचक भी बनी रही। अंतत: ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर ने कांग्रेस में शामिल होने का निर्णय कर लिया। उधर हार्दिक द्वारा कांग्रेस के साथ जाने की खबरों की प्रतिक्रिया स्वरूप उनके दो खास सहयोगी वरूण और रेशमा पटैल ने भाजपा का दामन थाम लिया। पाला बदल और तोडफ़ोड़ का ये सिलसिला कहां जाकर रूकेगा कहना कठिन है क्योंकि गुजरात का आगामी विधानसभा चुनाव नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद होने से कांग्रेस के लिये आशा की किरण बन गया है। पाटीदार आंदोलन से भाजपा के इस मजबूत किले की दीवारों में आई दरारों को ओबीसी और दलित वर्ग की गोलबंदी से और चौड़ा होने की आशंका ने राहुल   गांधी के मन में ये विश्वास जगा दिया है कि वे मोदी के अश्वमेधी अश्व को उनके अपने घर में ही रोककर 2019 की जंग में मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर सकेंगे। हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश तीनों युवा हैं। भीड़ एकत्र करने के मामले में भी वे अपनी क्षमता प्रदर्शित कर चुके हैं किन्तु ये सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि क्या गुजरात की जनता प्रदेश की सरकार चुनते समय जातीय समीकरणों को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देगी? और ये भी क्या कि राहुल सरीखा आधुनिक सोच वाला नेता चुनाव जीतने के लिये क्या उन युवा नेताओं पर निर्भर करेगा जिनके समूचे आंदोलन के पीछे केवल और केवल जातिगत सोच ही रही है? उ.प्र. के चुनाव में कांग्रेस को पुनस्र्थापित करने निकले राहुल ने जिस तरह अखिलेश यादव के साथ आत्मसमर्पण की शैली में गठबंधन बनाया उसकी वजह से कांग्रेस वहां अब तक की सबसे दयनीय स्थिति में जा पहुंची। ये भी विचारणीय है कि तीनों युवा नेताओं को समाज के अन्य वर्गो के हितों से कुछ भी सरोकार नहीं है। पाटीदार आंदोलन के समय जिस तरह गुजरात के अर्थतंत्र का नुकसान किया, क्या राहुल और कांग्रेस उसका समर्थन करेंंगे? इसके साथ ही क्या कांग्रेस हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश द्वारा उठाई गई मांगों को यथावत मान लेने का आश्वासन दे सकेगी क्योंकि ऐसा करने पर अन्य जातीय समूहों की नाराजगी उसे झेलनी पड़  सकेती है। यही गलती भाजपा की तरफ से भी हो रही है। हार्दिक पटैल सहित अन्य दो नेताओं को शुरू से भाव न देने की नीति चलते हुए उसने जो दृढ़ता दिखाई थी वह उस समय टूटती दिखी जब वरूण और रेशमा नामक पाटीदार आंदोलन के दो बड़े नेताओं को उसने महज चुनावी लाभ के लिये अपने साथ जोड़ लिया। ये दोनों हार्दिक द्वारा चलाने जा रहे हिंसक आंदोलन में पूरी तरह साथ रहे थे। क्या भाजपा में शरीक होने से उनके वे सभी अपराध शून्य हो गये? मात्र चुनावी सफलता के उ.प्र. और अन्य राज्यों में भी बिना अच्छे-बुरे का भेद किये भाजपा ने अन्य दलों से आये नेताओं को न सिर्फ टिकिट दी बल्कि जीतने पर सरकार में मंत्री पद भी दिया। गुजरात में यद्यपि हर बार भाजपा को कांग्रेस की तरफ से कड़ी चुनौती मिली रही किन्तु श्री मोदी में आखिरी दम तक लडऩे का जो माद्दा रहा उससे उन्हें जीत मिलती रही। शंकर सिंह वाघेला के बाद केशुभाई पटैल और सुरेश मेहता सरीखे दिग्गजों की बगावत को तो भाजपा ने झेल लिया परन्तु गुजरात की सत्ता से नरेन्द्र भाई के हटने के बाद से उत्पन्न रिक्तता को समय पर न भरे जाने के परिणामस्वरूप उसका आत्मबल किसी न किसी रूप में खंडित हुआ तभी उसने पहले श्री वाघेला के जरिये कांग्रेस विधायक तोड़े और अब हार्दिक के दो निकट सहयोगियों को अपने पाले में खींच लिया। आज अल्पेश ठाकोर कांग्रेस में जाने वाले हैं। हार्दिक और  जिग्नेश सारे मुद्दे छोड़कर भाजपा को हराने के लिये कुछ भी करने तैयार है और कांग्रेस भी अपनी राष्ट्रीय छवि  को भुलाकर उन लड़केनुमा नेताओं को बराबरी से बिठाने लालायित हो उठी है जिनकी सोच निहायत ही संकीर्ण और सतही है। केवल चुनाव जीतने के लिये भाजपा और कांग्रेस में क्षेत्रीय ताकतों को गोद में बिठाने की जो प्रतिस्पर्धा चल रही है उससे राष्ट्रीय राजनीति में नये-नये दबाव समूह पैदा होने लगे हंै जिनमें अधिकतर का उद्देश्य भावनाएं भड़काकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना है, जिसमें सत्ता प्रमुख है। बेहतर होता गुजरात चुनाव उन्हीं मुद्दों पर लड़ा जाता जो भाजपा और कांग्रेस लंबे समय से उठाते आये हैं। मुकाबला शुरू होने के पहले भाड़े के सैनिकों की तर्ज पर नई भरती कर युद्ध जीतने की इस प्रथा के उदय के बाद से ही सरकारों पर अनुचित दबाव डालने की बुराई ने जन्म लिया। मुख्यधारा की दोनों पार्टियां छोटे दलों की दादागिरी एवं अवसरवादिता का दंश भुगतने के बाद भी इनके सामने नतमस्तक क्यों हो जाती हैं ये विचारणीय प्रश्न है।

-रवींद्र वाजपेयी

Thursday, 19 October 2017

दीपावली पर विशेष संपादकीय ;राम के बाद राम राज्य की प्रतीक्षा

गत रात्रि अयोध्या में दीपावली की पूर्व संध्या पर दीपमालिका की जो छटा बिखरी उसने सहस्त्रों वर्ष पूर्व भगवान राम के लंका से लौटने की स्मृतियों को सजीव कर दिया। तब प्रभु सीता, लक्ष्मण सहित पुष्पक विमान से लौटे थे किन्तु कल वे हेलीकॉप्टर से उतरे। पूरी उ.प्र. सरकार उनकी अगवानी में खड़ी थी। समूची दुनिया ने उस रंगारंग समारोह का सीधा प्रसारण देखा। उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस प्रयास को एक तरफ जहाँ राम मंदिर निर्माण की तरफ महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है वहीं दूसरी तरफ अयोध्या को विश्वस्तर का पर्यटन केन्द्र बनाने की कल्पना भी इससे साकार हो सकेगी। भाजपा के कतिपय आलोचकों ने भी दबी जुबान ही सही किन्तु ये स्वीकार किया कि मुलायम सिंह यादव के परिवार ने सैफई में जो महोत्सव शुरू करवाया उसकी तुलना में योगी द्वारा अयोध्या में किया गया आयोजन कहीं ज्यादा गरिमापूर्ण और उ.प्र. में पर्यटन की दृष्टि से अधिक उपयोगी रहा किन्तु इस सफल भव्य आयोजन के बाद एक बार फिर ये प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि भले ही योगी सरकार और भाजपा के विचारकों ने अनगिनत वर्ष पूर्व श्रीराम के अयोध्या आगमन पर मनाई गई दीपावली को सजीव कर दिया किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि क्या उस राम राज्य को भी जमीन पर उतारने में सफलता मिलेगी जो देश की सत्ता पर विराजमान विचारधारा के प्रतिनिधियों की प्रतिबद्धता का हिस्सा रहा है। उस दृष्टि से ये जिज्ञासा गलत नहीं  है कि राम भक्तों का सिंहासनारूढ़ होना भी यदि सत्ता से जुड़ी संस्कृति को नहीं बदल सका तो फिर पूजा पर पाखंड का आरोप लगने से रोकना कठिन हो जाएगा। नोटबंदी  और जीएसटीजैसे मुद्दे तात्कालिक हैं। इनका देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव भले पड़ रहा हो किन्तु उससे भी अहम है उस चारित्रिक बदलाव का एहसास जो राम के अनुयायियों से अपेक्षित था। देश जिन हालातों से गुजर रहा है उनमें सबसे बड़ा संकट विश्वास का है। शासक और शासित के बीच का रिश्ता जिस विश्वास रूपी बुनियादी पर खड़ा होता है वह पूरी तरह से कमजोर तो नहीं हुई किन्तु उसमें हल्की-हल्की दरारें दिखाई देने लगी हैं। ये कहना तो गलत होगा कि ये सब हाल-फिलहाल हुआ है परन्तु ये भी सही है कि तमाम दावों के बावजूद वस्तुस्थिति उम्मीदों से काफी कम है। राम राज्य की जो परिभाषा 'दैहिक दैविक, भौतिक तापा, राम राज काहू न व्यापा' के रूप में तुलसीदास ने रामायण में दी वह अपने आप में एक घोषणापत्र थी। कोई भी शासक यदि केवल इसे आधार मानकर सत्ता का संचालन करे तो जनता से किये गये तमाम वायदे बिना ढोल पीटे ही पूरे हो सकते हैं। देश के मौजूदा भाग्यविधाताओं ने रामराज्य का वायदा तो नहीं किया था किन्तु जो कहा वह भी कम नहीं था। उस दृष्टि से कुछ किया नहीं गया ये भले ही न कहें किन्तु जितना किया जाना था उतना नहीं होना ही जनमानस के भीतर उबल रहे आक्रोश और असंतोष की वजह है। भारत सरीखे विविधता ओर विसंगतियों से भरे देश में तीन या पांच साल के भीतर आसमान को जमीन पर उतार लाने के वायदे पूरा करना आसान नहीं है परन्तु ऐसा कुछ तो होना ही चाहिये जो दुख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे का एहसास करा सके। यद्यपि अभी भी उम्मीदों के दिये टिमटिमा रहे हैं किन्तु ये भी सही है कि उनमें भरा गया विश्वास रूपी तेल तेजी से खत्म होने की ओर है। इसके पहले कि असंवेदनशील व्यवस्था के चलते ये दीपक बुझ जाएं, उन लोगों को कुछ करना चाहिए जिन्होंने हर घर में रोशनी का आश्वासन बांटा था। भारत एक महान प्राचीन देश है जो हजारों साल बाद भी उस राम में अखंड आस्था रखता है जो वंशवादी सत्ता के उत्तराधिकारी होने के बाद भी जनवादी थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी अपने कल्पना के भारत में इसीलिये राम राज्य की स्थापना की इच्छा व्यक्त की थी। कल रात अयोध्या में जो हुआ वह अद्वितीय था। सहस्त्रों दीपों के सामूहिक रूप से जलने के कारण समूचा वातावरण एक दिव्य अनुभूति से आलोकित हो उठा। इस अद्भुत दृश्य ने हर भारतवासी को चाहे वह दुनिया के किसी भी हिस्से में क्यों न रह रहा हो उत्साहित और आल्हादित कर दिया किन्तु उस मनोहारी दृश्य को देखने के उपरांत एक बार फिर उम्मीदों ने ऊँचे आसमान में उडऩा शुरू कर दिया है। राजनीति को सत्ता के उपभोग का साधन मानने वाली मानसिकता को दूर कर यदि उसे बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय नहीं बनाया जाता तब त्रेता में तो केवल एक धोबी नामक नागरिक ने उलाहना दिया था किन्तु हालात में सुधार नहीं हुआ तो उलाहने आर्तनाद का रूप ले लेंगे। योगी आदित्यनाथ ने जो कुछ भी अयोध्या में किया उसने करोड़ों देशवासियों के दिलों में राम भक्ति की धारा नये सिरे से प्रवाहित कर दी है किन्तु ये विरक्ति में न बदल जाए इसके लिये राम राज्य का हल्का सा अनुभव तो कराना ही होगा। ये देश और यहां के लोग केवल आस्थावासन ही नहीं भावुक भी होते है। घास के तिनके से लेकर आकाश गंगा में विचरण कर रहे अदृश्य गृहों तक के प्रति श्रद्धा रखना उनका स्वभाव है। इसी का लाभ उठाकर सियासत के सौदागर उन्हें बहलाने-फुसलाने में कामयाब होते रहे हैं परन्तु जमाने के साथ लोगों की सोच भी बदली है जिसके कारण अंधविश्वास की प्रवृत्ति घटने के आसार उत्पन्न हो चले हैं। लोकतंत्र के लिये ये स्थिति शुभ संकेत हैं। दीपावली को अंधकार पर प्रकाश की विजय के पर्व के रूप में मनाया जाता है। आइये इस अवसर पर हम ये संकल्प करें कि इस देश को मुट्ठी भर नेताओं के भरोसे छोड़ लंबी तानकर सोने की बजाय पूरी तरह चैतन्य होकर जनमत को इतना ताकतवर बनाएंगे जिससे राम राज्य की कल्पना को वास्तविकता में बदला जा सके क्योंकि इसके बिना भगवान राम के प्रति आस्था और श्रद्धा अर्थहीन होगी। दीपावली आप सभी के हृदय में सात्विकता, सद्भाव और संस्कारों के दीप प्रज्जवलित करे यही शुभकामनाएं हैं।

रवीन्द्र वाजपेयी

संपादक

Wednesday, 18 October 2017

लोकायुक्त :पंच परमेश्वर कहानी याद आ गई

जिन लोगों ने मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी 'पंच परमेश्वर' पढ़ी होगी उन्हें न्याय की आसंदी पर बैठे या बिठाए गए व्यक्ति की ईमानदारी पर उठे सवाल की अहमियत आसानी से समझ आ जाएगी। अलगू चौधरी और जुम्मन शेख की दोस्ती का अदावत में बदलना तथा उसके बाद के घटनाक्रम के इर्द-गिर्द घूमती मुंशी जी की उस कहानी का सुखान्त यद्यपि न्याय करने वाले के मन में स्वाभाविक रूप से आ जाने वाले आदर्श भाव को प्रतिबिंबित करता है किन्तु प्रेमचंद जी ने जिस युग को देखा और अपनी रचनाओं के माध्यम से आने वाली पीढिय़ों के सामने उसका जीवन्त चित्रण छोड़ गए वह अब मैडम तुसाद के संग्रहालयों में खड़ी मोम की उन  मूर्तियों की तरह है जो दिखती तो हूबूह असली हैं किन्तु न सिर्फ मूक अपितु भावना और चेतना शून्य भी हैं। गत दिवस म.प्र. के लोकायुक्त पद पर अवकाश प्राप्त न्यायाधीश नरेश गुप्ता की नियुक्ति को लेकर औचित्य के प्रश्नों के साथ आलोचना के स्वर जिस तरह गूंजे उससे इस महत्वपूर्ण संस्था और उसके सर्वोच्च पद की विश्वसनीयता पर संदेह के बादल एक बार फिर गहराने लगे हैं। यद्यपि श्री गुप्ता की नियुक्ति म.प्र. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री तथा नेता प्रतिपक्ष की सहमति के उपरांत होने से उसकी वैधानिकता पर उंगली उठाने की गुंजाइश उतनी नहीं है परन्तु जहां तक बात प्रामाणिकता और नैतिकता की है तो न्याय प्रक्रिया से जुड़े किसी भी पद पर आसीन व्यक्ति की छवि निष्पक्ष एवं निर्विवाद होनी जरूरी है। न्यायमूर्ति श्री गुप्ता की योग्यता, अनुभव तथा कार्य-कुशलता पर तो किसी ने संदेह नहीं किया परन्तु उप लोकायुक्त के तौर पर पहले से ही कार्य कर रहे न्यायाधीश यू.सी. माहेश्वरी चूंकि वरिष्ठता में श्री गुप्ता से छह साल आगे थे इसलिये स्वाभाविक यही होता कि उन्हें पदोन्नत कर लोकायुक्त बनाया जाता। अपनी नियुक्ति पर उठ रहे सवालों के उत्तर में श्री गुप्ता ने जहां उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रहते हुए उनके द्वारा निपटाए अपराधिक प्रकरणों की रिकॉर्ड संख्या का हवाला देकर अपनी क्षमता का प्रमाण पेश किया वहीं वरिष्ठ होने के बाद भी उप लोकायुक्त बने रह गए श्री माहेश्वरी ने अपने असंतोष को दार्शनिक अंदाज में प्रस्तुत करते हुए कह दिया कि वे काम करते रहेंगे क्योंकि उनकी नियुक्ति भी तो उप लोकायुक्त पद पर ही हुई थी। समूचे विवाद में वैधानिक तथा व्यवहारिक पक्ष से अधिक नैतिकता तथा पारदर्शिता का मापदंड कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। लोकायुक्त के पद पर विराजमान व्यक्ति के पास बतौर न्यायाधीश सुदीर्ध अनुभव के साथ ही मुख्यमंत्री सहित सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन लोगों की जांच का अधिकार होने से जिम्मेदारी से ज्यादा उसकी छवि महत्वपूर्ण हो जाती है। हॉलांकि पिछले अनुभवों के आधार पर ये कहना गलत नहीं लगता कि लोकायुक्त पद पर बैठे कई मान्यवर पद की गरिमा एवं गंभीरता को बरकरार नहीं रख सके। उन्होंने अपने अधिकारों तथा रूतबे का उपयोग करते हुए किसी बड़े मोहरे को पीटा हो ये तो देखने में नहीं आया लेकिन अपने वेतन, भत्ते, पेंशन तथा अन्य सुविधाओं को लेकर जरूर वे सरकार से दो-दो हाथ करने पर आमादा हो गये। राजनीतिक क्षेत्रों में व्याप्त चर्चाओं को सही मानें तो यदि निष्पक्ष जाँच हो जाए तो लोकायुक्त नामक पूरी व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है। यही वजह है कि एक कनिष्ठ को छह साल वरिष्ठ न्यायाधीश के ऊपर बिठाने के फैसले पर बवाल उठ खड़ा हुआ है। शिवराज सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले कतिपय व्यक्ति और संस्थाएं जहां सर्वोच्च न्यायालय जाने की बात कह रहे है वहीं खुद श्री गुप्ता ने विरोधियों को वैसा करने की चुनौती दे दी है। इस नियुक्ति पर विपक्षी दल कांग्रेस में भी अंतर्विरोध सामने आ गए हैं। प्रदेश के पूर्व महाधिवक्ता एवं राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने कांग्रेस के होते हुए भी नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की सहमति पर आश्चर्य व्यक्त कर दिया तो श्री सिंह के अनुसार मुख्य न्यायाधीश ने एक ही नाम की अनुशंसा की थी इसलिये उनके पास दूसरा विकल्प ही नहीं था। न्यायमूर्ति नरेश गुप्ता की नियुक्ति नियमानुसार है या नहीं इसका फैसला तो संविधान के जानकार और सर्वोच्च न्यायालय ही कर सकेंगे किन्तु इतना जरूर है कि पदभार ग्रहण करने के पहले ही विवादों में घिर जाने के कारण श्री गुप्ता पर अपनी नियुक्ति को सही साबित करने का अतिरिक्त भार आ गया है। अगले साल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। मुख्यमंत्री सहित तमाम मंत्रियों एवं वरिष्ठ अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। पिछले लोकायुक्त की सेवा निवृत्ति के उपरांत लंबे समय तक उनके उत्तराधिकारी का चयन न हो पाने से भी प्रदेश सरकार की नीयत पर संदेह उत्पन्न हो रहा था। खैर, अब नियुक्ति हो ही चुकी है तथा न्यायमूर्ति नरेश गुप्ता की काबलियत भी असंदिग्ध है इसलिये ये उम्मीद की जानी चाहिए कि उन्होंने बतौर न्यायाधीश जिस कार्य कुशलता तथा दक्षता का परिचय दिया वैसी ही लोकायुक्त के रूप में देकर वे 'पंच परमेश्वर' नामक कहानी के अंत को फिर सजीव कर देंगे।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 October 2017

आयुर्वेद संस्थान पूरे देश में खुलें

आजादी के 70 साल में जिन चीजों की सबसे ज्यादा दुर्गति हुई उनमें आयुर्वेद भी है। पूरी तरह जड़ी बूटियों पर आधारित चिकित्सा की ये विशुद्ध भारतीय पद्धति नुकसान रहित तथा स्थायी निदान देने वाली रही है। ब्रिटिश राज में एलोपैथी ने पाँव जमाए तथा धीरे-धीरे अंग्रेजी भाषा की तरह वह भी भारतीय परिदृश्य पर पूरी तरह हावी होती चली गई। आज आलम ये है कि एक तरफ जहाँ एलोपैथी डॉक्टर एवं इस प्रणाली पर आधारित निजी अस्पताल तबियत से रुपया बटोर रहे हैं वहीं आयुर्वेद किसी सरकारी प्राथमिक शाला की तरह उपेक्षित होकर रह गया है। कतिपय निजी दवाई कंपनियां हॉलांकि आयुर्वेदिक औषधियां बनाती हैं किन्तु अच्छे प्रशिक्षित नाड़ी वैद्य न होने से आयुर्वेद के प्रति पहले जैसा भरोसा नहीं रहा। योग गुरू बाबा रामदेव को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने इस प्राचीन चिकित्सा प्रणाली को सम्मान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका का निर्वहन करते हुए उसके प्रति विश्वास पुनस्र्थापित किया। दवाओं के क्षेत्र में भी उन्होंने सफलतापूर्वक हाथ आजमाया तथा सस्ते उत्पाद प्रस्तुत कर प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न की। श्रीश्री रविशंकर ने भी  आयुर्वेद दवाओं का उत्पादन प्रारंभ किया। सरकार यूं तो काफी पहले से आयुर्वेद शिक्षा हेतु महाविद्यालय चला रही है परन्तु बीएएमएस की उपाधि लेकर निकले लोग खुद को वैद्य की बजाय डॉक्टर कहलाना पसंद करते हैं तथा उनमें से इक्का-दुक्का ही आयुर्वेदिक दवाओं से इलाज करते होंगे। यही वजह है वैद्य नामक संस्था धीरे-धीरे विलुप्त होने लगी। आज धनतेरस पर स्वास्थ्य के आराध्य देव भगवान धन्वन्तरि की जयंती भी मनाई जाती है। इस अवसर पर भारत सरकार द्वारा दिल्ली में एम्स की तर्ज पर अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान का लोकार्पण करना एक उत्साहवर्धक कदम है। जानकारों की मानें तो आयुर्वेद के दौड़ में पिछडऩे की एक वजह उसमें नये न शोध होना भी है। हजारों वर्ष पुराने चरक संहिता एवं उस जैसे अन्य ग्रन्थों को ही मानक के तौर पर स्वीकार किया जाता है। यद्यपि ये कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि आयुर्वेद का जो भी उपलब्ध ज्ञान है उसमें हर बीमारी का इलाज है जिसमें कैंसर भी है परन्तु बीमारी की जाँच एवं बचाव के प्रति एलोपैथी की तरह जागरूकता फैलाने में आयुर्वेद से जुड़े लोग कामयाब नहीं हो सके तो इसकी एक वजह सरकार से समुचित प्रोत्साहन का नहीं मिलना भी रहा। अब दिल्ली में अखिल भारतीय स्तर का आयुर्वेद संस्थान खुलने के बाद ये उम्मीद की जानी चाहिए कि इस प्रामाणिक चिकित्सा पद्धति के प्रचार-प्रसार में गति आयेगी वहीं इसके माध्यम से प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के संरक्षण के प्रति भी जिम्मेदारी का भाव उत्पन्न हो सकेगा। दिल्ली में स्थित होने के कारण देश के भाग्यविधाता बने बैठे नेतागण इस संस्थान में इलाज कराने की सौजन्यता प्रदर्शित करें तो इसकी विश्वसनीयता बढ़ेगी। यही नहीं जिस तरह पूरे देश में जगह-जगह एम्स और पीजीआई सदृश संस्थान खोले जा रहे हैं ठीक वैसे ही आयुर्वेद संस्थान भी प्रारंभ किये जाएं। आजं चिकित्सा सेवाओं की जो दयनीय स्थिति है उसे देखते हुए लाखों चिकित्सकों की जरूरत है। सरकारी और निजी मेडीकल कॉलेज मिलकर भी इस जरूरत को पूरा नहीं कर पा रहे। यही स्थिति अस्पतालों की भी है। चूंकि आयुर्वेद पद्धति से इलाज करने वाले अस्पताल हरिद्वार में बाबा रामदेव के पतंजलि संस्थान की तरह उंगली पर गिनने लायक हैं इसलिये इस विधा से लोग चाहकर भी नहीं जुड़ पाते। आयुर्वेद संस्थान नामक ये प्रयोग उस दृष्टि से बेहद उपयोगी साबित हो सकता है क्योंकि यहां मरीजों को भरती करने की समुचित व्यवस्था है। अच्छा होगा यदि आयुर्वेद से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े लोग अच्छे वैद्य तैयार करने पर भी ध्यान दें। इसी के साथ आयुर्वेद के फायदों के प्रति भी जागरूकता लानी जरूरी है। लेकिन उससे भी आवश्यक ये होगा कि इसका इलाज एलोपैथी की तुलना में सस्ता हो। पहले के वैद्य अपनी दवाईयां स्वयं बनाया करते थे जिससे वे अपेक्षाकृत सस्ती होती थीं किन्तु कंपनियों के बने उत्पाद स्वाभाविक रूप से महंगे होते हैं। मौजूदा केन्द्र सरकार भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के प्रति सक्रिय है। आयुर्वेद को लोकप्रिय बनाकर ये उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि वह केवल चिकित्सा पद्धति ही नहीं अपितु आदर्श जीवनशैली हेतु भी प्रेरित करता है। दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान की शुरुवात भगवान धन्वंतरि के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इसकी शाखाएं पूरे देश में खोली जा सकें तो आयुर्वेद को उसका खोया हुआ सम्मानजनक स्थान फिर प्राप्त हो सकेगा ये उम्मीद की जा सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी