Friday, 27 October 2017

वरना किसान भाजपा के भाव उतार देंगे

इसमें दो मत नहीं है कि सरकार द्वारा प्रारंभ विभिन्न योजनाएं एवं कार्यक्रमों के पीछे जनहित की भावना रहती है। लेकिन उनके जमीन पर उतरते ही वे नौकरशाही की लापरवाही और भ्रष्टाचार के शिकंजे में कसकर दम तोड़  बैठती हैं। कृषि के क्षेत्र में लगातार अग्रणी बन रहे म.प्र. में किसानों को उनकी उपज का समुचित मूल्य दिलवाने हेतु हाल ही में शिवराज सिंह चौहान की सरकार द्वारा प्रारंभ भावांतर योजना के साथ भी ऐसा ही कुछ होने जा रहा है। सरकार द्वारा तय किए न्यूनतम खरीदी मूल्य को कम मानते हुए किसान अक्सर उन्हें बढ़ाने के लिये आवाज उठाते रहे हैं। शिवराज सरकार ने इसका तोड़ निकालने हेतु किसान को छूट दे दी कि वह अच्छी कीमत मिलने पर अपनी उपज व्यापारी को सीधे बेचने स्वतंत्र है। इस वर्ष म.प्र. में मानसून कमजोर रहने की वजह से किसानों ने मंूग और उड़द की फसल की तरफ रूख किया और उनकी रिकॉर्ड पैदावार हो गई परन्तु जब वे मंडी में पहुंचे तो उन्हें अपेक्षित से कम कीमत मिलने पर उनका गुस्सा भड़क उठा। प्याज की बंपर पैदावार से उत्पन्न परिस्थितियों में हाथ जला बैठी राज्य सरकार ने किसानों की नाराजगी से बचने के लिये भावांतर योजना के तौर पर एक अच्छा विकल्प दिया था परन्तु या तो उसे लागू करने के पहले समुचित होम वर्क नहीं किया गया या फिर पहले की तरह सारा मामला निकम्मी नौकरशाही एवं कृषि उपज मंडी के अति भ्रष्ट ढांचे पर छोड़कर लंबी चादर तान ली गई। आलम ये है कि व्यापारी अच्छी-भली फसल को घटिया बताकर वाजिब दाम नहीं दे रहे वहीं मंडी प्रशासन भी किसानों की मदद करने की बजाय उन्हें धक्के खाने मजबूर कर रहा है। सही बात ये है कि शिवराज सरकार की अच्छी-अच्छी योजनाएं भी सरकारी तंत्र की नालायकी और बदनीयती के कारण विफलता और बदनामी में डूब रही हैं। भावांतर योजना निश्चित रूप से किसान को उसके श्रम और लागत का उचित मूल्य दिलवाने शुरू की गई थी। ऐसा नहीं है कि ये पूरी तरह फुस्स हो गई हो किन्तु प्रारंभिक दौर में प्रदेश के विभिन्न अंचलों से किसानों के आक्रोशित होने के समाचार मिलने से किसी हिंसक आंदोलन की आशंका उत्पन्न हो चली है। जाहिर है हमारे देश में राजनीति नामक वायरस बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर हर जगह घुस जाता है। इसलिये किसानों से जुड़ी समस्याओं का भी राजनीतिकरण हो जाता है। कृषि प्रधान देश होने की वजह से किसान अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं किन्तु राजनेताओं की समूची सोच घुमा-फिराकर चूंकि वोटों की फसल पर केन्द्रित हो उठती है इसलिये विभिन्न राजनीतिक दलों के लिये किसान अन्नदाता कम मतदाता ज्यादा हो गया है। खेती-किसानी को लेकर सरकारों के समूचे दृष्टिकोण पर वोट बैंक की राजनीति पूरी तरह हावी है। संसद और विधानसभाओं में ग्रामीण पृष्ठभूमि के जनप्रतिनिधियों की भरमार है। उनमें कुछ छोटे, मझोले किसान तो कुछ फार्म हाऊसों के स्वामी भी हंै। अनेक संसद-विधायक ऐसे हैं जिनकी आजीविका खेती से ही चलती है परन्तु इतना सब होते हुए भी यदि किसान की दशा धीरे-धीरे दुर्दशा का रूप तो बैठी तो इसके लिये सरकार की अच्छी नीतियों का सही ढंग से लागू नहीं हो पाना ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। यही वजह है कि कम फसल होने पर भी किसान खून के आंसू रोता है वहीं ज्यादा पैदावार भी उसके चेहरे से खुशी छीन लेती है। भावांतर योजना को शिवराज सरकार ने जिस उद्देश्य से लागू किया वह निश्चित रूप से अच्छा और कृषक हित में था परन्तु उसको अमल में लाने के लिये जिम्मेदार अमला चूंकि संवदेनहीन है इस कारण किसान मंडी प्रशासन और व्यापारी रूपी दो पाटों के बीच फंसकर कराहने की स्थिति में आ गया है बीते कई दिनों से म.प्र. के विभिन्न अंचलों में भावांतर योजना के बावजूद अच्छी कीमत नहीं मिलने से किसानों के भड़कने की खबरें जिस तरह आ रही हैं वे अच्छा संकेत नहीं हैं। यद्यपि कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने सभी जिलाधीशों को आगाह किया है कि वे किसानों को व्यापारियों की मुनाफाखोरी से बचाने मैदान में उतरें परन्तु मंत्री जी के फरमान का कितना असर होगा ये कह पाना मुश्किल है क्योंकि मंत्रालय से जारी आदेशों का निचले स्तर पर गंभीरता से संज्ञान लिया जाने लगे तब ऐसी अप्रिय स्थितियां बने ही क्यों? अमेरिका में म.प्र. की सड़कों का गौरवगान करने वाले शिवराज सिंह चौहान को भावांतर योजना को सही तरीके से लागू करने के लिये कमर कसनी होगी वरना अगले साल जब भाजपा वोटों की मंडी में उतरेगी तब अन्नदाता कहलाने वाले मतदाता भी भाजपा का बाजार भाव जमीन पर उतारने से बाज नहीं आयेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 October 2017

व्यर्थ में जगहंसाई करवा बैठे शिवराज

तमाम विवादों एवं आरोपों के बावजूद भी ये माना जाता है कि म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शालीता एवं सौजन्यता के मामले में काफी बेहतर हैं। निजी और सार्वजनिक दोनों ही तौर पर उनकी बातों में विनम्रता एवं सरलता देखी जाती है। अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करते समय कभी-कभार अतिशयोक्ति का सहारा भले ही वे ले लेते हों परन्तु फिर भी उन्हें बड़बोला नहीं कहा सकता। लेकिन गत दिवस अपनी अमेरिका यात्रा में वॉशिंगटन की सड़कों से म.प्र. की सड़कों को बेहतर बताकर श्री चौहान ने अपनी जैसी किरकिरी करवाई वह अभूतपूर्व है। सोशल मीडिया के साथ ही टीवी चैनलों ने भी मुख्यमंत्री की टिप्पणी का जमकर मजाक बनाया। प्रदेश की टूटी-फूटी और अत्यंत जर्जर सड़कों के चित्र देखते ही देखते पूरी दुनिया में छा गये। जिन लोगों के सामने उन्होंने म.प्र. की सड़कों को वॉशिंगटन से बेहतर बताने की डींग हाँकी उन्होंने भी थोड़ी देर में ही म.प्र. की उन सड़कों का दर्शन कर लिया होगा जो बदहाली के मामले में विश्वस्तरीय कही जा सकती हैं। 2003 के विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह की सरकार के विरुद्ध बिसपा नामक जो मुद्दा उठाया गया था उसका अर्थ बिजली, सड़क, पानी था। इन तीनों को आधार बनाकर भाजपा ने दिग्विजय को अलीबाबा नामक उपाधि देकर कठघरे में खड़ा कर दिया। बीते 14 वर्षों में म.प्र. में बिजली और सड़कों की दशा में काफी सुधार हुआ, ये स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है। पानी की स्थिति में मौसम एवं भौगोलिक परिस्थितियों का योगदान भी रहता है अत: वह अपेक्षाकृत उतनी नहीं सुधरी किन्तु। ग्रामीण इलाकों में बिजली की उपलब्धता इतनी अच्छी पहले कभी नहीं थी। बात तो यहां तक होने लगी है कि म.प्र. विद्युत के मामले में आवश्यकता से ज्यादा (सरप्लस) उत्पादन करने वाला राज्य बन गया है। जहां तक बात सड़कों की है तो हालात पहले से काफी बेहतर हुए हैं। प्रदेश स्तर के कई राजमार्ग पूरी तरह विकसित किये जा चुके हैं वहीं ग्रामीण एवं कस्बाई सड़कों का भी उन्नयन होने से आवागामन सुलभ हो गया है। प्रदेश से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों में कुछ तो बहुत अच्छे बन गये हैं जिनकी वजह से उन पर चलने वालों को भारी-भरकम टोल टैक्स के बाद भी सुखद एहसास होने लगा है किन्तु अभी भी अधिकतर राजमार्ग या तो खस्ता हालत में हैं या फिर निर्माणाधीन होने से मुसीबत का सबब बने हुए हैं। जबलपुर से भोपाल जाने वाले राजमार्ग पर काम शुरू होने का मुहूर्त ही नहीं बन पा रहा। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात है प्रदेश के सभी बड़े शहरों में सड़कों की बुरी हालत। वॉशिंगटन से म.प्र. की सड़कों को बेहतर बताने वाले शिवराज सिंह अपनी नाक के नीचे राजधानी भोपाल एवं अपने गृह नगर विदिशा की सड़कों की ही यदि याद कर लेते तो ऐसा बयान विदेश में न देते जिसने उनकी जगहंसाई करवा दी। मुख्यमंत्री चूंकि लालू ब्राण्ड नेता नहीं माने जाते इसलिये उनके प्रशंसक वर्ग ने भी उक्त बयान को लेकर शर्मिन्दगी का अनुभव किया। शिवराज जी म.प्र. को बीमारू राज्य से बाहर लाने का ढोल पीटते तब शायद बात जम जाती। वे कृषि आधारित उद्योगों के विस्तार की संभावनाएं बढ़ा चढ़ाकर पेश करते वहां तक भी उचित था। गाँवों में बिजली के फीडर सेपरेशन की जानकारी देकर भी अपनी पीठ ठोंक सकते थे किन्तु उन्होंने बात कही भी तो ऐसी  जिसे उनके हनुमान कहे जाने वाले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान उर्फ नंदू भैया को छोड़कर अन्य कोई भाजपाई भी ईमानदारी से स्वीकार शायद ही करे। इससे भी बड़ी बात ये है कि मुख्यमंत्री विदेश यात्रा पर जाते ही क्यों हैं? यदि ये निजी यात्रा हैं तब तो किसी को पूछने का अधिकार नहीं है परन्तु यदि ये सरकारी खर्च पर आयोजित होती हों तब इनसे क्या हासिल होता है ये भी सार्वजनिक किया जाना चाहिये। जहां तक निवेशकों को न्यौता देने की बात है तो पूर्व में हुए निवेशक सम्मेलनों में आये भारतीय उद्योगपतियों ने जो वायदे किए थे उनमें से कितने पूरे हुए ये पूछे जाने पर ही प्रदेश सरकार के पसीने छूट जायेंगे। बेहतर हो विधानसभा चुनाव के एक वर्ष पूर्व सार्वजनिक तौर पर कुछ बोलने से पहले मुख्यमंत्री अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें और ऐसे ही निर्देश अपने मंत्रियों को दें वरना जो दशा दिग्विजय सिंह की हो गई थी ठीक वैसी ही भाजपाइयों की हो जाए तो अचरज नहीं होगा। सूचना क्रांन्ति के इस युग में जंगल में मोर का नाचना भी दुनिया से छिपा नहीं रहता।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 25 October 2017

सही समय पर सही निर्णय


केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने नया जूता भी कुछ दिन काटता है जैसा बयान देकर ये स्वीकार कर लिया कि जीएसटी नामक नई कर प्रणाली से लोगों को अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। राहुल गांधी द्वारा जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहा जाना तो उनकी अपरिपक्वता का परिचायक था क्योंकि उसे पारित करवाने में भी कांग्रेस का खुला समर्थन रहा। बावजूद इसके ये मान लेना हकीकत से रूबरू होना ही है कि पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी ने व्यापार जगत के सामने तमाम ऐसी परेशानियां उत्पन्न कर दीं जिनसे निपटने में उसे अनेकानेक व्यवहारिक परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। भले ही सरकार की नजर में उक्त दोनों कदमों से अर्थव्यवस्था पाक-साफ हुई है तथा व्यापार में काले धन का प्रवाह एवं उपयोग भी काफी हद तक रूका है परन्तु व्यवसाय एवं औद्योगिक उत्पादन में कमी आने से विकास दर में गिरावट एवं बेरोजगारी बढऩे जैसी समस्याएं भी पैदा हो गईं। यद्यपि चौतरफा विरोध के कारण सरकार अभी तक जीएसटी को लेकर काफी उदार बनी हुई है। रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाने तथा विलंब शुल्क की वापसी जैसे कदम इसका उदाहरण हैं किन्तु बाजार एवं रोजगार दोनों के क्षेत्र में मंदी चिंता का बड़ा कारण बनी हुई थी। यद्यपि जुलाई से लेकर सितंबर माह तक जीएसटी के तौर पर जो कर संग्रहण हुआ वह उम्मीद से ज्यादा न सही किन्तु उसके अनुसार रहने से केन्द्र सरकार का हौसला मजबूत हो सका जिसका प्रमाण पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी के रूप में देखने मिला। इसी क्रम में गत दिवस आर्थिक क्षेत्र में दो बड़े कदम केन्द्र सरकार द्वारा उठाये गये जिनसे उसकी चिंता और आत्मविश्वास दोनों का प्रगटीकरण हुआ। लगभग 7 लाख करोड़ की सड़क परियोजनाओं के साथ ही सरकारी बैंकों को 2 लाख 11 हजार करोड़ की पूंजी देने जैसे फैसलों से अर्थव्यवस्था में ठहराव दूर करने का प्रयास निश्चित रूप से समयोचित कदम है। आगामी पांच वर्षों में तकरीबन 84 हजार कि.मी. सड़कें बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य पूरा करने हेतु काफी बड़ी राशि मंजूर करने के कई फायदे हैं। इनमें मौजूदा एवं नये राजमार्ग विकसित करने के साथ-साथ सीमा एवं तटवर्ती इलाकों में उच्चस्तरीय सड़कें बनाने की योजना भी शामिल है। सड़क परिवहन को सुविधाजनक बनाकर आवागमन को सुलभ बनाना विकास की मूलभूत आवश्यकता रही है। परिवहन मंत्री नितिन गड़करी इस काम को बेहद कुशलता के साथ अंजाम दे रहे हैं। वाजपेयी सरकार द्वारा देश भर में सड़कों का जाल बिछा देने का जो काम शुरू किया गया था उसमें मोदी सरकार के आने के बाद फिर तेजी आई है। 22 किमी से बढ़ाकर 46 किमी प्रतिदिन सड़कें बनाने का निर्णय निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था में सक्रियता लाने की दिशा में बड़ा कदम होगा क्योंकि इससे निर्माण सामग्री की मांग बढऩे के साथ ही लाखों लोगों को काम भी उपलब्ध हो सकेगा। देश के प्रत्येक हिस्से तक सभी मौसमों में सुलभ एवं सुरक्षित आवागमन की सुविधा विकास के पहियों की गति को तेज करेगी ये मानने में कुछ भी गलत नहीं है। इन्फ्रास्ट्रक्चर नामक जो तत्व विगत कुछ दशकों में अर्थव्यवस्था का प्रमुख हिस्सा बना उसे यदि सर्वोच्च प्राथमिकता दी जावे तो मंदी एवं बेरोजगारी की मौजूदा स्थिति से उबरा जा सकता है। केन्द्र सरकार ने इसी के साथ राष्ट्रीयकृत बैंकों को 2 लाख करोड़ से ज्यादा की पूंजी देने के फैसले के जरिये बाजार में छाई सुस्ती दूर करने का जो प्रयास किया वह देखने में छोटा जरूर दिखता हो परन्तु एनपीए के बोझ से कराह रहे बैंकों को छोटे और मझोले कारोबारियों को ऋण देने के लिये प्रेरित करने की दिशा में ये पंूजी काफी सहायक हो सकेगी। नोटबंदी को एक वर्ष और जीएसटी को चार माह पूरे होने जा रहे हैं। ये अवधि एक तरह से अर्थव्यवस्था की ओव्हर हॉलिंग के समान रही। नोटबंदी का निर्णय जहां छापामार शैली में किया गया वहीं जीएसटी का ढोल बजाकर परन्तु बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं करने की मानसिकता के कारण समाज के सभी वर्गों में इन फैसलों ने उथल-पुथल मचा दी। अब जबकि गर्द-गुबार बैठने की स्थिति बन गई है तब स्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने की तत्परता दिखाकर केन्द्र सरकार ने जरूरतों और जनापेक्षाओं दोनों का ध्यान रखा। इन फैसलों से अर्थव्यवस्था में व्याप्त ठहराव तथा बेरोजगारी दूर करने में कितनी सफलता मिलेगी ये तो आने वाले समय में ही स्पष्ट हो सकेगा परन्तु मुफ्त में खैरात बांटकर कार्य संस्कृति को तबाह कर देने की मानसिकता त्यागकर सार्वजनिक धन से विकास कार्यों के जरिये लोगों को काम देना कहीं अच्छी  नीति है। वर्तमान परिस्थितियों में भले ही सरकार को मजबूरीवश ये सब करना पड़ा हो परन्तु इन फैसलों के दूरगामी परिणाम सुखद होंगे ये उम्मीद करना गलत नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

परिणाम न सही रूझान तो है

गत रात्रि आज तक चैनल पर गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनाव संबंधी सर्वेक्षण प्रसारित हुआ। दोनों राज्यों में भाजपा की विजय  बताने वाले उक्त सर्वेक्षण के एक माह पूर्व एबीपी चैनल ने गुजरात का जो सर्वे प्रसारित किया था उसकी तुलना में नये सर्वेक्षण में भाजपा को 25-30 सीटें कम दिखाई गई परन्तु वह 2007 और 2012 की अपनी स्थिति करीब-करीब बनाए रखेगी। दूसरी तरफ आज तक के सर्वे में हिमाचल में भाजपा को बड़ी जीत की तरफ बताया है। गुजरात में कांग्रेस के आक्रामक प्रचार और जीएसटी को लेकर व्याप्त नाराजगी से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा है पाटीदार, ओबीसी तथा दलित समुदाय के नेता बनकर उभरे तीन नवयुवक क्रमश: हार्दिक पटैल, अल्पेश ठाकोर तथा जिग्नेश मेवानी भाजपा को हराने के लिये जिस तरह आमादा हैं उसकी वजह से राहुल गांधी को ये लगने लगा है कि वे 2014 से अभी तक की सभी पराजयों का एकमुश्त बदला नरेन्द्र मोदी को उन्हीं के घर में हराकर ले लेंंगे। अल्पेश तो दो दिन पूर्व कांग्रेस में शरीक भी हो चुके हैं। सर्वेक्षण के अनुसार तो इन तीनों को मिलाने के बाद भी कांग्रेस की नैया पार नहीं होने वाली। इसकी एक वजह श्री मोदी का प्रधानमंत्री होना है। गुजरात के मतदाताओं के मन में कहीं न कहीं तो ये बात बैठी ही होगी कि भाजपा को परास्त करने पर प्रधानमंत्री कमजोर होंगे जिससे गुजरात का नुकसान हो सकता है। वहीं पर्वतीय राज्य हिमाचल में सत्ता परिवर्तन की परंपरा कायम रहने की संभावना ही नजर आ रही है। यदि सर्वेक्षण के आँकड़ों को पूरी तरह स्वीकार करें तब तो वहां वीरभद्र सिंह की सरकार के विरुद्ध जबर्दस्त असंतोष सतह पर तैरता नजर आ रहा है। हॉलांकि बीते समय में तमाम सर्वेक्षण गलत साबित हो चुके हैं। कई तो वास्तविक नतीजों से बहुत ज्यादा अलग रहने की वजह से उपहास का पात्र भी बने किन्तु उ.प्र., उत्तराखंड आदि में सर्वेक्षणों ने जनता के मन को काफी हद तक सही तरीके से पढ़ा। जिस एजेन्सी द्वारा गत रात्रि का सर्वे किया उसका पिछला रिकॉर्ड भी काफी अच्छा बताया जाता है। बावजूद इसके सर्वे को नतीजा मान लेना जल्दबाजी होगी। राजनीति जिस तेजी से करवट बदलती है उसको देखकर पक्के तौर पर कुछ कह पाना उचित नहीं होता किन्तु उक्त सर्वेक्षण में 2 से 3 फीसदी की गलती स्वीकार कर लें तब भी कांग्रेस के लिये चिंता का कारण तो बनता ही है। हिमाचल में कांग्रेस का हारना उतना चौंकाने वाला नहीं होगा किन्तु यदि इस बार भी गुजरात को राहुल नहीं जीत सके तब 2019 को लेकर संजोई जा रही उनकी उम्मीदों पर अभी से तुषारापात हो जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 October 2017

देश भक्ति : आत्मप्रेरित होनी चाहिये

जिस सर्वोच्च न्यायालय ने सिनेमाघरों में शो शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाने तथा दर्शकों को उसके सम्मान में अनिवार्य रूप से खड़े होने का फरमान निकाला था वही कह रहा है कि देशभक्ति को आस्तीन पर लेकर चलने बाध्य नहीं कर सकते। अपने आदेश में अनिवार्य की जगह ऐच्छिक शब्द के इस्तेमाल का संकेत देते हुए मुख्य न्यायाधीश सहित दो अन्य न्यायाधीशों की पीठ ने गेंद सरकार के पाले में डालते हुए कह दिया कि वह राष्ट्रगान तथा ध्वज संबंधी निर्णयों में संशोधन कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णय का हवाला दिये जाने पर पीठ ने उलाहना दिया कि सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने की छूट नहीं दी जावेगी। गत वर्ष दिये गये फैसले के विरोध में प्रस्तुत याचिका पर विचार करते हुए की गई उक्त टिप्पणियों से जहां न्यायालय ने अपने पूर्व रूख में लचीलापन दिखाया वहीं सरकार पर पूरी जिम्मेदारी डालते हुए कई सारे उपदेश भी दे डाले। बहरहाल न्यायालय का ये कहना सही है कि देश भक्ति न तो दिखावे की चीज है और न ही इसे जबरन लादा जाना चाहिये। सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज के सम्मान के प्रति अधिकतर लोगों की उपेक्षा का उल्लेख भी पीठ ने किया। इस टिप्पणी के बाद अब सरकार के रूख पर सभी की नजर रहेगी किंतु इतना सही है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान का भाव कानून और सरकार नहीं अपितु संस्कारों से ही उत्पन्न किया जा सकता है। भारत में देशभक्ति की भावना तो हर व्यक्ति के मन में है किन्तु उससे जुड़े कत्र्तव्यों के निर्वहन के प्रति लापरवाही भी उतनी ही है। ये बात सौ फीसदी सच है कि देशभक्ति यदि आत्म प्रेरित न हो तो तब उसका दबाववश किया गया प्रदर्शन भी अर्थहीन होता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

फटकार के साथ पुचकार भी जरूरी

केन्द्र सरकार द्वारा कश्मीर में सभी पक्षों से बातचीत का जो पैंतरा चला उसका समय काफी महत्वपूर्ण है। एनआईए द्वारा शिकंजा कस दिये जाने के कारण अलगाववादी नेता पूरी तरह ठंडे पड़े हुए हैं। पाकिस्तान से मिलने वाली आर्थिक सहायता को अवरुद्ध किये जाने के बाद से पत्थरबाजी की वारदातें भी लगभग रुक सी गई है। सुरक्षा बलों ने जिस तरह ढूंढ़-ढूंढ़कर आतंकवादियों को मारा उससे भी घाटी का वातावरण बदला है। सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर नियंत्रण लगाने में भी कामयाबी मिली है। सबसे बड़ा बदलाव ये देखने मिला कि पुलिस में भरती हेतु अपेक्षा से अधिक नौजवान परीक्षा देने उमड़े। सरकार द्वारा आयोजित खेलकूद तथा अन्य गतिविधियों में भी न सिर्फ युवक वरन् युवतियां भी बड़ी संख्या में बिना डरे शामिल हुईं। घाटी पूरी तरह आतंक से मुक्त हो चुकी है ये मान लेना तो मूर्खता कही जाएगी किन्तु बीते एक-दो वर्ष के भीतर पूरी तरह बेकाबू लग रहे हालात को सुरक्षा बलों ने काफी हद तक नियंत्रण में ले लिया है। हुर्रियत नेताओं की चौतरफा घेराबंदी का भी असर दिखने लगा है। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि ये रही कि आतंकवादी संगठनों से जुड़े बड़े नेताओं सहित बड़ी घटनाओं को अंजाम देने वाले अनेक पाकिस्तानी पि_ुओं को भी सुरक्षा बलों ने धराशायी करते हुए आतंक के कारोबार की कमर तोडऩे में सफलता हासिल कर ली। इसका परिणाम ये हुआ कि हताश आतंकवादी कश्मीरी लोगों पर ही गुस्सा निकालने लगे। हाल ही में एक आतंकवादी को भीड़ द्वारा घेरकर पीटने की घटना भी घाटी के बदलते माहौल का इशारा करती है। ऐसा लगता है जो जनता खासतौर पर युवक पैसे एवं आतंकियों के खौफ की वजह से सुरक्षा बलों के खिलाफ खड़े होते थे वे भी अब पीछे हटने लगे हैं। पत्थरबाजी के लिये मिलने वाली रकम बंद होने तथा आतंकवादियों का बड़े पैमाने पर सफाये होने से घाटी में सुरक्षा बलों तथा प्रशासन का दबदबा कायम होने की स्थिति बन गई है। ऐसे में केन्द्र सरकार द्वारा राजनीतिक समाधान हेतु बातचीत के लिये आईबी के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को नियुक्त करना चौंकाने वाला किन्तु सही कदम है। यद्यपि 15 अगस्त पर लालकिले से प्रधानमंत्री ने इसका हल्का सा संकेत दे दिया था किन्तु इसकी पुष्टि गृहमंत्री राजनाथ सिंह की पिछली श्रीनगर यात्रा से हुई। वार्ताकार श्री शर्मा वर्तमान में उत्तर-पूर्व के उग्रवादी संगठनों से बातचीत कर रहे हैं। खुफिया ब्यूरो के प्रमुख के तौर पर उनका अनुभव ऐसे कार्यों में काफी सहायक होता है। केन्द्र के इस कदम को ढिलाई के रूप  में देखना गलत होगा क्योंकि गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि किससे, कितनी और कब तक बात करनी है ये तय करने का अधिकार श्री शर्मा को दिया गया है। यही नहीं उन्हें केबिनेट सचिव का दर्जा देकर काफी अधिकार संपन्न भी बनाया गया है। वे अपने स्तर पर निर्णय लेने के लिये चूंकि स्वतंत्र होंगे इसलिये हर बात में केन्द्र या राज्य सरकार का मुंह ताकने की मजबूरी से उन्हें मुक्त रखा गया है। राज्य की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने इस पहल का स्वागत किया है वहीं कांग्रेस इसे सरकार का घुटनाटेक होना बता रही है। पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाली कहावत दोहराते हुए पाकिस्तान से बात करने की रट भी लगाई है। केन्द्र सरकार की ओर से ये स्पष्ट कर दिया गया कि दिनेश्वर शर्मा हुर्रियत नेताओं सहित अन्य अलगावादी संगठनों और नेताओं से बात करें अथवा नहीं ये फैसला उन्हीं को करना होगा। जम्मू कश्मीर में कोशिशें ऐसी पहले भी हो चुकी हैं परन्तु वार्ताकार को इतना अधिकार और छूट शायद ही पहले दी गई। हुर्रियत चूंकि पाकिस्तान को अलग रखकर बातचीत करने का विरोध करती रही है इस कारण ये संभव है कि श्री शर्मा घाटी के उन लोगों से बात करें जो पाकिस्तान को साथ रखने की जिद नहीं करते। जहां तक बात फारूख और उमर अब्दुल्ला की है तो हो सकता है केन्द्र सरकार उन्हें ज्यादा घास नहीं डाले क्योंकि कश्मीर को समस्याग्रस्त बनाए रखने में इस खानदान की सबसे बड़ी भूमिका रही है। कुल मिलाकर परिस्थितियों पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने के उपरांत शांति वार्ता का निर्णय केन्द्र का सकारात्मक एवं साहसिक निर्णय कहा जाएगा। भले ही हुर्रियत एवं अब्दुल्ला परिवार को ये रास नहीं आए परन्तु कश्मीर की जनता से सीधा संवाद करना ही ज्यादा बेहतर होगा जो अलगावादियों के दबाव में आकर सुरक्षा बलों के विरोध में खड़ी होने मजबूर थी। चूंकि वर्तमान में आतंकवादियों को पैसे की आपूर्ति पूरी तरह ठप्प कर दी गई है तथा उनके समूचे तंत्र पर एनआईए ने फंदा कस दिया है इसलिये आम कश्मीरी भय एवं लालच छोड़कर शांति कायम करने में ठीक वैसे ही सहायक बन सकता है जैसा कि नब्बे के दशक में पंजाब में देखने मिला था। केन्द्र सरकार ने दिनेश्वर शर्मा जैसे अनुभव संपन्न खुफिया तंत्र के पूर्व शीर्षस्थ अधिकारी को वार्ताकार बनाकर जो दाँव चला है उससे समस्या का समाधान निकल ही आयेगा ये उम्मीद करना तो जल्दबाजी होगी किन्तु  इस संबंध में ये उक्ति स्मरण रखना चाहिये कि बहादुरी का बेहतर तरीका बुद्धिमानी भी होता है। जिनसे गोली से निपटा जाना चाहिए उनसे बेशक वैसे ही पेश आना जरूरी है परन्तु फटकार के साथ पुचकार का भी अपना महत्व है।

-रवीन्द्र वाजपेयी