Thursday, 4 January 2018

केजरीवाल भी आम नेताओं की जमात में खड़े हो गए


कोई राजनीतिक पार्टी राज्यसभा में किसे भेजे, किसे नहीं ये उसका आंतरिक मामला है लेकिन पारदर्शिता की सबसे बड़ी ठेकेदार बनकर भारतीय राजनीति में अवतरित हुई आम आदमी पार्टी ने गत दिवस दिल्ली से जिन तीन लोगों को राज्यसभा हेतु चुना उनमें संजय सिंह पर तो किसी ने ऐतराज नहीं किया किन्तु कांग्रेस से हाल ही में आए उद्योगपति सुशील गुप्ता और चार्टर्ड अकाउंटेंट एनडी गुप्ता को उम्मीदवार बनाए जाने से पार्टी के प्रति सहानुभूति रखने वाले तमाम लोग हतप्रभ हैं। सोशल मीडिया के साथ ही टीवी चैनलों पर गत दिवस वे चेहरे भी खुलकर नाराजगी व्यक्त करते देखे गए जो अब तक अरविंद केजरीवाल के हर कदम की प्रशंसा में आगे रहा करते थे। अभय दुबे, ओम थानवी और उन जैसे अनेक पत्रकार एवं बुद्धिजीवियों को श्री केजरीवाल का उक्त निर्णय रास नहीं आया। अपने संक्षिप्त राजनीतिक जीवन में यूं तो अरविंद पर काफी हमले हुए लेकिन कल वे जिस तरह से अकेले और उपेक्षित दिखाई दिए वह अभूतपूर्व था। पार्टी में अब तक बने होने के बाद भी  हांशिये पर धकेल दिए गए कवि डॉ. कुमार विश्वास के घोर आलोचक भी ये कहने से नहीं चूके कि उनके साथ श्री केजरीवाल ने अच्छा नहीं किया। सबसे तीखी और अर्थपूर्ण टिप्पणी रही पार्टी से धकिया दिए गए संस्थापक सदस्य योगेंद्र यादव की। उन्होंने बड़े ही मार्मिक अंदाज में कहा कि मतभेदों के बावजूद  मैं मानता था कि अरविंद को कोई खरीद नहीं सकता लेकिन अब समझ नहीं पा रहा हूँ क्या कहूँ, स्तब्ध हूँ। देश भर से आई प्रतिक्रियाओं का निचोड़ यही रहा कि श्री केजरीवाल ने पार्टी को आम आदमी से दूर कर धनकुबेरों के हाथ बेच दिया और वैकल्पिक राजनीति का ये प्रयोग भी अंतत: प्रचलित ढर्रे में फंसकर असफलता की बलि चढ़ गया। सुशील गुप्ता महीने भर पूर्व पार्टी में आये, वहीं एनडी गुप्ता आम आदमी पार्टी का हिसाब किताब देखा करते हैं। इनके चयन के जो आधार उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने पत्रकारों को बताए वे अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन पार्टी के पास इस बात का कोई समुचित उत्तर नहीं है कि डॉ. विश्वास और टीवी पत्रकारिता छोड़ आम आदमी पार्टी में आए आशुतोष को पूरी तरह उपेक्षित करने का कारण क्या था? पार्टी द्वारा बाहर से सुयोग्य उम्मीदवारों को राज्यसभा भेजने की नीति सही लगती थी। उच्च सदन का गठन भी इसीलिए किया गया। श्री सिसौदिया की मानें तो बड़ी बड़ी हस्तियों से सम्पर्क किया गया लेकिन वे इस डर से पीछे हट गईं कि केंद्र सरकार उन्हें बेवजह परेशान करेगी लेकिन उसके बाद श्री केजरीवाल ने जिन दो गुप्ताओं को उपकृत किया वे पार्टी के समर्थकों के गले नहीं उतर रहे। भले ही अरविंद की मजबूत पकड़ के कारण भीतर से जोरदार विरोध न हो किन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है कि संजय सिंह के अलावा जिन दो उम्मीदवारों को राज्यसभा की टिकिट आम आदमी पार्टी ने दी उनका चयन किसी को रास नहीं आया। डॉ. विश्वास और आशुतोष को न भेजकर श्री केजरीवाल पार्टी के किसी अन्य नेता या कार्यकर्ता को संसद के उच्च सदन हेतु चुनते तो उसे पचाया जा सकता था किंतु सम्पन्न वर्ग के ऐसे दो व्यक्तियों को चुनना पार्टी के उद्देश्यों और छवि के पूरी तरह विपरीत लग रहा है जिनका न तो उसके उत्थान में कोई योगदान रहा और न ही वे सैद्धांतिक तौर पर ही पार्टी के करीब कहे जा सकते  हैं। ये मान भी लें कि टिकिट के बदले श्री केजरीवाल ने उन दोनों से कोई पैसा नहीं लिया तब भी ये तो कहा ही जा सकता है कि आम आदमी पार्टी ने इस निर्णय के द्वारा खुद को बाकी की तरह आम पार्टी बना लिया। यद्यपि श्री केजरीवाल ने जिस तरह की स्वेच्छाचारिता दिखाते हुए पार्टी की नींव के पत्थरों को बाहर फेंका और फिर भ्रष्टाचार में लिप्त मंत्रियों को संरक्षण दिया उससे पार्टी की पवित्रता तो कब की खत्म हो चुकी थी। जो वरिष्ठजन पार्टी से जुड़े हुए हैं वे भी श्री केजरीवाल और उनके दाहिने हाथ मनीष सिसौदिया के सामने बौने बनकर रह गए हैं। डॉ. विश्वास जैसे इक्का-दुक्का ने यदि असहमति की हिम्मत दिखाई तो उन्हें तिरस्कृत करने का प्रबन्ध कर दिया गया। इन सबसे साबित हो गया कि अरविंद केजरीवाल ने जनांदोलन की कोख से जन्मी इस पार्टी को अपनी निजी जागीर बना लिया है और जिस तरह से अन्य क्षेत्रीय पार्टियां किसी नेता या उसके कुनबे की गिरफ्त में हैं ठीक उसी तरह से आम आदमी पार्टी भी श्री केजरीवाल के हाथ की कठपुतली बनकर रह गई है। कहाँ तो ये पार्टी कांग्रेस और भाजपा की टक्कर में एक सक्षम और ईमानदार राष्ट्रीय विकल्प बनने की उम्मीदें जगाने में सफल होती दिख रही थी और कहां इसकी पुण्याई एक-एक कर नष्ट होती जा रही है। भारतीय राजनीति में उम्मीदों का अवतरण और पतन दोनों नई बात नहीं है लेकिन आम आदमी पार्टी सही मायने में पार्टी विथ डिफरेंस की कसौटी पर खरी उतरती दिख रही थी। दिल्ली की जनता के लिए केजरीवाल सरकार भले ही कितने भी अच्छे काम कर रही हो लेकिन आम आदमी पार्टी अपनी उस छवि को कायम नहीं रख पाई जिसके बलबूते वह सत्ता के सिंहासन तक आ पहुंची थी और इसके लिए यदि कोई दोषी है तो वह अरविंद केजरीवाल की अहंकार युक्त कार्यशैली ही है जिसके कारण इस पार्टी के प्रति बनी धारणा तेजी से बदल रही है। बड़ी बात नहीं आने वाले दिनों में इसकी छवि और खराब हो जाए क्योंकि अब यह आम आदमी से दूर होती चली जा रही है। राज्यसभा के लिए दो गुप्ताओं के चयन के बाद श्री केजरीवाल भी उन आम नेताओं की जमात में खड़े नजर आ रहे हैं जिनकी वजह से राजनीति का सम्मान पूरी तरह विलुप्त होता चला गया ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 January 2018

दलितों के बीच उमर खालिद की मौजूदगी षड्यंत्र का प्रमाण


महाराष्ट्र में बीते दो दिनों में जो कुछ घटित हुआ उसे आकस्मिक मानकर उपेक्षित करना खतरनाक होगा। 200 साल पहले हुई एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति में होने वाले वार्षिक जलसे में लाखों की भीड़ ही इस आशंका को प्रबल कर देती है कि दलितों की आड़ में सामाजिक विद्वेष फैलाकर राजनीतिक उल्लू सीधा करने हेतु षडय़ंत्र रचा गया। वरना गुजरात में नए नए उभरे दलित चेहरे जिग्नेश मेवानी की वहां उपस्थित का कोई औचित्य नहीं था। उनके साथ जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद के आने से भी साफ  हो गया कि जान बूझकर आग भड़काने का कुचक्र रचा गया। स्मरणीय है कि ये वही खालिद है जिन पर भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह जैसे देश विरोधी नारे लगाने का मुकदमा चल रहा है। दलितों के इस सालाना आयोजन में इसके पहले कभी कोई बड़ा दलित नेता गया हो ये भी कोई नहीं जानता। महाराष्ट्र दलित राजनीति का पुराना केंद्र रहा है। डॉ भीमराव आम्बेडकर की कर्मभूमि होने से वहां दलित चेतना भी काफी है लेकिन न कोई कांशीराम पनपा और न ही मायावती। यहां तक कि डॉ आम्बेडकर के पुत्र प्रकाश का भी दलित वर्ग में कोई खास असर नहीं है। सुशील कुमार शिंदे मुख्यमंत्री बने जरूर लेकिन वे भी एक क्षेत्र विशेष में ही असर रखते हैं। और भी दलित चेहरे राजनीति में उभरे लेकिन वे शिखर पर नहीं पहुंच सके। आम्बेडकर जी द्वारा बनाई रिपब्लिकन पार्टी के रूप में दलितों की जो राजनीतिक विरासत थी वह भी कुछ नेताओं के आपसी मतभेदों में बंट गई जिसकी वजह से प्रकाश भी केवल नाममात्र के दलित नेता बनकर रह गए। इन स्थितियों में पेशवाओं की पराजय के 200 साल पूरे होने के बहाने दलितों को गोलबंद करने के पीछे निश्चित रूप से गहरी साजिश की बू आ रही है अन्यथा जिग्नेश के साथ उमर खालिद का वहां क्या काम था ? कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बिना देर किए जिस तरह से  भाजपा और रास्वसंघ पर आरोप मढ़ दिया वह भी आश्चर्यजनक है। अभी तो मामले की प्रारंभिक जांच तक नहीं हो सकी है।  भीमा - कोरेगांव नामक जिस जगह अंग्रेजों के हाथों पेशवा की हार का स्मारक बना है उसे दलितों से कब और कैसे जोड़ा गया ये भी अध्ययन का विषय है क्योंकि वह युद्ध जातीय आधार पर नहीं लड़ा गया था। अंग्रेजों की सेना में महार नामक दलित जाति के सैकड़ों सैनिकों के कारण उस विजय को सवर्ण विरुद्ध दलित का नाम देना अंग्रेजों की फूट डालो राज करो नीति का ही नतीजा था। बावजूद इसके 1 जनवरी को उक्त स्मारक पर जमा होने वाले हज़ार दो हज़ार दलितों की मौजूदगी पर कभी कोई विवाद नहीं हुआ लेकिन इस वर्ष 200 वर्ष के नाम पर लाखों का हुजूम एकत्र करने के पीछे कौन सी ताकतें थीं इसका खुलासा भी होना जरूरी है। जिन सवर्णों द्वारा हमले की बात कही जा रही है वह भी बेमानी है क्योंकि इतने बड़े  समूह पर हमला करने की बात समझ से परे है। धीरे धीरे जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनके मुताबिक जिग्नेश और उमर खालिद की उपस्थिति और भड़काऊ भाषण ही सारे फसाद की जड़ बने। महाराष्ट्र सरकार की गलती इस स्तर पर तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि वह कानून व्यवस्था की स्थिति का सही आकलन नहीं कर पाई। वह ये सोचकर बैठी रही कि दलित समुदाय आएगा और जलसे में शरीक होकर लौट जाएगा किन्तु राज्य सरकार की प्रशासनिक मशीनरी भीतर भीतर पक रही खिचड़ी की गंध नहीं ले पाई जिसका लाभ उठाकर शरारती तत्व अपना खेल दिखा गए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के ऊंची जति से होने को भी मुद्दा बना लिया गया। एक दलित की मौत निश्चित रूप से निन्दनीय और दुखद थी किन्तु उसके बाद जिस तरह से महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में तोडफ़ोड़, आगजनी और हिंसक आंदोलन किया गया वह दर्शाता है कि गुजरात चुनाव में फैलाया गया जातीय घृणा का ज़हर लुढ़ककर महाराष्ट्र में आ गया है। भीतरखानों की खबर है कि महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव लोकसभा के साथ करवाने की तैयारी भाजपा कर रही है। इसके पीछे उद्देश्य शिवसेना की दादागिरी से मुक्ति पाना है। इसका आभास होते ही राज्य की सियासत को जाति के जंजाल में उलझाने का षड्यंत्र रचते हुए 200 साल पुरानी घटना को माध्यम बना लिया गया जिसे लेकर अब तक का कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ। पूरे घटनाक्रम में महाराष्ट्र सरकार खलनायक बनकर उभरी तो उसकी वजह पूर्वानुमान लगाने में उससे हुई चूक ही रही किन्तु महाराष्ट्र के दलित नेताओं को  चाहे वे रामदास आठवले हों या प्रकाश आम्बेडकर, ये सोचना चाहिए कि दलित वर्ग को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करने वाले उनके हितचिंतक नहीं अपितु शत्रु हैं जो कुछ अदृश्य शक्तियों के एजेंट बनकर देश को बांटने के षड्यंत्र को अंजाम देने में लगे हुए हैं वरना, उमर खालिद जैसे देश विरोधी शख्स की दलितों के जमावड़े में क्या जरूरत थी?  आश्चर्य की बात ये है कि जो राजनीतिक दल राजनीति में धर्म के प्रवेश पर नाक सिकोड़ते हैं वे ही जाति के नाम पर मतदाताओं को बांटकर अपनी स्वार्थ सिद्धि करने के लिए समाज के विघटन का आधार तैयार कर रहे हैं। दलितों को समाज की मुख्य धारा में जोड़कर सामाजिक समरसता बनाने की तमाम कोशिशों को ऐसी घटनाओं से जो नुकसान होता है उसे दलित वर्ग नहीं समझता वरना वह अधकचरे और षड्यंत्रकारी नेताओं से बचकर रहता। दुख की बात ये है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तक क्षणिक लाभ हेतु उन जातिवादी नेताओं को सिर पर बिठा रहे हैं जो देश को ऐसे गड्ढे में ढकेलने पर आमादा हैं जिससे निकलना बेहद कठिन होगा। चुनाव तो आते जाते रहेंगे लेकिन उसके लिए जिग्नेश और उमर खालिद जैसों की मदद लेना आत्मघाती होगा। जिन ज़हरीले नागों के फन कुचलना चाहिए उन्हें दूध पिलाना किसी भी तरह से बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती। एनसीपी नेता शरद पवार का ये कहना सही है कि सभी दलों को आगे आकर महाराष्ट्र को आग में झोंकने के प्रयासों को बेअसर करना चाहिए। मराठा आरक्षण की मांग के चलते दलितों के साथ टकराव की परिस्थितियाँ किसी बड़े तूफान का संकेत है जिससे समय रहते बचाव करना जरूरी है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 January 2018

ट्रम्प : काश कथनी को करनी में भी बदलें


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जब से पद पर आए हैं पाकिस्तान के विरुद्ध तीखे बयान देते रहते हैं। अपने चुनाव प्रचार में भी ट्रम्प ने इस्लामिक आतंकवाद को लेकर जो सख्त रवैया अपनाया उससे भारतवंशीय मतदाताओं  ने उनकी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया । शुरू में लगा कि पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की तरह ट्रम्प भी पाकिस्तान को ऊपर-ऊपर डांटने के बावजूद भीतर-भीतर डॉलर बांटने का क्रम जारी रखेंगे। पाकिस्तान को अमेरिका की मदद न मिले तो वहां आर्थिक आपातकाल आ जायेगा । पूर्व में भी कुछ राष्ट्रपतियों ने आतंकवाद को प्रश्रय देने के मामले में इस्लामाबाद की आर्थिक सहायता और हथियारों की आपूर्ति रोकी किन्तु जरा से अनुनय-विनय के बाद अमेरिका पिघल गया । दरअसल कभी रूस तो कभी तालिबान के विरुद्ध मोर्चेबंदी के नाम पर अमेरिका  पाकिस्तान के लालन-पालन की जिम्मेदारी उठाता रहा लेकिन वहां के दोगले शासक अमेरिका के दुश्मन नंबर एक ओसामा बिन लादेन को सुरक्षित रखने में भी नहीं सकुचाए। तालिबानों को पाकिस्तान आज भी खुलकर मदद देता है । वाशिंगटन में बैठे हुक्मरान हमेशा से जानते थे कि पाकिस्तान उनके द्वारा भेजी आर्थिक और सैन्य सहायता का क्या करता है किंतु ये बात भी सही है कि बावजूद उसके अमेरिका की नीति भारत को परेशान करने की भी रही क्योंकि उसे लगता रहा कि शुरू से ही भारत सोवियत संघ के खेमे में था। उसके विखंडन के बाद भी अमेरिका से भारत के रिश्ते बहुत मधुर और मजबूत नहीं रहे लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हालात बदले। यद्यपि परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने में तनिक भी संकोच नहीं किया लेकिन कारगिल युद्ध के दौरान राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान को काफी लताड़ा। वाजपेयी सरकार के समय से भारत-अमेरिका सम्बन्ध काफी अच्छे रहे किन्तु पाकिस्तान के प्रति अमेरिका की मोहब्बत यथावत रही । कहने को तो लादेन को पाकिस्तान में छिपाकर रखने की बात उजागर होने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस्लामाबाद को खूब फटकारा किन्तु अमेरिका की मदद रुक-रुककर उस तक पहुंचती रही । लेकिन ट्रम्प जबसे पद पर आए तबसे उन्होंने पाकिस्तान के बारे में काफी कठोर बयान देना शुरू कर दिया । आए दिन उसकी मदद में कटौती की बात कही जाती है। आतंकवादी संगठनों को संरक्षण और सहायता के लिए भी ट्रम्प पाकिस्तान की नियमित खिंचाई करते रहे हैं। बीते सप्ताह भी खबर आई थी कि अमेरिका ने इस्लामाबाद को मिलने वाली मदद को स्थगित करने का फैसला कर लिया है। लेकिन नए साल के अपने पहले भाषण में उन्होंने जिस तरह पाकिस्तान को हड़काते हुए धमकाया उससे लगता है ट्रम्प ऐसा कुछ करेंगे जिससे पाकिस्तान दबाव में आए। गत दिवस हाफिज सईद के संगठनों की सहायता रोकने का कदम उसी दबाव का ही परिणाम माना जा रहा है । ट्रम्प जिस तरह की भाषा का उपयोग पाकिस्तान को लेकर कर रहे हैं वह किसी भी लिहाज से मित्रवत तो नहीं कही जा सकती किन्तु देखने वाली बात ये होगी कि वे जिस तरह की सख्त बयानबाजी करते हैं क्या उस पर अमल भी करेंगे या अब  तक के ढर्रे पर चलकर केवल बातों का जमा खर्च ही जारी रखेंगे । गत दिवस ट्रम्प ने पाकिस्तान को दो टूक शब्दों में बता दिया कि उसने अब तक मिली आर्थिक मदद से आतंकवादियों को दूध पिलाकर बड़ा किया है हाफिज सईद सदृश आतंकवादियों को सिर पर बिठाए रखने से भी ट्रम्प पाकिस्तान से खफा हैं । नाराजगी की एक वजह इस्लामाबाद के चीन से मधुर सम्बन्ध भी हैं। अमेरिका को लगता है कि पाकिस्तान से मिलने वाले समर्थन के कारण ही चीन मध्य एशिया तक अपने पांव फैलाने में सफल हो रहा है । उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग के साथ ट्रम्प की जो रस्साकशी चल रही है उसमें चीन की भूमिका से खुर्राए ट्रम्प को लगता है कि पाकिस्तान को दबाने से चीन भी एशिया की राजनीति में कमजोर पड़ेगा क्योंकि और कोई पड़ोसी देश चीन के साथ खड़ा होने तैयार नहीं है । पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों से अलग ट्रम्प की पृष्ठभूमि राजनीतिक न होकर व्यवसायिक है । इसलिए वे कूटनीति के साथ व्यापार को अतिरिक्त महत्व देते हैं और इस दृष्टि से भी भारत उनके लक्ष्यों की प्राप्ति में अधिक सहायक होगा। भारत में वैसे भी उनके व्यवसायिक प्रकल्प चलते रहे हैं जिसकी वजह से अनेक भारतीय व्यवसायी उनकी अंतरंग मंडली में हैं । उसका असर भी ट्रम्प की पाकिस्तान नीति पर हो सकता है किंतु भारत को इस पर स्थायी रूप से प्रसन्न होने की जरूरत नहीं है क्योंकि पाकिस्तान को पहले दुत्कारना और फिर पुचकारना अमरीकी स्वभाव रहा है । वरना ओसामा बिन लादेन को शरण देने के जुर्म में तो पाकिस्तान से रिश्ते खत्म कर उसे शत्रु राष्ट्रों की श्रेणी में रख देना चाहिए था । लेकिन ऐसा नहीं कर पाने के पीछे वजह अमेरिका के अपने निहित स्वार्थ हैं जो पाकिस्तान की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के मद्देनजर उसकी पीठ पर हाथ रखे जाने की जरूरत बनाए रखते हैं । बावजूद इसके यदि अमेरिका उसे आतंकवाद का संरक्षक मानकर प्रताडि़त और दंडित करने का साहस दिखाता है तो यह भारत के लिए हितकारी है किंतु इसमें एक खतरा ये है कि उस सूरत में रूस और मध्य एशिया के अन्य इस्लामी देश इस्लामाबाद की मदद हेतु आगे आ सकते हैं । उत्तर कोरिया के साथ अमेरिका के बढ़ते तनाव में भी रूस किम जोंग के साथ जिस तरह खड़ा हुआ है उससे भी दक्षिण एशिया के कूटनीतिक समीकरण बदल सकते हैं । हालांकि पाकिस्तान पर ट्रम्प के दबाव का जो थोड़ा बहुत असर नजर आता है वह दिखावा ज्यादा लगता है वरना हाफिज सईद के पर कतरने की कोशिश के बीच परसों रात कश्मीर के पुलवामा में आतकंवादी हमला न हुआ होता । डोनाल्ड ट्रम्प को सनकी किस्म का नेता भी माना जा रहा है इसलिए उनकी नीतियां कितनी स्थायी होंगी ये भरोसा करना जल्दबाजी होगी । पाकिस्तान के बारे में वे जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं यदि उसे कार्यरूप में बदल दें तब जरूर भारत का पलड़ा मज़बूत हो सकता है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात काफी अच्छी रही थी और अमेरिका में रह रहे अप्रवासी भारतीयों को लुभाने का कोई अवसर भी वे नहीं छोड़ रहे । ऐसे में पाकिस्तान के प्रति उनका कड़ा रवैया उम्मीद तो पैदा करता है किंतु अमेरिका का पिछला रिकार्ड देखते हुए उस पर आंख मूंदकर विश्वास करने का जी भी नहीं होता । बावजूद इसके ट्रम्प फिलहाल जो कुछ भी बोल और कर रहे हैं उससे भारत को मानसिक शांति तो मिल ही रही है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 January 2018

संकट सुलझा लेकिन कटुता तो आ ही गई

गुजरात संकट भले निबट गया हो लेकिन यदि अमित शाह को अपने ही राज्य में इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़े तो माना जा सकता है कमल की पंखुडिय़ों के कुम्हलाने का खतरा बढऩे लगा है। नितिन पटैल ने जिस तरह के तेवर दिखाए यद्यपि उसमें पार्टी छोडऩे या तोडऩे का संकेत नहीं नजर आया लेकिन उससे जो कटुता उनके और मुख्यमंत्री विजय रूपानी के बीच उत्पन्न हो गई वह शायद ही दूर ही सकेगी। नरेंद्र मोदी और अमित शाह का इकतरफा जलवा होने पर भी अगर नितिन भाई ने अड़कर वित्त मंत्रालय ले लिया तो इसे केंद्रीय नेतृत्व के दबदबे में  कमी का प्रमाण मान लेना गलत नहीं होगा। गुजरात में भाजपा के सामने तलवार की धार पर चलने जैसी स्थिति है । अतीत में  शंकर सिंह वाघेला तथा केशुभाई पटैल के बीच चली वर्चस्व की लड़ाई में उसे कितना नुकसान हुआ ये भी सर्वविदित है। ऐसी स्थिति में भाजपा उस हादसे को दोहराए जाने की बात सोचकर ही भयभीत हो गई थी और नाराज नेताओं के सामने घुटने नहीं टेकने के प्रारंभिक दावे के बाद नितिन पटैल को वित्त विभाग देकर उनका तुष्टीकरण करने में तनिक भी देर नहीं की गई। खैर, हाल-फिलहाल तो संकट टल गया किन्तु चिंगारी पूरी तरह बुझ गई ये मान लेना खुशफहमी ही है। सरकार बनते ही एक मंत्री ने आंखें दिखाकर न सिर्फ अपना मनपसन्द विभाग ले लिया किन्तु बाकी को भी रास्ता दिखा दिया। नितिन पटैल भाजपा के समर्पित नेता रहे हैं। उनकी नाराजगी बगावत का रूप नहीं लेगी ये तो सभी मानते थे। नवनिर्वाचित कोई भी भाजपा विधायक दोबारा चुनाव होने का खतरा नहीं उठाना चाहेगा। वहीं कांग्रेस भी जल्दबाजी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी जिससे उसकी मुसीबतें बढ़ जाएं क्योंकि उसे अमित शाह की क्षमता और कार्य शैली अच्छी तरह पता है। फिर भी आने वाले दिनों में भाजपा को सतर्क रहना होगा क्योंकि उसके कई विधायक नई भर्ती वाले भी हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

यदि जंग ही विकल्प है तो हो जाने दें

बीते वर्ष की आखिरी भोर दुखद खबर लेकर आई। जम्मू कश्मीर के पुलवामा क्षेत्र में सीआरपीएफ  के शिविर में घुसे तीन आतंकवादियों ने हमारे आधे दर्जन जवानों को मार दिया । हालांकि जवाबी कार्रवाई में तीनों हमलावर भी ढेर कर दिए गए लेकिन खुफिया तंत्र द्वारा नव वर्ष पर ऐसे हमलों के लिए पहले से आगाह किये जाने के बाद भी चूक हो गई। ऐसे हादसों पर आलोचना और प्रत्यालोचना उचित नहीं होती क्योंकि सुरक्षा बल अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सदैव सजग रहते हैं लेकिन आतंकवादी चूंकि आत्मघाती बनकर आते हैं। इसलिए मरने के पहले वे बड़ा नुकसान करने में सफल हो जाते हैं। कुछ दिन पूर्व ही जैश ए मोहम्मद के एक बड़े सरगना को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था। कल की घटना को उसी का बदला बताया गया है। कांग्रेस ने हमले को केंद्र सरकार की कश्मीर नीति की विफलता बताकर अपना विपक्षी धर्म निभा दिया जिसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि बीते साल सुरक्षा बलों की मुस्तैदी से काश्मीर घाटी में 200 से ज्यादा आतंकवादी मार गिराए गए। काफी संख्या उन लोगों की भी रही जिन्होंने हथियार छोड़कर शांति के साथ रहने का निर्णय लिया। सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने की घटनाएं भी करीब-करीब खत्म सी हो चली हैं। सुरक्षा बलों को राज्य की पुलिस भी अब पहले की अपेक्षा बेहतर सहयोग करती है जिसके सकारात्मक परिणाम देखने मिल रहे हैं। कश्मीर घाटी में अलगाववादी नेताओं पर शिकंजा कसे जाने से भी माहौल सुधरा है लेकिन ये मान लेना गलत होगा कि आतंकवाद पर पूरी तरह काबू पा लिया गया है। दरअसल घाटी को अलगाववाद के रास्ते पर धकेलने में पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका के कारण ही स्थिति सम्भलते-सम्भलते एकाएक बिगड़ती लगने लगती है। 31 दिसम्बर की सुबह-सुबह पुलवामा में सीआरपीएफ के शिविर पर हुआ हमला भी उसी कड़ी का हिस्सा है जिसका मकसद सुरक्षा बलों का मनोबल तोडऩा है। जहां तक बात केन्द्र सरकार की नीति की है तो उसकी समीक्षा सार्वजनिक रूप से कर पाना न तो सम्भव ही है और न ही उचित क्योंकि एक तरफ तो सेना तथा अन्य सहयोगी बल आतंकवादियों को तलाशकर उनका सफाया करने में जुटे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ  केन्द्र के वार्ताकार भी घाटी में सभी पक्षों से बातचीत कर बीच का रास्ता निकालने प्रयासरत हैं। क्या होगा, क्या नहीं ये कह पाना कठिन है किंतु इतना तय है कि शांति स्थापना के प्रत्येक प्रयास में पाकिस्तान व्यवधान पैदा करता रहेगा। आए दिन आतंकवादियों के मारे जाने की खुशख़बरी पर उस समय पानी फिर जाता है जब हमारे जवान और युवा अफसर सस्ते में मारे जाते हैं। केन्द्र सरकार की सख्ती से स्थिति नियंत्रण में आती देख आतंकवादी कोई न कोई वारदात कर देते हैं। गत दिवस जो हुआ वह अत्यंत दुखद एवं चिंताजनक था क्योंकि पूर्व चेतावनी के बाद भी आतंकवादी सुरक्षा प्रबंधों को धता बताकर अपने मकसद में कामयाब हो गए। ऐसी घटनाओं को पूरी तरह से रोक पाना सम्भव नहीं दिखता क्योंकि आतंकवादियों के दस्ते मरने के लिए ही आते हैं। उनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारना होता है लेकिन एक बात जरूर है कि हमारी सेनाओं और अर्ध सैनिक बलों की तमाम चौकसी के बावजूद अगर पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकवादी सीमा पार करने में सफल हो जाते हैं तब ये गम्भीर मुद्दा है। इसी तरह ये भी विचारणीय है कि उन्हें संवेदनशील ठिकानों तक पहुंचने में स्थानीय लोग ही मदद करते हैं जिससे साबित होता है कि घाटी में भारत विरोधी तत्वों की जड़ें काफी गहरी और दूर -दूर तक हैं। यद्यपि ये कहने में जितना आसान लगता है उतना है नहीं किन्तु पाकिस्तान से वार्ता करने या रोके रहने के अपेक्षित परिणाम नहीं आने के बाद अब सैन्य कार्रवाई ही विकल्प दिखाई देती है। ये कब और कैसे होगी ये तो सरकार और फौज को मिलकर तय करना है लेकिन ऐसी किसी भी कोशिश को देश की जनता बिना शर्त समर्थन। करती आई है और आगे भी करेगी, ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा। बिना लड़े फौजियों की शहादत से बेहतर है जंग ही हो जाए वरना इसी तरह रोज ताबूतों को सलामी देने वाले दृश्य देख-देखकर देश का मनोबल भी गिर रहा है और छप्पन इंच के सीने का मज़ाक भी उडऩे लगा है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी