Tuesday, 9 January 2018

समलैंगिकता : चन्द लोगों की सोच को समाज पर लादना घातक

सर्वोच्च न्यायालय अपने उस निर्णय पर पुनर्विचार करने राजी हो गया है जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को पलट दिया गया था जिसके अनुसार समलैंगिक सम्बन्धों को दण्डनीय अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। चार वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के अंतर्गत समलैंगिक सम्बन्धों को अवैध माने जाने पर मुहर लगा दी गई थी किन्तु एक याचिका पर विचार करते हुए गत दिवस न्यायालय ने दो वयस्कों के बीच सहमति के आधार  पर समलैंगिक सम्बन्धों की अनुमति देने सम्बन्धी अनुरोध को संविधान पीठ के पास भेजने का निर्णय लिया। इस दौरान प्रधान न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा ने भी ये माना  कि समय के साथ बदलते नैतिकता के मापदंडों के अनुरूप कानून में संशोधन और परिवर्तन की बात  विचारणीय है और व्यक्तिगत आज़ादी के मौलिक अधिकार में कटौती नहीं की जा सकती। चूंकि प्रकरण संविधान पीठ के हवाले कर दिया गया इसलिये उसके  कानूनी पहलुओं पर टीका-टिप्पणी करना फिलहाल अनधिकार चेष्टा होगी लेकिन खुद प्रधान न्यायाधीश ने प्रकृति की अनुकूलता और सामाजिक नैतिकता के प्रति अवधारणा में परिवर्तन का जिक्र करते हुए सामाजिक स्तर पर बौद्धिक विचार विमर्श की गुंजाइश छोड़ दी है इसलिए जरूरी है कि लिव इन रिलेशनशिप, किराए पर कोख और तीन तलाक जैसे मुद्दों की तरह बिना शर्म किये समाज भी समलैंगिकता को लेकर अपना मत व्यक्त करे जिससे सर्वोच्च न्यायालय को भी ये ज्ञात हो सके कि समाज के दृष्टिकोण और सोच में परिवर्तन की सीमा और जरूरत कितनी है? इस सम्बंध में केवल न्यायालय के जिम्मे छोड़कर दूर बैठ जाने के दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होंगे। न्यायालय ने याचिका को संविधान पीठ के विचारार्थ भेजकर भले ही व्यक्तिगत आज़ादी के मौलिक अधिकार को स्पष्ट करने की मंशा व्यक्त की हो किन्तु ऐसे सवाल केवल कानून की दहलीज पर नहीं सुलझाए जा सकते। अदालत का ये प्रारंभिक अवलोकन निश्चित तौर पर विचारणीय है कि प्रकृति और सामाजिक नैतिकता के प्रति अवधारणा और विश्वास समयानुकूल बदलते हैं किन्तु समलैंगिक सम्बंध कोई वैज्ञानिक विषय नहीं है जिसके निष्कर्ष और परिभाषाएं नई खोज के साथ बदल दिए जाएं। प्रकृति को लेकर व्याप्त अनेक धारणाएं और विश्वास वैज्ञानिक अनुसंधानों एवम अध्ययनों के बाद बदली हैं जिन्हें स्वीकार करने में कोई दिक्कत भी नहीं हुई किन्तु व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार किसी भी तरह की ऐसी स्वच्छन्दता की अनुमति नहीं देते जो शाश्वत और अकाट्य सिद्धांतों के विरुद्ध  हो। समलैंगिक सम्बंध के बारे में भी यही कहा जा सकता है। प्रकृति ने जो लिंग भेद बनाया क्या व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसे बदल सकती है। मु_ी भर लोग तो क्या पूरी दुनिया मिलकर भी कहे कि स्त्री और पुरुष  में कोई अंतर नहीं तो भी उसे सत्यता की कसौटी पर सही नहीं माना जा सकेगा। दो समलैंगिक व्यक्ति निजी तौर पर कैसे भी रहें किन्तु उसे सार्वजनिक करना या मौलिक अधिकार मानकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोडऩा उस विकृत मानसिकता का ही दुष्परिणाम है जो पश्चिमी जगत के वर्जनाहीन समाज में विकसित यौन विकृति से उत्पन्न होकर हमारे देश में घुसने का दुस्साहस कर रही है। यौन सम्बन्धों को लेकर भारतीय संस्कृति बेहद व्यवहारिक रही है। रक्त सम्बन्धों के साथ अनुवांशिकता के मदद्देनजऱ वैवाहिक रिश्ते तय करने के पीछे जो वैज्ञानिक सोच थी उसे उजागर करने वालों को पश्चिम नें नोबेल पुरस्कार दिया गया जबकि हमारे ऋषि मुनियों ने हज़ारों वर्ष पहले इसे बतौर सिद्धान्त स्थापित कर दिया था। लिव इन रिलेशनशिप के अलावा किराए की कोख जैसी विधियों के बढ़ते चलन ने भी परिवार नामक उस संस्था के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया है जो भारत का आधार है। हाल ही में फिल्म क्षेत्र की कुछ हस्तियों के बिना विवाह किए किराए की कोख़ से मां और पिता बनने के बाद भी तरह - तरह के सवाल उठे थे। नि:संतान दंपत्तियों के लिए तो ये सब उचित भी मान लिया जाए किन्तु इसे आम बनाना घातक होगा। उसी आधार पर कहा जा सकता है कि समलैंगिक सम्बन्ध प्रकृति को लेकर अवधारणाएं बदलने का नहीं अपितु उस सत्य को अस्वीकार करने का प्रयास है जो किसी भी लिहाज से तर्कसंगत नहीं हो सकता। न्यायालय केवल कानूनी स्तर पर यदि सोचे तो निजी स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार के नाम पर  काफी कुछ ऐसा होने लगेगा जो समाज द्वारा स्थापित उन नैतिक मानदंडों को ध्वस्त कर देगा जो लम्बे अनुसंधान, अध्ययन और अनुभव पर आधारित हैं।  इसके पहले कि सर्वोच्च न्यायालय किसी ऐसे निष्कर्ष को लाद दे जिसे स्वीकार करना मुश्किल हो, समाज को भी अपना मत खुलकर व्यक्त करना चाहिए। समलैंगिकता को कानूनी मान्यता मिलने से समाज में जो गन्दगी बढ़ेगी वह एक नए तरह के व्यभिचार का मार्ग प्रशस्त करेगी। समाज के जिम्मेदार लोगों को तत्काल अपने अभिमत के साथ मुखर हो जाना चाहिए क्योंकि चन्द लोगों की स्वछंद सोच को पूरे समाज का दृष्टिकोण मान लेना  दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा।

-रवींद्र वाजपेयी

Monday, 8 January 2018

इंदौर हादसा : राजसत्ता का संरक्षण असली वजह

इंदौर में बीते सप्ताह हुए सड़क हादसे में एक नामी-गिरामी निजी विद्यालय के कुछ नन्हें बच्चे मौत के मुंह में समा गए। घटना पर हल्ला मचा तो पता चला कि विद्यालय की बस काफी पुरानी थी लेकिन अपनी ईमानदारी के लिए विश्वविख्यात परिवहन विभाग ने उक्त बस को गुणवत्ता के सारे प्रमाणपत्र देते हुए तकनीकी खराबी को दुर्घटना का कारण बताकर विद्यालय प्रबंधन का बचाव करने में कोई संकोच नहीं किया। गत दिवस मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शोक संतप्त परिवारों से मिलने गए तो मृतक बच्चों के माता-पिता का गुस्सा फूट पड़ा। अभिभावकों ने शिवराज सिंह को खूब खरी-खोटी सुनाई और ये उलाहना भी दिया कि ऐसा हादसा किसी बड़े व्यक्ति के संग घटा होता तो पूरा शहर हिला दिया जाता। मुख्यमंत्री पीडि़त परिवारों से मिलकर खुद भी भाव विव्हल हो गए और ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए परिवहन अधिकारी को हटा दिया। लगे हाथ पूरे राज्य में विद्यालयों की पुरानी बसों को बंद करने और प्रशासनिक चौकसी का आश्वासन भी दे डाला। उनकी जगह दूसरा शासक होता तो वह भी इसी तरह का कर्मकांड करते हुए शोक में डूबे परिवारों के गुस्से पर पानी डालता। परिवहन विभाग केवल मप्र ही नहीं अपितु पूरे देश में भ्रष्टाचार का प्रतीक माना जाता है। इसकी एक वजह राजनीतिक संरक्षण भी है। सत्ताधारी दल की रैलियों के लिए मुफ्त के वाहन जुटाने में इस विभाग का जिस तरह उपयोग होता है उसके कारण उसके अधिकारी बेलगाम होकर भ्रष्टाचार करते हैं। निजी शिक्षण संस्थानों की कंडम बसों को सुरक्षित और चलने योग्य प्रमाणित करने के एवज में मिलने वाली सौजन्य राशि के दबाव में पूरी व्यवस्था का मुंह बंद होकर रह जाता है। शिवराज जी ने जिस परिवहन अधिकारी को हटा दिया वह भी किसी न किसी बड़े भाजपा नेता या मंत्री का कृपापात्र रहा होगा। इंदौर जैसे शहर में परिवहन विभाग का मुखिया होना नोट छापने की मशीन हाथ में आने जैसा है। ये विभाग मोटी मलाई के लिए जाना जाता है। मुख्यमंत्री ने मौके की नजाकत के अनुरूप तत्काल कार्रवाई करते हुए जो सम्वेदनशीलता दिखाई वह मजबूरी का नतीजा था। यदि दर्दनाक हादसे में मासूमों की जान न गई होती तो उनकी सरकार 15 साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी बसों पर रोक लगाने जैसी बात सोचती भी नहीं। तीन महीनों में पूरी व्यवस्था चाक चौबंद करने की जो घोषणा शिवराज जी ने की वह कितनी कारगर होगी ये बताने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि चुनाव वर्ष में परिवहन विभाग चंदे का बड़ा जरिया रहेगा। दरअसल बसों और ट्रकों के धंधे में राजनीतिक नेताओं की हिस्सेदारी सर्वविदित है। महंगे निजी शिक्षण संस्थानों का संचालन भी नेताओं और प्रभावशाली लोगों द्वारा किया जाने से उनके द्वारा फीस की लूटपाट सहित अन्य अनियमितताओं पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता। छात्रों को लाने-छोडऩे के लिए बसें जिन निजी संचालकों से अनुबंध पर ली जाती हैं वे भी राजनेताओं के भागीदार या कृपापात्र होते हैं। यात्री बसों के व्यवसाय में तो नेताओं की मौजूदगी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में इंदौर हादसे के बाद भी व्यवस्था में व्याप्त गड़बडिय़ां खत्म हो सकेंगी ये मान लेना कोरा आशावाद होगा। शिवराज सिंह निश्चित रूप से ऐसे अवसरों पर आम जनता की भावनाओं के अनुरूप व्यवहार करते हैं किंतु उनके मातहत जो सरकारी महकमा है वह चूंकि पूरी तरह भ्रष्ट और स्वछंद है इसलिए मुख्यमंत्री के कहे अनुसार तीन महीने में सब कुछ ठीक हो जाएगा ये विश्वास नहीं होता। अतीत में हुई अनेक बस दुर्घटनाओं के बाद भी राज्य सरकार ने परिवहन व्यवस्था को नियमानुसार संचालित करने के लिए हाथ पांव चलाए। कुछ दिनों तक लगा कि रामराज्य धरती पर उतर आया लेकिन फिर से रात गई, बात गई वाली स्थिति लौट आई। इंदौर में जो हुआ वह हृदयद्रावक था। जिस तरह छोटे-छोटे बच्चे काल के गाल में समाए उसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो  जाते हैं लेकिन किसी एक विद्यालय या परिवहन अधिकारी को इसके लिए पूरी  तरह जिम्मेदार मानना सच से मुंह छिपाने जैसा होगा। जब पूरी व्यवस्था ही आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हो तब किसी एक या दो को कठघरे में खड़ा करने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। शिवराज सिंह की निजी सम्वेदनशीलता पर बिना सन्देह किये भी ये कहना गलत नहीं होगा कि भले ही वे सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बनने का कीर्तिमान बना चुके हों किन्तु दिग्विजय सिंह के राज को अलीबाबा चालीस चोर कहकर बदनाम करने वाली भाजपा की रामनामी सरकार भी भ्रष्टाचार के मोर्चे पर पूर्ववर्ती सत्ता से पीछे नहीं बल्कि दो कदम आगे ही है। आजकल निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों में भी बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का चलन बढ़ चला है। अपना पेट काटकर संतान का भविष्य संवारने वाले अभिभावक निजी शिक्षण संस्थानों के नाज नखरे उठाकर परेशान होने के बाद भी चुप बने रहते हैं क्योंकि उनके घर के पास वाले सरकारी विद्यालय की हालत दयनीयता की चरम अवस्था को भी पार कर चुकी है। जन कल्याण की अनेक योजनाएं चलाकर प्रशंसित होने वाले श्री चौहान सरकारी विद्यालयों को प्रतिस्पर्धा में खड़ा करने में नाकामयाब रहे जिस वजह से निजी क्षेत्र की शिक्षा दुकानों को दोनों हाथों से लूटने की छूट मिल गई। इंदौर हादसे के उपरांत हुई चौतरफा आलोचना के परिप्रेक्ष्य में भले ही मुख्यमंत्री ने त्वरित कार्रवाई का दिखावा कर दिया किन्तु जब तक भ्रष्ट व्यवस्था से  सत्ताधारियों की स्वार्थ सिद्धि का सिलसिला नहीं रुकता तब तक इस तरह के दर्दनाक हादसे दोहराए जाते रहेंगे।

-रवींद्र वाजपेयी

Saturday, 6 January 2018

बजट : मोदी के पास आखिरी मौका

जनवरी का महीना आते ही नया साल तो प्रारम्भ होता ही है किन्तु बीत रहे कारोबारी साल और नए वित्तीय वर्ष के लिए प्रस्तुत होने वाले केंद्रीय आम बजट को लेकर समीक्षा, आकलन और अनुमान का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। गत दिवस संसद के शीतकालीन सत्र के समापन के बाद 2017-18  के लिए विकास दर 6.5ज् रहने का अनुमान लगाया गया है जो 2016-17 की 7.1ज् से 0.6च् कम है। इसके लिए 2016 की नोटबन्दी के बाद 2017 में लागू जीएसटी को जिम्मेदार माना जा रहा है। 8 नवम्बर 2016 की रात अचानक घोषित नोटबन्दी ने पूरे देश में हलचल मचा दी थी। उसके बाद कई महीनों तक उद्योग-व्यवसाय ठप्प रहे। बाज़ार में नगदी गायब होने से विकास के पहिये थम गये। उस स्थिति से उबरने में कई महीने लगे। इसी दौरान जीएसटी का हल्ला मचने लगा। उसके प्रावधानों को लेकर व्याप्त अनिश्चितता ने उत्पादन क्षेत्र में गतिविधियां शिथिल कर दीं जिसकी वजह से पहली और दूसरी तिमाही में विकास दर के आंकड़े 6च् से भी नीचे आ गए। इस कारण मोदी सरकार के आर्थिक प्रबंधन पर सवाल उठने लगे। दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था में गिरावट निश्चित रूप से चौंकाने वाली बात थी। यद्यपि नोटबन्दी और जीएसटी दोनों के पीछे सरकार की नीयत में कोई संदेह नहीं किया जा सकता लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि इन कदमों का दूरगामी फायदा जो भी हो लेकिन तात्कालिक तौर पर तो ये अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित हुए । इनके कारण मोदी सरकार की लोकप्रियता में आई गिरावट का असर गुजरात में भाजपा की फीकी जीत के तौर पर दिखाई भी दे गया। बहरहाल यदि वर्तमान वित्तीय वर्ष में विकास दर 6.5ज् रहती है तो उसे संतोषजनक मानना गलत नहीं होगा। इसकी वजह अप्रैल से सितंबर के बीच आई गिरावट में सुधार के लक्षण दिखना है। वरना आंकड़ा 6च् से नीचे ही रहता। जीएसटी लागू होने के बाद धीरे-धीरे उत्पादन और निर्माण क्षेत्र की स्थिति जिस तरह सुधर रही है उसने पहली छमाही में आई गिरावट की काफी हद तक भरपाई कर दी। यही वजह है कि 2018-19 के लिए लगाए जा रहे अनुमानों में विकास दर एक बार फिर 7ज् से उपर जाने के आसार बन रहे हैं। वर्तमान वित्तीय वर्ष की आखिरी छमाही में उसका 7ज् रहना उम्मीदों को फिर जवान कर रहा है। इसके पीछे ठोस आधार भी है। पूंजी बाजार ने तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी जिस तरह का धैर्य और उत्साह दिखाया उससे अर्थव्यवस्था की सेहत में जोरदार सुधार के आसार बढ़े हैं।  भारतीय रुपये की विनिमय दर में काफी स्थिरता देखी जा रही है। विदेशी मुद्रा का भण्डार निरन्तर आसमान छू रहा है। कारोबारी जगत में विश्वास लौटने की वजह से निवेश के क्षेत्र में भी उत्साह देखा जा रहा है जिसका प्रमाण निजी निवेश में दोगुनी वृद्धि होना है। गत वर्ष मानसून की बेरुखी से कृषि क्षेत्र की रफ्तार भी धीमी रही जिसने विकास दर के आंकड़े को बढऩे से रोक दिया। चूंकि नोटबन्दी और जीएसटी से कारोबार और बाज़ार दोनों उबरने की स्थिति में आ चुके हैं इसलिए 2017-18 में विकास की दर 6.5ज् के आंकड़े तक पहुंचने जा रही है।  अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और रेटिंग एजेंसियों ने भी 2018-19 में आर्थिक मोर्चे पर भारत के बेहतर प्रदर्शन की भविष्यवाणी करते हुए उसके द्वारा अनेक विकसित देशों को पीछे छोडऩे की उम्मीद जताई है। यद्यपि जीएसटी के रूप में राजस्व के आंकड़े कम होने से केंद्र सरकार को 50 हज़ार करोड़ का कर्ज लेना पड़ गया वहीं पेट्रोल-डीजल महंगा होने से भी सरकार पर बोझा बढऩे की आशंका है। लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक जीएसटी को लेकर आईं व्यवहारिक और व्यवस्थाजनित  परेशानियाँ धीरे-धीरे जिस तरह दूर होती जा रही हैं उनसे आगामी वित्तीय वर्ष में आर्थिक मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीदें बढ़ चली हैं। चूंकि 2018 और 2019 में प्रधानमंत्री पर कुछ राज्यों में विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव जिताने की जिम्मेदारी रहेगी इसलिए ये उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि 1 फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली जो वार्षिक बजट पेश करेंगे उसमें रियायतों और सौगातों की भरमार रहेगी। सबसे अधिक जोर ग्रामीण विकास और कृषि पर रहने की उम्मीद है क्योंकि पूरे देश में किसानों की नाराजगी से केंद्र सरकार अच्छी तरह वाकिफ  है। वहीं जीएसटी की दरों में कमी और युक्तियुक्तकरण के प्रति भी कारोबारी जगत आशान्वित है। चूंकि हमारे देश में अर्थशास्त्र अपनी स्वाभाविक चाल की बजाय राजनीतिक नफे नुकसान से नियंत्रित-निर्देशित होता है इसलिये मोदी सरकार के लिए भी आगामी बजट अच्छे दिन आने वाले हैं, की गारंटी देने का आखिरी अवसर होगा। बीते साढ़े तीन साल में देश के हर वर्ग ने लगातर झटकों के बाद भी नरेंद्र मोदी पर अपने विश्वास को चन्द अपवाद छोड़कर बनाए रखा है। आम हिंदुस्तानी मानता है कि उनकी नीयत में खोट नहीं है। लेकिन ये स्थिति आगे भी जारी रहेगी ये कह पाना कठिन है क्योंकि आम जनता एक हद के बाद किसी को मोहलत नहीं देती। भाजपा और श्री मोदी को ये याद रखना चाहिये कि 2003 के अंत में मप्र सहित कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को लोगों ने हटा दिया क्योंकि उसके द्वारा शुरु किये अच्छे कार्यों के परिणाम वास्तविकता के धरातल पर नहीं उतर सके। और फिर अटल जी तथा श्री मोदी की छवि में भी ज़मीन आसमान का फर्क है। श्री वाजपेयी के विरुद्ध व्यक्तिगत तौर पर बोलने की हिम्मत उनके घोर विरोधी भी नहीं कर पाते थे जबकि श्री मोदी के बारे में छुटभैये तक जो मुंह में आता है बोलते सुने जा सकते हैं। ये देखते हुए अर्थव्यवस्था में सुधार के ताजा संकेतों के बाद भी केंद्र सरकार को कुछ ऐसे कदम उठाना चाहिए जिससे सबका साथ, सबका विकास का वायदा वास्तविकता में बदल सके ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 5 January 2018

काँग्रेस फिर वही गलती दोहरा रही

हर पार्टी की अपनी नीति होती है। समय की मांग पर  रणनीति के तहत उसमें थोड़ा लचीलापन भी लाना होता है लेकिन तीन तलाक़ विधेयक पर कांग्रेस की अस्पष्ट रणनीति समझ से परे है। बीते सप्ताह लोकसभा में उक्त  विधेयक को पारित कराने में उसने केंद्र सरकार का साथ दिया था। यद्यपि विधेयक को प्रवर समिति के विचारार्थ भेजने की मांग वहां भी उसकी ओर से की गई और तीन तलाक़ देने वाले को जमानत का अधिकार देने की बात भी उठाई किन्तु सिद्धांत: पार्टी ने विधेयक का समर्थन किया। उस वजह से उसके विरोध में केवल दो वोट पड़े। मुस्लिम महिलाओं की दशा सुधारने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर उठाए गए इस कदम की मुस्लिम महिलाओं ने दिल खोलकर सराहना की लेकिन धार्मिक नेताओं ने आसमान सिर पर उठाने में कोई संकोच नहीं किया और विधेयक को शरीया के खिलाफ  बताते हुए इस्लाम विरोधी निरूपित करने में पूरी ताकत झोंक दी। हालांकि मुस्लिम पुरुषों ने खुलकर कुछ नहीं कहा क्योंकि उनका पक्ष तो मुल्ला मौलवियों ने जोरदारी से रख दिया था। लोकसभा में कांग्रेस ने चूंकि बिना विरोध के विधेयक पारित करवा दिया इसलिये उम्मीद बनी थी कि राज्यसभा में भी वह समर्थन दे देगी जिससे तीन तलाक़ को दंडनीय अपराध बनाने वाला नया कानून अस्तित्व में आकर मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक स्थिति को सुधारने का जरिया बन सकेगा। 2018 की शुरुवात एक बड़े सामाजिक सुधार से होने से अन्य धर्मों से जुड़ी कुरीतियों को खत्म करने का रास्ता खुलने की उम्मीद भी जागने लगी थी। लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस ने जिस तरह से कदम पीछे खींचे उसके कारण संसद के मौजूदा सत्र में विधेयक का पारित होना असम्भव हो गया। चूंकि उच्च सदन में भाजपा अल्पमत में है इस वजह से बिना विपक्ष के सहयोग के वह लाचार होकर रह गई है। पहले तो कांग्रेस ने विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की जिद पकड़ी जिसे तकनीकी आधार पर सरकार ने नहीं माना। उसके बाद अब कांग्रेस और शेष विपक्ष कतिपय संशोधनों को लेकर अड़ गया है। इस वजह से गत दो दिनों से राज्यसभा में इस विधेयक पर चर्चा नहीं हो सकी। आज सत्र का आखिरी दिन है जिसमें कोई निर्णय हो पाना नामुमकिन लगता है। इस तरह अगले सत्र में ही इस पर विचार हो सकेगा किन्तु राज्यसभा की जो स्थिति है उसमें सरकार के पास बहुमत आने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। यहां तक कि  भाजपा की सहयोगी तेलुगु देशम तक इस मसले पर विपक्ष के साथ खड़ी हो गई। अब प्रश्न ये है कि आखिर लोकसभा में समर्थन के बाद कांग्रेस ने राज्यसभा में अपने रवैये में परिवर्तन क्यों किया और इसका उत्तर है मुस्लिम वोट बैंक। कांग्रेस को लग रहा है कि यदि विधेयक पारित हो गया तो उससे मुस्लिम महिलाएं भाजपा समर्थक बन जाएंगीं वहीं पुरुष भाजपा से नाराज बने रहने के साथ-साथ कांग्रेस से भी दूर हो सकते हैं। मुस्लिम धर्मगुरुओं की इकतरफा नाराजगी देखते हुए कांग्रेस को लगा कि वह विधेयक को पारित होने से रोककर मुस्लिम वोट बैंक को पूरी तरह बिखरने से रोक सकेगी। विधेयक को प्रवर समिति भेजने का सीधा -सीधा अर्थ उसे ठंडे बस्ते में डालना होगा। महिला आरक्षण विधेयक का हश्र इस संदर्भ में  उल्लेखनीय है। अन्य विपक्षी दल भी केवल मुस्लिम धर्मगुरुओं को खुश करने के लिए विधेयक को टांगने के पक्षधर हैं, उनको भी यही डर सताने लगा है कि मुस्लिम महिलाओं के मत थोक के भाव भाजपा के हिस्से में न चले जाएं। कुल मिलाकर विपक्ष द्वारा मुस्लिम समाज के भीतर एक बड़े सुधार की प्रक्रिया को पलीता लगाने का चिर- परिचित खेल फिर चल पड़ा है जिसका नेतृत्व वही कांग्रेस कर रही है जिसके हाथ तीन दशक से भी पहले शाहबानो प्रकरण में झुलस चुके थे। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा गुजरात चुनाव के दौरान मन्दिरों के दर्शन से ये एहसास हुआ था कि पार्टी को मुस्लिम तुष्टीकरण के नुकसान महसूस होने लगे हैं। 2014 की ऐतिहासिक पराजय के बाद एंटोनी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस की हिन्दू विरोधी छवि को हार की वजह बताया था। ऐसा लगा मानों राहुल को हिंदुत्व का महत्व समझ में आने लगा है। उप्र में अखिलेश यादव से हुए गठबंधन का कोई लाभ न मिलना भी वे भूले नहीं होंगे किन्तु तीन तलाक़ विधेयक पर लोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग नीति अपनाकर पार्टी ने अपनी निर्णय शून्यता को फिर उजागर कर दिया। यदि वह इस विधेयक पर सरकार के साथ हर तरह से खड़ी हो जाती तब भाजपा को उसका राजनीतिक लाभ पूरा-पूरा नहीं मिल पाता। लेकिन कांग्रेस की ढुलमुल रणनीति ने एक बार फिर उसकी स्थिति दयनीय बना दी है। राहुल गांधी किसी भी अभियान की अच्छी शुरुवात के बाद दिशाहीन क्यों हो जाते हैं ये राजनीतिक विश्लेषकों के लिए बड़ा और विचारणीय मुद्दा है। तीन तलाक़ विधेयक लोकसभा में पारित करवाकर भाजपा ने अपने खाते में मुस्लिम महिलाओं के रूप में अतिरिक्त मत अर्जित कर लिए लेकिन कांग्रेस और शेष विपक्ष ने हाथ आया अवसर गंवाकर भाजपा के मन की मुराद को पूरा कर दिया।

-रवीन्द्र वाजपेयी