Monday, 5 February 2018

करोड़पतियों का पलायन चिंता का विषय


काम की तलाश में लोगों का परदेस जाना तो सामान्य बात है। अच्छी शिक्षा, शोध और बेहतर अवसरों की तलाश में भी बहुत लोग अपना वतन छोड़कर चले जाते हैं। उनमें से कुछ की घर वापिसी भी होती है और कुछ वहीं बसकर रह जाते हैं। इसी कारण ब्रिटिश राज के दौरान पानी के जहाजों में भरकर मॉरीशस, फिजी और कैरिबियन द्वीप समूह में मजदूर बनाकर ले जाए गए भारतीय अब वहां के नागरिक हैं और कुछ तो राष्ट्रप्रमुख तक बन गए। आजादी के बाद से वह परिपाटी तो खत्म हो गई किन्तु बेहतर शिक्षा, ज्यादा कमाई और बेहतर जीवन की तलाश में लाखों भारतीय विदेश जा बसे। खाड़ी देशों में पेट्रो डॉलर से आई समृद्धि के चलते शुरू हुई विकास की होड़ ने भारतीय श्रमिकों और तकनीशियनों को रोजगार का अच्छा अवसर दिया। दुबई में तो भारतीयों की भरपूर उपस्थिति है। कई अफ्रीकी देशों में गुजराती मूल के अप्रवासी कई पीढिय़ों से रह रहे हैं। ब्रिटेन - अमेरिका में बसे भारतीय न सिर्फ  सेवाओं और उद्योग-व्यवसाय अपितु राजनीति में भी जमकर दखलन्दाजी करते हुए अपनी जगह बनाते जा रहे हैं। कैनेडा तो दूसरा पंजाब बन गया है। इन्हीं सबके कारण भारतीय अब विश्व समुदाय (ग्लोबल कम्युनिटी) के रूप में जाने जाते हैं। पृथ्वी के हर हिस्से में कहीं कम तो कहीं ज्यादा उनकी मौजूदगी ने विश्व में भारत को पहिचान और सम्मान दोनों दिलवाए तथा सपेरों और मदारियों के देश की बजाय भारत ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में बराबरी से बैठने की स्थिति में आ गया। शिक्षा, प्रबंधन, विज्ञान, तकनीकी और कम्प्यूटर सहित किसी भी क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर भारतवंशियों की प्रभावशाली उपस्थिति गौरवान्वित तो करती है किंतु प्रतिभा पलायन से होने वाले नुकसान को भी उजागर कर रही है। पहले केवल विदेशी कम्पनियों के भारत में आकर पाँव जमाने जैसी स्थिति हुआ करती थी लेकिन मुक्त अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण के कारण अनेक भारतीय उद्योगपतियों ने विदेशी कम्पनियों का अधिग्रहण कर अपनी धाक जमाई। देश में विदेशी पूंजी के बढ़ते प्रवाह के साथ-साथ भारत से भी धन विदेशों में निवेशित होने लगा। इसमें स्विस एवं अन्य विदेश बैंकों में छुपाकर रखा गया काला धन शामिल नहीं है। बीते कुछ वर्षों में भारत के भीतर अरबपतियों की संख्या में तेजी से वृद्धि होने को आर्थिक मोर्चे पर आ रही समृद्धि के तौर पर देखा जा रहा है। धनकुबेरों का सर्वेक्षण कऱने वाली संस्थाएं अब भारत के अरबपतियों को भी अपनी सूची में स्थान देने लगी हैं।  देश में पूंजी लगाने हेतु भारतीय अप्रवासी और विदेशी निवेशकों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लाल कालीन बिछाए जाने के कारण भी बड़ी संख्या में निवेशक भारत में कारोबार जमाने आ रहे हैं। शेयर बाजार विदेशी पूंजी से लबालब होता जा रहा है। लेकिन इस सबके बावजूद एक खबर ने ध्यान खींचा कि 2017 में 7 हज़ार करोड़पति देश से जाकर अन्य देशों में स्थायी रूप से बस गए। उसके पहले के 2 सालों में भी क्रमश: 6 और 5 हज़ार करोड़पति परदेस जा बसे। ये केवल भारत में होता हो ऐसा नहीं है। पड़ोसी चीन इस मामले में भारत से आगे है। विकसित देशों से भी सम्पन्न लोग दूसरे देशों में जाकर बसते हैं लेकिन संभावनाओं का देश माने जा रहे भारत से हज़ारों की सँख्या में करोड़पतियों का बाहर चला जाना चौंकाता है। यद्यपि इसके पीछे निजी कारण भी होते हैं किंतु ऐसे लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है जिन्हें भारत में कारोबार करना झंझटों से भरा लगने लगा है। प्रधानमंत्री ने नव उद्यमियों के लिए चाहे जितने अवसर उत्पन्न किये हों लेकिन नौकरशाही की बेढंगी चाल के कारण अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करने वालों को दौड़ा-दौड़ाकर थका देने का चिर-परिचित खेल जारी है। विदेशों में पढ़-लिखकर स्वदेश प्रेम से प्रेरित होकर लौटे अनेक उद्यमी भी निराश होकर लौटते देखे जाते हैं। कई अप्रवासी भारतीय अपने परिजनों को विदेश आकर बस जाने हेतु भी प्रेरित कर लेते हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील देश से यदि हजारों करोड़पति प्रतिवर्ष विदेश जाकर बसते जा रहे हैं तो इसे हवा में उड़ाना ठीक नहीं होगा। भारत सरकार को इसकी वास्तविक वजह पता करनी चाहिए। हालांकि ये किसी व्यक्ति का अधिकार है कि वह किस देश में जाकर रहे या बसे लेकिन काम की तलाश में बाहर गया भारतीय तो कमाई कर यहां भेजता है वहीं किसी सम्पन्न व्यक्ति द्वारा अपना समूचा कारोबार समेटकर चले जाना देश का नुकसान है और उस लिहाज से हजारों करोड़पतियों का पलायन राष्ट्रीय चिंता का विषय होना चाहिए। नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि और प्रतिष्ठा में जिस तरह वृद्धि की उसे देखते हुए करोड़पतियों का देश छोडऩा शुभ संकेत कतई नहीं है। ये कह देना सही नहीं होगा कि अमेरिका से भी धनकुबेर दूसरे मुल्कों में जाकर बसते रहे हैं क्योंकि भारत अभी विकास के उस स्तर तक नहीं पहुंचा है। अप्रवासी भारतीयों में अपने वतन के प्रति अनुराग उत्पन्न करने के लिए सरकारी स्तर पर नियमित प्रयास होते हैं। उन्हें तरह-तरह की सुविधाएं एवं प्रलोभन दिए जाते हैं तब भारत में रहकर करोड़ों कमाने वाले अपनी मातृभूमि त्यागकर क्यों जा रहे हैं उनके कारणों का गम्भीरता से अध्ययन कर इस चलन को रोकने का सार्थक प्रयास होना चाहिए। आजकल बड़ी कंपनियों में नौकरी छोड़कर जाने वाले से अत्यंत विनम्रता से पूछा जाता है कि उसे प्रतिष्ठान में क्या कमी महसूस हुई जिससे वह जा रहा है। इसे एग्जि़ट इंटरव्यू कहा जाता है। देश छोड़कर जा रहे करोड़पति देशवासी से भी इस तरह की पूछताछ की जानी चाहिए जिससे पता तो चले कि वह किस वजह से अपनी जन्मभूमि को अलविदा कहने मजबूर होता है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 3 February 2018

राजनीतिक आकाश पर अनिश्चितता के बादल

शेयर बाज़ार टूट गया। निवेशकों के करोड़ों डूब गए। राहुल गांधी ने इसे बजट के प्रति अविश्वास बताकऱ गलत नहीं किया। मध्यम वर्ग भी नाखुश है। जिस तबके को बजट में सौगातें दी गईं उसे भी ये नहीं पता कि उस पर कृपा कब तक बरसेगी। कम खुशी और ज्यादा गम के माहौल में ये खबर भी आ गई कि आंध्र में भाजपा की सहयोगी तेलुगु देशम भी कोप भवन में जा बैठी है। शिव सेना पहले ही सम्बन्ध विच्छेद का नोटिस भेज चुकी है जिस पर उसका कहना है कि कमान से निकला तीर वापिस नहीं आने वाला। गुजरात में फीके प्रदर्शन के बाद राजस्थान के तीनों उपचुनाव हार जाने के कारण भाजपा की सम्भावनाओं पर नए - नए प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं । पुरानी कहावत है केंद्रीय सत्ता के कमजोर होते ही सूबे सिर उठाने लगते हैं। उप्र चुनाव के बाद प्रधानमंत्री और भाजपा के अपराजेय होने की अवधारणा एकाएक बदलने लगी तो इसके पीछे के कारणों का विश्लेषण होना चाहिए क्योंकि 2019 के महासंग्राम के पहले 2018 में  लगातार कई राज्यों के चुनाव होने वाले हैं। पिछले दिनों दो टीवी चैनलों के सर्वेक्षण आए थे। उनमें राष्ट्रीय स्तर पर  जनमत का जो रुझान बताया गया उसके मुताबिक यदि आज चुनाव हो जाएं तो भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को कमोबेश फिर 2014 जैसा बहुमत मिल जाएगा। लेकिन उसके बाद पहले उद्धव ठाकरे और अब चंद्राबाबू नायडू ने भी जिस तरह भाजपा से कुट्टी कर ली उससे उन लोगों को इन सर्वेक्षणों की प्रामाणिकता पर संदेह करने का अवसर मिल रहा है जो सदैव उन्हें प्रायोजित बताया करते हैं। गुजरात चुनाव के बाद आत्मविश्वास से लबरेज राहुल गांधी ने नया नारा बस एक साल और लगाना शुरू कर दिया है। सोनिया गांधी भले कांग्रेस अध्यक्ष पद से निवृत्त हो गई हों किन्तु दो दिन पूर्व 17 विपक्षी नेताओं को एक साथ बिठाकर उन्होंने  भाजपा विरोधी मोर्चा पुनर्जीवित करने का जो प्रयास किया उससे दो बातें सामने आईं। अव्वल तो ये कि कांग्रेस जान चुकी है कि अपनी दम पर नरेंद्र मोदी का मुकाबला करना उसके बस में नहीं है वहीं दूसरी बात ये कि अभी भी शेष विपक्ष राहुल के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए एकमत नहीं है। हाल ही में सीपीएम पोलित ब्यूरो द्वारा कांग्रेस के संग गलबहियां करने से इंकार कर दिए जाने से भी विपक्ष की एकजुटता पर संदेह के बादल मंडराने लगे थे किन्तु शिवसेना का भाजपा को तलाक का नोटिस और चंद्रा बाबू नायडू की तिरछी चाल से कांग्रेस को 2019 में उम्मीद की किरणें दिखाई देने लगी हैं। भाजपा ने हालांकि पूर्वोत्तर में अपनी पकड़ बनाई है जिसका प्रमाण बंगाल के चुनावों में उसका दूसरे स्थान पर आ जाना है किंतु अभी भी ममता बैनर्जी रुपी चक्रवात का कोई तोड़ उसके पास न होने से बंगाल से बहुत उम्मीदें पार्टी को नहीं हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर के समस्त राज्य मिलकर भी मोदी लहर को पुनर्जीवित करने में सहायक नहीं हो सकेंगे। दरअसल भाजपा की मुसीबत ये है कि उन राज्यों में जहां कांग्रेस से उसका सीधा मुकाबला है, उसकी पकड़ कमजोर पड़ी है। लेकिन इसी तरह कांग्रेस की भी दिक्कत ये है कि उप्र, बिहार, बंगाल, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में उसका जनाधार न के बराबर है। उप्र में अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव के कटु अनुभव के बाद दोबारा राहुल के साथ मिलने से कतराते हुए चुनाव आने पर ही बातचीत करने की कहकर कन्नी काटते दिख रहे हैं वहीं बसपा भी अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को लेकर सजग है। बिहार में लालू के जेल जाने से कांग्रेस की आशाएं भी धूमिल हो चली हैं वहीं बंगाल में ममता को किसी की जरूरत नहीं है। उनके मन में ये बात बैठ गई है कि तीस-पैंतीस सांसद जिताकर वे प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं। तमिलनाडु इस समय अनिश्चितता में फँस गया है । जयललिता की मौत और करुणानिधि के शरशैया पर होने से उपजे शून्य को भरने कमल हासन और रजनीकांत जैसे नए चेहरे सामने आ रहे हैं जो किसके साथ और किसके खिलाफ जाएंगे ये फिलहाल अनिश्चित है। इन स्थितियों में तो गर्मियों में होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव पर भाजपा और कांग्रेस का भविष्य टिक गया है। यदि कांग्रेस अपना ये राज्य बचा ले गई तो बाकी विपक्ष भी उसके झंडे तले आने में नखरे नहीं दिखाएगा वहीं भाजपा के लिए मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान बचाना भी कठिन होगा जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव पर पडऩा अवश्याम्भावी है लेकिन भाजपा अगर कर्नाटक जीत लेती है तब श्री मोदी जैसा कहा जा रहा है लोकसभा के मध्यावधि चुनाव रुपी जुआ खेल सकते हैं। रही बात शिवसेना और तेलुगु देशम की तो वे दोनों एनडीए से अलग होने पर भी कांग्रेस से हाथ शायद ही मिलाएं क्योंकि दोनों का डीएनए पूरी तरह विरोधी  है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि केंद्र में स्थिर सरकार होने के बाद भी राजनीतिक स्तर पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं तो इसके लिए भाजपा ही दोषी कही जाएगी जो प्रभावक्षेत्र बढ़ाने के फेर में अपने परंपरागत गढ़ों में कमजोर होती दिख रही है । मोदी सरकार कितना भी अच्छा और देशहित का काम कर रही हो किन्तु उसकी नीतियां या तो लोगों को आश्वस्त नहीं कर पा रहीं या फिर उनका क्रियान्वयन अपेक्षित तरीके से नहीं हो पा रहा। यद्यपि ये कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा नामक जहाज के डूबने का अंदेशा होने से समर्थक रूपी चूहे कूदने लगे हैं किंतु ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि वर्तमान स्थिति में भाजपा और नरेंद्र मोदी अपने प्रतिबद्ध समर्थकों को भी ये समझाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं कि अच्छे दिन आने का वायदा पूरा हो रहा है। दूरगामी फायदे वाले काम करना नि:सन्देह देशहित में होता है किंतु व्यवहारिकता के धरातल पर देखें तो भूखे व्यक्ति को खेत का पट्टा देकर बीज देने से उसकी तात्कालिक जरूरत पूरी नहीं होती और यही फिलहाल लोगों की नाराजगी की वजह है जिसके कारण एक मजबूत संगठन और दबंग-मेहनती नेता होने के बावजूद भाजपा को लेकर लोगों के उत्साह में कमी आई है। यदि यही स्थिति बनी रही तब 2019 में फिर एक बार देश त्रिशंकु की स्थिति में फंस सकता है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 2 February 2018

बजट : गाँव और गरीब में नए जनाधार की तलाश


मोदी सरकार ने अपने अंतिम पूर्ण बजट में जिस तरह अपने लक्ष्यों की दिशा बदल दी वह रणनीति है या हड़बड़ी में उठाया कदम ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि प्रधानमंत्री ने भाजपा के परंपरागत जनाधार को शहरी मध्यमवर्ग से गांव और गरीब तक विस्तारित करने का महत्वाकांक्षी दांव चला है। जीएसटी लागू होने के बाद पेश हुए पहले आम बजट में सस्ता-महंगा वाली उत्सुकता तो थी भी नहीं इसलिए आम जनता उस तरफ से बेफिक्र थी। अब बची नीतिगत घोषणाएं और विभिन्न मदों में राशि का आवंटन। वित्त मंत्री अरुण जेटली को सम्पन्न वर्ग का हितचिंतक और खड्डूस किस्म का व्यक्ति माना जाता रहा है। बीते चार बजट में उनकी झोली से शहरी मध्यम वर्ग और किसानों को ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिससे अच्छे दिन का एहसास हो पाता। भाजपा के भीतरखानों में भी ये कहा जाने लगा था कि मोदी सरकार की लोकप्रियता की गिरावट में सबसे ज्यादा योगदान वित्तमंत्री का है। बीते कुछ समय से ये एहसास भी प्रबल होने लगा था कि केंद्र सरकार के आशानुरूप प्रदर्शन न कर पाने की वजह से  कांग्रेस का पुनरूत्थान होने लगा है। गुजरात चुनाव ने प्रधानमंत्री के दबदबे में कमी के संकेत दिए जिसकी पुष्टि गत दिवस राजस्थान के तीन उपचुनाव परिणामों ने भी कर दी। ऐसे में उम्मीद की जा रही थी कि इस वर्ष होने जा रहे कई राज्यों के विधानसभा और फिर अगले वर्ष लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मोदी सरकार का ये बजट सौगातों की बौछार लेकर आएगा लेकिन वित्तमंत्री का भाषण खत्म होते-होते तक भाजपा के भीतरखानों में भी आश्चर्य और मायूसी छा गई। जिन शहरी क्षेत्रों ने गुजरात में पार्टी की नैया पार लगाई उसमें रहने वाले नौकरीपेशा वर्ग को श्री जेटली ने ठेंगा दिखा दिया। न आयकर छूट की सीमा बढ़ी और न ही और कुछ मिला। जो थोड़ा सा दिया वह घुमा फिराकर वापिस भी ले लिया। सवाल ये है कि अपने सबसे पुख्ता समर्थक वर्ग को पूरी तरह निराश ही नहीं अपितु नाराज करने का जोखिम उठाने के पीछे की सोच क्या थी और इसका उत्तर बजट के उन हिस्सों से मिला जिनमें गांव और गरीब के साथ-साथ उद्योग-व्यवसाय पर पूरा ध्यान केंद्रित कर दिया गया। वित्तमंत्री ने नौकारीपेशा वर्ग को तो जमकर निराश किया लेकिन उन बुजुर्गों, खासकर रिटायर्ड की आंखों में चमक ला दी जो अपनी जीवन भर की कमाई बैंक में रखते हैं किंतु 10 हज़ार से ज्यादा ब्याज पर स्रोत पर ही आयकर कटौती से परेशान थे। बजट में 50 हजार तक के ब्याज को करमुक्त करने तथा वरिष्ठ नागरिकों को इलाज पर होने वाले खर्च को आयकर से घटाने की सीमा बढ़ाने से भी एक नया वर्ग मोदी सरकार से उपकृत हो गया है। सरकारी एवं अर्ध सरकारी उपक्रमों से निवृत्त लोगों को आजकल मोटी भरकम मिलती है। उस दृष्टि से वरिष्ठ नागरिकों को दी जाने वाली सुविधाएं स्वागतयोग्य हैं किन्तु दीर्घकालिक निवेश में पूंजीगत लाभ और म्यूचल फंड की आय पर कर लगाकर वित्तमन्त्री ने बचत करने वालों को क्यों निराश किया ये रहस्यमय है जिसका कोई संतोषजनक उत्तर किसी के पास नहीं है। बहरहाल 250 करोड़ तक के टर्नओवर वाली कंपनियों के कारपोरेट टैक्स में 5 प्रतिशत की कमी बड़ा कदम है जो कारोबारी जगत को राहत देने वाला है। इसी तरह कृषि से जुड़ी चीजें बनाने वाले उद्योगों को दी गई कर छूट भी सही कदम है। लेकिन सबसे बढ़कर बजट का पूरा फोकस गरीबों और गांवों पर ही रखा गया। 10 करोड़ गरीब परिवारों को 5 लाख सालाना तक के नि:शुल्क इलाज की मोदी केयर नामक स्वास्थ्य बीमा योजना से देश की 40 प्रतिशत आबादी को जबरदस्त लाभ होगा और यही इस बजट का सबसे बड़ा क्रान्तिकारी पहलू है जो मोदी सरकार फिर एक बार के नारे को मूर्तरूप प्रदान करने का प्रयास है। यदि इसको भ्रष्टाचार से बचाते हुए सही ढंग से लागू कर दिया गया तो ये साधनहीन लोगों के जीवन में बड़े सुधार का कारण बन सकेगा। मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन और गरीबों के घर बिजली पहुंचाने  जैसी घोषणाएं भी एक बड़े वोट बैंक तक भाजपा की पहुंच बढ़ाने की कोशिश है। खरीफ फसल के लिए डेढ़ गुना खरीद मूल्य तथा आलू-टमाटर के उत्पादकों को सहायता देने के प्रावधान भी उचित कदम कहा जायेगा। कुल मिलाकर बजट अर्थशास्त्र से ज्यादा चुनाव के मद्देनजर उस नए राजनीतिक दर्शन से प्रेरित है जिसमें शहरी चमक से बचते हए गाँव और गरीब के रूप में असली भारत के महत्व को स्वीकार करने का समझदारी भरा प्रयास है। मोदी सरकार के ऊपर अब तेजी से परिणाम देने का दबाव है। जनता की नाराजगी रह-रहकर सामने आना प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में उतार का संकेत है। बजट के जरिये नरेंद्र मोदी ने अडानी-अम्बानी के हितचिंतक होने के आरोप से बचने और भाजपा के शहरी जनाधार वाली पार्टी के ठप्पे को धोने की जो कोशिश की है वह कितनी सफल होगी ये इस बात और निर्भर करेगा कि जिस नौकरशाही पर बजट की सौगातों को बांटने का दायित्व होता है वह कितनी ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ है। यदि उसे ठीक से निर्देशित और नियंत्रित नहीं किया गया तब सारी घोषणाएं हवा-हवाई होकर रह जाएंगी। अब तक के अनुभव तो यही बताते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 1 February 2018

पीडीपी को तीन तलाक़ देने का साहस दिखाए भाजपा


कश्मीर घाटी में सेना की गोली से कुछ पत्थरबाजों के मारे जाने से उत्पन्न तनाव नया मोड़ लेता जा रहा है। बीते दिनों शोपियां में फौजी काफिले पर पत्थरबाजी की गई। उपद्रवी तत्वों ने सैन्य दल को घेरकर हथियार छीनने की कोशिश भी की। आत्मरक्षार्थ सेना द्वारा चलाई गई गोली से तीन लोग मारे गए। बीते वर्ष फौज द्वारा की गई सख्ती से पत्थरबाजी की घटनाएं काफी कम हो गईं थीं। पैलेट गन के उपयोग से हज़ारों युवक अंधे एवं विकलांग हो गए वहीं दर्जनों मर भी गए। बात संसद से सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंची। पैलेट गन का विकल्प तलाशने कहा गया। हज़ारों लोगों पर मुकदमे हुए और सैकड़ों जेल भेजे गए। सुरक्षा बलों की आक्रामक कार्रवाई के चलते सैकड़ों आतंकवादियों के एनकाउंटर में मारे जाने से घाटी के उपद्रवग्रस्त जिलों के हालात काफी सामान्य होने लगे थे। फौज को केंद्र सरकार द्वारा दिया गया खुला हाथ प्रभाव छोडऩे में सफल हुआ। नोटबन्दी के बाद अलगाववादियों को मिलने वाली आर्थिक सहायता के रास्ते भी अवरुद्ध हुए जिससे सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर भी नियंत्रण हो सका। राज्य सरकार का सहयोग होने से पुलिस भी सैन्य बलों के साथ सक्रिय हुई जिससे अलगाववादियों के हौसले पस्त होने लगे। कुल मिलाकर हालात काबू में आकर सुधरते दिख रहे थे। बीच में एक घटना हुई जिसमें पत्थरबाजों से सैन्य दल को बचाने के लिये एक स्थानीय युवक को सेना की जीप के बोनट पर बांधकर बिठा दिया गया। उस तरीके पर भी खूब चिल्लपों हुई। उस कृत्य का आदेश देने वाले फौज के अधिकारी को मानवाधिकार उल्लंघन का दोषी मानकर कार्रवाई का दबाव भी बनाया गया लेकिन केन्द्र सरकार और सेना के उच्च अधिकारियों ने अपने अफसर का खुलकर बचाव किया। उस तरीके को कांटे से कांटा निकालने के प्रयास के तौर पर देखा गया। उसके कारण सैन्य बलों का मनोबल बढ़ा जिसका प्रभाव स्पष्ट दिखने भी लगा किन्तु गणतंत्र दिवस पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हज़ारों पत्थरबाजों पर दायर मुकदमे वापिस लेने की घोषणा करते हुए सैन्य बलों की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया। यद्यपि केंद्र सरकार ने उस बारे में राज्य सरकार से पूछताछ की है लेकिन उस घोषणा से देश विरोधी तत्वों की खोई हिम्मत फिर से लौट आई जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण शोपियां में सैन्य टुकडिय़ों को घेरकर पत्थरों से किये गए हमले से मिला। सेना के अफसरों ने पत्थरबाजों को समझाने का भरपूर प्रयास किया लेकिन भीड़ के आक्रामक होने के बाद आत्मरक्षार्थ गोली चलाने की मजबूरी बन गई जिसमें तीन लोग मारे गए। उसके बाद राज्य सरकार ने एक मेजर के विरुद्ध  हत्या की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। दूसरी तरफ  केंद्र सरकार और सेना पूरी तरह से उक्त मेजर के साथ खड़ी हो गई। गत दिवस सेना की ओर से भी जवाबी रिपोर्ट कर दी गई। उधर राज्य विधानसभा में भाजपा सदस्यों ने मेजर के विरुद्ध रिपोर्ट वापिस लेने की मांग की जिसे मुख्यमंत्री ने ठुकराते हुए मजिस्ट्रियल जांच का आदेश दे दिया जिसमें सहयोग हेतु सेना ने भी रजामन्दी व्यक्त कर दी। इस घटना से लम्बे समय बाद सेना पर दबाव बनाने की जो कोशिश हुई उसके पीछे मेहबूबा मुफ्ती की राजनीतिक मज़बूरी भले हो लेकिन पत्थरबाजों पर रहम करने का दुष्प्रभाव जल्दी सामने आने से घाटी के भीतर की आंतरिक स्थिति उजागर हो गई है। जब तक राज्य सरकार, सेना और केन्द्र की कार्ययोजना में सहयोग करती रही, हालात पर नियंत्रण होता दिखा किन्तु ज्योंही मेहबूबा ने पत्थरबाजों को आम माफी का ऐलान किया त्योंही बिल में छिपे सर्प बाहर आकर फुफकारने लगे। थल सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत द्वारा घाटी में सैन्य बल की तैनाती में कमी और सेना को मिले विशेष अधिकार को वापिस लेने से दो टूक इंकार कर देने से जरूर राहत मिली वहीं पत्थरबाजों पर गोली चलवाने के आरोपी मेजर के बचाव की भी सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई किन्तु मेहबूबा मुफ्ती के रुख में अचानक आए बदलाव ने राज्य की आंतरिक राजनीति में बदलाव की जरूरत भी पैदा कर दी है। बीते तकरीबन चार साल तक सत्ता में हिस्सेदार रहने के बाद भाजपा को राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और नौकरशाही के रवैये की भरपूर जानकारी मिल गई होगी। कौन अधिकारी केंद्र के साथ और कौन अलगाववादी मानसिकता का है ये भी काफी कुछ पता चल गया होगा। इस दौरान सेना को मिली छूट से भी घाटी के भीतरी हालात को नियंत्रित करने में मदद मिली लेकिन मुख्यमंत्री ने बिना भाजपा और केंद्र को विश्वास में लिए पत्थरबाजों पर रहम की जो शरारत की जिसका असर भी सामने आ गया तब भाजपा को चाहिये वह औपचारिक विरोध की बजाय अब एक झटके में तीन तलाक देने जैसा साहस दिखाए। भाजपा ने जो भी सोचकर पीडीपी से हाथ मिलाया हो उसका विश्लेषण करने में समय गंवाने के बजाय बेहतर होगा वह मेहबूबा को शुद्ध हिंदी में समझा दे कि अलगाववादी मानसिकता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राजनीतिक मजूबूरी वश बेमेल गठबंधन भारतीय राजनीति की पहचान बन गए हैं किन्तु जब राष्ट्रहित का सवाल खड़ा हो तब राजनीतिक नफे-नुकसान अप्रासंगिक और अवांछनीय होकर रह जाते हैं। जम्मू-कश्मीर के मौजूदा सूरते हाल में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को गम्भीरता और दूरंदेशी का परिचय देते हुए ठोस निर्णय लेना चाहिए। पत्थरबाजी की ताजा घटनाओं से जो संकेत निकलकर आए हैं वे साधारण नहीं है। मेहबूबा मुफ्ती धीरे-धीरे अपने असली रंग में आते दिख रही हैं। ऐसे में अब भाजपा पर सभी की निगाहें लग गई हैं जो कश्मीर को लेकर सदैव संवेदनशील रही है। पीडीपी से गठबंधन घाटी में राष्ट्रवादी राजनीति के बीजारोपण के लिये किया गया था लेकिन यदि परिणाम आशानुकूल नहीं निकल रहे तो नीति और निर्णय को बदलने में देर करना ठीक नहीं होगा। भाजपा के कर्णधारों को ये याद रखना चाहिए कि सही निर्णय भी यदि देर से लिया जाए तो वह किसी काम का नहीं रह जाता। कश्मीर को लेकर अतीत में हुईं गलतियों को दोहराने से बचते हए उन्हें सुधारने का यही सही वक्त है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी