Friday, 9 February 2018

अयोध्या : मसले की दिशा तय होना शुभ संकेत

सर्वोच्च न्यायालय में राम जन्मभूमि विवाद पर नियमित सुनवाई सवा महीने के लिए फिर टल गई । कतिपय दस्तावेजों  के आदान-प्रदान के नाम पर मुख्य न्यायाधीश सहित तीन सदस्यीय पीठ ने अगली  तारीख 14 मार्च तय करते हुए कहा उसके बाद प्रतिदिन सुनवाई के सम्बंध में सोचा जावेगा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये हुई कि अदालत ने पूरे मसले को राजनीति , धर्म और आस्था आधारित मानने से इंकार करते हुए केवल भूमि स्वामित्व के मुद्दे को विचारणीय माना और नए पक्षकारों को शामिल करने से भी इंकार कर दिया । सर्वोच्च अदालत के इस रुख से दोनों पक्षों द्वारा अपनी,-अपनी धार्मिक भावनाएं आहत होने की दलीलें तो रद्दी की टोकरी में चली गईं किन्तु एक सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि अयोध्या में बाबरी ढांचे की जगह राम मंदिर बनाने का मसला यदि केवल भूमि स्वामित्व का विवाद था तो इसे निबटाने में न्यायपालिका को बरस तो छोड़िए इतने दशक क्यों लग गए ? और फिर सर्वोच्च न्यायालय ने रामायण-गीता में दिए तथ्यों का अंग्रेजी अनुवाद क्यों मांगा ? इन ग्रंथों में इस विवाद सम्बन्धी कौन से प्रमाण हैं , ये समझ से परे है । 14 मार्च के बाद सर्वोच्च न्यायालय की पीठ इस मसले पर दैनिक सुनवाई करते हुए इसे निश्चित समय सीमा में हल करने की कोशिश करता है तो ये देश पर बड़ा एहसान होगा क्योंकि इसके कारण राजनीति ही नहीं राष्ट्र जीवन के और भी पहलू प्रभावित हुए हैं । 90 के दशक के उपरांत की राष्ट्रीय राजनीति भी इस विवाद से काफी प्रभावित हुई है । केंद्र और राज्यों की कई सरकारें भी इसकी बलि चढ़ गईं । कुछ दलों और नेताओं को जहां राम मंदिर विवाद ने सामान्य से सम्मान्य बनवा दिया वहीं अनेकों ऐसे भी हैं जिनकी अच्छी भली चलती सियासत पर ग्रहण लग गया । मन्दिर बनवाने और रुकवाने के लिए भी न जाने क्या-क्या जतन उभय पक्षों से हुए । जहां तक बात भूमि स्वामित्व की है तो ये विवाद निचली अदालत में तब से चल रहा था जब सर्वोच्च न्यायालय के तमाम न्यायाधीश और इसके नाम पर नेतागिरी करने वाले अधिकतर लोगों का जन्म तक नहीं हुआ था । यदि उस पर राजनीति के बादल न मंडराए होते तब बड़ी बात नहीं अदालतों की आलमारियों में धूल खा रहे जमीन विवाद के लाखों मामलों की तरह ये भी कहीं दबा पड़ा होता । कुछ बरस पहले हालांकि अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने सम्बन्धी निर्णय देकर  हल निकालने की कोशिश की लेकिन कोई भी पक्ष उसे स्वीकार करने राजी नहीं हुआ तो मामला सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज तक आ पहुंचा । होना तो ये चाहिए था कि वह इसे सर्वोच्च प्राथमिकता के तौर पर निबटाता किन्तु ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि न्यायपालिका भी राष्ट्रीय महत्व के ऐसे संवेदनशील मामलों को लम्बे समय तक अकारण टालती रहती है । गत दिवस पीठ से निकली ये टिप्पणी काबिले गौर है कि केवल भूमि स्वामित्व के दावों और दस्तावेज़ों का ही संज्ञान लिया जावेगा । इसी आधार पर बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनकर  प्रकरण को और पेचीदा बनाने की कोशिश करने वाले बाहरी तत्वों को पक्षकार बनने से अदालत ने रोक दिया ।  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धर्म ,आस्था और उन जैसे भावनात्मक मुद्दों को अप्रासंगिक मान लिए जाने से कम से कम इतना तो हुआ कि प्रकरण की दिशा और सीमाएं तय हो गईं । जहां तक भूमि के मालिकाना हक की बात है तो इसका निबटारा तो दस्तावेजों के आधार पर ही हो सकेगा । हाशिम अंसारी नामक मूल पक्षकार की मृत्यु के उपरांत उप्र के शिया मुस्लिम बोर्ड की तरफ से बयान आया कि विवादित भूमि पर मूलतः उनका स्वामित्व रहा है इसलिए उनको मुख्य पक्षकार माना जावे। इससे भी एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने विवादित भूमि हिन्दुओं को सौंपने की रजामंदी भी दे दी । यद्यपि सुन्नी मुस्लिमों के संगठन उस पहल से पूरी तरह असहमत हैं किंतु यदि शिया समुदाय भूमि पर अपने हक़ को प्रमाणित कर सके तो फिर अदालत के लिए भी आसानी हो जाएगी । इस सम्बंध में आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर के मध्यस्थता प्रयासों पर भी सबकी नजरें लगी हुई हैं । बीच में खबर उड़ी कि श्री श्री सफलता के करीब पहुंच गए हैं किंतु वैसा कुछ हुआ नहीं । गत दो दिनों से रविशंकर जी की कोशिशें नए सिरे से शुरू होने की सुगबुगाहट खबरों में है लेकिन टीवी चैनलों पर चली बहस में सुन्नी मुस्लिम धर्मगुरुओं के रुख में किसी भी तरह का बदलाव न होना श्री श्री की कोशिशों में अवरोध बना हुआ है । प्रश्न ये भी है कि केवल जमीन विवाद को निबटाने में इतना लंबा समय खराब करना कहाँ तक उचित था ? राम जन्मभूमि का मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय की नज़र में भले ही जमीन के मालिकाना हक तक सीमित हो किन्तु ही हिंदुओं के लिए ये आस्था से भी बढ़कर आत्मसम्मान का सवाल बन गया वहीं आम मुस्लिम तो उतना मुखर नहीं लगता किन्तु सुन्नी  समाज के नेता गण इस मुद्दे पर पीछे हटने राजी नहीं हैं क्योंकि वोट बैंक की ठेकेदारी  के लिए खतरा पैदा हो जाएगा । मोदी सरकार द्वारा तीन तलाक़ पर दिए गए झटके से सनाके में आए मुस्लिम समाज को लग रहा है कि उसने यदि अयोध्या विवाद में पाँव पीछे खींच लिए तो भाजपा को मन्दिर बनाने का श्रेय मिल जावेगा जो 2019 के लोकसभा चुनाव में उसके लिए प्राणवायु का काम करेगा । उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी येन केन प्रकारेण अयोध्या   विवाद को निबटाने में जुटे हैं । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनी सोच स्पष्ट कर देने के बाद कम से कम इतनी उम्मीद तो बंधी ही है कि अब प्रकरण जल्दी निबटाया जा सकेगा क्योंकि न्यायाधीश गण भी इधर उधर के दबावों से मुक्त होकर निर्णय की तरफ बढ़ सकेंगें । ये भी अच्छी बात है कि समाज में रचनात्मक सोच बढ़ती जा रही है जिससे सभी पक्ष चाहे अनचाहे अदालत के फैसले को शिरोधार्य करने पर रजामन्दी दिखा रहे हैं। देश के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा भी चाह रहे हैं उनकी सेवानिवृत्ति के पूर्व वे इस लम्बित मामले को हल कर जाएं। देश के इतिहास और राजनीतिक उथलपुथल में अयोध्या विवाद काफी महत्वपूर्ण है जिसे उलझाए रखने में कुछ लोगों का निहित स्वार्थ हो सकता है किंतु देशहित में यही होगा कि इसका सुखद अंत शीघ्रातिशीघ्र हो क्योंकि पहले ही काफी समय नष्ट हो चुका है और युवा पीढी इस तरह के मसलों से ऊपर उठकर सोचने लगी है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 8 February 2018

फुटकर हमलों का थोक में अच्छा जवाब लेकिन.....

प्रधानमंत्री संसद में कम ही बोलते हैं लेकिन जब बोलते हैं तब ताबड़तोड़ बल्लेबाजी का नजारा पेश करते हुए चौतरफा शॉट लगाते हैं। गत दिवस संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर उन्होंने लम्बे भाषण दे डाले जिनमें अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान करते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला किया। उनके भाषण को विश्लेषकों ने 2019 के चुनावी मुकाबले का एजेंडा तय करने वाला बताया वहीं कुछ का मानना है उनकी नजऱ में फिलहाल कर्नाटक विधानसभा का चुनाव है जिसे भाजपा हर हाल में जीतना चाहेगी क्योंकि खुदा न खास्ता वहां उसे सफलता नहीं मिली तब गुजरात विधानसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद राजस्थान में हुए तीन उपचुनावों में मिली जबरदस्त पराजय का सिलसिला लम्बा खिंचने का खतरा बढ़ जाएगा। नरेन्द्र मोदी चूंकि भाजपा के एकमात्र वोट बटोरू चेहरा बन गए हैं इसलिए सफलता और असफलता दोनों उनके खाते ही चढ़ती हैं। 2018 में ही भाजपा शासित मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होना हैं जिनमें राजस्थान छोड़ बाकी दो राज्यों में लंबे समय से सरकार में रहने से भाजपा को  सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है जो अस्वाभाविक नहीं है किंतु उनके तुरन्त बाद लोकसभा के महा मुकाबले की दृष्टि से पार्टी के लिए अपनी राज्य सरकारें बचाना अत्यावश्यक होगा। कल श्री मोदी ने जिस अंदाज में संसद के मंच से देश को सम्बोधित किया उससे उन्होंने ये एहसास करवाने की कोशिश की कि गुजरात में लगे झटके के बाद भी उनकी मारक क्षमता और हौसला यथावत है। बीते कुछ समय से कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी जिस तरह से हमलावर शैली में वाचाल हो गए थे उसके कारण प्रधानमंत्री ने भी कुछ ज्यादा ही तगड़े प्रहार कर दिये। लोकसभा में कांग्रेस द्वारा लगातार शोर के बावजूद श्री  मोदी ने एक-एक कर अपने शासनकाल की उपलब्धियां गिनाने के साथ ही पिछली मनमोहन सरकार की गलतियों और असफलताओं का जो ब्यौरा पेश किया उसका कांग्रेस के पास शायद ही कोई जवाब होगा। राहुल हमेशा ये कहते आए हैं कि मोदी उनसे बेहतर वक्ता हैं। कल के भाषण के बाद भी उन्होंने वही कहा किन्तु साथ ही ये कटाक्ष भी कर दिया कि प्रधानमंत्री ने उनके सवालों के उत्तर नहीं दिए जिनमें सबसे ताजा है वायुसेना के लिए फ्रांस से खरीदे जा रहे रफैल लड़ाकू विमान की कीमतों सम्बन्धी जानकारी गोपनीय रखना। कांग्रेस अध्यक्ष आरोप लगा रहे हैं कि उक्त सौदे में भ्रष्टाचार हुआ लेकिन उनके इस आरोप की हवा तब निकल गई जब मनमोहन सरकार के कार्यकाल में रक्षा सौदों सम्बन्धी जानकारी देने से लगातार इंकार किये जाने के दस्तावेजी सबूत सामने आ गए और टीवी चैनलों पर चली बहस में भी अधिकतर लोगों का अभिमत यही रहा कि रफैल सौदे में कोई बिचौलिया नहीं है जिससे फ्रांस और भारत सरकार के बीच शीर्ष स्तर पर सब कुछ तय हुआ। अत: इसमें भ्रष्टाचार की  गुंजाईश नहीं है। लगता है राहुल ने ये पैतरा सीबीआई द्वारा बोफोर्स दलाली का प्रकरण पुन: खोले जाने के विरोध में दबाव बनाने के लिए चला किन्तु वह उल्टा पड़ गया। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में बैंकों के फंसे कर्ज के लिए भी जिस तरह मनमोहन सिंह की सरकार पर जोरदार हमला बोला वह भी निशाने पर जाकर लगा। पिछले दिनों राज्यसभा में गुलाम नबी आजाद ने सरकार को गेम चेंजर की बजाय नेम चेंजर बताकऱ उसका मजाक बानाया था जिसके जवाब में श्री मोदी ने कहा कि उनकी सरकार एम चेजर है जो लक्ष्य का पीछा करते हुए उसे हासिल करती है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के अभिभाषण और बजट पर हर साल लम्बा भाषण देकर विपक्ष के तमाम हमलों का थोक में जवाब देते हैं और गत दिवस भी उन्होंने वही किया। उनके पूर्व राज्यसभा में अपने पहले भाषण में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पकौड़ा विवाद पर विपक्ष को काफी धोया था। दरअसल संसद के दोनों सदनों के भीतर विपक्ष में एकजुटता का अभाव होने से वह सत्ता पक्ष को घेरने में सफल नहीं हो पाता। राज्यसभा में उसके पास बहुमत होने पर भी वह बहस की बजाय सदन को बाधित करने की गलती करता रहता है जिससे उसकी छवि खराब होती है। कल लोकसभा में श्री मोदी के भाषण के दौरान कांग्रेस सदस्य नारेबाजी करते रहे लेकिन प्रधानमंत्री ने उसकी परवाह न करते हुए अपनी धार बनाए रखी। राज्यसभा में कांग्रेस सदस्य रेणुका चौधरी द्वारा लगातार हंसने पर प्रधानमंत्री ने जिस तरह उन्हें मजाक का पात्र बनवा दिया वह उनकी वाकपटुता और हाजिरजवाबी का उदाहरण है। कुल मिलाकर राहुल गांधी के फुटकर हमलों का एकमुश्त उत्तर देकर श्री मोदी ने अपने दबावमुक्त होने का संकेत तो दिया ही उल्टे काँग्रेस पर दबाव बनाने में कामयाब भी हो गए। राहुल गांधी के आत्मविश्वास और आक्रामकता में निश्चित रूप से वृद्धि हुई है लेकिन वे अपनी दिशा नियंत्रित नहीं रख पाते। विपक्षी एकता की जो कोशिशें कांग्रेस की तरफ से होती हैं वे भी परवान नहीं चढ़ पा रहीं। तात्कालिक मुद्दों पर सरकार को घेरकर भले ही श्री गांधी खबरों में बने रहें किन्तु उनके हमलों की तीव्रता जल्द खत्म हो जाती है क्योंकि वे अक्सर अपने ही गोल में गेंद डाल देने की गलती दोहरा देते हैं जिसका लाभ उठाने में प्रधानमंत्री कभी नहीं चूकते। बजट के बाद आईं चौतरफा प्रतिक्रियाओं में सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा था। कल प्रधानमंत्री ने दोनों सदनों में अपने आक्रामक अंदाज़ से उस दबाव से पार्टी और सरकार को बाहर निकाल लिया। पकौड़ा और रफैल सौदे पर प्रधानमंत्री को घेरने जैसी कोशिशें प्रारम्भ में भले ही कारगर दिखीं हों लेकिन कल दिन में श्री मोदी ने उनका असर खत्म कर दिया। लेकिन इसके साथ ही भाजपा और केंद्र सरकार को ये भी ध्यान रखना चाहिए कि केवल विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने से उनके नंबर नहीं बढ़ेंगे। आरोपों के जवाब में प्रत्यारोप से 2019 का महासंग्राम नहीं जीता जा सकता। मोदी सरकार को  विरासत में जो समस्याएं मिलीं वे निश्चित रूप से गम्भीर थीं किन्तु अगले चुनाव में प्रधानमंत्री न तो मनमोहन सरकार की कमियां गिना सकेंगे और न हीं वायदों की झड़ी लगाना सम्भव होगा। इसके ठीक उलट उन्हें अपनी पांच साला उपलब्धियां जनता के सामने प्रस्तुत कर दूसरा कार्यकाल मांगना होगा और इसलिए जरूरी है वे बचे हुए समय में ऐसे ठोस काम करें जिनका प्रत्यक्ष लाभ जन साधारण को मिल सके। गत दिवस मोदी जी ने जो उपलब्धियां गिनवाईं वे अपनी जगह सही हैं किंतु आदर्श स्थिति वह होगी जब उन्हें ये सब बताने की जरूरत न पड़े और जनता खुद होकर उनका गुणगान करे। विपक्ष खासकर कांग्रेस को भी चाहिए कि वह केवल विरोध के लिए विरोध से परहेज करने के अलावा प्रधानमंत्री को जबरन घेरने और सस्ते आरोप लगाने से बचे। राहुल गांधी को ये याद रखना चाहिए कि वे अपनी पार्टी के अध्यक्ष भले ही बन गए हों लेकिन छवि और लोकप्रियता में वे नरेन्द्र मोदी के मुकाबले बहुत पीछे हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 February 2018

अन्ना के प्रति पहले जैसा उत्साह नहीं रहा


अन्ना हज़ारे फिर मैदान में हैं गत दिवस वे जबलपुर होते हुए आसपास के शहरों के भ्रमण पर निकल गए। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार पर वायदे पूरे न करने के आरोप मढ़ते हुए आरपार की लड़ाई लडऩे का ऐलान किया। भाजपा पर गरीबों और किसानों की उपेक्षा करने की तोहमत लगाते हुए अन्ना ने किसानों को पेंशन दिए जाने जैसी मांग भी दोहराई। भ्रष्टाचार के विरुद्ध चले लोकपाल आंदोलन के प्रतीक पुरुष रहे अन्ना ने दिल्ली के रामलीला मैदान में 12 दिन अनशन कर पूरे देश को आंदोलित कर दिया था। जनमानस में उनकी छवि दूसरे जयप्रकाश नारायण की बन गई थी। उस आंदोलन के दौरान ही अरविंद केजरीवाल और उनके कतिपय साथी नई राजनीति के ध्वजावाहक बनकर उभरे और देखते ही देखते सामाजिक आंदोलन को राजनीतिक पार्टी में तब्दील कर दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गए। कहना गलत नहीं होगा कि 2014 में कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय के विभिन्न कारणों में एक अन्ना का वह अनशन भी था। लेकिन केजरीवाल एंड कम्पनी ने ही अपने प्रेरणास्रोत से किनारा करते हुए उन्हें रामलीला मैदान के विराट आकार से धकेलकर वापिस रालेगण सिद्धि के छोटे से दायरे में समेट दिया। आम आदमी पार्टी के लिए अन्ना महज एक सीढ़ी थे वहीं भाजपा को भी एक सीमा के बाद वे अवांछनीय प्रतीत होने लगे। कांग्रेस और बाकी पार्टियां तो इस बुजुर्ग को पहले भी नापसन्द किया करती थीं क्योंकि वह  भ्रष्टाचार के विरुद्ध खुलकर बोलता ही नहीं मैदान में लड़ता भी था। लेकिन एक बार केंद्र में सत्ता परिवर्तन और फिर लोकपाल आंदोलन की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी को दिल्ली में मिली सफलता के बाद अन्ना जिस तरह अप्रासंगिक होते गए वह भारतीय राजनीति के लिए नई बात नहीं थी क्योंकि सत्ता के सान्निध्य में ध्येयवादी व्यक्ति और उनके आंदोलन पहले भी या तो दम तोड़ते रहे हैं या फिर वे राजनेताओं की अतृप्त महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का साधन बनकर बेकार हो गए। जिस तरह गांधी,लोहिया और दीनदयाल केवल जयन्तियों तक सीमित कर दिए गए, कमोबेश वही हाल उन सामाजिक आंदोलनों के पुरोधाओं का हुआ जो राजनेताओं के मायाजाल को समझने में नाकामयाब रहे और इस्तेमाल होने के बाद दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंके गए। इस सम्बंध में विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण का उदाहरण सर्वविदित है। अन्ना हजारे को उसी धारावाहिक की नवीनतम कड़ी के तौर पर लिया जा सकता है। जो चाहे-अनचाहे उस क्षेत्र में घसीट लिए गए जिससे उन्हें वैराग्य था। अन्ना हजारे ने दोबारा सक्रिय होने के साथ ही ये ऐलान भी किया कि वे अपने साथ जुडऩे वालों मेें से किसी को भी राजनीतिक नेता नहीं बनने देंगे किन्तु क्या ये उनके बस में होगा ? ये सवाल इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वे तो आम आदमी पार्टी के गठन के भी घोर खिलाफ  रहे लेकिन उनके मानसपुत्रों ने उनके साथ वही व्यवहार किया जो राजनीति का चिर परिचित चरित्र रहा है। उस लिहाज से लगभग 4 वर्ष तक एक तरह का निर्वासन झेलने के बाद उनके फिर से मोर्चे पर डटने की कोशिश एक पूर्व सैनिक की भुजाएं फडफ़ड़ाने का संकेत तो देती हैं किंतु खुद सेना में रह चुके अन्ना भी जानते हैं कि नि:स्वार्थ भाव से सेवा और संघर्ष करने वालों का समाज में कितना टोटा हो गया है और यह भी कि चार दिन टोपी पहिनकर जि़न्दाबाद-मुर्दाबाद करने के बाद अधिकतर लोगों को विधायक-सांसद बनने के स्वप्न आने लग जाते हैं। जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से निकले तमाम युवा उनके जीते जी सियासतदां बनकर लोकनायक को ठेंगा दिखा गए। हूबहू वही मैं भी अन्ना तू भी अन्ना का नारा लगाने वालों के साथ हुआ। उम्र के इस पड़ाव में भ्रष्टाचार , केंद्र सरकार की वायदा खिलाफी और किसानों की बदहाली जैसे ज्वलन्त मुद्दों पर अन्ना का क्रोधित और आंदोलित होना स्वागतयोग्य है। उनके उत्साह और मानसिक पीड़ा को देश समझता भी है और सम्मान भी देता है लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि ये बुजुर्गवार भी देश के वर्तमान माहौल में पुरानी थ्री नॉट थ्री रायफल सरीखे होकर रह गए हैं। जिन एनजीओ के दम पर रामलीला मैदान की लड़ाई लड़ी गई वे भी या तो अरविंद केजरीवाल के मोहपाश में फंसकर रह गए या फिर उन्हें ये सब फिजूल महसूस हुआ। और फिर अन्ना के पास न तो कोई संगठनात्मक ढांचा है और न ही ऐसे चेहरे जैसे लोकपाल आंदोलन के दौरान पूरे देश में चर्चित हो गए थे। उन लोगों की एकता भी अब छिन्न-भिन्न होकर रह गई है। ऐसे में एक हारे हुए सेनापति की तरह अपनी बिखरी सेना को फिर एकजुट करने का उनका प्रयास कितना कामयाब होगा, कहना क़ठिन है। सबसे बड़ी बात ये है कि खुद अन्ना भी भ्रमित रहते हैं। आम आदमी पार्टी के जन्म का विरोध करने के पीछे उनका तर्क सामाजिक आंदोलन को राजनीतिक शक्ल देने के ऐतराज पर आधारित था किन्तु बाद में वे तृणमूल के प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार हेतु राजी हो गए। उनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये आएगी कि अधिकतर विपक्षी दल उनके साथ नहीं हैं क्योंकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध न तो कोई दल मुंह खोलने तैयार है और न ही मुंह दिखाने लायक। ऐसे में दस-बीस की भीड़ के साथ बैठने या घूमने से वे सिवाय समाचार माध्यमों में सुर्खियां बटोरने के और क्या कर सकेंगे? कहने का आशय ये नहीं है कि अन्ना निराश होकर रालेगण सिद्धि के मन्दिर में भजन पूजन करते हुए बुढ़ापा काटें किन्तु उन्हें भी अपने आप में स्पष्ट होना चहिये। भ्रष्टाचार सहित अन्य समस्याओं के प्रति उनकी चिंता एवं संवेदनशीलता निश्चित रूप से अभिनन्दनीय है किंतु देश के मौजूदा माहौल के मद्देनजर अन्ना के प्रति भी पहले जैसा उत्साह नहीं रहा तो उसकी वजह वे खुद भी हैं। उनके ताजा प्रयास सफल हों ये तो हर किसी की चाहत है किंतु अन्ना का दौर खत्म हो चुका है। बाकी तो छोडि़ए अब तो अरविंद केजरीवाल भी उनके साथ नहीं खड़े होंगे क्योंकि उनकी सरकार के कई मंत्री भ्रष्टाचार के कारण जांच के दायरे में हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 February 2018

कड़ा सबक सिखाने की सख्त जरूरत


पाकिस्तान की तरफ से दागी गई मिसाइल से एक युवा कैप्टन सहित तीन सैनिकों की मौत से पूरे देश में गुस्सा है। सीमा पर तैनात सैनिक का मौत से कब सामना हो जाए ये कोई नहीं जानता लेकिन पाकिस्तान द्वारा आए दिन युद्धविराम का उल्लंघन किये जाने से अघोषित युद्ध की स्थिति बनी हुई है। केंद्र सरकार द्वारा सेना को ईंट का जवाब पत्थर से दिए जाने की खुली छूट दिए जाने से हालांकि हमारी तरफ  से भी जोरदार पलटवार होता रहता है और सेना अपने साथियों की मौत का सूद सहित बदला भी ले लेती है किंतु इसके बावजूद पाकिस्तान के रुख में बदलाव न आने से हमारी रक्षा नीति पर जो सवाल उठ रहे हैं उन्हें अनुचित नहीं ठहराया जा सकता। खास तौर पर इसलिए कि सत्ता में आने से पहले तक भाजपा और नरेंद्र मोदी पूर्ववर्ती सरकार और प्रधानमंत्री पर दब्बू होने का आरोप लगाने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ते थे। मोदी जी ने 56 इंच के सीने वाले दावे की वजह से अपनी छवि सुपर मैन की बना ली थी। लेकिन भले ही सेना को गोली का जवाब गोले से दिए जाने का स्थायी अधिकार दे दिया गया हो लेकिन उससे पाकिस्तान की हरकतें चूँकि नहीं रुक रहीं तथा लगातार हमारे फौजी जवान और युवा अफसर सस्ते में मारे जा रहे हैं इसलिए प्रधान मंत्री और भाजपा को आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है। ताजा हमले के बाद पूरे देश में आक्रोश की लहर व्याप्त हो गई है। टीवी चैनलों पर शहीदों के परिवारों का क्रन्दन देखकर हर व्यक्ति सरकार की नीति पर सवाल उठाता है। आखिर भारत सरीखे सैन्य शक्ति सम्पन्न देश पर इस तरह गोले दागने का दुस्साहस पाकिस्तान जैसा छोटा सा देश किस तरह करता है ये गम्भीर विषय है।  हमारी सेना उसका बदला ले लेती है मात्र इतना ही संतोष की बात नहीं है। होना तो ये चाहिए कि भारत की तरफ से की जाने वाली जवाबी सैन्य कार्रवाई के उपरांत पाकिस्तान की हिम्मत न पड़े हमले के बारे में सोचने की। उसे भारी नुकसान पहुंचाने के सैन्य दावों के बाद भी यदि थोड़े-थोड़े अंतराल पर उस तरफ  से फिर हमला होता है तो इसे रोजमर्रे की बात कहकर नहीं टरकाया जा सकता। पाकिस्तान के दिल्ली स्थित राजनयिकों को विदेश मंत्रालय में बुलवाकर अपना विरोध अथवा रोष व्यक्त कर देना कूटनीतिक जरूरत हो सकती है लेकिन इस प्रक्रिया से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाना चिंताजनक है । अमेरिका की ऐलानिया नाराजगी के बावजूद पाकिस्तान की तरफ  से युद्धविराम तोडऩे का सिलसिला जारी है। इसका साफ अर्थ है कि चीन उसकी पीठ पर हाथ रखे हुए है। विगत दिवस उसने जो मिसाइल दागी वह चीन में ही बनी हुई थी। ताजा वारदात के बाद सेना ने हमारा काम बोलेगा जैसी प्रतिक्रिया व्यक्त कर देश को आश्वस्त किया है। शहीद परिवार की तरफ से भी 4 के बदले 40 मारने की रोषपूर्ण इच्छा व्यक्त की गई है किंतु समस्या जिस मोड़ ओर आ गई है उसमें अब तदर्थं और तात्कालिक प्रतिक्रियात्मक उपाय काम नहीं आने वाले। उनके 40 मारने पर भी हमारे 4 शहीदों की भरपाई नहीं हो सकेगी। ये सब देखते हुए पाकिस्तान के विरुद्ध वे सारे कदम उठाने होंगे जो किसी शत्रु के लिए आवश्यक हैं। उससे मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापस लेना इस दिशा में पहला कदम हो और फिर व्यापार बन्द किया जावे। वाजपेयी सरकार द्वारा पाकिस्तान के यात्री विमानों के भारतीय वायु क्षेत्र एवं जलयानों के समुद्री क्षेत्र का उपयोग करने पर रोक लगाकर दबाव बनाया गया था। दूसरी जरूरत पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित कर उसका पूरी तरह बहिष्कार करने की है। वरना जब तक उससे व्यापार और दौत्य सम्बन्ध रहेंगे तब तक तरह-तरह के लिहाज बने रहेंगे। मोदी सरकार यदि वाकई अपनी विश्वसनीयता बनाए रखना चाहती है तो उसे  आर-पार की लड़ाई लडऩी पड़ेगी जिसका आश्वासन भाजपा वाजपेयी सरकार के समय भी देती रही। वर्तमान स्थिति बेहद शर्मनाक है। इससे भाजपा अथवा श्री मोदी के राजनीतिक भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि सेना के सम्मान, देश की सुरक्षा और जनता के मनोबल का है। अतीत में सर्जिकल स्ट्राइक जैसा आक्रामक कदम उठाकर सरकार ने जो दृढ़ता दिखाई उसकी पुनरावृत्ति इस पैमाने पर होना चाहिए जिससे पाकिस्तान दोबारा सिर उठाने का साहस न बटोर सके। इसके लिए चुनाव या अन्य किसी अवसर की प्रतीक्षा करने की बजाय सैन्य अनुकूलता को ध्यान में रखकर ऐसा कुछ किया जाना चाहिए जिससे रोज-रोज हमारे जवानों का खून बहना रोका जा सके। सुरक्षा को लेकर सरकार और सेना में देश का पूरा भरोसा है लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि फिलहाल देश गुस्से में है और इस गुस्से को ठंडा करने का एकमात्र तरीका पाकिस्तान की गर्दन दबाना ही है। सेना को छूट देना निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है किंतु अब उससे भी आगे बढ़कर कुछ ऐसा करने की जरूरत है जिसे पाकिस्तान लम्बे समय तक याद रख सके। बलूचिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर के भीतर भड़क रही विरोध की चिंगारी को हवा देने का भी ये सही समय है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी