Thursday, 15 February 2018

बैंक घोटाला : आर्थिक के साथ विश्वसनीयता का नुकसान


पंजाब नेशनल बैंक देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक है। इसलिए आर्थिक जगत में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। तमाम झंझावातों के बावजूद इसकी स्थिति अपेक्षाकृत काफी अच्छी बनी हुई थी किन्तु गत दिवस हुए एक खुलासे ने बैंक को खतरे के कगार पर ला खड़ा किया। मुंबई स्थित उसकी एक शाखा में 11346 करोड़ का घोटाला पकड़ में आया है। एनपीए नामक संकट से जूझ रहे बैंकिंग क्षेत्र के लिए ये खबर किसी उल्कापात जैसी ही है। इसका फौरी असर ये हुआ कि शेयर बाज़ार में इस बैंक का भाव 10 प्रतिशत गिर गया। पंजाब नेशनल बैंक के कुल मुनाफे के तीन गुने इस घोटाले को बैंक ने अपने स्तर पर ही पकड़ा और 10 अधिकारी भी तुरन्त निलम्बित कर दिए गए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हीरा व्यापारी नीरव मोदी को बैंक की तरफ से जारी एलओयू (लैटर ऑफ अंडरटेकिंग) के जरिये विदेशों में भारी कर्ज लिए गए। देश के भीतर भी अन्य बैंकों से कर्ज दिलवाने में एलओयू का उपयोग किया गया। इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज को बैंक के रिकॉर्ड में नहीं लिया जाना ही ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि सम्बन्धित अधिकारियों ने सन्देह के घेरे में आए हीरा व्यापारी के साथ मिलकर घोटाले को अंजाम दिया। सबसे चौंकाने वाली बात ये पता चली कि वर्ष 2010 से घोटाला होता रहा लेकिन अब जाकर उस पर नजर गई। इससे ये पता चलता है कि अधिकारी भले बदलते रहे किन्तु घोटाला जारी रहा। इतनी बड़ी रकम को लेकर बरती गई इस तरह की गम्भीर लापरवाही के लगातार बरसों तक जारी रहने से तो यही लगता है कि घोटाले के तार ऊपर तक जुड़े रहे होंगे। चूंकि एलओयू जारी करने वाले अधिकारियों ने उन्हें बैंक के रिकॉर्ड में नहीं रखा इसलिए सम्भवत: वे ऑडिटर्स की पकड़ में नहीं आये होंगे वरना इस तरह के लेनदेन की जांच में तो बैकों के आंतरिक अंकेक्षण के अलावा रिजर्व बैंक के ऑडिटर भी विशेष रूप से सतर्कता बरतते हैं। पंजाब नेशनल बैंक ने चूंकि खुद होकर उक्त घोटाले को उजागर किया इससे यही जाहिर होता है कि जो अधिकारी बरसों से उसे जारी रखे थे उनसे नए अधिकारी का तालमेल न बैठा हो। दूसरी आशंका ये भी है कि शाखा में पदस्थ अधिकारियों पर उच्च प्रबंधन का दबाव पड़ता रहा हो। विजय माल्या को दिए कर्ज में भी सम्बन्धित बैंकों के शीर्ष प्रबंधन की लिप्तता सामने आई थी। ये सच है कि अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए बैंक के अधिकारी बड़े कारोबारियों के आभामंडल से प्रभावित होकर नियम-शर्तों में ढील डाल देते हैं। दस्तावेज तैयार करते समय भी चूक कर दी जाती है जिसका लाभ उठाकर ऋण लेने वाला बैंक को चपत लगा देता है। राष्ट्रीयकरण के बाद से ही बैंकिंग उद्योग में भी भ्रष्टाचार के विषाणु प्रविष्ट होते गए वरना घपले और घोटाले जैसे शब्द उस क्षेत्र के लिए अपरिचित थे। गबन वगैरह तो हुआ करते थे किंतु कर्ज बांटने में होने वाली अनियमितताएं यदाकदा ही सुनने में आती थीं। उदारीकरण के बाद बैंकिंग उद्योग में ऋण बांटने को लेकर जो नरम रवैया अपनाया जाने लगा उसके  दुष्परिणाम स्वरूप ही अरबों - खरबों रुपये डूबन्त होते गए। ये काम एक दो दिन या वर्ष में हुआ हो ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने हालिया भाषण में पिछली यूपीए सरकार पर बैंकों को एनपीए घोटाले में फंसा देने का आरोप लगाया था। उधर राहुल गांधी भी मोदी सरकार पर अमीरों का कर्ज माफ  करने का आरोप आए दिन लगाया करते हैं। इस सबसे ये साबित होता है कि बैंकिंग उद्योग को चूना लगाने का सिलसिला बाकायदा चलता रहा जिसे राजनीतिक संरक्षण भी हासिल था। विगत दिनों विश्व के सबसे बड़े कहलाने वाले भारतीय स्टेट बैंक के घाटे की खबर ने आर्थिक जगत को झकझोरा ही था कि पंजाब नेशनल बैंक में 11 हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा के घोटाले की ख़बर आ जाने से बैंकिंग क्षेत्र के प्रति जनता के मन में व्याप्त विश्वास और खंडित होने लगा। खास तौर पर इसलिए भी क्योंकि अब बैंकों में लोग केवल पैसा जमा ही नहीं करते अपितु उनके शेयर खऱीदकर निवेश भी करते हैं। गत दिवस ज्योंही शेयर बाज़ार तक घोटाले की सूचना पहुंची त्योंही पंजाब नेशनल  बैंक के शेयर भाव 10 प्रतिशत लुढ़क गए जिससे निवेशकों को करोड़ों रुपये की चोट लगी। जैसी कि आशंका है यदि इस घोटाले की आंच अन्य बैंकों तक भी पहुंची तब नुकसान की राशि और बढ़ सकती है। एनपीए संकट से जूझ रहे बैंकिग क्षेत्र के लिए पंजाब नेशनल बैंक का घोटाला न केवल आर्थिक वरन विश्वसनीयता के लिए भी खतरा बनकर आया है। इसमें सरकार की जिम्मेदारी कितनी और बैंक प्रबन्धन की कितनी ये तो जांच से ही पता चलेगा किन्तु एक बात सप्रमाण कही जा सकती है कि बैंकिंग सरीखे साफ-सुथरे माने जाने वाले क्षेत्र में भी अब अन्य सरकारी विभागों की तरह भ्रष्टाचार और घोटाले होने लगे हैं जो देश की आर्थिक स्थिति और छवि दोनों के लिए नुकसानदेह है। बड़ी बात नहीं पंजाब नेशनल बैंक के बाद अब दूसरे बैंकों में भी इस तरह के मामले सामने आ जाएं। हर शाख पे उल्लू बैठे होने की बातें ज्यों-ज्यों सामने आती जा रही हैं त्यों-त्यों अंज़ाम ए गुलिस्तां को लेकर फिक्र भी बढ़ती जा रही है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 February 2018

बांह मरोडऩे से बढ़कर तोडऩे की जरूरत

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण एक सुशिक्षित, अनुभवी और गम्भीर राजनेता हैं। जम्मू में हुए आतंकवादी हमले के बाद कल घटनास्थल का मुआयना करने के बाद उन्होंने पाकिस्तान पर ठींकरा फोड़ते हुए नतीजे भुगतने की घिसीपिटी चेतावनी दे डाली। उसका मजाक उड़ाना तो अनुचित होगा किन्तु आतंकवादी बेखौफ  होकर सैन्य ठिकानों पर हमला कर जवानों को मार देते हैं। भले ही वे बचकर न जा पाते हों किन्तु हमारे सैनिकों का खून जिस तरह अकारण सस्ते में बह रहा है वह शर्म का विषय है। इस तरह के हमलों में स्थानीय कश्मीरियों की मदद की बात सामने आने से स्थिति की गम्भीरता का पता चल जाता है। जम्मू की घटना के तुरंत बाद श्रीनगर में भी वैसा ही दुस्साहस किया गया किन्तु प्रहरी की सजगता से हमलावर सैन्य शिविर में नहीं घुस सके। रक्षामंत्री की चेतावनी के पहले सेना के वरिष्ठ अधिकारी भी जवानों की शहादत का बदला लेने की बात कह चुके हैं। छुटपुट जवाबी कार्रवाई होती भी रहती है जिसे बांह मरोडऩा तो कह सकते हैं लेकिन बांह तोडऩे जैसा कारनामा जब तक भारत नहीं दिखाता तब तक पाकिस्तान इस तरह की हरकतें कर हमारा मनोबल तोड़ता रहेगा। यद्यपि ऐसे मामलों में हर कोई सलाह दे ये सही नहीं होता लेकिन देश कुछ ऐसा चाहता है जिससे लगे कि भारत सरकार वाकई पाकिस्तान को सबक सिखाने में सक्षम है वरना लोगों को मोदी और मनमोहन दोनों को एक ही श्रेणी में रखने से रोका नहीं जा सकेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

शिवराज ने घोषणाएं तो अच्छी कीं बशर्ते अमल हो सके

शिवराज सिंह चौहान मूलत: ग्रामीण परिवेश से निकले होने के कारण किसान वर्ग के जबरदस्त हितचिंतक माने जाते हैं और जब भी मौका आता है उनके लिए अपनी सरकार का खजाना खोल देते हैं। प्राकृतिक विपदाओं के समय भी दरियादिली दिखाने में वे कभी पीछे नहीं रहते। गत दिवस उन्होनें प्रदेश भर से किसानों को बुलाकर भोपाल में जंगी जलसा किया जिसमें सौगातों और राहतों की जोरदार बरसात कर डाली। किसानों की फसल का दाम समर्थन मूल्य से भी ज्यादा देना तो चलो ठीक है लेकिन गत वर्ष खरीदे गए अनाज पर भी अतिरिक्त बोनस देने जैसा कदम निश्चित रूप से चुनावी पैंतरा है। गोदामों का 25 प्रतिशत खर्च और किसानों पर चढ़े कर्ज का ब्याज सरकार द्वारा वहन किये जाने जैसी घोषणाएं इस समुदाय की नाराजगी दूर कर आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को चौथी पारी खेलने का अवसर प्रदान करने के लिए बनाई गई रणनीति का हिस्सा ही है। इसमें दो मत नहीं है कि शिवराज सिंह की सरकार के दौरान किसानों की बेहतरी के लिये किये गए उपायों के परिणामस्वरूप ही मप्र को लगातार कृषि कर्मणा पुरस्कार मिल रहा है। सबसे अधिक खरीद मूल्य देकर मुख्यमंत्री ने मप्र को गेंहू उत्पादन में पंजाब और हरियाणा से भी आगे लाकर खड़ा कर दिया। अन्य कृषि उत्पादनों में भी पर्याप्त वृद्धि के लिए राज्य सरकार की कृषक समर्थक नीतियां ही श्रेय का हकदार हैं किन्तु इसी के साथ ये कहना भी गलत नहीं होगा कि मुख्यमंत्री ने जितनी सदाशयता कृषि क्षेत्र के लिए दिखाई उसका पूरा-पूरा लाभ किसानों को नहीं मिल सका जिसके कारण अन्नदाता कहलाने वाले इस महत्वपूर्ण वर्ग का असन्तोष बढ़ते-बढ़ते गुस्से का रूप ले बैठा। गत वर्ष मन्दसौर में हुई हिंसक घटनाओं के बाद तो शिवराज सरकार को किसानों के बीच अलोकप्रिय माना जाने लगा। चुनावी साल में कोई भी मुख्यमंत्री किसानों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगा और यही वजह है गत दिवस शिवराज सिंह ने राजधानी भोपाल में किसान पंचायत का आयोजन कर जो मांगोगे वही मिलेगा का नज़ारा पेश करते हुए किसानों के रूप में फैले विशाल मतदाता वर्ग को सम्मोहित करने का दांव खेल दिया। मुख्यमंत्री ने जो घोषणाएं कीं उनसे शायद ही कोई असहमत होगा क्योंकि कृषि क्षेत्र और किसानों की उन्नति के बिना कोई भी राज्य विकसित नहीं हो सकता। मप्र को औद्योगिक विकास की राह पर आगे ले जाने के लिए अथक परिश्रम कर रहे मुख्यमंत्री के लिए किसानों की नाराजगी सारे किये कराए पर पानी फेरने का काम कर रही थी। हाल ही में सम्पन्न चुनावों के जो नतीजे आए उनमें भी शिवराज सिंह की लोकप्रियता में ह्रास परिलक्षित हुआ। मुंगावली और कोलारस के आगामी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की संभावनाएं धूमिल होने की आशंका ने भी पार्टी के रणनीतिकारों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। विधानसभा चुनाव के आठ महीने पहले यदि भाजपा उक्त दोनों उपचुनाव हार जाती है तो इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरना सुनिश्चित है जिनका हौसला गुजरात और राजस्थान के झटकों से पहले ही कमजोर है। हाल ही में सम्पन्न स्थानीय निकाय चुनाव परिणाम से भी पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट उभरकर सामने आ गई। किसानों की झोली को सौगातों से भर देने का ताजा प्रयास यदि मुंगावली और कोलारस के उपचुनाव में कारगर साबित हो गया तो उससे मुख्यमंत्री के आभामंडल में आ रही कमी दूर हो सकेगी वहीं कार्यकर्ताओं में भी नए सिरे से उत्साह का संचार हो सकेगा लेकिन किसानों के लिए की गई घोषणाओं का लाभ भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में तभी मिल सकेगा जब प्रदेश की भ्रष्ट नौकरशाही मुख्यमंत्री की मंशानुरूप किसानों की हमदर्द बनकर काम करे। अब तक के अनुभव इस बारे में बेहद कड़वे रहे हैं। एक तरफ  शिवराज सिंह ने फसलों के दाम देश भर में सबसे अधिक देने का रिकॉर्ड बनाया वहीं दूसरी तरफ  प्राकृतिक आपदा के समय भी मुख्यमंत्री ने अन्नदाता के आंसू पोंछकर उसके नुकसान की भरपाई का हरसम्भव इंतज़ाम किया किन्तु सरकारी अमले के गैर जिम्मेदाराना आचरण और भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति के कारण सरकार की तरफ  से दी गई राहत उन तक नहीं पहुंच सकी। शिवराज सरकार की छवि खराब करने  में पहले डंपर कांड और फिर व्यापमं घोटाले ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की किंतु सत्ता में भाजपा की वापसी पर संदेह के बादल मंडराने के पीछे किसान लॉबी की नाराजगी सबसे बड़ा कारण मानी जा रही है। मुख्यमंत्री ने गत दिवस जो सौगातें किसानों को दीं वे उन तक कैसे पहुंचेंगी ये देखने वाली बात होगी क्योंकि अब तक के अनुभव यही बताते हैं कि किसानों  के लिए सरकार के खजाने से निकली अपार धनराशि में बेईमान सरकारी कर्मचारी और अधिकारी बंदरबांट कर ले जाते हैं। मुख्यमंत्री ही नहीं भाजपा के विधायकों और संगठन को भी ये देखना होगा कि किसानों के हक़ पर कोई डाका न डाल सके वरना शिवराज सिंह की समूची मेहनत मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 February 2018

मुस्लिम समाज से आ रहे आशाजनक संकेत

अयोध्या में राममन्दिर के निर्माण को लेकर अब तक तो हिन्दू समाज में ही विभिन्न धर्माचार्यों तथा धार्मिक संगठनों के बीच एकजुटता का अभाव दिखाई देता था लेकिन सम्भवत: ये पहला अवसर होगा जब मुस्लिम समाज भी दोफाड़ होता लग रहा है। श्री श्री रविशंकर के समझौता प्रयासों के संदर्भ में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के भीतर जिस तरह की खींचातानी नजऱ आ रही है वह अभूतपूर्व होने के साथ ही इस बात का प्रमाण है कि अब वहां भी कट्टरपन छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने की छटपटाहट शुरू हो गई है। बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य मौलाना सलमान हुसैन नदबी जिन्होंने बाबरी ढांचे की जमीन के दावे को छोड़कर किसी और जगह मस्जि़द बनाने पर सहमति दिखाई, को बोर्ड ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। जवाबी हमले में श्री नदबी ने खुद होकर सदस्यता छोडऩे जैसी बात कहते हुए ये खुलासा भी किया कि वे दंगा करवाने वालों के साथ नहीं रहना चाहते। उधर शिया मुस्लिमों के शीर्ष संगठन ने तो सुन्नियों के संगठन पर आतंकवादी होने तक का आरोप लगा दिया। कई मुल्ला-मौलवी भी बीते कुछ दिनों में अयोध्या विवाद सम्बन्धी हठधर्मिता छोड़कर समझौता कर लेने की ही वकालत करते देखे गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समूचे विवाद को धर्म और आस्था जैसे भावनात्मक विषयों से अलग भूमि स्वामित्व तक सीमित करते हए दोनों पक्षों की तरफ  के नेतागिरी करने वालों के हस्तक्षेप पर जो विराम लगा दिया गया उससे भी मुस्लिम समाज में ये सोचने वाले बढ़ते जा रहे हैं कि कहीं अदालत ने विवादित ज़मीन पर मुस्लिमों के स्वामित्व को नहीं माना तब वे खाली हाथ रह जावेंगे। इसलिए समझौते के रास्ते पर चलकर अयोध्या में ही दूसरी मस्जि़द बनाने के लिए भूमि प्राप्त होने के प्रस्ताव को मंज़ूर कर लिया जावे। यद्यपि मुस्लिम समाज में समझौते के फार्मूले पर चलते हुए बाबरी ढांचे वाली जमीन का दावा छोड़ देने की मानसिकता को आम स्वीकृति दिलवाना किसी एक या पांच-दस नेताओं के लिए सम्भव नहीं होगा किन्तु दूसरी तरफ  ये भी सच है कि उप्र की सत्ता पर भाजपा के अपनी दम पर काबिज होने के बाद से मुस्लिम नेताओं का एक वर्ग ये मान रहा है कि उनके पास पहले जैसा राजनीतिक समर्थन और संरक्षण नहीं बचा है इसलिए बेहतर है बीच के किसी रास्ते को अपनाकर रोज-रोज की झंझटों से निज़ात पा ली जावे। तीन तलाक़ विरोधी कानून को लेकर मुस्लिम महिलाओं के बीच अपने लिए जगह बनाने के बाद से भाजपा का हौसला बढ़ा है। मुस्लिम समाज का एक वर्ग ये मान रहा है जिस तरह उनकी पर्दानशीं महिलाओं तक ने तीन तलाक़ के मुद्दे पर सारे बन्धनों को धता बताते हुए खुलकर अपनी राय व्यक्त की वह समाज के भीतर आ रहे खुलेपन का संकेत है जिसे नहीं समझने पर उसके और बढऩे का खतरा मंडराता रहेगा। जिस तरह हिंदुओं में भी काफी बड़ा वर्ग है जिसके लिए मन्दिर निर्माण अब उतना मायने नहीं रखता ठीक वैसे ही मुसलमानों में भी मस्जि़द की जि़द के प्रति रुचि कम होती दिखने लगी है। भले ही वैसा सोच रहे लोग हिंदुओं की अपेक्षा बहुत कम ही क्यों न हों। झगड़ा खत्म कर कोई शांतिपूर्ण समाधान तलाशने की बढ़ती इच्छा से हर समझदार व्यक्ति आशान्वित हो चला है, फिर चाहे वह हिन्दू हो अथवा मुसलमान। ये भी माना जा रहा है कि रविशंकर जी के मध्यस्थता प्रयासों के पीछे केंद्र सरकार और भाजपा का समर्थन है तथा मुसलमानों के  बीच योजनाबद्ध प्रयासों के जरिये काफी लोगों को मस्जि़द कहीं और बनाने के लिए रजामंद कर लिया गया है। वास्तविकता जो भी हो किन्तु मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के भीतर के मतभेदों का सतह पर आ जाना ये साबित करने के लिये पर्याप्त है कि उच्चस्तर पर कोई न कोई खिचड़ी पकाई जा रही है वरना मुस्लिम समाज में राम मन्दिर के प्रति नरम रवैया प्रदर्शित करने की पहल करने वाले इतनी हिम्मत नहीं दिखाते। हालांकि अभी कोई बड़ी उम्मीद पाल लेना जल्दबाजी होगी लेकिन कोशिश वालों करने वालों की हार नहीं होती जैसी अवधारणा पर विश्वास करें तो ऐसा लगता है कि बीते कई दशकों से देश को आंदोलित करने वाले इस विवाद के हल की संभावनाएं बलवती हो रही हैं। हिंदुओं के साथ ही मुस्लिम समुदाय में भी समन्वयवादी सोच का प्रादुर्भाव देशहित में ही होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 10 February 2018

दिल मिले न मिले हाथ मिलाते रहिये

आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर द्वारा राममन्दिर विवाद में मुस्लिम समुदाय के साथ की जा रही सुलह वार्ता कल फिर विफल हो गई। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जो शर्तें रख दीं उनके आधार पर तो समझौता नामुमकिन लगता है ।यदि हिन्दू समाज की रहनुमाई करने वालों को ये सब मंजूर होता तो झगड़ा न जाने कब का सुलझ गया होता। यद्यपि बोर्ड के कतिपय सदस्य कुछ ज्यादा उदार दिखे किन्तु कुल मिलाकर ज़िद यथावत है । मस्ज़िद की ज़मीन को खुदा की मानकर उसे किसी अन्य को न देने जैसा तर्क किसी भी समझौते के रास्ते में रोड़ा बन जाएगा । लेकिन दूसरी तरफ कुछ नर्म दिल मुस्लिम नेता भी सामने आए हैं जो ले देकर मामला निबटाने के पक्षधर हैं । सुना है प्रधानमंत्री के साथ भी मुसलमानों के प्रतिनिधि बैठक करने वाले हैं जिसके लिए एक मुस्लिम पत्रकार मध्यस्थता में जुटे हैं। क्या होगा ये कहना कठिन है । यद्यपि दोनों पक्ष सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को स्वीकार करने पर राजी हैं किंतु वह एक पक्ष की नाराजगी का कारण तो बनेगा ही। दोनों उससे सन्तुष्ट हो जाएं ये कहना कठिन है किन्तु अदालत के बाहर यदि किसी फार्मूले पर सहमति बन जाए तो न तुम हारे , न हम हारे वाली स्थिति बन जाएगी । प्रधानमंत्री यदि व्यक्तिगत रुचि लें तो आपसी सहमति से इस विवाद को हल किया जाना सम्भव हो सकता है लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को कुछ न कुछ तो पीछे हटना पड़ेगा । श्री श्री की कोशिशें कितनी सफल होंगी ये बता पाना मुश्किल है किन्तु दिल मिले न मिले , हाथ मिलाते रहिये की तर्ज पर मेल-मुलाकात भी कुछ बुरी नहीं है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

मप्र:बीमारू न सही बीमार तो है

चूंकि ये किसी विपक्षी नेता या पार्टी द्वारा कही गई बात नहीं है अतः इस पर गम्भीरता से ध्यान दिए जाने की अवश्यकता है। नीति आयोग ने राज्यों के स्वास्थ्य सूचकांको की जो जानकारी प्रसारित की उसके मुताबिक केरल जहां सबसे अव्वल और उप्र सबसे नीचे है वहीं अपना मप्र 17 वीं पायदान पर है । बीते दो सालों से मप्र इसी स्थान पर बना हुआ है यद्यपि मूल्यांकन में उसके 1 प्रतिशत अंक जरूर बढ़े हैं । स्वास्थ्य सूचकांक के अंतर्गत अनेक मापदण्ड तय किये गए थे जिनमें प्रदेश की स्थिति कहीं ऊपर कहीं नीचे दर्शाई गई किन्तु समग्र आकलन में वह देश भर में 17 वें स्थान पर बना हुआ है । हालांकि संतोषी प्रवृति के लोग इस सर्वेक्षण पर खुश हो सकते हैं क्योंकि मप्र ने अपना 17 वाँ स्थान बरकरार रखा किन्तु स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में इतने नीचे बने रहना न सिर्फ  चिंता अपितु शर्म का भी विषय है । 2003 में जब भाजपा सत्ता में आई उसके पहले तक मप्र बीमारू राज्यों की ज़मात का सदस्य कहलाता था । बीते करीब 15 वर्ष में वह कलंक तो धुल गया लेकिन बीमारू न सही लेकिन बीमार राज्य के रूप में मप्र का बना रहना नजरें नीची झुकाने को बाध्य करता है । प्रारंभिक दो वर्ष छोड़कर शिवराज सिंह चौहान ही लगातार सत्ता में बने हुए हैं इसलिए वे या उनकी सरकार का कोई नुमाइंदा पर्याप्त अवसर न मिलने जैसी सफाई देकर बच नहीं सकता । शिवराज सरकार ने कृषि , उद्योग और पर्यटन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये। जन कल्याण के अनेक कार्यों के लिए तो मुख्यमंत्री की देश भर में सराहना भी हुई तथा उनमें से कुछ को दूसरे राज्यों ने अपनाया भी किन्तु जन स्वास्थ्य को लेकर बीते डेढ़ दशक में राज्य सरकार ऐसा कुछ भी नहीं कर सकी जिससे लगता कि उसने इस दिशा में समुचित प्रयास किये हों। जननी सुरक्षा योजना  और दीनदयाल कार्ड के  जरिये साधनहीन लोगों की चिकित्सा के जो प्रबन्ध राज्य सरकार की ओर से हुए वे निश्चित रूप से प्रशंसनीय किन्तु अपर्याप्त हैं क्योंकि जिला सरकारी अस्पताल और मेडीकल कालेजों के चिकित्सालयों की तो छोड़िए प्राथमिक चिकित्सा केंद्र तक बदहाली के शिकार हैं ।अस्पताल है तो चिकित्सक नहीं और वह है तो नर्स एवं अन्य स्टाफ गायब। दवाएं व एक्सरे जैसी छोटी-छोटी चीजों तक का अभाव साधारण बात है। कहाँ तो मुख्यमंत्री कैंसर और ह्रदय रोग की निःशुल्क चिकित्सा का वायदा करते हैं वहीं दूसरी तरफ कुत्ते के काटने पर लगने वाला एंटी रैबीज इंजेक्शन तक सरकारी अस्पतालों में नसीब नहीं होता । कहने का आशय ये है कि शिवराज जी ने मप्र में भूटान से आनन्द सूचकांक की अवधारणा ग्रहण करते हुए प्रदेश में आनंदम विभाग तक बनवा दिया लेकिन स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो बुरी स्थिति है वह आनन्द की किसी भी अनुभूति की भ्रूण हत्या कर देती है । जब जिला और सम्भाग स्तर पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के चरमराने जैसे हालात हों तब ग्रामीण और आदिवासी अंचलों की कल्पना करना कठिन नहीं होगा । नीति आयोग की रिपोर्ट में दर्शाए सूचकांक को विपक्षी दल यदि आगामी विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनाते हुए इसे शिवराज सरकार की विफलता बताएं तो उसमें गलत कुछ भी नहीं होगा । अब चूंकि चुनाव सिर पर आ गए हैं तब प्रदेश से किसी चमत्कार की उम्मीद करना तो बेमानी होगा लेकिन  मुख्यमंत्री को ऐसा कुछ तो करना ही चाहिए जिससे जनता को लगे कि सरकार केवल नेताओं और बड़े अफसरों के स्वास्थ्य के लिए ही फिक्रमंद नहीं अपितु उसे जनता की सेहत का भी ख्याल है। किसी विधायक , सांसद, मंत्री या वीआईपी कहाने वालों की तबियत नासाज होते ही एयर एंबुलेंस आ जाती है तथा उन्हें मेदांता सरीखे सेवन स्टार अस्पताल का इलाज उपलब्ध करवाया जाता है लेकिन मुल्क की मालिक कहलाने वाली जनता को धरती वाली एम्बुलेंस भी नसीब नहीं हो पाती । नीति आयोग का स्वास्थ्य सूचकांक शिवराज सरकार के लिए चांटा भी है और चुनौती भी । देखें मानवीयता और संवेदनशीलता के प्रतीक मुख्यमन्त्री इस पर क्या कहते और उससे भी बढ़कर कहें तो क्या करते हैं ?

-रवीन्द्र वाजपेयी