Thursday, 5 April 2018

इसके पहले कि चीन कुछ करे ....

इसे शीतयुद्ध का नया संस्करण भी कह सकते हैं। अमेरिका और चीन के बीच खींचातानी ने आर्थिक महायुद्ध की जो शुरुवात कर दी है उससे पूरा विश्व प्रभावित हो रहा है। दोनों महाशक्तियों ने आयात शुल्क नामक हथियार के जरिये इस लड़ाई की शुरुवात की दो दिन पहले अमेरिका ने चीन से आयातित हो रही सवा सौ वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाकर व्यापार घाटे से बचाव का कदम उठाया था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो पद पर आते ही आर्थिक क्षेत्र में आक्रामक नीतियां अपनाकर अमेरिका की डगमगाती अर्थव्यवस्था को टेका लगाने की इच्छाशक्ति दिखाते आए हैं। चीनी वस्तुओं पर आयात शुल्क में वृद्धि जैसा निर्णय उसी का परिणाम माना जा रहा था लेकिन चीन ने भी ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं की और 24 घण्टे के भीतर जवाबी कार्रवाई करते हुए 100 से ज्यादा अमेरिकी वस्तुओं पर ड्यूटी बढ़ाकर हिसाब बराबर कर दिया। पूरी दुनिया इससे चिंतित है। खबर ये भी है कि चीन भारतीय वस्तुओं पर भी आयात शुल्क बढ़ा सकता है जिसके पीछे आर्थिक कारण न होकर कूटनीतिक दबाव है। यथपि भारत से चीन को होने वाला निर्यात बेहद कम है जबकि आयात कई गुना ज्यादा। जिससे व्यापार घाटा तो भारत के हिस्से में ही है किंतु अमेरिका से बढ़ती नजदीकी और डोकलाम में चीन के विरुद्ध जबरदस्त मोर्चेबन्दी ने बीजिंग को नाराज कर रखा है। यदि चीन भारतीय वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाता है तब भारत को भी समूचे चीनी आयात पर ड्यूटी बढ़ाने जैसा साहसिक कदम उठाना चाहिये। यूँ भी इसकी मांग भारतीय उद्योग लम्बे अरसे से करता आ रहा है क्योंकि सस्ते चीनी सामान के धड़ल्ले से हुए आयात ने घरेलू उद्योगों की कमर तोड़ रखी है। इसलिए बेहतर होगा चीन के निर्णय का इंतज़ार न किया जावे। भारत आज की तारीख में चीनी वस्तुओं का सबसे बड़ा बाजार है। उसकी तुलना में चीन को किया जाने वाला निर्यात ऊंट कर मुंह में जीरे से भी कम है। आयात शुल्क बढ़ाने से चीनी सामान मंहगा हो जाएगा जिससे भारतीय उत्पाद सस्ते होकर प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने लायक बन सकेंगे। जाहिर है चीन ऐसी कार्रवाई से भड़क उठेगा किन्तु अभी भी वह भारत की सताने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता। ऐसे में भारत सरकार को दबाव बनाने का प्रयास करना चाहिए। चीन अब एक व्यवसायिक देश बन चुका है। सैन्य शक्ति में भले ही वह हमसे ताक़तवर हो परन्तु भारत उसके सामान पर आयात शुल्क बढ़ाने की हिम्मत दिखाए तो उसके कूटनीतिक पैंतरे भी कमजोर पड़े बिना नहीं रहेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 April 2018

साधु-संतों को राज्यमंत्री का दर्जा देना निरर्थक

मप्र सरकार द्वारा कुछ संतों को राज्यमंत्री का दर्जा देने के फैसले पर टीका-टिप्पणी हो रही है। मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान द्वारा चलाये जा रहे नर्मदा संरक्षण अभियान को मजबूती देने  के उद्देश्य से कतिपय साधु-संतों को सरकारी हैसियत दिए जाने के पीछे आगामी विधानसभा चुनाव बताया जा रहा है। सही बात तो ये है कि मुख्यमंत्री का वह महत्वाकांक्षी अभियान करोड़ों रुपये की बर्बादी के बाद भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। 6 करोड़ पौधे लगाने के दावे भी फुस्स होकर रह गए। न तो नर्मदा का प्रदूषण दूर हुआ और न है अवैध रेत उत्खनन रुका। चुनाव करीब आने से श्री चौहान के पास नर्मदा अभियान के लिए समय नहीं  है लिहाजा उन्होंने कुछ बाबाओं को उस काम में लगा दिया। साधु-संतों को राजगुरु बनाने की प्राचीन परंपरा तो रही है लेकिन राज्यमंत्री जैसा दर्जा देना अटपटा लगता है क्योंकि इस तरह के ओहदे से तो सत्ताधारी पार्टी के तमाम छुटभैये तक नवाजे जा चुके हैं। चुनाव जीतकर तो अनेक साधु-संत मंत्री बन जाते हैं। लेकिन ये दर्जा जैसी बात उन्हें शोभा नहीं देती । हो सकता है ऐसा करने के पीछे श्री चौहान की मंशा बाबाओं को सरकारी सुविधाएं एवं प्रशासन का सहयोग दिलवाने की हो लेकिन ये बात भी सत्य है कि नर्मदा का सत्यानाश करने में साधु-संतों का भी कम हाथ नहीं है जो अपना आभामंडल बनाने के फेर में नदी के किनारों पर कांक्रीट के ढांचे खड़े कर बैठ गए हैं। यदि इन भगवाधारी बैरागियों में वाकई नर्मदा के संरक्षण का भाव है तो यह काम वे बिना सरकारी रुतबा लिए करें तब समाज भी बिना संकोच किये उनके साथ खड़ा हो जाएगा। विनम्रता की प्रतिमूर्ति शिवराज सिंह जिन संतों की सार्वजनिक रूप से चरणवंदना करते हैं उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा देना पूरी तरह अव्यवहारिक है क्योंकि ये ओहदा शासकीय शिष्टाचार में मुख्यमंत्री से नीचे होता है। इससे भी बड़ी बात ये है सच्चे साधु-सन्त फक्कड़ ही अच्छे लगते हैं। मंत्री पद उनके सामने लगता कहाँ है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

मायावती ने भी गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले पर तत्काल रोक लगाने इंकार करते हुए जो बातें अटॉर्नी जनरल से कहीं यदि दलितों के नेता ठीक से समझ लें तब उनका गुस्सा ठंडा हो सकता है लेकिन जिस तरह से देश के बड़े हिस्से में आंदोलन की आग फैलाई गई वह स्वप्रेरित न होकर पूरी तरह प्रायोजित लगती है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत दिवस सरकार द्वारा प्रस्तुत पुनर्विचार याचिका पर जो कहा उस पर दलित समुदाय के समझदार लोगों को गम्भीरता से विचार करना चाहिए क्योंकि उसके जिस निर्णय को लेकर दलित वर्ग आसमान सिर पर उठाए हुए है वैसा ही निर्णय  बसपा की अध्यक्ष और दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा कही जाने वाली मायावती ने बतौर मुख्यमंत्री उप्र में 2007 में ही कर लिया था। दलित समुदाय को आपत्ति इस बात पर है कि अनु.जाति/जनजाति कानून के उस प्रावधान को सर्वोच्च न्यायालय ने बदल दिया जिसके तहत दलित वर्ग के उत्पीडऩ की रिपोर्ट पर तत्काल गिरफ्तारी का प्रावधान था। मायावती ने वह कदम उप्र के सवर्ण समाज को खुश करने के लिए उठाया था। उल्लेखनीय है 2007 में मायावती को उप्र की सत्ता मिलने के पीछे उच्च जातियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी जो मुलायम सिंह यादव के राज में उनके सजातीय लोगों के कारनामों से त्रस्त हो गईं थीं। उस दौर में मायावती पर उच्च जातियों को खुश करने की धुन इस कदर सवार हुई कि तिलक, तराजू और तलवार - इनको मारो जूते चार का नारा हाथी नहीं गणेश है - ब्रह्मा, विष्णु, महेश है, में बदल गया। बहुजन समाज पार्टी को ब्राह्मण समाज पार्टी तक कहा जाने लगा। खुद को दलित समुदाय  की बजाय सर्व समाज का नेता साबित करने के फेर में मायावती ने दलितों की एफआईआर पर तत्काल गिरफ्तारी की जगह शिकायत की विवेचना उपरांत कार्रवाई करने जैसा संशोधन करवा दिया जिसका कोई विरोध न तो उप्र में हुआ न ही देश के किसी अन्य हिस्से में दलित समुदाय से विरोध का कोई स्वर उठा। बीते दो दिनों में ये बात कई मर्तबा उठी लेकिन समूची राजनीतिक जमात के बीच दलित तुष्टीकरण की जो होड़ मची उसमें मायावती सरकार के उस कृत्य को जान बूझकर उपेक्षित किया गया। अब जबकि वह बात स्पष्ट हो गई है तब दलितों को भड़काकर समाज में जातिगत संघर्ष उत्पन्न करने वालों की नीयत का भी पर्दाफाश होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के दो टूक इंकार और स्पष्टीकरण के बाद अब दलित वर्ग द्वारा मायावती को कठघरे में खड़ा करना चाहिए जिन्होंने अपनी सत्ता की सुरक्षा की खातिर अपने प्रतिबद्ध समर्थक वर्ग को धोखा दिया। यदि मायावती का वह फैसला दलित विरोधी नहीं था तब सर्वोच्च न्यायालय का ताजा निर्णय किस तरह दलितों के लिए नुकसानदेह है ये विचारणीय प्रश्न है। दलितों को तो चलो छोड़ भी दें लेकिन सवर्णों के आधिपत्य वाली भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी यदि दलितों के वोटों की लालच में सच्चाई को सामने लाने से डर रही हैं तब ये मान लेना ही सही रहेगा कि समाज को जातियों के नाम पर बांटने के पाप में वे भी बराबरी की साझेदार हैं। गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल द्वारा दी गई दलीलों की जिस तरह धज्जियां उड़ाईं उससे एक बात तो साफ  हो ही गई कि राजनीतिक दलों की तरह न्यायपालिका न तो किसी भी तरह के अपराधबोध से ग्रसित है और न ही उसे वोट बैंक के बिखरने का डर है। जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आया था उसके बाद यदि भाजपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेतागण मायावती सरकार के सन्दर्भित फैसले को सामने रखकर दलित समुदाय को समझाइश देते तब हो सकता है हालात इतने न बिगड़े होते। इसके ठीक उलट भाजपा ख़ुद को दलितों का सबसे बड़ा हिमायती साबित करने में जुट गई वहीं कांग्रेस उसे दलितों का दुश्मन ठहराने के लिए उठापटक में व्यस्त हो गई। उसके बाद जो हुआ वह सबके सामने है। सर्वोच्च न्यायालय ने 10 तारीख को पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करने कहा है। लगे हाथ उसने साफ  कर दिया कि न तो वह दलित  विरोधी है और न ही उंसने मूल कानून को बदला है। दण्ड विधान संहिता की मंशानुसार बिना जांच किये सीधे गिरफ्तारी को रोकने जैसे निर्णय को बिना पूरी तरह समझे चारों ओर भय का वातावरण बना देना पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना कदम है। भाजपा का उच्च नेतृत्व भी इस मुद्दे पर व्यर्थ के दबाव में आ गया। कुल मिलाकर ये मामला राजनीतिक बिरादरी की अपरिपक्वता को उजागर कर गया। दलितों की आड़ में बीते दो दिनों में जो कुछ भी हुआ या किया गया वह किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा लगता है, जिसका पर्दाफाश जरूरी है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 April 2018

प्रतिक्रिया स्वरूप सवर्ण गोलबंदी की आशंका

गत दिवस देश के कुछ हिस्सों में भारत बंद के दौरान हुई हिंसा में 14 लोगों की मौत हो गई। वाहन और दुकानें जलाई गईं  तथा रेलों को  भी रोका गया । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनु.जाति/जनजाति कानून के कुछ प्रावधानों में हल्के से बदलाव से नाराज दलित संगठनों ने अपना गुस्सा जिस तरह निकाला उसने जातीय संघर्ष की नई पटकथा लिख दी है । किसी भी पार्टी और नेता ने आंदोलन के स्वरूप की आलोचना करने का दुस्साहस नहीं किया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो भाजपा और रास्वसंघ पर दलितों को दबाने का आरोप लगाकर हिंसक आंदोलन का अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन कर दिया । भाजपा भी अपने ही दलित सांसदों के दबाव में थी। इसीलिए केंद्र सरकार ने  बिना देर किये सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका पेश कर दी लेकिन उससे दलित संगठनों के गुस्से पर कोई असर नहीं हुआ वरना बन्द वापिस लिया जा सकता था । न्यायालय अपने फैसले को बदलेगा या नहीं ये तो वही जाने लेकिन इस विवाद ने आरक्षण के विरोध में नए सिरे से माहौल बना दिया है । सोशल मीडिया पर जिस तरह से सवर्ण समुदाय मुखर हो उठा उसने भविष्य में नये आंदोलन की बुनियाद तैयार कर दी है। दलित समाज की आबादी के आंकड़े सामने आने से सुगबुगाहट और बढ़ गई है । क्रीमी लेयर वाला सवाल भी उठने लगा है । आरक्षण के कारण होने वाली योग्यता की उपेक्षा और प्रतिभा पलायन की चर्चा भी चल पड़ी है । पाटीदार और जाट आंदोलन के संचालक भी पसोपेश में हैं क्योंकि दलित समुदाय के गोलबंद हो जाने से ओबीसी वर्ग की चिंताएं बढ़ चली हैं। कुल मिलाकर धजी का सांप बनाने में दलित नेता कामयाब तो हो गए लेकिन जल्दबाजी और अति उत्साह में उन्होंने जो गलती कर दी वह उनके विरुद्ध सवर्ण समुदाय की गोलबंदी का कारण बन सकती है । दरअसल दलित समुदाय की सबसे बड़ी समस्या उसमें सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव है । द. आंबेडकर के पौत्र प्रकाश आंबेडकर भले ही दलित राजनीति के चेहरे हों किंतु उनकी राजनीतिक वजनदारी न के बराबर है । महाराष्ट्र में कई दिग्गज दलित नेता हुए किन्तु एक भी राष्ट्रीय स्तर पर  स्वीकार्यता नहीं बना सका । बसपा के संस्थापक कांशीराम ने जिस चतुराई से कर्मचारी संगठन को राजनीतिक दल में तब्दील किया वह राष्ट्रीय स्तर पर दलित नेतृत्व की श्रृंखला तैयार करने की बजाय मायावती के राजतिलक में उलझ गया जिसकी परिणिति ये हुई कि मायावती के बाद बसपा के दूसरे बड़े नेता के तौर पर मनुवादी सतीशचन्द्र मिश्रा स्थापित हो गए और लगातार राज्यसभा में जमे हुए हैं । बसपा चाहती तो श्री मिश्रा जो कि स्वयं बड़े वकील हैं , के जरिये सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका लगवाकर वैधानिक लड़ाई लड़ सकती थी लेकिन वैसा नहीं किया गया और पूरे देश में सामाजिक संघर्ष के नए हालात उत्पन्न कर दिए जो कालांतर में विभाजनकारी शक्तियों के लिए मददगार बने बिना नहीं रहेंगे । देश का दुर्भाग्य है कि दलितों के उद्धार की जो समन्वयवादी और समरसता के भाव से प्रेरित सोच थी वह वोट बैंक का रूप ले बैठी जिसे सुरक्षित रखने के लिए घृणा का बीज बोया जा रहा है। आरक्षण को लेकर समाज के एक बड़े वर्ग में जो असंतोष था वह अब आक्रोश में बदलने लगा है तो उसके पीछे वही राजनीति है जो बजाय जातिगत भेदभाव को मिटाने के उल्टे उसे खाद पानी देकर  समाज को खण्ड - खण्ड करने का षड्यंत्र रच रही है । शिक्षित हो रही नई पीढ़ी में जाति के प्रति पहले जैसा आग्रह नहीं होने के बावजूद दलित आंदोलन के नाम पर किये गए उपद्रवों से हालात सुधरने की जगह बदतर होने का भय बढ़ गया है । सोशल मीडिया पर प्रसारित कतिपय संदेशों के मुताबिक सवर्ण जातियों द्वारा शीघ्र ही आरक्षण के विरोध में भारत बंद का आयोजन होने वाला है । ऐसे में डॉ. आंबेडकर की छवि समाज सुधारक की  बजाय खलनायक की बनने के  आसार भी बन सकते हैं । संविधान निर्माता के तौर पर प्रतिष्ठित डॉ. आंबेडकर ने भी आरक्षण को स्थायी प्रावधान नहीं माना था । बावजूद उसके उसकी समयावधि खत्म होने के पहले ही उसे आगे बढ़ाया जाता रहा तथा किसी राजनीतिक दल ने उसका विरोध नहीं किया । लेकिन दलित समुदाय के आधुनिक रहनुमाओं की करतूतों को देखते हुए कहा जा सकता है कि ये लोग डॉ. अंबेडकर के प्रति जो सम्मान का भाव है उसे नष्ट करने पर आमादा हैं। दुर्भाग्य से चाहे कांग्रेस और भाजपा हो या क्षेत्रीय पार्टियां , सब दलित वोट बैंक के मोहपाश में बंधकर रह गई हैं वरना मोदी सरकार इतनी जल्दी सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार हेतु अर्जी नहीं लगाती। इतने संवेदनशील अवसर पर राहुल गांधी द्वारा भाजपा और रास्वसंघ पर तोहमत लगाना भी गैर जिम्मेदाराना कृत्य है । दलितों से सभी को हमदर्दी है । इतिहास की गलतियों को सुधारकर एक समतामूलक समाज की स्थापना भला कौन नहीं  चाहेगा? लेकिन आरक्षण की मौजूदा स्थिति को देखते हुए ऐसा कर पाना कठिन दिख रहा है क्योंकि दलित समुदाय की दयनीय स्थिति को सुधारने की बजाय मायावती और प्रकाश आंबेडकर जैसे नेता अपना महिमामंडन करने में जुटे हुए हैं। दलित समाज के शिक्षित  वर्ग को ये समझना चाहिये कि उनके नेता कितने ईमानदार हैं ? जिस तरह से मुसलमानों को महज मतदाता मानकर 70 साल तक उनका शोषण किया जाता रहा वही हालत दलित समुदाय की बनती जा रही है। उसे आरक्षण नामक जो झुनझुना पकड़ा दिया गया है उसकी आवाज भी दिन ब दिन कर्कश होती जा रही है । माना कि राष्ट्रीय जीवन नें 70 साल बहुत नहीं होते और सदियों से चली आ रही बुराई को आसानी से खत्म कर पाना भी कठिन है किंतु दलित नेताओं को ये नहीं भूलना चाहिए कि ज़हर के बीजों से आम के पेड़ नहीं उगेंगे । यदि वे भी वही करने का प्रयास करेंगे जो उनके साथ होता रहा तब वह अपनी आने वाली पीढ़ी को फिर से उसी खाई में धकेलने का अपराध होगा जिससे वे खुद अभी तक बाहर नहीं निकल सके ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 April 2018

उत्पीडऩ और प्रताडऩा दोनों गलत


दलित संगठनों द्वारा आज भारत बंद का जो आयोजन किया गया उसके औचित्य और आवश्यकता को लेकर बहस चल पड़ी है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बीते दिनों अनु.जाति/जनजाति कानून के अंतर्गत बिना जांच किये किसी पर मुकदमा और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इसका उद्देश्य उक्त कानून का दुरुपयोग रोकना है। पूर्व में दलित उत्पीडऩ की शिकायत पर तत्काल प्रकरण दर्ज करते हुए मुकदमा कायम करने की जो व्यवस्था थी उसका बेजा उपयोग होने की खबरें अक्सर आया करती थीं। यही हाल तकरीबन दहेज विरोधी कानून के साथ भी था जिसमें वधु पक्ष द्वारा की गई रिपोर्ट के बाद पुलिस वर के पूरे परिवार को ही पकड़ लेती थी। उस के बारे में भी पर्याप्त जांच के बिना गिरफ्तारी किये जाने पर रोक लगा दी गई। सर्वविदित है कि दहेज संबंधी शिकायत पर किस तरह पुलिस बुजुर्गों तक को उठाकर ले आती थी। अनु.जाति/जनजाति कानून का भी इसी तरह दुरूपयोग होने की शिकायतों पर सर्वोच्च न्यायालय ने बिना जाँच किये गिरफ्तारी और मुकदमे पर रोक लगाने वाला जो फैसला किया वह हर दृष्टि से विधि सम्मत और उचित है। लेकिन उसको लेकर राजनीति शुरू हो गई। फैसला दिया सर्वोच्च न्यायालय ने और आलोचना प्रारम्भ हो गई केंद्र सरकार की। कर्नाटक चुनाव सिर पर होने से सरकार भी दबाव में आ गई और आज ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पुनर्विचार हेतु अर्जी लगाने की बात गत रात्रि सामने आ गई। दलित संगठनों के बंद में शासकीय कर्मचारी भी सामूहिक अवकाश लेकर  शामिल होंगे। इस तरह उनके साथ ही वोटों के सौदागरों ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को अन्यायपूर्ण साबित करने के लिए घेराबंदी कर डाली। आगे क्या होगा ये कह पाना कठिन है किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने सन्दर्भित कानून के प्रावधानों को लागू करने में होने वाली जल्दबाजी को रोकने का काम किया तो उसमें गलत क्या है? केंद्र सरकार भी वोट बैंक के दबाव में व्यर्थ के अपराधबोध से ग्रसित हो गई। दलितों के सम्मान और सुरक्षा की जरूरत से कोई इनकार नहीं करेगा। अनु.जाति/जनजाति सम्बन्धी कानून से भी किसी को ऐतराज नहीं है। दलित समुदाय का अपमान और शोषण करने वालों के साथ कोई रियायत भी नहीं होनी चाहिये  लेकिन यदि उन्हें बराबरी पर लाना है तो फिर बहुत सी दीवारें गिरानी होंगी। दलित समुदाय का असली शोषण तो उसके नाम से नेतागिरी कर रहे सफेदपोश करते हैं फिर चाहे वे राजनीतिक नेता हों या कर्मचारी संगठनों के कर्ताधर्ता। आज के बंद से सरकार पर भले दबाव बना दिया जावे किन्तु सर्वोच्च न्यायालय पर इसका कोई प्रभाव शायद ही पड़े जिसने कानून के अव्यवहारिक प्रावधान को बदलने का फैसला दिया। उसे सीधे-सीधे दलित विरोधी बता देना न्यायपालिका के प्रति भी एक तरह का अविश्वास है। सबसे बड़ी बात ये है कि दलितों के सम्मान से खिलवाड़ जितना बड़ा अपराध है उतना ही दलित उत्पीडऩ के झूठे आरोप में किसी को अकारण प्रताडि़त करना भी। उस दृष्टि से जिस तरह का सुधार न्यायपालिका ने दहेज विरोधी कानून में किया करीब-करीब वैसा ही अनु. जाति/जनजाति कानून में किया गया तब उसे सकारात्मक भाव से लिया जाना चाहिए। भारत बंद को पूरे समाज का समर्थन मिलता तब तो सर्वोच्च न्यायालय को भी एक बार सोचना पड़ेगा लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों का समर्थन भी शायद ही मिल सकेगा। अब जरा सोचें कि कल को अनु.जाति और जनजाति को छोड़कर शेष जातियों ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के समर्थन में जवाबी शक्ति प्रदर्शन कर दिया तब बेमतलब के संघर्ष की स्थिति समाज में पैदा होना तय है। इसलिए बेहतर होगा दलित समाज बहकावे में न आए। सामाजिक समरसता के लिए दोनों हाथ से ताली बजाना जरूरी है। दलितों पर अत्याचार किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए किन्तु दलित उत्पीडऩ के नाम पर बेकसूर लोगों को प्रताडि़त किये जाने की छूट भी नहीं दी जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के परिप्रेक्ष्य में वोटों की जो खींचातानी शुरू हो गई वह अच्छा संकेत नहीं है क्योंकि इससे दलित वर्ग को समाज की मुख्य धारा में लाने की प्रक्रिया के अवरुद्ध होने का भय है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

जनता का तेल निकाल रहे पेट्रोल-डीजल

पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम पदार्थों के दाम अचानक उछलने से आम जनता हलाकान है। मोदी सरकार के दौरान उक्त वस्तुओं की कीमतें उच्चतम स्तर को छू गईं हैं। बेशक इसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं किंतु भारत सरकार ने कीमतें कम होने का लाभ चूंकि भारतीय उपभोक्ता को नहीं दिया इसलिये वह वैश्विक मंडी की तेजी से कीमतें बढऩे के औचित्य को साबित करने का नैतिक अधिकार भी खो चुकी है। तेल कंपनियों के पिछले घाटे की भरपाई के नाम पर अंधाधुन्ध करारोपण के जरिये जनता का तेल निकालने की जो धूर्तता बीते चार वर्ष में की जाती रही उसकी वजह से प्रधानमन्त्री की छवि पर भी विपरीत असर पड़ा है। आयातित कच्चे तेल की कीमतें बढऩे के बाद भी यदि केंद्र और राज्य सरकारें अपने करों को युक्तियुक्त रखें तब भी पेट्रोल-डीजल के दाम कम से कम 25 रु. प्रति लीटर तो कम हो ही सकते हैं। भाजपा शासित गोवा में ऐसा किया भी जा चुका है। विकास सम्बन्धी कार्यों के लिए पेट्रोल-डीजल पर की जा रही मुनाफाखोरी का औचित्य साबित करने की जो कोशिश सरकार की तरफ  से कभी-कभार होती है वह लोगों के गले नहीं उतरती क्योंकि जिस आसानी से विजय माल्या और नीरव मोदी अरबों रु. का घोटाला करने के बाद फुर्र हो गए उसकी वजह से आम जनता के मन में ये धारणा गहराई तक बैठ गई है कि मोदी सरकार अमीरों पर मेहरबानी करती है वहीं जनसामान्य के लिए परेशानी पैदा करना उसकी नीतिगत आदत बन चुकी है। समझ में नहीं आता कि ये लूटखसोट कब तक चलेगी? बीच में ये भरोसा जागा था कि पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के तहत लाया जावेगा जिससे उनके दाम घटकर क्रमश: 50 और 40 रु. प्रति लिटर हो जाएंगे किन्तु वह उम्मीद भी मृगमरीचिका लगने लगी है। ऐसा लगता है मोदी सरकार को आम जनता की तकलीफों और गुस्से का एहसास करवाने में भाजपा संगठन या तो उदासीन है या फिर सत्ता सुंदरी के सान्निध्य ने उसकी जुबान पर ताले डाल दिये हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी