Monday, 9 April 2018

अपनी लड़ाई छोड़ दूसरों के मोहरे बन गए हार्दिक

हार्दिक पटैल का नाम ढाई-तीन बरस पहले गुजरात में पाटीदार समाज के लिए आरक्षण की मांग को लेकर हुए आंदोलन के समय चर्चा में आया था। उस आंदोलन में खूब हिंसा हुई और तत्कालीन मुख्यमन्त्री आनंदीबेन पटैल को अपनी कुर्सी तक गंवाना पड़ी। एक समय ये युवक भाजपा के करीब था लेकिन अब उसका घोर विरोधी। गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में हार्दिक ने कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा को काफी नुकसान पहुंचाया था। यद्यपि वे भाजपा को सत्ता में आने से नहीं रोक सके लेकिन डेढ़ दर्जन सीटों के नुकसान की वजह से उसका बहुमत घटाने में जरूर सफल रहे। उस परिणाम के कारण वे भाजपा विरोधी खेमे के अत्यंत प्रिय बन बैठे। मप्र के मंदसौर में किसानों पर गोली चलने पर भी उन्होंने वहां आकर नेतागिरी करने का प्रयास किया था। गुजरात चुनाव के बाद हार्दिक विपक्षी एकता की मुहिम में भी सक्रिय दिखे। इन दिनों वे मप्र के चक्कर काट रहे हैं। मालवा में पाटीदार समाज काफी है। उसके अलावा भी प्रदेश के अन्य हिस्सों में पटैल बड़ी संख्या में हैं। उनको राज्य सरकार के विरुद्ध भड़काकर विधानसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान पहुँचाने की रणनीति के साथ हार्दिक काम कर रहे हैं। हालांकि अभी तक उन्होंने मप्र में गुजरात की तरह पाटीदार आंदोलन का कोई संकेत नहीं दिया लेकिन एक बात स्पष्ट है कि वे कांग्रेस के छद्म प्रचारक के तौर पर सक्रिय हैं। जिस तरह की भाषा और भावभंगिमा का वे प्रदर्शन कर रहे हैं उससे उनके इरादे ज़ाहिर हैं लेकिन सवाल ये उठता है कि हार्दिक ने गुजरात में पाटीदारों के लिए अपनी लड़ाई विधानसभा चुनाव सम्पन्न होते ही खत्म क्यों कर दी? यदि उनका उद्देश्य वाकई पाटीदारों का हित संवर्धन करना था तब वे चुनाव के बाद भी नई सरकार पर तत्सम्बन्धी दबाव बनाते लेकिन ऐसा लगता है मानों उनका उद्देश्य भाजपा के लिए मुसीबतें पैदा करना मात्र था। गुजरात के पाटीदार बहुल इलाकों में भाजपा को काफी नुकसान हुआ। हार्दिक के प्रभाव में आकर उन्होंने कांग्रेस को वोट तो दे दिया किन्तु उसके बदले में उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ। भाजपा से उनकी दूरी बन गई और कांग्रेस कुछ देने में सक्षम नहीं रही। हार्दिक को भी जब लगा कि फिलहाल वे पाटीदारों को आरक्षण नहीं दिलवा सकेंगे तो उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बाहर हाथ पांव मारने शुरू कर दिए। मप्र के उनके दौरे पाटीदारों के फायदे के लिए न होकर ऐलानिया तौर पर भाजपा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से हो रहे हैं जिसके पीछे निश्चित रूप से कांग्रेस का समर्थन है। इंदौर में हार्दिक पर स्याही फिंकने की घटना पर ज्योतिरादित्य सिंधिया का त्वरित बयान इसका प्रमाण है। लेकिन इस सबसे हटकर देखें तो हार्दिक सरीखे नेता जनता की भावनाएं भड़काकर क्षणिक उन्माद तो पैदा कर देते हैं लेकिन उसके उपरांत वे असली मकसद को भूलकर अपने स्वार्थ साधने में लग जाते हैं। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो उसके लिए हार्दिक जैसे चेहरे मात्र दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। वैचारिक दृष्टि से हार्दिक की कोई प्रतिबद्धता नहीं है। उनका अपना कोई दल भी नहीं है। ये देखते हुए लगता है वे भी अरविंद केजरीवाल की तरह केवल अपनी महत्वाकांक्षाओं की खातिर मैदान में उतरे हैं। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का अपहरण कर आम आदमी पार्टी का गठन और फिर दिल्ली की सत्ता हासिल करने के बाद श्री केजरीवाल ने किस तरह की राजनीति की ये सर्वविदित है। पहले -पहल तो उन्हें समर्थन देकर कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनवा दिया लेकिन बाद में वही आम आदमी पार्टी दिल्ली में कांग्रेस के समूल नष्टीकरण का कारण बन गई। शुरू शुरू में केजरीवाल एंड कम्पनी को लगा कि वे हिंदुस्तान को जीतने लायक हो गए हैं लेकिन बाद में उनका वह सपना धूल में मिल गया। सीधे प्रधानमंत्री पर हमले करने की रणनीति अपनाकर खुद को तुर्रमखां साबित करने की उनकी मूर्खता हाल ही में थोक के भाव मांगी गई माफियों से उजागर हो गई। हार्दिक को भी ये लग रहा है कि छोटे मुंह बड़ी बात करने से वे भी बड़े सियासतदां बन सकेंगे किन्तु वे भूल रहे हैं कि उन जैसे अनेक मौसमी नेता देश और प्रदेशों में पैदा हुए और धूमकेतु की तरह छाने के बाद गुमनामी के शिकार हो गए। इसकी वजह उनका मुख्य उद्देश्य को छोड़ निजी महिमामंडन में जुट जाना रहा। हार्दिक की पकड़ गुजरात में तो पूरी तरह बन नहीं सकी। पाटीदार समाज के बीच भी उनका प्रभाव अब पहले जैसा नहीं रहा। क्योंकि उनके बीच भी ये भावना जोर मारने लगी है कि आरक्षण के फेर में हासिल तो कुछ हुआ नहीं ऊपर से भाजपा के साथ पुराने रिश्ते बिगड़ गए। जब हार्दिक को लगने लगा कि गुजरात में फिलहाल उनके पास करने को कुछ बचा नहीं है तो वे बाहर हाथ पांव मारने लगे। सवाल ये है कि भाजपा से उनका विरोध है किस कारण? यदि हार्दिक किसी राजनीतिक विचारधारा को मानते हैं तो उन्हें उसका खुलासा करने चाहिए क्योंकि जब वे जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर के साथ बैठकर नरेंद्र मोदी और भाजपा को गरियाते हैं तब वे पाटीदार आंदोलन के नेता की बजाय केवल भाजपा विरोधी नजर आते हैं। मप्र में उनकी चहलकदमी के पीछे यदि पाटीदारों को संगठित करना होता तब उनकी छवि अपेक्षाकृत बेहतर होती किन्तु अब उनकी पहिचान उस शख्स जैसी बनती जा रही है जो नकारात्मक राजनीति करने के लिए किसी का भी मोहरा बनने तैयार हो जाता है। यही हाल रहा तो राजनीति में हार्दिक ज्यादा दूर तक नहीं चल पाएँगे क्योंकि वे अपना मकसद भूलकर दूसरों के हाथ के औजार बन गए हैं। मप्र में वे भाजपा का कितना नुकसान और कांग्रेस का कितना फायदा कर सकेंगे ये तो अभी निश्चित नहीं है किंतु इतना तय है कि गुजरात में उनका आभामंडल कमजोर होते-होते नष्ट होना अवश्यम्भावी है। क्षेत्रीय छत्रप बनने के पहले ही राष्ट्रीय नेता बनने की उनकी कोशिशें चौबे जी के छब्बे बनने के फेर में दुबे बन जाने जैसी हो सकती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 April 2018

जो देश को चलाती है वह खुद नहीं चलती !

आखिरकार संसद का बजट सत्र बिना कुछ खास किये ही समाप्त हो गया। दो चरणों में चले इस सत्र में बजट पारित तो हो गया किन्तु उस पर कोई चर्चा नहीं हुई। हंगामे के बीच ध्वनि मत से उसे मंजूरी मिल गई। ऐसा ही राष्ट्रपति के अभिभाषण को लेकर हुआ। यहां तक कि उस पर प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान पूरे समय टीका-टिप्पणी चलती रही। आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर सरकार और एनडीए छोडऩे वाली तेलुगू देशम पार्टी के साथ कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों ने अपने-अपने मुद्दों पर दबाव बनाने के लिए संसद को औजार बनाया और बजट सत्र सरीखे महत्वपूर्ण अवसर को एक तरह से बर्बाद कर दिया। सत्र के दूसरे चरण में कार्रवाई नहीं चलने की वजह से एनडीए सांसदों द्वारा वेतन-भत्ते नहीं लेने का निर्णय तो अच्छा कदम है लेकिन मात्र इतने से ही उस नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती जो संसद को ठप्प रखने से हो गया। कांग्रेस और भाजपा दोनों एक दूसरे को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं , वहीं क्षेत्रीय दलों के अपने तर्क हैं लेकिन दोषारोपण के इस चिरपरिचित खेल को देखते-देखते अब लोग त्रस्त हो चुके हैं। सही मायनों में मुद्दा संसद के अधिवेशनों पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये से कहीं अधिक सांसदों में बढ़ता जा रहा दायित्वबोध का अभाव है। बात-बात में संसद परिसर के भीतर बनी गांधी जी की प्रतिमा के सामने बैठकर फोटो खिंचवाने वाले सांसदों को इस बात पर तनिक भी लज्जा नहीं आती कि संसद को जाम करने का कृत्य राष्ट्रपिता का अपमान होने के साथ ही राष्ट्रीय अपराध भी है। बजट सत्र सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसीलिए उसकी अवधि भी सबसे अधिक रखी जाती है। बीते वर्ष की आर्थिक समीक्षा के साथ ही आगामी वर्ष की समूची योजना इसी सत्र में तय होती है। विपक्ष के पास इस दौरान अपनी बात रखने का समुचित अवसर होता है किंतु देश का दुर्भाग्य है कि वह भी क्षणिक राजनीतिक लाभ लेने के फेर में अपने संसदीय कर्तव्य से विमुख हो जाता है। तेलुगु देशम ने आंध्र को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर सदन न चलने देने की जिद पकड़ ली और अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस भेज दिया। कांग्रेस को लगा कि केंद्र सरकार को घेरने का ये अच्छा अवसर है तो उसने भी उस मुहिम को अप्रत्यक्ष समर्थन दे दिया। यदि वह कह देती कि अविश्वास प्रस्ताव पर समर्थन तभी मिलेगा जब तेलगु देशम सदन को सुचारू रूप से चलने दे तब संभवत: हंगामा रुक जाता लेकिन कांग्रेस ने भी बजाय राष्ट्रीय पार्टी की भूमिका का निर्वहन करने के क्षेत्रीय दलों जैसा आचरण किया। गलती भाजपा की तरफ  से भी कम नहीं हुई। एनडीए में रहकर नाराज चल रही शिवसेना  ने भी सदन को अवरुद्ध करने में विपक्ष का साथ दिया जिसे समझाना सत्ता पक्ष के प्रबंधकों का काम था, जिसमें वे असफल रहे। अक्सर ये मांग उठती है कि सदन न  चलने की स्थिति में सांसदों को वेतन-भत्ते न दिए जाएं लेकिन एनडीए सांसदों द्वारा 23 दिनों के वेतन-भत्ते न लिए जाने का निर्णय भी लादा हुआ लगता है। भले ही सांसदों ने भयवश मुंह न खोला हो किन्तु डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी जैसे मुंहफट राज्यसभा सदस्य ने खुलकर कह दिया कि संसद नहीं चलने में मेरा क्या कसूर क्योंकि मैं तो रोज समय पर सदन में पहुँचा था। आपसी बातचीत में एनडीए तो क्या भाजपा तक के अनेक सांसद संसदीय कार्यमंत्री के उक्त ऐलान से असहमत दिखे। विपक्ष में तो किसी ने भी वेतन-भत्ते त्यागने की सौजन्यता नहीं बरती। अंदरखानों की खबर ये है कि सत्ता पक्ष हंगामों को रोकने के लिए कोई विधायी बंदिश लगाने पर विचार कर रहा है जिसका खुलासा निकट भविष्य में हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो उस कदम को जनता का भरपूर समर्थन मिलेगा क्योंकि जनमानस में संसद को सब्जीमण्डी से भी बदतर बनाने के प्रयासों को लेकर जबरदस्त गुस्सा है। जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिस संस्था के ऊपर देश को संचालित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी हो यदि उसे ही चलने से रोक दिया जाए तो फिर लोकतंत्र पूरी तरह विकलांगता का शिकार होकर रह जाएगा। संविधान की शपथ लेकर सदन में  बैठने वाले सांसद कोई दिहाड़ी मजदूर नहीं हैं जिन्हें काम न करने पर मेहनताने से वंचित कर फुर्सत पा ली जावे। दरअसल सदन बाधित करने को दण्डनीय अपराध बनाना चाहिए। एक-दो बार चेतावनी दिए जाने के बाद भी जो सदस्य उदण्डता की पराकाष्ठा पर उतारु हो जाएं उनकी सदस्यता समाप्त करने जैसा प्रावधान जब तक नहीं बनाया जाता तब तक संसद का सम्मान इसी तरह मिट्टी में मिलाने का दुस्साहस होता रहेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

10 अप्रैल को लेकर सतर्कता जरूरी

बीते दिनों दलित समुदाय के भारत बंद के दौरान मप्र सहित देश के अनेक हिस्सों में हुई हिंसा के घाव अभी तक भरे नहीं हैं। जातिगत घृणा भी नए सिरे से सिर उठाने लगी है। प्रतिक्रियास्वरूप अब सवर्ण जातियों द्वारा आरक्षण हटाने की मांग को लेकर 10 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया गया है। इसके पीछे किसी राजनीतिक दल का हाथ तो नहीं दिखता क्योंकि दलित मतों के भयवश कोई भी पार्टी आरक्षण का विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखा सकती। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से अपने ऊपर लगे लांछनों से घबराए भाजपा नेता आरक्षण जारी रखने के लिए गंगाजल हाथ में उठाने तैयार हैं। ऐसे में केंद्र और राज्यों की सरकार को ध्यान रखना होगा कि 10 अप्रैल के प्रस्तावित बन्द के दौरान  भी हालात बेकाबू न हो जाएं। ये कहना गलत नहीं होगा कि आरक्षण को लेकर युवाओं के एक बड़े वर्ग में काफी गुस्सा है। नौकरी और पदोन्नति में आरक्षण के कारण जो सवर्ण अवसरों से वंचित रह जाते हैं  उनका सन्तोष समझा जा सकता है किन्तु जिस तरह जातीय नफरत के बीज अचानक अंकुरित होने लगे उसके पीछे किसी साजिश या षड्यंत्र की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। दलितों के ईष्टदेव के तौर पर प्रतिष्ठित डॉ आंबेडकर की जयंती भी निकट ही है। ये देखते हुए देश भर में अलर्ट की स्थिति बन जानी चाहिए। दलितों के संरक्षण सम्बन्धी कानून और आरक्षण को लेकर क्या होगा ये कोई नहीं बता सकता। अगले डेढ़ वर्ष चुनावी मौसम होने से जाति की राजनीति खुलकर चलेगी ये भी तय है। ऐसे में  सावधानी जरूरी है क्योंकि आंदोलनों के दौरान होने वाली हिंसा, आगजनी, तोडफ़ोड़ से देश का बड़ा नुकसान होता है। सभी  वर्गों को चाहिए कि वे भावना में बहकर बेकाबू न हों क्योंकि भीड़ का कोई विवेक तो होता नहीं और उन्माद से किसी का फायदा नहीं होता ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 April 2018

मानसून और विकास दर : अच्छे संकेत

आर्थिक जगत में व्याप्त अनिश्चितता और काफी हद तक अफरातफरी के माहौल में नए वित्तीय वर्ष के दौरान विकास दर के बढ़कर 7.4 प्रतिशत पहुंचने की संभावना अर्थव्यवस्था में अच्छे दिन आने की  गारंटी भले न दे लेकिन कम से कम बुरे दिनों की विदाई का आश्वासन तो दे ही रही है। नोटबन्दी और जीएसटी रूपी दोहरी मार से अर्थव्यवस्था में ठहराव ही नहीं आया वरन वह पीछे की तरफ  चल पड़ी। हालांकि इसके पीछे कुछ अन्य कारण भी थे जिनमें कमजोर मानसून भी रहा लेकिन ठींकरा फूटा मोदी सरकार की नीतियों और निर्णयों पर।  दरअसल सरकार उनका क्रियान्वयन जिस सरकारी मशीनरी के भरोसे करवाना चाहती थी, उसके रवैये में लेश मात्र का परिवर्तन नहीं होने से अच्छे फैसले भी आलोचना और आक्रोश का कारण बन गए। बहरहाल प्रधानमंत्री के धैर्य और आत्मविश्वास की तारीफ  करनी होगी कि वे विचलित हुए बिना अपने निर्णयों पर कायम रहे। इसका सुपरिणाम ये निकला कि अर्थव्यव्यस्था पूरी तरह पटरी से उतरने के बजाय धीरे-धीरे ही सही लेकिन सही दिशा में लौटती दिखाई दे रही है, जिसके संकेत गत 31 मार्च को समाप्त वित्तीय वर्ष की अंतिम दो तिमाही में मिलने लगा था। हालांकि बीते दो वर्ष में जो झटके लगे वे काफी तगड़े थे लेकिन नीतिगत दृढ़ता की वजह से  स्थिति में सुधार परिलक्षित होने लगा है। वैश्विक परिस्थितियाँ यद्यपि अभी भी उथलपुथल के संकेत दे रही हैं लेकिन भारतीय माहौल कुछ अलग है। इस वर्ष मानसून के अच्छे रहने की भविष्यवाणी ने भी उम्मीदें जगाई हैं। आगामी डेढ़ वर्ष पूरे समय चुनाव का माहौल रहेगा लिहाजा केन्द्र सरकार की तरफ  से भी कारोबारी जगत को राहत की उम्मीदें हैं। मोदी सरकार अपना आखिरी बजट पेश कर चुकी है। 2019 में आने वाला बजट तो कामचलाऊ रहेगा इसलिये किसी बड़े नीतिगत निर्णय की उम्मीद तो न के बराबर है किन्तु अभी तक जो कुछ भी किया गया उसके बेहतर नतीजे कैसे हासिल हों इस पर सरकार का ध्यान रहेगा। ये कहना गलत नहीं होगा कि जीएसटी की विसंगतियां धीरे-धीरे दूर होने लगी हैं। व्यापार जगत को इस नई कर प्रणाली से उतनी दिक्कत नहीं हुई जितनी कि उसके साथ जुड़ीं व्यवहारिक परेशानियों से। ढेर सारे रिटर्न और ऐसी ही कुछ अन्य पेचीदगियों के अतिरिक्त ऑन लाइन सेवाओं की अक्षमता ने एक अच्छे फैसले को भी विवादग्रस्त बनाकर रख दिया। चूंकि काले धन से व्यापार करना दिन ब दिन कठिन होता जा रहा है इसलिए भी सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी। खासतौर पर जमीन-मकान का धंधा तो ठप्प होकर रह गया। नोटबन्दी और सरकार द्वारा नगदी रहित अर्थव्यव्यस्था के प्रति आग्रह ने भी कारोबारी गिरावट की स्थितियाँ उत्पन्न कर दी थीं। लेकिन गत छह माह के दौरान हालात थोड़े ही सही लेकिन सुधरे हैं। निर्माण क्षेत्र के अलावा औद्योगिक उत्पादन की स्थिति में भी आशाजनक सुधार होने से ही नए कारोबारी साल में अर्थव्यवस्था के पुन: रास्ते पर आने के संकेत मिले हैं। जिसके आधार पर विकास दर के 7.4 फीसदी रहने की आशा व्यक्त की जा रही है। अगर मानसून जैसी कि भविष्यवाणी की गई वैसा ही रहा तब उक्त आंकड़ा और ऊपर चला जाए तब अचरज नहीं होगा क्योंकि ले देकर भारतीय अर्थव्यव्यस्था का आधार खेती ही है जो काफी हद तक वर्षा आधारित है। यद्यपि अभी भी अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों की चाल-ढाल पर काफी कुछ निर्भर करेगा किन्तु ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि बीते वर्षों की तुलना में आने वाले वित्तीय वर्ष में कारोबार की सेहत अच्छी रहेगी। यदि अर्थव्यवस्था 7.4 प्रतिशत के आंकड़े को छू गई तब निश्चित रूप से ये बड़ी उपलब्धि होगी। हालांकि इससे नरेंद्र मोदी द्वारा किये गए अच्छे दिनों के वायदे के अनुरूप कुछ खास तो नहीं होने वाला किन्तु इतना जरूर है कि नोटबन्दी और जीएसटी के तात्कालिक नुकसान से उबरकर सरकार द्वारा दीर्घकालीन परिणाम देने वाली नीतियों के फायदे सामने आने का समय आ गया है। इनकी मात्रा कितनी होती है उसी पर देश का राजनीतिक भविष्य निर्भर करेगा। सबसे अच्छी बात ये है कि अब अर्थव्यवस्था और विकास दर भी राजनीतिक विमर्श के विषय बनने लगे  हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

सजा सही लेकिन विलम्ब अनुचित


मामला चूंकि फिल्म स्टार से जुड़ा है इसलिए पूरे देश का ध्यान उस पर जाना स्वाभाविक था। समाचार माध्यमों ने भी अतिरिक्त कवरेज देकर अभिनेता सलमान खान को 5 साल की सजा मिलने का खूब प्रचार किया। अधिकतर टीवी चैनल जेल में उन्हें मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी जुटाने में लगे रहे। एक तरह से उनको मिली सजा और जेल जाना सबसे बड़ी खबर बन गई। हालांकि इसके पहले इसी मामले में सलमान जोधपुर जेल में कुछ दिन रह चुके थे लेकिन इस मर्तबा उन्हें पांच वर्ष की सजा सुनाई जाने से खबर और बड़ी बन गई। इसको लेकर जनमानस में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ हुईं। अधिकतर ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता और कानून के समक्ष समानता की पुष्टि हो गई। स्मरणीय है किसी अन्य प्रकरण में सलमान के बरी होने पर लोगों ने न्यायपालिका पर उंगलियां उठाई थीं लेकिन काले हिरण के शिकार का अपराध साबित होने के बाद सलमान को 5 साल की सजा मिलने से ये एहसास जागा है कि बड़ी हैसियत वाले भी कानून की निगाह से नहीं बच सकते। हाल ही में लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के कई मामलों में लंबी सजाएं होने से भी न्यायपालिका के प्रति विश्वास बढ़ा है। हालांकि सलमान के साथ आरोपी बनाए गए अन्य अभिनेता-अभिनेत्रियों को बरी किये जाने पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन मुख्य आरोपी चूंकि सलमान रहे इसलिये उन्हें दंडित करने का निर्णय न्यायाधीश ने किया।  बहरहाल इस फैसले के बाद एक बार फिर न्याय की धीमी गति पर बहस चल पड़ी है। 20 साल बाद हुए इस फैसले में विरुद्ध ऊपरी अदालतों में अपील होंगी। सर्वोच्च न्यायालय तक ये विवाद जाने की उम्मीद है। ऐसे में अंतिम निपटारा होने में कम से कम 5 वर्ष लगना बड़ी बात नहीं होगी। निश्चित रूप से ये स्थिति आदर्श नहीं कही जा सकती। लालू को भी जिन मामलों में सजा मिली वे सब दशकों पुराने हैं। न्यायालयों में लंबित मुकदमों के ढेर की वजह से ही निपटारे में विलम्ब होता है वहीं अभियोजन पक्ष को सबूत और गवाह बचाए रखने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है। विशेष रूप से अति विशिष्ट और सम्पन्न लोगों के मामले तो कछुआ से भी धीरे चलते हैं। जनअपेक्षा है महत्वपूर्ण प्रकरणों को दस-बीस साल खींचने की बजाय एक निश्चित समय सीमा में निपटाया जाए जिससे न्यायपालिका की छवि भी सुधरे तथा अपराधियों को साक्ष्य नष्ट करने का अवसर न मिल पाए। न्यायपालिका का डर भी तभी रहेगा जब त्वरित न्याय की स्थितियां बनें।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 April 2018

जनता ही क्यों, सांसद भी तो कुछ त्याग करें

चारों तरफ  हिंसा, घृणा और आरोप-प्रत्यारोप के बीच गर्मी में भी ठंडक का एहसास करवाने वाली एक खबर आई। वैसे इसे मुखपृष्ठ पर प्रमुखता मिलना चाहिए था लेकिन यह साधारण समाचार बना दिया गया। संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार ने गत दिवस बताया कि संसद में चल रहे हंगामे की वजह से बीते 23 दिन से कार्रवाई चूंकि नहीं चल पा रही इसलिए एनडीए सांसद इस अवधि का वेतन और भत्ते नहीं लेंगे। विपक्ष इस कदम का क्या जवाब देता है ये देखने वाली बात होगी। देश का जनमत संसद के न चलने पर बेहद आक्रोशित होता जा रहा है। जिसके लिए दोनों पक्ष बराबर के कसूरवार हैं क्योंकि विपक्ष में रहते हुए भाजपा और उसके सहयोगी भी सदन को लगातार बाधित किया करते थे। वर्तमान वित्तमंत्री अरुण जेटली ने तब हंगामे को भी संसदीय प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बताते हुए विपक्ष के रवैये का बचाव किया था। वर्तमान में फर्क केवल ये है कि जो सत्ता में थे वे विपक्ष में आ बैठे और विपक्षी कुर्सियों वाले सत्ताधारी बन गए। उस समय कांग्रेस भाजपा पर बहस से भागने का आरोप लगाती थी और अब भाजपा वही कर रही है। उधर जनता के मन में ये बात गहराई से बैठती जा रही है कि हंगामे की वजह से संसद के ठप्प रहने पर करोड़ों रुपये का नुकसान तो होता ही है , अनेक महवपूर्ण विषय एवं विधेयक भी लंबित रह जाते हैं। देश में इतना बड़ा दलित आन्दोलन हो गया जिसमें दर्जन भर से ज्यादा लोग मारे गए लेकिन संसद को इस बारे में चर्चा की फुर्सत तक नहीं मिली। बजट सत्र बेहद महत्वपूर्ण और सबसे लम्बा चलता है जिसमें देश की आर्थिक दिशा तय होती है। वर्तमान गतिरोध की स्थिति ये है कि कतिपय विपक्षी दलों द्वारा प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव  तक विचारार्थ नहीं आ पा रहा। एनडीए सांसदों द्वारा काम नहीं तो वेतन नहीं के सिद्धान्त पर चलने का जो फैसला लिया वह पूरी तरह जनअपेक्षाओं के अनुरूप है किंतु इसके पीछे भी नैतिकता कम और राजनीतिक पैंतरेबाजी ज्यादा है। अनंत कुमार यदि कहते कि भाजपा और उसके सहयोगी दल भविष्य में जब-जब भी सदन नहीं चलेगा तब-तब वेतन - भत्ता नहीं लेंगे तो बात जमती भी लेकिन एनडीए सांसदों ने  बीते 23 दिनों का मेहनताना छोड़ा है जिसे स्थायी नीतिगत निर्णय नहीं कहा जा सकता।  फिर भी इसका स्वागत होना चाहिये। जब जागे तब सवेरा की तर्ज पर सांसदों को जवाबदेह बनाने के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया था। दोनों सदनों के सांसदों पर 130 करोड़ जनता की आशाओं को पूरा करने का दायित्व होता है लेकिन वे अपनी जिम्मेदारी के प्रति अव्वल दर्जे की जो लापरवाही दिखाते हैं वह असहनीय होती जा रही है। उन्हें मिलने वाले वेतन,भत्ते , सस्ता आवास, नि:शुल्क रेल और हवाई यात्रा सहित संसद की कैंटीन में बेहद सस्ता भोजन जनता की आंखों में खटकने लगा है। मोदी सरकार ने आम जनता से रसोई गैस की सब्सिडी त्यागने की जो अपील की उसका असर ये हुआ कि लाखों उपभोक्ताओं ने सब्सिडी छोड़ दी। इसी तरह रेल्वे में वरिष्ठ नागरिकों को किराए में मिलने वाली छूट छोडऩे की अपील ने भी असर दिखाया और 10 लाख से भी ज्यादा बुजुर्गों ने सीनियर सिटीजन कन्सेशन त्याग दिया। एक तरफ  तो देशहित में जब भी  सरकार लोगों से कुछ त्यागने की अपेक्षा करती है तो भावनाओं में बहकर वे उसका सकारात्मक उत्तर देते हैं किन्तु दूसरी तरफ संसद के भीतर होने वाले हंगामे के बावजूद जब सांसदों के वेतन- भत्ते और अन्य सुविधाएं बढ़ाने का प्रस्ताव आता है तब सभी दलों के सदस्य मिलकर बिना बहस उसे मंजूरी दिलवा देते हैं। ये दुर्भाग्य है कि आम जनता की तरह त्याग करने में सांसद सदैव फिसड्डी रहते हैं। राज्यसभा में छह वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने पर सचिन तेंदुलकर की नगण्य उपस्थिति और सदन की कार्रवाही में न के बराबर  योगदान का खुलासा होने के बाद शर्मवश उन्होंने अपने कार्यकाल का पूरा वेतन लौटाने का ऐलान कर दिया किन्तु अन्य सांसदों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। अनंत कुमार ने एनडीए सांसदों द्वारा संसद में कामकाज ठप्प रहने की वजह से बीते तीन हफ्ते के वेतन-भत्ते त्यागने की जो बात कही वह तो अच्छी लगी ही लेकिन लगे हाथ ये घोषणा भी अपेक्षित है कि आगे से एनडीए सांसद रसोई गैस सब्सिडी का भी त्याग करेंगे। साथ ही संसद स्थित कैंटीन  के भोजन पर दी जा रही सब्सिडी खत्म की जाएगी। जनता का भरोसा जीतने हेतु  सांसद और भी बहुत कुछ छोड़ सकते हैं, बशर्ते उनमें जनता की तकलीफों को समझने की सम्वेदनशीलता हो। एनडीए सांसदों का निर्णय अन्य दलों के लिए प्रेरणास्रोत बने यह अपेक्षा गलत नहीं होगी। मुल्क के सेवक कहलाने वाले जिस तरह मुल्क के मालिक बन बैठे उसी वजह से जनता के मन में लोकतन्त्र के प्रति विश्वास के बावजूद संसद और सांसदों का सम्मान घटते-घटते जमीन पर आ गया है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

इसके पहले कि चीन कुछ करे ....

इसे शीतयुद्ध का नया संस्करण भी कह सकते हैं। अमेरिका और चीन के बीच खींचातानी ने आर्थिक महायुद्ध की जो शुरुवात कर दी है उससे पूरा विश्व प्रभावित हो रहा है। दोनों महाशक्तियों ने आयात शुल्क नामक हथियार के जरिये इस लड़ाई की शुरुवात की दो दिन पहले अमेरिका ने चीन से आयातित हो रही सवा सौ वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाकर व्यापार घाटे से बचाव का कदम उठाया था। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो पद पर आते ही आर्थिक क्षेत्र में आक्रामक नीतियां अपनाकर अमेरिका की डगमगाती अर्थव्यवस्था को टेका लगाने की इच्छाशक्ति दिखाते आए हैं। चीनी वस्तुओं पर आयात शुल्क में वृद्धि जैसा निर्णय उसी का परिणाम माना जा रहा था लेकिन चीन ने भी ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं की और 24 घण्टे के भीतर जवाबी कार्रवाई करते हुए 100 से ज्यादा अमेरिकी वस्तुओं पर ड्यूटी बढ़ाकर हिसाब बराबर कर दिया। पूरी दुनिया इससे चिंतित है। खबर ये भी है कि चीन भारतीय वस्तुओं पर भी आयात शुल्क बढ़ा सकता है जिसके पीछे आर्थिक कारण न होकर कूटनीतिक दबाव है। यथपि भारत से चीन को होने वाला निर्यात बेहद कम है जबकि आयात कई गुना ज्यादा। जिससे व्यापार घाटा तो भारत के हिस्से में ही है किंतु अमेरिका से बढ़ती नजदीकी और डोकलाम में चीन के विरुद्ध जबरदस्त मोर्चेबन्दी ने बीजिंग को नाराज कर रखा है। यदि चीन भारतीय वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाता है तब भारत को भी समूचे चीनी आयात पर ड्यूटी बढ़ाने जैसा साहसिक कदम उठाना चाहिये। यूँ भी इसकी मांग भारतीय उद्योग लम्बे अरसे से करता आ रहा है क्योंकि सस्ते चीनी सामान के धड़ल्ले से हुए आयात ने घरेलू उद्योगों की कमर तोड़ रखी है। इसलिए बेहतर होगा चीन के निर्णय का इंतज़ार न किया जावे। भारत आज की तारीख में चीनी वस्तुओं का सबसे बड़ा बाजार है। उसकी तुलना में चीन को किया जाने वाला निर्यात ऊंट कर मुंह में जीरे से भी कम है। आयात शुल्क बढ़ाने से चीनी सामान मंहगा हो जाएगा जिससे भारतीय उत्पाद सस्ते होकर प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने लायक बन सकेंगे। जाहिर है चीन ऐसी कार्रवाई से भड़क उठेगा किन्तु अभी भी वह भारत की सताने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता। ऐसे में भारत सरकार को दबाव बनाने का प्रयास करना चाहिए। चीन अब एक व्यवसायिक देश बन चुका है। सैन्य शक्ति में भले ही वह हमसे ताक़तवर हो परन्तु भारत उसके सामान पर आयात शुल्क बढ़ाने की हिम्मत दिखाए तो उसके कूटनीतिक पैंतरे भी कमजोर पड़े बिना नहीं रहेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी