Friday, 4 May 2018

दो फैसले : दो रवैये


अनु.जाति/जनजति सम्बन्धी कानून में उत्पीडऩ के आरोपी को तत्काल गिरफ्तार करने की व्यवस्था को बदलते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि सक्षम अधिकारी प्रारंभिक जांच में यदि आरोप को प्रथम दृष्टया सच पाएं तभी गिरफ्तारी की जाए। इस फैसले को ये कहते हुए राजनीतिक रूप दे दिया गया कि केंद्र सरकार दलित विरोधी है और आरक्षण खत्म करना चाहती है। गत 2 अप्रैल को दलित संगठनों के आह्वान पर हुए भारत बंद के दौरान देश के कई हिस्सों में हिंसा फैली जिसमें कई लोग मारे गए। प्रतिक्रियास्वरूप 10 अप्रैल को आरक्षण विरोधी बन्द भी हुआ। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि इस फैसले की वजह से दलित और सवर्ण समुदाय के बीच कटुता बढ़ी है जिसे हवा देने में राजनीतिक दलों की भरपूर भूमिका रही। चूंकि आरक्षण का लाभ पिछड़े वर्ग की जातियों को भी मिलने लगा है इसलिए उनके नेता भी दलितों के आंदोलन के साथ होकर केन्द्र सरकार को आरक्षण विरोधी ठहराने में जुट गए। मामला वोट बैंक का होने से सरकार भी दबाव में आ गई और सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका लेकर जा पहुँची। उसे उम्मीद थी कि न्यायालय स्थगन दे देगा किन्तु वैसा नहीं हो सका। गत दिवस फिर इस पर सुनवाई हुई। सरकार की तरफ  से अटॉर्नी जनरल ने कानून से छेड़छाड़ करने के अधिकार को चुनौती देते हुए यहां तक कहा कि न्यायालय द्वारा किये गए बदलाव की वजह से लोगों की जानें चली गईं। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दलितों के संरक्षण के प्रति न्यायपालिका भी पूरी तरह प्रतिबद्ध है लेकिन अपने पूर्व निर्णय पर स्थगन देने से दो टूक मना कर दिया। इस प्रकरण में राजनीतिक दलों की भूमिका भी बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे लेकर आसमान सिर पर उठा लिया जाता। कर्नाटक चुनाव सिर पर होने के कारण भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल भी इस मामले में वोट बैंक की लालच में उलझकर रह गए। ऐसे में सवाल ये उठता है कि बात-बात में न्यायपालिका के सम्मान की कसम उठाने वाले इस तरह के सार्थक फैसले का विरोध करने में क्यों नहीं झिझकते? ये बात बिल्कुल सही है कि न्यायपालिका को विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए लेकिन किसी कानून में व्याप्त विसंगतियों को दूर करने में यदि न्यायपालिका पहल करती है तो उसे केवल वोट बैंक के नजरिये से नहीं देखा जाए। तीन तलाक़ को लेकर भी इसी तरह के विवाद उत्पन्न किये गए। लोकसभा द्वारा तीन तलाक़ को दण्डनीय अपराध बनाने सम्बन्धी विधेयक लोकसभा से तो पारित हो गया लेकिन कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों ने राज्यसभा में उसे अटका दिया। खबर है केंद्र सरकार उसको लेकर अध्यादेश लाने की तैयारी कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि सर्वोच्च न्यायालय का तीन तलाक़ सम्बन्धी निर्णय चूंकि भाजपा को अपने अनुकूल लगा इसलिये उसको लागू करने में तो केंद्र सरकार पूरी ताकत झोंक रही है लेकिन अनु.जाति/जनजाति कानून में जरा से संशोधन पर वह न्यायपालिका के अधिकार को चुनौती देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। जबकि सर्वोच्च न्यायालय लगातार दोहराता जा रहा है कि दलितों की सुरक्षा और सम्मान की अनदेखी करने का उसका कोई मंतव्य नहीं है। उसने केवल कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए दिशा निर्देश देने जैसा काम किया है। तीन तलाक़ पर रोक चूंकि भाजपा का प्रिय विषय रहा इसलिए उसने विपक्ष के विरोध के बाद भी उसे हाथों हाथ लिया क्योंकि इससे उसे हिन्दू वोट बैंक की सहानुभूति मिलने का लाभ था लेकिन दलितों का मामला आते ही उसे गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव के परिणाम याद आने लगे। ये दोहरा मापदंड ही देश के सत्यानाश का बड़ा कारण रहा है। भाजपा और कांग्रेस ही नहीं शेष दल भी वोट बैंक के मायाजाल में उलझकर सही बोलने का साहस खो बैठे हैं जिससे समाज छोटे-छोटे समूहों में बंटने की स्थिति में आ गया है। चूँकि भारत में चुनावों की समयसारिणी पूरी तरह गड़बड़ा गई है इसलिए केंद्र और सम्बन्धित राज्य की सरकार पर हर समय वोट बैंक के नुकसान की तलवार लटका करती है। इस वजह से  देशहित के कई निर्णय जहाँ ठन्डे बस्ते में डाल दिये जाते हैं वहीं तात्कालिक लाभ वाले ऐसे फैसले ले लिए जाते हैं जिनका दूरगामी परिणाम विघटनकारी होता है। सर्वोच्च न्यायालय में गत दिवस हुई बहस में केंद्र सरकार के अधिवक्ता और मामले की सुनवाई कर रही पीठ के बीच जो सवाल-जवाब और तर्क हुए उन पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। दलित एवं पिछड़े विकास की दौड़ में आगे आएं, ये राष्ट्रहित में है लेकिन केवल वोट बैंक समझकर उनका तुष्टीकरण किया जाता रहा तब वे भी मुसलमानों की तरह राजनीतिक शोषण का स्थायी जरिया बनकर रह जाएंगे। जो मोदी सरकार कड़े निर्णय लेते वक्त जनता की नाराजगी से नहीं डरने का दावा करती है वह सन्दर्भित मामले में बुरी तरह से क्यों रक्षात्मक है ये समझ नहीं आ रहा ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 May 2018

प्रदूषित शहर : शर्मनाक और चिंताजनक स्थिति


विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित जिन 15 शहरों की सूची जारी की गई उनमें 14 भारत के होने से देश में पर्यावरण की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। कानपुर, वाराणसी, दिल्ली, जयपुर सहित तमाम बड़े शहर इस सूची में हैं। ये हालत शर्मनाक भी है और चिन्ताजनक भी क्योंकि प्रदूषण से जनता के स्वास्थ्य पर तो बुरा असर पड़ता ही है, पर्यावरण को भी जबरदस्त क्षति पहुंच रही है जिसकी वजह से भावी पीढ़ी को सांस लेने तक में परेशानी होने की परिस्थिति उत्पन्न होने की आशंका है। जिस तरह आज शुद्ध पेयजल की उपलब्धता न होने से बोतलबंद पानी का कारोबार चल पड़ा है वैसा ही ज्यादा दूर न सही आने वाले एक दशक के भीतर ऑक्सीजन का होने की संभावना बन रही है। आबादी के विस्फोट और बढ़ते शहरीकरण ने भारत में  प्रदूषण को जिस खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है उसका सबसे ज्वलन्त उदाहरण राजधानी दिल्ली है जहां साल में कई मर्तबा हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि लोगों का घर से निकलना दूभर हो जाता है। सवाल किसी एक या कुछ शहरों का न होकर पूरे देश का है क्योंकि बाकी जगह के हालात भी कोई बहुत अच्छे हों ये कहना या मान लेना सच्चाई को झुठलाना होगा। सवाल ये उठता है कि इसका निदान कौन करेगा? केवल सरकार कर सकती तो ये नौबत ही नहीं आती। पर्यावरण को बचाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, एनजीटी जैसी संस्थाएं तो हैं ही उच्च और सर्वोच्च न्यायालय तक बहुत सख्त हैं। बावजूद इसके स्थितियां बेकाबू हो रही हैं तो उसके लिए पूरा समाज सामूहिक तौर पर जिम्मेदार है। प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है जिसमें घास के तिनके से लेकर आकाशगंगा में विचरते नक्षत्रों तक को देव स्वरूप मानकर पूजित किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा आंकड़ों से निराश या हीनता से ग्रसित होने की जगह बेहतर होगा प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर इसे चुनौती मानकर हालात सुधारने में योगदान दे। जिसे हमने बिगाड़ा है उसे हम सुधार भी सकते हैं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

मासूमों को निशाना बनाने वाले बच्चे नहीं हैवान हैं

कहने को घटना छोटी सी है लेकिन उसकी पृष्ठभूमि उसे गम्भीर बना देती है। कश्मीर घाटी के शोपिया जिले में एक स्कूल बस पर कुछ लड़कों ने पथराव किया। बताया जाता है वे सुरक्षा बलों द्वारा एक आतंकवादी सरगना के मारे जाने पर अपना विरोध जता रहे थे। अब तक जो भी सुनने में आया उसके मुताबिक कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी एक संगठित अपराध जैसा बन चुका है जिसके पीछे आतंकवाद को प्रश्रय देने वाली ताकतें खड़ी हैं। कम उम्र के लड़कों और बेरोजगार युवकों को पैसे देकर उनसे सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करवाने का तरीका हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के दिमाग की उपज कही जाती है। किसी आतंकवादी को घेर लिए जाने पर भीड़ सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करने लगती है जिससे उसे निकलकर भागने का अवसर मिल जाता है। भारत विरोधी प्रदर्शनों में भी पत्थरबाजों का उपयोग आम बात हो चली थी। सुरक्षा बलों की मजबूरी ये होती कि गोली चलाने पर लोगों के मारे जाने का खतरा होता जिससे उत्तेजना बढ़ सकती है। लिहाजा हाथ में बंदूक होने पर भी $फौज और अर्धसैनिक बलों के जवान यहां वहां छुपकर खुद को बचाते। बाद में पैलेट गन नामक हथियार का उपयोग शुरू किया गया। इस हथियार से गोली की बजाय छर्रे निकलते हैं जो जान तो नहीं लेते किन्तु विकलांग जरूर कर देते हैं। उसके प्रयोग ने पत्थरबाजों के हौसले काफी पस्त किये। हज़ारों के हाथ, पाँव, आंख बेकार हो गईं। और फिर मचा मानवाधिकारों का हल्ला। कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को कश्मीर के पत्थरबाज बच्चे मासूम और भटके हुए लगने लगे। संसद में उनकी व्यथा का नाटकीय बखान करते गुलाम नबी आज़ाद का गला रुंध गया। बात सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गई जिसने केन्द्र सरकार पर सवाल दाग दिया कि पैलेट गन का कोई विकल्प है क्या? चौतरफा दबाव के कारण पैलेट गन का प्रयोग रोक दिया गया। तथाकथित भटके मासूम पत्थरबाजों का सरकारी खर्च पर इलाज भी करवाया गया लेकिन कुत्ते की पूंछ को सीधा करना भला कहां सम्भव है? सो सुरक्षा बलों की कार्रवाई में व्यवधान डालने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। जब भी सुरक्षा बल किसी आतंकवादी को किसी जगह या घर में घेर लेते हैं तो अचानक भीड़ जिसमें अधिकतर किशोर और युवा होते हैं उत्पात मचाने लगते हैं जिससे आतंकवादी भाग जाए। काफी दिनों से पत्थरबाजी की घटनाएं कम सुनाई दे रहीं थीं लेकिन गत दिवस स्कूली बस पर किया गया पथराव संकेत दे रहा है कि ज़हर के बीज फिर अंकुरित होने लगे हैं। लेकिन इसका और भी दुखद एवं चिंताजनक पहलू ये है कि पहली बार पत्थरबाजों ने कश्मीर घाटी के ही स्कूली बच्चों को निशाना बनाया जिनमें कुछ को चोटें भी आईं। उक्त घटना की चौतरफा निंदा हो रही है। मेहबूबा मुफ्ती ने भी अपना रोष व्यक्त किया लेकिन इस वारदात से ये साबित ही रहा है कि सुरक्षा बलों द्वारा बीते एक साल में घाटी के भीतर जिस बड़ी संख्या में आतंकवादियों को घेर - घेरकर मारा उससे अब भारत विरोधी तबके की बौखलाहट बढ़ रही है। कुछ माह पूर्व कश्मीर के ही फौजी और पुलिस अफसर की हत्या के बाद वहां लोगों में आतंकवादियों के विरुद्ध रोष पनपने के समाचार भी यदाकदा मिलते रहे। स्कूली बच्चों की बस पर पथराव से लगता है आतंकवादी कश्मीरी जनता को भावनात्मक तौर पर भयभीत करना चाह रहे हैं कि वे यदि उनका साथ नहीं देंगे तो उनके नौनिहालों से बदला लिया जावेगा। उम्मीद है मानवाधिकारों के दुकानदार और जेएनयू में कश्मीर की आज़ादी के झण्डाबरदार छोटी सी उक्त घटना को भविष्य में उसके बड़े होने के संभावित रूप में देखकर मुखर विरोध करेंगे। जो लोग मासूमों के खून के प्यासे हो जाएं उन्हें हिटलर कहें या बगदादी कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन इसके बाद लगता है पैलेट गन की उपयोगिता फिर महसूस की जावेगी और सर्वोच्च न्यायालय भी उस पर उंगली नहीं उठाएगा। मानवाधिकार मनुष्यों के होते हैं हैवानों के नहीं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 2 May 2018

जिन्ना की तस्वीर का भारत में क्या औचित्य

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी किसी न किसी वजह से चर्चा और विवादों में घिरी रहती है। ताजा खबर ये है कि सांसद सतीश गौतम ने इस यूनिवर्सिटी परिसर के छात्रसंघ कार्यालय में लगी मो. अली जिन्ना की तस्वीर हटाने हेतु कुलपति को जो पत्र लिखा उस पर विवाद हो गया। यूनिवर्सिटी के मुस्लिम तबके से तो सांसद की मांग का विरोध हो ही रहा है लेकिन कभी बसपा में मायावती के खासमखास रहे और अब उप्र की योगी सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी जिन्ना को महापुरुष बताते हुए उनका चित्र हटाने की बात को बेतुका बता दिया। बयानों के तीर तरकश से निकलना शुरू हो गए हैं लेकिन राजनीति से परे हटकर देखें तो ये बात चौंकाने वाली है कि भारत के विभाजन के लिए जि़म्मेदार एक व्यक्ति की तस्वीर आजादी के 70 साल बाद भी उक्त विश्विद्यालय के छात्रसंघ कार्यालय में ससम्मान लगी रहे और उसे हटाने की मांग को अनुचित बताया जाए। जिन्ना को महापुरुष भाजपा सरकार का एक मंत्री बताए ये और भी शर्मनाक बात है। प्रश्न ये है कि जेएनयू में भारत विरोधी नारे गुंजाने वाले तो देश की नजरों में आ गए लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में विभाजनकारी ताकतों का पर्दाफाश क्यों नहीं हो पाता। अपनी अल्पसंख्यक पहिचान को बनाये रखने के प्रति यह संस्थान सदैव सतर्क रहा है। इसके कुलपति और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर अधिकतर मुस्लिम ही नियुक्त होते रहे हैं। शिक्षा के स्तर के लिहाज से यहां का स्तर अब पहले जैसा तो नहीं रहा लेकिन अभी भी इसकी गणना देश के प्रमुख शिक्षा संस्थान के रूप में होती है। इसकी स्थापना 1875 में हुई थी। जिन्ना की तस्वीर छात्रसंघ कार्यालय में लगी होने के विवाद पर छात्रसंघ के प्रवक्ता का कहना है कि वह आज़ादी के पहले से वहां है क्योंकि महात्मा गांधी और जिन्ना दोनों को छात्रसंघ की मानद सदस्यता दी गई थी। एक तर्क ये भी दिया गया कि पाकिस्तान बनने के पहले जिन्ना ने भी आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। लेकिन आज़ादी की लड़ाई जब अंतिम दौर में आ गई तब तक जिन्ना अंग्रेजों के पिट्ठू बनकर धर्म के नाम पर अलग मुस्लिम राष्ट्र के लिए अड़ गए। उसका क्या नतीज़ा हुआ ये इतिहास का वह दर्दनाक अध्याय है जिसमें आबादी के सबसे बड़े हस्तातंरण के साथ ही लाखों निरपराध लोगों के नरसंहार का वर्णन समाया हुआ है। पाकिस्तान का निर्माण जिन कारणों से हुआ और नफरत की जो चिंगारी भड़की उसे भीषण आग में बदलने वाले जिन्ना प्रमुख व्यक्ति रहे। इसलिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ सभागार में उनकी तस्वीर को लगाए रखने की जि़द करना ठीक वैसे ही है जैसी जेएनयू में अफजल गुरु को महिमामंडित करना। जिन्ना इंग्लैंड से बैरिस्टरी पढ़कर भारत लौटे। उनकी गणना उस समय के बड़े वकीलों में होती थी। भारत आने और उसके काफी समय बाद तक वे पूरी तरह अंग्रेजी संस्कृति में रचे बसे रहे। उन्होंने विवाह भी पारसी लड़की से किया था जिसे लेकर तत्कालीन मुस्लिम कट्टरपंथियों ने काफी नाराजगी भी व्यक्त की थी। अपनी शैक्षणिक योग्यता और पेशेवर दक्षता से उत्पन्न महत्वाकांक्षा के चलते वे कांग्रेस में उच्च स्थान चाहते थे किंतु सफल न होने पर निराशा में डूबकर इंग्लैंड वापिस चले गए। लेकिन तब तक अंग्रेजों को उनमें भारत विभाजन की अपनी कार्ययोजना का नायक नजर आ गया था। उन्होंने जिन्ना की महत्वाकांक्षा को और परवान चढ़ाया जिसके बाद वे फिर भारत लौटे और मुस्लिम राजनीति के केंद्र बन गए। तब तक देश में हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगे फसाद के जरिये दो देश सिद्धांत ( टू नेशन थ्योरी ) का जिक्र जोर पकड़ चुका था। जिन्ना को गाँधीजी ने काफी मनाया किन्तु वे अंग्रेजों के दलाल की तरह पूरी तरह अड़ गए और अंतत: पाकिस्तान लेकर ही माने। इस्लाम के मौलिक रीति -  रिवाजों से सर्वथा दूर बने रहने वाले जिन्ना अंग्रेजी वेशभूषा त्यागकर शेरवानी और टोपी पहिनने लगे। प्रारंभिक जीवन में पूरी तरह आज़ाद खय़ाल रखने वाले जिन्ना ने पाकिस्तान को इस्लामिक देश बना दिया। ऐसे व्यक्ति को भारत में सम्मान मिलना किसी भी सूरत में समझ से परे है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान स्थित जिन्ना की कब्र पर जाकर जब उन्हें धर्मनिरपेक्ष सोच वाला व्यक्ति बताया तो अन्य दलों को तो छोड़ दें खुद भाजपा में उनके उस बयान का जोरदार विरोध हुआ जो अंतत: उनके राजनीतिक पतन का आधार बनता गया। ऐसे में जब देश और उप्र दोनों में राष्ट्रवादी होने का दावा करने वालों की सर्वाधिकार सत्ता हो तब किसी सरकारी सहायता प्राप्त केंद्रीय विश्वविद्यालय में भारत का विभाजन कराने वाले जिन्ना की तस्वीर महात्मा गांधी सहित अन्य महापुरुषों के साथ लगा होना उन विभूतियों का अपमान है जिन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। सांसद श्री गौतम ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुलपति को जो पत्र लिखा उस पर राजनीति की बजाय राष्ट्रनीति के मद्देनजर विचार होना चाहिए। स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरुष बताकर जिस तुष्टीकरण का परिचय दिया वह उनके पुराने राजनीतिक संस्कारों का प्रभाव लगता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने मंत्री के उस बयान पर उनसे पूछताछ करना चाहिये और वे जिन्ना की तरफदारी करने पर आमादा रहें तो उनसे मंत्रीपद छीनने में संकोच नहीं करना चाहिए। बेहतर हो सारे दल मिलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगी जिन्ना की तस्वीर को हटाने की मांग का समर्थन करें। ये सवाल हिन्दू-मुस्लिम का नहीं अपितु भारत और पाकिस्तान का है। धर्मनिरपेक्षता अपनी जगह है लेकिन देश के टुकड़े करवाने के षडय़ंत्र के मुख्य सूत्रधार का प्रशस्तिगान देशभक्ति नहीं हो सकती। पाकिस्तान में जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को महापुरुष मानकर उन्हें सम्मान नहीं दिया जाता तो हम जिन्ना को क्यों ढोयें? याद रहे हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए जीवन लगा देने वाले गांधी जी की मौत पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए जिन्ना ने उन्हें एक महामानव की बजाय एक महान हिन्दू कहकर अपनी संकीर्णता उजागर कर दी थी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पाकिस्तान के निर्माण में जो भूमिका रही उसे देखते हुए उसके परिसर में लगी जिन्ना की तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि जिन्ना के मानसपुत्र सरकारी खर्चे से चल रहे इस संस्थान में आज भी बने हुए हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 May 2018

राहुल : तब सही थे या अब


पिछले लोकसभा चुनाव के पहले एक बड़ा राजनीतिक स्टंट देखने मिला। अदालत द्वारा अपराधिक प्रकरण में दो वर्ष से ज्यादा की सजा पर लोकसभा, विधानसभा अथवा राज्यसभा की सदस्यता समाप्त होने के साथ दंडित व्यक्ति पर निश्चित अवधि तक के लिए चुनाव लडऩे पर प्रतिबंध लगाने संबंधी प्रावधान को शिथिल करने के लिए तत्कालीन मनमोहन  सिंह सरकार एक अध्यादेश लेकर  आई। उसका उद्देश्य केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव की सदस्यता बचाना था। जो चारा घोटाले की चपेट में आ चुके थे। उस अध्यादेश को लेकर कांग्रेस और यूपीए दोनों को बदनामी झेलना पड़ रही थी। अध्यादेश मंत्रीमण्डल की स्वीकृति के बाद राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर हेतु भेजा भी जा चुका था। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सम्भवत: विदेश गये हुए थे। अचानक कांग्रेस के युवराज कहे जाने वाले राहुल गांधी ने आनन-फानन में पत्रकार वार्ता बुलाई और राजनीति में नैतिकता और ईमानदारी के महत्व पर जोर देते हुए अपनी ही सरकार द्वारा राष्ट्रपति को भेजे अध्यादेश को फाड़ते हुए लालू यादव के जेल जाने का इंतज़ाम कर दिया। प्रधानमन्त्री विदेश से लौटे और राष्ट्रपति महोदय को प्रेषित अध्यादेश को वापिस बुलवाकर उसकी भू्रण हत्या कर दी। राहुल के उस कदम से मनमोहन सिंह की जबरदस्त किरकिरी हुई। सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेता द्वारा अपनी ही सरकार के फैसले को इस तरह रद्दी की टोकरी में फेंके जाने की उस घटना को राहुल गांधी के नेतृत्व में राजनीति की नई शैली का प्रतीक माना गया। बात आई गई हो गई। लालू जेल चले गए। उसके बाद का घटनाक्रम सभी को विदित है। लालू जमानत पर छूटकर बाहर आ गए और कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन जारी रहा। बिहार में महागठबंधन के तौर पर हुए प्रयोग ने राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों में बड़े बदलाव का संकेत दिया लेकिन वह प्रयोग भी विफल हो गया। नीतीश ने फिर भाजपा को पकड़ लिया और लालू यूपीए में रह गए। चारा घोटाले के विभिन्न मामलों की कानूनी स्थिति को भांपकर नीतीश ने जो निर्णय लिया वह पूरी तरह सही साबित हुआ। लालू को एक के बाद एक मामलों में सजाएं होती रहीं। उनके जेल से बाहर आने की सम्भावना फैसला दर फैसला क्षीण होने लगी। फिर जैसा होता आया है वैसा ही हुआ और लालू बीमार होकर एम्स की तर्ज पर बने रांची के सबसे अच्छे सरकारी अस्पताल रिम्स में भर्ती किये गए जहां से उन्हें दिल्ली के एम्स भेज दिया गया। इसे लेकर भी खूब सवाल उठे। सामान्य और विशिष्ट कैदी में भेदभाव का मुद्दा उछला। बहरहाल लगभग एक माह तक एम्स में रह रहे लालू को चिकित्सकों ने स्वस्थ बताते हुए रांची रवाना करवा दिया। इस पर भी जमकर राजनीति की गई। लेकिन असली मुद्दा बन गया कांग्रेस अध्य्क्ष राहुल गांधी का एम्स जाकर लालू से मिलने का। एक राजनीतिक नेता दूसरे की बीमारी में उससे मिलने जाए वह स्वाभाविक सौजन्यता कही जाएगी। राजनीतिक आंदोलन में जेल गए नेता से भेंट पर भी किसी को ऐतराज नहीं होता लेकिन लालू जिस अपराध के लिए दंडित किये गए हैं वह विशुद्ध भ्रष्टाचार है। ऐसे व्यक्ति से राहुल का मिलना उनके द्वारा उस अध्यादेश को फाडऩे के कृत्य के औचित्य पर पानी फेरने के लिए पर्याप्त है। लालू की पार्टी राजद अभी भी कांग्रेस की निकट सहयोगी हैं। उनके जेल जाने के बाद उनके बेटे पार्टी के मुखिया बने हुए हैं। उनसे राहुल का मिलना-जुलना समझ में आता है लेकिन एक सजायाफ्ता अपराधी से मुलाकात से उनकी वह छवि ध्वस्त हो गई जो उन्होंने अध्यादेश फाड़कर बनाने की कोशिश की थी। एक वकील अपने मुवक्किल से मिले तो वह पेशेवर मुलाकात मानी जाती है। कैदी के परिवार का उससे मिलना भी सामान्य है लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में लंबी सज़ा प्राप्त व्यक्ति से राहुल के मिलने से उनके नेतृत्व में पार्टी की कार्यशैली में गुणात्मक परिवर्तन की उम्मीदों को धक्का लगा है। हालांकि अपराधी तत्वों से किसी पार्टी को परहेज नहीं है। यहां तक कि पार्टी विथ डिफरेंस का दावा करने वाली भाजपा को भी नहीं। अन्य छोटी पार्टियों का तो इस बारे में कोई ईमान धरम समझ ही नहीं आता। लेकिन राहुल गांधी के हाथ में पार्टी की कमान आने के बाद कांग्रेस में होने वाले सुधारों की अपेक्षाएं इस तरह की मुलाकात से खतरे में पड़ जाती हैं। राहुल को इस बात का स्पष्टीकरण देना ही चाहिए कि जिन लालू को जेल भिजवाने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी की सरकार की भद्द पीटने में  संकोच नहीं किया उन्हीं की मिनाजपुर्सी करने जाने का क्या उद्देश्य था? भाजपा द्वारा राहुल और लालू की मुलाकात पर उंगलियां उठाना अनधिकृत चेष्टा है लेकिन श्री गांधी को ये तो बताना ही पड़ेगा कि वे अध्यादेश फाड़ते समय सही थे या कल लालू से मिलते समय?

-रवीन्द्र वाजपेयी