Saturday, 2 June 2018

मांगें उचित लेकिन अतिवादी तरीकों से बचें किसान

आधा दर्जन राज्यों में गत दिवस प्रारम्भ हुए किसान आंदोलन में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने के अलावा अन्य जो मांगें रखी गईं उनमें से अधिकतर स्वीकार करने योग्य हैं। विपक्षी दल भी बहती गंगा में हाथ धो लेने की तर्ज पर केंद्र सरकार को किसान विरोधी बताने के अभियान में जुटकर घडिय़ाली आंसू बहाते देखे जा सकते हैं। मप्र के मंदसौर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के आने की भी खबर है। ये देखना है कि क्या श्री गांधी पंजाब के आंदोलनरत किसानों के समर्थन में भी जाएंगे जहां उनके अपने दल की सरकार है। पहले दिन कहीं से किसी अप्रिय घटना के समाचार न मिलना अच्छा संकेत है। गत वर्ष मप्र के मंदसौर में आंदोलनरत किसानों के हिंसक हो जाने पर गोली चलाए जाने से हुई आधा दर्जन मौतों की वजह से न सिर्फ  शिवराज सरकार वरन अन्य राज्य सरकारें भी सतर्क  हैं। किसान भी इस बात को महसूस करने लगे हैं कि वोटों की फसल काटने वाले राजनीतिक नेताओं से सावधान रहना चाहिए किन्तु जिस तरह से किसानों पर आंदोलन में शामिल होने का दबाव बनाया जा रहा है उसके मदद्देनजऱ आने वाले दिनों में अंतर्निहित विवाद उत्पन्न हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। मोदी सरकार लगातार किसानों की आय को दोगुना करने के वायदे के साथ फसल का उचित दाम देने की प्रतिबद्धता दोहरा रही है। फसल बीमा जैसी तमाम योजनाओं को लागू भी कर दिया है। गांव और किसानों की बेहतरी के लिए केंद्र और राज्य सरकारें न जाने कितनी योजनाएं चला रही हैं। ग्रामीण विकास पर सरकारी बजट का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। बावजूद उसके यदि किसान परेशान है तो उसकी तह में जाए बिना किये गए तदर्थ उपाय किसी काम के नहीं रहते। आज भी कृषि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। एक समय था जब खाद्यान्न संकट हुआ करता था। राशन की दुकानों पर अच्छे-अच्छे लोग विदेशी गेंहूँ के लिए लाइन लगाए दिखते थे। लेकिन अब देश उस मामले में आत्मनिर्भर हो चुका है तब दूसरी समस्या उठ खड़ी हुई कृषि उत्पादों के भण्डारण की। सारी मुसीबतों की एक वजह हमारे देश में असंतुलित विकास का होना है। कृषि उत्पादन में वृद्धि करने की कार्ययोजना बनाने के साथ ही भण्डारण एवं खाद्य प्रसंस्करण के इन्तज़ाम भी लगे हाथ कर लिए जाते तब आज न तो किसानों को सड़कों पर उतरना पड़ता और न ही शासनतंत्र को अनावश्यक मानसिक दबाव झेलना पड़ता। बीते चार साल में मोदी सरकार किसानों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सकी ये सतही तौर पर तो सही दिखता है लेकिन कुछ समस्याएं किसानों की खुद पैदा की हुई हैं। इसकी एक बानगी है उन चीजों के उत्पादन के पीछे भागना जिनकी कीमतें अचानक ज्यादा हो जाती हैं। प्याज, टमाटर और दलहन इसके ताजा उदाहरण हैं। अगली फसल तक जब अधिक उत्पादन से कीमतें जमीन पर लुढकतीं हैं तब किसान अपने को लुटा महसूस करता है। कीमतें  बढ़ते समय चौतरफा आलोचनाओं की वजह से सरकार भी आयात कर दाम नियंत्रित करने में जुट जाती है जिसका विपरीत असर अगली फसल पर किसानों के घाटे के तौर पर सामने आता है। दूसरी तरफ  अनाज, सब्जियां और फलों के भण्डारण का समुचित प्रबन्ध नहीं होने से भी उत्पादक को मजबूरन औने-पौने दाम पर अपने उत्पाद बेचने पड़ते हैं। सरकार की भी मजबूरी है कि वह खाद्यान्न के लिए तो सरकारी समर्थन मूल्य तय कर सकती है किंतु सब्जियों और फलों के लिए वैसा करना टेढी खीर है। गत वर्ष मंदसौर गोली कांड से सहमी शिवराज सरकार ने प्याज खरीदी का इंतजाम कर किसानों के गुस्से को ठंडा करना चाहा लेकिन वह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। इसी तरह भावन्तर योजना भी नौकरशाही की हवस का शिकार होकर विफल हो गई। किसानों को बिचौलियों से बचाने के लिए बनाई गईं कृषि उपज मंडियां भी अपने मूल उद्देश्य की बजाय भ्रष्टाचार का अड्डा बन गईं जहां छोटे किसान को हर तरह की तकलीफ और अपमान झेलना पड़ता है। हमारे देश में वर्षा होने पर क्रिकेट पिच को ढांकने की तो पुख्ता व्यवस्था है किन्तु सरकारी खरीद के लिए अनाज को खुले में रखकर मौसम के रहमो करम पर छोड़ दिया जाता है। राज्य सरकारें कहने को तो किसान के लिए सौगातों के ढेर लगा देती हैं किंतु वे उन तक समय पर नहीं पहुंच पाने से सारा किया धरा पानी में चला जाता है। आढ़तिया के मकडज़ाल से किसान को बचाने के लिए जो सरकारी मंडियां बनाईं गई वे नए तरीके से उसे परेशान करने का जरिया बन गईं। दुर्भाग्य की बात ये है कि सरकार अपना घर ठीक नहीं कर पा रही जिससे किसान दुखी और क्रोधित हो उठता है। वर्तमान आन्दोलन में उसके द्वारा रखी गईं मांगों में कुछ को भले ही अव्यवहारिक या अनुचित कह दिया जाए लेकिन अधिकाँश मानी जाने लायक हैं किन्तु ये भी जरूरी है किसान ऐसा कुछ भी न करें जिससे जनमानस  में उनके प्रति जो सहानुभूति और समर्थन है उस पर विपरीत असर पड़े। गत दिवस कई जगहों पर सब्जियां और दूध जिस तरह सड़कों पर बहा दिया गया उसको कोई पसंद नहीं करेगा क्योंकि ये किसी भी कोण से बुद्धिमत्ता का परिचायक नहीं है। बड़े और समृद्ध किसान तो ऐसी हिम्मत कर भी सकते हैं किंतु छोटे उत्पादक के लिए ऐसा करना बहुत नुक्सानदेह होता है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि किसी भी आंदोलन की शुरुवात ही यदि अतिरेक पूर्ण तरीकों से हो तब उसकी उम्र ज्यादा नहीं होती। अतीत में जब-जब किसान आंदोलन में उत्तेजना और हिंसा का समावेश हुआ वह बेनतीजा खत्म हो गया। किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले नेता चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, केवल वोटों के नजरिये से अपना काम करते  हैं। कहने को तो हर दल का अपना कृषक संगठन है और संसद तथा विधानसभाओं के सैकड़ों सदस्य खुद किसान हैं या उनकी पृष्ठभूमि ग्रामीण है किन्तु अपना वेतन-भत्ता बिना बहस के बढ़वाने वाले इन जनप्रतिनिधियों में से एक ने भी कभी ये कहकर बढ़ा हुआ वेतन-भत्ता लेने से इनकार नहीं किया कि पहले किसान को संतुष्ट करो। उस दृष्टि से किसान जिन कारणों से  भरी गर्मी में सड़कों पर उतरने मजबूर हुआ उनके औचित्य को नकारा नहीं जा सकता। दूसरी तरफ  उनके आंदोलन की अगुआई कर रहे तथाकथित नेताओं ने भी जानबूझकर ये समय चुना क्योंकि देश इस समय चुनावी मूड में आ चुका है। और यही मौसम होता है जब जो मांगोगे वही मिलेगा वाली स्थिति बन जाती है। समाचार माध्यमों के अलावा निजी तौर पर किये गए अध्ययनों से ये बात तो साबित हो चुकी है कि देश कृषि उत्पादनों के क्षेत्र में भले तरक्की करता दिख रहा हो लेकिन वास्तविकता ये है कि छोटा और मध्यम श्रेणी का किसान बेहद परेशान है। बढ़ते कर्ज के अलावा अन्य मानसिक दबावों के चलते आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए यदि हजारों कृषक मजबूर हुए तब स्थिति की गम्भीरता को समझा जा सकता है। यद्यपि ऐसे कदम को कोई भी उचित नहीं मानेगा लेकिन ये भी सत्य है कि अपने हाथों अपनी जान लेने जैसा निर्णय व्यक्ति आसानी से नहीं कर सकता। ये सिलसिला लम्बे समय से चला आ रहा है इसलिए इसके लिए किसी पार्टी या सरकार की बजाय पूरी व्यवस्था को ही दोष दिया जा सकता है। किसान अपनी मांगें लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन करें उस पर किसी को ऐतराज नहीं होगा लेकिन उन्हें अतिवादी तौर-तरीकों से बचना चाहिए वरना उनके प्रयास दिशाहीन होकर बेकार चले जायेंगे। सरकार को भी चाहिए कि वह किसानों की जायज मांगों को तत्काल स्वीकार करे लेकिन उन्हें ऐसे कोई भी आश्वासन न दे जिन्हें पूरा न किया जा सके। कृषि प्रधान देश में किसान सड़कों पर उतरे ये शर्मनाक है। उसको घाटा होना भी चिन्ताजनक है लेकिन किसानों को भी थोड़ा व्यवहारिक और समझदार होना पड़ेगा क्योंकि आज के जमाने की खेती में केवल मेहनत से काम नहीं चलता बल्कि लागत भी लगती है और वह भी भरपूर। देश में भण्डारण और खाद्य प्रसंस्करण की समुचित व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता के तौर पर की जानी चाहिए जिससे कृषि उत्पादों की बर्बादी रुके तथा उनका व्यवसायिक उपयोग करते हुए किसान की आय बढ़ाने का जरिया निकले। उम्मीद की जानी चाहिए कि मौजूदा आंदोलन का सुखद समापन होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 June 2018

राष्ट्रीय पार्टियों पर क्षेत्रीय दलों का दबाव बढ़ेगा

विभिन्न राज्यों में हुए उपचुनाव के जो नतीजे विगत दिवस घोषित हुए उन्हें भाजपा के विरुद्ध विपक्षी एकता की सफलता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। चूंकि भाजपा ने अपनी उप्र की कैराना और महराष्ट्र की भंडारा-गोंदिया लोकसभा सीट क्रमश: रालोद और राकांपा के हाथों गवां दीं इसलिए ये माना जा रहा है कि मोदी लहर के कमजोर होने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। कैराना के साथ उप्र की नूरपुर विधानसभा सीट भी भाजपा से सपा ने छीन ली। भाजपा केवल महाराष्ट्र पालघर लोकसभा और उत्तराखंड की थराली विधानसभा सीट बचा सकी। कांग्रेस को पंजाब में एक, महाराष्ट्र की 2 और कर्नाटक एवं मेघालय की एक-एक विधानसभा सीट जरूर मिल गई किन्तु लोकसभा के चार उपचुनावों में कैराना और भण्डारा-गोंदिया में तो वह लड़ी नहीं और  पालघर में हिम्मत की भी तो वह पांचवे स्थान पर लुढ़क गई। इन नतीजों से स्पष्ट हो गया कि भाजपा और काँग्रेस दोनों को क्षेत्रीय दलों की तरफ  से जबरदस्त चुनौती मिल रही है। बंगाल, झारखंड, नागालैण्ड, मेघालय, उप्र, बिहार और महाराष्ट्र तक में क्षेत्रीय पार्टियाँ जिस तरह से राष्ट्रीय पार्टियों के समक्ष अड़ रही हैं वह भविष्य की दृष्टि से विचारणीय है। वामपंथी तो केरल में वे एक विधानसभा उपचुनाव जरूर जीत गए किन्तु बंगाल में उनका भाजपा से पीछे तीसरे स्थान पर लुढ़क जाना उनके अप्रसांगिक होते जाने का एक और प्रमाण है। इन परिणामों से एक बात तो जरूर स्पष्ट हुई कि सारे भाजपा विरोधी एकजुट हो जाएं तो 2019 में मोदी-शाह की सारी रणनीति धरी रह जायेगी। बिहार की एक विधानसभा सीट पर राजद को मिली बड़ी विजय इसको साबित करती है। महाराष्ट्र में भंडारा-गोंदिया लोकसभा सीट पर राकांपा की जीत 20 हजार के मामूली अंतर से तभी हो सकी जब वहां काँग्रेस नहीं लड़ी। वहीं पालघर में मुकाबला शिवसेना और भाजपा के बीच हुआ किन्तु काँग्रेस पांचवे स्थान पर रहकर जितने वोट ले गई वे भाजपा की जीत के अंतर से ज्यादा रहे। एक अन्य क्षेत्रीय दल भी जितने वोट ले गया यदि वे भी भाजपा के विरोध में मानें तब उसकी जीत असम्भव होती। उपचुनावों का मुख्य फोकस रहा उप्र की कैराना लोकसभा  सीट पर। फूलपुर और गोरखपुर का प्रयोग दोहराते हुए सपा और बसपा ने तो हाथ मिलाया ही काँग्रेस भी उनसे जुड़ गई। अजीत सिंह की रालोद का जाट मतों पर प्रभाव देखकर मुस्लिम प्रत्याशी उसके चिन्ह पर उतार दिया गया जिससे भाजपा को धु्रवीकरण से रोका जा सके। 5 लाख मुसलमान मतदाताओं के गोलबंद होने के कारण भाजपा पूरा जोर लगाकर भी हारने को मज़बूर हो गई। इससे ये सन्देश पूरे देश को देने की कोशिश की जा रही है कि उप्र में भाजपा को रोकने का नुस्खा हाथ लग गया है। लेकिन जो समीकरण दिखाई दे रहे हैं उनमें भले ही भाजपा का आभामंडल कमजोर पड़ता लगे लेकिन कांग्रेस का उत्थान भी नहीं दिखाई दे रहा। अरविंद केजरीवाल ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि अब स्पष्ट हो गया कि मोदी विकल्प नहीं है। उनकी बात का ये आशय निकाला जा सकता है कि विपक्ष का तात्कालिक लक्ष्य केवल येन केन प्रकरण मोदी को रोकना है क्योंकि 2019 में भाजपा की वापिसी से न सिर्फ  काँग्रेस अपितु अधिकतर क्षेत्रीय दलों का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा किन्तु सबसे बड़ा पेंच ये है कि उप्र और बिहार को छोड़कर बाकी राज्यों में क्या विपक्षी एकता महागठबंधन का रूप ले सकेगी और उसमें काँग्रेस का हिस्सा कितना होगा? उदाहरण के तौर पर बंगाल में ममता बैनर्जी वामपंथियों को किसी भी सूरत में उपकृत नहीं करेंगीं और कांग्रेस वहां वामपंथियों के साथ है। इसी तरह केरल में वाममोर्चा की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी अभी भी कांग्रेस ही है। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ उपचुनाव में भले ही तालमेल बन गया हो किन्तु शरद पवार की राकांपा और कांग्रेस, उद्धव ठाकरे के साथ कितनी दूर चल सकेंगी ये सोचने वाली बात है क्योंकि हिंदुत्व के मामले में शिवसेना तो भाजपा से भी ज्यादा कट्टर और आक्रामक मानी जाती है। उप्र और बिहार में भाजपा के विरोध में बनने वाले गठबंधन में कांग्रेस को कितना महत्व मिलेगा क्योंकि बाकी की तो छोड़ दें खुद सोनिया गांधी और राहुल अपनी लोकसभा सीट जीतने के लिए सपा और बसपा के रहमो करम पर निर्भर हैं। और कोई कितना भी गुणाभाग लगाए किन्तु बिना कांग्रेस को दूल्हा बनाये विपक्षी महागठबंधन की बारात नहीं सज सकेगी। ममता बैनर्जी और चंद्राबाबू नायडू के अलावा राजशेखर रेड्डी और अखिलेश यादव तक राहुल गांधी को बतौर प्रधानमंत्री पेश करने के प्रति अपनी हिचक दिखा चुके हैं। ऐसी स्थिति में श्री केजरीवाल का ये कहना कि मोदी विकल्प नहीं रहे विपक्षी एकता की पुष्टि नहीं करता। ऐसा लगता है उप्र में सपा-बसपा अपने अस्तित्व के लिए  किसी भी कीमत पर भाजपा को रोकने के लिए जैसा गठबंधन करना चाह रहे हैं वह अन्य राज्यों में आसान नहीं। कुमारस्वामी की शपथ ग्रहण पर हुए विपक्षी जमावड़े को 2019 से जोड़कर देखना उस दृष्टि से जल्दबाजी होगी। सही बात ये है कि विपक्षी एकता की पहल भले काँग्रेस कर रही है किन्तु उसे 2004 सरीखी सफलता नहीं मिलती दिखाई दे रही क्योंकि क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएँ भी आसमान छूने लगी हैं। दूसरी तरफ  ये तथ्य भी खुलकर सामने आ गया है कि  भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर उस स्थिति में आती जा रही है जहां कभी काँग्रेस हुआ करती थी। बंगाल में वामपंथियों और काँग्रेस की संयुक्त शक्ति भी उसके उभार को नहीं रोक पा रही। कर्नाटक में काँग्रेस द्वारा कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद सौंपने से अन्य क्षेत्रीय दलों के मुंह में भी पानी आ गया। प्रश्न ये उठ खड़ा होता है कि यदि 2019 में भाजपा को बहुमत नहीं मिला तब नरेन्द्र मोदी का उत्तराधिकारी कौन होगा क्योंकि काँग्रेस के 100 सीटों तक पहुंचने की संभावनाएं आज की स्थिति में तो नहीं दिखतीं। मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात छोड़कर कांग्रेस का भाजपा से सीधा मुकाबला बाकी नहीं है। अन्य सभी राज्यों में उसे सीटों का बंटवारा करना होगा जिसमें क्षेत्रीय दल उसे ज्यादा वजन नहीं देंगे। कर्नाटक को ही लें तो अब देवेगौड़ा परिवार भी उसका हिस्सा झपटने तैयार रहेगा। वहीं आंध्र में चंद्राबाबू नायडू और तेलंगाना में राजशेखर रेड्डी काँग्रेस को सुई की नोक बराबर जमीन भी देने को राजी नहीं होंगे। भाजपा के लिए भी क्षेत्रीय दलों का आक्रामक रवैया मुसीबत बनता जा रहा है क्योंकि वे उससे विचारधारा के आधार पर नहीं चिपके। जब उन्हें ये एहसास हो जाएगा कि भाजपा और श्री मोदी का करिश्मा कमजोर पड़ रहा है तो वे भी दूसरी मुंडेर पर बैठने में देर नहीं लगाएंगे। शिवसेना हिंदुत्व के नाम पर भाजपा की सहज मित्र थी किन्तु फिलहाल उद्धव ठाकरे प्राचीनकाल के राजपूतों वाली लड़ाई लड़ रहे हैं जिसमें सामने वाले के नुकसान के लिए दुश्मन से हाथ मिलाने में भी संकोच न किये जाने की नीति है। 2019 में शिवसेना अलग लडऩे की घोषणा कर चुकी है लेकिन कांग्रेस और राकांपा से उसका गठबंधन आसान नहीं  होगा और उस स्थिति में नतीजा पालघर जैसा आएगा। इन सबसे हटकर देखें तो क्या भाजपा के रणनीतिकार अपने जनाधार को इसी  तरह खिसकते देखते रहेंगे? जद (यू) महासचिव सहित अनेक विश्लेषकों ने माना है कि कर्नाटक चुनाव के फौरन बाद पेट्रोल-डीजल के दामों में रोजाना हुई वृद्धि इन उपचुनावों में भाजपा की हार का कारण बन गई। कैराना में गन्ना किसानों की समस्या ने पार्टी की लुटिया डुबोई। ये दोनों बातें अपनी जगह सही हैं किंतु मोदी सरकार ने अगर पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाकर कीमतें घटा दीं तब भी क्या लोग उसके प्रति ऐसे ही नाराज रहेंगे ? यद्यपि अभी भी भाजपा मोदी रूपी मृग मरीचिका में मुग्ध रही तब जरूर उसकी  उम्मीदों पर तुषारापात हो सकता है। गत दिवस उपचुनावों के जो नतीजे आए वे निश्चित रूप से भाजपा के प्रति उसके प्रतिबद्ध मतदाताओं में व्याप्त गुस्से का परिचायक है किंतु ये कांग्रेस के पुनरुत्थान की पुष्टि भी चूँकि नहीं करते इसलिए 2019 के राजनीतिक चित्र का स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है। गठबंधन सरकार बनने की सम्भावना को पूरी तरह से नकार देना तो गलत होगा किन्तु ये भाजपा विरोधी ही होगी ये नहीं कहा जा सकता क्योंकि गठबंधन करने में भाजपा को भी किसी से परहेज तो है नहीं। पीडीपी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बहरहाल मोदी सरकार पर दबाव तो बढ़ा है। नरेंद्र मोदी आज भी लोकप्रिय हैं किंतु उनमें 2014 वाली बात नहीं रही क्योंकि उनकी सरकार जनता की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी। दुर्भाग्य से कांग्रेस इसका लाभ नहीं उठा पा रही और क्षेत्रीय दलों के सामने बिना शर्त झुकने तैयार हो रही है ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 31 May 2018

तो जनता भी भाजपा का तेल निकाल देगी


कल सुबह से रात तक पेट्रोल के दाम एक पैसा कम होने पर केंद्र सरकार और साथ में भाजपा की फज़ीहत होती रही। सोशल मीडिया पर तो ऐसे मुद्दों पर तीखे कटाक्षों की बाढ़ आ जाती है। पहले 60 पैसे की कमी के तत्काल बाद संशोधन करते हुए 59 पैसे की कमी वापिस लेते हुए उसे एक पैसा करने को पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अधिकारी की गलती बताकऱ पल्ला झाड़ लिया। पूर्व की तरह श्री प्रधान ने एक बार फिर जीएसटी में पेट्रोलियम वस्तुओं को लाने की बात कहकर बहलाने की कोशिश की। यही नहीं तो केरल की वामपंथी सरकार द्वारा 1 जून से 1 रु.दाम घटाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होनें अन्य राज्यों को भी वैसा करने की सलाह दे डाली किन्तु उनकी अपनी पार्टी द्वारा शासित 20 से ज्यादा राज्यों के मुख्यमंत्रियों को दाम घटाने के लिए कहने से वे बचते रहे। इधर मप्र में वित्तमंत्री जयंत मलैया ने साफ कह दिया कि दाम घटाने की पहल केंद्र करे जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी जीएसटी का झुनझुना बजाकर दाएं-बाएं हो गये। स्मरणीय है मप्र देश के उन राज्यों में है जहां पेट्रोल-डीजल पर सर्वाधिक कर थोपे जाते हैं। जिस तरह से पेट्रोलियम के मूल्य बीते कुछ दिनों में लगातार ऊपर गए उनसे पूरे देश में जो नकारात्मक छवि केंद्र सरकार और भाजपा की बनी उसकी तनिक भी चिंता न होने के पीछे दो ही बातें हो सकती हैं। पहली तो ये कि भाजपा ने ठान लिया है कि उसे दोबारा सत्ता में  नहीं लौटना और दूसरा ये कि उसके पास अलादीन का जादुई चिराग आ गया है जिसके बलबूते वह मतदाताओं को दोबारा अपने पाले में खींच लाएगी। यदि भाजपा ने 2019 के चुनाव को भगवान भरोसे छोड़कर हम नहीं सुधरेंगे की कसम खा रखी हो तो फिर कोई बात नहीं। लेकिन अगर वह सोचती है कि चुनाव के एन पहले वह आम जनता की हितैषी बनकर सामने आ जायेगी और वोटों की फसल काट लेगी तो वह गलतफहमी में है। उससे भी बड़ा सवाल ये है कि सरकार का सारा ध्यान क्या चुनाव पर ही केंद्रित है और वह पहले परेशान करने के बाद आखिरी में खुश करने की नीति पर चल रही है? अनु.जाति/जनजति सम्बन्धी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए अध्यादेश लाने पर आमादा मोदी सरकार जीएसटी काउंसिल पर पेट्रोलियम वस्तुओं को भी अपने दायरे में लाने के लिए दबाव क्यों नहीं बनाती? सर्वविदित है कि काउंसिल में भाजपा और एनडीए शासित राज्यों का प्रचंड बहुमत है और उसके मुखिया भी बिहार के वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ही हैं जो भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से हैं। जब पेट्रोलियम मंत्री और भाजपा शासित अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री पेट्रोलियम वस्तुओं पर जीएसटी लगाकर उनके दाम घटाने के प्रति सैद्धान्तिक सहमति दे चुके हैं तब इस नेक काम में देरी से तो यही लगता है कि मुंह में राम बगल में छुरी वाला आचरण दोहराया जा रहा है। मोदी सरकार तेजी से फैसले करने का दावा करती है किन्तु इस सम्वेदनशील मुद्दे पर वह इतनी उदासीन या सुस्त क्यों बनी हुई है, ये समझ से परे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को इतना नादान नहीं माना जा सकता कि वे पेट्रोल-डीजल की कीमतों से उबल रहे जनाक्रोश को नहीं अनुभव न कर पा रहे हों। जनता की नाराजगी का ही नतीजा रहा कि गुजरात में मोदी-शाह के गुजराती होने पर भी वहां उसे मामूली बहुमत ही मिल सका। कर्नाटक में भी भाजपा तमाम अनुकूलताओं के बावजूद यदि बहुमत की दहलीज पर अटक गई तो उसमें काफी कुछ पेट्रोलियम वस्तुओं की अनियंत्रित महंगाई ही थी। आज भी विभिन्न राज्यों से उपचुनाव के जो परिणाम आ रहे हैं उनमें भाजपा को जबरदस्त नुकसान होता दिख रहा है उसके लिए भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगी आग ही है। पता नहीं केन्द्र सरकार के दिमाग में क्या चल रहा है किंतु जनता के दिमाग में जो चल रहा है यदि उसे न समझा गया तो भाजपा के बुरे दिन आने से कोई नहीं रोक पायेगा। जहां तक बात विकास कार्यों के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने की है तो वह काम बजट के जरिये होने चाहिए। वित्त मंत्री पेट्रोलियम पदार्थों से कर के तौर पर जो राजस्व वसूलना चाहते हों उसकी राशि निश्चित कर दी जावे। ऐसा होने पर जनता के साथ रोज-रोज होने वाली लूटपाट पर विराम लग सकेगा। बेहतर हो केंद्र सरकार ये घोषणा करे कि जीएसटी काउंसिल की अगली बैठक में पेट्रोलियम से सम्बन्धित चीजों पर लगाए जा रहे सभी कर समाप्त कर केवल जीएसटी लगेगा जिसकी अधिकतम दर 28 प्रतिशत है। ऐसा अनुमान है तब पेट्रोल और डीजल के दाम कम से कम 20 रु. प्रति लीटर तो कम हो ही जायेंगे जिसका असर अन्य चीजों की कीमतों पर भी पड़ेगा जो परिवहन ख़र्च बढऩे से महंगी  होती जा रही हैं। उल्लेखनीय है बीते कुछ दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने के कारण बसों व ट्रकों के साथ ही हवाई कंपनियां भी किराया बढ़ाने के लिए दबाव बना रही हैं। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि पेट्रोल-डीजल के दामों को लेकर मोदी सरकार और भाजपा दोनों बेहद असंवेदनशील और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार कर रहे हैं। यदि उन्हें लग रहा कि केवल हिंदुत्व उनकी सत्ता में वापसी करवा देगा तो ऐसा सोचना मूर्खों के स्वर्ग में रहने जैसा ही है। मोदी जी कितने भी लोकप्रिय भले हों और अमित शाह चुनावी शतरंज के बहुत शातिर खिलाड़ी किन्तु उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता उपभोक्ता भी होता है। यदि केवल हिंदुत्व और राममंदिर ही वैतरणी पार करवाते होते तो 1992 में बाबरी ढांचे के गिरने के बाद 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा उप्र, मप्र, दिल्ली वगैरह में शिकस्त न खाती। यदि अब भी केंद्र सरकार और भाजपा जनता का तेल निकालने में लगी रही तो फिर जनता भी उसका तेल निकालने में संकोच नहीं करेगी। आज सुबह से आ रहे उपचुनावों के परिणामों से यदि मोदी-शाह और शिवराज जैसे नेताओं को कुछ अक्ल आ जाये तब भी  गनीमत है वरना 2004 की कहानी दोहराए जाने की सम्भावना दिन ब दिन मजबूत होती चली जायेगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी