Friday, 8 June 2018

करीब आओ तो शायद हमें समझ लोगे ....

जिन लोगों को उम्मीद थी कि अंत-अंत तक रायता फैलेगा, उनके हाथ निराशा लगी। गत दिवस नागपुर में रास्वसंघ के मुख्यालय पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के मुख्य आतिथ्य में संघ स्वयंसेवकों के तृतीय वर्ष प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन हुआ। संघ के आमंत्रण को श्री मुखर्जी द्वारा स्वीकार किये जाने की खबर मिलने के बाद से ही इसे लेकर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई थीं। कांग्रेस के अलावा संघ विरोधी अन्य दलों को भी पूर्व राष्ट्रपति के नागपुर जाने पर एतराज था। कांग्रेस के अनेक नेताओं ने खुलकर उनके निर्णय पर उंगलियां उठाईं किन्तु प्रणब दा चूंकि अब उसके अनुशासन से बाहर हैं इसलिए वह चाहकर भी उन्हें रोक नहीं सकी। हॉलाँकि श्री मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा ने जरूर पिता के नागपुर जाने का विरोध किया लेकिन असहिष्णुता को लेकर आसमान सिर पर उठाने वाली लॉबी भी दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच प्रत्यक्ष संवाद को नहीं रोक सकी। तमाम अटकलों को दरकिनार रखते हुए प्रणब दा परसों ही नागपुर पहुंच गये थे। संघ के सार्वजनिक आयोजन के पूर्व वे उसके संस्थापक डॉ. हेडगेवार के निवास पर भी गए और वहां की आगंतुक पुस्तिका में उन्हें महान देशभक्त बताकऱ बहुतों के पेट में मरोड़ पैदा कर दी। इतना होने के बाद तो ये कयास लगने लगे कि दादा कोई  बड़ा धमाका कर देंगे लेकिन पूरे आयोजन में पहले संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने बिना झिझके संघ के समूचे दर्शन को अपनी चिरपरिचित सहज शैली में प्रस्तुत किया वहीं उनके बाद श्री मुखर्जी ने भी अत्यंत विस्तार से अपनी बात कही। मेजबान और मेहमान दोनों ने अपने-अपने धर्म का विधिवत पालन करते हुए पूरे देश को ये सन्देश दे दिया कि व्यर्थ के टकराव और छुआछूत की सोच से ऊपर उठकर पारस्परिक  संवाद के माध्यम से एक दूसरे की विचारधारा को समझकर आगे बढऩे से ही देश का भला होगा। रास्वसंघ के आमंत्रण पर नागपुर जाने के निर्णय को जो लोग श्री मुखर्जी का पाला बदल मानकर उनकी आलोचना करने में जुट गए थे वे कल के आयोजन के उपरांत बगलें झांकते फिर रहे हैं क्योंकि प्रणब दा ने एक शब्द भी ऐसा नहीं कहा जिससे लगता कि वे कोई सियासी पैंतरा दिखा रहे हों। वहीं डॉ. भागवत ने भी बिना लागलपेट के वह सब कह डाला जो संघ प्रमुख के तौर पर वे सदैव कहते रहते हैं। कहने का आशय ये है कि कल नागपुर से ये सन्देश निकलकर आया कि टकराव की बजाय सामंजस्य और संवाद से दूरियां कम की जा सकती हैं। एक दूसरे पर दूर से निरर्थक शब्दबाण चलाते रहने की जगह यदि नजदीक आकर अपनी-अपनी बात शालीनता से रखी जाए तो न सिर्फ  कटुता खत्म होगी वरन एक दूसरे को समझने में भी मदद मिलेगी। डॉ. हेडगेवार को महान देशभक्त बताकर श्री मुखर्जी ने बिना कुछ कहे ही बहुत कुछ कह दिया। नागपुर आने से वे रास्वसंघ की विचारधारा से किस हद तक प्रभावित हुए ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना ये कि उन्होंने उस संगठन के मंच पर जाने का साहस दिखाया जिसका वे पूरे राजनीतिक जीवन भर विरोध करते रहे। इसी तरह संघ ने भी उन्हें सम्मान देकर ये साबित कर दिया कि वह अपने विरोधी को शत्रु नहीं समझता। प्रणब दा के पहले भी महात्मा गांधी सहित तमाम दिग्गज संघ के आयोजनों में आ चुके थे। उनमें से किसी ने भी बाद में उसकी आलोचना नहीं की। गत दिवस पूर्व राष्ट्रपति ने भी पूरा कार्यक्रम देखा जिसमें संघ के स्वयंसेवकों के शारीरिक कार्यक्रम, गीत वगैरह थे। ध्वजारोहण और प्रार्थना के समय वे भी खड़े रहे। उनके पूरे नागपुर प्रवास में एक भी अवसर ऐसा सामने नहीं आया जब ये लगता कि कहीं कोई कड़वाहट है। डॉ. हेडगेवार के निवास पर गली के भीतर पैदल जाना और जूते उतारकर घर में प्रवेश करने जैसी बातें ये बताने के लिए काफी है कि प्रणब दा के व्यक्तित्व में गहराई है। वहीं संघ ने भी उन्हें कहीं से भी विवाद में न फंसाकर सनसनीखेज खबर की अपेक्षा करने वालों को निराश कर दिया। कुल मिलाकर उक्त आयोजन उन लोगों के लिये एक सबक बन गया जो सार्वजनिक जीवन में सैद्धांतिक और वैचारिक मतभिन्नता को शत्रुता का रूप देकर संपर्क और संवाद की गुंजाइश ही खत्म कर देते हैं। संघ के संस्थापक को महान देशभक्त कहकर जहां श्री मुखर्जी ने केवल आलोचना के लिये आलोचना करने वालों को सन्देश दे दिया, वहीं डॉ. भागवत ने भी खुले तौर पर ये कह दिया कि भारत में रहने वाले हर व्यक्ति को संघ भारत माँ की संतान मानता है। दोनों महानुभावों के उद्गारों में कहीं से भी एक दूसरे को नीचा दिखाने  और अपनी विचाधारा थोपने की कोशिश नजर नहीं आई। इसके विपरीत संघ प्रमुख और पूर्व राष्ट्रपति दोनों ने भारत की सांस्कृतिक विविधता के बावजूद उसकी एकता का गुणगान किया। अक्सर ऐसे अवसरों के बाद उसके राजनीति पर पडऩे वाले प्रभाव का विश्लेषण शुरू हो जाता है। लेकिन संघ के मंच पर कांग्रेसी विचारधारा से आजीवन जुड़े रहे प्रणब दा की साक्षात उपस्थिति के बाद देश भर के विघ्नसंतोषी सनाके में हैं तो उसका कारण दोनों तरफ  से प्रदर्शित परिपक्वता ही रही। आज देश का जो माहौल है उसमें राजनीति जहर फैलाने का जरिया तथा सिद्धांत और विचारधारा दिखावटी बातें बनकर रह गई हैं। सभी का लक्ष्य किसी भी तरह से सत्ता हासिल करना रह गया है। सौजन्यता अपने निम्नतम स्तर पर आ गई है। एक दूसरे का अपमान करने की प्रतिस्पर्धा राजनीति की पहचान बन चुकी है। ऐसे में  संघ और प्रणब दा द्वारा बुद्धिमत्ता और सद्भावना का जो प्रदर्शन किया गया उसकी राष्ट्रीय स्तर पर महती आवश्यकता है। किसी शायर की ये पंक्तियां गत दिवस पूरी तरह प्रासंगिक और सार्थक हो गईं :-
करीब आओ तो शायद हमें समझ लोगे, ये दूरियां तो गलतफहमियां बढ़ाती हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 June 2018

मुफ्त और माफ की संस्कृति का विरोध जरूरी

परसों मप्र सरकार ने गरीबों को 200 रु. प्रतिमाह में बिजली देने का ऐलान किया। और कल राहुल गांधी ने मंदसौर में किसानों को आश्वस्त किया कि प्रदेश में काँग्रेस की सरकार बनने पर 10 दिनों में किसानों के कर्जे माफ  कर दिए जावेंगे। उन्होंने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने उद्योगपतियों के कर्जे माफ  कर दिए। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने उनके इस कथन का तत्काल प्रतिवाद  करते हुए जवाबी आरोप लगा दिया कि बैंकों को चूना लगाने वाले उद्योगपतियों को मनमोहन सरकार के समय कर्ज दिया गया था। जहां तक बात सस्ती बिजली और कर्ज माफी के ऐलान की है तो कल ही रिज़र्व बैंक ने महंगाई के मद्देनजऱ कर्ज पर ब्याज दरों में मामूली वृद्धि कर दी। मप्र सरकार, कांग्रेस अध्यक्ष और रिजर्व बैंक तीनों ने क्रमश: जो किया या कहा उसका सीधा सम्बन्ध अर्थव्यवस्था से है। फर्क इतना है कि शिवराज सिंह चौहान और श्री गांधी का उद्देश्य जहां मतदाताओं को लुभाना है वहीं रिजर्व बैंक की चिंता राजनीतिक निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने की है। जो लोग आर्थिक मामलों की थोड़ी सी भी समझ रखते हैं उन्हें ये पता होगा कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत  सन्तोषजनक नहीं है। सरकार चाहे केंद्र की हो अथवा राज्यों की, सिर से पांव तक कर्ज में डूबी है। बजाय घटने के उसका बोझ बढ़ता ही जा रहा है। वित्तीय अनुशासन के नाम पर सरकार बजट घाटा कम करने की जो कोशिशें करती भी है वे मुफ्त और माफ  के सियासी मकडज़ाल में फंसकर बेअसर साबित हो जाती हैं। यही वजह है कि एक दिन जहां विकास दर कुलांचे भरती दिखाई देती है वहीं अगले दिन उसकी सांस फूलने की नौबत आ खड़ी होती है।  शिवराज सरकार द्वारा गरीब परिवारों को 200 रु. प्रतिमाह में बिजली देने की जो घोषणा की गई। उसके पीछे गरीबों के घर रोशन करने की भावना न होकर आगामी नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत को सुनिश्चित करना है। दूसरी तरफ  मंदसौर में किसानों का दुख बांटने आए राहुल को भी किसानों से किसी भी तरह की हमदर्दी नहीं है। यूपीए सरकार के 10 वर्षीय कार्यकाल में ही हजारों किसानों ने आत्महत्या की थी जो ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि अन्नदाता उनके राज में भी परेशान था। कल राहुल ने मंदसौर के कृषि उत्पादन लहसुन को शंघाई भेजने का लॉलीपॉप भी दे डाला। मप्र के इस इलाके में लहसुन तो दशकों से पैदा होता रहा है। तब यूपीए सरकार ने उसे शंघाई अथवा अन्य किसी विदेशी शहर में निर्यात करने की पहल क्यों नहीं की, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। ले- देकर बात वहीं खड़ी हो जाती है कि राजनेता जो दरियादिली दिखाते हैं उसके अर्थव्यवस्था पर पडऩे वाले विपरीत असर पर विचार करने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। अस्सी के दशक में स्व.अर्जुन सिंह  मप्र में झुग्गी-झोपड़ी वालों को एक बत्ती बिजली कनेक्शन देकर खुद तो गरीबों के मसीहा बन बैठे लेकिन देश के सबसे समृद्ध मप्र विद्युत मंडल को गरीब बना गए। उनकी देखा सीखी अन्य राज्यों ने भी उस फार्मूले को अपनाया और उन्हें भी वही सब झेलना पड़ा। फिर चला किसानों को मुफ्त और सस्ती बिजली देने का सिलसिला। उसने किसानों को कितना लाभ पहुंचाया ये तो कोई नहीं जानता लेकिन उसकी वजह से राज्य सरकारों का जो भट्टा बैठा वह सबके सामने है। किसी भी लोक कल्याणकारी शासन व्यवस्था से अपेक्षा की जाती है कि वह  जनता की मदद हेतु आगे आये। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं को शासकीय संरक्षण दिया जाना अत्यावश्यक होता है। गरीबों के जीवन को सुविधाजनक बनाने में भी कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए। कृषि प्रधान देश में कृषि और किसानों की बेहतरी के लिए भी सरकार का संवेदनशील होना प्रशंसा योग्य है लेकिन हमारे देश में सत्ता प्राप्त करने और उसमें चिपके रहने के लिए राजनेता सरकारी खजाने के दम पर जिस तरह की रईसी दिखाते हैं उसका सौवां हिस्सा भी वे अपनी जेब से किसी निर्धन की मदद के लिए नहीं देते। शिवराज सिंह चौहान और राहुल गांधी दोनों लंबे समय तक सत्ता के संचालन से जुड़े रहे हैं। ऐसे में उन्हें ठीक चुनाव के समय ऐसे निर्णय और आश्वासन देने की जरूरत पडऩा ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि सत्ता में रहते हुए वे ऐसा कुछ नहीं कर सके जिससे चुनाव के पूर्व उन्हें लालच देने के लिए मजबूर न होना पड़े। सबसे बड़ी बात ये है कि इस तरह की राजनीतिक घूस का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। मप्र में बिजली की दरें काफी हैं। विद्युत मंडल को विखंडन कर बनाई गई कंपनियों ने मुनाफाखोरी की हदें तोड़ दी हैं। शिवराज सरकार ने चुनाव के मद्देनजर गरीबों को 200 रु. में महीने भर बिजली देने का जो फैसला किया उसका बोझ चुनाव के बाद अंतत: शेष उपभोक्ताओं के कंधों पर पडऩा अवश्यम्भावी है। इसी तरह राहुल गांधी ने 10 दिनों में किसानों के कर्जे माफ  करने का जो झुनझुना बजा दिया उसकी भरपाई प्रदेश की जनता पर नए कर या  अधिभार लगाकर ही की जा सकेगी। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि 21 वीं सदी में भी राजनीति का वही ढर्रा देखने मिल रहा है जिसके कारण देश आज़ादी के सात दशक बीतने पर भी विकासशील ही बना हुआ है। एशिया के तमाम छोटे-छोटे देश भारत को पीछे छोड़ते हुए जिस तरह आगे निकलते जा रहे हैं वह केवल देखने की नहीं अपितु अनुकरणीय चीज है। इसके लिए जरूरत है सियासत की संस्कृति बदलने की। आज की युवा पीढ़ी में राजनेताओं के विरुद्ध जो गुस्सा बढ़ रहा है उसकी एक वजह मुफ्त और माफ  की नीतियां भी हैं। सत्ता पाने के लिये मंगल सूत्र और मिक्सर ग्राइंडर बाँटने जैसे कदम राजनेताओं के मानसिक दिवालियेपन को ही उजागर करते हैं। शिवराज और राहुल के पास इस प्रश्न का कोई समुचित उत्तर नहीं होगा कि उन्होंने जो उदारता दिखाई उसके लिए धन कहां से आएगा? अगले चुनाव के बाद सरकार भाजपा या कांग्रेस किसकी बनेगी ये तो मतदाता तय करेंगे किन्तु इन दोनों के फैसलों और वायदों से प्रदेश की जनता पर करों का बोझ बढऩा तय है। मप्र पर कई लाख करोड़ का कर्ज है। यहां तक कि कई मर्तबा सरकारी कर्मियों का वेतन तक समय पर नहीं बंट पाता। बावजूद उसके आय बढ़ाने की जगह कर्ज बढ़ाने के रास्ते खोजना अव्यवस्था और अराजकता को आमंत्रण देने जैसा ही होगा। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि एक बत्ती कनेक्शन, मुफ्त पट्टे, किसानों को मुफ्त अथवा रियायती बिजली,  मनरेगा और उस जैसे तमाम कार्यक्रमों के बाद भी सत्ता परिवर्तन होने को नहीं रोका जा सका। पंजाब में अमरिंदर सरकार ने किसानों के कर्ज माफ  करने का वायदा पूरा कर दिया लेकिन फिर भी वहां के किसान आंदोलित हैं। इससे साबित होता है कि मुफ्त में मिली चीज की कोई कद्र नहीं होती। समय आ गया है जब राजनेताओं द्वारा कर चुकाने वाली जनता से गला दबाकर वसूली गई राशि को अपने लाभ के लिए लुटाने वाली राजनीतिक संस्कृति का विरोध किया जाए क्योंकि ये देश किसी व्यक्ति, दल अथवा परिवार का न होकर जनता का है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 June 2018

आरक्षण : दूरगामी सोच जरूरी


सर्वोच्च न्यायालय ने पदोन्नति में भी आरक्षण की अंतरिम अनुमति देकर केंद्र सरकार को राहत प्रदान कर दी जिस पर लगातार दलित विरोधी होने के आरोप विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे हैं। दलित उत्पीडऩ के मामलों में तत्काल गिरफ्तारी नहीं किये जाने सम्बन्धी न्यायालयीन आदेश के कारण भी केंद्र सरकार निरन्तर दबाव में है। सर्वो'च और विभिन्न उ'च न्यायालयों द्वारा सरकारी विभागों में कार्यरत अनु.जाति/जनजाति के कर्मचारियों को पदोन्नति में भी आरक्षण की सुविधा मिलने  पर रोक लगा देने से हज़ारों लोग पदोन्नत हुए बिना ही सेवा निवृत्त हो गए। इसकी वजह से सरकार में बैठे लोगों पर आरक्षण विरोधी होने की तोहमत लगने लगी। खास तौर पर भाजपा को इस आरोप से काफी नुकसान हो रहा था। गत दिवस सर्वो'च न्यायालय ने सरकार का पक्ष सुनने के बाद फिलहाल पदोन्नति में आरक्षण जारी रखने का फरमान सुना दिया किन्तु अंतिम निर्णय संविधान पीठ ही करेगी। इस निर्णय को लेकर ये संशय बना हुआ है कि इससे केवल केंद्र सरकार के कर्मचारी लाभान्वित होंगे अथवा राÓयों के भी। विधि विशेषज्ञ सर्वो'च न्यायालय के ताजा आदेश का अध्ययन कर रहे हैं। क्या होगा ये जल्द स्पष्ट हो जाएगा। ये भी माना जा सकता है कि राÓयों को भी उसी आधार पर अंतरिम रूप से तत्सम्बन्धी अनुमति मिल जाए। जिन राÓयों नें आगामी कुछ महीनों में चुनाव होने वाले हैं वहां की सरकारें Óयादा चिंता में हैं क्योंकि इस फैसले से वोटों का हिसाब-किताब जुड़ा हुआ है। चूँकि ये तदर्थ व्यवस्था है इसलिए अंतिम फैसले तक रुकना ही पड़ेगा किन्तु इसकी वजह से आरक्षण को लेकर पक्ष-विपक्ष में चल रही बहस और तेज हो जाएगी। सही बात तो ये है कि राजनीति करने वालों को दलित और पिछड़ा वर्ग से कोई प्रेम नहीं है। यहां तक कि जाति की सियासत करने वालों तक को अपने कुनबे के सामाजिक और आर्थिक उत्थान में उतनी रुचि नहीं है जितनी वोट बैंक में। यही वजह है कि सात दशक बाद भी समाज में दलित और पिछड़े मौजूद हैं। आरक्षण का मूल उद्देश्य पूरी तरह से न्यायोचित था। सदियों से उपेक्षित और वंचित वर्ग को  बराबरी पर लाकर खड़ा करने के लिए प्रदत्त आरक्षण को असीमित समय के लिए जारी रखने का विचार डा. आम्बेडकर के मन में भी नहीं था। लेकिन बाद की राजनीतिक परिस्थितियाँ इस तरह की बन गईं कि आरक्षण की समयावधि बढाई जाती रही जिससे ये साबित होता है कि यह व्यवस्था अपने मकसद में सफल नहीं हो सकी। यदि आज भी दलित और पिछड़े वर्ग के लोग विकास की दृष्टि से बराबरी पर नहीं आ सके तो उसका सीधा-सीधा अर्थ ये निकलता है कि ये दवा भी मर्ज ठीक नहीं कर पाई। उल्टे इसकी वजह से जातिगत द्वेष और बढ़ता गया। आग में घी का काम किया पदोन्नति में भी आरक्षण सम्बन्धी व्यवस्था लागू किये जाने ने। नौकरी में आरक्षण को तो वंचित वर्ग के लिए एक अवसर माना गया लेकिन पदोन्नति करते समय फिर वैसा करना एक तरह से पक्षपात की श्रेणी में रखा जाने लगा। सामाजिक विषमता की वजह से पीछे रह जाने वालों को आगे लाने के लिए आरक्षण एक रचनात्मक प्रयास था किंतु उसका एक उद्देश्य उक्त वर्ग को अपनी शैक्षणिक और पेशेवर क्षमता बढाने का अवसर देना था जिससे वे प्रतिस्पर्धा में टिके रहने का आत्मविश्वास अपने आप में जगा सकें किन्तु पदोन्नति में भी आरक्षण की सुविधा मिलने के कारण आरक्षित वर्ग की बड़ी संख्या पूरी तरह सरकार के भरोसे होकर रह गई। इसमें कुछेक अपवाद भी होते हैं किन्तु आरक्षित होने के बाद निश्चिंत होकर बैठ जाने की प्रवृत्ति ने इस तबके का स्वाभाविक विकास रोक दिया। उसके प्रति समाज के भीतर जो विद्वेष फैला उसकी वजह भी आरक्षण ही है। पदोन्नति किये जाते समय सम्बन्धित कर्मचारी की जति की जगह उसका अनुभव और कार्यकुशलता पैमाना हो तो अ'छा रहेगा। हमारे देश में शासकीय सेवाओं का स्तर जिस तरह से गिरता जा रहा है उसे आरक्षण का दुष्परिणाम मानने वाले बहुत से हैं। यद्यपि खुलकर बोलने से सब कतराते भी हैं। कुल मिलाकर आरक्षण वह दवाई बनती जा रही है जिसका लाभ सतही तौर पर तो महसूस किया जा सकता है किंतु अँगरेजी दवा की तरह से इसके नुकसानदेह साइड इफेक्ट भी खुलकर नजर आने लगे हैं। इन्हीं बिंदुओं को दृष्टिगत रखते हुए ही उ'च और सर्वो'च न्यायालय ने पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगा रखी थी। चूंकि मामला वोट बैंक का है इसलिए राजनीतिक बिरादरी अपने-अपने ढंग से सक्रिय हो उठी। गत दिवस सर्वो'च न्यायालय ने जो अंतरिम आदेश सुनाया वह इस बात का प्रमाण है कि अभी न्यायपालिका इस बारे में किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है। संविधान सभा ने अगर पदोन्नति में आरक्षण को अवैध निरूपित कर दिया तब विभिन्न राजनीतिक दल क्या न्यायपालिका के उस निर्णय को शिरोधार्य करेंगे, इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा? यही वजह है कि आरक्षण बजाय सामाजिक समानता और समरसता लाने के नई नई समस्यओं को जन्म दे रहा है। राजनेताओं का एकमात्र उद्देश्य तो वोटों की फसल काटना मात्र है इसीलिए वे दूरदृष्टि की बजाय तात्कालिक फायदे की सोचा करते हैं लेकिन देश के मौजूदा माहौल में अब इस तरह के राजनीतिक पैंतरे समाज के भीतर नए तरह का संघर्ष उत्पन्न करने का कारण बन रहे हैं। समय आ गया है जब केवल राजनीति और वोटों से ऊपर उठकर देश और समाज की एकता के बारे में गम्भीर चिंतन किया जाए जिसमें बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की भावना हो। आरक्षण को लेकर तदर्थ और सतही सोच की बजाय ऐसा कुछ करने की जरूरत है जिससे कि समाज का दलित और वंचित वर्ग बजाय किसी की दया पर निर्भर रहने के अपने पांवों पर खड़ा हो सके और वह भी अपनी प्रतिभा के बल पर।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 June 2018

पर्यावरण की पुण्य तिथि जैसा बन गया 5 जून

चूंकि पूरी दुनिया मना रही है इसलिए हम भी मना रहे हैं, वरना जिस देश में प्रकृति के आधारभूत पंचतत्वों के महत्व को सहस्त्रों वर्ष पहले ही समझ लिया गया हो वहां पर्यावरण दिवस मनाने की औपचारिकता कुछ अजीब सी लगती है। दूब से लेकर अंतरिक्ष तक को पूजने वाले देश में आज पर्यावरण इतनी दयनीय अवस्था में जा पहुंचा है कि देखकर शर्म कम दुख ज्यादा होता है। उपभोक्तावादी संस्कृति और बाज़ारवादी सोच ने हरियाली को भी व्यापार और विलासिता बना दिया। जो सरल और सहज था, वह दुर्लभ हो गया। आंगन और मुंडेर पर आकर चहकने वाली गौरैया तो गुमशुदा की श्रेणी में आ गई। कौओं की कांव-कांव तक विलुप्त हो गई, कोयल की कुहू-कुहू तो इतिहास बनती जा रही है। किसी थके-हारे राहगीर को दो घड़ी सुस्ताने के लिए छांव देने वाले वृक्ष विकास की बलि चढ़ गए। जिन कुएं, तालाबों, बावडिय़ों से जीवन को सींचा जाता था, वे या तो दिवंगत हो गए या उनकी अंतिम सांसें चल रही हैं। सूरज का कोप भी साल दर साल बढ़ता जा रहा है। नदी, पहाड़, समुद्र सभी अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। जल, जंगल और जमीन पर मनुष्य की वासना भारी पड़ रही है। हरी भरी वसुंधरा अब केवल कवियों की कल्पना का हिस्सा रह गई है। हो सकता है प्रलय के लिए जरूरी सत्यानाश में अभी कुछ गुंजाइश हो लेकिन जितना हो चुका उसकी भरपाई की कोई सम्भावना नजर नहीं आने से पूरी दुनिया भयातुर है। पर्यावरण के संरक्षण के प्रति कहने को तो हर खासो- आम चिंतित दिखाई देता है लेकिन उसमें ईमानदारी का अभाव होने से जितना अपेक्षित है उसका दशमांश भी हासिल नहीं हो पा रहा। यही वजह है कि प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस नामक औपचारिकता का निर्वहन तो पूरा विश्व करता है लेकिन  कड़वा सच ये है कि हर साल प्रकृति और पर्यावरण की स्थिति बीते साल की अपेक्षा और बदतर होती जाती है। जो विकसित देश पूरी दुनिया को पर्यावरण के संरक्षण के प्रति उपदेश देते हैं वे ही उसके साथ दुराचार के सबसे बड़े अपराधी हैं। विकास का जो स्वरूप पूरी दुनिया ने अपना रखा है वह प्रकृति से समन्वय की बजाय उससे संघर्ष करते हुए  उसे पराजित करने की मनोवृत्ति पर आधारित होने से हालात एक कदम आगे दो कदम पीछे के बन गए हैं। दरअसल विकासशील कहे जाने वाले भारत को प्रकृति और पर्यावरण के लिए किसी से ज्ञान लेने की कोई जरूरत नहीं है। गांव के एक अपढ़ इंसान को भी जल, जंगल, जमीन का महत्व और उनके संरक्षण के तौर-तरीके भली-भांति पता होते हैं। प्रकृति की रक्षा का संस्कार उसे घुट्टी में ही मिल जाता है। बावजूद उसके यदि भारत में पर्यावरण के लिए खतरनाक स्थितियां उत्पन्न हो गईं है तब विचारणीय मुद्दा ये है कि क्या हमें पश्चिम से इस बारे में सीखना पड़ेगा जो खुद प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है। अविवेकपूर्ण विकास की अंधी दौड़ में जितना कुछ हासिल किया गया उससे ज्यादा गंवा दिया गया और वह भी ऐसा जिसकी क्षतिपूर्ति अब सम्भव नहीं लगती। इसलिए बुद्धिमत्ता इसी में है कि भारत अपनी समस्याओं का इलाज अपने तरीकों से ही करे जिसमें प्रकृति के दोहन की तो अनुमति है किन्तु शोषण की नहीं। देश की राजधानी दिल्ली जब विश्व के  सर्वधिक प्रदूषित महानगरों में शुमार होती है तब ये समझा जा सकता है कि देश के भीतरी हिस्से किस दुर्दशा में जी रहे होंगे? पर्यावरण दिवस पर जिन चिंताओं को लेकर चिंतन हो रहा है वे रातों-रात तो जन्मीं नहीं। लम्बे अरसे से हो रहे अत्याचार ने प्रकृति में भी प्रतिशोध की भावना भर दी है। इस वजह से जो प्राकृतिक आपदाएं कभी-कभार आया करती थीं वे जल्दी-जल्दी आने लगीं। विज्ञान प्रदत्त तकनीक और विकास के बावजूद भी इन आपदाओं के सामने अमेरिका सरीखा विकसित और संपन्न देश भी असहाय होकर रह जाता है। वर्ष में एक दिन पर्यावरण दिवस मनाने से यदि काम चलता होता तब स्थितियां शायद इतनी भयावह नहीं होतीं। यदि वाकई इस बारे में हम गंभीर हैं तब हमें पूरे समय पर्यावरण के संरक्षण के प्रति जागरूक रहना पड़ेगा। प्रकृति से लड़कर जीतने का अहंकार अन्तत: समूची मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाएगा। वहीं लापरवाही यदि नहीं रोकी गई तब भी पर्यावरण दम तोड़ता जाएगा। गर्मी से बचने के लिए कितने भी एयर कंडीशनर लगा लिए जाएं लेकिन जब तक समूचा परिवेश नैसर्गिक हरियाली से भरा नहीं होगा तब तक तन-मन  को सुकून देने वाली ठंडी हवाएं पैसा देकर भी नसीब नहीं होंगी। इसका सबसे ताजा और ज्वलन्त उदाहरण है हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला। देश के सबसे ऊंचे इस हिल स्टेशन पर शीतलता की चाह में धन और समय खर्च कर पहुँचे सैलानी पानी के लिए तरस रहे हैं। ज्यादा दूर न जाएं तो सदैव लबालब रहने वाली नर्मदा नदी की धार अपने उद्गम स्थल अमरकंटक से शुरू होने के कुछ दूर बाद ही सूख गई है। हिमालय के ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। पहाड़ नंगे नजर आने लगे हैं। जंगलों का घनापन गुजरे जमाने की चीज होकर रह गया है। ऐसे में पर्यावरण दिवस पश्चाताप दिवस बनकर रह गया है। यदि हम वाकई पर्यावरण के संरक्षण के प्रति ईमानदारी से समर्पित हैं तो पर्यावरण और पृथ्वी दिवस मनाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न करें क्योंकि ये किसी की पुण्यतिथि जैसा होता जा रहा है। इसके उलट पर्यावरण संरक्षण हमारी नित्य क्रियाओं का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। जब तक हम प्रकृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को अपनी आदत नहीं बनाएंगे तब तक किसी सुधार की उम्मीद करना रेगिस्तान में पानी की तलाश करने जैसा होगा। जो आज के दिन भारत सहित पूरी दुनिया कर रही है।

-रवीन्द्र वाजपेयी