Friday, 5 October 2018

पेट्रोल - डीजल  : मजबूरी में मेहरबानी

केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज घटाने के साथ ही पेट्रोलियम कंपनियों पर दबाव डालकर कीमतें कम करवाई गईं। उसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी द्वारा शासित राज्यों को निर्देश दिए और इस तरह जो केंद्र सरकार कुछ दिन पहले तक खुद को असहाय बता रही थी उसके हरकत में आते ही पेट्रोल-डीजल के दाम तकरीबन ढाई रुपये प्रति लीटर कम हो गए। भाजपा शासित राज्यों द्वारा स्थानीय करों में राहत दिए जाने से उनके यहां दाम 5 रुपये प्रति लीटर तक गिर गये। इस आकस्मिक निर्णय से आम उपभोक्ता निश्चित रूप से खुश हुआ लेकिन उसी के साथ हर किसी के मन में ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि जब सरकार को ही ये करना था तब जनता को इतना पेरने की क्या जरूरत थी। बीते कुछ महीने से अंतर्राष्ट्रीय कारणों से कच्चे तेल के दामों में बेतहाशा वृद्धि का असर भारत पर भी पड़ा और लगभग रोजाना दाम बढऩे का सिलसिला चल पड़ा। बीच-बीच में कीमतें कम हुईं किन्तु वे ऊंट के मुंह में जीरा के समान थीं। चौतरफा आलोचना के बाद भी केंद्र सरकार की तरफ  से सदैव यही जवाब मिला कि कच्चे तेल का पूरा खेल वैश्विक उठापटक पर चूंकि निर्भर है अत: उसके हाथ में कुछ भी नहीं है। पेट्रोलियम वस्तुओं पर लगने वाले टैक्स को घटाने की मांग पर आर्थिक स्थिति का रोना रोया जाता रहा। राज्यों ने भी केंद्र सरकार के नक्शे कदम पर चलते हुए जनता का तेल निकालने में कोई संकोच नहीं किया। मप्र के वित्त मंत्री जयंत मलैया का ही उदाहरण लें तो उन्होंने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स घटाने की मांग को बड़ी ही बेरुखी से अस्वीकार कर दिया। इस वजह से केंद्र सरकार के साथ भाजपा की छवि भी निरन्तर खराब होती जा रही थी। मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा के चुनाव अगले महीने होने हैं। वहां से आ रहे सियासी संकेत भाजपा के लिए चिंता का कारण बनने लगे थे। हाल ही में भोपाल में आयोजित महाकुम्भ में दावे के विपरीत कम लोगों की उपस्थिति से भाजपा अध्यक्ष  अमित शाह भी असंतुष्ट होकर लौटे। इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार, पेट्रोलियम कंपनियों और भाजपा शासित राज्यों ने मिलकर पेट्रोल, डीजल सस्ता करने की जो मेहरबानी की वह  मजबूरी ही कही जाएगी। इसके पीछे उद्देश्य तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव ही मुख्य रूप से दिखाई दे रहे हैं। वरना अरुण जेटली हफ्ते भर पहले तक तो पूरी तरह बेरहम बने रहे। मप्र जैसे राज्य की भाजपा सरकार पेट्रोलियम वस्तुओं पर सबसे ज्यादा टैक्स वसूलने के लिए कुख्यात है। यहां के मुख्यमंत्री बड़े ही संवेदनशील माने जाते हैं किंतु जिस तरह का काइयांपन केंद्र में श्री जेटली दिखाते रहे ठीक वैसा ही रवैया मप्र के वित्तमंत्री श्री मलैया का भी रहा। अचानक केंद्र सरकार और भाजपा जनता की हमदर्द बन गईं तो इसके पीछे कोई सदाशयता नहीं वरन जनता के गुस्से से थोड़ा बहुत बचने का प्रयास है। यदि तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर नहीं होते और उनमें भाजपा की स्थिति नाजुक नहीं होती तब ये उपकार इस तरह न किया जाता। लगे हाथ जेटली जी ने ये भी बता दिया कि इस मेहरबानी से केंद्र को कितना नुकसान होगा लेकिन ज्यादा अच्छा होता अगर वे ये बताते कि अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में जब कच्चे तेल के दाम धड़ाम-धड़ाम गिर रहे थे तब भारत की जनता को उसका लाभ न देकर केंद्र सरकार और पेट्रोलियम कम्पनियों ने किस निर्दयता से मुनाफाखोरी की। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि भारत में कच्चे तेल का आयात विदेशी मुद्रा का अधिकतम भाग खा जाता है। अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा आयात करने वाला भारत कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीददारों में एक है। पेट्रोल-डीजल का विकल्प खोजने में समुचित प्रयासों के अभाव ने इस समस्या को और विकराल बना दिया। जब बहुत देर और नुकसान हो चुका तब जाकर इस दिशा में कोशिशें शुरू हुईं लेकिन वे भी नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली उक्ति का प्रतीक बन गई हैं। बैटरी चलित वाहनों को लेकर भी उतनी सक्रियता नजर नहीं आ रही। कुल मिलाकर कच्चे तेल के मामले में भारत की हालत अभी भी वैसी ही है जैसी पहले से चली आ रही है। ऐसे में आज हुई राहत की बरसात आगे भी जारी रहेगी या नहीं ये बड़ा प्रश्न है। क्या पता इसके बदले किन्हीं और वस्तुओं पर अधिभार बढ़ाकर इस हाथ दे उस हाथ ले वाली स्थिति बना दी जाए। बावजूद इसके जनता को जो राहत मिली वह न मामा से काना मामा भला वाली उक्ति को चरितार्थ करती है। बेहतर होता केंद्र सरकार ये दरियादिली हर हफ्ते दिखाती रहती तो उसे इतनी गालियां शायद नहीं पड़ी होतीं। देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर पेट्रोल-डीजल के दामों में लगभग 5 रुपये प्रति लीटर की कमी स्वागतयोग्य है। लेकिन इसके बाद भी जनता के मन में केंद्र और भाजपा के प्रति गुस्सा पूरी तरह ठंडा नहीं पड़ा क्योंकि कुछ महीनों से रोजाना हुई मूल्य वृद्धि ने केंद्र और भाजपा के प्रति जो रोष उत्पन्न कर दिया था वह इतने मात्र से मिटना मुश्किल है। मान भी लें कि सरकार की अपनी मजबूरियां हैं लेकिन दूसरी तरफ  ये भी उतना ही बड़ा सच है कि हमारे देश में पेट्रोल-डीजल को केंद्र और राज्य दोनों सरकारों ने दुधारू गाय बना रखा है। नोटबन्दी और जीएसटी से सरकारी खजाने में काफी धन जमा होने लगा है। यदि मोदी सरकार वाकई अच्छे दिन लाने के वायदे को मूर्तरूप देना चाहती है तब पेट्रोल-डीजल को भी बिना विलंब जीएसटी के दायरे में ले आना चाहिए वरना ये स्थिति सदैव बनी रहेगी। कर वसूलना शासन का अधिकार और दायित्व दोनों है लेकिन जनता का खून चूसने का हक कदापि नहीं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 4 October 2018

प्रधान न्यायाधीश : संक्षिप्त किन्तु चुनौतीपूर्ण कार्यकाल

निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा कार्यकाल के अंतिम 9 महीनों में जितने विवादास्पद हुए उतना शायद ही उनका कोई पूर्ववर्ती हुआ होगा। लेकिन उन्हें विवादास्पद बनाने वाले सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों में से एक रंजन गोगोई का उनका उत्तराधिकारी बनने के बाद क्या सर्वोच्च न्यायालय और उसके अधीनस्थ कार्यरत देश की न्याय व्यवस्था निर्विवाद और निष्पक्ष रह सकेगी, ये प्रश्न हर उस शख्स के मस्तिष्क में उठ रहा है जो न्यायपालिका के सर्वोच्च शिखर पर मचे विवाद और टांग खिचौवल से दुखी और चिंतित था।  रोस्टर प्रणाली को लेकर श्री गोगोई सहित तीन अन्य न्यायाधीशों ने बगावती अंदाज में पत्रकार वार्ता कर श्री मिश्रा पर मनमानी करने का आरोप लगाते हुए ये एहसास कराया मानों समूची न्यायपालिका सरकार की गुलाम होकर रह गई हो। उस घटना को असहिष्णु  लॉबी ने भी जमकर उछाला। ये कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि उस पत्रकार वार्ता ने बतौर न्यायाधीश श्री मिश्रा के समूचे कैरियर पर धब्बा लगा दिया। लेकिन उस घटना से एक बात ये भी स्पष्ट हो गई कि न्यायपालिका पर भी दलगत राजनीति की काली छाया पड़ चुकी है। पत्रकार वार्ता के बाद उसमें शामिल एक न्यायाधीश श्री चेलमेश्वर के घर पर सीपीआई के नेता डी राजा के जाने पर भी ढेरों सवाल उठे। भले ही श्री मिश्रा की विदाई में श्री गोगोई ने अच्छी - अच्छी बातें कहीं किन्तु ये सही है कि बीते नौ माह सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा के लिए बेहद शर्मनाक रहे। गत दिवस कार्यभार ग्रहण करते ही श्री गोगोई ने पहला कार्य रोस्टर आवंटन का किया जिसमें किसी अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश से  सलाह उन्होंने ली हो ऐसा नहीं लगा। उल्लेखनीय है श्री गोगोई के साथ जिन चार न्यायाधीशों ने श्री मिश्रा के विरुद्ध मोर्चा खोला उनका प्रमुख मुद्दा यही रोस्टर आवंटन था। श्री मिश्रा द्वारा महत्वपूर्ण मामले अपने पास रखकर बाकी अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों को दिया जाना ही विवाद की असली जड़ बताई गई थी। इसे लेकर प्रस्तुत की गई याचिका पर जाते - जाते खुद श्री मिश्रा फैसला सुना गए कि रोस्टर आवंटन का अधिकार प्रधान न्यायाधीश का ही रहेगा। उस आधार पर श्री गोगोई को मजबूत बहाना मिल गया लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि उनके कार्यकाल में वह सब नहीं होगा जो देश ने बीते कुछ महीनों में देखा। देखने वाली बात ये होगी कि पत्रकार वार्ता कर सर्वोच्च न्यायालय की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाने की जिस मुहिम के श्री गोगोई हिस्सा बने यदि वह उनके कार्यकाल में भी जारी रही तब वे क्या कदम उठाएंगे ? उल्लेखनीय है उस मुहिम के बाद एक दो न्यायाधीश तो रो पड़े थे क्योंकि चार न्यायाधीशों ने बिना नाम लिए उनकी योग्यता पर प्रश्न उठा दिए थे। हाल ही में कुछ नए न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय का  हिस्सा बने हैं जिनमें कुछ को लेकर केंद्र सरकार के मन में हिचक भी थी लेकिन अनेक ऐसे भी हैं  जिन पर सत्ता समर्थक होने का सन्देह किया जाता है। ये देखते हुए यदि सर्वोच्च न्यायालय में शीर्ष स्तर पर शुरू हुई राजनीति आगे भी जारी रहे तो आश्चर्य नहीं होगा। हॉलांकि ये देश और न्यायपालिका दोनों के लिए नुकसानदेह रहेगा। अपनी मुखालफत करने वाले की सिफारिश प्रधान न्यायाधीश पद हेतु कर श्री मिश्रा ने मान्य परंपरा का निर्वहन किया वहीं केंद्र सरकार ने भी उसे जस का तस स्वीकार कर लिया किंन्तु इससे सर्वोच्च न्यायालय का अंतर्निहित विवाद खत्म हो जायेगा ये सोचना कोरा आशावाद होगा। श्री गोगोई का कार्यकाल यद्यपि बहुत लंबा नहीं रहेगा किन्तु इस दौरान देश महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम से गुजरेगा। इसके अलावा अनेक ऐसे प्रकरणों पर भी सर्वोच्च न्यायालय को फैसले करने हैं जिनसे देश की राजनीतिक दिशा प्रभावित होगी। ये भी संयोग है कि निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश श्री मिश्रा  कार्यकाल के अंतिम दौर में विवादस्पद हुए वहीं उनके उत्तराधिकारी श्री गोगोई विवाद खड़े करने के उपरांत उनके उत्तराधिकारी बने। न्यायपालिका के क्रियाकलापों पर नजर रखने वालों की रुचि इस बात पर रहेगी कि श्री गोगोई उन विवादों से कैसे बच पाएंगे जो उन्होंने ही उत्पन्न किये थे और क्या वे उन तौर-तरीकों को बदलने का साहस दिखाएंगे जिनको लेकर उन्होंने अपने पूर्ववर्ती को कठघरे में खड़ा करने में कोई संकोच न करते हुए मर्यादाओं की रेखाओं को लांघने की परंपरा को जन्म दिया। इस संदर्भ में ये बात स्मरणीय है कि न्यायप्रणाली में कानून जितना महत्वपूर्ण होता है उसी तरह परंपराओं की भी अपनी अहमियत है। देखते हैं श्री गोगोई अपने से कनिष्ठ न्यायाधीशों को वह स्वायत्तता देते हैं या नहीं जिसके लिए खुद उन्होंने ही आवाज उठाई थी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 3 October 2018

सपाक्स : बहुत कठिन है डगर ......

मप्र में एक और पार्टी का उदय हो गया। सपाक्स (सामान्य पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक समाज संस्था ) अब आंदोलन की बजाय एक राजनीतिक दल बन गया। चुनाव आयोग में इस हेतु विधिवत आवेदन कर दिया गया। अनु.जाति/जनजाति कानून को लेकर सवर्ण समुदाय बहुत नाराज है। पूरे प्रदेश में सपाक्स के नेतृत्व में सवर्ण समाज ने बंद करवाकर अपनी ताकत भी दिखाई। शुरुवात में बात नोटा से शुरू हुई थी लेकिन अब तो सपाक्स विधिवत राजनीतिक दल के तौर पर सामने आ गया है। उसने सभी 230 सीटों पर चुनाव लडऩे की घोषणा भी कर दी। सपाक्स के अध्यक्ष हीरालाल त्रिवेदी ने स्पष्ट किया कि पार्टी भाजपा या कांग्रेस की बी या सी टीम बनकर नहीं रहेगी। श्री त्रिवेदी के अनुसार उनकी पार्टी पिछड़े वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण भी देगी। पहले लग रहा था कि सपाक्स को आरक्षित वर्ग के संग़ठन अजाक्स के मुकाबले खड़ा किया गया है। इसे आरक्षण के विरुद्ध सवर्ण जातियों की आवाज भी विश्लेषक मान रहे थे। कुछ लोगों का ये भी सोचना था कि सपाक्स एक दबाव समूह के तौर पर काम करेगा लेकिन वे सभी अनुमान और आकलन दरकिनार हो गए और अंतत: वह एक राजनीतिक दल की शक्ल में खुलकर सामने आ ही गया। लेकिन इसकी छवि एक जनाधार वाली पार्टी के तौर पर बनेगी इस पर अभी सन्देह के बादल मंडरा रहे हैं क्योंकि अभी तक जितने भी नाम उसके शीर्ष पदाधिकारियों के उजागर हुए उनमें अधिकतर या यूँ कहें कि लगभग सभी पूर्व शासकीय अधिकारी हैं और वह भी उच्च पदों पर रहे हुए। आम तौर पर हमारे समाज में सरकारी मुलाजिमों की छवि अच्छी नहीं मानी जाती। नौकरी में रहते हुए जनता के प्रति उनका रवैया सामान्यतया असम्वेदनशील ही रहता है। ऐसे में अफसरों के वर्चस्व वाली पार्टी आम मतदाता को कितना आकर्षित कर सकेगी ये बड़ा प्रश्न है। और फिर अपने साथ पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को शरीक कर सपाक्स सवर्ण जातियों को कितना आकर्षित कर सकेगी ये भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। जातिगत आरक्षण और पदोन्नति में आरक्षण का यदि सपाक्स विरोध करेगा तो उस सूरत में उसे पिछड़े वर्ग के मतों से हाथ धोना पड़ेगा और समर्थन करने की दशा में सवर्ण जातियां उससे दूरी बना लेंगीं। सपाक्स अध्यक्ष श्री त्रिवेदी यदि अरविंद केजरीवाल बनना चाह रहे हों तो उनकी सोच गलत है क्योंकि श्री केजरीवाल भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे द्वारा किए आन्दोलन से प्रकाश में आए थे। उस आंदोलन को समाज के हर वर्ग ने समर्थन दिया था। उस आधार पर देखें तो सपाक्स के गठन के पीछे वैचारिक पक्ष क्या है ये स्पष्ट किये बिना वह आम आदमी पार्टी जैसी किसी चमत्कारिक सफलता की उम्मीद तो नहीं कर सकती लेकिन वह भाजपा और काँग्रेस से निराश उन मतदाताओं के लिए अपनी नाराजगी व्यक्त करने का एक जरिया जरूर बन सकती है जो अभी तक नोटा का बटन दबाने की मानसिकता से प्रभावित हो चले थे। राजनीतिक क्षेत्रों में इस बात पर भी मंथन चल पड़ा है कि सपाक्स दोनों प्रमुख पार्टियों में से किसे क्षति पहुंचाएगी ? प्रारंभिक आकलन के अनुसार अपने सवर्ण आधार के कारण ये संगठन भाजपा के परंपरागत जनाधार में सेंध लगाएगा लेकिन अब राजनीतिक पार्टी बनाकर सभी 230 सीटों पर लड़ऩे की घोषणा के बाद ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि सपाक्स इतने उम्मीदवार लाएगी कहां से? और जब वह अनु .जाति/जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी मुकाबले में आएगी तब वह सवर्ण जातियों की पसंद किस हद तक बनी रहेगी ये सोचने वाली बात है। दूसरी बात संगठन की है जो चुनाव जीतने की प्राथमिक आवश्यकता है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी भले ही नई-नई थी लेकिन श्री केजरीवाल और उनके सहयोगी एनजीओ चूंकि पहले से सक्रिय थे इसलिए उन्हें जनता से संवाद स्थापित करने में दिक्कत नहीं आई। और फिर दिल्ली कुल मिलाकर है तो एक महानगर ही। उस दृष्टि से सपाक्स पूरे मप्र के बड़े इलाके में प्रत्याशी तय करने के बाद चुनावी माहौल कैसे बनाएगी ये फिलहाल स्पष्ट नहीं है। बेहतर हो यदि ये पार्टी कुछ सीमित इलाकों को अपना कार्यक्षेत्र बनाकर मैदान में उतरे। 2008 के चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री उमाश्री भारती ने भी अपनी पार्टी बनाकर भाजपा-कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश की थी किन्तु वे भी सफल नहीं हो सकीं। उस अनुभव से सपाक्स सबक लेकर अपनी ताकत को कुछ सीटों पर केंद्रित कर मैदान में उतरे तो वह थोड़ा सा कुछ हासिल कर सकती है। वरना किसी बड़े दमदार और चर्चित चेहरे के अभाव में चुनाव जीतना बेहद कठिन है। सपाक्स अध्यक्ष के साथ जो पदाधिकारी घोषित हुए उनमें से अधिकांश पूर्व नौकरशाह हैं। पार्टी सोचती है उनके जरिये शासकीय कर्मचारियों को आकर्षित कर लेगी किन्तु ये भी उतना आसान नहीं दिखाई दे रहा। यदि श्री त्रिवेदी केवल उच्च कही जाने वाली जातियों को एकजुट करते हुए आरक्षण विरोधी मुहिम चलाते तब वे जनता के एक प्रभावशाली वर्ग को आकर्षित कर सकते थे लेकिन सभी वर्गों को साथ लेकर पार्टी बनाना और चलाना आज के दौर में उतना आसान नहीं है जितना समझा जाता है। कुल मिलाकर सपाक्स की स्थिति वोट कटवा की बनने की संभावना ही ज्यादा लगती है। कांग्रेस और भाजपा से रुष्ट मतदाता अपनी भड़ास निकालने के लिए जरूर सपाक्स को समर्थन दे सकते हैं वरना मप्र में तीसरी ताकत बनने में तो बसपा तक सफल नहीं हो सकी जबकि उसका जातीय आधार बेहद सुदृढ़ है। यही स्थिति गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की भी हुई। सपाक्स कितना भी कहे कि वह भाजपा-कांग्रेस दोनों से दूर है लेकिन वह मप्र की राजनीति में किसी बड़े बदलाव का कारण बन सकेगी ऐसा सोच लेना जल्दबाजी होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 2 October 2018

कम्प्यूटर बाबा : प्रवासी पक्षियों को दाना डालने का नतीजा

मप्र की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने जब कतिपय बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा देने का फैसला लिया तब उसका देश भर में मज़ाक उड़ा। संत समाज सहित आम जनता को भी वह निर्णय अटपटा लगा। सरकार धर्मगुरुओं का सम्मान करे उस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। शिवराज जी यूँ भी बड़े ही धार्मिक व्यक्ति हैं किंतु साधु-संत राज्यमंत्री का दर्जा पाकर सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के प्रचारक बनें तो उससे उनके प्रति व्याप्त सम्मान कम होता है। जो साधु-संत राजनीति में उतरकर किसी दल विशेष से जुड़े वे भले चुनाव जीतकर सांसद, विधायक और मंत्री वगैरह बन गए हों किन्तु उससे उनकी निर्विवाद और आध्यात्मिक छवि पर विपरीत असर पड़ा है। कुछ संत यद्यपि सीधे राजनीति में तो नहीं आए लेकिन वे किसी पार्टी के समर्थक बनकर विवादास्पद बन बैठे। यही वजह रही जब शिवराज सरकार ने कुछ बाबाओं को अचानक सत्ता सुख प्रदान किया तो लोगों को आश्चर्य के साथ बुरा भी लगा। मुख्यमंत्री के अलावा उन साधुओं के प्रति भी आम नागरिक के मन में उपहास का भाव उत्पन्न हुआ। राज्यमंत्री पद मिलते ही कुछ बाबा तो ठेठ सियासी अंदाज में सक्रिय हो उठे। गाड़ी-बंगला, प्रोटोकॉल, सर्किट हाउस की सुविधा जैसे सांसारिक प्रपंचों में उनकी लिप्तता देखकर उनके वैराग्य पर भी उंगलियां उठने लगीं। नर्मदा से अवैध रेत उत्खनन रोकने और पर्यावरण की रक्षा हेतु जनजागरण करने के जिस उद्देश्य से मुख्यमंत्री ने उनकी नियुक्तियां कीं वह कितना पूरा हुआ ये तो पता नहीं चला लेकिन उनके नाज़-नखरे जरूर जनचर्चा का विषय बनते रहे। धीरे-धीरे जब लोगों का ध्यान उनसे हटता सा लगा तब कम्प्यूटर बाबा ने पद  छोड़कर शिवराज सरकार को धर्मविरोधी बताते हुए मुख्यमंत्री पर उनकी बातों पर ध्यान नहीं देने और संतों से न मिलने जैसे आरोप भी मढ़ दिए। और भी कई बातें बाबा ने कहीं। उनका अंदाज विशुद्ध राजनीतिक लगा। आशीर्वाद से अचानक श्राप की मुद्रा में वे क्यों आ गए  ये तो वे ही बेहतर बता सकेंगे। उधर भाजपा के प्रवक्ता और एक-दो मंत्री भी कम्प्यूटर बाबा के आरोपों के जवाब में आए। यद्यपि मुख्यमंत्री की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई लेकिन इस झटके से भाजपा नेतृत्व की आंखें अब भी नहीं खुलीं तो फिर ये मानना पड़ेगा कि पार्टी में गंभीरता से सोचने की प्रवृत्ति का ह्रास होता जा रहा है। भाजपा या मुख्यमंत्री द्वारा बाबाओं को बिना किसी दूरदर्शिता के सीधे राज्यमंत्री का दर्जा दे देना जनता तो क्या उन समर्पित भाजपाइयों के गले तक नहीं उतरा जिनको देवदुर्लभ कार्यकर्ता कहकर पार्टी बहलाती-फुसलाती रही। कई तो अपनी नि:स्वार्थ सेवाओं के मूल्यांकन का इंतजार करते-करते बुढ़ा गए। ये गलती केवल मप्र में नहीं हुई बल्कि और भी जगह की जाती रही जिससे पार्टी के प्रतिबद्ध कैडर में असन्तोष बढऩे के साथ ही आम जनता के मन में भी ये धारणा मजबूत हुई कि पार्टी सत्ता की दौड़ में अपने मूल रास्ते से भटक गई। जिन बाबाओं को शिवराज सरकार ने महिमामंडित किया वे यदि वैचारिक तौर पर पार्टी से सम्बद्ध होते तो उनकी नियुक्ति औचित्यपूर्ण रहती किन्तु अचानक उनको राज्यमंत्री का दर्जा देने से भाजपा और शिवराज दोनों की किरकिरी हुई। कम्प्यूटर बाबा के इस्तीफे से भाजपा को कितना नुकसान होगा ये उतना बड़ा मुद्दा नहीं जितना ये कि जाते-जाते वे जो कारण गिना गए उससे भाजपा गुनाह बेलज्जत हो गई। हो सकता है शेष तीन बाबा भी चुनाव के पहले इसी तरह का धमाका करें क्योंकि ऐसे लोग अपने ऊपर किये उपकार को सामने वाले की कमजोरी समझते हैं। बेहतर हो भाजपा और मुख्यमंत्री कम्प्यूटर बाबा के आचरण से सबक लेते हुए प्रवासी पक्षियों को दाना डालना बंद कर दें वरना ऐसी फजीहत आगे भी होती रहेगी ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 1 October 2018

लखनऊ कांड : सम्वेदनशीलता के साथ जिम्मेदारी का भाव भी जरूरी


दो दिन पहले लखनऊ में आधी रात के समय कार में जा रहे एक निजी कंपनी के अधिकारी की पुलिस की गोली से हुई मौत बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटना है। गोली मारने वाले पुलिस कर्मी की ये सफाई किसी के गले नहीं उतर रही कि मृतक विवेक तिवारी ने रोके जाने पर गाड़ी नहीं रोकी उल्टे उसे अपनी कार से कुचलने का प्रयास किया जिस पर आत्मरक्षार्थ उसने गोली चला दी। घटना के समय मृतक के साथ उसकी एक महिला सहकर्मी भी थी जिसे वे उसके घर छोडऩे जा रहे थे और इसकी जानकारी विवेक ने कुछ देर पहले ही अपनी पत्नी को फोन पर दी भी थी। उक्त घटना से उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा अपराधियों के सफाये की जो मुहिम चलाई गई उस पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। सत्ता संभालते ही श्री योगी ने पुलिस को कुख्यात अपराधियों के एनकाउंटर की जो छूट दी उससे बड़ी संख्या में अपराधियों ने आत्मसमर्पण किया और जो नहीं आये उन्हें पुलिस ने तलाशकर मौत की नींद सुला दिया। इस मुहिम का अच्छा असर हुआ। अपराधी तत्वों में कानून-व्यवस्था के प्रति भय बढ़ा वहीं आम नागरिक भी स्वयं को सुरक्षित अनुभव करने लगा लेकिन इसका नकारात्मक असर ये पड़ा कि पहले से ही कुख्यात उप्र की पुलिस और निरंकुश हो गई तथा अनेक फर्जी एनकाउंटर की खबरें भी आईं। हालिया घटना भी उसी का परिणाम कही जा सकती है क्योंकि आधी रात के समय किसी कार में किसी पुरुष और महिला का साथ होना और रोकने पर गाड़ी की गति तेज कर भागने से ऐसा कुछ भी साबित नहीं होता जिससे विवेक की हत्या का औचित्य साबित किया जा सके। ऐसी घटना के बाद जैसा आजकल का चलन हो गया है परिजन समाचार माध्यमों के जरिये शासन-प्रशासन पर दबाव बनाते हैं और मुआवजे के तौर पर मोटी राशि के साथ सरकारी नौकरी भी मांगते हैं। विवेक की पत्नी ने भी बिना एक पल गंवाए उप्र सरकार के 25 लाख और नौकरी की पेशकश ठुकराते हुए सीधे एक करोड़ और नौकरी की मांग रख दी। ये ऐसा मुद्दा है जिसमें व्यवहारिकता और भावनाओं के बीच द्वंद चलता है। समय के साथ सब सामान्य भी हो जाता है लेकिन इस तरह के हादसे के बाद उप्र की पुलिस की चाल, चरित्र और चेहरा बदल जाने की उम्मीद करना सिवाय बेवकूफी के और कुछ भी नहीं होगा। ये पहला मौका नहीं है जब इस राज्य के पुलिस बल ने इस तरह की बर्बरता की हो किन्तु इससे योगी सरकार की साख और धाक दोनों को जबरदस्त धक्का लगा है। अपराधियों के विरुद्ध सख्ती बरतने की एक साहसिक और सराहनीय पहल व्यवस्थाजनित विसंगतियों की शिकार होकर कलंकित हो गई। मृतक की अंत्येष्टि हो गई। देर सवेर मुआवजे की राशि और सरकारी नौकरी का विवाद भी सुलझ जाएगा लेकिन विवेक वापिस नहीं आएगा। इस घटना के बाद भी पुलिस-प्रशासन और सत्ता में बैठे हुक्मरानों में प्रायश्चित का भाव आए ये कहीं से भी नहीं लगता और यही सबसे बड़ी विडंबना है। ऐसे मामलों में सियासत का गंदा खेल भी अशोभनीय लगता है। उप्र की कानून व्यवस्था और सरकारी नीतियों की आलोचना करना विपक्ष का कर्म और धर्म दोनों है लेकिन दिल्ली के सुशिक्षित मुखयमंत्री अरविंद केजरीवाल का ये बयान न सिर्फ  निंदनीय अपितु निम्नस्तरीय भी कहा जायेगा जिसमें उन्होंने उप्र सरकार पर हिन्दू को मारने जैसा आरोप लगाया। वैसे श्री केजरीवाल के बयानों में शालीनता का अक्सर अभाव ही नजर आता है लेकिन लखनऊ की घटना पर मृतक के धर्म का उल्लेख करना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। बेहतर हो समूची व्यवस्था में सम्वेदनशीलता के साथ जिम्मेदारी का भाव भी उत्पन्न हो क्योंकि उसके बिना इस तरह की घटनाओं को रोकना मुश्किल ही नहीं असम्भव भी होगा। उप्र के कतिपय मंत्रियों के बयान भी इस संबंध में बेहद अफसोसनाक रहे जिससे पता चलता है कि उनके भीतर छिपी मानवीयता का स्तर कितना कम है। हमारे देश में पुलिस, प्रशासन और पॉलिटीशियन (राजनेताओं) के गठजोड़ ने समूची शासन व्यवस्था को निरंकुश और निर्मोही बना दिया है। किसी की जान की कीमत मुआवजे से नहीं आंकी जा सकती। जिस पुलिस कर्मी ने विवेक की जान ली उसे अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए और उसकी बातों की भी गंभीरता से विवेचना जरूरी है। जांच एसआईटी को दे दी गई है। पीडि़त परिवार के दबाव डालने पर सीबीआई की जांच भी करवाने का आश्वासन राज्य सरकार ने दिया है। घटनास्थल पर लगे सीसी कैमरे भी मददगार रहेंगे तथा मृतक के साथ कार में मौजूद महिला के बयान भी बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वही घटना की एकमात्र चश्मदीद गवाह है। लेकिन सच्चाई सामने आने में काफी समय लगेगा। अक्सर ऐसे मामलों में अकल्पनीय मोड़ भी आ जाते हैं किन्तु ये भी सही है कि इस तरह की घटनाएं भी हमारे यहां कुछ दिन की सनसनी बनकर रह जाती हैं और ज्योंही कोई दूसरी वैसी ही घटना होती है पुरानी को भूल पूरा देश उसमें उलझ जाता है। बाजारवादी व्यवस्था में इंसानी जिंदगी भी खबरों के बाजार की विषयवस्तु बनकर रह गई है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी