Wednesday, 10 October 2018

विपक्षी एकता पर संकट के बादल

बसपा प्रमुख मायावती राजनीतिक सौदेबाजी में बहुत ही बेरहम हैं। लिहाज नाम की कोई चीज उनकी राजनीति में है ही नहीं। वे क्या कहती, क्या करतीं इसका अंदाजा दूसरी पार्टियां तो क्या खुद उनकी अपनी पार्टी तक में कोई नहीं लगा सकता। यही वजह है कि आज तक बसपा का स्थायी गठबन्धन किसी से नहीं हो सका। यहां तक कि अनुसूचित जातियों के बीच काम कर रही अन्य पार्टियों अथवा संगठनों के साथ भी उनका कोई तालमेल नहीं है। दलित समुदाय के कई नेता लंबे समय तक बसपा में रहने के बाद मायावती के एकाधिकारवादी रवैये से क्षुब्ध होकर बाहर आ गए। उप्र के स्वामीप्रसाद मौर्य इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। मायावती अपने राजनीतिक गुरु स्व.कांशीराम की तरह दलित समुदाय की हितचिन्तक कम अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के प्रति ज्यादा सतर्क रहती हैं। यही वजह है कि वे कब किसके साथ होंगी और कब किसके विरुद्ध हो जाएंगी कह पाना कठिन है। 1999 में अविश्वास प्रस्ताव पर अटल जी की सरकार को समर्थन का आश्वासन देने के बाद लोकसभा में भाषण के दौरान अचानक उन्होंने कांग्रेस को नागनाथ और भाजपा को सांपनाथ बताते हुए मतदान से दूर रहने की घोषणा कर दी जिसके कारण सरकार गिर गई। इसके पहले उप्र में भी भाजपा के साथ उनका गठबंधन कई मर्तबा उनकी जि़द और अस्थिर सोच के चलते टूटा। 2014 के लोकसभा और 2017 के उप्र विधानसभा चुनाव में बसपा का सूपड़ा साफ  होने के बाद मायावती ने पुराने दुश्मन समाजवादी पार्टी से निकटता बढ़ाने के संकेत दिये। कई उपचुनावों में बसपा ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारकर भाजपा को हरवा दिया। उसके बाद ये उम्मीद प्रबल हो गई कि 2019 के महासमर में मोदी विरोधी महागठबंधन आकार ले सकेगा और मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा के आगामी चुनावों में  भाजपा को हराने के लिए विपक्ष महागठबंधन बनाकर मैदान में उतरेगा। कांग्रेस ने बसपा और सपा के साथ चर्चा भी शुरू कर दी किन्तु मायावती ने एक बयान देकर उस मुहिम को फुस्स कर दिया। मप्र और राजस्थान में अकेले और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी से गठबंधन करते हुए उन्होंने कांग्रेस को जोरदार झटका दे दिया। उनकी देखा-देखी समाजवादी पार्टी ने भी काँग्रेस को खरी-खोटी सुनाते हुए अलग होकर चुनाव लडऩे की राह पकड़ ली। मायावती ने तो अपने प्रत्याशी घोषित करने भी शुरू कर दिए। उधर अखिलेश ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि जिन्हें काँग्रेस की टिकिट नहीं मिले तो सपा की टिकिट पर लड़ लें। इससे स्पष्ट हो गया कि भविष्य में भी महागठबंधन का होना अधर में है। गत दिवस मायावती ने भीख न मांगने जैसा बयान देकर कांग्रेस को फिर से चिढ़ाने का काम किया। कुल मिलाकर बसपा प्रमुख ने अपने स्वभाव और कार्यशैली में कोई परिवर्तन नहीं होने का प्रमाण देते हुए ये बता दिया कि उन्हें समझ पाना किसी के बस में नहीं है। मप्र काँग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ जैसा अनुभवी राजनेता तक मायावती की माया नहीं समझ सका। ये बात भी सही है कि अखिलेश यादव भी इन चुनावों में काँग्रेस से अलग लडऩे का साहस मायावती को देखकर ही जुटा सके।  ऐसा लगता है मायावती और अखिलेश दोनों ने राहुल गांधी के रास्ते में कांटे बिछाने का काम शुरू कर दिया है। उन्हें पता है कि इन तीन राज्यों में काँग्रेस से उपकृत होने की महंगी कीमत उन्हें उप्र में काँग्रेस को लोकसभा की ज्यादा सीटें देकर चुकानी पड़ेगी। ये बात तो राजनीति का न्यूनतम ज्ञान रखने वाला भी जानता समझता है कि बसपा और सपा की बैसाखी के बिना उप्र में सोनिया गाँधी और राहुल भी चुनाव नहीं जीत सकेंगे। यही सोचकर बुआ-भतीजे ने फिलहाल काँग्रेस से दूरी बनाये रखने की रणनीति अपनाने का निश्चय किया। इस प्रकार महागठबंधन का भविष्य एक बार अनिश्चितता में फंसकर रह गया है। हालाँकि उक्त तीन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद ही 2019 की रणभूमि नये सिरे से सजेगी लेकिन मायावती और अखिलेश यादव द्वारा दिए इन झटकों से ये तो स्पष्ट हो ही गया कि बसपा, सपा एवं दूसरे क्षेत्रीय दल भाजपा को हराने के लिए भले लालायित हों किन्तु काँग्रेस से भी उन्हें कोई लगाव नहीं है। दरअसल वे समझ गए हैं कि काँग्रेस के कमजोर रहने पर ही उनका अस्तित्व टिका हुआ है। मायावती और ममता बैनर्जी जैसों को तो ये लगने लगा है कि 25-30 सीटों के बल पर भी प्रधानमन्त्री बना जा सकता है लेकिन वह तभी सम्भव हो सकेगा जब राहुल गांधी को ताकतवर होने से रोका जाए। बहरहाल उप्र के कुछ उपचुनावों में विपक्षी एकता का अनौपचारिक परीक्षण सफल रहने के बाद ये उम्मीद थी कि मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में महागठबंधन का पूर्वाभ्यास हो जाएगा लेकिन पहले मायावती और फिर अखिलेश ने जो झटका दिया उससे विपक्षी एकता के गुब्बारे की हवा निकलती दिख रही है। इसके लिए काँग्रेस का अहंकार जिम्मेदार है या मायावती की चालाकी और अखिलेश यादव की अपरिपक्वता, ये तो अभी नहीं कहा जा सकता किन्तु इससे भारतीय राजनीति में बढ़ रही स्वार्थपरता एक बार फिर उजागर हो गई है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 9 October 2018

यौन उत्पीडऩ : फिल्मों से मीडिया तक

सूचना क्रांति का सबसे बड़ा परिणाम ये है कि अब कोई भी घटना या खबर कुछ लोगों या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं रह पाती। उसके कारण उसकी प्रतिक्रिया भी काफी व्यापक होती है। सोशल मीडिया के विस्तार ने तो खबरों के संसार को अकल्पनीय रूप से बड़ा कर दिया है। ताजा उदाहरण है फिल्म उद्योग की एक अभिनेत्री द्वारा नाना पाटेकर नामक अभिनेता पर यौन उत्पीडऩ के  आरोप से उत्पन्न विवाद। घटना पुरानी है तथा पहले भी उछल चुकी थी लेकिन जब अभिनेत्री नए सिरे से सामने आई तो बात राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो गई। फिल्म उद्योग भी बंटा - बंटा नजर आने लगा। कुछ लोग आरोप लगाने वाली अभिनेत्री से सहानुभूति व्यक्त करने आगे आए तो कुछ नाना के साथ खड़े हो गए। ये विवाद ठंडा पड़ता उसके पहले कुछ और अभिनेत्रियों ने कई अभिनेताओं, निर्देशकों और निर्माताओं पर उनके शोषण या दुव्र्यवहार का आरोप लगाकर पूरे फिल्म उद्योग में हलचल मचा दी। चूंकि ग्लैमर की दुनिया पेज थ्री संस्कृति से कई गुना आगे बढ़ी मानी जाती है। जिसमें यौन वर्जनाओं को लेकर परंपरागत भारतीय सोच को दकियानूसी समझा जाता है, इसलिए किसी अभिनेत्री के शोषण का उतना संज्ञान नहीं लिया जाता। लेकिन बीते कुछ समय से इस तरह की घटनाओं को सनसनी बनाकर सुर्खियों में आने का चलन भी चल पड़ा है। लेकिन इस बार बात फिल्म उद्योग से बाहर निकलकर अन्य क्षेत्रों तक पहुंच चुकी है। आए दिन कोई महिला किसी चर्चित हस्ती द्वारा अपना शोषण किये जाने या दुव्र्यवहार की शिकायतें लेकर सामने आ रही हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि महिलाओं के शोषण और उनके साथ आपत्तिजनक व्यवहार की शिकायतें अब समाचार माध्यमों तक पहुंच गई।  नामी-गिरामी पत्रकार रहे वर्तमान केंद्रीय मंत्री एम जे अकबर पर एक महिला पत्रकार ने जिस तरह के आरोप लगाए उनसे राजनीतिक क्षेत्रों में भी हलचल मच गई है। उसके बाद खबर आ गई कि एनडीटीवी में कार्यरत महिला पत्रकारों को भी उत्पीडऩ झेलना पड़ा जिसकी शिकायत उन्होंने चैनल प्रमुख डॉ. प्रणय रॉय एवं उस समय चैनल की चर्चित पत्रकार बरखा दत्त से की किन्तु उन्हें कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद अब और शिकायतें आ सकती हैं क्योंकि उत्पीडऩ की शिकार महिलाओं में साहस आया है। लेकिन इसका एक परिणाम ये हुआ कि सेलिब्रिटी की छवि पर सन्देह के बादल मंडराने लगे हैं। श्री अकबर केंद्रीय मंत्री हैं वहीं डॉ रॉय और बरखा दत्त भी मीडिया जगत की जानी मानी हस्ती हैं। ये सब देखकर लगता है कि आने वाले दिनों में यौन उत्पीडऩ के और पुराने मामले खुल सकते हैं। ये चलन कुछ हद तक तो स्वागतयोग्य है क्योंकि इससे अपने शोषण के विरुद्ध मुंह खोलने की हिम्मत बढ़ेगी वरना लोकलाज के भय से अधिकतर मामले तो दबे ही रह जाते हैं। लेकिन फिल्म उद्योग से बढ़ते बढ़ते बात का अभिजात्य वर्ग के मीडिया तक पहुंच जाने के बाद इस बात का खतरा भी बढ़ गया है कि जो चैनल अब तक दूसरों की टोपी उछालते हुए प्रसन्नता से फूला नहीं समाते थे वे अपने दामन पर छींटे पड़ते देख कहीं ठंडे न पड़ जाए। समाचार माध्यमों का स्वरूप व्यावसायिक होने के बाद पत्रकारिता और प्रबंधन दोनों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है। टीवी चैनलों ने योग्यता के साथ ग्लैमर को प्रोत्साहित किया जिसने मीडिया के प्रति युवतियों में रुझान और बढ़ाया लेकिन इससे कुछ विकृतियां भी सहज रूप से उत्पन्न हुईं जिनमें रातों-रात कामयाबी हासिल करने की महत्वाकांक्षा भी एक प्रमुख कारण बन गया। महिलाओं का यौन उत्पीडऩ करने वाले पुरुष मानसिक रोगी होते हैं लेकिन ये भी सही है कि हर प्रकरण में उन्हें ही कसूरवार नहीं ठहराया जाना चाहिए। बीते कुछ  समय से बरसों पुराने मामले उछालकर सहानुभूति बटोरने के भी प्रकरण देखने मिल रहे हैं। फिल्म उद्योग, मॉडलिंग, राजनीति, कारपोरेट जगत से होते-होते बात अब मीडिया तक आ जाने के बाद चिंता और चिंतन दोनों की जरूरत महसूस होने लगी है क्योंकि समाज को दिशा देने वाले जिम्मेदार वर्ग में भी यदि गंदगी आ गई तब फिर दूसरों को रोकने-टोकने वाला ही नहीं बचेगा। अधकचरी आधुनिकता के फेर में पड़कर अपनी संस्कृति और परम्पराओं को पिछड़ेपन की निशानी मानने का दुष्परिणाम सामने आने लगा है। जिस तरह से महिलाएं खुलासा कर रही हैं उस पर गम्भीरता से विचार कर सार्थक कदम उठाने के लिए समाज को आगे आना होगा क्योंकि ये काम सरकार का नहीं है और लगे हाथ मीडिया में बैठे उपदेशकों को भी अपनी बिरादरी में चल रहे क्रियाकलापों का भी पर्दाफाश करने का साहस दिखाना चाहिए।

Monday, 8 October 2018

गुजरात : इसके पहले कि आग और भड़के ....

चुनावी चर्चा के बीच गुजरात से आ रही खबरें चिंताजनक हैं।  मासूम बच्ची से दुष्कर्म के आरोप में एक बिहारी कामगार के पकड़े जाने के बाद अचानक उत्तर भारतीयों के विरुद्ध वैसा ही हिंसात्मक आंदोलन शुरू हो गया जैसा महाराष्ट्र में शिवसेना और मनसे समय-समय पर करती रही हैं। भयभीत उत्तर भारतीय परिवार गुजरात छोड़कर अपने गांव-देस लौट रहे हैं। यदि सोशल मीडिया और टीवी पर प्रसारित खबरें सही हैं तो कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर के संगठन ठाकोर सेना के सदस्य उत्तर भारतीय प्रवासियों पर हमले करने में आगे-आगे हो रहे हैं। यद्यपि अल्पेश ने इसका खंडन करते हुए सद्भाव यात्रा निकालने का ऐलान भी कर दिया किन्तु किसी एक व्यक्ति द्वारा किये गये घृणित कृत्य के लिए उसके समूचे समुदाय के विरुद्ध हिंसात्मक हो जाना देश के संघात्मक स्वरूप के लिए घातक है। कांग्रेस पार्टी को चाहिए कि वह तत्काल इस मामले का संज्ञान लेते हुए गुजरात में स्थितियां सामान्य करने सक्रिय हो वरना नवरात्रि महापर्व के अवसर पर आयोजित होने वाले गरबा के आयोजनों की भव्यता पर इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। उल्लेखनीय है गरबा गुजरात की सांस्कृतिक पहिचान है जिसकी लोकप्रियता न सिर्फ भारत वरन पूरी दुनिया में अप्रवासी भारतीयों के जरिये फैल चुकी है। इस दौरान गुजरात में पर्यटकों का आगमन भी खूब होता है। दीपावली के पूर्व अन्य राज्यों से व्यापारी भी यहां खरीदी हेतु आते हैं। इन सभी कारणों से उत्तर भारतीयों के विरुद्ध शत्रुवत व्यवहार की घटनाएं गुजरात जैसे शांत और व्यवसायिक मानसिकता वाले राज्य के भविष्य पर विपरीत असर डाल सकती हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि गुजरात में उद्योग व्यापार की जबरदस्त तरक्की ने वहां बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर उत्पन्न किये जिसकी वजह से मप्र, उप्र और बिहार से बड़ी संख्या में श्रमिक एवं अन्य लोग वहां आकर काम करने लगे। ये संख्या जरूरत के मुताबिक बढ़ती चली गई। कहा जाता है कि गुजरात में अभी भी बड़ी संख्या में कामगारों की आवश्यकता है। आज तक कभी भी गुजरात में क्षेत्रीयता की भावना इस तरह सामने नहीं आई थी। लेकिन दुष्कर्म की एक घटना को बहाना बनाकर जिस तरह की आक्रामक वारदातें शुरू हुईं उससे उत्तर भारतीय समुदाय में भय व्याप्त हो गया। हजारों लोग परिवार सहित गुजरात छोड़ते नजर आ रहे हैं। यद्यपि हिंसा साबरकांठा के हिम्मतनगर से शुरू हुई किन्तु उसका अहमदाबाद सहित आधा दर्जन से ज्यादा जिलों में फैल जाना इस बात का संकेत है कि उसके पीछे कोई संगठित सोच काम कर रही है। इसका प्रमाण इस बात से मिला कि ठाकोर सेना ने लगे हाथ 85 फीसदी रोजगार स्थानीय लोगों को दिए जाने की मांग भी उछाल दी। हालांकि राज्य की पुलिस उपद्रवकारियों को पकड़ रही है लेकिन जैसा समझ आ रहा है उसके अनुसार तो महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव सरीखा कोई योजनाबद्ध षडयंत्र इस हिंसा के पीछे हो सकता है अन्यथा स्थानीय लोगों को रोजगार देने का मुद्दा दुष्कर्म की घटना से नहीं जोड़ा जाता।  भीमा कोरेगांव में गुजरात के एक अन्य युवा नेता जिग्नेश मेवाणी की भूमिका भी सामने आई थी। हार्दिक पटेल के आंदोलन से भी गुजरात अशान्त होता रहा है।  हिंसात्मक पाटीदार आंदोलन के दौरान भी अरबों-खरबों का नुकसान हुआ था। ताजा घटनाओं के संदर्भ में गुजरात के विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट होकर हिंसा रोकने आगे आना चाहिए वरना इससे गुजरात के दूरगामी हित प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे। गुजरात का मूल स्वभाव व्यवसायिक है। वहाँ के लोग पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। गुजरात से सटे महाराष्ट्र विशेष रूप से मुंबई में व्यापार के क्षेत्र में गुजराती समुदाय की मौजूदगी अत्यंत प्रभावशाली है। ऐसे में गुजरात की घटनाओं का प्रतिक्रियात्मक असर दूसरे राज्यों में होने लगा तो इससे वहां रह रहे गुजरातियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। त्यौहारी सीजन में खरीदी करने गुजरात जाने वाले व्यापारी भी डर के मारे दूसरी जगहों को चुन सकते हैं। उससे भी बड़ी बात ये है कि उत्तर भारतीय समुदाय यदि गुजरात से पलायन कर गया तो वहाँ के कल कारखानों में कामगारों की कमी होने से उत्पादन प्रभावित होगा। सबसे चिंताजनक बात है गुजरात की उस छवि की जो उद्योग व्यापार के लिहाज से आवश्यक समन्वय और सामंजस्य से ओतप्रोत है। ताजा हिंसात्मक घटनाओं के मूल में चाहे कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर हों या कोई और लेकिन उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि बिना किसी ऐतराज के उप्र के बनारस शहर ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सिर-आंखों पर बिठाकर अपना लोकसभा सांसद चुना। यही नहीं उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में उप्र और बिहार की निर्णायक भूमिका रही थी। जिस व्यक्ति ने एक नन्हीं बालिका के साथ अमानुषिक कृत्य किया वह तो मृत्युदंड से कम का पात्र नहीं है लेकिन उसकी घिनौनी करतूत के लिए गुजरात की औद्योगिक प्रगति में योगदान दे रहे उत्तर भारतीयों को निशाने पर लेना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। बेहतर हो गुजरात के सभी राजनीतिक दल इस बारे में तत्काल मिल बैठकर सद्भाव कायम करने मैदान में उतरें वरना हिंसा और विद्वेष की आग गुजरात की आर्थिक सेहत के साथ ही उसके बाहर रहने वाले गुजरातियों के लिए जी का जंजाल बने बिना नहीं रहेगी। मुंबई में दत्ता सामंत नामक श्रमिक नेता द्वारा कई दशक पूर्व कपड़ा मिलों में करवाई गई लंबी हड़ताल के दुष्परिणाम स्वरूप वहाँ का कपड़ा उद्योग धीरे-धीरे गुजरात के निकटवर्ती सूरत शहर में स्थानांतरित हो गया। इसी तरह ठाकोर सेना का पागलपन नहीं रुका तो गुजरात और गुजरातियों को भी अकल्पनीय नुकसान उठाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। वैसे गुजरात के अधिकतर लोग बेहद सुलझे हुए होते हैं जिनकी रुचि कारोबार के विस्तार में ज्यादा होती है। इस आधार पर ये उम्मीद करना गलत नहीं होगा कि गुजरात अपने शांत स्वभाव का परिचय एक बार फिर देते हुए इस संकट से निकल आएगा। लेकिन राजनीतिक दलों को भी उदासीनता छोडऩा होगी क्योंकि इस तरह की घटनाओं में कहीं न कहीं सियासत की भूमिका होती ही है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 6 October 2018

पुतिन की यात्रा : तीर एक निशाने अनेक

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की दिल्ली यात्रा के दौरान लगभग 40 हजार करोड़ की रक्षा प्रणाली खरीदने का जो सौदा हुआ उससे हमारी सुरक्षा व्यवस्था तो सुदृढ़ हुई ही किन्तु ऐसे वक्त में जब भारत द्वारा अमेरिका, इजऱायल और फ्रान्स से काफी बड़े रक्षा सौदे किये जाने से भारत का अत्यंत पुराना और भरोसेमंद मित्र रूस नाराज होकर चीन और पाकिस्तान से याराना बढ़ाने लगा था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री पुतिन को दिल्ली बुलाकर अपनी विशिष्ट शैली में जिस तरह गले लगाया उसे कूटनीतिक तौर पर भी बड़े दांव के रूप में भी देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है कुछ बरस पहले तक रूस से ही सबसे ज्यादा रक्षा सामग्री खरीदी जाती थी। सोवियत संघ के पतन के बाद अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में थोड़ा बदलाव आया जिससे भारत का झुकाव अमेरिका और उसके समर्थकों की तरफ  भी होने लगा। लेकिन मोदी सरकार ने रक्षा सौदों में राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए खुलापन अपनाया और अपनी शर्तों पर सौदे करने शुरू किए जिसकी वजह से दुनिया के बड़े देशों से भारत के कारोबारी रिश्ते मजबूत होने के साथ ही राजनयिक तौर पर भी भारत के प्रति विश्वशक्तियों का दृष्टिकोण बदला जिसका प्रमाण वैश्विक सम्मेलनों में श्री मोदी को मिलने वाले महत्व और सम्मान से जाहिर हुआ। हाल के वर्षों में अमेरिका और इजरायल के  साथ भारत की सामरिक निकटता ने रूस के मन में सन्देह पैदा किया और वह चीन तथा पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने में रुचि लेने लगा। इसे मोदी सरकार की विदेश नीति की विफलता के तौर पर देखा गया किन्तु पिछले दो दिनों में पुतिन - मोदी शिखर वार्ता और एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल का जो अहम सौदा हुआ वह पुराने दोस्ताना रिश्तों के नवीनीकरण के साथ ही अमेरिका को भी संकेत है जो ईरान से कच्चे तेल के मामले में भारत पर अनुचित दबाव बनाए हुए है। नरेंद्र मोदी का ये कदम एक तीर से कई निशाने साधने जैसा है। राफैल विवाद के बीच उन्होंने श्री पुतिन के साथ इतना बड़ा रक्षा सौदा कर विपक्षी दलों को भी ये एहसास करवा दिया कि वे उनके हमलों से विचलित नहीं हैं। विश्व की सभी बड़ी ताकतों के साथ बराबरी के संबंध बनाकर प्रधानमन्त्री ने खुद को वैश्विक स्तर पर जिस  तरह स्थापित किया वह निश्चित तौर पर बड़ी बात है जिसे राजनीति से ऊपर उठकर स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि आखिरकार इससे देश का सम्मान बढ़ा है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

अर्थव्यवस्था पर अनिश्चितता का साया

अर्थशास्त्र का संबंध यूँ तो सीधे आम आदमी से होता है लेकिन रोचक बात ये है कि वह आम आदमी के पल्ले नहीं पड़ता। उसके सिद्धांत और व्यवहारिक पक्ष के बीच सदैव द्वंदात्मक स्थिति बनी रहती है। भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों जिस दौर से गुजर रही है उसे देखते हुए कोई ये बताने की स्थिति में नहीं है कि आने वाले समय में  उसकी दशा और दिशा क्या होगी? गत दिवस रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें स्थिर रखने का फैसला किया है। रुपये की विनिमय दर डॉलर के मुकाबले गिरते हुए 74 रु. तक जा पहुँची। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के उछलते दामों ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर जबरदस्त दबाव बढ़ा दिया है। बीते कुछ माह से कुलांचे भर रहा शेयर बाजार बीते कुछ दिनों से औंधे मुंह गिरता जा रहा है। बावजूद इसके रिजर्व बैंक को उम्मीद है कि इस वित्तीय वर्ष में विकास दर 7 फीसदी से ऊपर ही रहेगी। दूसरी तरफ  वित्त मंत्री अरुण जेटली भी चिंता की कोई बात नहीं की रट लगाए हुए हैं। जनता के गुस्से से बचने के लिए केंद्र सरकार ने परसों ज्योंही पेट्रोल-डीजल सस्ता किया और एनडीए शासित राज्यों से भी करवाया त्योंही पेट्रोलियम कम्पनियों के शेयर लुढ़कने लगे। इस तरह शेयर बाजार में निवेशकों के अरबों-खरबों रु. देखते-देखते डूब गए। अचानक ये हालात क्यों उत्पन्न हो गए ये किसी को समझ नहीं आ रहा। त्यौहारी सीजन सिर पर है लेकिन कुछ सेक्टर छोड़कर मांग वैसी नहीं जिससे बाजार गुलज़ार हो सकें। रिजर्व बैंक नगदी की समस्या दूर करने में भी जुटा हुआ है। थोक महंगाई भी नियंत्रण में बताई जा रही है। फिर भी अच्छे-अच्छे विशेषज्ञ ये नहीं बता पा रहे कि आखिर ऐसा क्या हो गया जिससे बुलेट ट्रेन की गति से भाग रही अर्थव्यवस्था अचानक पैसेंजर की तरह छुक-छुक करने मजबूर हो गई। आने वाले दिन कैसे रहेंगे इसका अनुमान और अंदाज बड़े-बड़े तुर्रम खाँ भी नहीं लगा पा रहे। पिछले कुछ महीनों तक शेयर बाजार का सूचकांक किस वजह से बढ़ता गया और विदेशी निवेशकों का भारत की अर्थव्यव्यस्था में भरोसा किस आधार पर सुदृढ़ हुआ ये भी रहस्यमय है। डॉलर के मुक़ाबले रुपये का लगातार नीचे जाना कच्चे तेल के दाम बढऩे का परिणाम बताया जा रहा है क्योंकि इससे डॉलर की मांग बढ़ी और वह महंगा होने लगा किन्तु लाख टके का प्रश्न ये है कि इन परिस्थितियों का पूर्वानुमान लगाकर आपातकालीन व्यवस्था क्यों नहीं की गई? भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लबालब होने के कारण अर्थव्यव्यस्था में जिस आत्मविश्वास का संचार हुआ था वह एकाएक खतरे में पड़ता नजर आने लगा। हालांकि इसके लिए अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा ईरान पर लगाए प्रतिबंध मुख्य वजह हैं जिसके कारण भारत को मिलने वाले सस्ते कच्चे तेल की आपूर्ति में अवरोध आ जायेगा। लेकिन ये भी सच है कि  अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां हमेशा एक समान नहीं रह सकतीं। इस आधार पर अपेक्षित था कि समय रहते जरूरी उपाय किये जाते। रुपये की गिरावट को रोकने के प्रति भी अपेक्षित प्रयास न सरकार की तरफ  से दिखाई दिए और न ही रिजर्व बैंक ने ऐसा कुछ किया जिससे उसकी गंभीरता प्रगट होती। और यदि कुछ किया भी गया तो उसका प्रभाव नहीं दिखा। पेट्रोलियम वस्तुएँ महंगी होती गईं और रुपया गिरता गया लेकिन केंद्र सरकार ने उसे जिस सरलता से लिया उसकी वजह से  अच्छी भली चलती अर्थव्यवस्था अचानक लडख़ड़ाने के स्थिति में आ गई। इसके बाद भी यदि विकास दर 7 फीसदी से ऊपर रहने का अनुमान रिज़र्व बैंक में बैठे विशेषज्ञ लगा रहे हैं और कतिपय विदेशी रेटिंग एजेंसियां उसकी पुष्टि कर रही हैं तब ये बड़ा ही पेचीदा सवाल है कि जब सब कुछ प्रतिकूल है  तब अनुकूलता की उम्मीद का आधार क्या है? शुरू में ही कहा गया है कि अर्थशास्त्र जिस आम आदमी पर सीधा असर डालता है वही उसके तकनीकी और व्यवहारिक पक्ष से अनजान बना रहता है। और इसीलिए जो तथाकथित जानकार कह देते हैं उसे मानने के सिवाय कोई चारा नहीं रहता। लेकिन थोड़ा सा भी सामान्य ज्ञान रखने वाला ये बता सकता है कि अर्थव्यस्था पर अनिश्चितता का जो साया है उसे अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता क्योंकि किसी स्वस्थ मनुष्य के अचानक अस्वस्थ होने से जिस तरह की चिंता होती है ठीक वैसी ही भारतीय अर्थव्यस्था को लेकर इस समय पैदा हो गई है।

-रवीन्द्र वाजपेयी