Monday, 5 November 2018

राम मंदिर : अभी नहीं तो ...........


अयोध्या में राममंदिर के निर्माण को लेकर साधु - संतों में बढ़ रहे गुस्से से राजनीतिक उथलपुथल तेज हो गई है । उप्र के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सहित केंद्र सरकार के कतिपय मंत्री भी मंदिर निर्माण के लिये तत्काल कदम उठाने की मांग कर रहे हैं । भाजपा के प्रतिबद्ध मतदाताओं के अलावा हिन्दू समाज में इस बात को लेकर बेचैनी बढ़ रही है कि जिस सम्वेदनशील मुद्दे पर पूरे देश की राजनीति बीते तीन दशक से प्रभावित होती आ रही है उसको लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हो पा रहा । मंदिर और मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद का हल जब राजनेता और दोनों पक्षों के धर्मगुरु नहीं कर सके तब चाहे - अनचाहे सभी पक्ष तनातनी छोड़कर इस बात पर राजी हो गये कि सर्वोच्च न्यायालय जो भी फैसला करेगा वह उन्हें स्वीकार होगा । यहां तक कि रास्वसंघ और विश्व हिन्दू परिषद जो आस्था के सवाल को न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते थे , वे भी अदालत के निर्णय को शिरोधार्य करने जैसी बातें कहने लगे । बीच में ऐसा कुछ लगा भी कि सर्वोच्च न्यायालय इस बहुप्रतीक्षित विवाद का हल निकाल देगा लेकिन अड़ंगेबाज भी पीछे नहीं रहे और उस कारण एक कदम आगे दो कदम पीछे वाली स्थिति बनी रही । मुस्लिम समुदाय की तरफ  से वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने तो खुलकर अदालत में ये दलील रखी कि अयोध्या मसले पर सुनवाई 2019 में लोकसभा चुनाव के बाद शुरू की जाए । इसे लेकर कांग्रेस को जबरदस्त आलोचना भी झेलना पड़ी जिसके बाद पार्टी ने उन्हें मुस्लिम समाज की तरफ से पैरवी करने से रोक दिया । लेकिन इतना अवश्य हुआ कि श्री दीपक मिश्रा के मुख्य न्यायाधीश रहते अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतिम फैसला किये जाने की तमाम उम्मीदें हवा-हवाई होकर रह गईं । बची-खुची संभावनाएं तब और नष्ट हो गईं जब गत 28 अक्टूबर से नियमित सुनवाई को नए मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई ने जनवरी तक टालते हुए कह दिया कि नई पीठ ही सुनवाई संबंधी फैसला करेगी और इस तरह ये विवाद एक बार फिर अदालती अनिश्चितता की भंवर में फँसकर रह गया । श्री गोगोई से जब अटॉर्नी जनरल ने मुद्दे की प्राथमिकता का तर्क दिया तब श्री गोगोई ने पलटकर कह दिया कि उनकी प्राथमिकताएं अलग हैं । इससे पूरे देश को ये संकेत मिल गया कि नए मुख्य न्यायाधीश अयोध्या मसले को लेकर उतने गम्भीर नहीं हैं जितना देश अपेक्षा कर रहा था । वरना वे नियमित सुनवाई शुरु करवाने के साथ ही ये निर्देश भी देते कि फलाँ समय तक इसका निपटारा कर दिया जाए । ज्योंही ये स्पष्ट हो गया कि इस मुद्दे पर न्यायालय का फैसला जल्द आने की कोई उम्मीद नहीं है त्योंही रास्वसंघ सहित अन्य हिन्दू संगठन और फिर साधु - संत केंद्र सरकार पर इस बात का दबाव बनाने में जुट गए कि वह अयोध्या में राम मंदिर बनाने के बारे में अध्यादेश जारी करे । कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय से मामला अलग करने की मांग भी जोर पकडऩे लगी । कई संतों ने तो आगामी  6 दिसंबर से निर्माण शुरू करने जैसी बात करना तक शुरू कर दिया । भाजपा भी इसे लेकर जबर्दस्त दबाव में है । उप्र और केंद्र में पूर्ण  बहुमत वाली सरकार होने के बाद भी राम मंदिर नहीं बना पाने के कारण वह न सिर्फ विरोधियों वरन अपने परंपरागत समर्थकों के निशाने पर भी आने लगी । जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उनमें भले ही राम मंदिर मुद्दा न हो लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को इस बात का जवाब देना ही होगा कि जिस मुद्दे ने भाजपा को अकल्पनीय सफलता दिलवाई उसे लेकर वह अपना वायदा क्यों नहीं निभा सके ? साधु - संतों का मोह भी इसी वजह से भाजपा से भंग होता दिख रहा है । उनका दो टूक कहना है कि न्यायालय के फैसले तक ही रुकना है तब भाजपा को समर्थन देने का क्या औचित्य है ? व्यवहारिक तौर पर देखें तो उनकी बात गलत नहीं है । सौगंध राम की खाते हैं , मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा भाजपा के गले पड़ गया है । उस दृष्टि से यदि अध्यादेश लाकर कानून के जरिये मंदिर निर्माण का रास्ता साफ  करने के लिए केंद्र सरकार पर चौतरफा दबाव बन रहा है तो उसे किसी भी  दृष्टि से गलत नहीं कहा जा सकता । जहां तक बात उन विपक्षी दलों की है जो मंदिर मुद्दे पर भाजपा का विरोध करते आये हैं तो वे भी कम दोषी नहीं हैं  क्योंकि वे सदैव भाजपा को ये कहकर उकसाते हैं कि वह केवल चुनाव के वक्त मंदिर का शिगूफा छोड़कर हिन्दू भावनाओं को भुनाती है । ये सब देखते हुए भाजपा और प्रधानमंत्री के पास अपना मुंह छिपाने के लिए कोई दूसरा रास्ता बच नहीं रहता । हो सकता है अध्यादेश और कानून को लोकसभा चुनाव के पहले संसद की स्वीकृति न मिल पाए लेकिन उस स्थिति में कांग्रेस या जो भी उसका विरोध करेगा उस पर हिन्दू विरोधी होने की तोहमत लग जाएगी । वहीं राहुल गांधी का सौम्य हिंदुत्व वाला अवतार भी नकली साबित हो जाएगा । सर्वोच्च न्यायालय भी रोड़े अटका दे तो आश्चर्य नहीं होगा लेकिन भाजपा यदि इस बारे में ईमानदार है तब उसे खुलकर सामने आना होगा ।  उप्र के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ दो दिन अयोध्या में दीपोत्सव मनाएंगे । इस अवसर पर कोई बड़ी घोषणा भी प्रतीक्षित है । वहीं दूसरी तरफ  मंदिर आंदोलन के बड़े नेता रामविलास वेदांती ने अयोध्या में मंदिर और लखनऊ में भव्य मस्जि़द बनाने जैसी बात कहकर किसी समझौते का संकेत भी दे दिया है । यद्यपि इस बारे में मुस्लिम समुदाय का मत सामने नहीं आया है । सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश श्री चेलमेश्वर ने भी कहा है कि सरकार कानून बनाकर मंदिर मसले पर चल रही न्यायालयीन प्रक्रिया को पूर्ण विराम दे सकती है । उन्होंने अतीत के कुछ उदाहरण भी दिए । बहरहाल भाजपा और श्री मोदी के समक्ष धर्मसंकट की स्थिति है जिसमें उन्हें कोई न कोई साहसिक निर्णय तो लेना पड़ेगा । भले ही लोग इसे लेकर कुछ भी कहें लेकिन इस ऐतिहासिक विवाद को हल करने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा । चुनाव से हटकर भी देखें तो देश के बहुसंख्यक समाज के मन में इसे लेकर जो नाराजगी है उसे दूर नहीं किया गया तो 6 दिसम्बर 1992 जैसा ही कुछ होने के अंदेशे से इंकार नहीं किया जा सकता । संघ परिवार भी इतना आगे बढ़ चुका है कि अब उसके लिए भी पीछे लौटना सम्भव नहीं होगा । लालकृष्ण आडवाणी की ऐतिहासिक रथयात्रा के रणनीतिकार नरेंद्र मोदी ही थे । यदि वे तत्काल मंदिर निर्माण की शुरुवात सम्बन्धी निर्णय नहीं करवाते तब महानायक की उनकी छवि खलनायक में बदल जाएगी । विपक्षी दल भी इस मुद्दे पर इधर कुआ उधर ,  खाई वाली स्थिति में फंसे हुए हैं । मंदिर को लेकर अभी नहीं तो कभी नहीं के इस अवसर को चूकना बहुत बड़ी राजनीतिक भूल होगी जिससे राष्ट्र के दूरगामी हित भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे । जो हिन्दू हित की बात करेगा वही देश पर राज करेगा का नारा तो अब राहुल गांधी की भी समझ में आ गया है । फिर भाजपा को कैसा संकोच ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 3 November 2018

सबूत हैं तो सर्वोच्च न्यायालय जाएं राहुल

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों आक्रमण ही सर्वोत्तम सुरक्षा के सिद्धांत का पालन करते हुए नित्यप्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने रॉफेल लड़ाकू विमान का सहारा ले रखा है जिसके सौदे में भ्रष्टाचार को लेकर वे ये साबित करने में जुटे हुए हैं कि इसमें प्रधानमंत्री ने स्वयं रुचि लेकर रॉफेल बनाने वाली कंपनी और अनिल अंबानी की कंपनी के बीच व्यवसायिक करार सम्पन्न करवाया और इसमें 30 हजार करोड़ का भ्रष्टाचार हुआ। सरकारी क्षेत्र की कम्पनी एचएएल को दरकिनार रख विमान निर्माण में अनुभवहीन और आर्थिक दृष्टि से बुरी तरह टूट चुके अनिल अंबानी को रॉफेल के निर्माण में हिस्सेदारी दिलवाने को भ्रष्टाचार बताते हुए श्री गांधी ने गत दिवस कह दिया कि श्री मोदी और श्री अंबानी के बीच पार्टनरशिप है। उन्होंने रॉफेल की कीमत गुप्त रखने के सवाल पर पर कहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने स्वीकार किया है कि सौदे के दस्तावेज में कीमतों को गोपनीय रखे जाने की कोई शर्त नहीं थी। कांग्रेस शुरू से कहती आ रही है कि उसकी सरकार ने जो कीमत तय की थी उससे कई गुना ज्यादा पर सौदा कर प्रधानमंत्री ने बड़ा भ्रष्टाचार किया है जिसकी जांच होने पर उनका जेल जाना सुनिश्चित है। इस संदर्भ में वे श्री मोदी के लिए चोर शब्द का भी प्रयोग कर चुके हैं। बहरहाल गत दिवस उन्होंने नया मामला उठाते हुए आरोप लगाया कि रॉफेल बनाने वाली कंपनी ने अनिल अंबानी को हिस्सेदार बनाते समय तर्क  दिया था कि उनके पास पर्याप्त भूमि है लेकिन अब पता चला कि भूमि खऱीदने हेतु उन्हें 280 करोड़ से भी ज्यादा की राशि रॉफेल निर्माता कंपनी ने ही दी थी। श्री गांधी ने सवाल उठाया कि दिवालियेपन के कगार पर खड़ी कंपनी में भला रॉफेल निर्माता इतने बड़ी रकम का निवेश क्यों करेगी? बकौल श्री गांधी ये राशि एक तरह की घूस थी। अनिल अंबानी की जेब में 30 हजार करोड़ डाल देने का आरोप तो वे शुरू से ही लगाते आए हैं। कांग्रेसाध्यक्ष ने गत दिवस पत्रकारों के समक्ष  ये कटाक्ष भी किया कि इन दिनों प्रधानमंत्री को नींद नहीं आती है। एक विपक्षी नेता होने के नाते श्री गांधी जो भी कर या कह रहे हैं वह जरा भी अनपेक्षित नहीं है लेकिन रोजाना वही बात दोहराते रहने से फिर उसकी गंभीरता में ह्रास होने लगता है। एक झूठ के हजार बार दोहराए जाने से उसके सच हो जाने की बात सूचना क्रांति के इस युग में अप्रासंगिक हो चली है क्योंकि सार्वजनिक विमर्श का विषय बनने वाली किसी भी बात का तथ्यात्मक विश्लेषण लोग अपने स्तर पर करने लग जाते हैं। भौगोलिक दूरी भी इस बारे में बाधा नहीं बन पाती। यही वजह है कि रॉफेल को लेकर जो भारत में कहा जा रहा है उसका संज्ञान तत्काल फ्रांस में लिया जाता है। इसी तरह जो कुछ वहां कहा जाता है उसकी जानकारी भी अविलंब भारत आ जाती है। गत दिवस श्री गांधी ने रॉफेल के सीईओ पर भी असत्य बयान देने आरोप लगाते हुए कह दिया कि वे श्री मोदी का बचाव कर रहे हैं। और भी बहुत कुछ कांग्रेसाध्यक्ष ने कहते हुए उपस्थित संवाददाताओं को ये उलाहना भी दिया कि आप ये सब प्रकाशित या प्रसारित नहीं करोगे। हालांकि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी द्वारा लगाए आरोप को समाचार माध्यमों ने गम्भीरता से लेते हुए उसे पर्याप्त महत्व दिया लेकिन उनके तमाम आरोप यदि तथ्यों पर आधारित हैं तब उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन याचिका में हस्तक्षेपकर्ता बनकर श्री मोदी को घेरना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते तो फिर ये सभी आरोप और इनको लेकर की जा रही बयानबाजी राजनीतिक दांव मानकर किनारे कर दी जाएगी। नेशनल हेराल्ड मामले में सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने अदालती प्रकरण दर्ज करवाकर न सिर्फ राहुल बल्कि उनकी माताजी सोनिया गांधी और वरिष्ट कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा को भी घेर रखा है और उन्हें अदालत जाकर जमानत करवाना पड़ी। डॉ. स्वामी ने इस मामले में बयानबाजी तो खूब की किन्तु वे अपनी लड़ाई को दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर न्यायालय में ले गए। राहुल गांधी से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वे केवल आरोप लगाते हुए राजनीतिक स्टंटबाजी न करें अपितु उचित माध्यम का सहारा लेते हुए अपनी बातों की पुष्टि भी करें। प्रधानमंत्री को चोर कहना आम तौर पर पसंद नहीं किया गया। श्री गांधी लगातार उस बात को दोहराते जा रहे हैं। इसलिए उन्हें उसे साबित भी करना चाहिए वरना कुछ दिनों बाद लोग इस ओर ध्यान देना बंद कर देंगे। 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा और प्रधानमंत्री को घेरने की उनकी सोच गलत नहीं है लेकिन गम्भीर आरोपों के साथ यदि पर्याप्त तथ्य न दिये जाएं तो व्यक्ति की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। श्री गांधी रोजाना प्रधानमंत्री पर तंज कसते हैं कि यदि उनके आरोप गलत हैं तो श्री मोदी उनका प्रतिवाद क्यों नहीं करते। दरअसल कांग्रेसाध्यक्ष खुद को प्रधानमंत्री के समकक्ष स्थापित करना चाह रहे हैं किंतु लगभग डेढ़ दशक से ऐसे ही हमलों को झेलते आ रहे श्री मोदी कहीं अधिक बड़े और अनुभवी खिलाड़ी हैं। इसलिए वे उपयुक्त अवसर की तलाश में होंगे। उनकी रणनीति राहुल की सारे तीर चलने देने तक रुकने की भी हो सकती है। वैसे भी रॉफेल के मसले को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाने वाले राहुल से ज्यादा होशियार निकले। हो सकता है प्रधानमंत्री भी न्यायालयीन प्रक्रिया के नतीजे की प्रतीक्षा कर रहे हों। यदि सर्वोच्च न्यायालय ने विचाराधीन याचिकाओं में उठाये मुद्दों पर सरकार को राहत दे दी तब राहुल की सारी पैंतरेबाजी निरर्थक होकर रह जायेगी। इसलिए जो प्रमाण वे सार्वजनिक सभाओं और पत्रकारों के समक्ष रख रहे हैं यदि वे उनकी प्रामाणिकता को लेकर आश्वस्त हैं तो उन्हें अविलंब सर्वोच्च न्यायालय चले जाना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते तब उनके बयान एक आम राजनीतिक आरोप तक सिमटकर रह जाएंगे। यूँ भी राज्यों के विधानसभा चुनाव में स्थानीय मसले ज्यादा प्रासंगिक होते हैं और रही बात लोकसभा चुनाव हेतु माहौल बनाने की तो उसमें अभी देर है। क्या पता तब तक देश की राजनीति में कौन सा बड़ा मोड़ आ जाए?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 2 November 2018

दक्षिण से नए समीकरण की शुरुवात

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू के राजनीतिक चातुर्य से कोई इंकार नहीं कर सकता। उनकी सियासत उसूलों की बजाय लेनदेन पर आधारित रहती है। संबंधों और भावनाओं को वे तनिक भी महत्व नहीं देते। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तब मिल गया था जब उन्होंने अपने ससुर एनटीआर (एनटी रामाराव) के विरुद्ध बगावत करते हुए सत्ता हथिया ली थी। दरअसल उस समय एनटीआर के पूरे परिवार में उनकी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को लेकर जबरदस्त असंतोष था जिन्हें उन्होंने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने की कोशिश की। उसके बाद तेलुगु देशम पार्टी धीरे-धीरे श्री नायडू के कब्जे में आ गई। एनटीआर के अवसान के उपरांत लक्ष्मी पार्वती भी विस्मृतियों के धुंधलके में गुम होती चली गईं और चंद्राबाबू अविभाजित आंध्रप्रदेश की राजनीति में गैर कांग्रेसी विपक्ष के प्रतीक बन बैठे। सत्ता में आने के बाद उन्होंने हैदराबाद को सायबर सिटी बनाने का जो कारनामा किया उसकी वजह से उनकी गिनती देश के उन राजनेताओं में होने लगी जिनमें भविष्य की जरूरतों के मुताबिक सत्ता का उपयोग विकास के लिए करने की प्रवृत्ति और क्षमता है। बाबू नाम से लोकप्रिय श्री नायडू आंध्र के विभाजन के विरुद्ध थे किन्तु उसे रोक नहीं सके और मनमोहन सरकार ने भारी खूनखराबे , हिंसा और जनधन की हानि के बाद तेलंगाना बनाकर आंध्र के दो टुकड़े कर दिए जिससे इस दक्षिणी राज्य की राजनीतिक वजनदारी कम हो गई। यद्यपि उससे कांग्रेस को कोई लाभ नहीं हुआ। 2014 के लोकसभा चुनाव के संग दोनों राज्यों के भी चुनाव हुए। तेलंगाना में टीआरएस और आंध्र में तेलुगु देशम ने सत्ता प्राप्त कर ली। उस समय चंद्रबाबू ने नरेंद्र मोदी की लहर का लाभ उठाने के लिए भाजपा से नाता जोड़ लिया जिसके साथ वे वाजपेयी सरकार के दौर में भी रह चुके थे। भाजपा ने आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा और नई राजधानी अमरावती बनाने के लिए पर्याप्त धन देने का आश्वासन दिया था। लोकसभा चुनाव में तेलुगू देशम के साथ रहने का लाभ भाजपा को भी मिला। मोदी सरकार बनने पर तेलुगू देशम के मंत्री भी बने किन्तु विशेष राज्य के दर्जे और राजधानी के लिए विशेष आर्थिक सहायता के मुद्दे पर वायदाखिलाफी को लेकर चंद्रबाबू ने एनडीए से नाता तोड़ते हुए सरकार से भी मंत्री हटा लिए। यहां तक कि वह केंद्र सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव भी ले आई। उधर भाजपा भी श्री नायडू की दबाव राजनीति से त्रस्त हो चुकी थी। इसलिए उसने भी तेलुगू देशम के नखरे उठाने की बजाय उससे दूर होना ही सही समझा। इसकी एक वजह ये भी थी कि भाजपा को ये लग गया कि चंद्रबाबू के साथ रहते हुए वह आंध्र में अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना सकेगी। एनडीए से अलगाव के बाद से श्री नायडू भाजपा और कांग्रेस से अलग तीसरे मोर्चे को पुनर्जीवित करने में जुटे लेकिन ममता बैनर्जी , मायावती सहित अन्य नेताओं के अडिय़ल और अस्थिर रवैये के कारण वे सफल नहीं हो सके। इधर भाजपा ने जगन मोहन रेड्डी के साथ नजदीकी बढ़ाना शुरू कर दिया। तेलंगाना में विधानसभा चुनाव समय से पूर्व होने के कारण श्री नायडू को लगा कि चुनाव बाद टीआरएस राष्ट्रीय राजनीति में कहीं बेहतर भूमिका में न आ जाये क्योंकि के.चंद्रशेखर राव ने अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा से बहिर्गमन कर परोक्ष रूप से मोदी सरकार की मदद कर दी। हालांकि उन्होंने विधानसभा चुनाव में  भाजपा-कांग्रेस दोनों से दूरी बनाकर लोकसभा चुनाव हेतु विकल्प खुले रखे। चंद्रबाबू ने इस शून्यकाल को भरने हेतु नए सिरे से पहल की और अंतत: वे राहुल गांधी की शरण में जा पहुंचे और इस तरह तीसरे मोर्चे की संभावना को बड़ा धक्का लगा। तेलुगू देशम के साथ आने से कांग्रेस को निश्चित रूप से आंध्र में मजबूत बैसाखी मिल गई क्योंकि जगन मोहन और भाजपा के संभावित गठजोड़ के बाद उसकी हालत और खराब हो जाती। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये हुई कि श्री नायडू खुद होकर कांग्रेस अध्यक्ष के पास गए। लेकिन इस मुलाकात से तेलुगू देशम की गैर कांग्रेसी विपक्षी दल की छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है। कहां तो बाबू का नाम प्रधानमंत्री के लिए चलने लगा था और कहां वे कांग्रेस के सामने नतमस्तक हो गये। उन्होंने शरद पवार सहित कुछ और विपक्षी नेताओं से भी मुलाकात की किन्तु तेलुगू देशम का कांग्रेस से मिल जाना ये दर्शाता है कि एनडीए से अलग होने के निर्णय पर भाजपा ने उनके प्रति जो उपेक्षा भाव दिखाया उससे उन्हें जबर्दस्त धक्का लगा और उनकी मानसिक स्थिति भी शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे जैसी हो गई जो सोते जागते नरेंद्र मोदी को गरियाने में लगे रहते हैं। बहरहाल राहुल से मिलने के बाद श्री नायडू ने जो बयान दिया उसे उनका गुस्सा और खिसियाहट दोनों कहा जा सकता है। भाजपा से तो वे पहले भी जुड़कर अलग हो चुके थे किंतु कांग्रेस-तेलुगू देशम की नजदीकी दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त की कहावत का नवीनतम पुष्टिकरण है। चंद्राबाबू की राजनीति में आए इस चारित्रिक बदलाव से न सिर्फ  दक्षिण की राजनीति अपितु राष्ट्रीय राजनीति में भी बदलाव आ सकता है। भाजपा को इससे क्या नुकसान होगा ये अभी तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना अवश्य है कि श्री मोदी का विरोध राजनीतिक से ऊपर उठकर व्यक्तिगत अधिक होता जा रहा है। वैसे भाजपा के लिए भी चंद्राबाबू का कांग्रेस के साथ जुड़ाव विचारणीय है। अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के सहयोगी दलों में जिस तरह की दहशत है वह अच्छा संकेत नहीं है। नए दोस्त मिलने और नया प्रभावक्षेत्र विकसित होने के बाद भी पुराने दोस्तों की उपेक्षा अच्छी रणनीति नहीं कही जा सकती। बहरहाल जो भी हो चंद्राबाबू ने राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरणों की जमीन तैयार कर दी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 1 November 2018

सरदार पटेल की प्रतिमा भारत के फौलादी इरादों का ऐलान

गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर बनी सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति का गत दिवस उनके जन्मदिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकार्पण किया। ये विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है जिसे धातु से बनाया गया है। लगभग 3 हजार करोड़ की लागत से निर्मित यह प्रतिमा 180 किमी की गति से चलने वाली हवा के साथ ही भूकम्प के बड़े झटके भी झेल सकती है। श्री मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्हीं ने इसकी नींव रखी थी। देश भर से इसके लिए लोहा भी एकत्र किया गया था ताकि पूरे भारत को इस मूर्ति से भावनात्मक लगाव रहे। सरदार पटेल देश की एकता और सार्वभौमिकता के कालजयी प्रतीक माने जाते हैं। आज़ादी के बाद देशी रियासतों के भारतीय संघ में विलीनीकरण के दुष्कर कार्य को जिस दृढ़ता के साथ सरदार पटेल ने सम्पन्न करवाया वह उनकी विलक्षण नेतृत्व क्षमता का प्रमाण था जिसने उनके साथ जुड़े लौहपुरुष विशेषण को सार्थक साबित कर दिखाया। यद्यपि सरदार साहब ज्यादा लम्बे समय तक जीवित नहीं रहे वरना देश के समक्ष मौजूद तमाम समस्याओं का हल कभी का हो चुका होता। नरेंद्र मोदी ने जिस भी उद्देश्य से उनकी प्रतिमा विश्व में सबसे ऊंची बनवाने का निर्णय किया हो किन्तु इस प्रकल्प की परिकल्पना को सफलतापूर्वक साकार करने के लिए वे अभिनन्दन के पात्र हैं। इसके लोकार्पण के बाद यह स्थल समूचे भारत के लिए एक ऐसा तीर्थस्थल बन जाएगा जो राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के भाव को मजबूती प्रदान करने वाला होगा। यही नहीं विदेशों तक से पर्यटक इस मूर्ति का अवलोकन करने आएंगे। इसे स्टेच्यू ऑफ  यूनिटी (एकता की मूर्ति) नाम देना भी बहुत ही सही है क्योंकि सरदार साहब और एकता एक तरह से समानार्थी हैं। जहां तक बात इसके साथ जोड़ी जा रही राजनीति की है तो ये सिवाय कुंठा के और कुछ भी नहीं। इसकी लागत को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। किसानों की उपेक्षा कर मूर्ति पर पैसा लुटाने जैसी टिप्पणियां भी हो रही हैं। कुछ लोग इसे भाजपा द्वारा गांधी जी के बाद सरदार पटेल की विरासत छीनने का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन इन सबसे ऊपर उठकर सोचने वाली बात ये है कि श्री मोदी ने मायावती की तरह अपनी मूर्ति तो लगवाई नहीं। सरदार पटेल ने बतौर गृहमंत्री रास्वसंघ पर प्रतिबंध लगाया था। उस दृष्टि से तो उनसे श्री मोदी का वैचारिक मतभेद होना चाहिए। बावजूद उसके अगर प्रधानमन्त्री बनने के पहले ही उन्होंने सरदार पटेल की विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया तो ये निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम था। स्मरणीय है सत्तर के दशक में जब कन्याकुमारी के तट पर समुद्र के बीच स्थित शिला पर स्वामी विवेकनन्द का स्मारक बनाने का  निर्णय संघ परिवार द्वारा लिया गया था तब भी इसी तरह की बातें उठी थीं किन्तु बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उसके लोकार्पण पर गईं। देश के लगभग सभी राज्यों की सरकारों ने उस स्मारक हेतु आर्थिक सहयोग भी दिया। बड़े औद्योगिक घराने भी खुलकर मदद के लिए सामने आए। आज विवेकानन्द शिला स्मारक देखने प्रतिवर्ष देश-विदेश के लाखों पर्यटक कन्याकुमारी पहुंचते हैं। स्वामी जी तो एक धर्म विशेष के प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठित थे किन्तु सरदार पटेल तो धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर होने के कारण हर धर्म और वर्ग के लिए अनुकरणीय और पूजनीय कहे जाएंगे। रही बात उनकी मूर्ति ही क्यों और किसी की क्यों नहीं तो इसका उत्तर भी आसान है। गांधी जी और पं.नेहरू के नाम पर तो पूरे देश में जगह -जगह स्मारक, प्रतिमाएं और संस्थान हैं किंतु उनकी तुलना में सरदार साहब का वैसा मूल्यांकन नहीं हुआ। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भी इस दृष्टि से उनके समकक्ष ही कहे जाएंगे जिनके साथ आज़ाद भारत में सौतेले बेटे जैसा व्यवहार किया जाता रहा। उस लिहाज से सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा बनवाकर नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय एकता के प्रति उनके अविस्मरणीय योगदान के मूल्यांकन के लिए भावी पीढ़ी को प्रेरित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। 19 वीं सदी में विभाजित जर्मनी का एकत्रीकरण करने वाले बिस्मार्क को वहां इतिहास पुरुष के रूप में सम्मानित किया गया जबकि उससे भी जटिल कार्य को सम्पन्न करने वाले सरदार पटेल के प्रति भारत में उदासीनता बरती गई। ये राजनीतिक ईष्र्यावश किया गया या इतिहास का अपहरण करने के षडय़ंत्र के तहत ये बहस और विश्लेषण का विषय भले हो लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि सरदार साहब की स्मृतियों को सहेजने के प्रति अपेक्षित सहृदयता और समानता का भाव प्रदर्शित नहीं किया गया। गत दिवस लोकार्पित प्रतिमा की ऊंचाई किसी का कद छोटा करने की कोशिश नहीं अपितु एक महान राष्ट्रभक्त की मातृभूमि के प्रति अनमोल सेवाओं के लिए विनम्र आभार मात्र है। यह स्मारक केवल एक व्यक्ति का नहीं वरन भारत के आसमान छूते आत्मविश्वास का प्रगटीकरण भी है जिसे देखने सारी दुनिया के लोग बरबस आएंगे। सही मायनों में तो ये कार्य दशकों पहले हो जाना चाहिए था। सरदार पटेल भारत की एकता के प्रतीक पुरुष थे और अब उनकी विशालकाय प्रतिमा वैश्विक चुनौतियों से जूझने के लिए भारत के फौलादी इरादों का ऐलान।

-रवीन्द्र वाजपेयी