Wednesday, 14 November 2018

संघ : दिग्विजय चुप हुए तो सुंदर बोल पड़े



भले ही अपनी तीखी टिप्पणियों से कांग्रेस को होने वाले नुकसान के मद्देनजर मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने बयानबाजी से परहेज कर रखा हो किन्तु ऐसा लगता है कांग्रेस के कुछ नेता दिग्विजय सिंह की कमी पूरी करने पर आमादा हैं। मप्र के लिए जारी अपने वचनपत्र में कांग्रेस ने सरकारी परिसर में रास्वसंघ की शाखा लगाने और सरकारी कर्मचारियों के संघ में भाग लेने पर रोक की जो बात कही उस पर मचे राजनीतिक बवाल पर मप्र कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने फौरन रक्षात्मक रवैया दिखाते हुए स्पष्ट कर दिया कि संघ पर प्रतिबंध लगाने का कांग्रेस का कोई इरादा नहीं है। दरअसल श्री नाथ संघ की आड़ में भाजपा द्वारा हिन्दू मतों के धु्रवीकरण को किसी भी कीमत पर रोकने के लिए वैसा कहने मज़बूर हुए थे लेकिन इसी बीच पार्टी के विधायक सुंदरलाल तिवारी ने ठंडी होती आग में पेट्रोल छिड़कने जैसी मूर्खता कर डाली। गत दिवस उन्होंने एक बयान जारी करते हुए संघ को आतंकवाद का प्रतीक बताते हुए उस पर सामाजिक घृणा फैलाने का आरोप लगा दिया। उनके इस अप्रत्यशित बयान ने संघ को और भड़का दिया और प्रदेश के विभिन्न अंचलों से संघ के वरिष्ठ अधिकारियों ने कांग्रेस के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। यद्यपि वचनपत्र से उत्पन्न विवाद पर कांग्रेस के छोटे बड़े सभी नेता पहली मर्तबा इतने दबाव में नजर आए और संघ पर प्रतिबन्ध लगाने की सम्भावना को नकारने में जुट गए। कमलनाथ के तत्सम्बन्धी बयान को कांग्रेस के सुलझे हुए रवैये से जोड़कर देखा जा रहा था लेकिन सुंदरलाल तिवारी ने सब गुड़-गोबर कर दिया। उसके बाद कमलनाथ को और झुकते हुए कहना पड़ा कि उन्हें संघ की किसी बात से उन्हें कोई एतराज नहीं है। उन्होंने श्री तिवारी के बयान से पूरी तरह किनारा करते हुए कह दिया कि वह उनका निजी विचार है जिससे कांग्रेस पार्टी को कुछ लेना देना नहीं है। जहां तक प्रश्न श्री तिवारी का है तो वे कोई दूध पीते बच्चे तो हैं नहीं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्व. श्रीनिवास तिवारी के पुत्र होने के नाते सियासत के दांव पेंच अच्छी तरह जानते हैं। लोकसभा सदस्य भी रह चुके हैं। ऐसे में उनको नादान तो नहीं कहा जा सकता। जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष संघ को लेकर एक नर्म बयान दे चुके थे तब श्री तिवारी को किस पागल कुत्ते ने काटा था जो पार्टी के हितों को पलीता लगते हुए उन्होंने दिग्विजय सिंह वाली गलती दोहराते हुए संघ को आतंकवाद का प्रतीक बताकर और भी आरोप उस पर मढ़ दिए। यद्यपि कमलनाथ ने फौरन समझदारी दिखाते हुए सुंदरलाल के बयान को उनकी निजी खुराफात बताते हुए उससे कांग्रेस का पिंड छुड़ाने की कोशिश की लेकिन इस वजह से संघ को खुलकर कांग्रेस के विरुद्ध मुखर होने का अवसर मिल गया। वैसे संघ के लिए सबसे अनुकूल और काफी हद तक चौंकाने वाली बात ये रही कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने दो टूक शब्दों में इस हिन्दू संगठन को क्लीन चिट दे दी। इसके पहले शायद ही किसी कांग्रेस नेता ने संघ को लेकर इतनी सौजन्यता बरती हो। इसे कमलनाथ की सज्जनता कहें या राजनीतिक मजबूरी लेकिन संघ को लेकर बीते दो दिन में उन्होंने जिस तरह की बातें कहीं वे इस बात का सबूत हैं कि संघ की ताकत से वे कितना अवगत और काफी हद तक भयभीत भी हैं। सुंदरलाल का बयान अतीत में दिग्विजय सिंह द्वारा लगाए गए हिन्दू आतंकवाद जैसे ऊलज़लूल आरोपों की नकल जैसा ही कहा जायेगा। भले ही श्री तिवारी की पहिचान विंध्यप्रदेश तक ही सीमित हो लेकिन उनके श्रीमुख से निकले वचन कांग्रेस को पूरे प्रदेश में नुकसान पहुंचा दें तो कोई अचंभा नहीं होगा। जहां तक बात कमलनाथ के स्पष्टीकरण की है तो वह निश्चित रूप से उनकी व्यवहारिकता और बुद्धिमत्ता का परिचायक है किन्तु सुंदरलाल जैसे अपरिपक्व नेताओं की बदजुबानी यदि नहीं रोकी गई तो ये कांग्रेस के लिए तक्षक नाग जैसे साबित होंगे। अभी मतदान में दो सप्ताह शेष है। बेहतर यही होगा कि कांग्रेस के शेष नेता भी कमलनाथ जैसा संयम और सौजन्यता दिखाते हुए केवल भाजपा से भिड़ें। संघ के विरुद्ध मोर्चा खोलना उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। कांग्रेस को इस वास्तविकता को भली-भांति समझ लेना चाहिए कि रास्वसंघ का आम कार्यकर्ता आमतौर पर राजनीति में लिप्त नहीं होता लेकिन जब-जब संघ को घेरने की कोशिश की जाती है तब उसके स्वयंसेवक अपने संगठन की सुरक्षा के लिए राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय हो जाते हैं। आपात्काल के दौरान और उसके बाद जब-जब भी संघ को घेरने की कोशिश हुई तब-तब उसने पूरी ताकत से उसे विफल कर दिया।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 November 2018

संघ को छेड़कर गलती कर गई कांग्रेस

कांग्रेस के नेता अब सफाई देते फिर रहे हैं कि पार्टी ने मप्र विधानसभा चुनाव हेतु जो घोषणापत्र जारी किया उसमें सरकारी परिसरों में रास्वसंघ की शाखाएं लगने पर रोक लगाने और शासकीय कर्मचारियों को संघ की गतिविधियों में हिस्सा न लेने सम्बन्धी जो बातें कही गईं हैं उनका उद्देश्य संघ पर प्रतिबंध लगाना कतई नहीं है । दरअसल दो दिन पहले ज्योंही कांग्रेस का घोषणा पत्र वचनपत्र के नाम से आया और उसमें संघ सम्बन्धी उक्त बातों का उल्लेख हुआ त्योंही भाजपा ने उसे लपकते हुए कांग्रेस पर हमले शुरू कर दिए । संघ और उससे जुड़े अनुषांगिक संगठनों ने भी कांग्रेस पर हिन्दू विरोधी होने का आरोप जड़ दिया । पार्टी ने वचनपत्र में हिंदुत्व के राहुल गांधी अवतार को ध्यान रखते हुए तमाम ऐसी बातें कहीं जो अमूमन भाजपा की पहिचान रही हैं । इसलिए ज्योंही संघ खेमे से तीखी प्रतिक्रिया आई त्योंही कांग्रेस का प्रचारतंत्र सफाई  देने में लग गया । गत दिवस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने तो खुलकर कहा कि संघ पर प्रतिबंध लगाने की कोई सोच कांग्रेस की नहीं है । उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह उनके मुंह में शब्द डालने की कोशिश कर रही है । इस मुद्दे पर कांग्रेस की स्थिति हास्यास्पद हो गई है । आए दिन वह संघ को लेकर तीखे आरोप लगाया करती है । उसके प्रवक्ता  घूमा फिराकर गांधी जी की हत्या का आरोप उस पर थोपने का प्रयास करने से भी नहीं चूकते । नाथूराम गोड़से का संघ से रिश्ता प्रमाणित करने में भी पार्टी का प्रचारतंत्र सक्रिय रहता है । ऐसे में संघ की शाखाओं को सरकारी  शिक्षण  संस्थानों में रोकने और सरकारी मुलाजिमों को संघ से दूर रहने जैसे प्रावधानों को अपने चुनाव घोषणापत्र में सम्मिलित करने का कदम कांग्रेस से अनपेक्षित नहीं था लेकिन जिस तरह से उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष हिंदुत्व का चोला ओढ़कर घूमने लगे हैं और उनके साथ पार्टी के अन्य नेतागण हिंदुओं के धर्मस्थानों में जा  - जाकर मत्था टेक रहे हैं उससे ये लगने लगा था कि कांग्रेस इस चुनाव में हिन्दू मतों को आकर्षित करने की रणनीति पर चलेगी । पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को पृष्ठभूमि में रखने के पीछे भी यही कारण समझ आया । यहां तक कि खुद श्री सिंह ने स्वीकार किया कि वे इसलिए प्रचार नहीं करेंगे क्योंकि उनके बयानों से कांग्रेस को नुकसान हो जाता है । उल्लेखनीय है हिन्दू आतंकवाद जैसी टिप्पणियों के कारण दिग्विजय कांग्रेस का सिरदर्द बढ़ाते रहे हैं। इन सब कारणों से राजनीतिक प्रेक्षक अनुमान लगा रहे थे कि भाजपा का गढ़ बन चुके मप्र में वापिसी के लिए कांग्रेस ऐसा कुछ भी करने से बचेगी जिससे उस पर मुस्लिम परस्त और हिन्दू विरोधी होने जैसे आरोप लगें लेकिन वचनपत्र के जरिये रास्वसंघ को घेरने की उसकी घोषणा ने सारे किये कराए पर पानी फेर दिया । चुनाव शुरू होने के पहले हल्ला था कि भाजपा के उम्मीदवारों का चयन संघ की निगरानी में होगा । पार्टी के बड़े नेताओं ने जिस तरह  संघ के वरिष्ठ अधिकारियों से बन्द कमरे में मुलाकातें कीं उससे भी लगा कि संघ की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रहने वाली है लेकिन जब प्रत्याशी घोषित हुए तब ये बात उजागर हुई कि संघ की सलाह को वैसी वजनदारी नहीं दी गई जैसी अपेक्षा थी । उसके बाद संघ से जुड़े तमाम लोगों में नाराजगी भी महसूस की गई जिससे ये आशंका जोर पकडऩे लगी कि ये हिन्दू संगठन भाजपा के लिए उतना सक्रिय नहीं रहेगा जितना अपेक्षित था । लेकिन कांग्रेस ने अनावश्यक रूप से संघ को छेड़ दिया । ये नादानी है या जानबूझकर की गई शरारत ये पता करना तो मुश्किल है किन्तु इसकी वजह से संघ के साधारण कार्यकर्ता तक सतर्क हो उठे हैं । संघ के जितने भी अनुषांगिक संगठन हैं उनमें भी ये भावना प्रबल हुई है कि कांग्रेस का हिंदुत्व दिखावा है और वह मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को नहीं छोड़ सकती । ये आशंका गलत भी नहीं है क्योंकि राहुल के जनेऊधारी ब्राह्मण बन जाने के बाद मुस्लिम समुदाय को ये लगने लगा था कि कांग्रेस भी भाजपा की राह पर चलकर उनकी उपेक्षा कर रही है। कांग्रेस की चुनावी व्यूह रचना बनाने वाले नेताओं ने मुस्लिमों को सन्तुष्ट करने के लिए ही सम्भवत: संघ की घेराबंदी का दांव चला लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी उसका उल्टा असर होता दिख रहा है । इसका चुनाव परिणाम पर क्या प्रभाव पडेगा ये आकलन करना फिलहाल तो जल्दबाजी होगी लेकिन ये कहा जा सकता है कि रास्वसंघ सम्बन्धी जो बातें कांग्रेस के वचनपत्र में कही गईं उनसे उसके विरुद्ध एक नया मोर्चा खुल गया है । शायद कांग्रेस को इसकी उम्मीद नहीं रही होगी इसीलिए वह बजाय ऊंची आवाज में बात करने के ये आश्वासन बांटने में जुट गई है कि संघ पर प्रतिबंध लगाने का उसका कोई इरादा नहीं है । और कोई अवसर होता तब कांग्रेस का हर नेता संघ पर प्रतिबन्ध का खुलकर समर्थन करता लेकिन चुनाव सामने देखकर सबकी सिट्टी-पिट्टी गायब है । बावजूद इसके जो तीर तरकश से निकल गया उसे लौटाना सम्भव नहीं है । इस प्रकरण में एक बात स्पष्ट हो गई कि कांग्रेस में पिछली गलतियों से सीखकर सुधार करने की प्रवृत्ति  समाप्त हो चुकी है ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 November 2018

वायदे लपेट लीजिए लंगोटी नहीं तो क्या

मप्र में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव हेतु अपने वचनपत्र में जो वायदे किये वे सब घिसे-पिटे हैं क्योंकि लगभग हर पार्टी किसानों के कर्जे माफ  करने, कृषि हेतु सस्ती बिजली, बेरोजगारों को भत्ता, लड़कियों को मुफ्त शिक्षा सरीखे लालच देकर सत्ता हासिल करने की जुगत भिड़ाती है। ये बात अलग है कि सरकार बन जाने पर उन्हें पूरा करने में व्यवहारिक और वित्तीय अड़चनें आने के बाद वायदे पूरे करने में टालमटोली की जाती है। चूंकि कांग्रेस पहले भी प्रदेश की सत्ता में लंबे समय तक रही है और उसी के शासनकाल में मप्र बीमारू राज्यों की कतार में खड़ा हो गया था इसलिए उसके वचनपत्र को गंभीरता से शायद ही कोई समझदार व्यक्ति लेगा। अभी भाजपा का घोषणापत्र आना शेष है जिसे वह दृष्टिपत्र कहने लगी है। बड़ी बात नहीं चौथी बार सरकार बनाने के लिए वह मतदाताओं को कांग्रेस से भी ज्यादा आकर्षक पैकेज देकर लुभाने का दांव खेल जाए। यद्यपि उसकी बात पर भी आंख मूंदकर भरोसा कर लेने को जनता तैयार नहीं होगी क्योंकि शिवराज सिंह चौहान सरकार भी अपनी कई बातों और वायदों से मुकर चुकी है। दरअसल जब तक चुनाव घोषणापत्र में, चाहे इसे कुछ और नाम ही क्यों न दे दिया जाए, किये गए वायदों को हलफनामा मानकर पूरा करने की वैधानिक अनिवार्यता नहीं होगी तब तक इसी तरह से जनता को ख्याली पुलाव खिलाते रहने का ये खेल चलता रहेगा। दरअसल केवल कांग्रेस और भाजपा ही नहीं वरन छोटी - छोटी क्षेत्रीय पार्टियां भी इसी संस्कृति का पालन करते हुई घोषणापत्र के नाम पर ऐसे - ऐसे व्यंजन परोस देती हैं जो देखने में तो बड़े ही अच्छे प्रतीत होते हैं लेकिन असलियत में वे बेस्वाद निकलते हैं। चूंकि हमारे देश में प्रारम्भ से ही राजनीति और चुनाव व्यक्तिवाद, क्षेत्र, भाषा, जाति, धर्म के मकडज़ाल में उलझकर रह गए इसलिये घोषणापत्र के साथ जुड़े वायदों के प्रति मतदाता भी उतने जागरूक और आग्रही नहीं रहे। शिक्षा और संचार सुविधाओं की कमी के चलते राजनीतिक दलों पर वैसा दबाव बनाने की परिपाटी कायम नहीं हो सकी जैसी अब कुछ-कुछ महसूस की जा सकती है। लेकिन ले-देकर बात वहीं आकर ठहर जाती है कि जनता की स्मरणशक्ति अव्वल तो बहुत कमजोर कही जाती है और उससे भी बढ़कर तो राजनीतिक दलों पर घोषणापत्र में किये वायदे पूरे करने की कोई कानूनी बंदिश नहीं है जिसकी वजह से वे चुनाव पूर्व जो सब्जबाग दिखाते हैं वह उनके सत्ता में आते ही मरुस्थल में बदलकर रह जाता है। कांग्रेस ने बेरोजगारी भत्ता देने की बात भी कही लेकिन असली जरूरत तो नए रोजगार उत्पन्न करना है। जिसके लिए कांग्रेस ही नहीं अपितु अन्य दलों के पास भी कोई पुख्ता योजना नहीं है। चुनाव आयोग ने कुछ समय पहले घोषणापत्र को शपथ पत्र के समकक्ष रखते हुए उसे पूरा करने की वैधानिक अनिवार्यता की बात कही थी। वायदों को पूरा करने हेतु आर्थिक संसाधनों के प्रबंध सम्बन्धी कार्ययोजना पेश करने जैसी बात भी उठी थी किन्तु दुर्भाग्यवश एक भी पार्टी ने उक्त प्रस्ताव पर उत्साह और रुचि नहीं दिखाई। चुनावी वायदों को पूरा करने सम्बन्धी कोई फार्मूला किसी पार्टी के पास नहीं होने से वे इसकी टोपी उसके सिर रखने की कोशिश करते हैं। शिवराज सरकार ने किसानों के बिजली बिल माफ  किये किन्तु उसकी भरपाई शहरी उपभोक्ताओं की बिजली दरें बढ़ाकर कर ली। इसी तरह जितनी भी जनकल्याणकारी योजनाएं चलाकर श्री चौहान अपनी लोकप्रियता बढऩे का दावा करते हैं उनके लिए मप्र में पेट्रोल-डीजल पर देश में सर्वाधिक करारोपण किया जाता है। इस तरह राजनीतिक दल अर्थ प्रबंधन समझे बिना जो दरियादिली दिखाते हैं उसका बोझ आखिरकार जनता के उस वर्ग पर पड़ता है जिसे सत्ताधारी सोने की मुर्गी समझते हैं। ये देखते हुए चुनाव घोषणापत्र को जिसे चाहे वचनपत्र कहा जाए या फिर दृष्टिपत्र, एक वैधानिक दस्तावेज का रूप देना जरूरी हो गया है। वायदे पूरे करने की समय सीमा और उस हेतु वित्तीय संसाधन जुटाने की कार्ययोजना भी साथ-साथ पेश किये जाने की कानूनी अनिवार्यता से ऐसे वायदों पर रोक लग सकेगी जिनको पूरा करना साधारणतया सम्भव नहीं होता। वैसे नीतिगत वायदों से अलग हटकर किये जाने वाले वायदे वस्तुत: घूस ही कहे जाएंगे। मसलन मोटर सायकिल, लैपटॉप, मिक्सर, मंगलसूत्र सरीखी चीजें देने का वायदा अचार संहिता का खुला उल्लंघन है। पता नहीं चुनाव आयोग ने अब तक इसका संज्ञान क्यों नहीं लिया? कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि चुनाव घोषणापत्र भी राजनीतिक नेताओं की तरह अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। किसी कवि की ये पंक्तियां इस संदर्भ में बेहद प्रासंगिक लगती हैं :-

सब कुछ है मेरे देश में रोटी नहीं तो क्या,
वायदे लपेट लीजिए लंगोटी नहीं तो क्या?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 10 November 2018

मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस के 30 वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर विशेष:- -रवीन्द्र वाजपेयी स्वस्थ और निर्भीक पत्रकारिता जारी रहेगी

29 बरस बीत गए। पीछे मुड़कर देखें तो ये कल की ही बात लगती है लेकिन तीन दशक पूरे करने की ओर बढ़ते हुए आज शुरू से अब तक की संघर्ष यात्रा की स्मृतियों को कुरेदने की कोशिश करने पर एक रोमांच महसूस होने लगता है क्योंकि कठिन से कठिन मुश्किलों से साक्षात्कार करते-करते आज मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस उस मुकाम तक पहुंच सका जो किसी मध्यम श्रेणी समाचार पत्र के लिए बड़ी उपलब्धि होती है। 9 नवम्बर 1989 को प्रकाशित पहले अंक से ही इसका पाठकों से जो आत्मीय सम्बंध कायम हुआ वह आज भी यथावत है। और वही आत्मीयता इस अखबार की ताकत है जिसके बल पर यह अपनी निर्भीकता कायम रख सका जो आज के दौर में व्यावसायिक सफलता की राह में बड़ी बाधा मानी जाती है। लेकिन ये कहते हुए गर्व की अनुभूति होती है कि मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने धनोपार्जन की दौड़ से अलग हटकर विश्वसनीयता नामक संपत्ति अर्जित की वरना पूंजी और तकनीक से उत्पन्न प्रतिस्पर्धा के सामने टिके रहना साधारण बात नहीं थी। पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा के निर्वहन के प्रति हमारी प्रतिबद्धता असंदिग्ध रही है जिसकी वजह से हमें तरह-तरह की परेशानियां झेलनी पड़ीं। आर्थिक संकट तो मानों हमारे स्थायी हमसफर रहे लेकिन उन्हें दूर करने के लिए स्वाभिमान को गिरवी रखने की बजाय मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने ऊंची आवाज में सच बोलना जारी रखा। जिसके अन्तर्निहित नुकसान भी खूब हुए। सत्ता प्रतिष्ठान को ये अखबार सदैव खटकता रहा क्योंकि ब्लैक एंड व्हाइट छपाई के बावजूद इसने कई ओहदेदारों का रंग फीका कर दिया। विज्ञापन के अलावा समाचार माध्यमों द्वारा अन्य स्रोतों से की जाने वाली कथित कमाई चूंकि मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस का उद्देश्य नहीं रहा इसलिए कोई इसकी आवाज दबाने या बंद करने का दुस्साहस नहीं कर सका और जिसने भी इसका प्रयास किया उसे निराशा ही हाथ लगी। इस लंबी यात्रा में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने पत्रकारिता की पवित्रता और सम्मान को अक्षुण्ण बनाये रखने का जो प्रयास किया वह इसकी सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है वरना बाजारवाद के जबरदस्त आक्रमण के कारण समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता संकट में पड़ गई है। इसी के चलते बिकाऊ मीडिया जैसी गाली प्रचलन में आई। दुर्भाग्य की बात ये है कि पत्रकार बिरादरी के दिग्गज कहे जाने वाले लोगों ने भी इसका प्रतिवाद नहीं किया जो उनके अपराधबोध का प्रतीक बन गया किन्तु मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस बिकाऊ मीडिया के आरोप को खुलकर नकारने का साहस रखता है और यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। 30 वें वर्ष में प्रविष्ट होते हुए हम ये विश्वास दिलाते हैं कि निर्भीक पत्रकारिता के सशक्त प्रतिनिधि के रूप में मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस सदैव आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरता रहेगा। एक सांध्य दैनिक होने के बाद भी पाठकों ने उसे जो महत्व दिया वह विपरीत परिस्थितियों में भी जनहित के लिए लडऩे का सम्बल हमें प्रदान करता रहा। आज इस अवसर पर हम अपेक्षा करते हैं कि पाठकों और शुभचिंतकों का स्नेह बीते वर्षों की तरह ही भविष्य में भी हमारा उत्साहवर्धन करता रहेगा। इस माह की 28 तारीख को मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव हेतु मतदान होने वाला है। लोकतंत्र की इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में पूरे उत्साह से हिस्सा लेकर अच्छे और सच्चे उम्मीदवार को अपना प्रतिनिधि चुनें जो नि:स्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस ने चुनावों के दौरान सदैव स्वस्थ एवं निष्पक्ष प्रस्तुतीकरण की परंपरा कायम रखी है जिसे इस बार भी दोहराने हेतु हम वचनबद्ध हैं। आगामी कुछ महीने देश के लिए भारी उथलपुथल वाले होंगे। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीति में नई-नई करवटें देखने मिलेंगी। निश्चित रूप से ऐसे समय में  लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की जिसे खबरपालिका भी कहा जाने लगा है, महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। मध्यप्रदेश हिन्दी एक्सप्रेस निर्णय की उस घड़ी में पाठकों को यथार्थपरक खबरें और जानकारियां देने का प्रयास उसी ईमानदारी से करता रहेगा जिसके कारण आप उस पर विश्वास करते आये हैं। 29 वर्ष रूपी मील के पत्थर से आगे बढ़ते हुए हम एक बार फिर आप सभी के स्नेहयुक्त सहयोग और शुभकामनाओं के आकांक्षी हैं।
विनम्र आभार सहित,
रवीन्द्र वाजपेयी
संपादक

Wednesday, 7 November 2018

" सम्पन्नता के साथ प्रसन्नता का भी अनुष्ठान करें"

भारत समृद्ध हो रहा है। प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है। विकास दर भी आशाओं और उम्मीदों के नए आसमान छूती दिख रही है। मध्यम वर्ग का जीवन स्तर जिस तरह ऊपर उठ रहा है उससे पूरे समाज का परिदृष्य बदलता दिख रहा है। यहां तक कि उससे नीचे वाले वर्ग की आर्थिक स्थिति भी पहले से कहीं बेहतर कही जा सकती है। सबसे बड़ी बात ये है कि देश का युवा उत्साह से भरपूर है। वह केवल सपने देखता नहीं अपितु उन्हें साकार करने के प्रति भी सजग और प्रयत्नशील है। लेकिन इससे अलग हटकर एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसके लिए ये सब बेमानी है। उसकी आंखों से नींद ही गायब है तो सपने कहाँ से आएंगे? उसके शब्दकोश में जीवन स्तर जैसी कोई बात ही नहीं है। उसे देखें तो पूरा चित्र विरोधाभासी लगता है। पढ़ा-लिखा युवा भी बेरोजगार है तो मज़दूर वर्ग भी रोजी-रोटी के संकट से जूझ रहा है। एक तरफ  सड़कें आलीशान कारों से  पटी पड़ी हैं तो दूसरी तरफ  हर शहर में फुटपाथ पर सोने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। समृद्धि और अभाव का समानांतर चलना  आधुनिक भारत की पहिचान बन गया है किंतु यह एक तरह का कलंक भी है जिसे धोने के सारे प्रयास ईमानदारी न होने के कारण बेअसर साबित हो जाते हैं। वादे और दावे अब अविश्वसनीय लगने लगे हैं। सबसे अधिक चिंताजनक बात ये है कि समाज में जिस तेजी से समृद्धि आ रही है उसी तेजी से गरीबी भी बढ़ रही है। सामाजिक सुरक्षा की सरकारी योजनाओं के अंतर्गत भले ही करोड़ों लोगों को संरक्षण प्रदान किया जा रहा हो लेकिन उसके बाद बाद भी विकास को लेकर वैसी समानता नहीं दिखाई दे रही जैसी अपेक्षित थी। इस सबसे अलग हटकर देखें तो भौतिक उपलब्धियों के बावजूद मानसिक शांति का अभाव होता जा रहा है। बढ़ती आत्महत्याएं इस बात का प्रमाण है कि मानसिक तनाव समृद्धि के साइड इफेक्ट की तरह हमारी जि़ंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। हाल के वर्षों में दुराचार की घटनाओं की जानकारी जिस मात्रा में मिल रही है वह संस्कारों के क्षरण का ही परिणाम है। जिस देश में गांव और मोहल्ले की बच्ची अपनी बेटी समान होती थी वहां खून के रिश्तों पर बहशीपन का हावी हो जाना ये दर्शाता है कि शिक्षा का कितना भी प्रसार हुआ हो लेकिन सभ्यता का स्तर गिरता जा रहा है। पाठक सोच सकते हैं कि दीपावली की खुशियों के बीच इन सब बातों की चर्चा का क्या औचित्य है लेकिन जिस पर्व पर पूरा समाज धन-धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की आराधना करते हुए अपनी आर्थिक संपन्नता के लिए तरह-तरह के अनुष्ठान करता हो उस अवसर पर हमें इस बात का चिंतन भी करना चाहिए कि इस समृद्धि की कीमत कहीं हमारी मानसिक शांति और नैसर्गिक प्रसन्नता तो नहीं है। बीसवीं सदी में औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ के कारण व्यक्ति की मानसिक शांति लुप्त होती चली गई। विकास के नाम पर परिवार और रिश्ते टूटने का जो दौर चला वह अंतत: समाज के विघटन तक जा पहुंचा और तब जाकर आधुनिक  विकास के जनक देशों को ये समझ आया कि बाहरी चमक-दमक और नकली हँसी तब तक निरर्थक है जब तक व्यक्ति अंदरूनी तौर पर सन्तुष्ट और प्रसन्न न हो। और इसी के बाद प्रसन्नता सूचकांक (हैप्पीनेस इंडेक्स) की बात उछली और दुनिया के तमाम छोटे बड़े देश आर्थिक विकास की मृग मरीचिका से निकलकर अब प्रति व्यक्ति आय की बजाय प्रति व्यक्ति प्रसन्नता को विकास का मापदंड मानने लगे हैं। दरअसल ये भारतीय चिंतन पर आधारित अवधारणा ही है जो प्राचीनकाल से भारतीय मानसिकता रही किन्तु विदेशी आक्रांताओं के आने के बाद धीरे-धीरे उसमें कमी आती गई और अंतत: वह लुप्त हो गई। समय आ गया है जब हम अपनी जड़ों की ओर लौटें। दीपावली इस बारे में सोचने का सही अवसर है जब हम अपनी सम्पन्नता की कामना करते हुए जीवन को सुखमय बनाने हेतु प्रार्थना करते हैं लेकिन देवी लक्ष्मी से धनधान्य मांगने के साथ ही हमें ऐसा कुछ भी करना चाहिए जिससे हमारा अपना ही नहीं अपितु समूचे समाज में तनाव दूर होकर प्रसन्नता का भाव उत्पन्न हो। जो समृद्धि संस्कारों की कीमत पर आती हो और जो विकास हमारे जीवन को अशांत करते हुए तनावग्रस्त कर दे वह ज़हर समान है। इस दीपावली पर आइये हम सम्पन्नता के समानांतर प्रसन्नता की प्राप्ति हेतु अपने प्रयास केंद्रित करें। मप्र सरकार ने आनंदम मंत्रालय बनाकर इस दिशा में पहल जरूर की लेकिन उसे समाज की अपेक्षित स्वीकृति और समर्थन नहीं मिल सका क्योंकि ये कार्य समाज को करना चाहिए। इस सत्य को स्वीकार करने में कोई बुराई नहीं है कि सरकार संस्कार नहीं देती। इस दीपावली पर दीप जलाते समय इस बात का संकल्प भी लें कि जीवन की सफलता का आधार सम्पन्नता की बजाय प्रसन्नता को बनाया जाए।
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं सहित ,
रवीन्द्र वाजपेयी