Monday, 19 November 2018

पंजाब में आतंकवाद की आहट नए खतरे का संकेत

अमृतसर के समीप एक गांव में निरंकारी भवन पर हुए आतंकी हमले ने पंजाब में आतंक की वापसी का खतरा उत्पन्न कर दिया है। ये माना जा रहा है कि घटना के पीछे पाकिस्तान पोषित कश्मीर के किसी आतंकवादी संगठन का हाथ है। ये सन्देह भी व्यक्त किया गया है कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद के पैर उखड़ते देख पाकिस्तान एक बार फिर खालिस्तान के नाम पर पंजाब को आतंक की आग में धकेलने का षडय़ंत्र रच रहा है। स्मरणीय है नब्बे के दशक में जब पंजाब में पाकिस्तान प्रवर्तित खालिस्तानी आतंकवाद की कमर टूटने लगी तब उसने कश्मीर में आतंकवाद को दाना-पानी देकर भारत के लिए ऐसी समस्या खड़ी कर दी जिसकी वजह से पूरे देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ी हुई है।  हालांकि पंजाब में सैन्य ठिकानों पर भले आतंकवादी हमले होते रहे किन्तु निरंकारी भवन पर हुआ ताजा हमला किसी दूसरी रणनीति की तरफ  इशारा कर रहा है। एनआईए ने जांच शुरू कर दी है लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि खुफिया एजेंसियों द्वारा आगाह किए जाने के बाद भी आतंकवादी कामयाब हो गए। हमले के लिए अपनाए गए तरीके से ये लगता है कि वे बड़ी वारदात करने में सक्षम नहीं थे लेकिन हथगोला फेंककर तीन लोगों की जान लेकर उन्होंनें दहशत तो फैला ही दी जो आतंकवाद का प्राथमिक उद्देश्य होता है।  इस घटना को लेकर न तो राजनीति  होनी चाहिए और न ही सुरक्षा एजेंसियों पर उंगली उठाने की कोशिश ही सही होगी। लेकिन केंद्र और पंजाब के साथ ही जम्मू-कश्मीर में तैनात सुरक्षा एजेंसियों को मिल बैठकर ये निष्कर्ष निकालना चाहिए कि उक्त घटना की जड़ , उद्देश्य और आगामी योजना क्या है? ये अवसर इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकसभा चुनाव का माहौल देश में बनने लगा है।  जम्मू-कश्मीर में फिलहाल केंद्र का शासन है इसलिए वहां भी नए चुनाव या फिर कोई वैकल्पिक सरकार बनने की प्रक्रिया राजनीतिक स्तर पर चल रही है। घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों के विरुद्ध सुरक्षा बलों की सुनियोजित और आक्रामक रणनीति की वजह से आतंकवादी संगठन बौखलाए हुए हैं।  हाल के कुछ दिनों में उन्होंने स्थानीय पुलिस वालों की हत्या करने के अलावा नौजवानों का अपहरण कर उनकी नृशंस हत्या करने का तरीका अख्तियार कर रखा है।  कश्मीर घाटी की जनता भी अब आतंकवादियों की गतिविधियों से त्रस्त होकर उनको पहले जैसा सहयोग नहीं दे रही।  पत्थरबाजी की घटनाओं में भी कमी आई है।  सुरक्षा बलों द्वारा सघन तलाशी अभियान चलाकर छिपे हुए आतंकवादियों के सफाये का जो अभियान चलाया गया उसके अनुकूल परिणाम निकले जिसकी वजह से पाकिस्तान भी अपनी रणनीति बदलकर पंजाब में नया मोर्चा खोलने का दांव चल सकता है।  पंजाब में नशे के कारोबार को भी आतंकवादी गतिविधियों से जोड़कर देखा जाता रहा है।  यूूं भी आतंकवादियों के लिए कश्मीर के बाद पंजाब ही सबसे उपयुक्त जगह है क्योंकि वहां से सीमा पार करना आसान है।  लेकिन देखने वाली बात ये होगी कि मुस्लिम आतंकवादी संगठनों का खालिस्तान समर्थक तत्वों से गठबंधन किस तरह आकार लेगा क्योंकि बिना पाकिस्तान के सक्रिय सहयोग के ये सम्भव नहीं होगा। नब्बे के दशक में भी पंजाब के आतंकवाद को पूरी तरह से पाकिस्तान का समर्थन था।  जानकार सूत्र कहते हैं कि 1971 में बांग्ला देश के निर्माण का बदला लेने हेतु पाकिस्तान के तत्कालीन फौजी तानाशाह जिय़ाउल हक ने पंजाब में अलगाववाद के बीज बोए और बड़ी संख्या में सिख युवकों को लालच देते हुए  सीमा पार बुलाकर वैसे ही आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जैसे वह कश्मीरी युवकों के साथ करता है। खालिस्तान की उस मांग को कुछ पश्चिमी ताकतों का भी अंदरूनी समर्थन हासिल था जो भारत को अस्थिर करने के लिए हमेशा पाकिस्तान को प्रेरित और प्रोत्साहित करते रहे।  ये कहना पूरी तरह से सत्य है कि यदि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश पाकिस्तान को दूध पिलाकर नहीं पालते तो वह अपने अंतद्र्वंद में उलझकर कभी का टूट चुका होता। यहां उल्लेखनीय है कि भारत का विभाजन करते समय अंग्रेजों ने सिख होमलैंड बनवाने का कुचक्र भी रचा था। लेकिन पाकिस्तान बनने की हलचल शुरू होते ही पश्चिमी हिस्से सहित सीमांत क्षेत्रों में मुसलमानों ने जिस तरह से सिखों और हिंदुओं का क़त्लेआम शुरू किया उससे अलग देश का ख्वाब देखने वाले सिख नेता चौकन्ने हो गए और भारत के साथ रहने को राजी हो गए किन्तु ये भी सही है कि अलग देश का ज़हरीला बीज पंजाब की मिट्टी में दबा रहा जो रह-रहकर अंकुरित होने की कोशिश करता रहा और कालान्तर में भिंडरावाला के रूप में सामने आ गया।  हालांकि इसके पीछे हमारे देश की राजनीति भी कम जिम्मेदार नहीं थी जिसका दर्दनाक चर्मोत्कर्ष अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार और फिर इंदिरा गांधी की हत्या के रूप में देखने मिला।  धीरे-धीरे देश उस दौर को भूल चुका था। कश्मीर घाटी में आतंकवाद के उदय के साथ ही पूरा ध्यान वहां केंद्रित होता गया।  लेकिन गत दिवस अमृतसर के पास निरंकारी भवन में हुआ हादसा नये खतरे का इशारा है।  इसके दूरगामी उद्देश्य को समझकर तत्काल उचित कदम उठाये जाने की जरूरत है। विशेष ध्यान रखने वाली बात ये है कि उक्त घटना को राजनीति का चश्मा उतारकर राष्ट्रीय सुरक्षा और उससे जुड़ी चिंताओं के संदर्भ में देखना चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 17 November 2018

अयोध्या मामले में नया मोड़

अयोध्या विवाद को अपनी प्राथमिकता नहीं मानने वाले सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई पर राजनीतिक जमात के साथ - साथ विभिन्न वर्गों से आलोचना के तीर छोड़े गए । उल्लेखनीय है कि पिछले प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कार्यकाल में इस प्रकरण की सुनवाई नियमित करने का निर्णय हुआ था । जब गत 29 अक्टूबर को श्री गोगोई की अध्यक्षता में सुनवाई हुई तब पूरा देश उम्मीद कर रहा था कि देश की राजनीति में उथल - पुथल मचाये रखने वाले इस मुद्दे पर श्री गोगोई त्वरित गति से सुनवाई करते हुए फैसला कर देंगे किन्तु पहली ही पेशी में उन्होंने बड़ी ही बेरुखी दिखाते हुए कह दिया कि ये प्रकरण उनकी प्रथमिमताओं में नहीं आता और जनवरी में नई पीठ इसकी सुनवाई करेगी किन्तु उसका समय निश्चित नहीं किया जा सकता । इस तरह। प्रधान न्यायाधीश के साथ ही नियमित सुनवाई का सर्वोच्च न्यायालय का अपना फैसला ही रद्दी की टोकरी में चला गया जिससे न्याय की सबसे ऊंची आसंदी को लेकर विधि जगत के अलावा आम लोगों में चलने वाली चर्चाओं को और भी बल मिल गया । बात आई गई हो गई क्योंकि बीच में दीपावली का त्यौहार आ गया लेकिन अचानक एक खबर ने ध्यान खींच लिया । अयोध्या विवाद के दो प्रमुख पक्षकार मंदिर के महंत धर्मदास और मस्जिद के इकबाल अंसारी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर मांग की है कि अयोध्या विवाद के जल्द निराकरण हेतु विशेष पीठ गठित कर नियमित सुनवाई की व्यवस्था की जाए । यहां तक भी बात ठीक थी किन्तु उक्त दोनों पक्षकारों ने महामहिम से ये मांग भी कर दी कि विशेष पीठ में प्रधान न्यायाधीश श्री गोगोई न रहें । इस बारे में जो जानकारी मिली वह और भी चौंकाने वाली कही जा सकती है क्योंकि मंदिर और मस्जिद के पक्षकारों द्वारा राष्ट्रपति से विशेष पीठ का गठन कर नियमित सुनवाई करवाने के अनुरोध से भी आगे बढ़कर उस पीठ में श्री गोगोई को नहीं रखे जाने जैसी मांग का पत्र लिखे जाने संबंधी फैसला अयोध्या में इकबाल अंसारी के निवास पर हुई महंत धर्मदास सहित कुछ हिन्दू और मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक में हुआ। जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के रवैये पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा गया कि हम नहीं चाहते कि मंदिर - मस्जिद विवाद को लेकर लोग आपस में झगडें । उसी बैठक में प्रकरण की नियमित सुनवाई हेतु महामहिम से लिखित अनुरोध करने के साथ ही उनसे मिलकर तत्संबंधी मांग करने का निर्णय किया गया । इस प्रकरण में इसे एक सकारात्मक मोड़ कहा जा सकता है । इससे कई बातें साबित हो गईं। पहली तो ये कि अयोध्या विवाद के दोनों ही पक्ष अब लंबी मुक़दमेबाजी से ऊब चुके हैं और जल्द फैसला चाहते हैं । दूसरी बात ये कि दोनों को इस सम्वेदनशील मुद्दे पर प्रधान न्यायाधीश श्री गोगोई की उपेक्षावृत्ति पर जबर्दस्त आपत्ति है जो एक तरह से उनके प्रति अविश्वास में बदल गई वरना दोनों पक्षकार राष्ट्रपति से विशेष पीठ गठित करने के अनुरोध में ये शर्त नहीं जोड़ते कि श्री गोगोई को उसमें शामिल नहीं किया जावे । इसका कारण सम्भवत: प्रधान न्यायाधीश द्वारा अयोध्या विवाद को अपनी प्राथमिकताओं में नहीं रखे जाना हो सकता है । एक बात और भी इस बारे में सामने आ गई कि कांग्रेस नेता और प्रख्यात अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में अयोध्या विवाद की सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव तक टालने की जो दलील दी थी वह दरअसल कांग्रेस पार्टी की रणनीति का ही हिस्सा रही होगी। भले ही पूरे देश में भद्द पिटने के बाद पार्टी ने श्री सिब्बल को उस मामले से हटने की सलाह भी दी किंतु  दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग का हल्ला मचाने वालों में श्री सिब्बल की अग्रणी भूमिका रही थी और संयोगवश जिन चार न्यायाधीशों ने गत जनवरी में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश श्री मिश्रा के विरुद्ध सार्वजनिक मोर्चा खोला था उसकी अगुआई श्री गोगोई ने ही की थी । प्रधान न्यायाधीश बनते ही उनके कतिपय फैसले और आदेश केंद्र सरकार के विरुद्ध होने से ये भावना तेजी से फैलने लगी कि सर्वोच्च न्यायालय और सरकार में टकराव की स्थिति बनेगी यद्यपि श्री गोगोई के अलावा एक न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर केंद्र ने टकराव को टाला । इसके पीछे केंद्र की सोच शायद यही होगी कि पिछले प्रधान न्यायाधीश को लेकर जो विवाद की स्थिति बनी उसकी पुनरावृत्ति न हो सके । लेकिन अयोध्या मामले के दो पक्षकारों द्वारा जिस तरह से श्री गोगोई को विशेष पीठ से अलग रखने की मांग राष्ट्रपति से की उससे अब न्यायपालिका को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है । कम से कम इतना तो होगा ही कि जो नई पीठ जनवरी में बनाने हेतु श्री गोगोई ने कहा था उसमें नैतिकता की वजह से वे स्वयं नहीं होंगे । ये बहुत ही रोचक मामला हयोग जब इतने चर्चित प्रकरण में दोनों विरोधी पक्षकार प्रधान न्यायाधीश को पीठ में रखे जाने का विरोध कर रहे है। न्यायपालिका को लेकर राजनीतिक जगत में चल रहा विवाद अब पक्षकारों तक भी पहुंचने लगा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 16 November 2018

आरक्षण : मराठा के बाद पाटीदार और जाट चढ़ बैठेंगे

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फणनवीस ने मराठा आरक्षण के लिए संघर्षरत लोगों से आंदोलन स्थगित करने की अपील करते हुए कह दिया कि 1 दिसम्बर को वे जश्न मनाने के लिए तैयार रहें । उनके इस सुझाव को मराठा आरक्षण की घोषणा का पूर्व संकेत समझा जा रहा है । राज्य विधानसभा के आगामी सत्र में तत्संबधी ऐलान की अटकलें तेज हो गई हैं । मराठा समुदाय महाराष्ट्र में वही सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक हैसियत रखता है जो गुजरात में पाटीदार और हरियाणा तथा प. उत्तरप्रदेश में जाटों की कही जा सकती है । आरक्षण की उनकी मांग यूँ तो काफी पुरानी है लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा समुदाय का जबरदस्त दबदबा रहा है जिसका प्रमाण आधा दर्जन से ज्यादा मराठाओं का मुख्यमंत्री बनना है । केंद्र की राजनीति में भी मराठा वर्ग के अनेक नेताओं ने प्रभावशाली भूमिका का निर्वहन किया और आज भी कर रहे हैं । इसी वजह से जब शुरू - शुरू में मराठा आरक्षण की मांग उठी तब उसके औचित्य पर प्रश्न उठाए गए किन्तु आखिरकार राजनीति उसमें घुस गई और फिर पूरा का पूरा आंदोलन वोट बैंक में उलझ गया । ऐसा होते ही कांग्रेस , भाजपा और शिवसेना जैसे प्रमुख दलों ने उस आंदोलन का समर्थन कर दिया लेकिन मराठा मुख्यमंत्रियों के रहते हुए भी वह मांग अधूरी ही रही क्योंकि सर्वोच्च  न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा जो तय कर रखी है और फिर एक जाति या समुदाय को आरक्षण मिलते ही दूसरा दाना - पानी लेकर चढ़ बैठता है । इस वजह से जब देर हुई तब मराठा समाज ने आंदोलन शुरू किया जिससे राज्य में काफी नुकसान हुआ और तनाव भी बढ़ा ।  वर्तमान फणनवीस सरकार पहले भी आंदोलन के जोर पकडऩे पर किसी न किसी तरह का आश्वासन बांटकर आग पर पानी डालती रही किन्तु 2019 में लोकसभा और उसके कुछ महीनों बाद ही राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं । शिवसेना के साथ भाजपा के सम्बंध पहले से ही तनावपूर्ण बने हुए हैं । उद्धव ठाकरे एनडीए से अलग चुनाव लडऩे की घोषणा काफी पहले ही कर चुके थे। लोकसभा चुनाव में मराठा आंदोलन भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकता है । हो सकता है यही सब सोचकर श्री फणनवीस ने  मराठा आरक्षण को मंजूरी देने का मन बना लिया होगा । विधानसभा में वे जो घोषणा करने वाले हैं उससे आंदोलनकारी कितने सन्तुष्ट होंगे ये अभी से कहना कठिन है लेकिन जैसे ही मराठाओं को आरक्षण मिलेगा गुजरात , हरियाणा तथा प.उप्र भी जलने लगेंगे । हरियाणा का पिछला जाट आंदोलन जो यादें छोड़ गया वे आज भी डरा देती हैं । गुजरात के पाटीदार आंदोलन ने तो पूरे देश की राजनीति को प्रभावित कर दिया । चूंकि मराठा , पाटीदार और जाटों का नेतृत्व सम्पन्न लोगों के हाथ है इसलिए वे पलक झपकते ही राज्य की शांति भंग करने की ताकत रखते हैं । महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शायद इसीलिए सतर्क होकर काम कर रहे हैं और हो सकता है उन्हें भाजपा के साथ ही रास्वसंघ की स्वीकृति भी इस बारे में प्राप्त हो गई हो । उल्लेखनीय है श्री फणनवीस नागपुर के ही हैं और संघ से उनके बड़े ही निकट संबंध रहे हैं । ऐसे में वे इतना बड़ा निर्णय अकेले दम पर शायद ही लें । लेकिन महाराष्ट्र में भले ही आग ठंडी पड़ जाए किन्तु उसका असर पड़ोसी गुजरात और फिर हरियाणा , प.उप्र तथा राजस्थान में भी पड़े बिना नहीं रहेगा । ये सवाल भाजपा के सामने आकर खड़ा हो जायेगा कि जब मराठा समुदाय को आरक्षण की सुविधा दी जा सकती है तब पाटीदारों और जाटों को किस आधार पर उससे वंचित रखा जाना चाहिए । स्मरणीय है कि इसी तर्ज पर आंध्र की एक ताकतवर कृषक जाति ने भी कुछ वर्ष पूर्व आरक्षण के लिए हिसंक आंदोलन कर चंद्रबाबू नायडू सरकार की मुसीबतें बढ़ा दी थीं । ये आशंका भी है कि मराठा , पाटीदार और जाट समुदायों को आरक्षण मिलते ही अन्य राज्यों में भी उनकी समकक्ष जातियों द्वारा भी ऐसी ही मांगें उठेंगी । इसके पीछे सामुदायिक कल्याण कम और राजनीतिक महत्वाकांक्षा कहीं ज्यादा है । महाराष्ट्र सरकार यदि मराठा आरक्षण की घोषणा कर देती है तब बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी वाली स्थिति बने बिना नहीं रहेगी और पूरे देश में नए - नए दबाव समूह उभरकर सामने आने लगेंगे तथा बड़ी बात नहीं कि लोकसभा चुनाव आते - आते तक देश एक बार फिर नए सिरे से जातीय हिंसा की आग में घिर जाए । आरक्षण नामक व्यवस्था एक पवित्र उद्देश्य से शुरू की गई थी जिसका उद्देश्य वंचित वर्ग को विकास की दौड़ में आगे लाना था किंतु सियासत के गंदे खेल ने उसे सामाजिक विद्वेष और विघटन का कारण बनाकर रख दिया । इसे लेकर तदर्थ सोच अपनाए जाने का ही दुष्परिणाम है कि आरक्षण अब हनुमान जी की पूंछ की तरह बढ़ता ही जा रहा है । नई - नई जातियां और उपजातियां निकलकर सामने आने लगी हैं जिनके पीछे कोई न कोई राजनीतिक दिमाग जरूर रहता है । महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बेहद सुलझे और समझदार नेता हैं लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वे 1 दिसम्बर को मराठा समाज को जो खुशखबरी देने जा रहे हैं उससे वह पूर्णरूपेण खुश और संतुष्ट हो ही जायेगा । उल्टे महाराष्ट्र की हवा दूसरे राज्यों में भी फैल गई तो देश नई मुसीबत में फंस सकता है  क्योंकि सभी की नजर लोकसभा चुनाव पर जो है । और हमारे देश में चुनाव के समय जो मांगोगे वही मिलेगा का माहौल रहता है ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 15 November 2018

प्रत्याशी चयन : न पवित्रता है न पारदर्शिता


मप्र में विधानसभा चुनाव हेतु प्रत्याशियों की घोषणा होते ही भाजपा और कांग्रेस में बगावत शुरू हो गई। अनेक सीटों पर बागी निर्दलीय बनकर उतर पड़े। नाम वापिसी के अंतिम क्षण तक उनकी मान - मनौवल चली। कुछ माने तो कुछ की नाराजगी बरकरार रही। सबसे ज्यादा बगावत सत्तारूढ़ भाजपा में हुई जिसके लगभग 50 और उसके बाद कांग्रेस के  भी दर्जन भर बागी अंत तक डटे रहे। ये हालात बनते तो सभी चुनावों में रहे किन्तु इस मर्तबा भाजपा में जिस पैमाने पर बगावत देखने मिली वह अभूतपूर्व और अप्रत्याशित कही जा सकती है। अतीत में  भाजपा के वरिष्ठ नेता और संगठन मंत्री नाराज लोगों को मनाकर बिठा दिया करते थे। प्रत्याशी चयन से उत्पन्न असंतोष को दूर करने के लिए सत्ता और संगठन की तरफ  से प्रयास इस बार भी हुए लेकिन चौंकाने वाली बात ये रही कि अधिकतर बागियों ने पार्टी नेताओं को ठेंगा दिखा दिया। कांग्रेस में बगावत अपेक्षाकृत कम जरूर हुई लेकिन सांसद कांतिलाल भूरिया के बेटे के विरुद्ध हुआ विद्रोह जहाँ उल्लेखनीय है वहीं वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने अपने पुत्र को समाजवादी पार्टी से टिकिट दिलवाकर खुलकर उसका प्रचार करने का ऐलान कर दिया। अनेक सीटों पर बगावत तो नजर नहीं आ रही लेकिन भीतरघात किये जाने का अंदेशा बना हुआ है। सोचने वाली बात ये है कि चुनाव के पहले तक जो नेता और कार्यकर्ता पार्टी की नीतियों और सिद्धांतों के लिए हरसंभव त्याग करने की डींगें हांका करते हैं वे ही टिकिट न मिलने पर सब भूलकर इस तरह पेश आने लगते हैं जैसे कि पार्टी से जुडऩे का उनका उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण चुनाव लड़कर विधायक या सांसद बनना मात्र था। नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं की जल्दबाजी तो समझ में आती है क्योंकि उनकी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता पुरानी पीढ़ी जैसी नहीं है। आजकल तो राजनीति को कैरियर के रूप में चुनने का फैशन चल पड़ा है। विशुद्ध पेशेवर शैली में युवक -युवतियां पार्टी में आकर सक्रियता दिखाते हैं और चार -पांच बरस के बाद ही उनकी अपेक्षाएं हिलोरें मारने लगती हैं। जब वे पूरी नहीं होतीं तो उनको पार्टी फिजूल लगने लगती है। पल भर में निष्ठा की जगह निंदा ले लेती है और कल तक वे जिस विचारधारा की पैरवी करते नहीं थकते थे उसी को पानी पी - पीकर कोसने लग जाते हैं। दूसरी पार्टी यदि उन्हें टिकिट दे दे तो वे उसे हासिल करने के लिए भी बिना देर किए तैयार हो जाते  हैं। लेकिन युवा वर्ग की पार्टी भक्ति में कमी पर तो बदलते वक्त का प्रभाव मानकर संतोष किया जा सकता है किंतु जब दो-दो, चार-चार बार के विधायक-सांसद टिकट नहीं मिलने पर कोपभवन में जाकर बैठ जाते हैं तब अचरज भी होता है और दु:ख भी। कई वरिष्ठ नेता अपनी पत्नी और बेटे-बेटी के लिए टिकिट मांगने के लिए अपनी पूरी पुण्याई दांव पर लगाने में भी नहीं शर्माते। मप्र में बागियों को मनाने भी कई ऐसे नेताओं को भेजा गया जो खुद कभी त्याग करने को तैयार नहीं होते। यही वजह है कि कल तक जो कार्यकर्ता उनकी इज्जत करता था, वही उनको खरी-खोटी सुनाते हुए खाली हाथ लौटा देता है। भाजपा में रामकृष्ण कुसमरिया और कांग्रेस में सत्यव्रत चतुर्वेदी की बगावत से साबित हो जाता है कि बड़ी पार्टियों में भी अब ऐसे नेताओं का अभाव हो गया है जिनका सभी सम्मान करते थे। ये स्थिति इसलिए विचारणीय है क्योंकि इस प्रवृति के बढऩे से न केवल  राजनीतिक दलों अपितु राजनीति का बचा - खुचा सम्मान भी खत्म होने को है। दरअसल प्रत्याशी चयन में किसी बड़े नेता का कृपापात्र या परिजन होना एक अनिवार्यता सी बन गई है। योग्यता और वैचारिक प्रतिबद्धता पर चुनाव जीतने की क्षमता भारी पडऩे लगी। चुनावी टिकिट हेतु कोई निश्चत आधार नहीं होने से जिसे देखो वह प्रत्याशी बनने की दौड़ में शामिल हो जाता है। इंदौर में भाजपा ने कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र को तो टिकिट दे दी किन्तु वहाँ की सांसद और लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन के बेटे को ठेंगा दिखा दिया। इसी तरह कांग्रेस में दिग्विजय सिंह अपने भाई , बेटे और भतीजे को कांग्रेस की उम्मीदवारी दिलवाने में कामयाब हो गये जबकि सत्यव्रत चतुर्वेदी की ऐसी ही कोशिश नकार दी गई। ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिनसे ये स्पष्ट होता है कि प्रत्याशी चयन को लेकर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया में न कोई पवित्रता है न ही पारदर्शिता। चयन समिति में बैठे नेता अपने परिवार के साथ ही पिछलग्गुओं को उपकृत करने के फेर में अनेक ऐसे निष्ठावान कार्यकर्ताओं का भविष्य चौपट कर देते हैं जिनमें नेतृत्व प्रतिभा के साथ ही सैद्धान्तिक दृढ़ता और वैचारिक प्रतिबद्धता कूट-कूटकर भरी हुई है।  ये परिदृश्य केवल मप्र का ही नहीं अपितु पूरे देश में देखा जा सकता है। प्रत्येक पार्टी इस बुराई से ग्रसित है। दरअसल राजनीति सेवा करने की बजाय जबसे मेवा खाने का जरिया बन गई है तभी से इस तरह के विवाद सामने आने लगे हैं। छोटी और क्षेत्रीय पार्टियां तो एक - दो नेताओं अथवा परिवारों तक सिमटकर रह गई हैं जिसकी वजह से उनमें आंतरिक लोकतंत्र पूरी तरह विलुप्त हो गया है। बरसों-बरस पसीना बहाने वाले कार्यकर्ता टापते रह जाते हैं और दलबदल कर आए नए - नवेले नेता को टिकिट दे दी जाती है। इसी के चलते विभिन्न दलों के बीच का नीतिगत अंतर मिट गया है। किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करने की हवस ने पहले राजनीति का व्यवसायीकरण किया और अगले चरण में उस पर कुछ लोग विशुद्ध माफिया शैली में काबिज हो गए। बागियों को बिठाने गए तथाकथित बड़े नेताओं को जिस तरह की बातें सुनने मिलीं उसके बाद भी उनकी आंखें नहीं खुलीं तब ये मान लेने में कोई बुराई नहीं होगी कि राजनीति पूरी तरह सिद्धांतविहीन हो चुकी है और विचारधारा को तिलांजलि देकर कुछ लोगों के गिरोह उस पर काबिज हो गए हैं। सवाल ये है कि ऐसे में अच्छे, सुशिक्षित और संभ्रांत लोगों से राजनीति में आने की अपेक्षा करना क्या महज दिखावा नहीं है? कोई भी स्वाभिमानी और सुयोग्य व्यक्ति इस गंदगी में हाथ डालने के लिए भला क्यों तैयार होगा जिसमें उसे महाभ्रष्ट और पदलोलुप नेताओं के चरणचुम्बन हेतु मजबूर किया जावे।

-रवीन्द्र वाजपेयी