Wednesday, 5 December 2018

हिंसात्मक घटनाओं से गौरक्षा के प्रयासों को धक्का

उप्र के बुलंदशहर में गौतस्करी के किसी मामले के बाद थाना जलाने एवं पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या किए जाने का कृत्य घोर निंदनीय है। इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। प्रारंभिक संकेतों के अनुसार बजरंग दल और विहिप के कुछ कार्यकर्ताओं और नेताओं पर सन्देह किया जा रहा है। कुछ को छोड़ अधिकतर आरोपी फरार हैं। गौतस्करी की एक घटना की प्राथमिकी दर्ज करवाने के बाद हुए उत्पात में थाना जलाए जाने और फिर इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या होने से उप्र की राजनीति गर्मा गई है। विपक्ष योगी सरकार की विफलता का हल्ला मचाकर राजनीतिक लाभ लेने का इच्छुक है वहीं भाजपा से कुछ कहते नहीं बन रहा क्योंकि जिन हिन्दू संगठनों के सदस्यों पर इस जघन्य अपराध का आरोप लग रहा है वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उसके सहयोगी ही हैं। ये पहली वारदात नहीं है जब गौतस्करी या गाय की हत्या को लेकर किसी मनुष्य की हत्या हुई हो। लेकिन उल्लेखनीय ये है कि बुलन्दशहर में मृतक कोई अल्पसंख्यक नहीं वरन एक हिन्दू था और वह भी थाने में तैनात पुलिस इंस्पेक्टर। आरोप-प्रत्यारोप के बीच मृतक इंस्पेक्टर की बहन ने पुलिस महकमे पर ही साजिश के तहत अपने भाई की हत्या करवाए जाने का आरोप लगाकर मामले को और संदिग्ध बना दिया। उपद्रव में एक अन्य युवक की मौत भी हो गई जिसके परिजन मारे गए इंस्पेक्टर सुबोध पर उसकी हत्या का आरोप लगा रहे हैं। कुल मिलाकर मामला उलझता जा रहा है। चूंकि अधिकांश आरोपी सत्तारूढ़ दल से जुड़े हुए हैं इसलिए राज्य सरकार भी कुछ कहने के पहले जांच किये जाने की रट लगा रही है। उधर क्षेत्रीय भाजपा विधायक एवं सांसद ने जो बयान दिए उनने आग में घी डालने का काम कर दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं। पूरे प्रकरण का दूसरा पक्ष ये है कि क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय के एक बड़े धार्मिक आयोजन के दौरान बड़े पैमाने पर गौमांस का उपयोग हुआ जिसके लिए गायें काटे जाने का आरोप हिन्दू संगठनों ने लगाया। गौतस्करी के आरोप का आधार भी यही था जिसकी परिणिती हिंसा, आगजनी और हत्या के रूप में हुई। इस समूचे घटनाक्रम के बाद गाय एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है। उप्र की योगी सरकार के साथ ही भाजपा और अन्य हिन्दू संगठन भी आरोपों के घेरे में हैं क्योंकि गाय की रक्षा के नाम पर कुछ लोग जिस तरह कानून अपने हाथ में ले लेते हैं उससे गाय का सकारात्मक पक्ष तो पृष्ठभूमि में चला जाता है और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के साथ ही सांप्रदायिक विद्वेष भी पूरे वातावरण में फैल जाता है। दरअसल गाय को लेकर सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात ये हो गई है कि उसे दुधारू और कृषि उपयोगी पशु की बजाय हिन्दुओं की धार्मिक आस्था से जोड़ दिया गया है जबकि मुस्लिम समाज गाय को भी साधारण पशु मानकर उसका मांस खाने से परहेज नहीं करता। गौपालन और गौसंरक्षण के आर्थिक आधार की बजाय केवल उसके धार्मिक पक्ष को महत्व देने की वजह से ही गाय विवादास्पद होकर रह गई। भाजपा की राज्य सरकारें गौसंवर्धन के नाम पर काफी कुछ कर रही हैं फिर भी देश भर के राजमार्गों पर बैठीं लाखों गायें इस बात का प्रमाण है कि गौपालन और उसकी रक्षा के प्रति समाज में कितनी उदासीनता है। महानगरों को छोड़ भी दें लेकिन छोटे शहरों और कस्बों में सड़कों पर बैठीं गायों के दृश्य आम हैं। कचरे के ढेर में पॉलीथिन खाती गायों को रोकने की फिक्र भी किसी को नहीं है। ये सवाल भी अक्सर उठता है कि जब बैलों से खेती लगभग खत्म होती जा रही है और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछ जाने से बैलगाड़ी भी लुप्त होने को आ गई तब फिर गाय का उपयोग महज एक दुधारू पशु के तौर पर ही है। यद्यपि अब गाय के दूध का औषधीय महत्व प्रचारित होने से कुछ लोग उसके व्यवसायिक उत्पादन के प्रति भी आकर्षित हुए हैं। गाय का दूध और उससे बना घी तथा पनीर वगैरह भैंस के दूध से भी अधिक के दाम पर बिक रहा है। बावजूद इसके शहरों को तो छोड़ भी दें लेकिन अब तो ग्रामीणजन विशेष रूप से किसान भी गाय को लेकर उतने सम्वेदनशील और आकर्षित नहीं रहे जितनी अपेक्षा गौरक्षा के हिमायती करते हैं। यही वजह है कि केंद्र और भाजपा शासन वाले राज्यों तक में गौसंवर्धन और संरक्षण का काम सरकारी ढर्रे और कर्मकांड का हिस्सा बन गया है। गौशालाओं के लिए दिए जाने वाले अनुदान की राशि भी मजाक बनकर रह गई है। बुलन्दशहर का हादसा तो कुछ दिनों बाद विस्मृतियों के धुंधलके में ओझल हो जाएगा लेकिन गाय और उससे जुड़े वे सभी मुद्दे यथास्थिति का शिकार होते रहेंगे जो सन्दर्भित घटना के मूल में थे। गाय के धार्मिक पक्ष का अपना महत्व है लेकिन जब तक उसके आर्थिक महत्व को सही और प्रामाणिक तरीके से समाज के सभी वर्गों के गले नहीं उतारा जाता तब तक इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं होती रहेंगी जो गौसंवर्धन की आवश्यकता और उसके महत्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देती हैं। जो हिन्दू संगठन पूरे देश में गाय के रक्षक बनकर सड़कों पर कूदते-फांदते नजर आते हैं वे जब तक अपनी बात समझाने की बजाय जबरन थोपने की कोशिश करेंगे तब तक बुलंदशहर जैसे हादसे होते रहेंगे। इस वारदात के लिए कौन दोषी था ये तो जाँच से ही स्पष्ट हो सकेगा और शायद न भी हो लेकिन दु:ख का विषय ये है कि इस तरह की घटनाओं से गौरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों को धक्का लगता है ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 4 December 2018

अदालत गवाह और सुबूत पर चलती है जोसेफ साहेब

सर्वोच्च न्यायालय से बीते सप्ताह सेवा निवृत्त हुए न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ  उन चार न्यायाधीशों में से एक थे जिन्होंने गत जनवरी माह में पत्रकार वार्ता के माध्यम से तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध मोर्चा खोलकर सनसनी मचा दी थी। उन चारों में वरिष्ठतम श्री चेलमेश्वर पहले ही निवृत्त हो चुके हैं और न्यायमूर्ति श्री लोकुर इसी महीने निवृत्त हो जाएंगे। चौथे श्री रंजन गोगोई वर्तमान में प्रधान न्यायाधीश हैं। उनकी सेवा निवृत्ति में अभी एक वर्ष है। पद मुक्त होने के बाद श्री चेलमेश्वर ने विभिन्न समारोहों में देश की न्याय व्यवस्था, अभिव्यक्ति की आज़ादी और ऐसे ही कुछ मुद्दों पर जिस तरह की टिप्पणियां कीं उससे लगा कि श्री मिश्रा के विरुद्ध पैदा हुई खुन्नस कम नहीं हुई। लेकिन श्री जोसेफ  ने तो पद से हटते ही जो तेवर दिखाए उनसे ऐसा लगता है कि वे अभी भी लडऩे के मूड में हैं। बीते दो दिनों में उन्होंने श्री मिश्रा पर जो आरोप लगाए वे थे तो लगभग पुराने लेकिन गत दिवस दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने ये कहकर सुर्खियां बटोरने का प्रयास किया कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश किसी बाहरी स्रोत के प्रभाव में थे जो उन्हें रिमोट कंट्रोल से संचालित कर रहा था। लेकिन ज्यादा कुरेदे जाने के बाद भी श्री जोसफ ने उस स्रोत का ब्यौरा देने से इंकार कर दिया। किसी खास मामले पर इसके प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर भी उन्होंने क्षमा मांगते हुए इसके आगे कुछ बताने से इंकार कर दिया। बहरहाल ये जरूर कहा कि पत्रकार वार्ता के बाद सर्वोच्च न्यायालय की कार्यप्रणाली में सकारात्मक सुधार हुआ। बाहरी स्रोत के बारे में किसी भी जानकारी देने से परहेज करते हुए श्री जोसेफ ने कहा कि पत्रकार वार्ता में चुनिंदा मामलों के आवंटन का प्रश्न उसी से जुड़ा हुआ था। ये पहला अवसर है जब सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश पर रिमोट कंट्रोल से संचालित बाहरी प्रभाव में काम करने जैसा आरोप उन्हीं के सहयोगी रहे न्यायाधीश ने लगाया है। अत: इसे केवल बौद्धिक चर्चा तक सीमित रखकर उपेक्षित करना उचित नहीं होगा। श्री जोसेफ  ने जो आरोप लगाया वह बेहद गंभीर है क्योंकि देश के प्रधान न्यायाधीश पर बाहरी स्रोत से संचालित होने जैसी बात कोई अन्य कहता तब उसे गैर जिम्मेदाराना मानकर उस पर अदालत की अवमानना का प्रकरण बन सकता था किन्तु श्री मिश्रा के साथ काम करने वाले एक न्यायाधीश ने जो आरोप लगाया वह समूची न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। देश के प्रधान न्यायाधीश पर  रिमोट कंट्रोल से संचालित होने जैसा आरोप यदि सर्वोच्च न्यायालय का ही एक पूर्व न्यायाधीश लगाए तब उसे उसकी खीझ मानकर हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। भले ही श्री जोसेफ  ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश के विरुद्ध ऐलानिया बगावत की हो लेकिन उनकी योग्यता और वरिष्ठता को देखते हुए उनके आरोप की जांच होनी चाहिए क्योंकि सर्वोच्च का प्रधान न्यायाधीश ही यदि रिमोट कंट्रोल के नियंत्रण में हो तब निचले स्तर पर क्या होता होगा इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। बड़े-बड़े वकील तक किसी याचिका को पेश करने के पहले जब पीठ बदलने तक रुकने की बात कहते हैं तब मन में सन्देह उत्पन्न होता है। आज के दौर में ये कहने में भी कोई संकोच नहीं होता कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार के विषाणु प्रविष्ट हो चुके हैं लेकिन ये पहला मौका होगा जब न्याय की सर्वोच्च आसंदी पर बैठ चुका व्यक्ति ही उसके मुखिया की निष्पक्षता और न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधे-सीधे आरोप लगा रहा है। लेकिन अब श्री जोसेफ  पर भी अपने आरोप की सच्चाई को साबित करने का नैतिक दबाव आ गया  है। वे केवल ये कहकर नहीं बच सकते कि इसके आगे नहीं बढऩा चाहता। पूरी उम्र अदालत में गुजारने के बाद उन्हें ये बताना या समझाना तो धृष्टता होगी कि न्याय प्रक्रिया गवाह और सुबूत पर आश्रित होती है और महज आरोप लगाने मात्र से कोई दोषी नहीं माना जा सकता। दंड प्रक्रिया तो बिना साक्ष्य और प्रमाण के एक कदम आगे नहीं बढ़ सकती। उस आधार पर श्री जोसेफ  का कर्तव्य बनता है कि वे उस कथित बाहरी स्रोत को उजागर करें जो रिमोट कंट्रोल से तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पर प्रभाव डालता था। उन्हें उन मामलों का भी खुलासा करना चाहिए जो उस बाहरी दबाव से प्रभावित हुए। यदि वे ऐसा नहीं करते तब उन पर भी ये पलटवार हो सकता है कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश के विरुद्ध छेड़ा गया अभियान भी किसी बाहरी प्रभाव से संचालित हो रहा था। न्यायपालिका और न्यायाधीशों पर उंगलियां पहले भी उठी हैं। सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसले न्यायविदों तो क्या आम जनता तक के गले नहीं उतरे। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय से चंद रोज पहले निवृत्त हुए न्यायाधीश द्वारा पूर्व प्रधान न्यायाधीश पर रिमोट कंट्रोल से संचालित बाहरी प्रभाव के अंतर्गत काम करने का आरोप लगाया जाना झकझोर देने वाला है। उचित होगा यदि वर्तमान प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई खुद होकर इसका संज्ञान लें और श्री जोसेफ  से उनके आरोप को साबित करने कहें। ऐसा करना इसलिये जरूरी है क्योंकि श्री गोगोई भी उन चार न्यायाधीशों में शरीक थे जिन्होंने पद पर रहते हुए ही तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश की कार्यप्रणाली पर आक्षेप लगाकर पूरे देश को हिला दिया था। इसके पहले कि कोई और श्री जोसफ  पर रिमोट कंट्रोल से संचालित बाहरी प्रभाव में श्री दीपक मिश्रा को निराधार कठघरे में खड़ा करने का आरोप लगाए, उन्हें आपने आरोप के पक्ष में प्रमाण देना चाहिए। वरना राजनीति की तरह ही  इस तरह के हवाई आरोप - प्रत्यारोप न्यायपालिका में भी शुरू हो जाएंगे और वह स्थिति किसी भी दृष्टि से अच्छी नहीं होगी ।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 December 2018

चुनाव आयोग अपनी कमियां भी देखे

मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने सेवा निवृत्त होते ही नोटबन्दी को विफल बताते हुए कहा कि चुनावों के दौरान जप्त होने वाला काला धन इसका प्रमाण है। उन्होंने ये भी कहा कि उच्चस्तरीय स्रोतों से इसकी आवक होती है। यद्यपि उन्होंने ये नहीं बताया कि ये उच्चस्तरीय स्रोत क्या हैं? ये भी उल्लेखनीय है कि देश के वरिष्ठ नौकरशाह श्री रावत ने चुनाव आयोग के मुखिया रहते हुए नोटबन्दी और काले धन की चर्चा कभी नहीं की। वैसे भी हमारे देश में पद से हटने के उपरांत ही नेताओं और नौकरशाहों को दिव्यज्ञान प्राप्त होता है। उस दृष्टि से श्री रावत ने कोई अनोखा काम नहीं किया किन्तु अब जब वे पदमुक्त हो चुके हैं तब उन्हें निष्पक्ष और निडर होकर उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग द्वारा जप्त किये गए काले धन के बारे में विस्तृत जानकारी देश के साथ बांटना चाहिए। हर चुनाव में काला धन पकड़े जाने की खबरें सुर्खियां बनती हैं। लेकिन आज तक देश को नहीं पता कि उन मामलों में किसको कितनी सजा मिली? नोटबन्दी के बाद ही उप्र में विधानसभा चुनाव हुए थे। उस दौरान वहां बड़ी मात्रा में काला धन पकड़ा गया था लेकिन आज तक चुनाव आयोग, पुलिस अथवा आयकर विभाग ये नहीं बता सका कि उसका मूल स्रोत क्या था? और शायद बता भी नहीं पायेगा। ऐसे में ये प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है कि आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद काले धन का उपयोग यदि कम नहीं हो पा रहा तब इस समस्या का इलाज क्या है? गत 28 नवम्बर को सम्पन्न हुए मप्र विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा खर्च के जो आंकड़े प्रस्तुत किये गए वे पूर्णत: अवास्तविक हैं। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि तीन-चार  लाख रु. में भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवार ने चुनाव लड़ा होगा? चुनाव आयोग की सख्ती के बाद भले ही मैदानी प्रचार में कमी नजऱ आती हो किन्तु वास्तविकता ये है कि चुनाव में काले धन का उपयोग बेरहमी से होता है। श्री रावत सेवा निवृत्ति के बाद इस बारे में अपने अनुभव यदि सार्वजनिक कर सकें तो ये लोकतंत्र के लिए अच्छा होगा। यद्यपि आजकल नौकरशाहों के मुंह में भी सियासत का खून लग चुका है। शासकीय सेवा से निवृत्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होकर या तो वे चुनाव लड़ लेते हैं अथवा सत्ता प्रतिष्ठान के नजदीक रहकर कुछ न कुछ हथिया लेते हैं। टीएन शेषन के बाद देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बने एमएस गिल तो सेवा निवृत्त होने के  बाद कांग्रेस में सम्मिलित होकर मनमोहन सरकार में राज्यमंत्री बन गए और वह भी अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण विभाग के। उस दृष्टि से श्री रावत भी यदि मन में कोई महत्वाकांक्षा पालकर बैठें हों तब किसी को आश्चर्य नहीं होगा। सेवा निवृत्त होते ही उन्होंने यदि चुनाव में काले धन के बेधड़क उपयोग पर चिंता व्यक्त की होती तब उसे सामान्य प्रतिक्रिया मानकर चला जा सकता था लेकिन उन्होंने नोटबन्दी को विफल बताकऱ ये संकेत दे दिया कि वे किसी न किसी राजनीतिक उद्देश्य के प्रति आकर्षित हैं। सच बात तो ये है कि चुनाव में काले धन  का उपयोग रोकने में अब तक किये गये तमाम प्रयास सतही तौर पर भले ही असरकारक दिखे हों लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट है। ऊपरी तौर पर चुनावी तामझाम पर आयोग की सख्ती का असर दिखता हो पर वास्तविकता इससे बहुत हटकर है। पैसा, शराब और अन्य उपहार पहले से ज्यादा बंटते हैं। झंडे-बैनर का खर्च बेशक कम हुआ तथा दीवारें रंगने पर भी रोक लग गई लेकिन दूसरे खर्च बेतहाशा बढ़ गए। श्री रावत का ये कथन अपनी जगह सत्य है कि चुनाव के दौरान बड़ी मात्रा में काला धन जप्त होता है किंतु इसे नोटबन्दी की विफलता बताकऱ चुनाव आयोग अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता। ज्यादा बेहतर होता यदि निवृत्ति के अवसर पर श्री रावत स्वीकार करते कि हर तरह की सख्ती के बावजूद चुनाव आयोग काले धन के उपयोग को नहीं रोक सका। और इसकी वजह उसके द्वारा की गई अनावश्यक कड़ाई भी है जिसने चुनाव को काफी हद तक नीरस बना दिया। खर्च संबंधी बंदिशों का असर मात्र इतना हुआ कि जो पैसा खुलकर लुटाया जाता था वह पर्दे के पीछे खर्च होने लगा है। अखबारी विज्ञापनों पर आयोग ने नियंत्रण किया तो पेड न्यूज नामक बुराई ने जन्म ले लिया। पहले बड़े बड़े नेताओं का आगमन रेल और सड़क मार्ग से होता था लेकिन आजकल तो छुटभैये नेता तक हेलीकॉप्टर से आते-जाते हैं। आम सभाओं के आयोजन पर जितना खर्च होता था उससे कहीं ज्यादा होटलों में आयोजित गोष्ठियों में होता है। आचार संहिता के चलते नेताओं को सरकारी विश्रामगृहों की जगह होटलों में ठहराया जाने लगा है। कुल मिलाकर चुनाव में होने वाला खर्च नाम के लिए कम हो गया हो किन्तु हर चुनाव पहले से महंगा होता जा रहा है। मप्र में जबलपुर संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आठ विधानसभा  सीटों पर लड़े सभी प्रत्याशियों ने खर्च के जो आंकड़े पेश किये उनसे अधिक तो प्रशासन ने मतदान बढ़ाने के लिए कराए प्रचार में व्यय कर दिए। सच्चाई ये है कि चुनाव को कम खर्चीला बनाने के सारे प्रयास विफल हुए हैं। चुनाव आयोग को खुले मन से  स्वीकार करना चाहिए कि वह सख्ती के नाम पर कई ऐसे अव्यवहारिक फैसले लेता है जिन पर अमल कर पाना तकरीबन असम्भव है। बेहतर होगा यदि श्री रावत मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ-साथ बतौर प्रशासनिक अधिकारी प्राप्त अनुभवों के आधार पर ये बताते कि चुनाव आयोग चुनाव प्रक्रिया में वांछित सुधार के साथ ही चुनावी खर्च को लेकर बजाय इकतरफा अव्यवहारिक फैसलों के ऐसा कुछ करे जिसका असर हो सके। चुनाव और काला धन दोनों समानार्थी हो चले हैं लेकिन खर्च जिस मात्रा में बढ़ रहा है उसमें कमी करने की बजाय आयोग इधर-उधर की बातों को उठाकर बेवजह की बहस को जन्म दे उसकी बजाय उसे इस हकीकत को समझना चाहिए कि काले धन के उपयोग को रोकने में  यदि वह विफल रहा है तो उसके लिए उसके अपने निर्णय भी कम जिम्मेदार नहीं हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 December 2018

किसान आंदोलन : नेताओं की नजर वोटों की फसल पर

गत दिवस दिल्ली में कर्ज माफी को लेकर हजारों किसान एकत्र हुए। किसान मुक्ति मार्च नामक इस आयोजन में 24 राज्यों के 35 हजार किसानों के जमा होने का दावा किया गया। इसके पीछे वैसे तो अनेक किसान संगठन थे किन्तु असली ताकत दिखाई वामपंथी संगठनों ने। इस तरह के आंदोलन अन्य राज्यों में पहले भी होते रहे हैं। महाराष्ट्र में भी हजारों किसानों ने मुंबई कूच करते हुए राज्य सरकार के समक्ष अपनी मांगें रखीं जिनमें से कुछ तो तत्काल स्वीकार हो गईं तो कुछ के लिए सरकार ने समय ले लिया। अनेक राज्यों में किसान आंदोलन हिंसक भी हुआ। मप्र का मंदसौर इसका उदाहरण है। हालाँकि सभी राजनीतिक दल और केंद्र तथा राज्यों की सरकारें किसानों के हित में नीतियां बनाने का दावा करती हैं और खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने की कसमें खाते नहीं थकतीं लेकिन वस्तुस्थिति ये है कि कृषिप्रधान भारत में किसान आत्महत्या करने को यदि मजबूर हो रहा है तो ये गंभीर चिंता का विषय है। गत दिवस जो शक्तिप्रदर्शन दिल्ली में हुआ वह संख्या के लिहाज से उतना महत्वूपर्ण नहीं था जितना इस बात से कि किसानों के नाम पर मंच लूटने के लिए राहुल गांधी, योगेंद्र यादव, अरविंद केजरीवाल और सीताराम येचुरी के अलावा बड़ी संख्या में विपक्षी नेता पहुंच गए। सभी ने किसानों के प्रति हमदर्दी और समर्थन व्यक्त करते हुए उनके कर्ज माफ  करने और फसलों का सही मूल्य दिलवाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाया। राहुल ने किसानों की भीड़ को अम्बानी और अडानी के साथ रफैल सौदे से जुड़ी बातें सुनाकर उनका ज्ञानवर्धन करने की कोशिश की तो वहीं श्री केजरीवाल और श्री येचुरी ने अपने ढंग से सरकार को सुझाव भी दिए और घेरा भी। किसानों के लिए काम करने वाले योगेंद्र यादव और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर ने भी किसानों की समस्याओं का बखान करते हुए सरकार पर हमले किये। इस पूरी कवायद में किसानों का अपना नेतृत्व और मुद्दा तो गौण होकर रह गया और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी मोर्चेबंदी की कोशिश उभरकर सामने आ गई। ये पहला मौका नहीं है जब किसानों के लिए शुरू की गई लड़ाई सियासत के मकडज़ाल में उलझकर रह गई हो। 1952 से लेकर अब तक हुए हर चुनाव में किसान और गांव की बेहतरी के आश्वासन दिए जाते रहे। चौ. चरण सिंह और देवगौड़ा तो स्वयं को किसान ही कहते थे। संसद के दोनों सदनों में हमेशा ग्रामीण पृष्ठभूमि के सदस्यों की पर्याप्त उपस्थिति रही है। किसानों और ग्रामीण समस्याओं को लेकर लम्बे लम्बे भाषण होते रहे हैं। हर बजट में किसान और गांव पर ध्यान देने के दावे भी हुए न ग्रामीण विकास का लक्ष्य पूरा हुआ और न ही किसान के चेहरे पर मुस्कुराहट आ सकी। यद्यपि कभी-कभी विरोधाभासी चित्र भी उभरता है किंतु ये कहने में कुछ भी अनुचित नहीं होगा कि किसान परेशान है। फसल न हो तो फंाकेमस्ती और ज्यादा हो जाये तो कीमतों में गिरावट से उसकी कमर टूट जाती है। हालांकि शहरों जैसी जीवनशैली और सुख-सुविधाएं हासिल करने की कोशिश भी इसका एक कारण है किंतु इस सच्चाई से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि व्यवसाय से उद्योग की शक्ल लेते-लेते कृषि घाटे का धंधा बन गई। उन्नत खेती के फेर में किसान कर्ज में डूबने लगा। परंपरागत खेती का अर्थशास्त्र भूलकर वह कृषि वैज्ञानिकों के साथ -साथ खाद , बीज और उपकरणों के व्यापारियों के जाल में उलझता गया। साहूकार के पठानी ब्याज से मुक्ति मिली तो बैंकों का कर्ज चढ़ गया। शासकीय योजनाओं से खेती और किसानों के लिए आने वाली मदद नौकरशाही के मकडज़ाल में फंसकर औने-पौने हो जाती है। ये सब हर कोई जानता समझता है। नेता, बुद्धिजीवी, कवि, शायर, चिंतक, विचारक, राजनेता, सभी किसानों के लिए सम्वेदनशील हैं किन्तु किसान के पास उसका कोई प्रामाणिक और ईमानदार नेतृत्व नहीं होने से उसकी समस्याओं का समाधान तो होता नहीं उल्टा वह राजनीतिक रस्साकशी में फंसकर रह जाता है। कभी महेंद्र सिंह टिकैत तो कभी चौ. देवीलाल उसे मूर्ख बनाकर अपना महिमामंडन करने में सफल हो जाते हैं। कल जो प्रदर्शन राजधानी में हुआ उसके साथ न तो कोई नई मांग जुड़ी और न कोई ऐसा नया चेहरा उभरकर सामने आया जो चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर किसानों के हित के लिए लड़े। यदि लोकसभा चुनाव सिर पर न होते तब न राहुल  आते और न श्री येचुरी और श्री केजरीवाल। पता नहीं किसान कब इस खेल को समझेंगे? राजनेता यदि उनके शुभचिंतक होते तो वे इस तरह खून के आंसू रोने मजबूर ही क्यों होते? कल श्री येचुरी ने सरकार बदलने की धमकी भी दे डाली। आजकल राहुल गांधी चुनाव वाले राज्य में किसानों के कर्ज माफ  करने का आश्वासन देते फिर रहे हैं वहीं कोई और पार्टी बिना ब्याज के उन्हें कर्ज देने का वायदा बांट रही है किन्तु इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है कि आखिर किसान कर्ज लेने को बाध्य होता ही क्यों है और उसे चुकाने में असमर्थ क्यों रहता है? कड़वा सच तो यही है कि किसी भी दल के हों राजनेताओं की नजर केवल और केवल वोट पर रहती है। किसानों के लिए घडिय़ाली आंसू बहाने के पीछे भी उनका उद्देश्य किसान वोट बैंक रूपी फसल काटना मात्र है। जब तक किसानों का अपना गैर राजनीतिक नेतृत्व विकसित नहीं होगा तब तक वे इसी तरह भटकते रहेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी