Monday, 10 December 2018

कल दोपहर तक देश की राजनीतिक दिशा तय हो जाएगी

कल 11 दिसम्बर का दिन देश के  राजनीतिक भविष्य के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण होगा। दोपहर तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित हो जाएंगे। इनमें मिज़ोरम, तेलंगाना, मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान शामिल हैं। मिज़ोरम उत्तर पूर्व का छोटा सा राज्य है जिसके चुनाव को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी अपेक्षित थी क्योंकि यहां की राजनीति देश की मुख्यधारा से सर्वथा पृथक और उलझी हुई होने से लोग उसके बारे में अधिक नहीं जानते। यद्यपि ये बहुत बड़ी विडंबना है किंतु कड़वी हकीकत भी। शेष चार राज्यों पर नजर डालें तो पांच साल पूर्व अस्तित्व में आये तेलंगाना में अभी तक टीआरएस नामक क्षेत्रीय दल का एकाधिकार सरीखा बना हुआ था। इसके मुखिया के. चन्द्रशेखर राव ने चूंकि आंध्र से अलग तेलंगाना राज्य बनाये जाने को लेकर अनवरत संघर्ष किया था इसलिये नया राज्य बनने पर स्वाभाविक रूप से सत्ता उनके पास आ गई। 2014 में लोकसभा के साथ ही तेलंगाना के भी चुनाव हुए थे लेकिन श्री राव ने विधानसभा पहले ही भंग करवाकर चुनाव का दांव खेल दिया। पहले उम्मीद थी कि वे भाजपा से गठजोड़ करेंगे जो नहीं हुआ लेकिन आंध्र में सत्तारूढ़ तेलुगु देशम पार्टी के सर्वेसर्वा चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर दक्षिण की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू कर दिया। केंद्र की मोदी सरकार से अलग होने के बाद उन्होंने एनडीए से भी नाता तोड़कर कांग्रेस से हाथ मिला लिया जिसके पीछे कोई सिद्धांत न होकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह से खुन्नस निकालना मात्र ही प्रमुख है क्योंकि आंध्र की प्रस्तावित  नई राजधानी अमरावती के लिए धनराशि देने के अलावा आंध्र को विशेष पैकेज देने में केंद्र द्वारा अनाकानी करने किये जाने से चंद्रबाबू भन्नाये हुए थे। उधर भाजपा को भी लग रहा था कि तेलुगु देशम का चरित्र चूंकि कांग्रेस विरोधी रहा है इसलिए वह एनडीए  नहीं छोड़ेगी लेकिन श्री नायडू ने भाजपा को झटका देते हुए पहले तो अन्य विपक्षी दलों से बात आगे बढ़ाई और फिर तेलंगाना में कांग्रेस से गठबंधन बनाकर दक्षिण के प्रवेश द्वार पर भाजपा के लिए अवरोध खड़े करने का फैसला कर दिया। तेलंगाना को लेकर जो अनुमान लगाए जा रहे हैं उनके अनुसार तो टीआरएस सत्ता में वापिस आ रही है और उसके बाद लोकसभा में वह एनडीए से हाथ मिला सकती है क्योंकि अब उसका कांग्रेस के साथ जाना असम्भव हो जाएगा। ये भी संभव है कि वह लोकसभा में भी अकेली उतरे और चुनाव बाद की परस्थितियों के अनुसार निर्णय करे किन्तु इतना अवश्य है कि चंद्रबाबू के चले जाने से भाजपा ने एक मजबूत साथी खो दिया जो बेहद अनुभवी और लोकप्रिय भी है। यदि चंद्रशेखर राव ने एनडीए का दामन पकड़ा जैसा वे अतीत में कर चुके हैं तब भी वे दक्षिण में राजनीतिक समीकरण के लिहाज से भाजपा के लिए कितने फायदेमंद रहेंगे यह कल दोपहर तक स्पष्ट हो जाएगा। उनकी सरकार यदि अच्छे बहुमत से लौटी तब तो श्री राव भी एक क्षेत्रीय छत्रप बनेंगे वरना वे केवल अपने राज्य तक सीमित रहेंगे। इसीलिए तेलंगाना का चुनाव परिणाम राष्ट्रीय राजनीति को अपने ढंग से प्रभावित करेगा। लेकिन भाजपा और कांग्रेस के लिए जीवन मरण का प्रश्न मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान हैं जहां इनके बीच लगभग सीधा मुकाबला है। हालांकि बसपा और सपा ने अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है किंतु वह आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ सौदेबाजी करने के लिए चली गई चाल से ज्यादा कुछ भी नहीं। भाजपा इसमें अपने लिए अनुकूलता देख रही है। दलित मतों के बंटवारे से कांग्रेस को होने वाले संभावित नुकसान से भाजपा को शुरुवात में जो खुशी थी वह यद्यपि एग्जिट पोल के बाद कम हुई है लेकिन इतना तो तय था कि अगर बसपा और सपा कांग्रेस से गठबंधन कर लेते तब भाजपा का सफाया हो जाता। ऐसा न होने के पीछे भी आगामी  लोकसभा चुनाव ही हैं। चूंकि बसपा और सपा दोनों का प्रभावक्षेत्र मुख्यरूप से उप्र ही है और भाजपा तथा कांग्रेस दोनों का भविष्य उसी राज्य पर टिका है इसलिए उक्त पार्टियों ने अपने पत्ते फिलहाल छिपाकर रखने का निर्णय कर तीनों राज्यों में अकेले लडऩे का साहस जुटाया। हालांकि इसके लिए मायावती और अखिलेश यादव दोनों ने सीधे-सीधे कांग्रेस और राहुल गाँधी को जिम्मेदार ठहराकर ये संकेत भी दे दिया कि उसे राष्ट्रीय पार्टी होने का अतिरिक्त लाभ देने को राजी नहीं हैं और जो भी समझौता होगा वह उप्र में कांग्रेस की जमीनी हैसियत के मुताबिक होगा। माया और अखिलेश दोनों जानते हैं कि यदि उन्होंने उम्मीदवार उतारे तब रायबरेली और अमेठी की पुश्तैनी सीटें भी कांग्रेस बचा नहीं सकेगी। ऐसी स्थिति में इन तीन राज्यों में उसके प्रदर्शन पर उत्तर भारत का विपक्षी गठबंधन निर्भर करेगा। अगर कांग्रेस ने तीनों जीत लिए तब राहुल गांधी पक्के तौर पर अपनी शर्तों पर  सौदेबाजी करने में सक्षम होंगे अन्यथा माया और अखिलेश उन्हें घास न डालने जैसी हिमाकत भी कर सकते हैं। कांग्रेस केवल राजस्थान जीती तब भी कांग्रेस की वजनदारी उतनी नहीं बढ़ेगी। इसी तरह भाजपा के लिए तो ये तीनों राज्य उसके भविष्य के साथ ही नरेंद्र मोदी के सियासी अस्तित्व से जुड़ गए हैं। तीनों में हार से लोकसभा चुनाव के पहले ही मोदी और अमित शाह की जिताऊ क्षमता और कार्यप्रणाली पर घर के भीतर से ही सवाल उठेंगे और जिन लोगों को किनारे बिठा रखा गया है वे मुखरित हो उठेंगे। इसके प्रारंभिक संकेत मप्र में बाबूलाल गौर और रघुनंदन शर्मा जैसे वरिष्ठ नेताओं के ताजा बयान हैं। लेकिन जैसा शुरू से लग रहा है यदि भाजपा राजस्थान में पराजित होने के बावजूद मप्र और छत्तीसगढ़ में सरकार बचा ले गई तब राजस्थान की हार को वसुंधरा राजे के मत्थे मढ़कर मोदी मैजिक जारी रहने का ढोल पीटना शुरू हो जाएगा। वैसे इन चुनावों ने भाजपा की कई खुशफहमियां तोड़ी हैं। मतदाता को बंधुआ समझ बैठने की जो मूर्खता कांग्रेस को ले डूबी उसे दोहराने की कोशिश में भाजपा ने अपने परंपरागत समर्थकों की सहानुभूति और समर्थन दोनों खोए। यदि ऐसा नहीं होता तब कम से कम मप्र और छत्तीसगढ़ में उसका आत्मविश्वास डगमगाया नहीं होता। कल दोपहर तक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। मिज़ोरम और तेलंगाना को अलग रखकर केवल मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणामों से आगामी लोकसभा में भाजपा और कांग्रेस दोनों का भाग्य तो तय होगा ही साथ में देश की राजनीतिक दिशा भी स्पष्ट हो जाएगी। किसान लॉबी के बढ़ते दबाव और राममंदिर को लेकर संघ और संत समाज के उग्र तेवर भावी केन्द्र सरकार की छाती पर मूंग दलने का कारण बनेंगे। और उसके लिए क्रमश: कांग्रेस और भाजपा ही जिम्मेदार होंगे जिन्होंने आसमानी वायदे करते हुए उम्मीदों के पहाड़ खड़े कर दिए हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 December 2018

एग्जिट पोल : नतीजे न सही संकेत तो हैं

एग्जिट पोल करने वाली एजेंसियां और उनका प्रसारण करने वाले टीवी चैनल बीच - बीच में ये बताते रहते हैं कि उनके निष्कर्ष केवल संकेत हैं परिणाम नहीं। अतीत में चूंकि कई मर्तबा ये पोल सिरे से गलत साबित हो चुके हैं इसलिए राजनीतिक दल भी उन्हें पूरी तरह स्वीकार कर लेने में हिचकिचाते हैं। बावजूद इसके गत दिवस पांच राज्यों के जो चुनाव परिणाम आए उनके मुताबिक मप्र, और छत्तीसगढ़ में जहां कांग्रेस भाजपा से सत्ता छीन सकती है वहीं राजस्थान में उसकी जीत सन्देह से परे है। मिज़ोरम का राष्ट्रीय राजनीति में उतना महत्व नहीं है लेकिन तेलंगाना में कांग्रेस ने तेलुगू देशम से गठबंधन बनाकर भाजपा की राह में अवरोध उत्पन्न कर दिया है जो इस राज्य में मुख्य विपक्षी दल बनने की आकांक्षा पालकर बैठ गई थी। लेकिन वहां भाजपा का पिछडऩा चर्चा का वैसा विषय नहीं बनेगा जैसा कि उसके शासन वाले तीन राज्यों में कांग्रेस के तेजी से उभरना बन गया। यद्यपि  एग्जिट पोल में कुछ प्रतिशत की घट-बढ़ परिणाम को पूरी तरह उलट सकती है जैसा बिहार और उप्र के गत विधानसभा चुनाव में देखा जा चुका है और उसी आधार पर भाजपा के रणनीतिकार अभी भी इस उम्मीद में डूबे हैं कि अंतत: मप्र, छत्तीसगढ़ का मतदाता सत्ता की चाबी एक बार फिर भाजपा को सौंप देगा वहीं राजस्थान को लेकर उसे लगता है कि प्रधानमंत्री की सभाओं में उमड़ा जनसैलाब इस बात का संकेत है कि भले ही सत्ता चली जाए लेकिन राजस्थान में पार्टी का वैसा सूपड़ा साफ नहीं होगा जैसा चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में बताया गया था। मान लिया जावे कि भाजपा का आशावाद सही साबित होगा फिर भी मप्र-छत्तीसगढ़ में 15 और राजस्थान में 5 साल की सत्ता के बाद भी यदि वह कांग्रेस को हॉशिये से बाहर नहीं कर सकी तब नरेंद्र मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत जैसे नारे का तो कोई अर्थ ही नहीं रह जायेगा। कल्पना के तौर पर ये सोच लिया जावे कि भाजपा अपनी तीनों सरकारें बचा ले जाएगी तो भी यदि उसकी ताकत घटती और कांग्रेस की सीटें बढ़ती हैं तो उस सूरत में भी पार्टी के लिए  शर्मनाक स्थिति होगी जो 2019 में केंद्र की सत्ता में वापिसी का सपना संजोए हुए है। एक कैडर आधारित पार्टी के प्रति उसके समर्थकों में इतनी जल्दी असंतोष का पनपना ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वह उन आकांक्षाओं को पूरा करने में बुरी तरह विफल रही है जिनके कारण वह सत्ता तक पहुंची थी। इस हालत के लिए केंद्र सरकार ज्यादा उत्तरदायी है या सम्बंधित राज्यों के सत्ताधीश , इसे लेकर तो बहस चल सकती है किंतु निष्कर्ष तो यही निकलेगा कि भाजपा कसौटी पर खरी साबित नहीं हो सकी। तीन राज्यों में यदि वह दो भी जीत लेगी तब तो उसके पास मुंह छिपाने की जगह रहेगी वरना ये मान लेना पड़ेगा कि सत्ता सुंदरी के सान्निध्य ने भाजपा को भी उसी रास्ते पर धकेल दिया जिस पर चलकर कांग्रेस के लिए अस्तित्व का खतरा उत्पन्न हो गया। अभी मतगणना के लिए दो दिन और शेष हैं। इस अवधि में चुनाव अभियान और एग्जिट पोल को लेकर सभी संबंधित पक्ष अपने-अपने ढंग से विचार करेंगे लेकिन भाजपा की नींद तो इससे गायब हो ही गई होगी। कांग्रेस के पास चूंकि खोने की लिए कुछ भी नहीं था इसलिए वह पूरी तरह बेफिक्र होकर लड़ी जबकि सत्ता बचाने का दबाव भाजपा पर खुलकर महसूस किया जा सकता था। छत्तीसगढ़ तो खैर , छोटा सा राज्य है इसलिए वहां कांटे की टक्कर से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन अजीत जोगी और बसपा का गठबंधन होने के बावजूद भाजपा यदि कोहनी के बल चलकर सत्ता तक पहुंच गई तब भी ये उसके लिए लज्जास्पद ही रहेगा। जहां तक मप्र का सवाल है तो चुनाव के कुछ महीने पहले तक कांग्रेस के पुनरुत्थान की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी किन्तु सवर्ण आंदोलन के बाद भाजपा जिस तरह रक्षात्मक हुई उसने उसकी सम्भावनाओं पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए। अंतिम परिणाम क्या होगा इसे लेकर यदि अभी कोई  निष्कर्ष न भी निकाला जाए तब भी ये तो कहना ही पड़ेगा कि कांग्रेस ने अपनी स्थिति में जबरदस्त सुधार करते हुए भाजपा के मजबूत गढ़ों की दीवारों को इतना क्षतिग्रस्त तो कर ही दिया है कि वे जरा से धक्के मात्र से भरभराकर गिर सकती हैं। इसका सीधा-सीधा अर्थ ये है कि भाजपा ने सत्ता में रहते हुए अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को कहीं न कहीं निराश किया होगा। वरना आज उसकी जीत पर इस तरह संदेह के बादल न मंडरा रहे होते। पता नहीं अमित शाह से लेकर उक्त तीन राज्यों में सत्ता और संगठन में कुंडली मारकर बैठे भाजपाई क्षत्रपों ने एग्जिट पोल का कितना संज्ञान लिया किन्तु एक बात बिना संकोच के कही जा सकती है कि कांग्रेस का इस तरह का उभार भी भाजपा की नैतिक हार है। कहावत है जीत के हज़ार बाप होते हैं जबकि हार हमेशा अनाथ होती है। उस दृष्टि से कांग्रेस में जहां जीत का सेहरा बंधवाने के लिए कई सिर आगे आ जाएंगे वहीं भाजपा में सत्ता और संगठन दोनों एक दूसरे पर दोष मढ़ेंगे। केंद्र और राज्य के सत्ताधीशों के बीच भी इस तरह की बात हो सकती है। दूसरी तरफ  यदि राजस्थान जीतने की बाद भी कांग्रेस मप्र और छत्तीसगढ़ नहीं जीत सकी तब भी उसकी बढ़ी हुई ताकत 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के विजय रथ का रास्ता रोकने में सक्षम होगी। 11 तारीख की दोपहर राष्ट्रीय राजनीति की पटकथा नए सिरे से लिखी जा सकती है जिसमें नायक की भूमिका नरेंद्र मोदी की होगी या राहुल गांधी की ये जानने के लिए अभी तीन रातों का इंतजार करना पड़ेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 December 2018

शालीनता और सिद्धांतों की राजनीति मरणासन्न

आज मतदान होने के बाद काफी दिनों से चल रही हलचल खत्म हो जाएगी। 11 को मतगणना के बाद दोपहर तक ये भी स्पष्ट हो जाएगा कि मप्र , छत्तीसगढ़ ; राजस्थान, तेलंगाना और मिज़ोरम में किसकी सरकार बनेगी? हमेशा की तरह चुनाव प्रचार जोरदार रहा। पहले तीन प्रदेशों में जहां भाजपा और कांग्रेस में सीधी टक्कर है वहीं तेलंगाना और मिज़ोरम में क्षेत्रीय दल निर्णायक स्थिति में हैं। परिणामों को लेकर विभिन्न सर्वेक्षण एजेन्सियों ने महीनों पहले से निष्कर्ष निकालने शुरू कर दिए थे जो विभिन्न चरणों में बदलते गए और अंतिम क्षण आते- आते तक तो बहुत उलटफेर हो गया। बहरहाल इस सबसे हटकर देखें तो राजनीति में हल्की सी भी रुचि रखने वाले को ये पीड़ा है कि चुनाव प्रचार का स्तर लगातार गिर रहा है। नीतियों और सिद्धान्तों से हटकर राजनीति निजी हमलों पर आकर केंद्रित हो गई है। विरोधी से सैद्धांतिक आधार पर मतभेद न होकर निजी शत्रुता का भाव प्रबल होता जा रहा है। आरोप-प्रत्यारोप तो पहले भी लगते थे लेकिन उनमें भी शालीनता हुआ करती थी। लेकिन ब परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। चुनाव जीतने के लिए केवल धन और बाहुबल के साथ ही शराब आदि का वितरण तो पुरानी बात है। अब तो विरोधी  को जेल भिजवाने की धमकियां खुले आम दी जाती हैं। नीतिगत आलोचना की जगह व्यक्तिगत कटाक्षों ने ले ली है। उसमें भी शब्दों की मर्यादा का ध्यान नहीं रखा जाता। कभी-कभी तो लगता है गली-मोहल्लों में खेलते हुआ लड़ बैठने वाले बच्चों के बीच भी जो कहा-सुनी होती है वह मंच से बोलने वाले स्वनामधन्य नेताओं की अपेक्षा उच्चस्तर की कही  जा सकती है।  सन्दर्भित पांच राज्यों में हुए चुनाव प्रचार के दौरान जो देखने सुनने मिला वह कोई नई बात नहीं है लेकिन ये भी सही है कि एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे इस तरह की खोखली और निम्नस्तरीय राजनीतिक शैली असहनीय लगने लगी है। विशेष रूप से 18 से 30 वर्ष की आयु के मतदाताओं को ये सब देखकर राजनीति और राजनेताओं से जो वितृष्णा थी वह अब घृणा का रूप लेने लगी है। प्रश्न ये है कि इस शर्मनाक और दर्दनाक स्थिति के लिए कौन दोषी है और कितना ? पूछने पर तो हर कोई सामने वाले पर पूरा अपराध थोप देगा लेकिन सच्चाई ये है कि किसी एक को कठघरे में खड़ा करने की बजाय सामूहिक रूप से सभी राजनेताओं को कसूरवार ठहराया जाना चाहिये क्योंकि किसी को भी न तो मर्यादाओं का ध्यान है और न ही सौजन्यता कहीं नजर आती है। ये स्थिति रातों -रात उत्पन्न हो गई हो ऐसा नहीं है। लेकिन इसकी शुरुवात कब और कहां से हुई इसका शोध करने से भी कोई लाभ नहीं है क्योंकि कोई भी अपनी गलती मानने की बजाय दूसरे में दोष तलाशने लगता है। आपातकाल के बाद  देश की राजनीति में नई पीढ़ी का वर्चस्व बढ़ा। जयप्रकाश जी के आंदोलन में शामिल रहे तमाम युवा नेता जेल से निकलने के बाद संसद पहुँच गए। कुछ को मंत्री पद भी मिल गया। 1980  में इंदिरा जी की सरकार लौटी तब संजय ब्रिगेड के नाम पर दूसरी तरफ  से भी काफी नौजवान संसद सदस्य बने। हालांकि 1975 के पहले भी नवयुवक संसद के लिए चुने जाते रहे लेकिन तब उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम ही हुआ करती थी लेकिन अस्सी के दशक  में स्थितियां तेजी से बदलीं और बड़ी संख्या में बुजुर्गवार संसद से बाहर होते गए। नौजावान सदस्यों ने अपने नेतृत्व की नजर में चढऩे के लिए होहल्ला, धक्का-मुक्की और ऐसे ही अन्य अशोभनीय व्यवहार करना शुरू किए जो धीरे-धीरे सदन की संस्कृति बनती चली गई। बहस का स्थान शोरशराबे ने ले लिया। सदन की बैठकें शुरू होने के साथ ही अगले दिन तक के लिये स्थगित हो जाना साधारण बात हो गई। कई बार तो नौबत यहाँ तक आ पहुंची कि पूरा का पूरा सत्र बिना किसी विधायी काम और बहस के सामाप्त हो गया। राष्ट्रीय महत्व के ज्वलंत मुद्दों से हटकर सांसद गण गैर जरूरी विषयों पर समय खराब करने में रुचि लेने लगे। कार्यवाही के टीवी प्रसारण ने सदन में हंगामे को और प्रोत्साहित किया। ये कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि संसद के दृश्य देख-देखकर अन्य राजनेताओं में भी वैसा ही हंगामा खेज आचरण करने की प्रवृत्ति जोर पकडऩे लगी और फिर तब वह सब होने लगा जिसे लेकर प्रत्येक समझदार व्यक्ति दुखी और चिंतित है। वैसे इसकी एक बड़ी वजह लगातार होते रहने वाले चुनाव हैं। इसके कारण राजनेताओं के पास जनता से सार्थक संवाद करने लायक मुद्दों का टोटा पडऩे लगा है। तभी तो उन्हें फिल्मी सितारों, क्रिकेटरों, हास्य कलाकारों जैसी गैर राजनीतिक हस्तियों का सहारा लेना पड़ता है। हेमा मालिनी जब से भाजपा की स्टार प्रचारक बनीं तबसे वे 1975 में आई फिल्म शोले का संवाद चल धन्नो तेरी इज्जत खतरे में है, सुना-सुनाकर वोट मांगती हैं। अन्य लोग भी इसी तरह के बयानों से श्रोताओं का प्रबोधन कम मनोरंजन ज्यादा करते हैं। नवजोत सिद्धू भाजपा में रहते तक  डॉ. मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का मखौल उड़ाया करते थे लेकिन कांग्रेस में आते ही नरेंद्र मोदी पर  तीखे कटाक्ष करते सुने देखे जा सकते हैं। टिकिट नहीं मिलते ही पार्टी छोड़कर दूसरे दल में जाकर उम्मीदवारी हासिल कर लेने वाले नेताओं की जुबान किस तरह पलटी मारती है ये देखकर आश्चर्य भी होता है और हंसी भी आती है। कहने का आशय ये है कि राजनीति का अवमूल्यन एक क्रमिक प्रक्रिया के अंतर्गत होता - होता मौजूदा मुकाम तक आ पहुंचा है। जहां उसके गिरते स्तर को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। जिस तरह हर समय होते रहने वाले क्रिकेट मैचों की वजह से खेल की कलात्मकता ने आक्रामकता का रूप ले लिया उसी तरह पूरे पांच साल चलने वाले चुनावी मौसम की वजह से  राजनीति भी शालीनता और सिद्धान्तवादिता से हटकर ओछेपन और निरर्थक बातों में उलझती जा रही है। 11 तारीख की दोपहर तक जैसे ही पांच राज्यों की तस्वीर साफ  होगी वैसे ही लोकसभा चुनाव की रणभूमि सजने लगेगी और राजनीतिक विमर्श की दिशा उस तरफ  घूम जाएगी। लेकिन राज्यों के चुनाव में जो बातें सुनाई दीं कमोबेश वे ही लोकसभा चुनाव में दोहराई जाने की संभावना है क्योंकि नेताओं के पास नया कुछ कहने के लिए शेष ही नहीं बचा। सवाल ये उठता है कि इस दुरावस्था से राजनीति को निकालेगा कौन क्योंकि जब स्नानागार में सभी दिगम्बर अवस्था में खड़े हों तब मान-मर्यादा की बात करे भी तो करे कौन?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 December 2018

1948 से 2018 : और कितना इतंजार

आज 6 दिसम्बर है। कहने को ये एक तारीख है लेकिन भारत्तीय संदर्भ में इसका जिक्र होते ही 1992 की याद आ जाती है जिस दिन अयोध्या में एकत्रित हुई कारसेवकों की भीड़ ने बाबरी ढांचे को धराशायी कर दिया था। उस घटना ने देश
राजनीति को गहराई तक प्रभावित किया। अनेक सरकारें उसके नाम पर बनी और बिगडीं। बड़ी - बड़ी हस्तियों के विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र के प्रकरण दर्ज हुए जिनका फैसला आज तक नहीं हो सका। उक्त कांड के मूल में राम जन्मभूमि का विवाद था। हिन्दू समुदाय का विश्वास है कि जिस ढांचे को गिराया गया वही वस्तुत: भगवान राम का जन्मस्थल है जिस पर मुगल शासक बाबर के ज़माने में उनके सेनापति मीर बाकी ने एक मस्जिद खड़ी कर दी। देश आजाद होने के पहले से हिन्दू समुदाय उस बात को लेकर भावनात्मक रूप से आहत था लेकिन कुछ कर नहीं सका। आज़ादी के बाद से संपत्ति विवाद के नाम पर ये मुद्दा उठा। लंबे समय तक अदालती कार्रवाई में उलझे रहने के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला तब स्व. राजीव गांधी के शासनकाल में ढांचे के एक छोटे से हिस्से में लगे उस ताले को खुलवा दिया गया जिसमें भगवान की मूर्तियां रखी थी। यदि वह ताला नहीं खुलवाया जाता तब शायद यथास्थिति बनी रहती। ज्योंही जन्मभूमि का ताला खुला त्योंही हिन्दुओं की उम्मीदें परवान चढऩे लगीं। यदि राजीव सरकार बजाय ताला खुलवाने के हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच सुलह करवाकर कोई सकारात्मक समाधान निकालने की बुद्धिमत्ता दिखाती तब हो सकता है जो 6 दिसम्बर 1992 को हुआ वह नहीं होता। सही बात ये है कि भारत में किसी समस्या का स्थायी समाधान निकालने की बजाय तदर्थ उपायों पर जोर दिया जाता है। अयोध्या मामले में भी पंडित नेहरू के ज़माने से राजीव गांधी तक इसी फार्मूले पर काम किया गया जिसकी वजह से मामला जिस स्थिति में देश आजाद होने के समय था उसी में अटका रह गया। अदालत में भूमि स्वामित्व को लेकर चल रहे प्रकरण को भी एक साधारण जमीन के झगड़े की तरह सुलझाने  की सोच ने भी यथास्थिति बनाये रखने में मदद की। कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि देश और उ. प्र. की सत्ता में बैठे हुक्मरानों ने कभी अयोध्या विवाद को शांतिपूर्वक सुलझाने की पहल नहीं की। राजीव सरकार के दौर में जब जन्मभूमि का ताला खुला और रामलला की पूजा शुरू हुई तब भी यदि 400 सीटों वाली केंद्र सरकार चाह लेती तब ताला खुलवाने के साथ ही वह हिन्दू और मुसलमानों के बीच कोई ऐसा समाधान निकाल सकती थी जिससे कि सौहार्द के साथ विवाद सुलझ जाता। लेकिन ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि राजीव भी अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं के कहने में आकर काम करते रहे और बजाय सुलझने के झगड़ा और बढ़ गया। 1989 में राजीव चुनाव हार गए और फिर शुरू हुआ मंडल-कमंडल का मुकाबला। वीपी सिंह मंडल आयोग लेकर आये तो लालकृष्ण आडवाणी रथ लेकर निकल पड़े। उनकी गिरफ्तारी ने वीपी सरकार को चलता किया । स्मरणीय है उसके पहले तक हिन्दू संगठन और साधु-महात्माओं की तरफ  से राम जन्मभूमि हिंदुओं को सौंप देने की मांग जोर पकडऩे लगी थी। 30 अक्टूबर 1990 को बड़ा आंदोलन भी हुआ जिसमें राज्य की मुलायम सरकार ने गोली चलवाकर आग में घी डालने की मूर्खता कर दी। उसके बाद जो हुआ वह सर्वविदित है। चंद्रशेखर सरकार बनी लेकिन चली नहीं। 1991 के लोकसभा चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या हो गई और पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। लेकिन उन्होंने भी इस मसले पर कुछ नहीं किया। परिणामस्वरूप 6 दिसम्बर 1992 की घटना घटी जिसके बाद दोनों समुदायों के बीच कटुता और बढ़ी, ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा। तदुपरांत धार्मिक ध्रुवीकरण और तेज हुआ। राजनीतिक अस्थिरता इस हद तक बढ़ी कि 96, 98 और 99 में लोकसभा चुनाव करवाने पड़े। 1999 से 2004 तक अटलबिहारी वाजपेयी सत्ता में रहे लेकिन सहयोगियों के दबाव की वजह से वे भी कुछ नहीं कर सके। आखिऱकार आस्था के विवाद पर अदालत का फैसला मानने की बात दोनों तरफ  से शुरू हो गई। मनमोहन सरकार के समय अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला देते हुए विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुना दिया। जिसके विरुद्ध अपीलें हुईं। जो सर्वोच्च न्यायालय में अटकी हैं। यहां  भी कछुआ गति से काम हो रहा है । लंबी-लंबी पेशियां लगती हैं। दैनिक सुनवाई का आश्वासन भी रद्दी की टोकरी में चला गया। न्यायाधीश बदलते ही मामला टलता जाता है। 2014 में नरेंद्र मोदी की कप्तानी में पहली बार भाजपा को बहुमत मिला तब माना जाने लगा कि ये सरकार अपने समर्थक वर्ग की आकांक्षाओं पर खरी उतरेगी लेकिन हुआ कुछ नहीं। उधर संत समुदाय दबाव बना रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जल्द सुनवाई की मांग ठुकराने पर अध्यादेश की मांग भी जोर पकडऩे लगी। लोकसभा चुनाव नजदीक है और ये सही है कि ये विवाद धार्मिक के साथ राजनीतिक दांव-पेंच का भी हिस्सा बन गया है। केन्द्र सरकार खुलकर कुछ बोल नहीं रही। अब यदि वह अध्यादेश लाती भी है तब उसे चुनावी पैंतरा ही माना जावेगा। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई तो कह ही चुके है कि ये विवाद उनकी प्राथमिकताओं में नहीं है इसलिए जल्द निर्णय की उम्मीद न करें। कुल मिलाकर जैसे थे की स्थिति बनी हुई है । विपक्ष भाजपा पर मंदिर मुद्दे का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाता है और भाजपा उस पर मुस्लिम तुष्टीकरण का। हिन्दू -मुस्लिम धर्माचार्य भी मिल बैठ चुके किन्तु कोई समाधान नहीं निकल पाया। 1948 से 1992 और उसके बाद 2018 आ गया किन्तु एक छोटा सा भूमि स्वामित्व का अदालती प्रकरण सरकारें गिराने-बनाने का कारण बनने के बाद भी अनसुलझा ही है। ये स्थिति हमारी निर्णय क्षमता पर प्रश्रचिन्ह खड़े करने के लिए पर्याप्त है। पहले केवल कांग्रेस और अन्य पार्टियां कठघरे में थीं किन्तु 1999 से 2004 और 2014 से 2018 के दौरान भाजपाई प्रधानमंत्री होने के बावजूद राममंदिर मुद्दा जस का तस पड़ा रहने से अब भाजपा भी सवालों के घेरे में है। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्र सरकार इस दिशा में कोई ठोस पहल यदि करती भी है तो उसे चुनावी पैंतरा मानकर विवादित किया जावेगा । ये सब देखकर लगता नहीं है कि विवाद जल्द सुलझेगा। वैसे इससे बड़ी हास्यास्पद और साथ ही दुखद बात क्या होगी कि इस देश की 80 प्रतिशत बहुसंख्यक जनता के आराध्यदेव की जन्मस्थली का विवाद सुलझने की बजाय उलझता ही जा रहा है। अनिर्णय और अनिश्चितता की ऐसी ही स्थिति 6 दिसम्बर 1992 का कारण बनी थी। दुर्भाग्य से हमने इतिहास से सबक लेने की प्रवृत्ति को गहराई तक दफन कर रखा है । हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने धर्म के आधार पर देश के विभाजन जैसा कठिन फैसला तो कर लिया लेकिन हिंदुओं की भावनाओं और आस्था के इतने बड़े केंद्र का विवाद सुलझाने में वे असफल साबित हुए। बाबरी ढांचा गिरने के ढाई दशक बाद भी इस विवाद की यथास्थिति को देखकर लगता है फिर किसी हादसे का इंतज़ार हो रहा है। सियासत के सौदागरों को याद रखना चाहिए कि मथुरा और काशी भी कालांतर में बड़ा मुद्दा बनने की प्रतीक्षा में हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी