Friday, 4 January 2019

वंदे मातरम विवाद का सुखांत

वंदे मातरम विवाद पर मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बिना देर लगाए नई व्यवस्था लागू कर दी। अगले माह से पहली तारीख को भोपाल स्थित राज्य सचिवालय के प्रांगण में राष्ट्रगीत गायन के आयोजन को और विस्तार देते हुए अब पुलिस मुख्यालय से पुलिस बैंड राष्ट्रभक्ति के गीत बजाते हुए वल्लभ भवन तक जाएगा। जनता भी उसके साथ चल सकेगी। सचिवालय पहुंचने के बाद वहां वंदे मातरम के साथ ही राष्ट्रगान जन गण मन भी होगा। कमलनाथ द्वारा गत एक जनवरी को सचिवालय के समक्ष कर्मचारियों द्वारा सामूहिक तौर पर राष्ट्रगीत का गायन बंद करवा दिया गया जिस पर भोपाल से दिल्ली तक राजनीतिक बवाल मच गया। मुख्यमंत्री ने इस पर ये भी कहा था कि महीने में एक दिन राष्ट्रगीत गाने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता लेकिन आलोचना शुरू होते ही उन्होंने आश्वासन दिया कि शीघ्र ही नई व्यवस्था की जावेगी। विपक्षी दल भाजपा को तो नई सरकार पर हमला करने का स्वर्णिम अवसर मिल गया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वल्लभ भवन में खुद वंदे मातरम गाने की तिथि भी घोषित कर दी। दूसरी तरफ  कमलनाथ के निर्णय को सही ठहराने वाले भी सक्रिय हो उठे। समय की बर्बादी के साथ ही कर्मचारियों की उदासीनता का हवाला भी दिया गया। कुछ टीवी चैनलों ने वंदे मातरम के समर्थकों को खुद भी राष्ट्रगीत याद न होने के दृश्य दिखाकर परोक्ष रूप से उनका मजाक भी उड़ाया। लेकिन अपने अंधभक्तों से प्रभावित हुए बिना मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बुद्धिमत्ता दिखाते हुए अपने फैसले को बदलकर भोपाल स्थित पुलिस मुख्यालय से सचिवालय तक बैंड पर राष्ट्रभक्ति के गीतों की धुनें बजाते हुए जुलूस ले जाने की व्यवस्था कर दी और वंदे मातरम के साथ ही राष्ट्रगान के गायन का आदेश भी निकाल दिया। सचिवालय में प्रतिमाह होने वाले आयोजन को समय की बरबादी बताने वालों के गाल पर जोरदार तमाचा लगाते हुए मुख्यमंत्री ने जिला और संभाग मुख्यालयों पर भी महीने की पहली तारीख को वंदे मातरम के साथ जन गण मन के गायन का आदेश पारित कर दिया। प्रदेश सरकार के इस निर्णय को भाजपा अपनी जीत के तौर पर प्रचारित कर रही है जो राजनीतिक तौर पर गलत भी नहीं है क्योंकि वह इस मुद्दे को गरमाती नहीं तब शायद कमलनाथ भी इतनी शीघ्रता से नई व्यवस्था नहीं करते। लेकिन इससे भी बढ़कर ये उन लोगों की किरकिरी है जिन्होंने सचिवालय में वंदे मातरम गायन को समय की बर्बादी बताते हुए भाजपा पर राष्ट्रवाद को अपने एजेंडे के रूप में इस्तेमाल करने जैसा आरोप लगाया था।  कांग्रेस के उत्साही अंधभक्तों सहित वामपंथी ढोंगियों को कमलनाथ से कुछ सीखना चाहिए जिन्होंने जनभावनाओं का सम्मान करते हुए तत्काल अपने निर्णय को सुधारते हुए उसे और विस्तृत कर दिया।  इसे उनकी उस टिप्पणी का विरोधाभासी भी कहा जा सकता है कि एक दिन वंदे मातरम गाने से राष्ट्रभक्ति नहीं आ जाती। लेकिन मुख्यमंत्री ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए बिना कुछ कहे इस बात का संकेत दे दिया कि वे पारी की शुरुवात में ही बाहर जाती गेदों को छेड़कर कैच आउट होने से बचेंगे। हॉलांकि कुछ और भी फैसले हैं जो जल्दबाजी और अति उत्साह से प्रभावित कहे जा सकते हैं। उनका संबंध रास्वसंघ और भाजपा से होने के कारण उनकी राजनीतिक प्रतिक्रिया भी होगी किन्तु वंदे मातरम पर रोक लगाए जाने से वह व्यक्ति भी आहत हुआ जो न वंदे मातरम गाता है और न ही जिसे राष्ट्रगीत याद ही है। यूँ भी जन गण मन की अपेक्षा वंदे मातरम थोड़ा कठिन और लंबा है। बहरहाल कमलनाथ के ताजे फैसले से एक विवाद का अंत ही नहीं बल्कि सुखांत हो गया। अब माह के पहले दिन भोपाल स्थित सचिवालय सहित जिला एवं संभाग मुख्यालयों पर भी वंदे मातरम के साथ जन गण मन का गायन होगा। इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने जिस भी कारण से किया किन्तु उनका फैसला स्वागत योग्य है क्योंकि राष्ट्रभक्ति को प्रोत्साहित करने वाले हर प्रयास का अभिनंदन होना चाहिए फिर चाहे वह भाजपा की सरकार द्वारा उठाया जाए या कांग्रेस की। जहां तक बात शिवराज सिंह द्वारा सात तारीख को वल्लभ भवन में वंदे मातरम गाने की है तो उसमें किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिये। वैसे भाजपा ने वंदे मातरम के प्रति सम्मान तो दिखा दिया किन्तु उसके नेताओं को अब तो कम से राष्ट्रगीत याद कर ही लेना चाहिए  वरना उनके ऊपर  पर उपदेश कुशल बहुतेरे की कहावत को चरितार्थ करने का आरोप लगता रहेगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 January 2019

स्टंटबाजी का पर्याय बन गई राजनीति

गत दिवस लोकसभा में जमकर चों-चों हुई।  रॉफेल लड़ाकू विमान सौदे में हुए कथित भ्रष्टाचार के आरोपों को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जहां दोहराते हुए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा वहीं सत्ता पक्ष की तरफ  से वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वकालत के अपने अनुभव का प्रदर्शन करते हुए राहुल और गांधी परिवार के साथ कांग्रेस पर तीखे हमले किये। सांकेतिक शैली में कुछ लोगों के नाम लेकर आक्षेपों की बौछार भी हुई। जैसा कि हमेशा होता आया है आरोप-प्रत्ययारोप के बाद बैठक खत्म हो गई। समाचार पत्रों को मसाला मिल गया और टीवी चैनलों को प्रायोजित बहस का अवसर। लेकिन साधारण जनता की समझ में कुछ भी नहीं आया। दरअसल  रॉफेल विमान, बोफोर्स तोप और अगस्ता हेलीकाप्टर सभी की खरीदी में भ्रष्टाचार का हल्ला मचा लेकिन आज तक किसी को सजा नहीं हुई। जेपीसी, अदालत और सीबीआई  सरीखे फोरम भी किसी कसूरवार के गले में फंदा नहीं डाल सके। सीबीआई ने जांच के सिलसिले में पूरी दुनिया छान मारी लेकिन एक भी दोषी सलाखों के पीछे नहीं भेजा जा सका। अगस्ता हेलीकाप्टर खरीद से जुड़े क्रिश्चियन मिशेल को जरूर दुबई से पकड़ कर लाया गया है लेकिन ये कहना कठिन है कि उससे कुछ राज मिल सकेगा। यही सब देखकर आम धारणा बन गई है कि राजनीतिक पार्टियां अपने निहित स्वार्थों के लिए भ्रष्टाचार के मुद्दे उछालती हैं लेकिन किसी पुख्ता सबूत के अभाव में जांच अंजाम तक नहीं पहुंच पाती। भोपाल गैस त्रासदी के आरोपी को देश से निकल भागने में  तत्कालीन राजीव सरकर ने मदद की थी। बीते साल वह चल बसा किन्तु लाख कोशिशों के बाद भी उसका प्रत्यर्पण नहीं हो सका। बोफोर्स कांड का आरोपी क्वात्रोची भी भारतीय जांच एजेंसियों को चकमा देता रहा और अंत में चल बसा। अगस्ता हेलीकाप्टर घोटाला हुए भी बरसों बीत गए लेकिन अब जाकर एक आरोपी पकड़ में आ सका है। कहने का आशय ये है कि मामला उठता तो जोर-शोर से है लेकिन टीवी धारावहिक की तरह उसका अंत नहीं होता और फिर वह गुमनामी का शिकार होकर रह जाता है। चूंकि राजनीति अब नीतियों और सिद्धांतों की बजाय सनसनीखेज बातों पर आधारित हो चुकी है इसलिए सभी दलों के नेता इसी में जुटे रहते हैं । चुनाव चाहे नगरीय निकाय का हो या लोकसभा का उस तक में ऐसे मुद्दे उठाये जाते हैं जिनकी कोई प्रासंगिकता नहीं होती । चूंकि हमारे देश में चुनावी मौसम हर समय बना रहता है इस वजह से आरोप-प्रत्यारोप रूपी बादल भी जब देखो तब गरजते रहते हैं । यही वजह है कि जनमानस पर इनका कोई असर नहीं होता। राहुल गांधी के आरोपों का जहाँ प्रधानमंत्री जवाब नहीं देते वहीं क्वात्रोची से नजदीकी पर सोनिया गांधी और राहुल चुप्पी साध लेते हैं । कुल मिलाकर स्थिति पूरे कुए में भांग घुले होने जैसी है और विश्वास का संकट दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है  । राजनेताओं की भीड़ में प्रामाणिकता से भरे चरित्र लुप्त होते जा रहे हैं। संसद में विवाद तो हर समय होते रहते हैं किंतु विचार करने की फुर्सत किसी को नहीं है। लोकसभा चुनाव ज्यों-ज्यों करीब आता जाएगा राजनीतिक स्टंटबाजी तेज होती जाएगी। रही बात चुनाव जीतने की तो उसके लिए कर्ज माफी या उस जैसी किसी मुफ्त उपहार योजना का उपयोग कर लिया जाएगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

क्रिकेट के भगवान का शिल्पकार चला गया

डॉ. सरोजिनी प्रीतम ने काफी पहले किसी पत्रिका में एक क्षणिका लिखी थी कि फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन को तो सभी जानते हैं लेकिन मधुशाला के लेखक डॉ. हरिवंश राय बच्चन को अब कम लोग जानते हैं। उल्लेखनीय है डॉ. बच्चन अमिताभ के यशस्वी पिता थे। जब उक्त क्षणिका लिखी गई तब बच्चन जी जीवित थे। साहित्यकाश में भले ही उनकी शोहरत और प्रतिष्ठा बरकरार थी किन्तु जनमानस में एंग्री यंगमैन के तौर पर उनके पुत्र अमिताभ की तूती बोल रही थी। यद्यपि उसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं था। आज उस सन्दर्भ का स्मरण करने का प्रयोजन एक ऐसे व्यक्ति की चर्चा करना है जिसके कुशल मार्गदर्शन में तैयार हुए एक खिलाड़ी ने इतिहास बना दिया। सरकार ने उसे भारत रत्न जैसे सम्मान से विभूषित किया तो खेल प्रेमियों ने क्रिकेट का भगवान जैसा संबोधन देकर महामानव की श्रेणी में रख दिया। लेकिन जिस व्यक्ति ने यह चमत्कार कर दिखाया वे थे रमाकांत आचरेकर जिनका गत दिवस देहांत हो गया। क्रिकेट के अनगिनत प्रशिक्षक देश में हैं। लेकिन आचरेकर सर के नाम से सम्मानित उस व्यक्ति ने जिस तरह हीरे को तराशा वह उनके समर्पण भाव के साथ ही पारखी नजर का भी प्रमाण था। आज समाचार माध्यमों में उनके बारे में काफी सामग्री है लेकिन ये बात भी सही है कि अगर आचरेकर सर ने सचिन जैसे सितारे को दुनिया के सामने पेश न किया होता तो उनकी कोई पहिचान नहीं बन पाती। खेल जगत में प्रशिक्षकों को दिये जाने वाले सर्वोच्च सम्मान द्रोणाचार्य अवार्ड से उन्हें सम्मानित किया गया था। सचिन के साथ विनोद कांबली भी आचरेकर सर के शिष्य थे जो थोड़ी चमक दिखाकर चलते बने किन्तु सचिन ने गुरु की अपेक्षाओं को पूरा किया। सवाल उठता है कि आचरेकर सर जैसे आदर्श गुरुओं को वह सम्मान, शोहरत और समृद्धि क्यों नहीं मिलती जो उनके शिष्य बटोर ले जाते हैं और इसका जवाब है कि गुरु वही होता है जो अपनी महत्वाकाक्षाओं को अपने शिष्यों के जरिये पूरा करे। उस दृष्टि से आचरेकर सर ने जीवन में संतुष्टि का सर्वोच्च शिखर छू लिया होगा क्योंकि उनका एक शिष्य सफलता के आसमान पर जो पहुंच गया। बीसीसीआई को चाहिए कि वह रमाकांत आचरेकर की स्मृति में कोई बड़ा टूर्नामेंट  प्रारम्भ करे। सचिन तेन्दुलकर और उनके अलावा जिन भी क्रिकेटरों ने स्व. आचरेकर के चरणों में बैठकर हुनर हासिल किया उनका भी फर्ज है कि वे अपने गुरु की स्मृति में ऐसा कुछ करें जिससे उनकी स्मृतियाँ चिरजीवी हो सकें। ये कहने में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिस तरह सचिन तेन्दुलकर महानता के प्रतीक बन गए वही सम्मान उनके गुरु आचरेकर सर को भी मिलना चाहिये क्योंकि गुरु बिन शिष्य की कल्पना व्यर्थ है। क्रिकेट के भगवान का सृजन करने वाले उस अद्वितीय गुरु को विनम्र श्रद्धांजलि।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 2 January 2019

तो क्या एक दिन की शपथ से रामराज आ जायेगा

मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ का ये कहना पूरी तरह से सही है कि एक दिन वंदे मातरम गाने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता और जो लोग इसका गायन नहीं करते क्या वे देशभक्त नहीं हैं ? दरअसल ये बात तब उठी जब गत दिवस प्रदेश की राजधानी भोपाल में सचिवालय के समक्ष सभी कर्मचारियों द्वारा होने वाला राष्ट्रगीत गायन नहीं हुआ। इस परंपरा को बाबूलाल गौर द्वारा मुख्यमंत्री बनने पर प्रारम्भ किया गया था। विपक्षी दल भाजपा ने बिना देर लगाए मुख्यमंत्री और कांग्रेस पर हमला बोल दिया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो यहां तक कह दिया कि यदि कांग्रेस को वंदे मातरम गाने में शर्म आती है या उसके शब्द याद नहीं हैं तो वे स्वयं आकर गाने तैयार हैं। बाद में कमलनाथ ने स्पष्ट किया कि वे इस परंपरा का स्वरूप बदलकर इसे नए सिरे से शुरू करवाएंगे। कुछ लोगों का ये भी कहना है कि इस आयोजन से सचिवालय के कर्मचारियों का एक घंटा बेकार हो जाता था। खैर , नई सरकार के निर्णय ने एक विवाद को तो जन्म दे ही दिया। मुख्यमंत्री ने इसे क्यों बन्द किया इसका कारण स्पष्ट हुए बिना नई सरकार की मंशा पर संदेह करना जल्दबाजी होगी लेकिन ये भी सही है कि बरसों से चली आ रही परंपरा को बिना कोई ठोस कारण बताए अचानक बन्द करने पर सवाल उठना भी स्वाभाविक ही हैं। और फिर जब बात राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त वंदे मातरम की हो तब तो बवाल मचना ही था। उल्लेखनीय है संसद में भी वंदे मातरम का गान होता है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रगीत गाने या न गाने को राष्ट्रभक्ति का आधार मानने सम्बंधी जो बात कही वह अपनी जगह सही है। वंदे मातरम को लेकर मुस्लिम समाज को सदैव आपत्ति रही है। भारत माता की जय बोलने पर भी कुछ लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं। लेकिन असदुद्दीन ओवैसी और आज़म खान ब्रांड मुसलमानों से हटकर जावेद अख्तर सरीखे मुस्लिम भी हैं जिन्होंने राज्यसभा में अपने विदाई भाषण में भारत माता की जय बोलकर उन लोगों को करारा जवाब दिया जो इसमें भी मज़हब तलाशते हैं। एक वर्ग डॉ. फारुख अब्दुल्ला जैसों का भी है जो दिल्ली में तो भारत माता की जयकार करता है लेकिन कश्मीर पहुंचते ही उनकी जुबान पलट जाती है। वंदे मातरम किसी धर्म या राजनीतिक दल विशेष का न होकर राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत एक गीत है जो स्वतंत्रता सेनानियों के लिए गुरुमंत्र समान था। कांग्रेस के अधिवेशनों में भी उसका गायन होता था। मौलाना आज़ाद जैसे मुस्लिम नेता तक ने कभी उसका विरोध नहीं किया। आज़ादी के बाद यद्यपि जन गण मन को राष्ट्रगान के तौर पर स्वीकार कर लिया गया लेकिन वंदे मातरम को भी बतौर राष्ट्रगीत सम्मान दिया जाता रहा।  हालांकि बाद में कट्टरवादी सोच के चलते एक तबके ने इस पर ऐतराज करना शुरू भी किया लेकिन अधिकतर देशवासी जिनमें सभी धर्म और संप्रदायों के लोग हैं वंदे मातरम के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। मप्र के सचिवालय में महीने के पहले दिन वंदे  मातरम का सामूहिक गायन समय की बर्बादी या किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार या पोषण न होकर कर्मचारियों के बीच राष्ट्रभक्ति का भाव जगाने का प्रयास मात्र था। यह अपने उद्देश्य में कितना सफल हुआ ये विश्लेषण का विषय हो सकता है लेकिन इसे बिना किसी उचित कारण के बन्द कर देना खटकने वाला है। कमलनाथ और कांग्रेस दोनों की  राष्ट्रभक्ति पर सन्देह करने का भाजपाई पैंतरा तो निश्चित रूप से राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित और प्रभावित कहा जा सकता है लेकिन बिना वैकल्पिक प्रबंध किए एक अच्छी परंपरा को अचानक रोक देना भी शुभ संकेत नहीं है। यदि मुख्यमंत्री या उनके सहयोगियों के मन में सन्दर्भित आयोजन को लेकर कोई विचार था तब वे उसे अगले माह से लागू कर सकते थे। अभी सरकार बने ज्यादा समय नहीं हुआ है। मंत्रियों ने ठीक से अपना कार्यभार भी नहीं संभाला। विभागों को लेकर असंतोष भी सतह पर तैर रहा है। बाहर से समर्थन दे रहे निर्दलीय और सपा - बसपा अलग आंखें तरेर रहे हैं। विधानसभा में सरकार के पास बहुमत का भी टोटा है। ऐसे में बेहतर होगा मुख्यमंत्री अपनी ऊर्जा चुनावी वायदों को पूरा करने में लगाएं। अगर वे रास्वसंघ की शाखा और वंदे  मातरम सरीखे मुद्दों में उलझे तो लोकसभा चुनाव के पहले उनकी सरकार अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकेगी। मुख्यमंत्री ने शपथ लेने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटलबिहारी वाजपेयी के जन्मदिन को सुशासन दिवस के तौर पर मनाए जाने की शिवराज सरकार की परंपरा को जारी रखने का  आदेश निकालकर अपनी रचनात्मक सोच का परिचय दिया था। प्रदेश भर में सरकारी दफ्तरों के पूरे अमले ने अटल जी की तस्वीर के सामने सुशासन की प्रतिज्ञा दोहराई। कमलनाथ ने महीने में एक दिन वंदे मातरम गाने से राष्ट्रभक्त नहीं हो जाने की जो बात कही यदि उसे ही मापदंड मानें तब ये सवाल भी तो उठ खड़ा होता है कि साल में एक दिन सुशासन की शपथ लेने से क्या सरकारी दफ्तरों में रामराज आ जाएगा? उम्मीद की जानी चाहिए कि कमलनाथ वंदे मातरम गायन को लेकर उत्पन्न विवाद का समुचित हल निकालकर अगले माह से वैकल्पिक व्यवस्था लेकर आएंगे क्योंकि प्रश्न राष्ट्रगीत की प्रतिष्ठा का है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 January 2019

2019 एक अवसर : बेहतर उपयोग हम पर निर्भर

कालगणना के लिहाज से आज से ईस्वी  कैलेण्डर का नया साल शुरू हो गया। हालांकि हर देश का  नववर्ष अलग होता है किन्तु अधिकृत तौर पर पूरी दुनिया ने ईस्वी वर्ष को ही मानक के तौर पर स्वीकार कर लिया है। भारत के विभिन्न अंचलों में भी  नव वर्ष अलग-अलग महीनों में शुरू होता है किंतु सरकारी तौर पर 1 जनवरी से ही नए कैलेंडर वर्ष की शुरुवात मानी जाती है। उस दृष्टि से आज 21 वीं सदी का 19 वाँ वर्ष प्रारंभ हो रहा है।  भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह वर्ष देश के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय का है। मई माह में नई केंद्र सरकार बनेगी जिसके लिए चुनाव की प्रक्रिया सम्भवत: अप्रैल से शुरू हो जाएगी। यूँ तो हमारे देश में चुनाव कभी खत्म ही नहीं होते।  2018 के अंतिम महीने में ही पांच राज्यों में  विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए। लोकसभा के साथ भी कुछ राज्यों के चुनाव करवाए जाएंगे किन्तु केंद्र सरकार के लिए होने वाला चुनाव चूंकि पूरे देश के भाग्य और भविष्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है इसलिए इसे लेकर अधिक उत्सुकता देखी जाती है। संचार क्रांति और शिक्षा के विस्तार ने निर्वाचन प्रक्रिया में लोगों की रुचि बढ़ाई है। चुनाव आयोग द्वारा मतदान के लिए लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने हेतु किये जा रहे प्रयासों को अपेक्षित सफलता मिलना लोकतंत्र में बढ़ते विश्वास का प्रमाण है।  विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की तुलना महाकुम्भ जैसी ही है। संयोगवश इस वर्ष प्रयागराज में महाकुंभ भी है जिसके बाद लोकसभा चुनाव की हलचल शुरू हो जाएगी। यूँ तो चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक सामान्य प्रक्रिया है किन्तु 2019 का चुनाव कई मायनों में विशिष्ट होगा क्योंकि एक तरफ  तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 2014 में मिली ऐतिहासिक विजय को दोहराने का दबाव रहेगा वहीं दूसरी तरफ  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की भी जबर्दस्त परीक्षा होगी। दोनों के भविष्य के लिए आने वाली गर्मियां निर्णायक होंगी। यदि श्री मोदी एनडीए की सरकार बना ले गए तो वे न सिर्फ राष्ट्रीय वरन अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर एक कद्दावर शख्सियत के तौर पर स्थापित हो जाएंगे और ये मान लिया जावेगा कि 2014 की जीत धुप्पल में मिली सफलता नहीं थी। दूसरी तरफ  कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ चुके हैं। बीते माह हिंदी अंचल के तीन राज्य भाजपा से छीनकर कांग्रेस ने जो कारनामा कर दिखाया उसने राहुल के कद को बढा दिया। लेकिन श्री मोदी और श्री गांधी दोनों के सामने एक समान समस्या ये है कि बिना अन्य दलों से गठबंधन किये वे बहुमत के जादुई आंकड़े को नहीं छू सकेंगे। हालांकि 2014 में श्री मोदी ने भाजपा को 282 सीटें दिलवाकर इतिहास रच दिया था किंतु वह इसलिए सम्भव हो सका क्योंकि पार्टी ने एनडीए नामक गठबंधन तो बनाया ही बड़ी संख्या में दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकिट भी दीं। 2019 में भी भले ही राजनीतिक विश्लेषक मोदी और राहुल के बीच मुकाबला बता रहे हों किन्तु सच्चाई ये है कि दोनों गठबंधन नामक बैसाखी का सहारा लेने के लिए बाध्य हैं। भाजपा और कांग्रेस यद्यपि राष्ट्रीय दल की हैसियत रखते हैं किंतु उन्हें इस बात का एहसास हो चुका है कि बिना छोटे और क्षेत्रीय दलों के सत्ता तक पहुंचना सम्भव नहीं रहा। इस आधार पर अब किसी नेता का आकलन उसकी योग्यता से ज्यादा गठबंधन बनाने और चलाने की उसकी क्षमता से किया जाता है। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उक्त दोनों ही दल वर्तमान में अपने गठबंधन को मजबूत बनाने में जुटे हुए हैं। लेकिन इसका दुष्परिणाम अनुचित दबावों के समक्ष घुटने टेकने की शर्मिंदगी के तौर पर सामने आता है। यह एक विचारणीय स्थिति है क्योंकि राष्ट्रीय दलों द्वारा किये जाने गठबंधन के पीछे कोई नीति या सिद्धांत न होकर येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने की वासना ही प्रमुख है। जो विपक्षी दल भाजपा सरकार को हटाने के लिए एकजुट होने की कवायद कर रहे हैं उनका पूरा ध्यान केवल सौदेबाजी के जरिये अधिकतम स्वार्थसिद्धि है। भाजपा के साथ भी जो छोटे दल हैं वे भी सत्ता की मलाई मिलने के बाद और ज्यादा पाने की लालसा नहीं छोड़ पा रहे। इसका दुष्परिणाम देशहित में नीतियों के साहस के साथ क्रियान्वयन में आने वाले व्यवधानों के रूप में देखने मिलता है। क्षेत्रीय दलों के दबाववश अनेक ऐसे निर्णय रुक जाते हैं जो राष्ट्रीय महत्व के हैं। उस लिहाज से 2019 के लोकसभा चुनाव में चाहे एनडीए को बहुमत मिले या यूपीए को लेकिन ये निश्चित है कि भाजपा और कांग्रेस को अपने बलबूते सरकार बनाने का जनादेश नहीं मिलेगा। इन दोनों गठबंधनों से अलग तीसरे मोर्चे की खिचड़ी भी यदि पक गई तब त्रिशंकु की आशंका राष्ट्रीय राजनीति में अनिश्चितता का कारण बनी रहेगी। दुर्भाग्य का विषय ये है कि समूची राजनीति चाहे वह सत्ता पक्ष की हो या विपक्ष की नीतियों और सिद्धांतों से पूरी तरह भटककर चुनाव जीतने पर केंद्रित हो चुकी है जिसकी वजह से सर्वत्र अशांति , अव्यवस्था और अराजकता का बोलबाला हो गया है। हर क्षेत्र में दबाव समूह बन गए हैं जो पूरी व्यवस्था को अपनी उंगलियों पर नचाने पर आमादा हैं।  किसान , कर्मचारी , व्यापारी , उद्योगपति और इनसे हटकर साधारण मजदूर तक की सुनवाई तभी हो पाती है जब वे दबाव बनाने में सक्षम हों। चुनाव के मौसम में ये दबाव वोट बैंक का रूप ले लेते हैं। इस आधार पर ये कहना गलत नहीं होगा कि आगामी लोकसभा चुनाव भी सतही और तात्कालिक महत्व के मुद्दों पर लड़ा जाएगा। अव्यवहारिक वायदे कर मतदाता को आकर्षित करने का बाजारवादी तरीका जीत का नुस्खा बन गया है। 21 वीं सदी के 18 बरस बीत जाने की बाद भी भारतीय राजनीति में जिस परिपक्वता की अपेक्षा की जाती थी वह दूरदराज तक नहीं दिखाई दे रही। और तो और जनतांत्रिक देश के सार्वजनिक जीवन में जो शुचिता, सौजन्यता और सामंजस्य मूलभूत गुण के रूप में होने चाहिए, उनका पूरी तरह से अभाव हो जाना बहुत ही दुखद और चिंताजनक है। रही बात जनता की तो वह भी नेताओं को आदर्श मानकर स्वार्थों के समझौते में उलझकर रह गई है। यदि देश और प्रदेश में आदर्श कहे जाने वाले नेतृत्व का अभाव हो गया है तो उसके लिए जनता भी कम कसूरवार नहीं है।  नए साल में नया सोचने और तदनुसार नया करने की अपेक्षा की जाती है। बेहतर हो  देश के आम नागरिक जो चुनाव के माध्यम से निर्णय प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से हैं अपने दायित्व को समझकर आने वाले चुनाव में बुद्धि के साथ विवेक का भी समुचित उपयोग करते हुए ऐसे जनप्रतिनिधि का चयन करें जो छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठकर देश और जनता के व्यापक हितों का संवर्धन और संरक्षण करे। यदि मतदान करते समय हम क्षणिक स्वार्थ में फंसकर गलत चयन कर बैठे तो अगले पांच वर्ष तक उसका दंड हमें ही भोगना होगा। उस दृष्टि से 2019 देश के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर लेकर आया है। ये हमारे ऊपर है कि हम उसका उपयोग किस तरह करते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी