Wednesday, 9 January 2019

काश, ऐसी ही समझदारी आगे भी दिखाई जाए

जैसी कि उम्मीद थी कल रात लोकसभा ने सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण सम्बन्धी संविधान संशोधन विधेयक भारी बहुमत से पारित कर दिया। गर्मागर्म बहस के उपरांत हुए मतदान में सदन में उपस्थित 326 में से 323 ने विधेयक के पक्ष में मत देते हुए उसे स्वीकृति दे दी। उल्लेखनीय है कि परसों ही केंद्रीय मंत्रीपरिषद ने उक्त विधेयक को मंजूरी दी और बिना देर लगाए उसे लोकसभा में पेश भी कर दिया।  सरकार जानती थी कि इस निर्णय की आलोचना करने वाले दल भी मजबूर होकर समर्थन करेंगे। इसीलिए राज्यसभा को एक दिन के लिए बढ़ा दिया गया जो आज इस पर विचार करेगी और यदि कोई बहुत बड़ा कारण नहीं हुआ तब शाम तक उसकी सहमति भी प्राप्त हो जाएगी। यदि ऐसा हुआ तब ये आजाद भारत के इतिहास में एक बड़ा कदम माना जाएगा क्योंकि इसके जरिये पहली बार आरक्षण का विस्तार जाति के दायरे से निकलकर आर्थिक स्थिति तक हो जाएगा। सबसे रोचक बात ये थी कि चंद अपवाद छोड़कर जाति की राजनीति करने वाली पार्टियां और नेता भी उक्त विधेयक का समर्थन करते दिखे। लेकिन उससे भी बड़ी बात ये  रही कि सभी ने विधेयक पेश करने के समय के साथ ही सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाए और भाजपा पर अपने घटते जनाधार को बचाने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया। लेकिन न तो विधेयक को विचारार्थ किसी समिति को भेजने का दबाव बनाया गया और न ही सदन में किसी भी प्रकार की बाधा ही उत्पन्न हुई। असदुद्दीन ओवैसी, लालू यादव की पार्टी और अन्ना द्रमुक जैसे कुछ दलों को विधेयक रास नहीं आया। लेकिन बाकी विरोधी दलों के सांसदों ने सरकार पर तीखे हमले करते हुए उस पर राजनीति करने का आरोप तो लगाया लेकिन आलोचनाओं के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ खड़े करने के बाद विधेयक का समर्थन भी किया। निश्चित रूप से ये एक अभूतपूर्व स्थिति थी जब किसी विधेयक के जबरदस्त विरोध के बावजूद वह दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। इसकी वजह वैचारिक मतभेदों में कमी या सैद्धांतिक सहमति न होकर केवल वोट बैंक की राजनीति ही थी। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव में सवर्ण मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में बनाये रखने के लिए आनन-फानन में उक्त विधेयक गुपचुप तरीके से पेश कर दिया। जैसा विरोधी दल कह रहे थे अगर इसे सत्र की शुरूवात में लाया जाता तब हो सकता था इसे ठंडे बस्ते में डालने की रणनीति वह अपनाता किन्तु सरकार ने उसे सोचने और कुछ करने का समय ही नहीं दिया। ये भी कह सकते हैं कि विपक्षी दल भी अपने ही बनाये मकडज़ाल में फंस गए। ऐसी ही एकता गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को पलटने के लिए प्रदर्शित हुई थी जिसके मुताबिक अनु. जाति और जनजाति के किसी व्यक्ति के उत्पीडऩ पर बिना जांच किये गिरफ्तारी किये जाने पर रोक लगा दी गई थी। बात-बात में सर्वोच्च न्यायालय की स्वायत्तता का बखान करने वाले तमाम दलों ने उस फैसले को सिरे से नकारने में तनिक देर नहीं लगाई क्योंकि उससे बड़े वर्ग की नाराजगी जुड़ी हुई थी। कल वही एकता फिर दोहराई गई क्योंकि इस बार सवर्ण मतदाताओं को खुश करने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। यदि चुनाव सिर पर न होते तब शायद केन्द्र सरकार भी इस तरह जल्दबाजी नहीं करती। हाल ही में सम्पन्न हुए  विधानसभा चुनावों में तीन राज्य हाथ से निकल जाने से भाजपा के लिए ऐसा करना जरूरी हो गया था। जहां तक बात उक्त विधेयक के औचित्य की है तो उसे स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है किंतु जिस तरह से विपक्षी दलों के सांसदों ने लोकसभा में उसके अनेक प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए उसकी वैधानिकता पर भी सन्देह जताया उसके बाद ये उम्मीद थी कि किसी न किसी बहाने से वे उसे अधर में टांगकर सरकार का खेल खराब करेंगे किन्तु ना, ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए भारी बहुमत से विधेयक को पारित करना ये दर्शाता है कि सदन को बाधित करने के पीछे निहित राजनीतिक स्वार्थ होते हैं। संसदीय प्रजातंत्र नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत पर चलता है। बहुमत नि:सन्देह महत्वपूर्ण होता है किंतु राष्ट्रीय और जनहित के विषयों पर आम सहमति की अपेक्षा भी की जाती है। चुनाव में सत्ता और विपक्ष दोनों एक दूसरे के सामने खड़े होकर अपनी बात कहते हैं किंतु संसद में विचार और निर्णय होने चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश में चुनावी कटुता संसद के भीतर भी बनी रहती है जिसकी वजह से सत्ता और विपक्ष दोनों ही अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीके से नहीं करते। कुछ दिन बाद ही देश गणतंत्र दिवस मनाएगा। संविधान की वर्षगांठ पर पूरे देश में बड़ा जलसा होता है। लेकिन इस बात पर कोई विचार नहीं करता कि संसद के भीतर संविधान का किस तरह मजाक बनता है। आज़ादी के सात दशक बाद भी हमारे सांसद दलगत राजनीति से जुड़े स्वार्थों में ही उलझे रहते हैं। गम्भीर विषयों पर अव्वल दर्जे की लापरवाही दिखाई जाती है। पूरा का पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ जाता है किंतु न सत्ता पक्ष को खेद होता है और न विपक्ष को। लेकिन जब बात निहित स्वार्थ की हो तो सभी मतभेद दरकिनार रखते हुए एकता का प्रदर्शन किया जाता है। सांसदों के वेतन और भत्तों में वृद्धि का प्रस्ताव जिस तरह सर्वसम्मति से पारित होता है वह लोकशाही के सामंती स्वरूप का जीता जागता उदाहरण है। गत दिवस लोकसभा में विपक्ष ने सत्ता पक्ष की बखिया उधेडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी। गुस्सा भी दिखाया गया और तीखे व्यंग्यबाण भी छोड़े किन्तु अंत में सहमति हेतु हाथ भी उठा दिए। निश्चित तौर पर ये सुखद एहसास देने वाला रहा किन्तु इस तरह की समझदारी और परिपक्वता तो संसद से हर महत्वपूर्ण मामले में अपेक्षित है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 8 January 2019

आर्थिक आरक्षण : बात निकली है तो दूर तलक जाएगी

ये बात सौ फीसदी सही है कि भारतीय  राजनीति में हर काम चुनावी लाभ के लिए किया जाता है। उस दृष्टि से मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर कमजोर सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण देने के निर्णय को आगामी लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जाना गलत नहीं है। दूसरी बात ये भी सही है कि केंद्र सरकार ने संसद सत्र की शुरुवात में तत्सम्बन्धी विधेयक रखने की बजाय उसे आज पेश करने का फैसला लिया जिसे फटाफट अंदाज में लोकसभा से पारित करवाकर कल राज्यसभा में पारित करवाने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए राज्यसभा की बैठक एक दिन बढ़ा दी गई है। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तक सीमित कर दी है और संविधान में आर्थिक आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए सरकार ने संविधान में संशोधन करने का कदम उठाया। क्योंकि मामला वोट बैंक का है इसलिए कांग्रेस सहित अधिकतर पार्टियां उसका समर्थन करने मजबूर हैं। इससे भी बढ़कर तो उन सभी का कहना है कि वे तो पहले से ही ऐसा करने के लिए प्रयासरत थीं। कुछ प्रदेशों ने अतीत में वैसा करने की कोशिश भी की थी जिसे अदालत ने रद्द कर दिया। गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने अनु. जाति/जनजाति के उत्पीडऩ के मामले में तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने सम्बन्धी जो फैसला दिया उसे संसद ने सर्वसम्मति से पलट दिया लेकिन उसकी गाज गिरी भाजपा पर और उसका परम्परागत सवर्ण आधार हिल गया। मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजे उसी का परिणाम माने जा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने पर भाजपा को चौतरफा आलोचनाएं झेलना पड़ीं। हिंदुओं के बीच से ये प्रश्न तेजी से उठा कि ऐसी ही पहल मोदी सरकार राम मंदिर के मुद्दे पर क्यों नहीं कर रही? उससे भी ज्यादा ये हुआ कि जिस आरक्षित समुदाय को लुभाने के लिए केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को उलट दिया उसने भी हाल के विधानसभा चुनावों में भाजपा को अपेक्षित साथ नहीं  दिया। न इधर के  रहे न उधर के रहे वाली स्थिति में पहुंचने के बाद भाजपा नेतृत्व ने आ अब लौट चलें की रणनीति अपनाते हुए अचानक ऐसा निर्णय ले लिया जो मौजूदा परिस्थितियों में अनपेक्षित कहा जा सकता था। इसे मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है इसलिए भले ही उसके भविष्य और क्रियान्वयन को लेकर टीका-टिप्पणी हो रही हों किन्तु मायावती, रामविलास पासवान और रामदास आठवले जैसे अनु. जातियों के नेताओं तक को मोदी सरकार की इस पहल का समर्थन करना पड़ा। ओबीसी वर्ग के अनेक नेता यद्यपि इसकी अप्रत्यक्ष रूप से मुखालफत कर रहे हैं किंतु आरक्षण से वंचित गरीबों को भी लाभ मिले उसका समर्थन उन्हें भी करना पड़ रहा है। आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग के जो मापदंड बताए गए उनके औचित्य पर भी सवाल उठ रहे हैं लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि मोदी सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाने की हिम्मत तो दिखाई। पहले से आरक्षण का फायदा उठा रहे तबके का हिस्सा कम किये बिना 10 फीसदी का जो प्रावधान किया वह भविष्य में आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति को बनाने का माध्यम बन सकता है। इसके साथ ही क्रीमी लेयर का जो सवाल सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर उठाया वह भी अनु. जाति/जनजाति और ओबीसी वर्ग के बीच भी गरमा सकता है। सवर्ण जातियों में भी इस बात पर काफी नाराजगी है कि हर तरह से समृद्ध हो चुके लोगों के बच्चों को भी आरक्षण का फायदा दिया जाता है। हालांकि सबसे ज्यादा एतराज आरक्षण के नाम पर योग्यता की उपेक्षा किये जाने पर है। पदोन्नति में आरक्षण से भी एक वर्ग आक्रोशित है। और जो सबसे ज्यादा चर्चित बात है वह है नौकरियों की संख्या में कमी जिसके फलस्वरूप आरक्षण केवल झुनझुना बनकर रह गया है। इन सबसे मोदी सरकार और भाजपा दोनों भलीभांति परिचित हैं। अपने ऊपर लगे सवर्ण ठप्पे को हटाने के लिए सामाजिक समरसता का जो प्रयास किया गया वह चौबे जी का छब्बे बनने के फेर में दुबे बन जाने जैसा साबित हुआ। अंतत: भाजपा ने उस वास्तविकता को स्वीकारा जो उसका समर्थक वर्ग उससे अपेक्षा करता आ रहा था। जहां तक इस निर्णय के संसद की मंजूरी मिलने के बाद भी न्यायालय में जाकर अटक जाने की आशंका है तो उसके बारे में ये कहा जा सकता है कि संविधान में वर्णित आरक्षण के प्रावधान को संशोधित करने के बाद सम्भवत: न्यायपालिका भी उसे नहीं छेड़ेगी किन्तु वैसा हुआ तब भी सभी राजनीतिक दलों पर ये दबाव बन जायेगा कि वे आर्थिक आधार पर आरक्षण को समर्थन दें। ये ठीक उसी तरह से होगा जैसे राहुल गांधी ने हिंदुओं को आकर्षित करने के लिए जनेऊ पहिनना और मंदिर-मठ में पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया। हालांकि सवर्ण मतदाता मोदी सरकार के इस निर्णय का आंख मूंदकर समर्थन कर देंगे ये मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि असली गुस्सा तो आरक्षण की आड़ में योग्यता को दरकिनार किये जाने से है। एक वर्ग ये भी कह रहा है कि राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थों की खातिर समाज को जाति में बांटकर खण्ड-खण्ड करने में जुटी हैं। सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर बीते कुछ दशक से देश में जो हुआ उसने नए किस्म के वर्ग संघर्ष को जन्म दे दिया। डॉ. लोहिया जाति तोडऩे के पैरोकार थे किंतु उनके मानसपुत्र तो जाति नामक बैसाखी के सहारे पर ही चलते हैं। इस तथाकथित मास्टर स्ट्रोक से भाजपा को लोकसभा चुनाव में फायदा होगा या नहीं उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण ये बात है कि इससे आरक्षण को संकुचित दायरे से निकालकर वास्तविकता के धरातल पर उतारने की कवायद शुरू होगी। आरक्षण का आधार जाति की बजाय गरीबी हो और चयन के लिए योग्यता से समझौता न किया जाए तो वह एक आदर्श स्थिति होगी लेकिन उसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति उत्पन्न करना पड़ेगी। दुर्भाग्य से लगभग सभी राजनीतिक दल और अधिकतर नेता केवल चुनाव में जीत से आगे नहीं सोच पाते और इसीलिए आरक्षण जिस उद्देश्य से शुरू किया गया वह आज तक पूरा नहीं हो सका। मोदी सरकार के ताजा कदम को बर्र के छत्ते में पत्थर मारना भी कहा जा सकता है किन्तु इससे यदि सामाजिक न्याय अपने असली रूप में लागू हो सके तो ये देशहित में होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 7 January 2019

दलों के दलदल में प्रतिष्ठा खोती राजनीति

लोकसभा चुनाव के पहले विभिन्न राजनीतिक दलों में गठबंधन की प्रक्रिया चल रही है। कांग्रेस चाहती है कि भाजपा विरोधी सभी पार्टियां उसके साथ खड़ी हो जाएं जिससे नरेंद्र मोदी को दोबारा सत्ता में आने से रोका जा सके। इस मुहिम को महागठबंधन का नाम दिया जा रहा है। गत वर्ष उप्र में हुए दो उपचुनावों में सपा-बसपा गठबंधन की वजह से भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी। कांग्रेस भी उस प्रयास में सहभागी बनी।  उसके बाद ये बात तो साफ हुई कि भाजपा विरोधी मतों का विभाजन रोककर उसे हराया जा सकता है किंतु उसके बाद मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के रवैये से क्षुब्ध सपा और बसपा ने अलग होकर चुनाव लड़ा।  छत्तीसगढ़ में तो मायावती ने अजीत जोगी से गठजोड़ किया। संयोगवश मप्र और राजस्थान में त्रिशंकु की स्थिति बनने से कांग्रेस को सपा और बसपा का समर्थन लेना पड़ा लेकिन जैसी कि खबरें आ रही हैं उनके अनुसार दोनों ही पार्टियां उप्र में कांग्रेस को बराबरी से बिठाने के लिए राजी नहीं हैं। महागठबंधन को राष्ट्रीय स्वरूप देने में सोनिया गांधी के प्रयास अभी तक तो सफल नहीं दिख रहे। हालांकि आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी का कांग्रेस के साथ आना भाजपा के लिए बड़ा झटका है लेकिन तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव द्वारा तीसरे मोर्चे की जो कोशिशें की जा रही हैं उनसे महागठबंधन को अपेक्षित ताकत नहीं मिल पा रही। बंगाल में ममता बैनर्जी और उड़ीसा में नवीन पटनायक हैं तो भाजपा विरोधी लेकिन वे कांग्रेस के साथ आने भी राजी नहीं हैं। यही स्थिति शिव सेना की है जो भाजपा से खार खाए बैठी है किंतु महाराष्ट्र में वह कांग्रेस और एनसीपी से भी हाथ नहीं मिला रही। बिहार में जरूर महागठबंधन आकार ले रहा है लेकिन उसका वैसा वृहद स्वरूप नहीं बन पाया जैसा कांग्रेस चाहती है। दूसरी तरफ  भाजपा के नेतृत्व में बना एनडीए भी 2014 वाली स्थिति में नहीं रहा। तेलुगु देशम और शिवसेना नामक दो बड़े धड़े उसे छोड़कर चलते बने वहीं बिहार में कुर्मियों के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने भी सरकार और गठबंधन छोड़ दिया। हालांकि बिहार में नीतीश के साथ आ जाने से भाजपा को बल मिला है किन्तु एनडीए में शरीक अन्य छोटी पार्टियां जिस तरह से आये दिन उसे धमकाया करती हैं उससे भाजपा के दबदबे में भी कमी दिख रही है। रामविलास पासवान ने भाजपा नेतृत्व को जिस आसानी से घुटनाटेक करवाया उससे बाकी छोटी दलों की हिम्मत भी बढ़ गई। इस प्रकार ये स्पष्ट हो गया है कि गठबंधन के नाम पर सिद्धान्तों और नीतियों की राजनीति को तिलांजलि दे दी गई है। सारा ध्यान किसी भी तरह से सत्ता हासिल करने पर केंद्रित होकर रह गया है। हालांकि यह भी सही है कि भारत सदृश विविधता भरे देश में  कोई राजनीतिक विचार या सोच सबको स्वीकार हो ये जरूरी नहीं है लेकिन दूसरी ओर ये भी सही है कि राष्ट्रीय पार्टियों के कमजोर होने से क्षेत्रीयतावाद को बढ़ावा मिल रहा है। 1956 में भाषावार राज्यों के गठन के बाद अलग पहिचान बनाने के फेर में राजनेताओं ने जो सियासत शुरू की उसकी विषबेल पूरे देश में फैल गई। इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि राष्ट्रीय हितों पर प्रादेशिक स्वार्थ हावी होने लगे। क्षेत्रीय दलों द्वारा शासित राज्यों की सरकार केंद्र से जिस तरह पेश आती है उससे कभी-कभी लगता है मानों वह किसी और देश की हों। इस समय गठबंधन की जो प्रक्रिया राष्ट्रीय स्तर पर चल रही है उसके पीछे सत्ता में हिस्सेदारी ही एकमात्र उद्देश्य है। रामविलास पासवान और नीतीश कुमार भले ही भाजपा के साथ हों लेकिन वे राम मन्दिर को चुनावी मुद्दा बनाने को राजी नहीं हैं। नीतीश ने तो राज्यसभा में तीन तलाक विधेयक पर भाजपा का समर्थन करने से भी इंकार कर दिया। कुल मिलाकर दलों के दलदल में फंसकर राजनीति अपनी प्रतिष्ठा और पवित्रता दोनों खोती जा रही है। लेकिन ये भी सही है कि जिस तरह से क्षेत्रीय ताकतें ताकतवर होती जा रही हैं उसे देखते हुए कांग्रेस या भाजपा का अपनी दम पर सरकार बना लेना कठिन होता जा रहा है। 2014 में मोदी लहर के चलते भाजपा ने लोकसभा में 282 सीटें हासिल कर स्पष्ट बहुमत तो पा लिया किंतु उसके पीछे गठबंधन की ताकत भी थी। राज्यों के भीतर भले ही कांग्रेस और भाजपा अपने बलबूते सता हासिल कर लें लेकिन संसद के चुनाव में उन्हें छोटे दलों से हाथ मिलाना ही पड़ेगा। दुर्भाग्य ये भी है कि राष्ट्रीय दल के तौर पर तो दो पार्टियां यद्यपि हैं किंतु ऐसे राष्ट्रीय नेता का सर्वथा अभाव हो गया है जिसका सम्मान और स्वीकृति पूरे देश में हो। इंदिरा जी और अटल जी जैसे नेताओं की कल्पना तक अब करना कठिन हो गया है। ये स्थिति कब बदलेगी या सुधरेगी कह पाना मुश्किल है क्योंकि कोई भी दल सत्ता का मोह छोडऩे को तैयार नहीं है। सैद्धांतिक पहिचान और नीतिगत अंतर भी अतीत की बात होकर रह गए हैं। चुनाव जीतने के लिए नीतियों के प्रचार से ज्यादा मुफ्त उपहार पर जोर दिया जाता है। प्रश्न ये है कि क्या ये स्थिति देश के हितों को सुरक्षित रख सकेगी क्योंकि राष्ट्रीय महत्व के अनेक विषयों पर फैसला ही नहीं हो पा रहा। यहां तक कि न्यायपालिका पर भी राजनीति की छाया पडऩे लगी है। आगामी लोकसभा चुनाव में किसकी सरकार बनेगी इससे ज्यादा जरूरी ये है कि जो भी दल या गठबंधन सत्ता में आए वह क्षणिक स्वार्थ सिद्ध करने की बजाय दूरगामी राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर काम करे। वर्तमान परिदृश्य तो निराशा उत्पान करने वाला है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 5 January 2019

इसके पहले कि बात हाथ से निकल जाए.....

गत दिवस सोशल मीडिया पर किसी ने एक चुटकुला प्रेषित किया जिसके अनुसार एक न्यायाधीश शहर के सबसे बड़े डॉक्टर के पास किसी बीमारी के इलाज के लिए गए । बीमारी की वजह से न्यायाधीश महोदय काफी तकलीफ में थे। उनके आते ही डॉक्टर को इत्तला दी गई तो उसने उन्हें भीतर बुलवा लिया। न्यायाधीश ने अपनी तकलीफ बताते हुए कहा कि उन्हें फौरन इलाज की जरूरत है लेकिन डॉक्टर ने पैथालॉजी जांच रिपोर्ट देखकर उन्हें एक माह बाद की तारीख देते हुए आने को कहा। इस पर न्यायाधीश महोदय नाराज होकर बोले आप समझ क्यों नहीं रहे मुझे तत्काल इलाज की जरूरत है और आप हैं जो एक माह बाद आने को कह रहे हैं। तकलीफ  के कारण मेरे कई काम रुके हुए हैं। आपसे अनुरोध है कृपया सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर मेरा इलाज शुरू कीजिए किन्तु डॉक्टर  ने उन्हें टके सा जवाब देते हुए कहा कि आपका इलाज मेरी प्राथमिकताओं में नहीं आता क्योंकि वे सर्वथा अलग हैं। पाठक सोच रहे होंगे कि इस प्रसंग का इस स्तंभ में क्या औचित्य है ? लेकिन मजाक में कही गई उक्त बात के निशाने पर भारत का सम्मानीय सर्वोच्च न्यायालय है जो अयोध्या विवाद पर डॉक्टर की तरह टालमटोली कर रहा है। नए मुख्य न्यायाधीश ने गत वर्ष के अंतिम महीनों में इस विवाद की नियमित सुनवाई से इंकार करते हुए कहा था कि उनकी प्राथमिकताएं कुछ और हैं तथा जनवरी के प्रथम सप्ताह में नई पीठ बनाकर सुनवाई की जावेगी। वह कब तक निर्णय देगी इस पर भी वे कुछ बता नहीं सके। गत दिवस जब उक्त मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचारार्थ आया तब देश को उम्मीद थी कि उसकी दिशा तय होगी किन्तु एक मिनिट से भी कम समय में आगामी 10 जनवरी तक उसे टालते हुए कह दिया गया कि उस दिन तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया जाएगा जो आगे का कार्यक्रम तय करेगी। इस प्रकार इस बहुप्रतीक्षित प्रकरण के फैसले की समय सीमा तय नहीं हो पा रही। माननीय न्यायाधीशगण भी इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं कि यह कोई साधारण भूमि विवाद न होकर बीते अनेक दशकों से राजनीति के साथ साम्प्रदायिक टकराहट की वजह बना हुआ है। जिसके परिणाम स्वरूप देश के भीतर काफी उथलपुथल और अशांति बनी रहती है। किसी अनिष्ट की आशंका के साथ ही अनिश्चितता का भी  बड़ा कारण ये विवाद है। मूलत: यह मामला जमीन के स्वामित्व का है किंतु हिंदुओं का विश्वास है कि इसी स्थान पर हजारों वर्ष पहले उनके आराध्य प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था जहां बाबर के शासनकाल में उनके खासमखास मीर बाकी ने एक मस्जिद बनवा दी जिसे बाबरी नाम दिया गया। उसमें नमाज़ पढ़े जाने को लेकर भी काफी भ्रांतियां हैं किंतु हिन्दू संगठनों की पुरानी मांग के बाद जब राजीव गाँधी के कार्यकाल में बाबरी ढांचे के भीतर रखी भगवान राम की मूर्तियों का ताला खुलवाकर पूजा पाठ शुरू हुआ तबसे अयोध्या विवाद राष्ट्रीय स्तर पर फैल गया और बीते तीन दशक से न केवल उप्र अपितु पूरे देश में इसे लेकर हिन्दू मुस्लिमों के बीच घोषित और अघोषित झगड़ा चला आ रहा है जिसे राजनीति का समर्थन मिलने से वह और भी गम्भीर होता गया। कहने वाले कहते भी हैं कि आज़ादी के बाद भारत ने जिस धर्मनिरपेक्षता को अपना लिया था उसे इस मसले ने छिन्न भिन्न कर दिया। दंगे फसाद तो हुए ही राजनीतिक छुआछूत भी चरम पर जा पहुँची। उम्मीद की जाती थी कि देश के भाग्य विधाता बने बैठे सांसद इस विवाद का समुचित हल निकालकर राहत प्रदान करेंगे किन्तु राजनीति राष्ट्रहित से ऊपर उठकर चूंकि वोट बैंक पर जाकर टिक गई है इसलिये तमाम आश्वासनों के बाद भी संसद इस विवाद का हल निकालने से बचती रही।  इसी तरह दोनों पक्षों के धर्मगुरु एवं अन्य आध्यात्मिक हस्तियों ने भी समय - समय पर प्रयास किये किन्तु उनमें या तो ईमानदारी नहीं थी या फिर हठधर्मिता आड़े आ गई। जब सभी तरफ से निराशा हाथ लगी तब हर कोई न्यायपालिका की तरफ उम्मीद से देखने लगा। अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित भूमि के तीन हिस्से करने वाला फैसला भी दिया लेकिन अपीलों की वजह से बात सर्वोच्च न्यायालय में जाकर अटक गई। लेकिन ये कहने में दुख होता है कि वह भी इस ज्वलंत मुद्दे को गम्भीरता से लेने की बजाय एक साधारण भू स्वामित्व विवाद की तरह ले रहा है जिससे बात वहीं की वहीं अटकी हुई है। गत दिवस पूरे देश को आशा थी कि सर्वोच्च न्यायालय ऐसा कुछ करेगा जिससे राहत की अनुभूति हो सके लेकिन उसने क्षण भर में बात हफ्ते भर के लिए टाल दी किन्तु उससे भी कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता। बीते कुछ महीनों से हिन्दू संगठन मोदी सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि वह अध्यादेश लाकर विवाद का फैसला कर दे किन्तु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक साक्षात्कार में स्पष्ट कर दिया कि न्यायपालिका के फैसले के बाद ही सरकार कोई  कदम उठायेगी।  चूंकि लोकसभा चुनाव करीब हैं और शिवसेना भी राम मंदिर को मुद्दा बनाकर भाजपा के मुकाबले खुद को हिंदुओं का हित चिंतक साबित करने के लिए प्रयासरत हैं इसलिए ये जरूरी हो जाता है कि चुनाव के पूर्व सर्वोच्च न्यायालय फैसला दे जिससे देश एक बड़ी अनिश्चितता से उबर सके। संयोगवश हिन्दू और मुसलमानों के साथ ही अयोध्या विवाद में रुचि रखने वाले अन्य लोग भी अदालत के फैसले को स्वीकार करने के लिए राजी हैं इसलिए न्यायपालिका को भी हिचक नहीं होनी चाहिए। ये बात भी सच है कि अगर चुनाव तक यथास्थिति बनी रही तब कुछ अप्रिय घटने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि अयोध्या विवाद केवल भूमि के मालिकाना हक तक सीमित न रहकर सरकार बनाने और गिराने तक जा पहुँचा है।  सर्वोच्च न्यायालय की स्वायत्तता सर्वोच्च है जिसे छेडऩा लोकतंत्र के लिए घातक होगा लेकिन दूसरी तरफ  न्याय की सबसे ऊंची आसंदी पर विराजमान माननीय न्यायाधीशों का भी ये कर्तव्य है कि वे जनभावनाओं को समझकर इस अति सम्वेदनशील विषय को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में रखते हुए एक समय सीमा तय करें वरना चिंगारी को आग बनाने वाले मौके की तलाश में रहेंगे। इसके पहले कि बात हाथ से निकल जाए उसे संभालना ही बुद्धिमत्ता होती है। न्यायपालिका से पूरा देश यही अपेक्षा कर रहा है।

-रवीन्द्र वाजपेयी