Tuesday, 5 February 2019

क्या राहुल अपना पुराना बयान भूल गए

राजनीति में कभी-कभी अपनी कही बात ही अपने गले किस तरह पड़ जाती है इसका ताजातरीन उदाहरण है कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का वह बयान जिसमें उन्होंने शारदा चिट फंड घोटाले में ममता बैनर्जी पर धुआंधार आरोप लगाते हुए उसे सबसे बड़ा घोटाला बताते हुए कहा था कि 20 लाख गरीबों की मेहनत की कमाई उसमें हड़प ली गई। परसों कोलकाता में पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के यहां सीबीआई की दबिश के बाद शुरू हुए राजनीतिक नाटक में लगभग सभी विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने ममता बनर्जी को समर्थन के संदेश भेज दिए लेकिन जब राहुल ने भी उन्हें साथ देने का भरोसा जताया तब सोशल मीडिया सहित अन्य माध्यमों में भी 2016 के बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल द्वारा शारदा चिटफंड घोटाले को लेकर ममता बनर्जी पर लगाये गए आरोपों वाला बयान बाहर निकलकर आ गया। इस बारे में विचित्र स्थिति बन गई जब बंगाल के कांग्रेसी ममता सरकार को बर्खास्त करने की गुहार लगाते सुने गए। इस पूरे मामले में कांग्रेस ने जो जल्दबाजी की उससे बंगाल में उसकी संभावनाओं को और धक्का पहुँचा है। उल्लेखनीय है पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाले वामपंथी न तो ममता की महारैली में ही शामिल हुए और न ही उन्होंने ताजा विवाद में बहुत ज्यादा उत्साह दिखाया। ऐसा लगता है मोदी सरकार के विरोध में कांग्रेस अध्यक्ष आगा-पीछा सोचे बिना ही फैसला ले लेते हैं। आंध्र में तेलुगु देशम के साथ गठबंधन के कारण वहां के बड़े-बड़े कांग्रेस नेता पार्टी छोड़कर भाग रहे हैं। ममता को समर्थन देकर राहुल ने बंगाल में भी कांग्रेस के बचे खुचे जनाधार को खतरे में डाल दिया है। उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए था कि ममता पूरी तरह से आत्मकेंद्रित नेत्री हैं जिनका हर निर्णय केवल और केवल उन्हीं की फायदे के लिए होता है। इस बारे में उनकी तुलना स्व. जयललिता और बसपा सुप्रीमो मायावती से की जा सकती है। इस विवाद में जीत होगी तो ममता की और हार हुई तो उसका हिस्सा कांग्रेस के खाते में भी जायेगा। राहुल गांधी को ये साफ  करना चाहिए कि क्या शारदा घोटाले संबंधी अपने पिछले बयान से वे किनारा कर गए हैं क्योंकि एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते उन्हें कुछ भी बोलने या करने से पहले इत्मिनान से सोचना चाहिए। पता नहीं वे कैसे भूल जाते हैं कि इन्हीं ममता की वजह से कांग्रेस बंगाल की खाड़ी में गहराई तक डूब चुकी है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 February 2019

बंगाल की खाड़ी से उठा सियासी चक्रवात

इसमें दो मत नहीं हैं कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी एक दबंग और जनाधार वाली नेत्री हैं। चार दशक तक वामपंथियों के अभेद्य दुर्ग के तौर पर स्थापित इस राज्य में सत्ता परिवर्तन का जो कारनामा इंदिरा जी, राजीव गांधी और अटल जी जैसे महारथी तक नहीं कर पाए वह ममता ने कर दिखाया। आगामी लोकसभा चुनाव में वामपंथी यदि एक सीट भी नहीं जीत सकें तो अचंभा नहीं होगा। ममता ने जब कांग्रेस को वामपंथियों की बी टीम कहकर तृणमूल कांग्रेस बनाई उसके बाद कांग्रेस भी घुटनों के बल आ गई। लेकिन बीते कुछ वर्षों में भाजपा ने बंगाल में अपना प्रभावक्षेत्र जिस तेजी से बढ़ाया उसने ममता की परेशानी बढ़ा दी है। असम, मणिपुर और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद सुश्री बैनर्जी की चिंताएं और बढ़ गईं। हॉलांकि वे वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री में रह चुकी थीं लेकिन बाद में उनका भाजपा से छत्तीस का आंकड़ा बन गया जो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के उभरने के बाद और भी तल्खी भरा होता गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बंगाल में अच्छे मत हासिल करते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी। बाबुल सुप्रियो को केंद्र में मंत्री बनाकर भाजपा ने बंगाल में अपना फैलाव करने का जो प्रयास किया वह रंग लाने लगा और विधानसभा के बाद हुए निकाय चुनाव में भाजपा तृणमूल की निकटतम प्रतिद्वंदी बनकर सामने आ गई। अपने एकछत्र साम्राज्य को चुनौती मिलना ममता को भला कहां सहन होता और उस पर भी जब मोदी सरकार शारदा चिट फंड घोटाले सहित कुछ अन्य मामलों में उनकी सरकार के मंत्रियों और सांसदों पर शिकंजा कसने सक्रिय हो उठी हो। यही वजह है कि बीते कुछ समय से ममता केंद्र सरकार और भाजपा के प्रति बेहद असहिष्णु और आक्रामक हो उठी हैं। सीबीआई के दखल को रोकने के साथ ही उन्होंने राज्य सरकार का कोई भी डाटा केंद्र के साथ बाँटने पर पाबंदी लगा दी। अपनी पार्टी के कुछ बड़े चेहरों के भाजपा में चले जाने से भी उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा। दरअसल भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों सहित मुस्लिम तुष्टीकरण को लेकर जिस तरह से ममता को घेरा उससे वे बौखलाहट की स्थिति में पहुंच गई। कुछ समय पहले उन्होंने कोलकाता में सभी भाजपा विरोधी दलों की एक बड़ी रैली आयोजित कर मोदी सरकार के विरूद्ध  महौल बनाने का प्रयास किया। उस रैली के बाद भाजपा और सक्रिय हो गई। बीते सप्ताह ही प्रधानमंत्री ने बंगाल में जो रैली की उसमें इतनी भीड़ उमड़ पड़ी कि सभास्थल छोटा पड़ गया। काफी समय से बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याओं का वैसा ही दौर चल रहा है जैसा वामपंथी शासन में होता था। दरअसल साम्यवादी सत्ता का अंत होते ही वाममोर्चे के साथ जुड़े असामाजिक तत्व तृणमूल में घुस गए और वही सब करने लग गए जिसके खिलाफ  ममता ने बरसों लड़ाई लड़ी। भाजपा की रथ यात्रा को अनुमति नहीं देना, अमित शाह के हेलीकॉप्टर को उतरने से रोकना और उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सभा को रोकने जैसे कदम इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि ममता को भाजपा से खतरा महसूस होने लगा है। श्री मोदी और अमित शाह बंगाल में जब भी गए उन्होंने शारदा घोटाले का जिक्र प्रमुखता से किया। कुल मिलाकर सुश्री बैनर्जी के मन में केंद्र सरकार द्वारा की जा रही घेराबंदी का भय इस तरह बैठ चुका है कि वे कुछ भी करने पर आमादा हैं। दो-ढाई साल पहले उन्होंने सेना पर उनका तख्त पलट जैसा गम्भीर आरोप लगाकर सनसनी फैलाई थी। गत दिवस कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुँची सीबीआई टीम के कुछ अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। उल्लेखनीय है श्री कुमार शारदा घोटाले की जांच की लिए बने विशेष जांच दल के मुखिया रह चुके है और इस कारण एक गवाह भी हैं। सीबीआई का कहना है कि वे जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं तथा मांगे जाने पर भी जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं उपलब्ध करवा रहे। यही नहीं तो बकौल सीबीआई उन्होंने घोटाले से सम्बंधित कुछ प्रमाण नष्ट भी कर दिए। ये जांच सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर मोदी सरकार के पहले से चल रही है। गत शाम ज्योंही सीबीआई दल पूछताछ हेतु पहुँचा तो बजाय सहयोग करने के श्री कुमार ने उसके कुछ सदस्यों को गिरफ्तार करवा दिया। इसी बीच ममता उनके आवास पर आ गईं और केन्द्र सरकार पर संघीय ढांचे और संविधान के विरुद्ध काम करने का आरोप लगाते हुए धरने पर बैठ गईं। घोटाले की जांच तो पीछे चली गई और राजनीतिक नाटक शुरू हो गया। देश भर से भाजपा विरोधी विपक्षी नेताओं ने सुश्री बैनर्जी को फोन करते हुए समर्थन दे दिया। इस अभूतपूर्व स्थिति के बाद सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय जाने का निर्णय लिया जो कल सुनवाई के उपरांत अपना अभिमत देगा जिसके बाद ही ये तय हो सकेगा कि सीबआई गलत थी या ममता? लेकिन इस सबसे हटकर एक सवाल ये उठ रहा है कि सीबीआई के नोटिस पर भी श्री कुमार ने पूछताछ में सहयोग क्यों नहीं किया और यदि उसकी टीम उनके घर पहुँच ही गई तब बजाय उसके सदस्यों को गिरफ्तार करने के वे मांगी गई जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध करवा सकते थे। यदि जांच एजेंसी उन्हें गिरफ्तार करती तब तो ममता का बवाल मचाना वाजिब भी होता लेकिन महज सीबीआई के घर पर आ जाने से संघीय ढांचा और संविधान किस तरह खतरे में पड़ गया ये समझ से परे है। बहरहाल अब सभी को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए क्योंकि केंद्र और राज्य दोनों ही अपने को सही ठहराने में जुटे हुए हैं। ममता के आरोप सही हैं या गलत इस बहस में पड़े बिना ये तो पूछा ही जा सकता है कि एक अधिकारी के घर किसी जांच एजेंसी के जाने पर राज्य के मुख्यमंत्री का धरने पर बैठ जाना कहां तक संविधान सम्मत है? क्योंकि इससे एक नई परिपाटी जन्म ले सकती है। ममता को ये नहीं भूलना चाहिए कि श्री कुमार भले ही उनके राज्य में पदस्थ हों किन्तु वे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी होने  से केंद्र सरकार के अधीनस्थ ही होते हैं। यदि मोदी सरकार उन्हें कोलकाता से हटाकर दिल्ली बुलवा ले तब ममता क्या वहां जाकर भी धरने पर बैठेंगी? बंगाल की खाड़ी से उठा ये सियासी चक्रवात न तो संघीय ढांचा बचाने के लिए है और न ही संविधान की चिंता इसके पीछे है। केंद्र सरकार यदि राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से ममता सरकार को परेशान कर रही है तो वे भी कौन सी सौजन्यता दिख रही हैं? यदि राजीव कुमार पाक साफ हैं और शारदा घोटाले में ममता तथा उनके निकटस्थ निर्दोष हैं तो संबंधित कागजात एवं अन्य प्रमाण जांच एजेंन्सी को सौंपने में क्या आपत्ति थी? रही बात ममता के धरने की तो उनकी आदत और कार्यशैली से सभी परिचित हैं इसलिए उनके धरने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। लेकिन इस विवाद के बाद संघीय ढांचे और केंद्र-राज्य सम्बन्धों को लेकर चलने वाली बहस नए मोड़ पर आ पहुंची है। कल को कोई राज्य सर्वोच्च न्यायालय को भी ठेंगा दिखाने लगे तब भी क्या संघीय ढांचे का रोना रोया जाएगा? राजीव कुमार जिस तरह से ममता के धरने में शिरकत कर रहे हैं उसकी वजह से वे सेवा शर्तों के उल्लंघन के आरोप में भी घिर गए हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 February 2019

बजट : लिया कुछ नहीं - दिया ही दिया

नरेंद्र मोदी सरकार ने गत दिवस जो अंतरिम बजट पेश किया उस पर चुनावी रंग होने का विपक्षी आरोप पूरी तरह सही है। पूर्व वित्त मंत्री पी.चिदंबरम ने अंतरिम के नाम पर पूर्ण बजट पेश करने पर जो आपत्ति व्यक्त की वह भी बैद्धिक विमर्श के लिहाज से ठीक है। ये कहना भी गलत नहीं होगा  कि लोकसभा चुनाव के लगभग ढाई महीने पहले मोदी सरकार ने इस बजट के बहाने एक तरह से भाजपा या यूँ कहें कि एनडीए का वायदा पत्र ही प्रस्तुत कर दिया। कार्यवाहक वित्तमंत्री पीयूष गोयल ने एक सिद्धहस्त चार्टर्ड अकाउंटेंट होने का जोरदार परिचय देते हुए जिस तरह का बजट लोकसभा में रखा वह किसी एक दिवसीय क्रिकेट मैच के अंतिम ओवरों के रोमांच जैसा एहसास दे रहा था। जिस तरह क्रिकेट में बल्लेबाजी के परम्परागत शाट्स से हटकर अब रिवर्स स्वीप जैसे नए तरीके ईजाद कर लिए गए हैं ठीक उसी तरह राजनीति भी केवल चुनाव जीतने पर केंद्रित हो गई है और उस आधार पर श्री गोयल ने अपने कप्तान श्री मोदी के निर्देशनुसार जिस धमाकेदार अंदाज में बल्लेबाजी की वह चुनाव रूपी ट्राफी जीतने पर ही केंद्रित थी। उन्होंने अच्छी सलामी बल्लेबाजी से टीम मोदी को एक मजबूत आधार दे दिया है जिसे जीत तक ले जाना बाकी खिलाडिय़ों पर निर्भर होगा कि वे विपक्षी दलों की गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण का किस कुशलता से सामना करते हैं। बहरहाल जहां तक बात इस अंतरिम बजट के विश्लेषण की है तो ये शत-प्रतिशत चुनावी है, जो अपेक्षित भी था। यदि कल वित्तमंत्री की भूमिका में श्री गोयल की जगह श्री चिदंबरम होते तब वे भी घुमा-फिराकर ऐसा ही बजट पेश करते। लोकसभा के जो चित्र टीवी पर दिखाई दिए उनमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मुरझाया चेहरा और कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े की परेशानी बजट पर विपक्ष की अनकही प्रतिक्रिया मानी जा सकती है जो बाद में उनके बयानों से और मुखरित हो गई। प्रधानमंत्री श्री मोदी को जानने वाले ये तो मानते ही हैं कि वे स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की तरह के आदर्शवादी नहीं हैं। लेकिन ये भी सही है कि शासन-प्रशासन के संचालन के अलावा मतदाताओं को प्रभावित करने की कला में वे पूरी तरह से पारंगत हैं। बीते पौने पाँच वर्ष में उन्होंने जितनी भी आलोचनाएं और कटाक्ष झेले उन सभी का जवाब इस अंतरिम बजट में दे दिया और वह भी इस सावधानी के साथ कि सरकार द्वारा दिखाई जाने वाली दरियादिली का लाभ सुपात्रों को ही मिले। गरीब, किसान, कर्मचारी, मजदूर, महिलाओं आदि को एक साथ खुश करना कोई आसान बात नहीं थी। लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली की बीमारी के कारण उनकी जगह आए पीयूष गोयल ने पूरे देश को खुश होने के मौके तो दे ही दिए। बजट के अंतर्निहित प्रावधानों का खुलासा होने के बाद हो सकता है कहीं खुशी कहीं गम का माहौल बन जाये लेकिन प्रधानमंत्री ने 2014 में सबका साथ सबका विकास के जिस नारे पर चुनाव जीता था उसे जमीन पर उतारने की पुरजोर कोशिश बजट के माध्यम से गई। प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि अधिकाँश मतदाता दीर्घकालीन की बजाय नगद लाभ से प्रभावित होते हैं। हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने कर्ज माफी के वायदे से भाजपा को धूल चटाकर इसे साबित भी कर दिया। कल पेश हुए अंतरिम बजट में मतदाताओं के उस वर्ग को सीधे संबोधित किया गया जो छोटे-छोटे फायदों से संतुष्ट हो जाता है। चुनावी राजनीति के इस दौर में किसी भी सरकार के लिए लोकलुभावन नीतियों के साथ ही अर्थव्यव्यस्था को पटरी पर बनाये रखना बहुत कठिन हो गया है। लेकिन मोदी सरकार की प्रशंसा करनी होगी कि उसने कड़े वित्तीय अनुशासन से लोगों की नाराजगी मोल लेने का खतरा भी उठाया वहीं समाज के निम्न मध्यम वर्ग और गरीबों को विकास की मुख्य धारा में शामिल करने की सदाशयता भी दिखाई। बीते पौने पाँच साल तक श्री मोदी के प्रचलित नारे अच्छे दिन आने वाले हैं का खूब मज़ाक उड़ता रहा। विरोधी दल ही नहीं अपितु आम जन भी ये कहनेे लगे कि सबका साथ सबका विकास केवल जुमला था और ये सरकार पूंजीपतियों और उसमें भी एक दो घरानों की हितकचिन्तक रही है। लेकिन कल के बजट ने उन सभी आलोचनाओं को सिरे से ध्वस्त कर दिया। श्री गोयल का पूरा बजट समाज के प्रत्येक वर्ग को कुछ न कुछ देने वाला रहा। जिसे कुछ नहीं मिला उससे कुछ लिया भी नहीं गया। जिस वर्ग को प्रत्यक्ष रूप से उपकृत नहीं किया वह परोक्ष तौर से लाभान्वित होता दिख रहा है। उद्योग और हाउसिंग सेक्टर को बजट प्रावधानों से निश्चित रूप से जबर्दस्त सहारा मिला जो अर्थव्यवस्था में आए ठहराव को दूर कर सकता है। एक बात जरूर खटकने वाली है कि बजट में रोजगार बढ़ाने के कोई सीधे उपाय नहीं किये गए। एक दिन पहले ही बेरोजगारी के जो भयावह आंकड़े आए उनके मद्देनजर उम्मीद थी कि जिस तरह किसानों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को नगद लाभ देने की पहल की गईं वैसा ही कुछ शिक्षित बेरोजगारों के लिए भी किया जाता। उस मामले में श्री गोयल ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे बेरोजगार संतुष्ट हो जाते। हो सकता है कारोबार में वृद्धि तथा नौकरपेशा मध्यमवर्ग की जेब में आने वाले ज्यादा धन से बाजार में मांग उठे। वहीं जमीन-जायजाद विशेष रूप से घर बनाने और खरीदने के लिए दिए गए प्रोत्साहन से रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हों लेकिन ये वह मुद्दा है जो लोकसभा चुनाव में श्री मोदी के लिए समस्या बन सकता है। छोटे किसानों को छह हजार साल की मदद यद्यपि ऊंट के मुंह में जीरा जैसी है लेकिन इसे शुरुवात समझकर उसका स्वागत किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर भले ही श्री गोयल ने चालाकी के साथ चतुराई का समन्वय बनाते हुए अंतरिम को पूर्ण बजट बनाने का दांव चला हो लेकिन कुछ लक्ष्मण रेखाएं फिर भी ऐसी रहीं जिन्हें वे नहीं लांघ सके। लेकिन इसके जरिये मोदी सरकार चुनाव के पहले ये संदेश देने में तो कामयाब हो ही गई कि वह अपने समर्थक और प्रतिबद्ध मतदाताओं के कल्याण के लिए संवेदनशील है। इसका चुनावी असर क्या होता है ये तो इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस तथा बाकी विपक्षी दल जनता के सामने कौन से वायदे परोसते हैं। लेकिन बहुत ज्यादा खैरात बांटने की गुंजाइश भी नहीं है। मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में किसानों की कर्जमाफी में आ रही आर्थिक और व्यवहारिक परेशानियां इसका प्रमाण हैं। अर्थव्यवस्था को मुफ्तखोरी और भ्रष्टाचार से बचाकर ठोस आधार देने के साथ ही जरूरतमंदों का जीवन स्तर उठाने के प्रयासों के लिए इस सरकार को अच्छे अंक दिये जा सकते हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 February 2019

बेरोजगारी : तमाम उपलब्धियों पर भारी

आज दोपहर तक ये स्पष्ट हो जाएगा कि अच्छे दिन आने वाले हैं का वायदा बांटकर सत्ता में आई मोदी सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद आगामी लोकसभा चुनाव के पहले देश की जनता को क्या सौगात देती है? किसानों और मध्यमवर्गीय नौकरी पेशा लोगों के साथ नोटबन्दी और जीएसटी से हलाकान हुए व्यापार-उद्योग जगत की मिजाजपुर्सी करने का मानसिक दबाव प्रभारी वित्तमंत्री पीयूष गोयल से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर है जो अभी भी लोकप्रियता की दौड़ में अव्वल बने रहने के बावजूद 2014 वाले स्तर से नीचे आए हैं। दिसम्बर 2018 में तीन राज्य जिस तरह से भाजपा के हाथ से खिसके उससे फिर एक बार मोदी सरकार का शोर थोड़ा मद्धम पड़ा है। हालाँकि बतौर प्रधानमंत्री श्री मोदी ने अनेक ऐसे कार्य किये जो उनकी योग्यता और क्षमता को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और शासन व्यवस्था में सुधार की दिशा में उनकी कोशिशें दुस्साहसिक कही जाएंगी क्योंकि हमारा देश परिवर्तन को आसानी से स्वीकार नहीं करता। श्री मोदी की इस बात के लिए भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने विश्व मंच पर भारत की छवि को काफी उज्ज्वल बनाया और उसे एक संभावना भरे सक्षम और शक्तिसम्पन्न राष्ट्र के तौर पर मान्यता दिलवाई। उन पर ये आरोप भी लगते रहे हैं कि वे विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च कर अपने को वैश्विक व्यक्तित्व के तौर पर स्थापित करने में लगे रहे किन्तु ये कहना गलत नहीं होगा कि कूटनीतिक क्षेत्र का अनुभव नहीं होने पर भी उन्होंने विदेशी मोर्चे पर शानदार काम किया। उनके विदेशी दौरों पर उंगली उठाने वाले ये भूल जाते हैं कि उसका अकल्पनीय लाभ अप्रत्यक्ष तौर पर देश को मिला है। लेकिन ये बात भी सही है कि मोदी सरकार ने लीक से हटकर जो दीर्घकालीन नीतियां बनाईं उनकी वजह से आम जनमानस को लगा कि उसने 2014 के वायदे पूरे नहीं किये। वैश्विक मंदी के दौर में भी आर्थिक विकास की दर को 7 फीसदी से ऊपर रखना निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है जिसका लोहा पूरी दुनिया मान रही है। भारत ने विकासशील अर्थव्यव्यस्था में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने का जो चमत्कार किया वह वाकई उल्लेखनीय है जो कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी नहीं कर सके थे। विदेशी निवेश भी बीते पांच वर्षों में छप्पर फाड़कर आया। कर्ज पर ब्याज दरें कम हुई जिससे घर बनाने या खरीदने वालों को फायदा हुआ। किसानों की आत्महत्या की श्रृंखला के बावजूद कृषि उत्पादन में वृद्धि विरोधाभासी होते हुए भी एक सच्चाई है। लेकिन ये बात भी पूरी तरह सही है कि आर्थिक क्षेत्र में सतही तौर पर दिखाई दे रही रंगीनियों के पीछे एक अंधेरा भी है और वह है बेरोजगारी का जो मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता मानी जा रही है। आज जो आंकड़े आये उनके अनुसार बेरोजगारी के आंकड़े बीते कई दशकों में सर्वोच्च स्तर पर जा पहुँचे हैं। नीति आयोग हालांकि इस बारे में गोलमोल जवाब दे रहा है लेकिन सच्चाई किन्हीं आंकड़ों की मोहताज नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस आंकड़े को लेकर मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोला है। यूँ भी तमाम आर्थिक विशेषज्ञ रोजगार रहित विकास को लेकर प्रधानमंत्री और भाजपा को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। देश का जो युवा वर्ग श्री मोदी का प्रशंसक और समर्थक माना जाता है वह भी रोजगार के मुद्दे पर उनसे असंतुष्ट है। उसकी नाराजगी और विपक्ष की आलोचना गलत नहीं है क्योंकि देश आर्थिक विकास की राह पर बढ़ते हुए एक तरफ जहां चीन, फ्रांस और  ब्रिटेन जैसी आर्थिक महाशक्तियों को पीछे छोडऩे का दावा करने की स्थिति में आ गया है वहीं देश के करोड़ों युवा पढ़-लिख कर भी काम की तलाश में भटक रहे हैं। नोटबंदी के बाद कारोबार में आए ठहराव ने दूबरे में दो आसाढ़ की कहावत को चरितार्थ कर दिया। मोदी सरकार के लिए इस मुद्दे पर जवाब देना कठिन हो रहा है क्योंकि वह 2 करोड़ रोजगार प्रति वर्ष देने के नाम पर सत्ता में आई थी। यद्यपि केंद्र सरकार के सबसे सफल माने जाने वाले मंत्री नितिन गडकरी तर्क देते हैं कि बीते पांच वर्ष में राजमार्ग, फ्लायओवर, बंदरगाह और हवाई अड्डे जैसे जो बड़े प्रकल्प निर्माणाधीन हैं उनकी वजह से बड़ी मात्रा में रोजगार सृजन हुआ है जो शासकीय आंकड़ों में दर्ज नहीं होने से सार्वजनिक जानकारी में नहीं आ सका। श्री गडकरी की छवि और रिकार्ड लफ्फाजेबाज का न होकर तथ्य आधारित वायदे करने वाले राजनेता की रही है इसलिए उनके दावे को भले ही नकारा न जा सके लेकिन ये कहना भी गलत नहीं है कि सरकारी क्षेत्र में नौकरियां घटते जाने से स्थिति पूर्वापेक्षा खराब हुई है। निजी क्षेत्र में रोजगार की जो स्थिति है वह ऊपर से भले चमकदार दिखे लेकिन उसमें वेतन के साथ ही नौकरी की सुरक्षा भी नहीं रहती। शिक्षा के निजीकरण के बाद देश में निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की बाढ़ आ गई। जिसके कारण प्रतिवर्ष लाखों इंजीनियर तो तैयार हो रहे हैं लेकिन या तो उन्हें रोजगार नहीं मिलता या फिर उनकी शिक्षा और योग्यता का सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा। ये स्थिति केवल चुनाव के समय बहस और विवाद की न होकर देश के ठोस आर्थिक विकास के लिए अत्यावश्यक है। आज के अंतरिम बजट में इस दुरावस्था को दूर करने के लिए जो उपाय वित्तमंत्री करते हैं ये बहुत महत्वपूर्ण नहीं होंगे क्योंकि अव्वल तो उनका परिणाम आने में समय लगेगा वहीं दूसरी तरफ  उन पर चुनावी लाभ लेने का आरोप भी चस्पा हो जाएगा। मोदी सरकार 2019 में वापिस आएगी या देश किसी और को अवसर देगा ये तो मई के बीच में पता चलेगा किन्तु रोजगार विहीन विकास किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी। कहना गलत नहीं होगा कि बीते पांच वर्ष देश का ध्यान किसानों की बदहाली पर केंद्रित रहा किन्तु आगामी समय बेरोजगारी पूरे देश को आंदोलित करती रहेगी। करोड़ों बेरोजगार युवा देश में उथल पुथल मचा सकते हैं। हालांकि बेरोजगारी भत्ता और न्यूनतम आय सुनिश्चित करने जैसी बातें सामने आ रही हैं लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी देश में युवाओं को खैरात की बैसाखी देकर विकास की इमारतें खड़ी नहीं की जा सकतीं ।

-रवीन्द्र वाजपेयी