Friday, 8 February 2019

खाली खज़़ाने से खैरात बांटने की प्रतिस्पर्धा

मप्र की कमलनाथ सरकार ने गत दिवस अनेक महत्त्वपूर्ण फैसले लिए। इनमें बेरोजगारों को वर्ष भर में 100 दिन काम की गारंटी के आधार पर प्रशिक्षण और भत्ता, किसानों को आधी दर पर बिजली, 100 यूनिट तक के विद्युत उपभोक्ताओं को 100 रु. प्रतिमाह में बिजली, सामाजिक सुरक्षा पेंशन 300 से बढ़ाकर 600  रु. करने जैसे जनहितकारी निर्णय हैं। चूंकि इनसे प्रदेश के लाखों लोगों को सीधे आर्थिक लाभ मिलेगा इसलिये लाभार्थी समुदाय में से शायद ही कोई इसका विरोध करेगा। हालांकि और ज्यादा की उम्मीद और उस हेतु दबाव बनाने का प्रयास भी जारी रहेगा क्योंकि ये दिल मांगे मोर वाला विज्ञापन अपने देश की मानसिकता बन गई है। केंद्रीय बजट में किसानों को 6 हजार रुपए सालाना दिए जाने पर तंज कसने वाले क्या बता सकेंगे कि मात्र 600 रु. प्रति माह या 7200 रु. प्रति वर्ष में किसी वृद्ध का गुजारा कैसे होगा? बहरहाल मप्र सरकार अपने चुनावी वायदों को पूरा करने की दिशा में तेजी से बढ़ रही है इसलिये उसकी प्रशंसा हो रही है लेकिन ले देकर एक सवाल फिर उठ खड़ा होता है कि खाली खजाने वाली आर्थिक परिस्थिति में राज्य सरकार आखिरकार इस सबके लिए धन कहां से जुटाएगी? बिजली की दरें आधी करने या एक रु. प्रति यूनिट में बाँटने से मप्र विद्युत मंडल के पहले से ही चरमरा चुके अर्थतंत्र का क्या होगा इसका उत्तर भी फिलहाल किसी की पास नहीं है। चुनावी वायदों को पूरा करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाना किसी भी दल की सरकार के लिए विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा उतरने के लिहाज से एक आदर्श स्थिति कही जा सकती है लेकिन केवल चुनाव जीतने के लिए की जाने वाली इन मेहरबानियों के चलते सरकार की माली हालत जिस प्रकार बिगड़ती जा रही है वह चिंता का विषय है। ये बात केवल मप्र तक ही सीमित नहीं है। हाल ही में मोदी सरकार ने भी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अपने बजट में जिस तरह की दरियादिली दिखाई वह भी सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है। गत दिवस लोकसभा में अपने लंबे और बेहद आक्रामक भाषण में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस शासित राज्यों द्वारा किसानों के कर्ज माफी के मामले में की जा रही देरी पर कटाक्ष किये लेकिन ऐसा कहते हुए वे  भूल गए कि उनकी अपनी सरकार और भाजपा शासित राज्यों में भी इसी तरह जनता से बटोरे गए धन की होली जलाई जाती है। लोकतंत्र जनता के लिए समर्पित शासन व्यवस्था है। उस दृष्टि से श्री मोदी और श्री क़मलनाथ कोई गलत काम नहीं कर रहे। लेकिन बीते कुछ दशक में महज वोट बटोरने के लिए जिस तरह से सरकारी खजाना लुटाए जाने की परंपरा सी बन गई है उसकी वजह से ही घाटे की अर्थव्यव्यस्था जैसा बोझ सहने की मजबूरी सिर पर चढ़कर बैठ गई है। मोदी सरकार कितना भी दावा करे कि उसने घाटे को अनुमानित सीमा के भीतर कर रखा है लेकिन प्रश्न ये है कि घाटा आखिऱकार रहे ही क्यों ? सही बात तो ये है कि राजनीति का एकमात्र उद्देश्य किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करना रह गया है। जो पार्टी या नेता इसमें असफल रहता है तो उसे जनता भी भाव नहीं देती। कई अच्छी सरकारें केवल इसलिए अगला चुनाव नहीं जीत सकीं क्योंकि उन्होंने काम तो ठोस किया किन्तु लोगों को तात्कालिक लाभ देने वाली  योजनाएं लागू करने में वे विफल रहीं। वाजपेयी सरकार का उदाहरण इस बारे में सबसे अच्छा है। उसके बाद सभी की समझ में आ गया कि ऐसे कार्य करो जिससे जनता को नगद-नारायण मिलता रहे फिर चाहे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतें पूरी हों या नहीं? गत दिवस किसी संदर्भ में लोकसभा के भीतर दलीय मतभेदों से ऊपर उठकर अधिकतर पार्टियों के सांसदों ने मेज थपथपाकर परिवहन मंत्री नितिन गड़करी की जमकर तारीफ की। इनमें सोनिया गांधी भी थीं। इस वाकये से ये स्पष्ट हो गया कि विकास के क्षेत्र में ठोस कार्य की अपेक्षा और प्रशंसा तो सभी करते हैं किंतु खुद गद्दी मिलते ही सब भूलकर मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर समाज के एक बड़े हिस्से को निठल्ला बनाने से बाज नहीं आते। यही सूरते हाल बना रहा और चुनाव की समयसारिणी में यथोचित सुधार नहीं हुआ तब आने वाले कुछ सालों में भारत की बड़ी आबादी काम धंधा छोड़कर सरकार से मिलने वाली खैरात का इतंजार करती बैठी रहेगी। सवा अरब की आबादी वाले देश में बेरोजगारी का रोना तो प्रत्येक पार्टी और नेता रोता है किन्तु लोगों को काम करने हेतु प्रेरित करने की तकलीफ  कोई नहीं उठाना चाहता क्योंकि वैसा करने में लोगों के नाराज होने का खतरा जो है। ये स्थिति चुनाव जीतने के लिए तो लाभप्रद हो सकती है लेकिन इस वजह से युवा पीढी में कार्य संस्कृति का अभाव भी देखा जाने लगा है। सस्ती और मुफ्त बिजली ने पूरे अर्थतंत्र की रीढ़ तोड़कर रख दी है। किसानों के कर्ज माफ  किये जाने का बैंकिंग सेक्टर पर क्या असर पड़ा ये भी किसी से छिपा नहीं है। सरकारें जनकल्याण के काम जरूर करें किन्तु उसके कारण उसका अपना अर्थ प्रबंध यदि असंतुलित होने लगे तब किसी अन्य मार्ग की तलाश की जाए वरना एक कदम आगे और दो कदम पीछे का खेल चलता रहेगा। आरक्षण ने समाज को टुकड़े टुकड़े कर दिया और मुफ्तखोरी अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह चाटने में जुटी हुई है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 February 2019

वीआईपी : सम्मान ज्यादा तो सजा भी ज्यादा हो

कानून के सामने सब समान हैं किंतु कानून के सामने आने तक की प्रक्रिया में समानता का नितांत अभाव है। भले ही स्वाधीनता के पश्चात राजा-महाराजाओं को भूतपूर्व बनाकर देश में गणतंत्र की स्थापना कर ली गई हो लेकिन अब भी सामंतवाद किसी न किसी रूप में मौजूद है। फर्क केवल इतना है कि अब वे वीआईपी कहलाने लगे हैं। इस वर्ग को हर तरह की सुविधाएं और सुरक्षा उपलब्ध है। कानून भी इनकी मर्जी से चलने मजबूर है। ये अपनी शान में किसी भी तरह की गुस्ताखी पसंद नहीं करते। गत दिवस कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष पूछताछ हेतु उपस्थिति हुए। उनके ऊपर विदेशों में संपत्ति खरीदने के आरोप हैं। देश के भीतर उन्हें कांग्रेस राज में नियम विरुद्ध आवंटित भूमि के प्रकरण अलग से चल रहे हैं। श्री वाड्रा इस पूछताछ को जितना टाल सके टाला। और जब कोई रास्ता नहीं बचा तब हाजिर हुए और वह भी इस तुर्रे के साथ कि उन्हें राजनीतिक कारणों से प्रताडि़त किया जा रहा है। उनकी पत्नी ने भी सांकेतिक भाषा में ऐसा ही कुछ कहा। ऊपर से आरोप ये है कि केंद्र सरकार लोकसभा चुनाव के ऐन पहले गांधी परिवार की छवि धूमिल करने के लिए ये सब करवा रही है। इसी तरह का मामला शारदा चिट फंड का है जिसे लेकर बीते दिनों कोलकाता से लेकर दिल्ली तक घमासान मचता रहा। इस घोटाले में भी बड़े-बड़े लोगों के शरीक होने का शक है। जिसकी वजह से सर्वोच्च न्यायालय के सख्त निर्देशों के बाद भी जांच बरसों बाद तक प्रारम्भिक अवस्था से ऊपर नहीं आ सकी। पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति भी प्रवर्तन निदेशालय की जांच में हैं। और कोई होता तो कभी का जेल जा चुका होता लेकिन श्री चिदंबरम खुद चूंकि देश के बड़े वकीलों में से हैं इसलिए हर पेशी में उन्हें और बेटे को किसी न किसी तरह की मोहलत मिलती जाती है। उनकी गिरफ्तारी कब से और क्यों टल रही है ये भी जांच का विषय है। एक और प्रकरण है तीस्ता सीतलवाड़ नामक महिला का जिसे बीते पाँच साल में गिरफ्तारी से लगातार राहत मिलती जा रही है। केवल उपयुक्त लोग ही  नहीं बल्कि पूरे देश में इस तरह के दर्जनों वीआईपी हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गम्भीर आर्थिक अपराध में फंसे हैं। इस जमात में कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा,  राजद, तेलुगु देशम, डीएमके, अन्ना द्रमुक, टीएमसी सहित अन्य छोटी-छोटी पार्टियों के तमाम नेता हैं। कुछ तो जेल भी जा चुके हैं। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा इसका उदाहरण हैं। विडंबना ये है कि  वीआईपी कहलाने वाले ऐसे नेताओं को कानून के सामने भी बजाय बराबरी के विशिष्ट दर्जा हासिल होता है। ऊंची पहुंच वाले इन नेताओं के पास अवैध कमाई का जो भण्डार होता है उससे वे बड़े-बड़े वकीलों को अदालत में खड़ा कर देते हैं जिनकी जिरह से मामला बीरबल की खिचड़ी की तरह पकता जाता है। इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति भी एक तरह का अविश्वास जन्म ले चुका है। आज भी जेलों में हजारों ऐसे कैदी हैं जो अपने लिए वकील का इंतजाम नहीं कर पाने की वजह से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। समय आ गया है जब वीआईपी पर चल रहे आपराधिक प्रकरणों का निपटारा भी वीआईपी शैली में जल्दी से जल्दी हो। मोदी सरकार ने जनप्रतिनिधियों के मामले निश्चित समयावधि में निपटाने के लिए विशेष अदालतें बनाने की पहल की थी किन्तु वह भी हवा-हवाई होकर रह गई। देश के कई प्रख्यात वकील ऐसे हैं जो बिना राजनीतिक भेदभाव के भ्रष्टाचार में फंसे नेताओं के मुकदमे लड़ते हैं। बदले में उन्हें फीस के साथ राज्यसभा की सीट भी हासिल हो जाती है। दरअसल प्रकरण को टालते रहने की रणनीति के पीछे सत्ता परिवर्तन की प्रतीक्षा है। यदि भविष्य में मोदी सरकार की जगह कोई और सरकार आ गई  तो फिर कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के तमाम नेता भ्रष्टाचार के मामलों से बरी कर दिए जाएंगे या फिर जांच अधर में लटका दी जाएगी। ऐसे नेता तो रहे नहीं जो नैतिकता के नाम पर पद छोडऩे में एक क्षण भी नहीं लगाते थे। उल्टे हर आरोप को राजनीति प्रेरित बताकऱ सीनाजोरी की जाती है। रॉबर्ट वाड्रा या उनके समर्थन में उतरी कांग्रेस का ये कहना गलत नहीं है कि बीते पौने पांच साल तक केंद्र सरकार क्या करती रही लेकिन ये भी तो सच है कि चाहे श्री वाड्रा हों या अन्य विशिष्टजन, सभी जांच और सुनवाई को टलवाने के लिए धरती आसमान एक कर देते हैं। इसके पीछे उनकी सामंतवादी मानसिकता है जिसकी वजह से उन्हें ये नागवार गुजरता है कि कोई उनसे सवाल-जवाब करे या फिर वे अदालत के कठघरे में आम आदमी की तरह से खड़े हों। मप्र के चर्चित व्यापमं घोटाले में भी ऐसा ही हुआ और अंत में  शिवराज सिंह चौहान बेदाग होकर निकल गए। ये स्थिति बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि साधारण व्यक्ति के आरोपी होने से जहां समाज में उसकी प्रतिष्ठा घट जाती है लेकिन जब ऐसा किसी बड़े नेता या श्री वाड्रा जैसों के साथ होता है तो भी वह सिर ऊंचा करते हुए घूमता रहता है। न्याय की आसन्दी पर बैठने वाले पंच परमेश्वरों से ये आशा की जाती है कि वे वीआईपी समुदाय के प्रति सीमा से बाहर जाकर नरमी या रियायत दिखाना तो बन्द करें ही साथ ही साथ अपराध साबित होने पर उन्हें कुछ अतिरिक्त दंड भी दिया जाये जिससे लोगों को वाकई ये लगे कि कानून गरीब-अमीर और ओहदेदार में कोई भेद नहीं करता। किसी सामान्य व्यक्ति को घर से उठा लेने वाली पुलिस और अन्य जांच एजेन्सी वीआईपी की लंबे समय तक मनुहार करती रहती हैं तब जाकर वे हाजिर होने का उपकार करते हैं। लालू यादव कहने को सजा काट रहे हैं किंतु जेल की जगह अस्पताल में पड़े हुए राजनीतिक गठबन्धन बनाने हेतु विभिन्न नेताओं से वार्ता करते रहते हैं। अपराध करने के बाद भी छुट्टा घूमने वाले ये विशिष्ट जन हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए नासूर बन चुके हैं। वामपंथी नेता आर्थिक घोटालों में तो नहीं लिप्त होते किन्तु देशविरोधी गतिविधियों को समर्थन और संरक्षण देने का आरोप उन पर भी लगता है। कोलकाता में सीबीआई की कार्रवाई के बाद ये सवाल भी उठा कि शारदा घोटाले के छींटे जिन बाबुल सुप्रियो और मुकुल रॉय पर भी हैं वे भाजपा की गोद में आकर बैठे हैं इसलिए उन्हें सीबीआई नहीं छू रही। यदि हालात ऐसे ही रहे तो फिर लोकतंत्र भले कायम रहे लेकिन उसके प्रति आस्था घटती जाएगी जो अच्छा नहीं होगा। बेहतर हो कानून के समक्ष समानता के सिद्धान्त का ईमानदारी से पालन किया जावे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 6 February 2019

प्रियंका : श्रीमती गांधी या वाड्रा

विदेश से लौटते ही प्रियंका वाड्रा ने कांग्रेस महासचिव  का कार्यभार संभाल लिया। पार्टी मुख्यालय में राहुल गांधी के कक्ष के बगल में ही उनका कमरा रखा गया है जिसके बाहर लगी नाम पट्टिका पर प्रियंका गांधी वाड्रा लिखा गया है। इस प्रकार उनके नाम का उल्लेख करते समय अधिकृत रूप से प्रियंका गांधी वाड्रा ही कहा और लिखा जाना चाहिए। जब उनकी नियुक्ति हुई थी तब उनके उपनाम को लेकर भी बहस चली और लोगों ने ये सवाल उठाए कि गांधी उपनाम का उपयोग पारिवारिक विरासत का सियासी लाभ लेने हेतु किया जा रहा है जबकि कांग्रेस समर्थकों को प्रियंका के साथ गांधी जुड़ा होना किसी भी तरह से आपत्तिजनक नहीं लगा। लेकिन अब जबकि स्वयं प्रियंका ने अपने नाम में गांधी के साथ अपने पति का उपनाम जोड़ लिया है तब किसी को कुछ कहने की गुंजाइश ही नहीं बची क्योंकि आजकल महिलाएं विवाहोपरांत भी अपने पैतृक उपनाम के संग पति के उपनाम को जोड़तीं हैं। शायद ये बात इसलिए भी उठी क्योंकि सोनिया गांधी जो खुद पाश्चात्य संस्कृति से आईं थीं, ने भी कभी अपने विवाह पूर्व उपनाम का उपयोग नहीं किया। इंदिरा जी ने भी फीरोज़ गांधी से विवाह के बाद नेहरू उपनाम छोड़ दिया था और जीवन भर श्रीमती गांधी ही कहलाईं। सोनिया जी को भी श्रीमती गांधी कहकर संबोधित किया जाता है लेकिन प्रियंका ने सार्वजनिक रूप से गांधी उपनाम के साथ जब वाड्रा भी जोड़ लिया तब उन्हें श्रीमती गांधी या श्रीमती वाड्रा कहा जायेगा ये अभी स्पष्ट नहीं है। शेक्सपियर ने लिखा था कि नाम में क्या रखा है लेकिन वे चूंकि राजनीतिज्ञ नहीं थे इसलिये वैसा कह गए। भारतीय राजनीति में नाम और विरासत का महत्व किसी से छिपा नहीं है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया की दोनों बेटियां वसुन्धरा राजे और यशोधरा राजे विवाहित होने पर भी सिंधिया उपनाम का उपयोग धड़ल्ले से करती हैं। प्रियंका ने अपने नाम के साथ मायके और ससुराल दोनों के उपनाम जोड़कर आलोचकों को तो शांत कर दिया किन्तु क्या वे खुद को श्रीमती वाड्रा कहना पसन्द करेंगी ये सवाल अभी अनुत्तरित है। निजी जीवन में ये बातें भले मायने न रखती हो लेकिन सार्वजनिक विशेष रूप से राजनीति के शिखर पर विराजमान शख्सियत के नाम और संबोधन का भी तो शिष्टाचार होता है और होना भी चाहिए।

-रवीन्द्र वाजपेयी

क्या ऐसी सुविधा किसी पुलिसकर्मी को भी मिलती

जैसी उपेक्षा थी वैसा ही हुआ। शारदा चिट फंड घोटाले की जांच को लेकर दो दिन चली सियासी खींचतान पर सर्वोच्च न्यायालय ने जो व्यवस्था दी उसे दोनों पक्ष अपनी-अपनी नैतिक विजय मानकर फूले नहीं समा रहे हैं। कोलकाता के जिन पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को लेकर सारा बवाल मचा उन्हें गिरफ्तारी से राहत दे दी गई और सीबीआई को उनसे पूछताछ की छूट। बीते रविवार को सीबीआई के लोगों के साथ कोलकाता पुलिस द्वारा किये गए सुलूक के विरुद्ध दायर अवमानना प्रकरण में सुनवाई की तारीख दे दी गई। राजीव कुमार द्वारा घोटाले के प्रमाण नष्ट किये जाने को लेकर सीबीआई द्वारा लगाये गए आरोप पर भी सुनवाई होगी लेकिन कुछ दिनों बाद। सर्वोच्च न्यायालय ने कल जो फैसला दिया उस पर खुश होने के ममता बैनर्जी और भाजपा के अपने कारण होंगे लेकिन राजीव कुमार से पूछताछ के लिए दिल्ली और कोलकाता छोड़कर शिलांग का चयन एक अजीबोगरीब बात है। दरअसल सीबीआई राजीव को दिल्ली बुलाकर उनसे घोटाले की जांच संबंधी सवाल-जवाब करना चाहती थी जबकि वे चाहते थे कि कोलकाता में ये काम हो। रविवार की घटना से क्षुब्ध सीबीआई को वहां जाने से परहेज था। तब बीच का रास्ता निकालते हुए शिलांग में पूछताछ किये जाने की बात तय हुई, प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की इस टिप्पणी के साथ कि शिलांग ठंडी जगह है इसलिए वहां दोनों पक्षों के दिमाग भी ठंडे रहेंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने चूंकि निर्णय कर दिया इसलिए अब तो शिलांग में ही दोनों पक्ष जमा होंगे लेकिन इस तरह के फैसले से एक नई नजीर बनने का खतरा पैदा हो गया है। मसलन अब बड़ी हैसियत वाला कोई भी आरोपी या अन्य व्यक्ति जांच एजेंसी के बुलाये जाने पर उसे अपनी पसंद की जगह आकर पूछताछ करने कहे तब क्या उसे भी ऐसी सुविधा दी जाएगी? यदि जांच एजेंसी उसके अनुरोध को न मानें तब वह अदालत जाकर सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के आधार पर अपने लिए भी वैसी ही व्यवस्था चाहेगा। पाठक सोच सकते हैं कि इस स्तंभ के लिए भला ये भी कोई विषय है लेकिन जिस तरह के लोकतंत्र को हम देख और जी रहे हैं उसमें साधारण लहजे में कही गई बात और किये गए कार्य का बेजा उपयोग करने की प्रवृत्ति पूरी व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठ गई है। विजय माल्या जैसा भगोड़ा लंदन में बैठकर भारतीय जेलों में रहने से नाक मुंह सिकोड़ता है। और यहां भारतीय पुलिस सेवा का एक अधिकारी राष्ट्रीय राजधानी में पूछताछ से इंकार कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी जि़द को जिस हल्के अंदाज में लिया वह किसी भी तरह से गले नहीं उतरती। बेहतर यही होता कि देश के प्रधान न्यायाधीश महोदय राजीव कुमार को पूछताछ में सहयोग करने की हिदायत देने के साथ ही ये भी कहते कि उन्हें जहां बुलवाया जाए वहां वे जांच हेतु उपस्थित हों। इस सारे मामले में सीबीआई पर केंद्र सरकार का दबाव होने की बात यदि एक बार मान  लें तो भी राजीव कुमार से शारदा घोटाले विषयक जानकारी लेने की कोशिश में कहां आपत्ति थी? भले ही राजीव आरोपी न हों किन्तु बंगाल सरकार द्वारा बनाए विशेष जांच दल के प्रमुख होने की वजह से सीबीआई के सामने उनके जवाबदेही तो बनती ही है। उस दृष्टि से उनकी कोलकाता आकर पूछताछ करना और दिल्ली नहीं जाने जैसी जिद किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं कही जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय की निष्पक्षता और विवेक पर किसी भी तरह का सन्देह किये बिना भी ये कहा जा सकता है कि राजीव कुमार से पूछताछ के लिए किसी तटस्थ जगह का चयन करने की अर्जी को स्वीकार करना अपने आप में देश के संघीय ढांचे की अवधारणा की अवहेलना है। ममता सरकार संविधान की रक्षा करने का ढोल तो पीटा करती हैं लेकिन संवैधानिक एजेंसियों को अपने राज्य में काम करनेे से रोकने जैसा संविधान विरोधी आचरण भी करती हैं। उनकी देखासीखी अन्य राज्यों की सरकारें सीबीआई और आयकर विभाग के लोगों को अपने-अपने राज्य में घुसने न देने और वैधानिक कार्रवाई करने से रोकने लग जाएं तब कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है का नारा मजाक बनकर रह जायेगा। अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने शिलांग को राजीव से पूछताछ हेतु तय कर दिया है तब उसे रद्द करना तो ठीक नहीं होगा किन्तु न्यायपालिका को इस बारे में सतर्क रहना चाहिए वरना आरोपी भी अपने लिए विशेषाधिकार के तौर पर इस तरह की मांग करने लगेंगे। यदि आईपीएस की जगह कोई पुलिसकर्मी होता तब क्या सर्वोच्च न्यायालय उसे भी इस तरह से अपनी मनपसंद जगह पर पूछताछ की सुविधा देता ?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 February 2019

माल्या पर वापिसी का शिकंजा कसा

विभिन्न बैंकों का हजारों करोड़ रुपये लेकर ब्रिटेन भाग गए विजय माल्या को वापिस लाने के लिए भारत सरकार द्वारा की जा रही कानूनी कोशिशों को गत दिवस बड़ी सफलता हासिल हो गई जब ब्रिटेन के गृह सचिव ने माल्या के भारत प्रत्यर्पण पर सहमति दे दी। ब्रिटिश कानून के अनुसार अभी माल्या के पास उच्च न्यायालय में 14 दिन के भीतर अपील का अवसर है। वहां भी यदि वह हारता है तब भी और ऊपर की अदालत में गुहार लगाने का अधिकार उसे मिलेगा परंतु इस मामले में एक बात साबित हो गई कि उसे वापिस लाने के जो कूटनीतिक प्रयास भारत सरकार की तरफ  से हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने मान्य करते हुए उसके प्रत्यर्पण पर सहमति दे दी। माल्या के भाग जाने से मोदी सरकार की जो फजीहत हुई थी उसकी काफी हद तक भरपाई ब्रिटिश सरकार के फैसले से हुई है। विशेष रूप से जब लोकसभा चुनाव बिल्कुल करीब आ गए हैं तब ये फैसला प्रधानमंत्री के लिए अपनी प्रामाणिकता साबित करने में सहायक हो सकेगा। इस बारे में एक बात और भी उल्लेखनीय है कि भारत में पड़ रहे चौतरफा दबाव के बाद माल्या ने बैंकों को बड़ी रकम लौटने का प्रस्ताव भी भेजा है। दरअसल उसकी जो संपत्तियाँ भारत में जप्त हुईं उनसे वह घबराहट में हैं क्योंकि उसके ताजा बयान के मुताबिक उनका मूल्य उसके ऊपर बैंकों के कर्जे की रकम से भी ज्यादा है। वैसे भारत से भागने के पहले भी उसने बैंकों से कर्ज चुकाने के लिए सौदेबाजी की थी किन्तु कतिपय व्यवहारिक और कानूनी अड़चनों की वजह से बात नहीं बन सकी। बहरहाल अब जबकि ब्रिटिश सरकार ने उस पर से अपना हाथ उठा लिया है तब हो सकता है गिरफ्तारी से बचने की शर्त पर वह भारत लौटकर कर्ज लौटाने की पेशकश नए सिरे से करे। पहले भी वह भारतीय जेल की खराब व्यवस्था का बहाना बनाकर ब्रिटिश अदालतों में अपना बचाव करता रहा। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि प्रत्यर्पण की सरकारी अनुमति मिलने के बाद वह महीने दो महीने में स्वदेश लौट ही आएगा क्योंकि वह बहुत ही चालाक व्यक्ति है और सारे हथकंडे  जानता है। माल्या की वापिसी के बाद भारत सरकार के लिए नीरव मोदी और उस जैसे कुछ अन्य आर्थिक घोटालेबाजों को विदेश से लाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी किन्तु पहले अगस्ता हेलीकाप्टर घोटाले के आरोपी मिशेल क्रिश्चियन को पकड़कर भारत लाने और अब माल्या के प्रत्यर्पण में मिली प्रारंभिक सफलता से उम्मीद की किरण नजर आने लगी है। इन लोगों की वजह से न सिर्फ  बैंकों को जबर्दस्त नुकसान हुआ बल्कि उससे भी बढ़कर आम जनता के मन में ये धारणा मजबूत हुई कि सत्ता प्रतिष्ठान में अपनी ऊंची पहुंच के चलते बड़े-बड़े धन्नासेठ जनता का धन लूटते रहते हैं और कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। हाल ही में जिन बड़े आर्थिक घोटालेबाजों ने बैंकों का पैसा लेकर देश छोडऩे की चालाकी दिखाई उनको तो सजा मिले ही लेकिन पिछली सरकार के जिन प्रभावशाली लोगों की सिफारिश या दबाव के चलते बैंकों ने उन पर नियमों की अवहेलना करते हुए मेहरबानियां बरसाई उनका भी पर्दाफाश होना जरूरी है।

-रवीन्द्र वाजपेयी