Wednesday, 6 March 2019

कांग्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा

दिग्विजय सिंह को नौसिखिया कहना तो गलत होगा। अच्छा-खासा पढ़े लिखे हैं। विधायक और सांसद रहने के अलावा दस वर्ष तक मप्र जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाकर कई राज्यों का दायित्व भी दिया। यद्यपि वे जिन राज्यों के प्रभारी बने वहां पार्टी का बंटाधार करवा आए। उस वजह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उन्हें हॉशिये पर धकेलते जा रहे थे किन्तु मप्र में कांग्रेस की सरकार बन जाने से वे फिर प्रासंगिक हो गए। ये भी कहा जाने लगा कि कमलनाथ सरकार को परदे के पीछे से श्री सिंह ही चला रहे हैं। लेकिन हाल ही में उनके किसी  बयान पर एक युवा मंत्री उमंग सिंगार ने जिस शैली में उन्हें जवाब दिया उससे ये संकेत गया कि मुख्यमंत्री श्री नाथ उनके हस्तक्षेप से मुक्ति पाना चाह रहे हैं। उस घटना के बाद से श्री सिंह कुछ शांत थे लेकिन गत दिवस ट्विटर पर उनकी एक टिप्पणी ने विवाद पैदा कर दिया जिसमें उन्होंने पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले को दुर्घटना बता दिया। अन्य कांग्रेस नेताओं की तरह से श्री सिंह ने भी बालाकोट में की गई एयर स्ट्राइक में मारे गए पाकिस्तानियों की संख्या पर सवाल उठाते हुए प्रमाण मांगे लेकिन पुलवामा की आतंकी वारदात को दुर्घटना का नाम देकर उन्होंने अपनी उस छवि को ताजा कर दिया जो हिन्दू आतंकवाद और दुनिया के सबसे कुख्यात आतंकवादी को ओसामा जी कहकर आदर देने से बनी थी। हालांकि रास्वसंघ और भाजपा को लेकर वे समय-समय पर विवादास्पद टिप्पणियां करते रहते हैं लेकिन पुलवामा हमले को दुर्घटना कहकर उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही किन्तु आतंकवादियों को क्लीन चिट देने जैसी गलती कर दी। ऐसे समय जबकि पाकिस्तान एयर स्ट्राइक को लेकर भारत के तमाम नेताओं और कतिपय पत्रकारों के बयानों का भारत विरोधी प्रचार में उपयोग कर रहा है तब देश के एक वरिष्ठ नेता द्वारा पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले को महज दुर्घटना कह देने से पाकिस्तान को यह कहने का अवसर मिल गया कि भारत उस पर निराधार दोषारोपण कर रहा है। चूंकि श्री सिंह ने अभी तक अपनी टिप्पणी को न वापिस लिया और न ही उस पर खेद जताया इसलिए कहा जा सकता है कि उन्होंने वह ट्वीट पूरे होशो-हवास में किया था। वैसे भी उनकी जो फितरत है उसके आधार पर उनसे ये अपेक्षा भी नहीं की जाती किन्तु घरेलू राजनीति में भले ही वे गैर जिम्मेदार और आपत्तिजनक बातें कहते रहें किन्तु जिस प्रकरण से देश की सुरक्षा और सम्मान जुड़ा हो उसके विषय में बोलने से पहले किसी वरिष्ठ राजनेता को पूरी तरह सोच-समझकर अपनी राय रखनी चाहिए। पूरा देश पुलवामा हमले के कारण आक्रोशित हो उठा था जिससे केंद्र सरकार पर 40 से भी ज्यादा फौजियों  की शहादत का बदला लेने का दबाव पडऩे लगा। भारत ने पाकिस्तान पर उक्त आतंकवादी हमले को प्रायोजित करने वाले संगठन जैश ए मोहम्मद को पालने - पोसने का आरोप लगाते हुए वैश्विक स्तर पर उसकी जबर्दस्त घेराबंदी की जिसका सकारात्मक असर हुआ उससे प्रोत्साहित होकर भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट इलाके में स्थित जैश के प्रशिक्षण शिविर पर बमबारी कर उसे ध्वस्त कर दिया। 300 आतंकवादियों के मारे जाने का दावा भी किया गया। इस दावे पर तो काफी सवाल उठे और अभी भी उठाये जा रहे हैं लेकिन पुलवामा हमले को महज दुर्घटना कहने का दुस्साहस किसी ने नहीं किया। इसलिये दिग्विजय सिंह के ट्वीट से हर समझदार और सुलझे हुए व्यक्ति को दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया। भले ही उसे राजनीतिक रस्साकशी कहकर उपेक्षित कर दिया जाए किन्तु इस तरह की टिप्पणी को केवल सियासी रंग देकर हवा में उड़ा देना सही नहीं होगा। ये देखते हुए कि पाकिस्तान अपने बचाव में ऐसी किसी भी टिप्पणी अथवा बयान का जमकर उपयोग कर रहा है दिग्विजय सिंह सदृश अनुभवी नेता को कुछ कहने के पहले राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर देश के व्यापक हितों के बारे में सोचना चाहिये। प्रधानमंत्री और भाजपा के विरुद्ध बोलने और लिखने के लिए श्री सिंह और मुद्दों का सहारा ले सकते हैं। नीतिगत मतभेद और सैद्धांतिक विरोध लोकतंत्र की प्राणवायु जैसे हैं लेकिन जब देश की सुरक्षा, संप्रभुता और साख का सवाल हो तब संकीर्णता त्यागकर सभी को एक आवाज में बोलना चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश की राजनीति पर इन दिनों गैर जिम्मेदाराना सोच हावी होती जा रही है। दिग्विजय सिंह अकेले नहीं हैं जो समय-समय पर अपनी बयानबाजी से खुद तो हास्यास्पद और विवादास्पद बनते ही हैं अपनी पार्टी को भी शर्मसार करते हैं। मणिशंकर अय्यर, नवजोत सिंह सिद्धू, शशि थरूर और मनीष तिवारी जैसे नेताओं के बयानों से पार्टी को पल्ला झाडऩा पड़ता है। लेकिन पता नहीं क्यों उन्हें ये हरकत दोहराने से नहीं रोका जाता। कांग्रेस के उच्च नेतृत्व को इस बारे में गम्भीरता से सोचना चाहिये क्योंकि इस तरह की बयानबाजी से पार्टी को जबर्दस्त नुकसान होता है। बहरहाल दिग्विजय सिंह ने पुलवामा हमले को महज दुर्घटना बताकऱ अपनी छवि को तो बरकरार रखा किन्तु कांग्रेस को बैठे-बिठाए नजरें झुकाने की स्थिति में ला दिया।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 March 2019

इस अभियान को अधूरा छोडऩा आत्मघाती होगा

जो लोग ये समझ बैठे थे कि विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई को लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा की गई शांति की पेशकश और कई बड़े देशों द्वारा दिये गए मध्यस्थता प्रस्ताव के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे मौजूदा तनाव की इतिश्री हो जाएगी, उनकी गलतफहमी गत दिवस दूर हो गई होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वायु सेनाध्यक्ष बीएस धनोआ ने स्पष्ट कर दिया कि आतंकवाद के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई का जो कदम उठाया गया है वह पीछे नहीं हटेगा। श्री मोदी ने तो साफ -साफ  कह दिया कि पाकिस्तान के भीतर घुसकर मारेंगे। 26 फरवरी की एयर स्ट्राइक पर सन्देह करने वालों को वायु सेनाध्यक्ष ने जवाब दिया कि यदि हमारे पायलट खाली जंगल में बम गिरा आए थे तब पाकिस्तान जवाब क्यों देता? उन्होंने मारे गए आतंकवादियों की संख्या पर भी साफ  कर दिया कि वायुसेना उसे दिए गए लक्ष्य पर निशाना साधती है, लाशें नहीं गिनती। वैसे भी चंद मिनिटों के अभियान में ये सब सम्भव भी नहीं था। बहरहाल प्रधानमंत्री और वायु सेनाध्यक्ष के बयानों से एक बात स्पष्ट हो गई कि विपक्ष के अलावा केंद्र सरकार के अन्य आलोचकों द्वारा बनाए जा रहे भ्रमजाल से सरकार और सेना दोनों अप्रभावित हैं और पाकिस्तान के प्रति आक्रामक रवैये में कोई कमी नहीं आई है। भले ही इसे आगामी लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा हो लेकिन देशहित के लिहाज से देखने पर ये लगेगा कि आतंकवाद के विरुद्ध जो अभियान शुरू किया गया है उसे अंजाम तक पहुंचाए बिना यदि बीच में रोक दिया गया तो ये दोहरा नुकसान पहुंचाने वाला होगा। पुलवामा हमले के बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को जो सहानुभूति और समर्थन मिला वह अभूतपूर्व कहा जा सकता है। पहली बार पाकिस्तान को विश्व की लगभग सभी महाशक्तियों ने जमकर लताड़ा जिसका नतीजा ये हुआ कि इमरान खान चिकनी-चुपड़ी बातें करने लगे। वरना और कोई समय होता तो वे भारत सरकार द्वारा औपचारिक निवेदन के बगैर अभिनंदन को इतनी आसानी से रिहा नहीं करते। संरासंघ में मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किये जाने संबंधी प्रस्ताव का विरोध न करने की पाकिस्तानी नीति भी इस बात का संकेत है कि भारत के हमलावर रुख से वह भारी दबाव में है। मसूद की बीमारी का प्रचार कर वह उस दबाव को कम करने की कोशिश जरूर कर रहा है लेकिन उसकी विश्वसनीयता चूंकि न के बराबर है इसलिए उस पर किसी को भरोसा नहीं रहा। शायद यही वजह है कि पुलवामा हमले के बाद सेना को पूरी छूट देने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया और उसी के परिणामस्वरूप वायुसेना ने बालाकोट में जैश ए मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर पर बम गिराए। इस हमले के बाद भारत पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता था। लेकिन अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, द. अफ्रीका जैसे देशों ने भारतीय कार्रवाई का न सिर्फ समर्थन किया बल्कि पाकिस्तान को आतंकवादियों के विरुद्ध सख्त कदम उठाने के लिए भी कहा। इसी का प्रभाव हुआ जो हमेशा ऐंठ कर बात करने वाले पाकिस्तान के मुंह से मिल-बैठकर बातचीत के जरिये विवाद सुलझाने जैसी बातें निकलने लगीं। चूंकि चीन ने भी पाकिस्तान को अपेक्षित सहयोग नहीं दिया उसके कारण वहां की सरकार और सेना दोनों का मनोबल गिर गया। ये भी संभव है कि इमरान खान को भारत की तरफ  से इस तरह के आक्रामक रवैये की उम्मीद नहीं रही होगी। पठानकोट और उरी पर हुए हमले के बाद भी मोदी सरकार ने हालांकि बदला लेने की बात कही तथा थलसेना ने एक सर्जिकल स्ट्राइक भी की किन्तु वह पाक अधिकृत कश्मीर के इलाके तक ही  सीमित रही। लेकिन बीती 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने न केवल पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से बल्कि पाकिस्तान के भीतर घुसकर बालाकोट नामक पहाड़ी एवं जंगली क्षेत्र में चल रहे आतंकवादी शिविर पर बम गिराने जैसा दुस्साहसिक कारनामा कर दिखाया। वैसे किसी देश की सीमा में इस तरह घुसकर सैन्य कार्रवाई करना हमले की परिभाषा में आता है किंतु भारत की तरफ  से ये सावधानी बरती गई कि वायुसेना के निशाने पर केवल आतंकवादी अड्डे रहें। चूंकि पाकिस्तान की धरती पर न तो एक भी नागरिक की मौत हुई और न ही किसी संपत्ति को क्षति पहुँची इसलिये भारतीय कार्रवाई का नैतिक पक्ष मजबूत हुआ। आत्मरक्षा के सिद्धांत के आधार पर किये गए इस हवाई हमले को इसीलिए विश्वव्यापी समर्थन मिला। उस लिहाज से प्रधानमंत्री और वायु सेनाध्यक्ष ने गत दिवस 26 फरवरी की कार्रवाई को दोहराए जाने की जो बात कही वह भारत के ऊंचे हौसले का परिचायक है। श्री मोदी का लहजा तो कुछ ज्यादा ही सख्त था। उन्होंने विपक्ष द्वारा उठाये जा रहे सवालों पर भी नाराजगी व्यक्त की वहीं श्री धनोआ ने फौजी मर्यादाओं का पालन करते हुए राजनीतिक सत्ता की सर्वोच्चता को स्वीकार भी किया। सरकार और सेना के बीच का ये संतुलन शत्रु के विरुद्ध हमलावर रुख अपनाने के लिए बेहद जरूरी होता है। आतंकवादी वारदातों में आए दिन होने वाली फौजियों की शहादत से सेना के मन में भी भीतर-भीतर गुस्सा तो था ही। हर वारदात के बाद केंद्र सरकार कड़ी कार्रवाई का दम तो भरती थी लेकिन वह हवा-हवाई होता रहा। इसकी वजह से पूरे देश में मोदी सरकार के प्रति नाराजगी थी। लेकिन बालाकोट पर हमले के बाद से ये भरोसा दोबारा कायम हो सका है कि भारत केवल कागजों पर ही एक बड़ी सामरिक शक्ति नहीं वरन युद्ध के मैदान में भी इसे सिद्ध करने में सक्षम है। पाकिस्तान के जवाबी हमले में एक एफ-16 लड़ाकू विमान को गिराकर भारतीय वायुसेना ने अमेरिका तक को चौंका दिया। ये सब देखते हुए प्रधानमंत्री द्वारा पाकिस्तान में घुसकर मारने और वायु सेनाध्यक्ष द्वारा कार्रवाई जारी रखने जैसी बातें आश्वस्त करने वाली हैं। ये मुहिम कब तक चलेगी कहना कठिन है। अन्तर्राष्ट्रीय दबाव और अपनी घरेलू स्थितियों की वजह से इमरान सरकार ज्यादा प्रतिरोध करने में भी सक्षम नहीं है। यूँ भी यदि पाकिस्तान आतंकवाद से मुक्त हो सका तो ये उसके लिए भी लिए भी बेहतर होगा। भारत को चाहिए वह इन अनुकूल हालातों का पूरा-पूरा फायदा उठाए और इस अभियान को पूर्णता तक पहुंचाए। रही बात चुनाव और आचार संहिता की तो बाकी सब बातें देश की सुरक्षा के आगे महत्वहीन हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 March 2019

कूटनीति के मोर्चे पर भी भारत की बड़ी सफलता

भारतीय कूटनीति के लिहाज से ये एक अनोखी घटना है कि मुस्लिम राष्ट्रों के संगठन ओआईसी ने अपने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता के लिए भारत को आमंत्रण दिया। इस संगठन में पाकिस्तान एक प्रमुख सदस्य है। मौजूदा परिस्थितियों में उसके लिए ये किसी अपमान से कम नहीं था कि भारत मुस्लिम देशों की बिरादरी में सम्मान के साथ न केवल बैठे बल्कि उसे महत्वपूर्ण स्थान भी हासिल हो सके। इसीलिए उसकी तरफ से इसका जोरदार विरोध भी किया गया लेकिन आयोजकों ने उसे दरकिनार रख दिया तब शर्मसारी से बचने के लिए उसने उसका बहिष्कार करने का निर्णय लिया। उल्लेखनीय है विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से सम्मेलन में पाकिस्तान के  विदेश मंत्री से मुलाकात होने पर उनसे बातचीत करने के बारे में पूछा गया तब  उन्होंने सकारात्मक उत्तर दिया था। लेकिन अंतत: पाकिस्तान को इस्लामिक देशों के बीच भारत की गरिमामय उपस्थिति सहन नहीं हुई। यद्यपि दोनों देशों के बीच युद्ध की परिस्थितियां बन जाने के पहले ही भारत को ओआईसी का निमंत्रण मिल चुका था। हाल ही में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने भी पाकिस्तान और भारत की यात्रा की थी। उन्होंने आतंकवाद को लेकर भारत के रुख का समर्थन किया तथा भारत में पाकिस्तान की तुलना में कई गुना ज्यादा निवेश करने की घोषणा भी कर डाली। स्मरणीय है सऊदी अरब अमेरिका के बाद पाकिस्तान का सबसे बड़ा पालनहार रहा है। इस्लामिक देशों की जानकारी रखने वाले ये भी स्वीकार करते हैं कि इस्लाम के नाम पर आतंक का जो कारोबार पूरी  दुनिया में चल रहा है उसके लिए आर्थिक संसाधन भी सऊदी अरब ही उपलब्ध करवाता है। इस्लामिक देशों में उसकी अहमियत आर्थिक और धार्मिक दोनों कारणों से है। नरेंद्र मोदी की सरकार ने सऊदी अरब के अलावा संयुक्त अरब अमीरात के देशों के साथ जो करीबी रिश्ते बनाये उसी का सुपरिणाम है कि इस्लामिक देशों के सम्मेलन में भारत को बाइज्जत बुलाया गया और पाकिस्तान के एतराज की रत्ती भर भी परवाह नहीं की गई। ये सब भी तब हुआ  जब भारत की घरेलू राजनीति में मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी माना जाता है। तीन तलाक पर रोक लगाने जैसे कानून बनाने की वजह से मुस्लिम नेता ही नहीं बल्कि दूसरी पार्टियों  के लोग भी मोदी सरकार को हिन्दू सांप्रदायिकता का संरक्षक मानते हैं। बावजूद उसके यदि ओआईसी के आयोजकों ने भारत को न्यौता भेजा तो उसके पीछे कारण भारत का एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरना  ही है। पुलवामा के हादसे के बाद जब दुनिया भर में आतंकवाद के विरोध में आवाज उठ रही थी तब भी चीन ने दबी जुबान ही सही लेकिन पाकिस्तान के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए भारत को बिना सबूत आरोप लगाने के लिए टोका था। लेकिन 26 फरवरी को भारत द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद चीन भी ठिठक गया और अनमने तरीके से ही  सही किन्तु पाकिस्तान के अंध समर्थन से बचता नजर आया। इमरान खान को ये मुगालता था कि भारत के हमलावर रवैये के विरुद्ध उसे कम से कम चीन का साथ तो मिलेगा ही लेकिन ऐसा नहीं होने से इस्लामाबाद की सारी हेकड़ी निकल गई। बची खुची कसर पूरी कर दी ओआईसी में भारत को मिले आमंत्रण ने। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कोई नया नहीं है। सीमा पर अघोषित युद्ध का माहौल सदैव बना रहता है। कश्मीर घाटी में छद्म युद्ध के जरिये वह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए निरन्तर खतरा पैदा करता रहता है। मसूद अजहर और हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकी सरगनाओं को खुले आम संरक्षण देने के बाद भी इस्लामिक देश उसकी मदद करते रहे। चीन ने तो एक तरह से उसे गोद ही ले रखा था जबकि अमेरिका , अफगानिस्तान की वजह से उसकी सारी हरकतों को सहन करता आया है। लेकिन मौजूदा संकट के समय भारत को जो चौतरफा समर्थन और सहानुभूति हासिल हुई वह बड़ी उपलब्धि है। भले ही भारत के भीतर विरोधी दल और वामपंथी विचारधारा से प्रेरित सहिष्णुतावादी इसे स्वीकार नहीं करें किन्तु इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर प्रधानमंत्री भी इस तरह का कूटनीतिक कौशल नहीं दिखा सकीं। 1971 की लड़ाई के समय भी केवल तत्कालीन सोवियत संघ ही भारत के साथ खड़ा नजऱ आया था। अमेरिका और उसके पिछलग्गू पश्चिमी देश खुलकर भारत के विरोध में नजर आए। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया दो शक्ति केंद्रों में बंट गई तब भारत ने हालांकि गुट निरपेक्षता का रास्ता पकड़ा किन्तु पहले पं नेहरु और फिर इंदिरा जी के कारण वह साम्यवादी खेमे की तरफ झुकता गया । चीन से दुश्मनी के बाद सोवियत संघ भारत का संरक्षक बनकर सामने आया । संरासंघ में कश्मीर मसले पर उसी के वीटो ने हमेशा भारत की रक्षा की । लेकिन उसके विघटित होने के बाद शीतयुध्द का नया रूप सामने आया जिसमें बाजारवाद हावी हो गया । यहां तक कि माओ के दौर का चीन भी मुक्त अर्थव्यवस्था के आकर्षण में फंस गया। बीते 20 - 25 साल में पूरी दुनिया आर्थिक उदारवाद नामक जिस व्यवस्था से संचालित हो रही है उसमें भारत की दोहरी भूमिका है । एक तरफ तो वह विश्व के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में सामने आया वहीं मानव संसाधन की प्रचुरता ने भी दुनिया को आकर्षित किया। पीवी नरसिम्हा राव के समय डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों का सूत्रपात किया था किन्तु भारत की ताकत का सही प्रगटीकरण हुआ अटल जी के कार्यकाल में जब भारत परमाणु शक्ति बनने के साथ ही विश्व रंगमंच पर आत्मविश्वास से भरपूर देश के तौर पर उभरा। उसके बाद के दस वर्ष उदासीनता में गुजरे लेकिन श्री मोदी ने आते ही भारत को वैश्विक स्तर पर एक बार फिर जिस तरह से प्रतिष्ठित किया उसी का सुपरिणाम बीते कुछ दिनों में देश ने देखा। पाकिस्तान की तरफ से शांति की पेशकश , अभिनंदन की बिना शर्त रिहाई और ओआईसी में भारत की प्रभावशाली उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि मोदी सरकार ने विदेश नीति के क्षेत्र में बहुत ही उल्लेखनीय या यूँ कहें कि अभूतपूर्व कार्य किया । अटल जी की सरकार ने जब परमाणु परीक्षण किया उसके बाद भी देश का कूटनीतिक कौशल उजागर हुआ था। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अमेरिकी लॉबी द्वारा लगाए प्रतिबंधों को जिस तरह लंबी वार्ताओं के जरिये शिथिल करवाया वह भी अविस्मरणीय है। लेकिन बीते पांच वर्ष में भारत ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह से अपने संबंधों का विस्तार करते हुए उन्हें मजबूती प्रदान की उसी का परिणाम है कि आज पूरा विश्व भारत के साथ खड़ा हुआ है । निश्चत रूप से ये बहुत बड़ी उपलब्धि है जिसके लिए प्रधानमंत्री की प्रशंसा की जानी चाहिए जिन्होंने आलोचनाओं से विचलित हुए बिना लगातार विदेश यात्राएं करते हुए देश को इस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 1 March 2019

इमरान की प्रशंसा करने वालों को क्या कहा जाए

अपने एक वीर सैनिक के दुश्मन के कब्जे में होने से चिंतित देश को उस समय हर्षमिश्रित राहत मिली जब पता चला पाकिस्तान ने उसे रिहा करने का फैसला कर लिया है। बुधवार की सुबह पाकिस्तान के हवाई हमले को विफल करने के लिए विंग कमांडर अभिनंदन ने अपने मिग 21 लडाकू विमान से दुश्मन के  स्न-16 विमान का पीछा किया। इसे विश्व के सर्वश्रेष्ठ और अजेय लड़ाकू विमानों में माना जाता है। अभिनंदन ने उसे निशाने पर लेकर  ध्वस्त कर दिया। लेकिन इस दौरान वे पाक अधिकृत कश्मीर में प्रविष्ट हो गए जहां उनके विमान को दुश्मन की मिसाइल ने मार गिराया और वे पैराशूट से नीचे उतर आए। उसके बाद की कहानी सभी जानते हैं। उनके साथ स्थानीय लोगों द्वारा किये गए दुव्र्यवहार के जो चित्र प्रसारित हुए उनकी वजह से पूरा देश अपने जाबांज सैनिक की सुरक्षा के लिए चिंतित  हो उठा। कुछ देर के लिए लगा कि पाकिस्तान के पास हमारी नस दबाने का हथियार आ गया है। घरेलू मोर्चे पर एक बड़ा वर्ग युद्ध के नुकसान पर प्रवचन झाडऩे में जुट गया। मकसद ये था कि अभिनंदन के बहाने सरकार पर पाकिस्तान का वार्ता प्रस्ताव मंजूर करने का दबाव बना दिया जाए। उधर पाकिस्तान के विदेश मंत्री द्वारा बंधक पायलट की रिहाई के लिए भारत के सामने हालात सामान्य बनाने की शर्त रख दी। उसे लगा कि भारत अपने सैनिक की रिहाई के लिये झुकने को तैयार हो जायेगा लेकिन इसके उलट उसे कड़ी भाषा में समझा दिया गया कि अभिनंदन को युद्ध बंदी के रूप में जिनेवा संधि के तहत बिना शर्त छोड़ा जाए। उल्लेखनीय है पाकिस्तान के विदेश मंत्री कल सुबह तक कहते रहे कि भारतीय पायलट को युद्ध बंदी मानने संबंधी निर्णय उस वक्त तक नहीं लिया गया था। कुलभूषण जादव और सरबजीत जैसे उदाहरणों की वजह से भारत का चिंतित होना स्वाभाविक भी था। पाकिस्तान की  गिरफ्त में आए भारतीय नागरिकों के साथ किये जाने वाले अमानुषिक व्यवहार के किस्से दिल दहलाने वाले रहे हैं। ऐसे में इस बात का डर था कि अभिनंदन  को बजाय युद्ध बंदी के घुसपैठिया मानकर कुलभूषण जादव जैसा सलूक न किया जाए । लेकिन पिछली परिपाटियों से अलग हटते हुए भारत की सरकार और सेना दोनों ने कह दिया कि अभिनंदन के नाम पर किसी भी तरह की सौदेबाजी मंजूर नहीं होगी। उधर संरासंघ में अमेरिका और फ्रांस जैसे बड़े देशों ने मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित किये जाने का प्रस्ताव रखकर इमरान सरकार पर दबाव बना दिया। अंतत: पाकिस्तान की संसद में इमरान ने अभिनंदन को रिहा करने की घोषणा कर दी और उसे शांति की दिशा में एक कदम बताया। यही नहीं तो इमरान ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बातचीत करने का प्रयास किया लेकिन इस तरफ से उन्हें कोई जवाब नहीं मिल सका। इस तरह अभी तक भारत का पलड़ा युद्ध और कूटनीति दोनों मोर्चों पर भारी  साबित हुआ। लंबे समय बाद भारत की सामरिक और कूटनीतिक ताकत का डंका पूरे विश्व में बजा है। चीन को लेकर जो शंकाएं थीं वे भी निर्मूल साबित हुईं। हालांकि उसका पाकिस्तान प्रेम छिपा नहीं हैं लेकिन मौके की नजाकत और विश्व बिरादरी के रुख को देखते हुए वह अभी तक तो ठंडा पड़ा हुआ है। कुल मिलाकर पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करने और फिर अभिनंदन की रिहाई की खबर तक जो कुछ भी हुआ उससे हर देशवासी खुद को गौरवान्वित अनुभव कर रहा है लेकिन आज भी देश में एक लॉबी उन लोगों की है जिन्हें ये सब अच्छा नहीं लग रहा। ये वही लोग हैं जो श्री मोदी के छप्पन इंची सीने के दावे का मखौल उड़ाने में  आगे-आगे रहते थे। किसी भी बड़ी आतंकवादी वारदात के बाद ये तबका सरकार की नाकामी को मुद्दा बनाकर आसमान सिर पर उठाने में जुट जाता था। पुलवामा की घटना के  दो-चार दिन की ख़ामोशी के बाद जब भारतीय सेना ने दुश्मन के घर के भीतर घुसकर प्रहार किया तब उन सबकी बोलती बंद हो गई जो ऐसा करने के लिए सरकार को उकसाया करते थे। हद तो तब हो गई जब सर्जिकल स्ट्राइक और मारे गए आतंकवादियों की संख्या पर ही सवाल उठाए जाने लगे। जब इस सबका जनता पर असर नहीं हुआ तब इमरान खान की तारीफ में कसीदे पढऩे की प्रतिस्पर्धा शुरु हो गई। अपने देश की सेना और सरकार की बजाय शत्रु राष्ट्र के प्रधानमंत्री को शांति का मसीहा साबित करने वाले लोगों को किस श्रेणी में रखा जाए ये बहुत ही विचारणीय मुद्दा है। पूरे घटनाक्रम को चुनाव से जोडऩे की आपाधापी में ये लोग देश का मनोबल गिराने जैसा अपराध कर रहे हैं। यदि पुलवामा हमले का माकूल जवाब नहीं दिया गया होता तब शांति के हिमायती ये लोग केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री की फजीहत करने पर आमादा हो गए होते।  निश्चित रूप से ये राजनीति का नकारात्मक रूप है। जहाँ तक बात चुनाव में लाभ लेने की है तो क्या अतीत में ऐसा नहीं हुआ ? 1972 में विधानसभा चुनावों के पहले हुए बांग्ला देश युद्ध की विजय का श्रेय लेकर इंदिरा जी ने कांग्रेस के पक्ष में उसे जमकर भुनाया था ? यदि श्री मोदी ने आतंकवाद के विरुद्ध बड़ा और कड़ा कदम उठाते हुए देश की सुरक्षा और सम्मान की दिशा में शानदार कदम उठाये तो उसकी प्रशंसा करने का  बड़प्पन भले न दिखाया जाए लेकिन सेना के साहस और शौर्य पर सन्देह व्यक्त करने जैसा कुकृत्य भी नहीं होना चाहिए। लोकसभा  चुनाव में सत्तारूढ़ दल अपनी उपलब्धियाँ प्रचारित करेगा तब विपक्ष के पास भी कहने को बहुत कुछ होगा। जनता इतनी मूर्ख नहीं है कि वह प्रधानमंत्री अगर झूठ बोलेंगे तो उसे बिना सोच स्वीकार कर लेगी। सूचना क्रांति के इस दौर में कुछ भी दबा - छिपा नहीं रह पाता। इसलिए विपक्ष या मौजूदा सरकार को फूटी आंखों से भी नहीं देखने के इच्छुक महानुभाव निराश होकर इमरान की तारीफ के पुल बांधने की बजाय अपने देश की गौरवगाथा का गान करें। नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी यदि देश हित के विरुद्ध कुछ भी करती है तो दो महीने बाद राष्ट्र की जनता उनका हिसाब-किताब कर देगी । लेकिन इस समय जो भी सरकार और सेना के निर्णयों पर सवाल करेगा उसकी नीयत पर सन्देह होना सहज और स्वाभाविक ही है । अपने लड़ाकू विमान भेजकर भारत के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश करने वाले इमरान खान का गुणगान करने वालों को लेकर जनमानस में जबर्दस्त गुस्सा है जो समय आने पर सामने आए बिना नहीं रहेगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी