Monday, 11 March 2019

लंबे चुनाव अभियान में मुद्दों से भटकाव की आशंका

लोकतंत्र के महाकुंभ का ऐलान हो गया | 11 अप्रैल से शुरू होकर 19 मई तक चलने वाले इस आम चुनाव में 7 चरणों में विभिन्न राज्यों में मतदान कराया जाएगा | 23 मई को एक साथ सभी सीटों पर मतगणना होगी | इस प्रकार आज से जोड़ें तो तकरीबन सवा दो महीने तक पूरा देश चुनाव मय रहेगा | वैसे तो हमारे देश में चुनाव भी नित्यकर्म जैसा बन गया है | लोकसभा के लिए भले ही 5 वर्ष में एक बार मतदान की प्रक्रिया होती है लेकिन उसके बाद भी प्रतिवर्ष किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते रहने से राजनीतिक गर्मी बनी रहती है | जब टीवी नहीं था तब दूसरे राज्य की खबरें अखबार से ही मिला करती थीं किन्तु अब तो मानों पूरा देश ही सियासी तौर पर जुड़ गया है | लोकसभा के साथ आंध्र , उड़ीसा , अरुणाचल और सिक्किम की विधानसभा के लिए भी मतदान होगा | पहले संभावना जताई जा रही थी कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनाव भी लोकसभा के साथ करवाये जा सकते हैं लेकिन वैसा नहीं हुआ | कुछ माह बाद ही वहां भी चूनावी बिसात बिछाई जावेगी | इसी तरह 2020 में भी चुनावी बिगुल बचता रहेगा | मोदी सरकार , चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने लोकसभा के साथ ही सभी विधानसभाओं के चुनाव करवाने की जो पहल की थी वह क
अधिकाँश पार्टियाँ को नहीं जमने की वजह से अधर में लटककर रह गई | यदि ऐसा हो जाता या भविष्य में भी हो जाए  तो देश  अनेक समस्याओं से मुक्ति पा सकेगा | बहरहाल अभी तो पूरा ध्यान इस चुनाव पर आकर केंद्रित हो गया है जो कई मायनों में अभूतपूर्व होगा |  2014 में आजादी के बाद पहली बार केंद्र में विशुद्ध गैर  कांग्रेसी सरकार बनी थी | कांग्रेस सत्ता से हटी ही  नहीं 50 से भी कम पर सिमटकर मान्यता प्राप्त विपक्षी दल की हैसियत से भी वंचित हो गई | बीते पांच साल में देश ने बहुत कुछ अच्छा - बुरा देखा | सरकार की सफलताओं और विफलताओं को लेकर अन्तहीन बहस भी चलती रही | राजनीतिक घटनाक्रम भी अत्यंत रोचक रहा जिसका सार यदि निकाला जाए तो भले ही कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार न हो सका हो किन्तु भाजपा ने अपने आपको सही अर्थों में राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित कर लिया जो 2014 के पहले तक अकल्पनीय माना जाता था | इसका श्रेय निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को देना होगा लेकिन इसी के साथ ये  कहना भी गलत नहीं होगा कि इस अंधी दौड़ में भाजपा ने अपनी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता से काफी समझौते किये जो सफ़लता के शोर में भले ही उपेक्षित हो गए हों किन्तु सत्ता की चाहत में कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते - लगाते कांग्रेस युक्त भाजपा जैसी स्थिति भी बनती गई | बावजूद उसके बतौर प्रधानमंत्री श्री मोदी ने पूरे पांच साल अपने को प्रासंगिक बनाये रखा और ये कहना गलत नहीं होगा कि ये चुनाव भी पूरे देश में मोदी समर्थन और मोदी विरोध पर आकर सिमट गया है  | वैसे तो पिछला लोकसभा चुनाव भी काफी हद तक उनके इर्द गिर्द  ही सिमटा रहा लेकिन वे भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिलवा सकेंगे ये दिवास्वप्न ही माना जा रहा था | लेकिन इस चुनाव में मुद्दा ये है कि क्या श्री मोदी भाजपा की उस सफलता को दोहराने का कारनामा दिखा सकेंगे  ?  मप्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान की पराजय के बाद भाजपा की पेशानी पर पसीने की बूंदें साफ देखी जा सकती थीं | लेकिन प्रधानमंत्री ने पहले बजट और उसके बाद पकिस्तान के विरुद्ध बेहद आक्रमक रवैया अपनाते हुए पूरे देश का राजनीतिक वातावरण और सन्तुलन दोनों उलट पुलट कर दिए | इस वजह से विपक्ष जिन मुद्दों को बीते एक साल से जोरशोर से उठते हुए भाजपा की राह में कांटे बिछा रहा था वे सभी फिलहाल तो गौण होकर रह गए हैं | दूसरी सबसे अहम बात ये हुई कि सोनिया गांधी की लगातार कोशिशों के बावजूद भी गैर भाजपा पार्टियां एक झण्डे के तले नहीं आ सकीं | यद्यपि विभिन्न राज्यों में अलग - अलग भाजपा विरोधी गठबंधन बने किन्तु उनका राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा । बिहार में लालू के जेल में होने की वजह से महागठबंधन का जितना हल्ला था उसके मुताबिक कुछ नहीं हो पा रहा और जिस उप्र को दिल्ली की सत्ता का प्रवेश द्वार माना जाता है वहां भी सपा - बसपा ने कांग्रेस से सलाह लेने तक की जरूरत तक नहीं समझी । और अपनी उपेक्षा से आहत होकर वह अकेली मैदान में उतर रही है । इस वजह से भाजपा पर जो मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सकता था वह नहीं हो सका | इसका एक कारण घोर भाजपा विरोधी दलों के बीच कांग्रेस को लेकर सन्देह का भाव भी है | कांग्रेस द्वारा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे लाया जाना भी इसके पीछे है | इस कारण विपक्षी दल चाहते हुए भी मोदी के विरोध में  एकजुट होने का एहसास नहीं दिला सके | यही कारण है कि दिसम्बर 2018 में जो प्रधानमंत्री कमजोर लगने लगे थे वही दौड़ में सबसे आगे निकलते दिखाई देने लगे | पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले ने केंद्र सरकार की जमकर किरकिरी कर दी थी लेकिन उसके बाद जो हुआ उसने पांसा पलटकर रख दिया | दबी जुबान ही सही लेकिन ग़ैर भाजपाई दल भी ये स्वीकार करने लगे हैं कि बालाकोट में की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने मोदी लहर को काफी हद तक पुनर्जीवित कर दिया है | लेकिन भाजपा यदि इसी खुशफहमी में रही तो उसके अच्छे दिन झमेले में पड़ सकते हैं | इसका कारण चुनाव अभियान का लंबा चलना है | जिन मुद्दों से जंग की शुरूवात होगी वे पूरे समय गर्म रहें ये कहना कठिन है | राफैल के मामले को भले ही ठंडा माना जा रहा हो किन्तु सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई के दौरान कोई ऐसी बात निकल आई जो प्रधानमंत्री के लिए नुकसानदेह हुई तब भाजपा के लिए स्थिति को संभालना बहुत कठिन हो जाएगा | इसी तरह सर्जिकल स्ट्राइक के श्रेय को प्रासंगिक बनाये रखना भी उतना आसान नहीं है जितना सोचा जा रहा है | उस दृष्टि से आगामी दो महीने बेहद असमंजस भरे होंगे जिनमें राजनीतिक दलों को भरी गर्मी में न सिर्फ पसीना और पैसा बहाना पड़ेगा अपितु जनता  के सवालों का जवाब भी देना पड़ेगा | सबसे बड़ी बात ये है कि इस चुनाव से भारत का भाग्य और भविष्य दोनों जुड़े हुए हैं | नतीजे क्या होंगे ये तो मतदाता ही तय करेंगे किन्तु यदि विकास , सुरक्षा और स्थायित्व लोगों के मन में बैठे तब मोदी सरकार की वापिसी की उम्मीद की जा सकती है किंतु  मतदाताओं ने यदि इनसे अलग हटकर विचार किया तब परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं | यूँ भी लगभग 70 दिन तक चुनाव प्रचार चलने से मुद्दों में घालमेल होना संभव है | इस सबके  बावजूद इस चुनाव का केंद्र बिंदु नरेंद्र मोदी ही रहेंगे क्योंकि चाहे उनकी प्रशंसा की जाए या निंदा लेकिन उपेक्षा करना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा | शायद 1971 के बाद ये पहला चुनाव है जिसमें नीति और विचारधारा की बजाय व्यक्तित्व पूरे माहौल पर छाया हुआ है | 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 9 March 2019

असुरक्षित रक्षा मंत्रालय चिंता का विषय

पूरे देश को ये जानकर राहत मिली होगी कि राफैल संबंधी गोपनीय दस्तावेज चोरी नहीं हुए । तीन दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय में जब अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने इस बारे में जानकारी दी तब न्यायाधीशों ने उनसे पूछा था कि सरकार ने इस बारे में क्या किया जिसका वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। उसके बाद पूरे देश में इसे लेकर मोदी सरकार पर उंगलियां उठने लगीं। राहुल गांधी ने तो पत्रकार वार्ता करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग तक कर डाली। प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा द्वारा लगाई गई पुनर्विचार याचिका में चेन्नई के हिन्दू अखबार के उस समाचार को आधार बनाया गया जिसके अनुसार राफैल सौदे में प्रधानमंत्री कार्यालय ने हस्तक्षेप किया था। अटॉर्नी जनरल ने गोपनीय दस्तावेज प्रकाशित करने के लिए उक्त अखबार पर कार्रवाई किए जाने की बात तो कही किन्तु उसकी सत्यता को लेकर अदालत को बताया कि रक्षा मंत्रालय से वे चोरी कर लिए गए। यद्यपि अदालत ने गोपनीयता भंग किये जाने के बाद भी सन्दर्भित दस्तवेजों का संज्ञान लेने की बात कही किन्तु पूरा मामला दस्तावेजों की चोरी पर आकर केंद्रित हो गया। न्यायालय ने सरकार से इस बारे में जवाब देने कहा। जो लोग ये मानकर चलते आए हैं कि राफैल सौदे में कोई घपला नहीं हुआ वे भी दस्तावेज चोरी जाने की खबर से संशय में पड़ गए। सबसे ज्यादा चिंता इस बात की हुई कि रक्षा मंत्रालय से गोपनीय दस्तावेज गायब हो गए। इसके कारण केंद्र सरकार की क्षमता पर भी सवाल उठे। सर्वोच्च न्यायालय में सरकार के संभावित उत्तर की सभी को प्रतीक्षा थी किन्तु उसके पहले ही श्री वेणुगोपाल ने स्पष्टीकरण दे दिया कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए अपितु याचिका में उन दस्तावेजों की फोटो कॉपी संलग्न की गई थी। अटॉर्नी जनरल के इस बयान के बाद सरकार पर पलटी मारने जैसा आरोप स्वाभाविक रूप से लगा। एक झूठ छिपाने के लिए दस बोलने जैसे तंज भी कसे जा रहे हैं। इस बारे में विचारणीय मुद्दा ये है कि श्री वेणुगोपाल ने दस्तावेज चोरी होने की बात किस आधार पर कही थी? यदि ये उनके अपने दिमाग की उपज थी तब उन्हें पद से अलग कर देना चाहिए और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने उन्हें वह जानकारी दी तब उनके विरुद्ध भी समुचित कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि  इस तरह की बातों से केवल सरकार की ही नहीं पूरे देश की जगहंसाई होती है। अटॉर्नी जनरल द्वारा दस्तावेज चोरी नहीं होने की बात कहकर चिंता दूर जरूर कर दी गई किन्तु एक बात तो वे भी मान रहे हैं कि याचिका के साथ पेश की गई फोटो कॉपी दस्तावेजों की ही हैं। पिछली सुनवाई के दौरान श्री भूषण ने ये कहा था कि उन्होंने सूचना के अधिकार के जरिये उन्हें हासिल किया था। हालांकि उन्होंने ये स्वीकार किया कि एक दस्तावेज के स्रोत के बारे में वे अनभिज्ञ हैं। उनकी बात कितनी सही है ये तो पता नहीं चल सका किन्तु इस पूरे विवाद से एक बात निकलकर सामने आई कि रक्षा विभाग में गोपनीय दस्तावेज़ भी सुरक्षित नहीं है। जो गोपनीय है उसे सूचना के अधिकार के तहत भी उजागर नहीं किया जा सकता और यदि याचिकाकर्ता के पास उसकी फोटो कॉपी भी है तो वह कैसे आई ये जांच का विषय है। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ  कह दिया है कि दस्तावेज भले चोरी से हासिल किया गया हो किन्तु उसे विचारार्थ स्वीकार किया जा सकता है। अटॉर्नी जनरल द्वारा चोरी का खंडन किये जाने के बाद भी विवाद यथावत है। हिन्दू अखबार में प्रकाशित दस्तावेज यदि गोपनीय हैं तब उस पर गोपनीयता भंग का आरोप तो लगता ही है लेकिन प्रशांत भूषण जैसे अनुभवी अधिवक्ता ने भी यदि उन का उपयोग किया तो वे भी दोषारोपण से नहीं बच सकते। दूसरी तरफ  ये भी सही हैं कि गोपनीय दस्तावेजों को सुरक्षित रखना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि वे चोरी नहीं हुए किन्तु उनकी फोटो कॉपी किसी ने करवा ली तो ये भी बड़ी चूक है। श्री वेणुगोपाल के स्पष्टीकरण का ये आशय भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने याचिका के साथ संलग्न दस्तावेजों की सत्यता को स्वीकार करने की झंझट से बचने के लिए चोरी जाने का बहाना बना दिया लेकिन इसके कारण जब सरकार की छीछालेदर होने लगी तब पलटी मार दी गई। राफैल मामले में अभी तक विपक्ष ने जो आरोप लगाए उन पर जनता को कितना भरोसा हुआ ये तो अब लोकसभा चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे किन्तु ये कहने में कुछ भी गलत नहीं होगा कि सरकार की तरफ  से किये जा रहे बचाव में बचकानापन झलकने से उसे शर्मसार होना पड़ता है। चूंकि प्रधानमंत्री के बारे में अभी भी आम धारणा ये है कि वे ईमानदार हैं इसलिए राहुल गांधी द्वारा तकरीबन रोजाना राफैल की रट लगाए जाने के बाद भी श्री मोदी की छवि अक्षुण्ण है। लेकिन गोपनीयता की आड़ में जिस बात को संसद तक से छिपाया गया वह यदि अखबार की सुर्खी बन जाये और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत याचिका में भी उसका उपयोग हो गया तब सरकार की जवाबदेही तो बनती ही है। इसके पहले इसी मामले में सीएजी रिपोर्ट को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में दी गई जानकारी पर भी अटॉर्नी जनरल ने कदम वापिसी की थी। इस सौदे को लेकर सत्ता और विपक्ष दोनों को अग्निपरीक्षा देनी पड़ेगी। मोदी सरकार यदि सही है तो उसे उन संदेहों का समुचित निराकरण करना होगा जो विपक्ष और कतिपय समाचार माध्यमों द्वारा उठाये गये हैं। वहीं विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस भी इस मुद्दे पर इतनी आगे बढ़ चुकी है कि उसके लिये पीछे हटना या चुप होना संभव नहीं रहा। यद्यपि श्री मोदी जिस आत्मविश्वास के साथ तमाम आरोपों को झुठलाते हैं उसका असर भी जनता पर पड़ता है। पाकिस्तानी हवाई हमले के बाद राफैल की कमी का मुद्दा छेड़कर उन्होंने विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने में जरा सी भी देर नहीं लगाई किन्तु पिछली सरकार से ज्यादा कीमत देने और अनिल अंबानी जैसे दिवालिया हो चुके कारोबारी को राफैल संबंधी काम दिलवाने के आरोप अभी भी हवा में तैर रहे हैं। गोपनीयता के नाम पर संयुक्त संसदीय समिति के गठन से इंकार और ज्यादा कीमत देने के औचित्य को साबित नहीं किए जाने से सरकार पर भी शक की सुई लटक रही है। अटॉर्नी जनरल के ताजा स्पष्टीकरण के बाद भले ही दस्तावेज चोरी होने के आरोप से सरकार बच गई हो किन्तु इस पूरे प्रकरण में इतना तो साफ  हो ही गया कि सरकार का बचाव करने वाली टीम या तो अनुभवहीन है या फिर उसमें आपसी सामंजस्य का अभाव है। इस विवाद से एक बात और भी उभरकर सामने आ रही है कि यदि राफैल से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों की फोटो कॉपी याचिकाकर्ताओं के पास चली गई तो और भी संवेदनशील दस्तावेज इसी तरह गैर जिम्मेदार हाथों में पड़ गए होंगे। इसलिए जरूरी है इस मामले की राजनीति से अलग हटकर जांच करवाई जाए क्योंकि ये किसी सरकार के बचाव से ज्यादा देश की सुरक्षा से जुड़ा मसला है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 8 March 2019

जम्मू धमाका नए खतरे का संकेत

पुलवामा हमले के बाद भले ही पाकिस्तान की भाषा रक्षात्मक हो गई हो और वैश्विक दबाव में वह मसूद अजहर और हाफिज सईद पर शिकंजा कसने का नाटक कर रहा हो लेकिन जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवादी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे। 14 फरवरी के बड़े आतंकवादी हमले के बाद भी कश्मीर घाटी में आतंकवादियों के साथ सुरक्षा बलों की मुठभेड़ लगभग रोजाना ही होती है।  इससे साबित होता है कि अभी उनके हौसले पस्त नहीं हुए हैं।  इसका ताजा प्रमाण गत दिवस जम्मू शहर के मोटर स्टैंड पर हुए धमाके से मिला।  इसमें 1 व्यक्ति की मौत हो गई जबकि तकरीबन तीन दर्जन घायल हैं। ग्रेनेड से किये गए इस विस्फोट के जिम्मेदार को थोड़ी देर बाद ही गिरफ्तार भी कर लिया गया। लेकिन इस वारदात का चिंताजनक पहलू ये है कि कश्मीर घाटी के बाहर जम्मू के भीड़ भरे मोटर स्टैंड को आतंवादियों ने अपना निशाना बनाया। हालांकि जम्मू में पहले भी इस तरह के हमले हुए हैं लेकिन कश्मीर घाटी की तुलना में उनकी संख्या उँगली पर गिने जाने लायक ही है। उल्लेखनीय है जम्मू पूरी तरह से हिन्दू बहुल इलाका है। उस कारण से वहां पाकिस्तान समर्थक आतंकवादियों को घाटी जैसा स्थानीय समर्थन और संरक्षण नहीं मिल पाता। यही कारण है कि जम्मू और उसके आसपास के इलाके आतकंवाद से उतने पीडि़त नहीं हुए। लेकिन कल के हमले के बाद सुरक्षा बलों को अपनी सतर्कता बढ़ानी होगी। बड़ी बात नहीं कि घाटी में बढ़ते दबाव और चौतरफा घेराबंदी की वजह से आतंकवादी संगठन अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए जम्मू क्षेत्र में अपनी गतिविधियां तेज कर दें। यद्यपि उन्हें स्थानीय स्तर पर घाटी जैसा सहयोग तो नहीं मिलेगा लेकिन बीते कुछ वर्षों में मुस्लिम आबादी योजनाबद्ध तरीके से बनिहाल दर्रे के नीचे के क्षेत्र में बसाने का काम हुआ है।  करीब-करीब यही कारगिल से ऊपर लद्दाख अंचल में महसूस किया जा सकता है। घाटी के दोनों मुख्य क्षेत्रीय दलों नेशनल कांफे्रंस और पीडीपी का प्रभावक्षेत्र मुख्यरूप से अभी तक केवल घाटी तक ही सिमटा हुआ था। मुस्लिम आबादी को जम्मू कहे जाने वाले क्षेत्र में बसाने के पीछे का मकसद उनका प्रभावक्षेत्र बढ़ाना भी है।  इस आधार पर कल के धमाके को आतंकवादियों के विस्तार के रूप में देखते हुए सुरक्षा बलों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। पाकिस्तान की ये कार्यप्रणाली रही है कि वह आतंकवादी संगठनों के माध्यम से भारत को परेशान करने के नए तरीके ढूंढता रहता है। जम्मू का धमाका ऐसी ही किसी नई दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा हो सकता है। यूँ भी भारत से शिकस्त खाने के बाद वह खीझ निकालने से बाज नहीं आता। बड़ा हमला करने पर चूंकि उसकी विश्वव्यापी चर्चा होती है इसलिये आतंकवादी इसी तरह के छोटे-छोटे धमाके करते हुए देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये परेशानी पैदा कर सकते हैं। ये भी मुमकिन है कि जम्मू जैसी वारदात अन्य राज्यों में भी की जाएं। लोकसभा चुनाव के दौरान भी पाकिस्तान ऐसा कुछ कर सकता है जिससे भारत के भीतर अफरातफरी तथा असुरक्षा का माहौल बना रहे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 March 2019

स्वच्छता को संस्कार बनाना होगा

राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण में मप्र के इंदौर को एक बार फिर देश के सबसे स्वच्छ शहर और भोपाल को सबसे स्वच्छ राजधानी होने का जो गौरव प्राप्त हुआ वह पूरे प्रदेश के लिए सम्मान की बात है । देश भर में किए गये सर्वेक्षण के उपरांत गत दिवस जो परिणाम आए उनसे ये तो लगा ही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारम्भ राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन जनता के स्तर पर भी मुख्यधारा का एजेंडा बन गया है। हालांकि अभी भी इस मुहिम में सरकारी भागीदारी ही ज्यादा है लेकिन ये स्वीकार करना गलत नहीं होगा कि स्वच्छता को लेकर प्रारम्भ प्रतियोगिता ने एक उपेक्षित समझे जाने वाले विषय को प्रासंगिक बना दिया है । यद्यपि पुरस्कार बांटने मात्र से स्वच्छता नहीं लाई जा सकती । भारतीय जीवनशैली में स्वच्छता का विशेष महत्व होता है । इसे संस्कार कहना भी उचित ही होगा । इसीलिए जब विश्व हैंड वॉश डे पर हाथ धोने जैसी बातें प्रचारित होती हैं तब हंसी आती है क्योंकि ये तो हमारे समाज में बचपन से ही सिखाया जाता है । आज भी ग्रामीण क्षेत्रों और गरीबों की बस्तियों में घर के सामने लिपाई-पुताई के जरिये सफाई रखी जाती है । बेहतर हो स्वच्छता को प्रतियोगिता और पुरस्कार से आगे बढ़ाकर दैनिक जीवन का संस्कार बनाने की मुहिम चलाई जाए। इसमें दो मत नहीं है कि इस तरह के अभियान से नागरिकों की सोच भी प्रभावित होती है । मसलन चंडीगढ़ के लोग अपने शहर को सिटी ब्यूटीफुल कहे जाने से केवल गौरवान्वित ही नहीं महसूस करते अपितु इस विशेषण को बनाए रखने के प्रति सजग भी रहते हैं । मप्र के इंदौर शहर में भी स्वच्छता लोगों की आदत में शुमार हुई है। ये प्रतियोगिता लोगों में जागरूकता फैलाने के लिहाज से नितांत उपयोगी और लाभदायक है लेकिन अब जरूरी हो गया है कि इस अभियान को केवल प्रतियोगिता और सर्वेक्षण से बढ़ाकर एक दैनिक क्रिया के तौर पर विकसित किया जाए । सिंगापुर एक शहर का देश है जो पांच दशक पहले तक गंदगी से पटा था किंतु वहां के प्रधानमंत्री  ने खुद होकर सफाई अभियान का नेतृत्व किया जिसने सिंगापुर की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल दी । जिन शहरों ने इस वर्ष बाजी मारी उनकी प्रशंसा होनी चाहिए और जो पिछड़ गए वे अगले साल के सर्वेक्षण का इंतजार किये बिना स्वच्छता को कर्तव्य के तौर पर अपना लें तो वे किसी पुरस्कार के मोहताज नहीं रहेंगे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

वरना 6 दिसम्बर ' 92 दोहराए जाने की आशंका


अयोध्या में राम जन्मभूमि संबंधी विवाद पर न्यायालयीन फैसले को लेकर हो रही देरी से जनता का धैर्य जवाब देने लगा है। बरसों, क्या दशकों से लटके इस प्रकरण का राजनीतिक समाधान नहीं निकलने के कारण सभी पक्षों ने ये स्वीकार किया कि जो अदालत कहेगी उसे वे मान लेंगे। यद्यपि अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांट देने जैसा फैसला देकर एक पहल की थी लेकिन उसे किसी ने मान्य नहीं किया और सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें लग गईं। उसके बाद भी बहुत लंबा समय बीत गया किन्तु सबसे बड़ी अदालत में भी मामला हनुमान जी की पूंछ जैसा लंबा होता चला गया। बीते कुछ महीनों में अनेक बार ऐसी उम्मीद जगी कि नियमित सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय अपना फैसला सुना देगा। लोकसभा चुनाव के पहले ऐसा होने पर राजनीतिक तौर पर भी बहुत से विवाद खत्म हो जाते लेकिन किसी न किसी वजह से सुनवाई टाली जाती रही। कभी पीठ का गठन और कभी बड़ी पीठ को प्रकरण दिए जाने के कारण विलंब होता गया। लेकिन लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब सर्वोच्च न्यायालय ने खुद होकर फैसला करने के बजाय पक्षकारों से ही आपसी बातचीत के जरिये विवाद निपटाने कहा। गत दिवस तो उसने साफ  कर दिया कि ये भूमि स्वामित्व का मसला न होकर आस्था का विषय है जिससे लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं। इसलिए सभी पक्षकार मध्यस्थों के नाम दे दें। पांच सदस्यों की पीठ ने खुद होकर मध्यस्थता करने से इंकार कर दिया। अदालत के इस निर्देश पर हिन्दू महासभा ने असहमति दिखाई जबकि मुस्लिम पक्ष राजी दिखा। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि एक प्रतिशत भी संभावना हो तो वह मध्यस्थता से मामला निबटाने को प्राथमिकता देगी। किसी विवाद का हल यदि आपसी बातचीत से हो जाये या फिर सर्वमान्य पंच मिलकर कोई रास्ता निकाल दें, इससेे बेहतर कुछ नहीं होगा लेकिन अयोध्या विवाद तो सर्वोच्च न्यायालय ने कोई साधारण भूमि स्वामित्व का झगड़ा नहीं अपितु करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा भावनात्मक विषय है इसलिए इसका निपटारा मध्यस्थता से करना उतना आसान नहीं है जितना माननीय न्यायाधीशगण समझ रहे हैं। सोचने वाली बात ये है कि जब सभी पक्ष सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को मानने को राजी हैं तब वह ऐसा करने से क्यों बच रहा है? रही बात आस्था और जनभावनाओं की तो तीन तलाक और सबरीमाला जैसे मामलों में भी तो सर्वोच्च न्यायालय ने प्रचलित आस्थाओं से अलग हटकर फैसला सुनाने का दु:साहस किया। अनेक ऐसे विवाद उसके समक्ष आते हैं जिनका कानूनी पक्ष स्पष्ट नहीं होने पर भी वह उन पर विचार करते हुए अपना फैसला देता है। ऐसे में देश के सबसे चर्चित विवाद को निपटाने में पेशी दर पेशी देने के बाद भी नौ दिन चले अढ़ाई कोस से भी खराब स्थिति में इस विवाद को रखने का औचित्य समझ से परे है। ये कहने की जरूरत नहीं है कि अयोध्या विवाद के कारण देश राजनीतिक तौर पर ही नहीं सामाजिक आधार पर भी बंटा है। बीते ढाई दशक से तो ये देश की मुख्यधारा का एजेंडा बना हुआ है। राजनीतिक दलों के बारे में जनता के मन में ये धारणा बन गई है कि वे अपने स्वार्थवश इसे लटकाकर रखने के इच्छुक हैं। वरना संसद जैसा सर्वोच्च मंच चाहता तो इसे कब का हल कर चुका होता। उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों तक को संसद ने बदला है। शाहबानो और अनु.जाति/जनजाति विषयक फैसले इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। ये सब देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ही उम्मीद की किरण के रूप में बच रहता है लेकिन अब तक की उसकी भूमिका भी आश्वस्त नहीं कर सकी। ये दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस तरह के संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर निर्णय करने में विधायिका और कार्यपालिका तो चीटी चाल से चलते ही रहे लेकिन न्यायपलिका का रिकार्ड भी बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता। ऐसा भी नहीं है कि न्यायपालिका सजग न हो। अनेक चर्चित मामलों में उसकी सक्रियता सराहनीय रही है। स्वयं संज्ञान लेकर भी उसने अनेक ऐसे मुद्दों पर व्यवस्था दी जो उपेक्षित पड़े थे। ये देखते हुए पूरा देश ये अपेक्षा कर रहा है कि अयोध्या विवाद को भी न्याय की सर्वोच्च आसंदी हल करते हुए देश को चैन की सांस लेने का अवसर देगी। मध्यस्थता और आपसी बातचीत से बात बनती होती तो बात सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक आती ही क्यों? जब अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा विवादित जमीन के तीन हिस्से करने संबंधी फैसला सभी पक्षों को संतुष्ट नहीं कर सका तब मध्यस्थों द्वारा किसी एक पक्ष को पूरी जमीन देने या उसमें हिस्सा बांट की बात को स्वीकार किये जाने की संभावना भी नहीं के बराबर है। बेहतर तो यही होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस विवाद पर अपना फैसला दे। यदि वह ऐसा करने में विफल रहा तो फिर 6 दिसम्बर 1992 जैसी स्थिति के दोहराए जाने की आशंका बनी रहेगी। द्विपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपनान्द जी ने राम मंदिर के शिलान्यास की जो घोषणा की थी वह उनकी अस्वस्थतावश भले ही अधर में लटक गई हो लेकिन संत समाज ने प्रयागराज कुम्भ में जिस तरह अपना आक्रोश व्यक्त किया उसे भी गम्भीरता से लिया जाना चाहिए क्योंकि अब साधु -सन्यासी भी राजनीति से अछूते नहीं रहे।

-रवीन्द्र वाजपेयी