Monday, 6 May 2019

सर्वसम्मत निष्कर्ष : कांग्रेस को बहुमत नहीं

19 मई को अंतिम चरण का मतदान होने के बाद एग्जिट पोल के नतीजों से 23 मई  को आने वाले परिणामों का हल्का सा संकेत मिल जायेगा लेकिन बीते दो-तीन दिनों से शीर्ष स्तर पर राजनीतिक नेताओं के जो बयान आ रहे हैं उनसे पता चलता है कि विभिन्न राजनीतिक दलों को एग्जिट पोल एजेंसियों ने अब तक हुए चार चरणों के मतदान के रुझानों से अवगत करवा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सपा-बसपा गठबंधन को लेकर किये कटाक्ष के बाद अखिलेश यादव द्वारा कांग्रेस पर सपा और देश को धोखा देने जैसे आरोप के साथ 23 मई को प्रधानमंत्री पद हेतु समर्थन का निर्णय जैसे बयान निरुद्देश्य नहीं हैं। गत दिवस अखिलेश ने एक टीवी चैनल से बतियाते हुए यहाँ तक कह दिया कि उनकी इच्छा है अगला प्रधानमन्त्री भी उप्र से ही बने और यदि श्री मोदी प्रधानमन्त्री बनते हैं तब वे उन्हें रोकने का प्रयास नहीं करेंगे बल्कि स्वागत करेंगे। दूसरी तरफ  बसपा प्रमुख मायावती ने सपा द्वारा उनका उपयोग करने संबंधी श्री मोदी की टिप्पणी को महागठबंधन में फूट डालने की कोशिश बता डाला। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गत दिवस प्रधानमंत्री पर तीखा हमला बोलते हुए यहाँ तक कह दिया कि उनकी सत्ता जाने वाली है। इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने ये कहकर चौंका दिया कि कांग्रेस पूर्ण बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटें लाने में विफल रहेगी। श्री सिब्बल का आकलन है कि भाजपा की सीटें घटकर 160 तक आ जायेंगी। इस प्रकार एक बात पर तो आम सहमति बनती दिख रही है कि कांग्रेस का बहुमत आने की कोई सम्भावना नहीं है। श्री सिब्बल के पहले राकांपा नेता शरद पवार और मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी सार्वजानिक तौर पर मान चुके हैं कि कांग्रेस 272 का जादुई आंकड़ा जुटाने में किसी भी सूरत में सफल होती नहीं दिख रही। श्री पवार ने उसे 100 सीटों से ज्यादा मिलने की बात तो कही लेकिन राहुल गांधी के प्रधानमन्त्री बनने की गुंजाईश से भी इंकार कर दिया। श्री पवार और कमलनाथ दोनों ने भाजपा को बहुमत नहीं मिलने के दावे भी किये किन्तु वे दोनों कांग्रेस को मिलने  वाली सीटों को लेकर कोई ठोस अनुमान लगाने में विफल रहे। इसी तरह श्री सिब्ब्ल ने भी भाजपा की सीटों में गिरावट के साथ ही उसे 160 पर लाकर खड़ा कर दिया लेकिन वे भी ये बताने का साहस नहीं बटोर सके कि कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगीं? अभी तक जितने भी चुनाव पूर्व सर्वे आये उनमें किसी ने भी कांग्रेस को बहुमत तो दूर 150 तक पहुँचने की संभावना तक नहीं जताई। राहुल गांधी भी मोदी सरकार के जाने के दावे तो आये दिन करते सुने  जाते हैं लेकिन उन्होंने भी सीना ठोककर अपनी पार्टी के बहुमत को लेकर कोई दावा अब तक नहीं किया। हालांकि सभी विपक्षी पार्टियां ये कयास लगा रही हैं कि एनडीए का बहुमत आने पर भी भाजपा यदि बहुमत से बहुत पीछे रही तब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन सकेंगे और कहीं एनडीए भी बहुमत से थोड़ा दूर रहा तब समर्थन देने वाली पार्टियां भी श्री मोदी की जगह किसी और को ही पसंद करेंगी। यहाँ तक कि उद्धव ठाकरे और नीतिश कुमार जैसे सहयोगी भी चाहेगे कि श्री मोदी जैसे कड़क व्यक्ति की बजाय स्व.अटल जी जैसा कोई सौम्य प्रधानमंत्री पद पर आसीन हो। भाजपा नेता डा. सुब्रमण्यम स्वामी ने भी हालिया एक बयान में तदाशय की राय व्यक्त की थी। लेकिन आज चुनाव के पांचवें चरण का मतदान होने तक चुनाव विश्लेषकों, राजनीतिक नेताओं, ज्योतिषियों और यहां तक कि सटोरियों के हवाले से भी जो कहा जा रहा है उसके मुताबिक ये सुनिश्चित है कि कांग्रेस को बहुमत तो दूर रहा वह सबसे बड़े दल के रूप में भी उभरने की स्थिति में नहीं है और यही भाजपा के आत्मविश्वास का आधार बन गया है। अब की बार 300 पार और फिर एक बार मोदी सरकार जैसे नारे भले ही चुनावी प्रचार के मन्तव्य से गढ़े गये हों लेकिन कांग्रेस को जब खुद ही अपने बहुमत का भरोसा नहीं रहा तब मतदाता भला क्यों उसे उपकृत करेंगे ये इस चुनाव का बड़ा सवाल बन गया है। उप्र की रायबरेली और अमेठी सीटों पर क्रमश: सोनिया गांधी  और राहुल का समर्थन करने के बाद भी  मायावती और अखिलेश यादव द्वारा बिना राहुल का नाम लिए कांग्रेस पर तीखे हमले करना ये दर्शाता है कि उन्हें भी भरोसा हो गया है कि कांग्रेस के बहुमत की दूरदराज तक कोई उम्मीद नहीं है। श्री मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने में बाधा नहीं बनने और उप्र से ही प्रधानमंत्री होने जैसी बातें ये साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि गैर कांग्रेसी विपक्ष भी इस चुनाव में कांग्रेस के पुनरोदय की उम्मीद छोड़ चुका है। स्मरणीय है लोकसभा की अंतिम बैठक में सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमन्त्री बनने की शुभकामनाएं देते हुए यहाँ तक कह दिया था कि विपक्ष में तो कोई दम नहीं है। उस भाषण को विदाई के अवसर पर प्रदर्शित की जाने वाली भावनात्मक सौजन्यता कहकर उपेक्षित करने का प्रयास भी किया गया किन्तु एक अनुभवी और शातिर राजनेता के तौर पर श्री यादव ने एक तरह से चुनाव परिणाम का पूर्वानुमान संसद में पेश कर दिया था। आज के मतदान के बाद 12 और 19 मई को दो चरणों का मतदान और होगा लेकिन कांग्रेस के बहुमत की सम्भावना लड़ाई खत्म होने के पहले ही समाप्त हो जाने का मनोवैज्ञानिक असर उन मतदाताओं पर भी पड़े बिना नहीं  रहेगा जो कांग्रेस में श्री मोदी का विकल्प ढूंढ रहे थे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 May 2019

येचुरी के बयान पर कांग्रेस खामोश क्यों

भोपाल से कांग्रेस का प्रत्याशी बनने के बाद दिग्विजय सिंह ने उलाहना दिया था कि वे भी हिन्दू हैं तब रास्वसंघ उनका समर्थन क्यों नहीं करता? यद्यपि संघ ने तो उनकी बात का उत्तर नहीं दिया लेकिन गत दिवस भोपाल में हुई एक परिचर्चा के बाद श्री सिंह की चुप्पी से उक्त सवाल का जवाब मिल गया जिसमें बोलते हुए सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने रामायण और महाभारत को हिंसक घटनाओं से भरा बताते हुए कहा कि वे साबित करती हैं कि हिन्दू भी हिंसक हो सकते हैं। उन्होंने हिन्दुओं के हिंसक नहीं होने के दावे का मखौल भी उड़ाया। श्री येचुरी आये तो परिचर्चा को संबोधित करने थे लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर ये भाजपा के विरोध के लिए आयोजित की गई थी। इसीलिये उन्होंने हिन्दुओं को हिंसक बताते हुए भाजपा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर भी निशाना साधा। सीपीएम महासचिव का नाम भले ही  उनके माता-पिता ने सीताराम रख दिया हो लेकिन साम्यवादी होने के कारण वे नास्तिक हैं और उनके वैचारिक पूर्वज माओ त्से तुंग के अनुसार धर्म अफीम की तरह है। श्री येचुरी ने हिन्दू धर्म और उसके शास्त्रों का कितना अध्ययन किया होगा ये उनकी उक्त टिप्पणी से ही उजागर हो गया। ऐसा लगता है  कि खूनी क्रांति के जरिये सता हथियाने की पक्षधर साम्यवादी विचारधारा में दीक्षित होने के कारण सीताराम जी को भी हर चीज में केवल और केवल हिंसा ही नजर आती होगी तभी तो उन्हें रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में वर्णित सैकड़ों प्रेरणा दायक और ज्ञानवर्धक प्रसंगों में से केवल युद्ध ही याद रहा। लेकिन एक कट्टर माक्र्सवादी यदि हिन्दुओं को हिंसक बताने का दुस्साहस करे तब कोई अचरज नहीं होता क्योंकि ऐसा करना उनकी नीति है लेकिन खुद को धर्मनिष्ठ हिन्दू कहने वाले शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी के दीक्षित शिष्य दिग्विजय सिंह के चुनाव क्षेत्र में ऐसा कहा गया और  उन्होंने अब तक उसका प्रतिवाद क्यों नहीं किया इस प्रश्न का जवाब उनसे अपेक्षित है। प्रश्न ये भी उठ खड़ा होता है कि भोपाल से उनका कोई प्रत्याशी नहीं होने के बाद भी वहां वामपंथी नेता और विचारकों की आवाजाही अचानक कैसे बढ़ गई ? श्री येचुरी के पहले गीतकार जावेद अख्तर भी आकर बुर्का और घूंघट संबंधी विवाद खड़ा कर चुके थे। वैसे वामपंथियों को पालने-पोसने की शैली श्री सिंह ने अपने राजनीतिक गुरु स्व. अर्जुन सिंह से सीखी है जिनके शासनकाल में मप्र वामपंथी बुद्धिजीवियों की आश्रयस्थली बन गया था। लेकिन बीते साल अपनी पत्नी के साथ नर्मदा परिक्रमा करते हुए उन्होंने अपनी आस्थावान हिन्दू की जो छवि स्थापित की उसे देखते हुए होना तो ये चाहिए था कि वे रामायण और महाभारत जैसे पवित्र और पूजनीय ग्रन्थों में वर्णित प्रसंगों के आधार पर हिन्दुओं को हिंसक साबित करने के दावे का प्रतिवाद करते किन्तु चूँकि श्री येचुरी ने उस बहाने भाजपा को कठघरे में खड़ा किया था इसलिए वे बातें उनके मन को प्रिय लगने वाले वचन बन गईं। श्री सिंह के विरुद्ध लड़ रही भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा की आलोचना किये जाने पर तो उनकी चुप्पी स्वाभाविक है लेकिन जहां बात हिन्दुओं की शांत प्रकृति को ही झुठलाने की हो रही हो तब उन जैसे मुखर नेता को कहना चाहिये कि श्री येचुरी गलतबयानी कर रहे हैं जो हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथों का अपमान तो है ही पौराणिक प्रसंगों के आधार पर स्थापित हिन्दुओं के विश्वास का उपहास भी है। इस प्रकार देखें तो सीताराम येचुरी के साथ ही दिग्विजय सिंह भी हिन्दुओं के बारे में की गई घोर आपत्तिजनक टिप्पणी के मौन समर्थक होने से दोष के भागीदार हैं। हिन्दू होने के नाते रास्वसंघ से समर्थन की अपेक्षा करने वाले श्री सिंह को ये समझ में आया गया होगा कि उनकी अपेक्षा पूरी क्यों नहीं होती। ये आश्चर्य की बात है कि अपने को हिन्दू साबित करने के लिए एक तरफ  जहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खुद को ब्राह्मण बताते हुए यज्ञोपवीत धारण करने की हद तक जाते हुए मन्दिरों के चक्कर काटते हैं वहीं पूजा-पाठी दिग्विजय सिंह के चुनाव क्षेत्र में हिन्दुओं को हिंसक ठहराने जैसी बात होती रही और वे मुंह में दही जमाये हुए हैं क्योंकि उससे उनको राजनीतिक लाभ होने की सम्भावना है। श्री येचुरी के संदर्भित बयान के विरुद्ध चुनाव आयोग में शिकायत की जा चुकी है लेकिन सीपीएम महासचिव की आपत्तिजनक बातों का केवल दिग्विजय सिंह ही क्यों किसी और कांग्रेस नेता द्वारा विरोध नहीं किया जाना ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि कांग्रेस अभी भी मुस्लिम तुष्टीकरण का लोभ त्याग नहीं पा रही। उल्लेखनीय है हाल ही में चुनाव प्रचार के दौरान गांधी की बहिन प्रियंका वाड्रा भी अनेक हिन्दू मंदिरों में पूजा-अर्चना करती देखी गईं। सौम्य हिंदुत्व का दिखावा बीते काफी समय से कांगे्रस की रणनीति का हिस्सा रहा है। ऐसे में श्री येचुरी भोपाल में हिन्दुओं को खुलेआम हिंसक बता गए और वह भी पौराणिक ग्रंथों का उदाहरण देते हुए लेकिन श्री गांधी से लेकर भोपाल में बैठे कांगे्रस के किसी भी नेता ने सीपीएम महासचिव की आलोचना नहीं की। ऐसे में यदि हिन्दू मतों को गोलबंद करने का प्रयास किया जावे वह क्रिया की प्रतिक्रिया मात्र होगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

क्या कभी शिक्षा भी बनेगी मुख्य चुनावी मुद्दा



सीबीएसई के 12 वीं के जो परिणाम गत दिवस आये उसमें एक बार फिर बालिकाओं ने बाजी मार ली। देश भर में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाली दोनों बेटियों हंसिका और करिश्मा ने 500 में से 499 अंक लेकर अपनी प्रतिभा का डंका पीट दिया। देश भर में उत्तीर्ण होने वालों में बालिकाओं का प्रतिशत 88 रहा वहीं बालकों का 79। बीते कई वर्षों से बेटियाँ इस परीक्षा में अव्वल आती रही हैं। प्रावीण्य सूची में भी उन्हीं का दबदबा है। वैसे ये चलन स्थायी रूप लेता जा रहा है जो एक शुभ संकेत है। बेटी पढ़ाओ का नारा जिस तरह से जोर पकड़ रहा है वह समाज की बदलती या यूँ कहें कि सुधरती हुई सोच का परिचायक है। आधी आबादी की देश के विकास में हिस्सेदारी के लिए ये जरूरी है कि बालिकाओं की शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जावे। सरकार की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन उससे भी ज्यादा परिवार की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव जरूरी है। भारतीय समाज मूलत: परिवार नामक जिस इकाई के भरोसे टिका हुआ है उसमें महिला की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। बतौर गृहिणी वह उसकी व्यवस्थापक होती है। बच्चों की परवरिश से लेकर गृह्स्थी के छोटे - बड़े कामों को कुशलतापूर्वक संपन्न करने की उसकी क्षमता बेमिसाल है। संयुक्त परिवारों में तो बगैर या कम शिक्षित महिला भी काम चला लेती थी लेकिन एकाकी परिवारों के उदय के बाद से जो स्थिति उत्पन्न हुई उसमें महिला का शिक्षित होना अनिवार्यता बन गई है। लगभग सभी क्षेत्रों  में महिलाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा की वजह से उनके भीतर जबर्दस्त आत्मविश्वास जाग्रत हुआ है। अब तो वे वायुसेना के लड़ाकू विमान तक उड़ाने लगी हैं। प्रशासन में तो उनकी उपस्थिति काफी पहले से हो चुकी  है लेकिन हाल के वर्षों में इसमें उल्लेखनीय  वृद्धि होना प्रसन्न करने वाला है। सीबीएसई  के परीक्षा परिणाम उस दृष्टि से बेहद उत्साहजनक हैं क्योंकि इसी पौध में से देश का भावी नेतृत्व तैयार होकर निकलने वाला है लेकिन ये आधी तस्वीर है। आज भी गावों की तो बात दूर रही शहरों तक में ऐसी बालिकाओं की बड़ी संख्या है जो शिक्षा  से वंचित रह जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी  माध्यमिक स्तर से ऊपर पढने वाली बालिकाओं की संख्या अपेक्षाकृत कम ही है जबकि शासन उनके लिए हरसंभव सुविधा जुटाने में लगा रहता है। अच्छे सरकारी विद्यालयों का अभाव दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। और फिर शिक्षकों की रूचि भी शिक्षण कार्य में नहीं होती। निम्न आय वर्ग में किशोरावस्था की बालिका को भी परिवार के भरण -  पोषण में मां - बाप का हाथ बंटाना पड़ता है। ऐसी ही अनेक और भी समस्याएं हैं जो बालिकाओं की समुचित शिक्षा में बाधा बन जाती हैं। बावजूद इसके अब शिक्षा के प्रति जिस तरह बालिकाओं में रूचि पैदा हो रही है उससे आशा तो बंधती ही है। सीबीएसई की 12 वीं के परीक्षा परिणाम ने बालिका शिक्षा को एक बार पुन: चर्चा में ला दिया। जिन बेटे - बेटियों ने इसमें सफलता हासिल की वे सब बधाई और प्रोत्साहन के हकदार हैं। उनमें से जो मेधावी हैं वे उच्च शिक्षा प्राप्त  करने के बाद विदेश में न बस जाएं इसके लिए वातावरण बनाना चाहिए। आजकल संपन्न वर्ग के बच्चों को शालेय शिक्षा के बाद ही पढऩे के लिए विदेश भेज देने का सिलसिला चल पड़ा है। ये बच्चे पढ़ लिखकर वहीं काम करने लगते हैं। बेहतर हो शिक्षा के साथ देशभक्ति के संस्कार भी विकसित किए जावें क्योंकि उनके बिना शिक्षा निरर्थक है। विशेष रूप से  बालिकाओं में तो सांस्कृतिक और सामाजिक संस्कारों का बीजारोपण बहुत जरूरी है। लोकसभा चुनाव के घोषणापत्रों में विभिन्न राजनीतिक दलों ने शिक्षा के बारे में कुछ न कुछ लिखा तो जरुर है लेकिन कड़वा सच ये है कि चुनाव के बाद कोई भी सरकार शिक्षा पर अपेक्षित ध्यान  नहीं देती। हालाँकि नारेबाजी और दिखावे के लिए सार्वजनिक धन की बर्बादी तो जमकर होती है लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते क्योंकि प्रयासों में ईमानदारी का सर्वथा अभाव होता है। पता  नहीं वह दिन कब आयेगा जब राष्ट्रीय चुनाव में शिक्षा प्रमुख मुद्दा बनेगी ? फिर भी उम्मीद की जानी चाहिए कि सीबीएसई के परीक्षा परिणामों से बालिकाओं की शिक्षा के प्रति रूचि तो बढ़ेगी ही साथ ही  पूरा समाज विशेष रूप से राजनीतिक बिरादरी इससे प्रेरित होकर सही दिशा में सही कदम उठायेगी। केवल मुख्यमंत्री की फोटोयुक्त बस्ते सायकिल , टैबलेट और  लैपटाप बाँटकर सौ फीसदी शिक्षा का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। जरूरत इस बात की है कि शिक्षक और विद्यालय चाहे सरकारी हों या निजी और शहर में हों या कस्बों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में उनका स्तर हर तरह से एक न्यूनतम मापदंड  तक एक समान होना चहिये। दूसरे शब्दों में कहें तो शिक्षा के क्षेत्र में समाजवादी चिंतन पूरी तरह से लागू होना चाहिए जिससे गरीब और संपन्न विद्यार्थी का भेद खत्म किया जा सके। जिन बालिकाओं और बालकों ने गत दिवस सफलता के आसमान को छुआ वे पूरे देश के दुलार और आशीर्वाद के सुपात्र हैं क्योंकि चुनाव के दौरान उत्पन्न कटुता  के बीच उन्होंने हम सभी को सुकून की अनुभूति कराई।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 2 May 2019

झुकाने वाला हो तो चीन भी झुक सकता है

पाकिस्तान के कुख्यात इस्लामी आतंकवादी संगठन जैश ए मोहम्मद का मुखिया और पुलवामा हमले के सूत्रधार माने जा रहे मसूद अजहर को लम्बी जद्दोजहद के बाद संरासंघ ने वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया। वैसे तो ये काम बरसों पहले हो जाता लेकिन पकिस्तान का संरक्षक बना बैठा चीन तत्संबंधी प्रस्ताव पर वीटो करता आ रहा था। लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसी महाशक्तियों के अलावा जर्मनी और जापान ने भी जब कड़ा रुख अख्तियार करते हुए चीन पर दबाव बनाया तब जाकर उसने अडिय़ल रवैया छोड़ते हुए अपना वीटो वापिस ले लिया। गत दिवस संरासंघ ने मसूद को विधिवत वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया। पिछली बार जब चीन ने वीटो किया था तब उसने इस बात का आश्वासन दिया था कि इस विवाद का समुचित हल निकाल लिया जावेगा और दो दिन पहले उसने इस आशय के संकेत भी दे दिए थे। ये महज संयोग ही हो सकता है कि भारत में चुनाव के चलते ये निर्णय हुआ और उसके पहले ही ईस्टर के दिन श्रीलंका में चर्चों पर मुस्लिम आतंकवादी हमले में 250 से भी ज्यादा लोग मार दिए गये। मसूद का बचाव करने के कारण भारत और चीन के रिश्तों में तल्खी बढती ही जा रही थी। जनता के बीच चीन के साथ व्यापार सम्बन्ध खत्म करने की मांग भी जोर पकडऩे लगी थी। विपक्षी दल प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ दोस्ताना बनाने की कोशिशों का मजाक उड़ाने से भी बाज नहीं आ रहे थे। राहुल गांधी ने श्री मोदी पर चीन से डरने का आरोप तक लगा डाला। लेकिन पुलवामा हमले के बाद भारत के पक्ष में जिस तरह से वैश्विक सहानुभूति और समर्थन उमड़ा उसके बाद चीन को भी ये लगने लगा कि यदि अब भी वह अड़ा रहा तब विश्व बिरादरी में अकेला पड़ जाएगा। दूसरी तरफ  पाकिस्तान की बिगड़ती आर्थिक हालत के चलते चीन को उसकी पीठ पर हाथ रखना घाटे का सौदा लगने लगा। मसूद अजहर पर लगाये वीटो को हटाने के फैसले के पीछे उसकी सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड से दुनिया के अनेक देशों द्वारा अचानक हाथ खींच लेना भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। उल्लेखनीय है भारत उन पहले देशों में से था जिसने वन बेल्ट वन बेल्ट रोड का विरोध किया था। ये सड़क पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से से होकर गुजरने वाली है जिससे भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो जाएगा। ऐसे अवसर पर जब भारत में नई सरकार के लिए चुनाव चल रहा है तब चीन द्वारा अचानक अपने रुख में बदलाव करना इस बात का भी संकेत है कि उसे श्री मोदी के सत्ता में लौटने का भरोसा हो चला है। वरना वह 23 मई को लोकसभा चुनाव के परिणाम आने तक इन्तजार कर सकता था। यही वजह है कि ज्योंही मसूद संबंधी संरासंघ का निर्णय घोषित हुआ त्योंही भारत में राजनीतिक स्तर पर उसकी चर्चा शुरू हो गई। इसे प्रधानमन्त्री की सफल कूटनीति का नतीजा बताया जाने लगा। हालाँकि ये याद दिलाने वाले भी पीछे नहीं रहे कि डा मनमोहन सिंह की सरकार के समय भी हाफिज सईद को लेकर ऐसा ही फैसला संरासंघ द्वारा किया गया था और इसका कोई विशेष असर नहीं होगा। लेकिन ये बात भी सही हैं कि मोदी सरकार ने जिस तरह से विश्व स्तर पर भारत को एक मजबूत आर्थिक और सामरिक शक्ति के तौर पर पेश किया उसकी वजह से चीन भी दबाव में आ गया। बालाकोट में की गई एयर स्ट्राइक के बाद पूरी दुनिया ने उसे भारत द्वारा आत्मरक्षार्थ उठाया कदम बताते हुए उसका समर्थन किया। यहाँ तक कि चीन भी खुलकर पाकिस्तान का साथ देने की हिम्मत नहीं दिखा सका। मसूद अजहर पर प्रतिबन्ध लगने से यद्यपि न तो जैश ए मोहम्मद खत्म होगा और न ही पकिस्तान की नीति और नीयत में कोई अंतर आयेगा लेकिन इससे भारत का महत्व और शक्ति दुनिया के सामने साबित हो गई। सबसे बड़ी बात ये हुई कि चीन पहली मर्तबा भारत के सामने झुकता नजर आया। हालाँकि इसे उसकी सदाशयता मान लेना भूल होगी। सही बात ये है कि वर्तमान परिस्थितियों में वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते महत्व से चीन काफी सतर्क हो उठा है। उसे ये लगने लगा है कि यदि उसने अपना रवैया नहीं सुधारा तब वह भारत के बड़े उपभोक्ता बाजार को खो सकता है। कुल मिलाकर भारत के लिए ये बड़ी कामयाबी है जिसका श्रेय यदि मोदी सरकार और भाजपा लेते हैं तब वह गलत नहीं होगा। गत सप्ताह चीन की यात्रा पर गए पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान का खान का जिस तरह से फीका स्वागत करने के साथ ही चीन के राष्ट्रपति ने उन्हें भारत से रिश्ते सुधारने की नसीहत दी वह भी इस बात का संकेत था कि चीन उसका आंख मूंदकर समर्थन करने की अपनी नीति में संशोधन करते हुए भारत के तुष्टीकरण के लिए भी प्रयासरत हो चुका है। मसूद अजहर पर लगे वैश्विक प्रतिबंध से पाकिस्तान पर विश्व बिरादरी का दबाव बढ़ेगा। ये भी कहा जा रहा है कि चीन द्वारा लगातार विश्व जनमत की उपेक्षा के चलते अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन मिलकर पाकिस्तान पर कड़े प्रतिबन्ध लगाने की तैयारी कर रहे थे जिनके परिणामस्वरूप उसकी नाकेबंदी हो जाती और तब चीन का अरबों-खरबों का निवेश डूबने के कगार पर आ जाता। पाकिस्तान के प्रति भारत का कड़ा रुख भी चीन के लिए एक संकेत था जिसकी बानगी डोकलाम विवाद के समय उसे मिल ही चुकी थी। इस तरह मसूद अजहर पर प्रतिबन्ध लगने से भारत को एक तीर से दो निशाने साधने जैसा लाभ हुआ। सबसे बड़ी बात ये हुई कि मोदी सरकार ये साबित करने में सफल हो गई कि चीन को भी झुकाया जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 1 May 2019

सर्वोच्च न्यायालय से माफी : राहुल का बचकाना रवैया

सर्वोच्च न्यायालय  द्वारा राफैल सौदे पर कही गई बात को गलत ढंग से उद्धृत करने पर भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर अवमानना का जो प्रकरण दर्ज करवाया उसको लेकर श्री गांधी जिस तरह का आचरण कर रहे हैं वह गैर जिम्मेदाराना भी है और बचकाना भी। सर्वोच्च न्यायालय उनसे लगातार गलत बयानी का आधार पूछ रहा है। लेकिन गलती का एहसास हो जाने के बाद भी श्री गांधी माफी मांगने की बजाये खेद व्यक्त करते रहे । उनके इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई तक ने  उनके अधिवक्ता को लताड़ लगाई । प्रारंभिक सफाई में श्री गांधी ने ये कहते हुए बात हवा में उड़ाने की कोशिश की कि चुनाव की तनातनी के बीच जोश में उनके मुंह से निकल गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी चौकीदार को चोर माना है। लेकिन जब श्रीमती लेखी ने उनको न्यायालय की अवमानना के मामले में घेरा तब उन्होंने खेद जताकर सस्ते में बच निकलने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी । इधर अपनी सभाओं में वे चौकीदार चोर है का नारा लगवाते रहे  । जब न्यायालय ने खेद  को अपर्याप्त बताया तब उन्होंने दोबारा हलफनामा देकर फिर खेद जता दिया । उनका ये रवैया इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि इतना लंबा समय राष्ट्रीय राजनीति में  व्यतीत करने के बाद भी वे सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना महसूस करने के बाद भी माफी मांगने के  प्रति ढीठ बने हुए हैं । गत दिवस पत्रकारों ने जब इस सम्बन्ध में उनसे पूछना चाहा तब वे वहां उपस्थित समर्थकों से भी चौकीदार चोर है के नारे लगवाने के बाद मुस्कराते हुए आगे बढ़ गए । कल उनके अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को सर्वोच्च न्यायालय में जमकर डांट पड़ी तब जाकर उन्होंने 6 मई को संशोधित हलफनामा पेश करने का आश्वासन दिया जिसमें विधिवत माफी मांगी जाएगी । राफैल सौदे को राहुल ने अपने चुनाव अभियान में प्रमुख हथियार बना रखा था । हालांकि वे अभी तक इसे जनता के दिमाग में उतार नहीं  सके लेकिन उन्हें ऐसा लगता है कि इशारों में ही सही प्रधानमंत्री को चोर कहलवा के वे अपने को धारदार नेता साबित कर लेंगे । हालांकि कुछ दिनों से वे न्याय योजना को भी उछालकर मतदाता को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। हर गरीब परिवार को सालाना 72 हजार देने का वादा किया जा रहा है। यह काँग्रेस और श्री गांधी का इस लोकसभा चुनाव में ट्रम्प कार्ड है। तकरीबन 20-25 करोड़ वोटर इस योजना का लाभ ले सकेंगे। उनका झुकाव कांग्रेस की ओर हो गया होगा तो चुनाव परिणाम चौंकाने वाले आ सकते हैं। चार चरण में कहीं भारी, कहीं कम मतदान हुआ है। तीन दौर वोटिंग का अभी बाकी है। शायद इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष सीधे-सीधे माफी मांगने से कतरा रहे हैं। उन्हें पता होगा कि अगर जैसा सुप्रीम कोर्ट कह रहा है वैसा कर लिया गया तो फिर मामला उलट जायेगा। वे संदेह के घेरे में आ जायेंगे। राफेल पर उनका आरोप भी हल्का हो सकता है। यही कारण है कि श्री गांधी माफी शब्द के इस्तेमाल से बचने की कोशिश कर रहे थे जो असफल साबित हुई। वैसे श्री गांधी यह जताने का प्रयास भी कर रहे हैं कि चौकीदार वे बोलते हैं तो जनता खुद ब खुद चोर है बोल देती है। हो सकता है कि 6 मई को राहुल गांधी माफी मांग लें। बहरहाल जो भी हो कांग्रेस या राहुल गांधी इस चुनाव में राफेल के साथ-साथ नोटबंदी, जीएसटी, कथित बेरोजगारी, महंगाई तथा अन्य आम जनता से जुड़े मुद्दे उठाते तो उन्हें ज्यादा फायदा होता। और भी मुद्दे ऐसे रहे जिन पर मोदी सरकार को घेरा जा सकता रहा। गांव-देहात तो छोडिय़े शहर के लोग भी राफेल के बारे में ज्यादा नहीं जानते। फिर अभी तक कोई ऐसा सबूत सामने नहीं आया है जो प्रधानमंत्री को दोषी ठहराता हो। शुरूआत से ही श्री गांधी अगर अपनी अति महत्वकांक्षी योजना न्याय पर फोकस करते तो इसका बहुत कुछ फायदा कांग्रेस को मिलता। 15 लाख के मुकाबले 72 हजार को पेश किया जाता तो गरीब तबका ज्यादा प्रभावित होता। हिन्दुस्तान का मतदाता माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम का आदी हो गया है। उसे सबकुछ फ्री में चाहिए। राफेल के मोह में फंसकर राहुल गांधी अपनी भिनिष्टा करा बैठे।

-रवीन्द्र वाजपेयी