Friday, 10 May 2019

जीते हारे कोई भी पूरा चुनाव मोदीमय हो गया

लोकसभा चुनाव के छटवें चरण के मतदान का प्रचार आज शाम बंद हो जाएगा। अभी तक की जो स्थिति है उसमें एक बात साफ़  उभरकर आई है कि पूरा परिदृश्य मोदी समर्थन और मोदी विरोध पर केन्द्रित हो गया है। कहने को कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर का विपक्षी दल होने के नाते भाजपा का विकल्प कहलाना चाहिए था किन्तु कुछ राज्यों को छोड़कर शेष देश में क्षेत्रीय दल मोदी लहर को निष्प्रभावी करने के लिए संघर्षरत हैं। यही वजह रही कि 2018 के अंत में अपने अधिपत्य वाले तीन राज्यों की सरकार कांग्रेस के हाथ गंवाने वाली भाजपा शीघ्र ही न सिर्फ  लड़ाई में लौट आई बल्कि छत्तीसगढ़ छोड़कर बाकी दो में वह कांग्रेस से काफी आगे बताई जा रही है। केवल पंजाब वह  राज्य है जहां कांग्रेस की बढ़त नजर आ रही है। इस कारण चुनाव परिणामों को लेकर व्याप्त अनिश्चितता के बावजूद दो ही संभावनाएं नजर आ रही हैं। पहली नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दोबारा भाजपा नीत एनडीए की सरकार और दूसरी कांग्रेस के सहयोग से मिली जुली सरकार जिसका नेता कौन होगा ये फिलहाल कोई नहीं बता सकता। लेकिन दूसरी  सम्भावना तब ही जन्म ले सकेगी जब भाजपा बहुमत से इतनी पीछे रह जावे कि बाहरी समर्थन के बाद भी सरकार बनाना संभव नहीं हो । कुछ लोग ये हवा उड़ा रहे हैं कि उस स्थिति में भाजपा श्री मोदी की जगह किसी और चेहरे को आगे लाकर समर्थन बटोर लेगी किन्तु इसकी संभावना बहुत ही क्षीण है क्योंकि मोदी-शाह की जोड़ी इतनी आसानी से किसी और के झंडे तले खड़ी नहीं होगी और विपक्ष में बैठकर खिचड़ी सरकार के पतन की राह देखना पसंद करेगी। यद्यपि सट्टा बाजार सहित चुनाव की भविष्यवाणी करने वाले अन्य लोग भी ये मान रहे हैं कि कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ तब भाजपा को कम से कम 230-240 सीटें तो मिल ही जायेंगीं और उस स्थिति में एनडीए के पास श्री मोदी ही विकल्प बचेंगे। लेकिन भाजपा यदि 200 से नीचे आ गई तब जरुर बाजी उसके हाथ से खिसक सकती है। इन तमाम अटकलों के बीच कोई भी ये कहने को तैयार नहीं है कि कांग्रेस 125 या उससे ऊपर सीटें ले जायेगी। और उस सूरत में वह अपना प्रधानमंत्री बना सकेगी इसकी संभावना न के बराबर है। यही वजह है कि मतदान के चार चरण पूरे होने के बाद ही उप्र से ये आवाज उठने लगी कि अखिलेश यादव मायावती का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे बढ़ाकर खुद को उप्र के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तावित करेंगे। लेकिन इस मुहिम पर किसी भी तरह की  प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आना इस बात का संकेत है कि अखिलेश की इकतरफा सोच को शेष विपक्ष की स्वीकृति फिलहाल नहीं है। रही बात कांग्रेस की तो सपा-बसपा गठबंधन के साथ कुछ दिनों से जिस तरह से तनातनी चल रही है उसे देखते हुए कांग्रेस सीधे-सीधे उप्र दूसरों के लिए छोड़ देगी ये सोचना आसान नहीं है। जिस तेजी से प्रियंका वाड्रा चुनावी मैदान में सक्रिय हुईं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने अभी से 2024 के चुनाव हेतु तैयारी शुरू कर दी है जिसका संकेत स्वयं प्रियंका पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच दे चुकी हैं। इस प्रकार विपक्ष के पास खिचड़ी सरकार का नेतृत्व करने लायक जो चेहरे बच रहते हैं वे ममता बैनर्जी और शरद पवार ही हैं। लेकिन ये भी तभी संभव है जब ममता बंगाल में 2014 की तरह तृणमूल को सफलता दिलवा पाएं। वहां भाजपा ने जिस आक्रामक शैली में मोर्चा संभाल रखा है उसके कारण तृणमूल की सीटें घटने के आसार बताए जा रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तब ममता की वजनदारी कम हो जायेगी। रह बात शरद पवार की तो वे विपक्ष की निर्विवाद पसंद हो सकते हैं किन्तु उसके लिए उन्हें महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को मात देनी पड़ेगी जो आसान नहीं है। दरअसल अखिलेश और मायावती को लग रहा है कि उप्र की 50-55 सीटें यदि गठबंधन के हाथ लग गईं तब पूरी विपक्षी राजनीति उनकी मु_ी में होगी। इन सबसे हटकर अनेक ऐसे भी लोग हैं जो उक्त समूची संभावनाओं को बुद्धिविलास मानते हुए दावा कर रहे हैं कि विपक्ष की तरफ  से कोई सर्वसम्मत प्रधानमंत्री प्रत्याशी पेश नहीं किये जाने से पूरे देश में ये अवधारणा प्रबल हो गई कि त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में यदि गैर भाजपाई सरकार बन भी गई तब वह चलेगी नहीं और देश राजनीतिक अस्थिरता के भंवर में फंसकर रह जायेगा। देवेगौड़ा और गुजराल सरकार को कांग्रेस द्वारा अकारण गिराए जाने की स्मृतियाँ लोगों के दिमाग में ताजा है और यही वह वजह है जिसके कारण श्री  मोदी के प्रति मतदाताओं के मन में आकर्षण नजर आता है। अमेठी जैसी कांग्रेस की पारम्परिक सीट पर भी युवा पीढ़ी के मतदाता जिस तरह खुलकर बदलाव की बात करते दिखे वह साधारण बात नहीं है क्योंकि यहाँ गांधी परिवार देवताओं की तरह पूजा जाता रहा है। भाजपा विरोधी माने जाने वाले अनेक राजनीतिक विश्लेषक भी ये मान रहे हैं कि किसी सक्षम विकल्प के अभाव में श्री मोदी को वह तबका भी मत देता दिख रहा है जो चुनाव पूर्व तक उनसे असंतुष्ट नजर आता था। ये भी कहने वाले कम नहीं है कि पिछली बार मतदाता कांग्रेस को हटाने के लिए तत्पर था वहीं 2019 में श्री मोदी को वापिस लाने वाला जनादेश आएगा जिसे सकारात्मक भी कहा जा सकता है। यद्यपि पक्के तौर पर अंतिम परिणाम की भविष्यवाणी करना बहुत कठिन है लेकिन ये तो कहना ही पड़ेगा कि समूचे चुनाव का एकमात्र मुद्दा मोदी बनकर रह गए हैं। भाजपा इसमें अपने लिए भारी सफलता देख रही है लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें भारतीय राजनीति के पूरी तरह से व्यक्ति केन्द्रित हो जाने में खतरों का पूर्वाभास भी होने लगा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 May 2019

चीन आतंकवाद की जड़ें खोद सकता है तो हम क्यों नहीं

चीन के शिनजियांग (पुराना नाम सिकियांग) में उइगर मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है। दिखने में ये भी मंगोलियन नस्ल का एहसास ही करवाते हैं। मध्य एशिया से होते हुए इस्लाम इस सीमावर्ती इलाके में आया होगा लेकिन उसके आगे नहीं बढ़ सका। 1949 की साम्यवादी क्रांति के बाद चीन में धर्म एक तरह से प्रतिबंधित हो गया था। माओ ने तो धर्म को अफीम कहकर उसका प्रतिकार किया। यद्यपि बौद्ध और हूण संस्कृति के अवशेष वहाँ दबे रहे जो उदारीकरण के प्रादुर्भाव के बाद धीरे-धीरे ही सही लेकिन अंकुरित होने लगे। लेकिन चीन में इस्लाम की मौजूदगी दुनिया की निगाहों में नहीं आ सकी। ये भी अचरज की बात है कि तिब्बत पर जबरन कब्ज़ा करने के बाद वहां की बौद्ध संस्कृति को पूरी तरह नष्ट करने जैसी नीति अपनाने के बाद भी चीन ने शिनजियांग के उइगर मुस्लिमों को क्यों  नजरंदाज कर दिया? चीनी मामलों के कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार उसके पीछे चीन सरकार की इस्लाम के प्रति हमदर्दी कम और पकिस्तान से अपनी स्वार्थसिद्धि ज्यादा थी। चीन को डर था कि यदि उसने उइगर मुस्लिमों के धर्म पालन पर बंदिशें लगाईं तब उसका विपरीत असर पाकिस्तान पर पड़ सकता है। स्मरणीय है पाकिस्तान ने अपने कब्जे वाले कश्मीर का अक्साई चिन इलाका चीन को बतौर तोहफा दे दिया। उसकी महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड परियोजना भी इसी से गुजरने वाली है जिसका भारत विरोध कर रहा है। जहां तक बात शिनजियांग प्रान्त के उइगर मुस्लिमों की है तो कुछ वर्ष पूर्व वहां कुछ आतंकवादी घटनाएँ हुईं जिनके तार पश्चिम एशिया के इस्लामी आतंकवाद से जुड़े पाए गए। उस मुहिम को तो चीन सरकार ने सख्ती से कुचल ही दिया लेकिन उसके बाद से उसने मुसलमानों के धार्मिक आधिकारों और आजादी पर बंदिशें लगाने के साथ ही उनकी जड़ें काटने का वैसा ही सुनियोजित प्रयास शुरू कर दिया जैसा वह तिब्बत में करता आया है और अभी भी कर रहा है। मुस्लिमों के त्यौहारों पर रोक लगाना, नमाज हेतु ध्वनि विस्तारकों के उपयोग पर प्रतिबन्ध, नमाज पढऩे, दाढ़ी-टोपी पर निषेध के साथ ही रमजान में रोजे रखने पर भी बंदिश लगा दी गई। यही नहीं तो मुस्लिम समुदाय पर दमनात्मक कार्रवाई भी की जाने लगी। दर्जनों मस्जिदें ढहा दी गयीं। आज खबर आ गई कि चीन सरकार ने रमजान के महीने में होने वाली सभी इस्लामिक धार्मिक रस्मों पर कड़ाई से रोक लगा दी है। इसी के साथ ये जानकारी भी आ रही है कि उक्त प्रान्त में चीन की सरकारी एजेंसयां मुस्लिम युवकों के दिमाग से इस्लाम का प्रभाव नष्ट करने का ठीक वैसा ही योजनाबद्ध प्रयास कर रही हैं जैसा तिब्बत में किया गया। उन्हें साम्यवादी विचारधारा में ढालने का अभियान भी जारी है। इस समूची कवायद का मूल उद्देश्य इस्लम की आड़ में आतंकवाद की किसी भी सम्भावना को चीन की धरती पर उत्पन्न होने से पहले ही कुचल देना है। जब तक सोवियत संघ रहा तब तक चीन को ज्यादा चिंता नहीं थी लेकिन उसके विघटन के बाद मध्य एशिया के जो देश स्वतंत्र हुए उनमें से अधिकांश में इस्लाम पूरी ताकत के साथ लौट आया। यही नहीं वहां आतंकवादी घटनाएं भी यदाकदा होने लगीं। चीन इस खतरे का दूरगामी प्रभाव भांप गया और उसने बिना देर लगाये अपनी चिरपरिचित नीति लागू करते हुए उक्त प्रान्त में इस्लाम की जड़ों पर प्रहार शुरू कर दिया। कहने को तो ये उसका आंतरिक मसला है किन्तु पकिस्तान जैसा पड़ोसी और चीन का घनिष्टतम मित्र तक मुंह में दही जमाये बैठा हुआ है। बाकी इस्लामिक देश भी चूं-चपाट करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहे। मानव अधिकारों के लिए लडऩे वाले वैश्विक संगठनों में से भी किसी ने इसका संज्ञान नहीं लिया और लिया भी हो तब चीन सरकार से कुछ पूछने की तकलीफ नहीं उठाई। और तो और भारत में धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले माक्र्सवादियों ने भी अपने वैचारिक अभिभावक चीन से शिनजियांग प्रान्त के उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार रोकने की विनती नहीं की। कुल मिलाकर इस मामले से ये साबित हो जाता है कि किसी भी देश के लिए उसके राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं। अब लौटकर अपने देश पर निगाह डालें तो कश्मीर घाटी में अलगाववाद को समर्थन देने वाले नेता रमजान के अवसर पर सरकार से युद्धविराम करने की मांग करते हैं। वैसे भी अब तक की किसी भी केंद्र सरकार ने कश्मीर में इस्लाम से जुड़ी किसी भी गतिविधि या रस्म की अदायगी पर बंदिश नहीं लगाई। चीन ने सैकड़ों उइगर मुस्लिम युवकों को पकड़कर जेल में डाल रखा है जिनमें से कई का कोई अता-पता नही है। भारत चूंकि लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है जिसमें स्वतंत्र न्यायपालिका के अलावा अभिव्यक्ति की आजादी भी है लेकिन राष्ट्र के दूरगामी  हितों के संरक्षण के प्रति उदासीनता के कारण हमारे देश में आतंकवादी और दुसरी देश विरोधी ताकतों के विरुद्ध जिस तरह का सख्त रवैया अपनाने की जरूरत है वैसा होने पर जिस तरह आसमान सिर पर उठाया जाता है वह हमारी कमजोरी का प्रमाण बन जाता है। चीन हमारे लिए आदर्श नहीं है। न ही  हम वहां की एकाधिकारवादी शासन व्यवस्था को स्वीकार कर सकते हैं लेकिन शत्रु की भी अच्छी बात आत्मसात करना राष्ट्रहित में होता है और उस दृष्टि से चीन इस्लाम के नाम पर फैल रहे आतंकवाद की जड़ें खोदने में जैसी मुस्तैदी दिखा रहा है वह भारत के लिए भी विचारणीय है। मानव अधिकारों के प्रति सम्वेदनशीलता और धार्मिक स्वतंत्रता किसी भी सभ्य समाज के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है लेकिन जब राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता खतरे में हों तब कठोर निर्णय लेना जरूरी है। कश्मीर में आतंकवाद के पनपने के पीछे पकिस्तान की कुटिल चालें  तो हैं ही हमारी अपनी कमजोर नीतियाँ भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जिनके चलते भारत की आन्तरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है। रोहिंग्या शरणार्थियों के प्रति देश के एक जिम्मेदार तबके का सहानुभूतिपूर्ण रवैया इस बात का प्रमाण है कि इतिहास की गलतियों से अब तक हमने कुछ नहीं सीखा। चीन तो चलिये एक बड़ा और ताकतवर राष्ट्र है किन्तु ईस्टर के दिन श्रीलंका के चर्चों में हुए बम धमाकों के बाद वहां की सरकार ने आतंकवाद के विरुद्ध जिस तरह की सख्ती दिखाई कम से कम उसी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 May 2019

कम्प्यूटर से कम्प्यूटर बाबा तक

मप्र में जब शिवराज सरकार ने कुछ बाबाओं को राज्यमंत्री पद का दर्जा देकर सरकारी सुविधाओं से नवाजा था तब कांग्रेस ने उसका खूब मखौल उड़ाया। लेकिन कुछ समय बाद उनमें से कम्प्यूटर बाबा नामक एक टूटकर कांग्रेस में आ गये और विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान और भाजपा की खूब मुखालफत की। कमलनाथ सरकार के शपथ ग्रहण में कम्प्यूटर बाबा को विशिष्ट अतिथियों के साथ मंचासीन भी करवाया गया। भोपाल में जब दिग्विजय सिंह के विरोध में भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा तब कांग्रेस ने उस पर तरह-तरह के तंज कसे लेकिन जब ये लगा कि साध्वी हिन्दू मतदाताओं के धु्रवीकरण में सफल हो सकती हैं तब दिग्विजय सिंह को भी ध्याना आया कि खुद को हिन्दू साबित किया जाए और इसीलिये गत दिवस भोपाल में एक खुले मैदान में कम्प्यूटर बाबा ने हठयोग का आयोजन किया जिसमें श्री सिंह ने सपत्नीक सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया जिसके चित्र टीवी के पर्दों पर पूरे देश ने देखे। दिग्विजय सिंह ऐलानिया तौर पर खुद को हिन्दू कहते हैं। पूजा-पाठ भी उनकी दिनचर्या और राजनीतिक गतिविधियों का चिरपरिचित हिस्सा है। उस लिहाज से भोपाल में गत दिवस हुआ कर्मकांड एक साधारण धार्मिक आयोजन कहा जा सकता है किन्तु लोकसभा चुनाव के दौरान ऐसा क्यों और किसलिए  किया गया इसका उद्देश्य सामान्य राजनीतिक समझ वाला भी बता देगा। सही बात ये है कि अपनी उम्मीदवारी की घोषणा काफी पहले से हो जाने की वजह से दिग्विजय सिंह ने भोपाल लोकसभा सीट के काफी हिस्सों में प्रारम्भिक जनसंपर्क कर लिया था। दूसरी तरफ  भाजपा में प्रत्याशी चयन को लेकर भारी असमंजस और अनिश्चितता बनी रहने के कारण राजनीतिक जगत में ये अवधारणा भी व्याप्त होने लगी कि भाजपा  दिग्विजय सिंह को अघोषित वाकओवर देने जा रही है। लेकिन लम्बे विचार-विमर्श के बाद जब उसकी तरफ  से प्रज्ञा ने आकर मैदान सम्भाला तब अचानक भोपाल का चुनाव राष्ट्रीय महत्व का बन गया और दिग्विजय सिंह फिर उसी चक्रव्यूह में फंस गए जिसमें बीते 30 साल से कांग्रेस घिरी हुई है। प्रज्ञा ठाकुर मालेगांव विस्फोट में आरोपी हैं। बरसों जेल में भी रही। जाँच के दौरान अपने ऊपर हुए अत्याचारों का बखान करते हुए उन्होंने खूब सहानुभूति बटोरी। विशेष रूप से महिलाओं के मन में उनके प्रति जबर्दस्त आकर्षण पैदा होने की खबरें आने लगीं। भोपाल की सीट 1989 के चुनाव से धु्रवीकरण के वशीभूत भाजपा के कब्जे में चली आ रही है। दिग्विजय सिंह को उतारकर कांग्रेस ने इस कब्जे को समाप्त करने का जोरदार दांव चला जो शुरुवात में तो कामयाब लगा लेकिन जब से साध्व़ी प्रज्ञा ने मोर्चा संभाला तब से वे रक्षात्मक नजर आने लगे। पहले पहल तो उन्होंने विकास को मुद्दा बनाकर भोपाल के लिए अपना अलग से घोषणापत्र जारी किया लेकिन जल्दी ही उन्हें लग गया कि बाजी उनके हाथ से खिसकने की कगार पर है तब उन्होंने कम्प्यूटर बाबा की शरण ली। दो दिन पहले बाबा ने ऐलान किया कि वे हजारों साधुओं को भोपाल बुलवाकर दिग्विजय के समर्थन में भी भगवा लहर चलवाने की कोशिश करेंगे और उसके बाद ही उन्होंने हठयोग नामक आयोजन में दिग्विजय सिंह की शिरकत करवाकर हिन्दू मतदाताओं को लुभाने का दांव चला। एक समय था जब कांग्रेस राजनीति में धर्म के उपयोग को लेकर भाजपा को घेरा करती थी किन्तु बीते एक डेढ़ वर्ष में वह समझ गई कि हिंदुत्व राजनीति के केंद्र में आ गया है और केवल अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण से चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती। गुजरात और कर्नाटक के बाद मप्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मप्र के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने मंदिर-मठ आदि के दौरे जमकर किये। इसका उन्हें कितना लाभ हुआ ये तो स्पष्ट नहीं हो सका लेकिन दिखावे के लिए ही सही  सौम्य हिंदुत्व को कांग्रेस ने अपनी रणनीति का हिस्सा बना लिया। उसके तमाम नेता अपने को हिन्दू साबित करने में जुट गए। दिग्विजय सिंह पार्टी के उन नेताओं में से हैं जो भाजपा और रास्वसंघ के कटुतम आलोचक कहे  जा सकते हैं। आतंकवादियों को लेकर अतीत में दिए कुछ बयानों से उनकी हिन्दू विरोधी छवि बन गयी थी। भोपाल से उन्हें लोकसभा चुनाव लड़वाने के पीछे कांग्रेस की सोच वहां की बड़ी मुस्लिम आबादी के परम्परागत समर्थन के साथ हिन्दू मतों को जोड़कर भाजपा को शिकस्त देना रही। विधानसभा चुनाव में भोपाल संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को अच्छी खासी सफलता से उसे ये लगने लगा कि हिन्दू मतों में भी वह सेंध लगा सकती है। लेकिन साध्वी प्रज्ञा की वजह से पांसे उलटे पड़ते लगे तब जाकर दिग्विजय सिंह को कम्प्यूटर बाबा की शरण में जाना पड़ा। चुनाव जीतने के लिए अनेक प्रत्याशी धार्मिक और तांत्रिक विधियों और ज्योतिषियों का सहारा लेते हैं लेकिन सार्वजानिक रूप से हठयोग के जरिये मतदाताओं को आकर्षित करने का तरीका नवीनतम है। हठयोग क्या है और इसका उद्देश्य क्या है ये जानना हमारा उद्देश्य कदापि नहीं है लेकिन भोपाल के आयोजन से एक बात साबित हो गयी कि स्व. राजीव गांधी के कार्यकाल में कम्प्यूटर से जुडऩे  वाली कांग्रेस उनके बेटे राहुल गांधी का दौर आते-आते तक कम्प्यूटर बाबा की शरण में आ गई। इस बदलाव को क्या कहा जाये ये विश्लेषण का विषय है। राजनीति जो न करवाए कम है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 May 2019

काश , जनता को भी इसी तेजी से न्याय मिले

देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन शोषण के आरोप से मुक्ति मिल गई। न्यायालय की इन हाउस कमेटी ने उन्हें बेदाग करार दिया। दरअसल जिस महिला के आरोपों पर उक्त समिति ने जांच शुरू की उसने जांच में सहयोग नहीं दिया जिसकी वजह से समिति के सदस्य न्यायाधीशों ने एकपक्षीय फैसला सुनाते हुए श्री गोगोई को पाक साफ होने का प्रमाणपत्र दे दिया। न्याय क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक आरोपों को साबित करने का दायित्व शिकायतकर्ता महिला पर था। चूंकि वह जांच समिति के समक्ष हाजिर होने से पीछे हट गई इसलिए आरोपों की गम्भीरता कम हो गई या यूं कहें कि उसमें विश्वसनीयता का पुट लुप्त हो गया। इसीलिए जांच समिति ने श्री गोगोई को बेदाग मानते हुए राहत प्रदान कर दी। देश के मुख्य न्यायाधीश पर इस तरह का गम्भीर आरोप पहली बार लगने से पूरा विधि जगत हिल गया था। यद्यपि आरोप लगाने वाली महिला के बारे में विस्तृत जानकारी मिलने के बाद उसकी बातों को गम्भीरता से नहीं लिया गया लेकिन न्याय की सर्वोच्च आसंदी पर विराजमान महानुभाव पर चारित्रिक दोषारोपण अपने आप में अभूतपूर्व था इसलिए दूध का दूध और पानी का पानी होना नितांत आवश्यक था क्योंकि मुख्य न्यायाधीश महज एक व्यक्ति नहीं अपितु एक संस्था होता है जिसकी प्रामाणिकता में देश का असंदिग्ध विश्वास जरूरी है। इसीलिये ज्योंही आरोप उछला त्योंही नैतिकता का प्रश्न भी सामने आ गया। अनेक लोगों का मानना था कि निर्दोष साबित होने तक श्री गोगोई को न्यायिक कार्य से अलग रहना चाहिए किन्तु उन्होंने शुरुवात में ही ऐसा करने से मना कर दिया और जाँच समिति बना दी जिसने फास्ट ट्रेक कोर्ट से भी तेजी से काम करते हुए गत दिवस उनके दामन पर लगाये गये दागों को धोकर साफ कर दिया। हालांकि इस दौरान एक अधिवक्ता ने मुख्य न्यायाधीश पर लगाये गये आरोप को किसी योजनाबद्ध षडय़ंत्र से जोड़ते हुए उसके पीछे किसी कार्पोरेट घराने का हाथ होने जैसा आरोप लगाकर सनसनी मचा दी जिस पर सर्वोच्च न्यायालय में जोरदार बहस भी चली लेकिन वह प्रकरण अभी तक अनिर्णीत ही है। जाँच समित्ति ने जितनी तत्परता से मुख्य न्यायाधीश को बेकसूर साबित कर दिया उतनी ही तेजी उक्त मामले में भी अपेक्षित है क्योंकि सर्वोच्च न्यायलय के एक वरिष्ठ अधिवक्ता को इस षडय़ंत्र का सूत्रधार बताया जा रहा था। उसके द्वारा पेश किये गये प्रमाण गोपनीयता के नाम पर उजागर नहीं किये गये। उसी तरह गत दिवस श्री गोगोई को निष्कलंक बताने वाली रिपोर्ट को भी गोपनीय रखा जा रहा है। ये अत्यंत आश्चर्यजनक है क्योंकि राफेल लड़ाकू विमान सहित अनेक प्रकरणों में सर्वोच्च न्यायालय ने ही गोपनीय दस्तावेजों के सार्वजनिक किये जाने पर दर्ज सरकारी आपत्तियों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था। उस दृष्टि से यदि न्यायपालिका की किसी विशेष मर्यादा का उल्लंघन न होता हो तब श्री गोगोई को निर्दोष ठहराए जानी वाली रिपोर्ट को भी सार्वजनिक किया जाना विश्वसनीयता बढ़ाने में सहायक रहेगा। उसी तरह देश को उस आरोप की सत्यता के बारे में भी पता चलना चाहिए जिसके अनुसार मुख्य न्यायाधीश के चरित्र पर लगाए गये आरोप के पीछे कार्पोरेट घराने और फिक्सिंग जैसी बातें थीं। गनीमत ये रही कि सर्वोच्च न्यायालय पर लगी इस तोहमत को राजनीति का विषय नहीं बनाया गया वरना चुनाव के मौसम में जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं उनके मद्देनजर ये डर पैदा होने लगा था कि कहीं मुख्य न्यायाधीश के चरित्र पर लगे आरोपों पर भी सियासत न शुरू हो जाए। लेकिन इन सबसे हटकर ये सवाल हर खासो-आम के मन में तैर रहा है कि जितनी तेजी श्री गोगोई को निर्दोष साबित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने दिखाई क्या उतनी ही जन साधारण से जुड़े मामलों में भी दिखाई जायेगी? राम जन्मभूमि संबंधी विवाद को अपनी प्राथमिकता से बाहर रखने वाले श्री गोगोई ने अपने दामन को बेदाग़ साबित करने में जिस तत्परता से न्यायिक कार्रवाई को संचालित करवाया वह निश्चित ही प्रशंसनीय है लेकिन न्याय के समक्ष समानता का जो सिद्धांत है उसका लाभ हर नागरिक को बिना उसकी हैसियत देखे मिलना चाहिए। देश के प्रधान न्यायाधीश होने के नाते श्री गोगोई एक विशिष्ट दर्जे से जुड़े हैं जिसका सम्मान नितांत जरूरी है लेकिन न्याय में विलम्ब को लेकर मचने वाले हल्ले के बीच जिस त्वरित गति से उन्हें न्याय और राहत मिली वह मापदंड के रूप में स्थापित जब तक नहीं होती तब तक न्यायपालिका के प्रति लोगों के मन में अपेक्षित सम्मान और भरोसा कायम नहीं किया जा सकेगा। विधि क्षेत्र में ये उक्ति बहुत प्रचलित है कि न्याय में विलम्ब न्याय से इनकार करना है। उसी तरह किसी प्रकरण के निराकरण में आश्चर्यचकित कर देने वाली तेजी भी संदेह उत्पन्न करने वाली होती है। बहरहाल श्री गोगोई के बेदाग साबित हो जाने से पूरी न्याय व्यवस्था राहत महसूस कर रही होगी।

- रवीन्द्र वाजपेयी