Wednesday, 15 May 2019

ममता भी वामपंथी हिंसा की राह पर

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की संघर्षशीलता और सादगी से उनके विरोधी भी प्रभावित रहे हैं। वामपंथियों के लगभग चार दशक पुराने दुर्ग पर झंडा फहराने का कारनामा निश्चित रूप से उन्हें एक जनाधार वाली नेत्री के रूप में साबित करता है। सत्ता में आने के बाद भी साधारण रहन-सहन की वजह से वे जनता से जुडाव बनाये रखती हैं। कांग्रेस में रहते हुए जब उन्हें ये महसूस हुआ कि वह साम्यवादियों के प्रति नर्म रवैये पर चलती है तब उन्होंने तृणमूल कांग्रेस नामक अपनी पार्टी बना ली और वामपंथी शासन को उखाड फेंकने के लिए भाजपा से गठजोड़ भी किया। वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री जैसा महत्वपूर्ण विभाग भी उन्हें मिला लेकिन अपने जिद्दी स्वाभाव और मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाले रवैये की वजह से वे अटल जी जैसे समन्वयवादी व्यक्ति के साथ भी अपेक्षित तालमेल नहीं बना सकीं और आये दिन सरकार से समर्थन वापिस लेने की धमकी देती रहीं। बाद में वे पूरी तरह स्वतंत्र होकर सियासत करने लगीं और बंगाल की सत्ता हाथ में आने के बाद तो उन्होंने न सिर्फ  कांग्रेस वरन माक्र्सवादियों के कैडर को भी तोड़कर अपनी पार्टी का हिस्सा बना लिया। उन्हें लगा होगा कि लोकप्रियता के दम पर सत्ता तो हासिल की जा सकती है किन्तु उसमें बने रहने के लिए शायद वही शैली जरूरी है जो वामपंथी चार दशक  तक अपनाते हुए बंगाल पर एकछत्र राज करते रहे। इसी के साथ सत्ता मिलने के बाद ममता की ईमानदारी पर भी सवाल उठने लगे और चिट फंड सहित अनेक घोटालों में उनकी पार्टी के तमाम नेताओं के संलग्न होने की जानकारी बाहर आ गई। कांग्रेस चूँकि बंगाल में अपनी मारक क्षमता पूरी तरह खो चुकी थी और वामपंथी भी धीरे-धीरे अप्रासंगिक होते चले गये तब रास्वसंघ द्वारा तैयार की गयी जमीन पर भाजपा ने अपनी फसल बोनी शुरू कर दी जो बीते दस वर्ष में काफी तेजी से फैलती गई। हालाँकि ये एक विचारणीय पहलू है कि वह जिस जनसंघ का पुनर्जन्म मानी जाती है उसके संस्थापक स्व. डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के गृहप्रदेश में भाजपा को अपनी उपस्थिति महसूस करवाने में कई दशक लग गये। लेकिन ये कहना कतई गलत नहीं होगा कि कांग्रेस और वामपंथियों को चौंकाते हुए भाजपा ने जिस चपलता से ममता का विकल्प बनने की स्थिति उत्पन्न की उससे वे बौखला सी गईं क्योंकि पहले कांग्रेस और फिर साम्यवादियों का विकल्प बन जाने के बाद उन्हें ये स्वीकार नहीं हो रहा था कि उनके वर्चस्व को इतनी जल्दी कोई चुनौती देने  लगे। विशेष रूप से नरेंद्र मोदी और अमित शाह के राष्ट्रीय राजनीति में उदय के बाद भाजपा ने जिस योजनाबद्ध तरीके से बंगाल के साथ ही पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में अपने पाँव जमाये उसका असर बंगाल में भी दिखाई देने लगा। 2014 में दो लोकसभा सीटों के बाद विधानसभा चुनाव में जोरदार प्रदर्शन के साथ ही भाजपा ने ग्राम पंचायतों के चुनाव में दूसरा स्थान प्राप्त कर राज्य में प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर स्वयं को स्थापित करते हुए मतदाताओं के एक बड़े वर्ग में ये विश्वास प्रबल कर दिया कि तृणमूल का सामने आकर मुकाबला करने की ताकत और हिम्मत उसी में है। और इसी वजह से ममता ने अपने नाम को गलत साबित करते हुए भाजपा के विरुद्ध शत्रुवत व्यवहार शुरू कर दिया। चिटफंड घोटाले को भाजपा ने जिस तरह अपना प्रमुख मुद्दा बनाते हुए तृणमूल के अनेक प्रमुख नेताओं के जेल जाने की नौबत पैदा कर दी उससे ममता भी भयभीत हो उठीं और जिस वामपंथी दमन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वे जननेत्री बनीं उसे ही उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने का जरिया बना लिया। वामपंथियों के दौर के तमाम असामाजिक तत्व धीरे-धीरे ममता की छत्रछाया में आकर सुरक्षित हो गये। बीते पांच वर्ष में भाजपा ने बंगाल को अपना प्रमुख लक्ष्य बना लिया और अमित शाह ने लगातार दौरे करते हुए वहां ग्रामीण इलाकों तक में पार्टी की प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा दी। इस राज्य की लगभग 27 फीसदी मुस्लिम आबादी एक ज़माने में वामपंथी शासन  के साथ थी  लेकिन अब वही ममता की रीढ़ बन गयी है। भाजपा ने असम की तरह यहाँ भी मुस्लिम घुसपैठियों के विरुद्ध मुहिम छेड़ी जिसका अनुकूल असर हुआ और हिन्दुओं को ये लगने लगा कि भाजपा ही उनकी हितचिन्तक है और बंगाल में जनसँख्या के असंतुलन को रोकने के प्रति प्रयासरत भी है। बीते कुछ वर्षों में राज्य के भीतर हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद ममता के अल्पसंख्यक प्रेम ने भाजपा को और मजबूती प्रदान कर दी जिसके बलबूते वह लोकसभा चुनाव में 20 से भी ज्यादा सीटें जीतने के दावे पूरे आत्मविश्वास से करने लगी। पहले-पहल तो ये मुंगेरीलाल का सपना लगा लेकिन जिस तरह वहां नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अलावा उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सभाओं में जनता उमड़ी उसने ये संकेत तो दे ही दिया कि भाजपा ही तृणमूल का विकल्प बनने की स्थिति में आ चुकी है। और इसी वजह से ममता ने हर वह काम किया जिससे भाजपा के समर्थकों का मनोबल तोड़ा जा सके। श्री मोदी को प्रधानमंत्री नहीं मानने जैसा बयान उनकी खीज और भय दोनों को साबित कर गया। बात उन्हें थप्पड़ मारने तक जा पहुँची। लेकिन गत दिवस कोलकाता में अमित शाह के रोड शो में जिस तरह से प्रायोजित हिंसा करवाई गई उसके बाद ये स्पष्ट हो गया कि भले ही भाजपा अपने दावे के अनुरूप सीटें नहीं जीत सके लेकिन उसने ममता के एकाधिकार के लिए खतरा तो उत्पन्न कर ही दिया जो भविष्य में असर दिखाए बिना नहीं रहेगा।  ममता को बंगाल की जनता ने वामपन्थी निरंकुशता के विरुद्ध संघर्ष करने के पुरस्कार स्वरूप सत्ता सौंपी थी लेकिन अब वे भी उसी बुराई में पूरी तरह डूब चुकी हैं। प्रधानमन्त्री बनने के उनके सपने में भाजपा चूंकि सबसे बड़ी बाधा है इसलिए कांग्रेस और वामपंथियों को छोड़कर बीते कुछ समय से वे भाजपा के विरूद्ध पूरी ताकत दिखा रही हैं। उन्हें ये भी अखर रहा है कि वामपथियों के समर्थक मतदाता बड़ी संख्या में भाजपा की तरफ  झुकते जा रहे हैं। 23 मई को यदि भाजपा ने बंगाल की दस लोकसभा सीटे भी जीत लीं तब राष्ट्रीय राजनीति में उनकी ऊँची उड़ान का सपना धरा रह जाएगा। कल और उसके पहले बंगाल में ममता बैनर्जी ने सरकारी संरक्षण में राजनीतिक गुंडागर्दी का जो नजारा पेश किया उसने वामपंथी शासन के भयावह दौर को भी पीछे छोड़ दिया है। भले ही इससे उनको तात्कालिक सियासी लाभ हो जाये लेकिन उनके प्रभुत्व का पतन भी ज्यादा दूर नहीं लगता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 May 2019

लंबा चुनाव अभियान मुद्दों से भटकाव का कारण

लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा के बाद इसी स्तम्भ में लिखा गया था कि बहुत लंबा चुनाव अभियान थकाऊ और उबाऊ हो जाता है। आखिरी चरण आते-आते तक मूल मुद्दे तो लुप्त हो जाते हैं और व्यर्थ की रस्साखींच प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। आरोप-प्रत्यारोप भी नीतिगत न होकर व्यक्तिगत स्तर पर आ जाते हैं। खिलाड़ी भावना की जगह शत्रुता का भाव दिखाई देने लगता है। विभिन्न दलों ने अपने जो घोषणापत्र मतदान के पहले जारी किये थे उनमें किये गये वायदे उनके नेताओं को ही याद नहीं रहे।  59 सीटों के मतदान वाला अंतिम चरण आगामी 19 मई को सम्पन्न हो जाएगा और उसके फौरन बाद विपक्ष और सत्तापक्ष 23 तारीख की दोपहर तक आने वाले नतीजों का पूर्वानुमान लगाकर गोटियाँ बिठाने में व्यस्त हो जायेंगे। ये कोई नई बात नहीं है। भारत जैसे विशाल और विविधता भरे देश में चुनाव कराना हंसी खेल नहीं है। उस दृष्टि से चुनाव आयोग ने जो और जितना किया वह प्रशंसा के योग्य है। चुनावी हिंसा को रोकना एक बड़ी समस्या थी। बिहार और उप्र तो इस मामले में कुख्यात थे लेकिन बंगाल को अपवाद मान लें तो अभी तक के छह चरणों में बाकी राज्यों में हिंसा की घटनाएँ पूर्वापेक्षा कम हुईं जो निश्चित तौर पर बड़ी सफलता है। लेकिन ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इतना लंबा अभियान चुनावों की सहजता को समाप्त कर देता है। उदाहरण के तौर पर उप्र को ही लें तो वहां हर चरण में मतदान हुआ। इसकी वजह से प्रचार करने वाले नेताओं को नये-नये मुद्दे तलाशने में कितनी मशक्कत करनी पड़ी ये विचारणीय प्रश्न है। संचार क्रांति के इस युग में दुनिया के एक कोने की खबर दूसरे तक पहुँचने में कुछ सेकेण्ड लगते हैं तब एक नेता किसी प्रदेश की एक सीट पर क्या बोल आया उसकी जानकारी दूसरी सीट के मतदाताओं तक तत्काल पहुंचने से जब वह उनके बीच में आता है तब तक उसका भाषण पुराना हो चुका होता है। यही वजह है कि राष्ट्रीय मुद्दों से शुरू हुआ चुनाव आधा होते तक तात्कालिक और स्थानीय मुद्दों पर केन्द्रित हो गया। कभी-कभी तो लगता है कि हमारे देश के नेताओं को चुनाव लडऩे का विधिवत प्रशिक्षण दिलवाना चाहिए। स्टार प्रचारकों के नाम पर जिस तरह के बड़बोले और फूहड़ लोगों को मंच दिया जा रहा है वह हंसी से ज्यादा चिंता का विषय है। चुनावी भाषणों में जैसी स्तरहीन टिप्पणियाँ और कटाक्ष सुनने को मिले वे अच्छा संकेत नहीं है। आपत्तिजनक बयानों पर सम्बंधित नेता को दो-तीन दिनों तक प्रचार से प्रतिबंधित कर देना किसी उद्दंड विद्यार्थी को बतौर सजा कुछ देर तक कक्षा के बाहर खड़ा कर देने जैसा ही है। होना तो ये चाहिए कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के दोषी चुनाव प्रचारक को शेष चुनाव के दौरान प्रचार से रोक दिया जाए। ऐसा होने पर दूसरे नेता अनर्गल प्रलाप करने से डरेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होने से सभी पक्षों के कुछ नेताओं की जुबान बेलगाम हो गई है। इसका कारण भी ये है कि लंबा चुनाव अभियान होने के कारण उनके पास मतदाताओं से कहने को कुछ नया नहीं बचता। चुनाव किसी भी राजनीतिक दल के लिए अपनी नीतियों और सिद्धांतों का प्रचार करने का अवसर होता है लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे देश में येन केन प्रकारेण जीत हासिल करने का जो जूनून समूची राजनीतिक बिरादरी पर सवार हो गया है उसके कारण पार्टियों को अपने प्रतिबद्ध और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की जगह अभिनेताओं और खिलाडिय़ों को प्रत्याशी बनाना पड़ रहा है। वरना उर्मिला मातोंडकर और सनी देओल जैसे चेहरों को पार्टी की सदस्यता लेते ही उम्मीदवारी देना किसी फिल्म के लिए साइन करने जैसा ही है। इसी तरह से टिकिट कटते ही पुरानी पार्टी छोड़कर आने वाले नेताओं को अपनी पार्टी से उम्मीदवार बना देना भी राजनीतिक दलों के सैद्धांतिक दिवालियेपन का परिचायक नहीं तो और क्या है? कुल मिलाकर राजनीति भी आईपीएल के आयोजन जैसी हो गई है जिसमें जीत हासिल करना ही एकमात्र लक्ष्य है और जिसके लिए किसी भी खिलाड़ी को ज्यादा बोली लगाकर खरीदा जा सकता है। यही नहीं तो टीम के मालिकों में खिलाड़ी की जगह उद्योगपति और फिल्मी अभिनेता आगे आ जाते हैं जिनकी खेल की बेहतरी में कोई रूचि नहीं बल्कि केवल और केवल पैसा बटोरने में रहती है। अब चुनाव लडऩे के लिए प्रत्याशी की योग्यता का पैमाना उसका अनुभव और सैद्धांतिक प्रतिबद्धता न होकर उसकी जाति, आर्थिक स्थिति और जीतने की क्षमता हो गया है। इसकी वजह भी यही है कि लम्बे चुनाव अभियान के चलते राजनीतिक दलों और उसके नेताओं की जमीनी पकड़ और विश्वसनीयता में जबरदस्त कमी आई है। बेहतर हो इस चुनाव के बाद चुनाव आयोग इस बारे में विचार करते हुए चुनाव कार्यकम को संक्षिप्त करने की कार्ययोजना बनाये। इसके अलावा एक देश एक चुनाव के मुद्दे पर भी राष्ट्रीय विमर्श शुरू किया जाना चाहिए क्योंकि हर समय चुनाव की वजह से देश का वातावारण लगातार विषाक्त होता जा रहा है। विकास परियोजनाओं में विलम्ब के साथ ही संवेदनशील मुद्दों पर अनिर्णय की स्थिति का एक कारण भी चुनाव ही  हैं वरना राम जन्मभूमि जैसा विवाद कभी का सुलझ गया होता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 May 2019

कम मतदान और ज्यादा सुविधाएं !

छटवें चरण का मतदान भी संपन्न हो गया। जो आंकड़े आये उसके अनुसार सबसे कम मतदान उस उप्र में हुआ जहां राजनीति की चर्चा सबसे ज्यादा होती है और जिसके बारे में कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ होकर जाता है। 80 सीटों  वाले इस राज्य में 55 फीसदी से कम मतदान हुआ जो 2014 की तुलना में मामूली सा ज्यादा रहा । पिछले चरण में अमेठी, रायबरेली और लखनऊ जैसी चर्चित सीटों पर औसतन 53 फीसदी लोगों ने मताधिकार का उपयोग किया। लखनऊ में तो अब तक का ये सबसे अधिक मतदान रहा। इसी तरह गत दिवस मप्र की राजधानी भोपाल में लगभग 66 फीसदी मतदान होने पर कहा गया  कि ये 1957 से अब तक का सबसे अधिक मतदान है। वहीं देश की राजधानी दिल्ली में पिछले चुनाव से 5 फीसदी कम मतदान हुआ। टीवी चैनल पर चल रही एक चर्चा में एक वरिष्ठ पत्रकार ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि रविवार को मतदान होने से मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग घर-गृहस्थी के कार्यों में उलझ गया। यदि मतदान और  किसी दिन होता तब उससे एक अतिरिक्त अवकाश मिलता। इसी तरह एक विश्लेषक ने भीषण गर्मी के मौसम में मतदान की आलोचना की और सुझाव दिया कि मतदान का समय शाम 6 बजे तक करने की बजाय रात 8 बजे तक होना चाहिए था ताकि मतदाता गर्मी से बच सकें। और भी सुझाव आये मतदान बढ़ाने के। लेकिन रोचक बात ये है कि मप्र की जिस भोपाल सीट का चुनाव सर्वाधिक चर्चित रहा और जहां शिक्षित मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा है, से ज्यादा मतदान राजगढ़ में 74,  विदिशा में 71 और गुना में 70 फीसदी हुआ।  देश की राजधानी दिल्ली और मप्र की राजधानी भोपाल की अपेक्षा निकटवर्ती छोटे शहरों में जिनके साथ ग्रामीण आबादी जुडी हुई है, मतदान के प्रति अधिक उत्साह इस बात का प्रमाण है कि राजधानी के काफी हाऊसों  में बैठा बुद्धिजीवी पांच साल तक तो राजनीति पर मगजमारी करता है लेकिन निर्णय के क्षणों में सुस्त पड़ जाता है। वरना क्या कारण है कि दिल्ली, लखनऊ और भोपाल जैसे शहरों में छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में मतदान का प्रतिशत नीचे रहता है। उप्र और बिहार राजनीतिक  दृष्टि  से देश में सबसे जागरूक राज्य माने जाते  है जहां हिन्दू-मुस्लिम के साथ ही जातीय समीकरण पूरे चुनाव पर हावी रहते हैं लेकिन इस चुनाव में वहां अब तक हुए मतदान में जैसी  राजनीतिक चेतना दिखनी चाहिए थी वैसी नजर नहीं आई। लखनऊ जैसे विकसित महानगर में यदि 53 फीसदी मतदान अब तक का सबसे ज्यादा है तो ये समूची राजनीतिक बिरादरी के लिए विचारणीय विषय होना चाहिए। इसी तरह भोपाल और दिल्ली राजधानी होने के नाते विकास का अतिरिक्त बजट तो हजम कर जाते हैं लेकिन प्रदेश और देश के भविष्य के फैसले की प्रक्रिया में उनकी हिस्सेदारी छोटे और पिछड़े कहे जाने वाले कस्बों से कम रहती है। चुनाव आयोग ने मतदान बढ़ाने के लिए जो जागरूकता अभियान चलाया और मतदान केन्द्रों पर बढिया इंतजाम किया उसने समाज के एक बड़े तबके की उदासीनता तो दूर की लेकिन जिस सुशिक्षित वर्ग से शत-प्रतिशत मतदान की अपेक्षा की जाती है और जो शहरों में सुविधाजनक जिंदगी गुजारता है वही सरकार का चयन करते समय आरामपसंद हो जाता है। कभी-कभी तो ये लागता है कि मतदान का जो प्रतिशत बढ़ता भी है उसमें पहली और दूसरी बार मत देने वाले युवाओं का खासा योगदान है। वरना तो 50 फीसदी का आंकड़ा भी बड़ा हो जायेगा। इस दृष्टि से बंगाल की तारीफ़  करनी होगी जहां हर चरण में 80 फीसदी या उससे भी ज्यादा मतदाताओं ने अपने अधिकार का उपयोग किया जबकि वहां का राजनीतिक वातावरण काफी तनावपूर्ण है। टेलीविजन के आने के बाद राजनीतिक चर्चाएं और बहस के साथ ही ज्वलंत मुद्दों पर जनता का ध्यान पूर्वापेक्षा ज्यदा आकर्षित होने लगा है। महिलाएं भी अब खुलकर सियासी और राष्ट्रीय महत्व के अन्य मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करने लगी हैं। ग्रामीण इलाके भी अब शहरों में होने वाली गतिविधियों से बेखबर नहीं रहते। सबसे बड़ी बात ये हुई कि, लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वालों की बढ़ती संख्या इसका प्रमाण है। इतना सब होने के बाद भी यदि देश और प्रदेश की राजधानी में मतदान का प्रतिशत 55 से 65 फीसदी रहे तब इसे दिया तले अँधेरा कहना गलत नहीं होगा। कुछ बरस पहले तक मतदाता सूचियों से नाम कट जाने की शिकायतें आम थीं लेकिन चुनाव आयोग ने इसमें काफी सुधार किया है। और तो और मतदाता पर्चियां तक घर-घर पहुँचाने की समुचित व्यवस्था भी कर दी गयी। बावजूद उसके दिल्ली, बेंगुलुरु, मुम्बई, लखनऊ और भोपाल जैसे शहरों में मतदान का साधारण प्रतिशत सोचने के लिए बाध्य करता है। सता में बैठे लोगों को भी इस बारे में ये सोच विकसित करनी चाहिए कि जिन वीआईपी  सीटों और राजधानियों सहित महानगरों में 75 फीसदी से कम मतदान हो उनके विकास को वरीयता न दी जाए। अधिक मतदान करने वाले पिछड़े क्षेत्रों की विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता देने की नीति इस मामले में कारगर हो सकती है। जितना मतदान उतना विकास का नारा भी चुनाव का हिस्सा बनना चाहिए।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 May 2019

पित्रोदा : संचार के विशेषज्ञ हैं सियासत के नहीं

पहले स्व. राजीव गांधी और अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के निकट सलाहकार कहे जाने वाले सैम पित्रोदा द्वारा दो दिन पहले 1984 में इंदिरा जी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिख नरसंहार को लेकर की गई टिप्पणी जो हुआ सो हुआ को लेकर मचे विवाद ने पूरी पार्टी को पिछले पैरों पर खड़े होने मजबूर कर दिया। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी तो ऐसे अवसरों को भुनाने में कभी पीछे नहीं रहते। उन्होंने फौरन इसे चुनावी मुद्दा बना लिया। दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के अलावा जहां 12 और 19 मई को मतदान होने वाला है वहां सिख मतदाता कांग्रेस के खिलाफ  न चले जाएं इस डर से राहुल ने फौरन श्री पित्रोदा के बयान को उनकी निजी  राय बताते हुए पार्टी को उससे अलग किया और उन्हें माफी मांगने भी कह दिया। पंजाब के मुख्यमंत्री कै. अमरिंदर सिंह भी उस बयान के विरुद्ध मुखर हो उठे। राहुल ने तो 1984 के सिख दंगों को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए खेद जताया वहीं पार्टी ने पूरी तरह श्री पित्रोदा के बयान से पल्ला झाड़ते हुए उन्हें अकेला छोड़ दिया। चारों तरफ  से फजीहत होने के बाद हालाँकि श्री पित्रोदा ने माफी मांगते हुए अपनी कमजोर हिन्दी का हवाला देकर बचने की कोशिश की लेकिन उनके बयान से कांग्रेस को जो नुकसान होना था वह तो हो ही गया। यदि ऐसा नहीं होता तब राहुल श्री पित्रोदा को लताड़ते हुए माफी मांगने को नहीं कहते जो कि न सिर्फ  उनके सलाहकार और विदेशी दौरों के आयोजक बल्कि राजनीतिक गुरु भी कहलाते हैं। ऐसे में उनकी कही गई राजनीतिक बात को श्री गांधी से जोड़कर देखा जाना स्वाभाविक है। यही वजह रही कि प्रधानमन्त्री ने बिना देर किये श्री पित्रोदा की टिप्पणी को कांग्रेस के सिख विरोधी रवैये से जोड़ते हुए चुनावी लाभ लेने का दांव चल दिया। प्रतिक्रियास्वरूप देश के कई शहरों में सिख संगठन कांग्रेस के विरोध में सड़कों पर भी उतर आये। चुनाव का आखिऱी चरण आते-आते तक कांग्रेस के लिए ये मुसीबत  घातक हो सकती है। सरकार बनाने का दावा तो वह छोड़ ही चुकी है। कल मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने फिर दोहरा दिया कि कांग्रेस की सीटें 2014 की तुलना में तीन गुनी बढ़ेंगी। यदि इसे मान भी लें तब उसका आंकड़ा तकरीबन 130 के इर्दगिर्द सिमटकर रह जाएगा। ऐसे में श्री पित्रोदा का बयान दूबरे में दो आसाढ़ वाली स्थिति का कारण बन सकता है। लेकिन इससे भी अलग हटकर देखें तो कांग्रेस के कतिपय प्रवक्ता बड़बोलापन दिखाते हुए समय-समय पर इस तरह की टिप्पणियाँ कर देते हैं जिनसे पार्टी को शर्मसार होने के साथ नुक्सान भी उठाना पड़ता है। श्री पित्रोदा के तकनीकी ज्ञान और वैश्विक दृष्टिकोण को चुनौती देना तो गलत होगा  लेकिन इस तरह के व्यक्ति राजनीति में नादाँ की दोस्ती जी का जंजाल वाली कहावत को चरितार्थ करने का माध्यम बन जाते हैं। मौजूदा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मणिशंकर अय्यर को तो मुंह बंद रखने की नसीहत देकर एक तरह से अज्ञातवास पर भेज दिया लेकिन सैम पित्रोदा जैसे लोग उनकी कमी पूरी करने में आगे-आगे हो रहे हैं। वैसे ये समस्या दूसरी पार्टियों में भी है लेकिन कांग्रेस को ये बीमारी ज्यादा नुक्सान देती है। जल्दबाजी में कुछ भी बोलने की धुन में राहुल गांधी ने चौकीदार चोर के नारे को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जोडऩे की गलती कर दी जिसके लिए उन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने जमकर डांट पिलाते हुए बिना शर्त  माफी मांगने के लिए मजबूर कर दिया। भाजपा के आलोचक प्रधानमन्त्री पर भाषा का स्तर गिराने का जो आरोप लगाते हैं वह अपनी जगह सही भी है लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह की शब्दावली विपक्ष द्वारा प्रयुक्त की गई वह भी शोभनीय नहीं कही जा सकती। बेहतर हो राहुल गांधी इस बात को समझें कि आक्रामकता भी अनुशासित न हो तो आत्मघाती बन जाती है। क्रिकेट में छह रनों के लिये गेंद को सीमा रेखा पार करवाने के फेर में उसे उछालकर मारने वाला बल्लेबाज सही फुटवर्क के अभाव में कैच आउट हो जाता है। सियासत में भी जो नेता अपनी जुबान पर लगाम नहीं लगाते वे पार्टी के लिए समस्याएं खड़ी करते हैं। सैम पित्रोदा अपने क्षेत्र के महारथी होंगे। स्व. राजीव गांधी के कार्यकाल में वे प्रकाश में आये और देश में संचार क्रांति के सूत्रधार भी बने लेकिन राजीव जी की मृत्यु उपरान्त कांग्रेस में उन्हें वैसा महत्व नहीं मिला। राहुल के उदय के बाद वे फिर से सक्रिय नजर आने लगे और उनके विदेशी दौरों के आयोजन के बाद देश में रहकर भी कांग्रेस के नीति निर्धारकों में शामिल हो गए।  उनकी सलाह और रणनीति ने कांग्रेस को कितना लाभान्वित किया ये तो वे ही बेहतर जनते होंगे लेकिन दो दिन पहले दिया उनका बयान कांग्रेस के लिए नई मुसीबतें खड़ा कर गया। जिस तरह धनुष से निकला तीर वापिस नहीं लौटता ठीक वैसे ही जुबान से निकले शब्द भी वापिस नहीं लिए जा सकते। राजनीतिक दलों को चाहिए कि अपने प्रवक्ताओं का चयन सोच-समझकर किया करें। पार्टी की नीतियों और विचारधारा को समझने वालों की बजाय राजनीति को पेशा बनाने आये पेशेवरों को ऐसे मामलों में दूर रखना ही अच्छा होता है। दुर्भाग्य से लगभग सभी दल तथाकथित ग्लैमर युक्त नवागन्तुकों से प्रभावित होकर उन्हें पार्टी का पक्ष रखने का काम दे देते हैं जो अंतत: बन्दर के हाथ में उस्तरा वाली परिस्थिति बना दते हैं। सैम पित्रोदा उसका ताजा उदाहरण बन गये हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी