Monday, 20 May 2019

आयेगा तो मोदी ही... हकीकत बनने की ओर

इसमें कोई  शक नहीं है कि मतदान के बाद किये गये सर्वे के निष्कर्ष कई बार आंशिक ही नहीं वरन पूरी तरह से गलत निकले हैं लेकिन ऐसा तो हर क्षेत्र में होता है और उस दृष्टि से गत दिवस लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण का मतदान हो जाने के बाद विभिन्न टीवी चैनलों द्वारा जारी किये गए एग्जिट पोल में एकाध को छोड़कर सभी ने यदि फिर एक बार मोदी सरकार के दावे पर मोहर लगाई है तो उसे सिरे से नकारना भी उचित नहीं होगा। हालाँकि भाजपा को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिलने को लेकर संशय बना हुआ है लेकिन एनडीए की सरकार बनना सुनिश्चित है। कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष ही नहीं बल्कि मोदी विरोधी असहिष्णुता गेंग  भी 23 को अंतिम नतीजों के पहले तक हार नहीं मानने पर आमादा है। लेकिन पिछले रिकार्ड और सर्वे के तरीके पर चाहे जितने प्रश्नचिन्ह लगाए जाएं लेकिन इतना तो तय है कि एग्जिट पोल और वास्तविक परिणामों के बीच यदि अंतर आ जाए तब भी दो बातें तो तय हैं कि चाहे बहुमत के साथ बने या समर्थन बटोरकर लेकिन सरकार बनेगी तो भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की ही और उसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही होंगे। विपक्ष के साथ समाचार माध्यमों में भी एक समूह ऐसे लोगों का है जो त्रिशंकु की स्थिति में मोदी विहीन एनडीए सरकार की कल्पना करता रहा है लेकिन जैसे हालात बनते दिख रहे हैं उनके अनुसार एनडीए की सरकार जैसे भी बने लेकिन उसके मुखिया श्री मोदी ही होंगे। इसकी वजह आंध्र के जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना के चन्द्रशेखर राव हैं जो अपने  राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण किसी भी सूरत में कांग्रेस के साथ नहीं जा सकते। हालांकि भाजपा का इनसे किसी प्रकार का गठबंधन नहीं था लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वे जरूरत पडऩे पर एनडीए के साथ जुडऩा ही पसंद करेंगे। लोकसभा  में तेलुगु देशम द्वारा मोदी सरकार के विरुद्ध पेश किये गये अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान भी इन दोनों ने अनुपस्थित रहकर भाजपा की मदद ही की थी। चूँकि चन्द्रबाबू नायडू श्री रेड्डी और श्री राव दोनों के सियासी दुश्मन नम्बर एक हैं इसलिए उनका झुकाव चाहे-अनचाहे एनडीए की तरफ  ही रहेगा। इस प्रकार अन्य विरोधी दलों के समर्थन से कांग्रेस की या कांग्रेस के समर्थन से तथाकाथित तीसरे  मोर्चे की सरकार बनने संबंधी आशावाद हकीकत में बदलता नहीं लगता। रही बात भाजपा की तो उसके सबसे बड़ी पार्टी होने को लेकर किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है लेकिन वह 2014 की तरह ही 272 के जादुई आंकड़े को पार कर सकेगी इस पर जरुर किन्तु-परन्तु लग रहे  हैं। हालांकि जिन  दो-तीन सर्वेक्षणों में एनडीए को 350 से उपर बताया गया है यदि वे सही निकले  तब जरुर भाजपा अकेले 300 के आंकड़े को हासिल कर  इतिहास रच सकेगी और ऐसा हुआ तब ये मानना ही होगा कि मोदी नाम की सुनामी थी जिसे विपक्ष तो क्या अच्छे-अच्छे राजनीति के जानकार तक नहीं समझ सके। बहरहाल किसी भी एग्जिट पोल ने कांग्रेस के बहुमत तो दूर की बात रही उसके नजदीक फटकने की आशंका तक नहीं जताई। यहाँ तक कि बिहार और महाराष्ट्र में गठबंधन के बावजूद भी वह मतदाताओं की पसंद नहीं बन सकी। पहले  ये उम्मीद की जा रही थी कि हालिया अच्छे प्रदर्शन के बाद वह गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को घुटनाटेक करवा देगी लेकिन जो संकेत आये उनके अनुसार तो वह खुद मुंह के बल गिरती नजर आ रही है। कर्नाटक से भी उसे अच्छी खबर नहीं मिल रही। केवल तमिलनाडु वह राज्य है जहां कांग्रेस का गठबंधन सफलता की ओर है लेकिन उसका श्रेय और सीटों का बड़ा हिस्सा द्रमुक के खाते में जाएगा। केरल में  भी वामपंथी बंटवारा करते दिख  रहे है। केवल पंजाब में कांग्रेस अपने दम पर बढ़त लेती दिखती है। लेकिन उसमें भी योगदान मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह का ज्यादा है। इस प्रकार कांग्रेस 44 सीटों से कितनी उपर जायेगी ये प्रश्न भी अब महत्वहीन हो गया है क्योंकि उसके नेतृत्व वाले यूपीए को ही कोई 150 तक नहीं मान रहा। इस चुनाव में चंद्रबाबू नायडू और अरविन्द केजरीवाल जैसे क्षेत्रीय छत्रपों का नूर भी उतरता दिखाई दे रहा है। उप्र में सपा-बसपा महागठबंधन के प्रदर्शन को लेकर बड़ी आशाएं लगाने वाले भी कल निराश हो गये जब ये पता लगा कि उसे भाजपा का सफाया करने में उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। यही स्थिति बंगाल की है जहां ममता बैनर्जी के अभेद्य किले में भाजपा ने सेंध लगा दी है और उड़ीसा में भी अपने पांव जमा लिए हैं। इन दो राज्यों में यदि एग्जिट पोल जैसे नतीजे आये तब मोदी-शाह की जोड़ी को पूरे नम्बर देने पड़ेंगे। अभी दो दिन इन्तजार और कयासों के जरुर हैं लेकिन एक बात तो तय है कि कोई अकल्पनीय उलटफेर नहीं  हुआ तब आएगा  मोदी ही का नारा जमीनी सच्चाई बन जाएगा। नरेंद्र मोदी की वापिसी उनके कद को जहां वैश्विक स्तर पर और ऊँचा करने में मददगार बन जायेगी वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान और गहरे हो जायेंगे। बड़ी बात नहीं कल को उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा ही उनके लिए सिरदर्द बन जाएं। भारतीय राजनीति में श्री मोदी की वापिसी एक गुणात्मक बदलाव का कारण बन सकेगी जिसकी परिणिति उन ताकतों के सम्पूर्ण पराभव के तौर पर देखने मिल सकती है जो राष्ट्रवाद को तानाशाही का पर्याय बताने की हद तक जाने में भी नहीं शरमाये। बंगाल में वामपंथ का सफाया इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय की इतिश्री होगी। यदि भाजपा ने 300 पार का आंकड़ा छू लिया तब नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में महानायक के तौर पर स्थापित हो जायेंगे लेकिन सबसे बड़ा बदलाव  ये होगा कि राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को लेकर विधवा विलाप करने वाली ताकतें हाशिये से भी बाहर हो जायेंगी। वैसे अभी भी जिन लोगों को एग्जिट पोल झूठ का पुलिंदा लग रहे हैं उन्हें दो दिन तक दिल बहलाने का पूरा अधिकार है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 18 May 2019

क्षेत्रीय पार्टियों के सामने कांग्रेस लाचार

लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण का चुनाव प्रचार रुक जाने के बाद राजनीतिक दलों के नेताओं को कितना आराम मिला  ये तो वे ही जानते होंगे लेकिन जनता को बड़ी राहत मिल गई है। बीते अनेक महीनों से टीवी चैनलों और अखबारों में लोकसभा चुनाव को लेकर चल रही बहस ही छाई रहती थी। लेकिन इसे दुर्भाग्य कहें या कुछ और कि इतने लम्बे प्रचार के बावजूद कोई भी पार्टी जनमानस को पूरी तरह से प्रभावित नहीं कर सकी। भाजपा का दावा अपने बलबूते 300 से ज्यादा सीटें जीतने का भले हो लेकिन आंध्र, तेलंगाना, तमिलनाडु और काफी हद तक केरल में उसका प्रभाव न के बराबर या  बेहद सीमित है। रही बात बंगाल और उड़ीसा की तो वहां भले ही भाजपा ने अपने आप को स्थापित कर लिया हो लेकिन 23 मई को ही ये पता चल पायेगा कि उसकी कोशिशें किस हद तक कामयाब हुईं। इसके अलावा  भाजपा ने पूर्वोत्तर में अपनी जो प्रभावशाली उपस्थिति बीते पांच वर्षों में दर्ज करवाई वह कितनी ठोस है ये भी परिणामों से स्पष्ट हो जाएगा। सबसे बड़ी बात ये रही कि भाजपा का समूचा प्रचार अभियान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व पर केन्द्रित हो गया। लेकिन ये नई बात नहीं है क्योंकि 2014 में भी पार्टी अबकी बार मोदी सरकार का नारा बुलंद करके ही सत्ता में आई थी। उसी नारे को इस चुनाव में फिर एक बार मोदी सरकार के तौर पर दोहरा दिया गया। चौंकाने  वाली बात ये रही कि नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल और रामविलास पासवान जैसे एनडीए के बड़े नेताओं  तक ने इस पर ऐतराज नहीं जताया कि मोदी सरकार की जगह एनडीए सरकार क्यों नहीं कहा गया?  इससे ये तो स्पष्ट हो गया कि उन सभी ने ये मान लिया कि राष्ट्रीय स्तर पर श्री मोदी ही मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन ये भी संभव है कि उनकी खामोशी परिस्थितिजन्य हो और यदि भाजपा बहुमत से पीछे रही तब वे उसी  तरह नखरे दिखाने लग जायेंगे जैसा शिवसेना ने बीते पांच साल तक किया। बहरहाल भाजपा और उसके सहयोगियों के बीच के रिश्तों की मजबूती के लिए भी अंतिम नतीजों के लिए इन्तजार करना होगा। लेकिन दूसरी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को देखें तो पूरे चुनाव अभियान में उसकी तरफ  से कहीं भी ये एहसास नहीं हुआ कि वह पूर्ण बहुमत के लिए आशान्वित है। ये भी ध्यान देने योग्य बात है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के बावजूद भी कांग्रेस का प्रभाव क्षेत्र सिमटता ही जा रहा है। उप्र और बिहार में वह घुटनों के बल चलने मजबूर है। ये कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस केवल उन्हीं  राज्यों में भाजपा के साथ सीधे मुकाबले  में है जहां वे दोनों ही प्रमुख ताकतें हैं। जहां भी क्षेत्रीय दलों की वजनदारी है वहां कांग्रेस या तो अप्रासंगिक होकर रह गई  या फिर पिछलग्गू बनने मजबूर हो गई। केवल पंजाब ही अपवाद है जहां अकाली दल जैसे क्षेत्रीय दल के बाद भी कांग्रेस सीधे मुकाबले में रहती है वरना मप्र, उप्र, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ और कुछ हद तक दिल्ली में ही वह वैकल्पिक शक्ति बची है। इसका प्रभाव ये हुआ कि भाजपा ने तो श्री मोदी को बिना लागलपेट के दोबारा प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर दिया लेकिन कांग्रेस आज तक इस बारे में या तो चुप है या फिर घुमा-फिराकर बात कर रही है। स्मरणीय है उसकी सबसे निकटस्थ सहयोगी एनसीपी के नेता शरद पवार तक ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावना को सिरे से नकार दिया। भविष्य में भाजपा विरोधी गठबंधन जिन  नेताओं के बलबूते बनाने की उम्मीद कांग्रेस को है उनमें से ममता बैनर्जी, अखिलेश यादव और मायावती आदि ने भी प्रधानमंत्री पद कांग्रेस के खाते में डालने की बात नहीं कही। और तो और बिहार के तेजस्वी यादव भी इस बारे में मौन ही रहे। इस प्रकार ये स्पष्ट हो गया कि जिन सूबों में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व कायम है वहां कांग्रेस पूरी तरह से हाशिये पर चली गई है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि जहां कोई और पार्टी शक्तिशाली है वहां राष्ट्रीय राजनीति के दोनों धुरंधरों को जनता भाव नहीं देती। तमिलनाडु इसका सबसे पुराना और आंध्र प्रदेश सबसे नया उदाहरण है। जहां भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने पैरों पर खड़े होने की हैसियत नहीं रखते। ये भारतीय राजनीति का वह पहलू है जिसे भले ही  संघीय ढांचे की मजबूती के तौर पर अच्छा कहा जाता हो लेकिन देश की एकता और अखंडता के लिहाज से ये बेहद घातक स्थिति है। बीते कुछ महीनों में आंध्र और बंगाल की राज्य सरकारों ने केन्द्रीय सत्ता को जिस अंदाज में चुनौती दी उसे भाजपा और कांग्रेस से उपर उठकर सोचने की जरूरत है। ममता बैनर्जी द्वारा श्री मोदी को प्रधानमंत्री नहीं मानने जैसे सार्वजानिक बयान की कांग्रेस द्वारा निंदा नहीं किया जाना भी उसके राष्ट्रीय पार्टी होने के लिहाज से आश्चर्यजनक है। समूचे परिदृश्य का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर जो बात सामने आई है वह ये है कि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी की रूप में अपनी स्थिति को लगातार खोती जा रही है। खुदा न खस्ता 23 मई को भी यदि वह 100 सीटों के भीतर ही सिमटकर रह गई तब सपा-बसपा भविष्य में उसके लिए उप्र की अमेठी और रायबरेली सीटें भी छोड़ेंगे इसमें संदेह है। दो दिन पहले गुलाम नबी आजाद द्वारा प्रधानमंत्री पद हेतु दावेदारी छोडऩे के 24 घंटे बाद ही फिर से कांग्रेस ने जिस तरह से दोबारा दावा प्रस्तुत किया उस पर किसी भी गैर भाजपा विपक्षी पार्टी ने ध्यान नहीं दिया। इसी से साबित हो जाता है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व किस तरह अनिर्णय में उलझा हुआ है। 19 मई को अंतिम चरण के मतदान के तुरंत बाद आने वाले एग्जिट पोल से अंतिम नतीजे काफी हद तक स्पष्ट हो जायेंगे। लेकिन एक बात तय है कि फिर एक बार मोदी सरकार का नारा सफलीभूत हुआ तब कांग्रेस के भविष्य पर लगे प्रश्नचिन्ह और भी गहरे हो जायेंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 17 May 2019

प्रज्ञा : जी का जंजाल बन सकती हैं

दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध अभिनेता कमल हासन द्वारा नाथूराम गोड़से के बारे में की गई टिप्पणी पर पूछी  गई प्रतिक्रिया के जवाब में भोपाल लोकसभा सीट से भाजपा की प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर ने जो कुछ भी कहा वह न सिर्फ अवांछनीय और अनुचित अपितु घोर निंदाजनक भी है। गोड़से की विचारधारा और देशभक्ति का भाव उस दिन निरर्थक होकर रह गये थे जिस दिन उसके साथ महात्मा गांधी के हत्यारे होने का कलंक जुड़ गया। प्रज्ञा राजनीति में नई-नई उतरी हैं इसलिए उन्हें उससे जुड़ी मान-मर्यादा का उतना ज्ञान और ध्यान नहीं है जितना आम तौर पर अपेक्षित होता है। भोपाल से चुनाव मैदान में उतरने के साथ ही उन्होंने मुम्बई पुलिस के अधिकारी स्वर्गीय हेमंत करकरे को लेकर बेहद विवादास्पद बयान देकर भाजपा को मुसीबत में डाल दिया था। मालेगांव कांड की जाँच के दौरान उनके साथ जो ज्यादतियां हुईं उसकी जानकारी देकर उन्होंने जो सहानुभूति अर्जित की थी वह स्व. करकरे के बारे में दिए गये बयान से निश्चित तौर पर कम हुई। बावजूद उसके उनके साथ जो हुआ उसे लेकर उनके प्रति काफी हमदर्दी बनी रही। लेकिन गत दिवस गोड़से को देशभक्त बताने के बाद प्रज्ञा के बारे में ये धारणा और मजबूत हो गयी कि वे भाजपा के लिए जी का जंजाल बनने जा रही हैं। कल ज्योंही उनका बयान आया त्योंही भाजपा ने बिना देर किये उससे दूरी बनाते हुए उन्हें माफी माँगने के लिये कह दिया। चौतरफा थू-थू होने के बाद प्रज्ञा ने भी पाँव पीछे खींचते हुए पार्टी के मत के साथ होने की बात कह दी किन्तु तब तक जो नुकसान होना था वह तो हो ही चुका था। गोड़से द्वारा अदालत में दिए गये बयान को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएँ होती रही हैं जिसमें उसने गांधी जी की हत्या किये जाने के अपने कुकृत्य को सही ठहराने का भरपूर प्रयास किया था। उसकी देशभक्ति को लेकर किसी भी प्रकार की अवधारणा बनाना अब बेमतलब है क्योंकि उस जैसा व्यक्ति किसी भी देश या समाज का आदर्श नहीं हो सकता। लोकतन्त्र भले ही बहुमत के आधार पर चलता हो लेकिन जिस तरह फूलन देवी द्वारा अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने किये गये सामूहिक हत्याकांड को जायज नहीं ठहराया जा सकता भले ही उसे जनता ने चुनाव जिता कर लोकसभा में भेज दिया हो। उसी तरह प्रज्ञा को भोपाल की जनता सांसद बना दे उसके बाद भी यदि वे राजनीतिक शिष्टाचार का पालन नहीं करेंगी तब उनको वह सम्मान नहीं मिल सकेगा जिसकी चाहत उन्हें राजनीति में खींच लाई। भगवा आतंकवाद के नाम पर उन्हें जिस तरह फंसाया गया उसके कारण समाज के एक बड़े वर्ग में उन्हें लेकर सहानुभूति का भाव है लेकिन अपने साथ हुए अन्याय के प्रतिकार स्वरूप वे ऊल जलूल बातें कहेंगी तब वे लोगों की नजरों से उतर जायेंगी । गोड़से को हिन्दू आतंकवादी कहने के बयान पर कमल हासन की भी काफी आलोचना हुई। आज भी एक वर्ग है जो ये, मानता है कि गोड़से ने देश के अहित की चिंता की वजह से महात्मा जी की ह्त्या जैसा जघन्य कृत्य किया लेकिन वह तर्क भी गले नहीं उतरता। बल्कि इससे एकदम अलग हटकर ये कहना सही होगा कि उसके उस कार्य ने देश में हिंदूवादी ताकतों को पचास साल पीछे कर दिया वरना कांग्रेस 1962 आते-आते तक जनता की निगाहों से उतर जाती। गांधी जी भी यदि जीवित रहते तब 1974 में बाबू जयप्रकाश नारायण ने जिस सम्पूर्ण क्रांति का आन्दोलन खड़ा किया वह 1957 आते तक महात्मा गांधी और विनोबा भावे के नेतृत्व में शुरू हो चुका होता। गोड़से के प्रति सहानुभूति रखने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद जब देश ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था अपना ली तब हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार था और गांधी जी का वैचारिक विरोध भी अपराध नहीं माना जाता। कांग्रेस के भीतर भी अनेक ऐसे कद्दावर नेता रहे जिन्होंने समय-समय पर महात्मा जी की नीतियों का खुलकर विरोध किया। सरदार पटेल ने तो ब्रह्मचर्य के प्रयोगों पर बापू को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति दर्ज करवाने तक में संकोच नहीं किया था। ऐसे में गोड़से की कथित देशभक्ति और स्वाधीन भारत के हितों की चिंता करने वाला भाव उसके एक कृत्य की वजह से मिट्टी में मिल गया। प्रज्ञा ठाकुर ने भले ही पार्टी की फटकार के उपरांत अपने बयान को लेकर लल्लो-चप्पो शुरू कर दी और भाजपा ने भी उसे सिरे से नकारकर नुकसान से बचने की कोशिश की हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर की एक पार्टी को अपने यहाँ नई भर्ती करते समय किसी भी व्यक्ति की मानसिकता और सोच के स्तर का भली-भांति परीक्षण कर लेना चाहिए। दिल्ली विधान सभा के चुनाव के दौरान पार्टी की एक और साध्वी सांसद ने रामजादे और हरामजादे जैसी टिप्पणी से भाजपा को नुकसान पहुँचाया था। उप्र के सांसद साक्षी महाराज भी अनर्गल बातें बोलने की लिए कुख्यात हैं। उसी कड़ी में प्रज्ञा ठाकुर भी आ खड़ी हुई  हैं जिनसे भाजपा को तात्कालिक चुनावी लाभ शायद मिल भी जाये लेकिन कालान्तर में ऐसे लोग लम्बा नुकसान कर जाते हैं। प्रज्ञा ने गोड़से को लेकर जो भी कहा उसे उनकी निजी राय मानकर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता क्योंकि अब वे एक एक राष्ट्रीय पार्टी की ओर से लोकसभा के लिए प्रत्याशी बन चुकी हैं। राजनीतिक और वैचारिक मतभेद चाहे कितने भी क्यों हों किन्तु गांधी जी की हत्या करने वाले की सार्वजानिक प्रशंसा किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकती।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 May 2019

इसके पहले कि वितृष्णा घृणा में बदल जाए ..........

संभवत: ये पहला अवसर है जब समय सीमा से पहले ही चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी गई। कोलकाता में परसों भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद गत दिवस चुनाव आयोग ने विशेष  प्रावधानों के अंतर्गत 17 मई की शाम से बंद होने वाला प्रचार आज से ही रोक दिया। इसे लेकर तरह-तरह की प्रातिक्रियाएं आ रही हैं। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने चुनाव आयोग को रास्वसंघ से नियंत्रित बताया वहीं सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने सवाल उठाया कि आयोग ने ये निर्णय करने में 24 घंटे क्यों लगाये? उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा गत दिवस बंगाल में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की दो रैलियों के संपन्न हो जाने के लिए किया गया। आश्चर्य की बात है कि ममता से सबसे ज्यादा प्रताडि़त वामपंथी इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी के विरुद्ध बोलने से इसलिए पीछे हट रहे हैं क्योंकि उनका ताजा निशाना भाजपा है। चौंकाने वाली बात ये रही कि पूरे देश में चुनावी हिंसा न के बराबर हुई जबकि बंगाल में हर चरण के मतदान में जमकर खूनखराबा हुआ। ममता विरोधी मतों का धु्रवीकरण भाजपा के पक्ष में होने की सम्भावना से भी तृणमूल भयाक्रांत है। दरअसल वामपंथी और कांग्रेस चूँकि चुनाव बाद भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन की बात करते सुनाई दे रहे हैं इसलिए जो मतदाता ममता से त्रस्त हैं उन्हें भाजपा ही उनका विकल्प दिखाई दे रही है। लेकिन परसों हुई हिंसा की प्रतिक्रिया से आशंकित चुनाव आयोग ने 17 की बजाय 16 मई को ही प्रचार रोक देने जैसा कदम उठाकर एक नया रास्ता देश को दिखा दिया है। लगभग डेढ़ माह लम्बे चुनाव अभियान ने राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को ही नहीं अपितु पूरे देश को थका दिया है। देश के भविष्य का फैसला जिस प्रक्रिया से जुड़ा हुआ हो वही अब बोझ लगने लगी है। एक जमाना था जब फिल्मों की लम्बाई तीन घंटे की हुआ करती थी। 10-12 गीत होते थे। साधारण फिल्में तक 10-12 हफ्ते सिनेमा घरों में चला करती थीं। लेकिन आज के दौर में सुपर हिट फिल्म भी हफ्ते दो हफ्ते चल जाये तो बहुत बड़ी बात मानी जाती है। और अब तो 15-20 मिनिट वाली लघु फिल्मों का दौर आ गया है जिसे देखने के लिए सिनेमा घर तक जाने की तकलीफ  उठाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। बदलाव के इस दौर में इतने बड़े देश को इतने लम्बे समय तक एक ही खूंटे से बांधे रखना अटपटा और अवांछनीय लगने लगा है। दो दिन पूर्व इसी स्तम्भ में लम्बे चुनाव अभियान से जनता के ऊब जाने का मुद्दा उठाया गया था। उसी को आगे बढाते हुए ऐसा लगने लगा है कि चुनाव प्रचार के गिरते स्तर और उससे भी बढ़कर उस पर होने वाले खर्च के मद्देनजर मतदान के 36 घंटे पहले बंद होने वाला शोर-शराबा और पहले बंद कर  दिया जाए। संचार क्रांति के इस दौर में जनता तक अपनी बात पहुँचाने के अनेक तरीके निकल आये हैं। प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री करोड़ों लोगों से फोन पर वोट की अपील कर  देते हैं। व्हाट्स एप, ट्विटर, एसएमएस और फेसबुक सरीखे सोशल मीडिया के माध्यम से भी राजनीतिक चर्चा का सैलाब आ जाता है। ऐसे में 36 घंटे पहले तक प्रचार की सुविधा बंद करते हुए इसे और पीछे ले जाया जाए जिससे चुनावी शोर कम हो तथा पैसे की होली जलने पर भी नियंत्रण किया जा सके। एक समय था जब दूरदर्शन विभिन्न पार्टियों को चुनाव प्रचार हेतु प्रसारण की सुविधा देता था लेकिन निजी चैनलों की बाढ़ आ जाने के बाद वह सुविधा महत्वहीन होकर रह गई। अर्से से ये मांग होती आई है कि चुनाव को सस्ता बनाने के लिए सरकार उसका पूरा खर्च वहन करे। इससे काले धन का उपयोग रुक सकेगा और भ्रष्टाचार पर भी नकेल कस जायेगी। बीते कुछ समय से मतदाता पर्चियां घर-घर पहुँचाने का दायित्व चुनाव आयोग ने अपने हाथ में ले लिया। इससे राजनीतिक दलों का बड़ा सिरदर्द दूर हो गया है। मतदान का प्रतिशत भी इसकी वजह से बढ़ा है। इसी तरह से सभी प्रत्याशियों का परिचय और प्रचार सामग्री घर-घर मतदान के हफ्ते भर पहले तक पहुंचाने का प्रबंध भी सरकारी खर्च पर हो। कहते हैं जापान और ब्रिटेन सहित अनेक लोकतान्त्रिक देशों में चुनाव सामग्री डाक से नि:शुल्क भेजी जाने की व्यवस्था है। इसी के साथ ये भी किया जावे कि चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद बड़ी सभाओं, रैलियों और रोड शो जैसे आयोजनों पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाकर केवल व्यक्तिगत सम्पर्क, बैठकें और गोष्ठियों की अनुमति दी जावे। इस सम्बन्ध में रोचक बात ये है कि जिस सीट पर प्रचार  बंद हो जाता है उसके 25-50 किलोमीटर दूर किसी दूसरी सीट पर स्टार प्रचारक की रैली या रोड शो आयोजित किया जाता है। इस तरह से चुनाव की आचार संहिता का मजाक ही उड़ता है। ये सब देखते हुए बेहतर रहेगा कि चुनाव आयोग द्वारा जैसे ही चुनाव की अधिसूचना जारी की जाती है त्योंही पूरे देश में सार्वजानिक प्रचार प्रतिबंधित कर दिया जाए। इसका सबसे बड़ा लाभ ये होगा कि व्यर्थ के आरोप-प्रत्यारोपों से उत्पन्न कीचड़ उछाल प्रतियोगिता और उसके परिणामस्वरूप तनाव से देश बच सकेगा। अन्यथा लम्बा चुनाव अभियान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है। चुनाव सुधारों के लिए होने वाली तमाम बातों के बीच इस बारे में भी यदि चुनाव आयोग राजनीतिक दलों से हटकर जनमत जानने का प्रयास करे तो ऐसा लगता है अधिकाँश लोग इस सुझाव के पक्ष में खड़े होंगे। नेताओं के प्रति बढ़ती असम्मानजनक और व्यक्तिगत टिप्पणियों से उनके प्रति वितृष्णा घृणा में बदल जाए उसके पहले ही समुचित कदम उठा लेना चाहिए। बंगाल के चुनाव ने भविष्य के संकेत दे दिए हैं और फिर पुरानी उक्ति भी है कि जो बंगाल आज सोचता है वही पूरा देश भविष्य में सोचता है। क्या देश लोकतंत्र के उस मॉडल को पसंद करेगा?

-रवीन्द्र वाजपेयी