Saturday, 25 May 2019

इंसानी जान की कीमत मुआवजा तो नेताओं को सुरक्षा क्यों?

देश में नई सरकार बनने के जश्न के बीच गुजरात की व्यवसायिक राजधानी सूरत से जो दुखद समाचार आया उसने प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम कर दीं। एक बहुमंजिला व्यवसायिक इमारत में दोपहर लगी आग से वहां संचालित एक कोचिंग सेंटर में मौजूद 21 बच्चे जलकर मौत के आगोश में चले गये। कुछ ने कूदकर अपनी जान बचाई लेकिन उनमें से भी कई की स्थिति नाजुक है। राज्य सरकार ने मामला सूरत की महानगरपालिका पर ढाल दिया है क्योंकि किसी बहुमंजिला इमारत में अग्निशमन की व्यवस्था संबंधी जाँच करने का दायित्व स्थानीय निकाय के अंतर्गत ही आता है। प्रधानमन्त्री ने भी अपना दु:ख व्यक्त कर दिया। मरने वाले बच्चों के परिजनों को सरकार आर्थिक मुआवजा दे देगी। उसके बाद जाँच समिति बनेगी, दो-चार निलम्बित होंगे, भवन स्वामी के विरुद्ध लापरवाही का मुकदमा दर्ज होगा और हो सकता है दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड की तरह सालों तक चलने वाली अदालती कार्रवाई के उपरांत उन्हें जेल भी जाना पड़ जाए। लेकिन इन सबसे न तो उन मासूमों की जि़न्दगी लौटकर आयेगी और न ही उनके परिवारजनों के सीने में जल उठी दु:ख की आग कभी ठंडी होगी। इस तरह का ये कोई पहला मामला नहीं है और न ही आखिऱी होगा क्योंकि बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय वाली उक्ति हमारी मानसिकता पर स्थायी तौर पर हावी हो चुकी है। दुनिया के विकसित देशों में भी ऐसी दुर्घटनाएं होती हैं। लेकिन वहां गलतियों से सीखने की जो प्रवृत्ति है उसकी वजह से हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के प्रबंध सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर किये जाते हैं। जिस इमारत में कल की घटना घटी उसका मालिक यदि कोई राजनेता या उसका करीबी हुआ तब ये मानकर चलिए कि सूरत से दिल्ली तक उसके लिए बचाव कार्य शुरू हो चुका होगा। बड़े-बड़े वकील अग्रिम जमानत की अर्जी तैयार करने में जुट गये होंगे। प्रश्न ये है कि विकास के आसमानी दावों के बीच मूलभूत जरूरतों और सावधानियों के प्रति लापरवाही की ये प्रवृत्ति हम कब तक ढोते रहेंगे? 1997 में जबलपुर में आये भूकम्प के फौरन बाद भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी यहाँ आये थे। भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद उन्होंने पत्रकार वार्ता में तत्कालीन दिग्विजय सिंह की राज्य सरकार पर Criminal indifference (अपराधिक उदासीनता) का आरोप लगाया था। संयोगवश उसी दिन दिल्ली के उपहार सिनेमा में आग की खबर आई और तब श्री आडवाणीं के साथ आईं सुषमा स्वराज को तुरंत उन्होंने दिल्ली जाने का निर्देश दिया। श्रीमती स्वराज उस समय दिल्ली की सदर लोकसभा सीट से सांसद थीं और उपहार सिनेमा उसके अंतर्गत आता था। उस घटना को 22 साल बीत गये लेकिन अग्नि शमन या उस जैसी अन्य दुर्घटनाओं से बचने के उपायों को लेकर व्यवस्थाजनित हमारी उदासीनता यथावत है। सूरत में हुआ हादसा वाकई दिल दहलाने वाला है। अग्निकांड पर बनी Towering Inferno (टावरिंग इन्फर्नो ) नामक हालीवुड की फिल्म पूरी दुनिया में चर्चित हुई थी। उस फिल्म का कथानक एक बहुमंजिला इमारत में लगी भीषण आग और बचाव कार्य पर आधारित था। फिल्म देखने के बाद दुनिया के अनेक देशों में बहुमंजिला इमारतों में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने संबंधी प्रबंध किये जाने लगे किन्तु हमारे देश में विकास के नाम पर छोटे-छोटे शहरों तक में अट्टालिकाएं तो तन गईं लेकिन उनमें रहने वालों की सुरक्षा के प्रति बरती जाने वाली लापरवाही भी उतनी ही ऊँची होती चली गई। उस विदेशी फिल्म की नकल करते हुए हमारे देश में भी बर्निंग ट्रेन नामक फिल्म बनी लेकिन उसमें मनोरंजन हावी रहा। सूरत की घटना से कुछ बदलेगा या सुधरेगा ये मान लेना दिल को बहलाने के लिए काफी होगा क्योंकि हमारे देश में सुरक्षा और सुविधा पर केवल नेताओं का एकाधिकार है। यदि इंदिरा गांधी की हत्या नहीं हुई होती तब नेताओं को जेड स्तर की सुरक्षा देने के प्रति भी विचार नहीं हुआ होता। सरकार हर व्यक्ति की जान की रक्षा करे ये तो सम्भव नहीं लेकिन उसकी लापरवाही से लोग सस्ते में मर जाएं ये भी आदर्श स्थिति नहीं हो सकती। यदि केवल कुछ लाख रूपये ही इंसानी जान की कीमत है तो बेहतर हो नेताओं की सुरक्षा का तामझाम भी बंद कर दिया जाए। आखिर वे भी तो देश के दूसरे आम इंसानों की तरह ही दो हाथ पैर वाले इंसान ही तो हैं।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 May 2019

विचार शून्यता बनी विपक्ष की हार का कारण

जनादेश 2019 की समीक्षा एक-दो दिन में नहीं की जा सकती। पूरे परिणाम देश की जानकारी में आ चुके हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से अरुणाचल तक का राजनीतिक वृत्तांत स्पष्ट हो चूका है। नरेंद्र मोदी दोबारा सत्ता में लौटे हैं और वह भी भाजपा की 303 सीटों के विशाल आंकड़े के साथ। भाजपा के नेतृत्व में एनडीए ने भी 350 की संख्या प्राप्त कर नेहरु-इंदिरा युग की याद ताजा कर दी। राजनीतिक प्रेक्षक श्री मोदी को पंडित नेहरु और इंदिरा जी की श्रेणी का नेता बताकर उनका यशोगान करने में जुटे हैं। कांग्रेस की कमजोरियों का बखान भी हो रहा है। लेकिन ये परिणाम केवल कांग्रेस की ही नहीं अपितु विपक्ष के उस खेमे की शिकस्त है जिसने राष्ट्रवाद की अवधारणा को साम्प्रदायिकता से जोड़कर उसका उपहास और अपमान किया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गत दिवस हार स्वीकार करते हुए कहा कि ये दो विचारधाराओं का संघर्ष है। लेकिन चुनाव का हल्ला शांत हो जाने के बाद क्या वे अपनी पार्टी की विचारधारा को स्पष्ट कर सकते हैं ? देश की सबसे बड़ी पार्टी की विचारधारा क्या है ये उसके नेता ही स्पष्ट नहीं कर सकते तब जनता से क्या अपेक्षा की जाए। दुर्भाग्य की बात ये है कि सत्ता की लालच में तकरीबन सभी पार्टियां कांग्रेस की तरह से विचार शून्य हो गईं। यहाँ तक कि नई राजनीति की प्रतिनिधि बनकर उभरी आम आदमी पार्टी तक सियासत के उसी गंदे नाले में डूब गयी जिसे साफ करने का वायदा और दावा उसने किया था। कांग्रेस की देखा सीखी वंशवाद की बयार भी खूब बही और जाति तथा क्षेत्र के नाम पर मैदान में उतरीं तमाम पार्टियां निजी पारिवारिक संपत्ति बनकर रह गईं। इस चुनाव ने केवल गांधी परिवार के वर्चस्व को ही नहीं अपितु अन्य पार्टियों में चल रही कुनबेबाजी की जड़ें भी खोदने का साहस जनता ने कर दिखाया। ज्योतिरादित्य सिंधिया, डिम्पल यादव, मीसा भारती, शिबू सोरेन, एचडी देवगौड़ा और उनके पौत्र , हुड्डा पिता-पुत्र. वैभव गहलोत और उन जैसे तमाम खानदानों को कूड़ेदान में फेंकने का निर्णय भारतीय राजनीति में उत्पन्न उस नई सोच का परिणाम है जो वंशवाद के साथ ही जाति की जंजीरें तोडऩे के लिए प्रयासरत है। उस दृष्टि से नरेंद्र मोदी बधाई के विशेष पात्र हैं जिन्होंने विकास और जनकल्याण की राजनीति को विजय का आधार बनाते हुए तमाम स्थापित धारणाओं को ध्वस्त कर दिया। उनकी ही तरह उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी व्यर्थ के प्रपंचों से उपर उठकर रचनात्मक राजनीति करते हुए जनता के मन में लगातार जगह बनाए रखने में कामयाब हुए हैं। इस चुनाव का रोचक पहलू ये है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव की लहर के बावजूद उनकी बेटी निजामाबाद से भाजपा उम्मीदवार से हार गई। इस प्रकार मतदाताओं ने अनेक मिथक तोड़ दिए। उप्र और बिहार में जातिवादी गठजोड़ की धज्जियां उड़ गई। कटिहार से तारिक अनवर की पराजय ने मुस्लिम मतों के तिलिस्म को भी बेअसर कर दिया। बिहार में लालू परिवार और पार्टी साफ़ हो गई वहीं उप्र में मुलायम का कुनबा घरेलू यादवी संघर्ष में कमजोर हो गया। मायावती का दलितवाद भी हाँफता नजर आया। सबसे बड़ी बात रही बंगाल में ममता बैनर्जी के अहंकार की धज्जियां उडऩा। सत्ता की चाहत में बहुसंख्यक समुदाय को ठेंगे पर रखने के उनके पागलपन को जनता ने जोरदार झटका दिया। वामपंथी बीते पांच वर्ष में राष्ट्रवादी ताकतों के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह को भड़काने में जुटे रहे। दुर्भाग्यवश राहुल गांधी उनके जाल में फंस गये जिसकी वजह से कांग्रेस का रहा-सहा वैचारिक आधार भी जाता रहा। 2014 में हुई हार के बाद कांग्रेस ने जो एंटोनी कमेटी बनाई उसने हिंदुत्व को उसका कारण बनाया। उसके बाद राहुल गांधी ने सौम्य हिंदुत्व नामक प्रयोग करते हुए मंदिरों और मठों में पूजा पाठ शुरू कर दिया। अचानक वे जनेऊधारी ब्राह्मण बनकर अपना गोत्र बताते घूमने लगे। उनके शिवभक्त होने का प्रचार भी किया जाने लगा जिसे साबित करने के लिए वे कैलास मानसरोवर की तीर्थ यात्रा भी कर आये लेकिन जनता ने उस सबको पाखंड मानकर उपेक्षित कर दिया। जबकि दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को सफलतापूर्वक जनता के मन में बिठाते हुए तुष्टीकरण की राजनीति के खतरों को उजागर कर दिया। रही सही कसर पूरी हो गयी आतंकवाद के विरुद्ध छेड़ी गई लड़ाई पर सवाल खड़े करने के मूर्खतापूर्ण निर्णय से। कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष ने सैन्य कार्रवाई के सबूत मांगकर अपने आपको जनता की नजर में बुरी तरह से गिरा लिया। लेकिन इन सबसे अविचलित श्री मोदी अपनी उन योजनाओं को लोगों तक पहुँचाने में लगे रहे जिनसे उन्हें सीधा फायदा मिला। राहुल गांधी ने अपना अधिकांश समय राफेल सौदे और अनिल अम्बानी पर खर्च कर दिया जिसे आम मतदाता समझ ही नहीं सका । चौकीदार चोर की उनकी रट की वजह से जनता ने उन्हें गम्भीरता से लेना बंद कर दिया। बाकी विपक्षी दलों ने भी श्री मोदी की घेराबंदी में अपनी ऊर्जा और समय तो नष्ट किया लेकिन वे भाजपा विरोधी एक मोर्चा बनाने की बुद्धिमत्ता दिखाने से चूक गए। लेकिन सबसे बड़ा कारण बना हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर श्री मोदी की जबरन आलोचना। कड़े निर्णय लेने के बाद उन पर डटे रहने की नीति ने प्रधानमन्त्री की छवि एक सक्षम नेता के तौर पर स्थापित की। भ्रष्टाचार का एक भी आरोप उन पर और उनकी सरकार पर विपक्ष साबित नहीं कर सका। उनके विदेशी दौरों का मजाक उड़ाकर राजनीतिक रोटी सेंकने की राहुल की नीति भी लोगों को पसंद नहीं आई। उलटे उनसे मिले कूटनीतिक फायदों ने श्री मोदी को वैश्विक स्तर का नेता बना दिया। देश के जनमानस पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा जिसने विपक्ष को निहत्था कर दिया जो आखिर तक कोई एक चेहरा बतौर विकल्प नहीं दे सका। ये विजय निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और करिश्माई नेतृत्व की सफलता है। इसकी वजह से ये भी कहा जा रहा है कि उनका कद पार्टी से उपर हो गया लेकिन ये सोच गलत है। नरेंद्र मोदी एक विचार यात्रा के पथिक हैं जिसका उद्देश्य देश की सुरक्षा, समृद्धि और सम्मान में वृद्धि है। पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम इलाकों में भाजपा का उदय उसी का हिस्सा है जिसे समझ पाना राहुल, अखिलेश, तेजस्वी जैसों के बस की बात नहीं है। नरेंद्र मोदी जैसे कद्दावर नेता को परास्त करने के लिए कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी समान गैर जिम्मेदार तत्वों का सहारा लेने की नीति ने राहुल गांधी की अपरिपक्वता को प्रमाणित कर दिया। आजादी के बाद नेहरु जी और इंदिरा जी के इर्द गिर्द वामपंथी बुद्धिजीवियों का एक घेरा था। दुर्भाग्य से राहुल भी उसी में घिर गये। ये तबका राष्ट्रवादी शक्तियों को कमजोर करने में लगा रहता है। जिसके अनेक उदाहरण बीते पांच वर्षों में देखने आये। उस दृष्टि से ये चुनाव परिणाम राष्ट्रीय राजनीति को चुनावी जीत-हार से ऊपर उठाकर राष्ट्रवादी विचारधारा के मजबूत होने की घोषणा है। कांग्रेस अभी भी गांधी परिवार के मोहपाश से मुक्त नहीं हो सकी तब उसका भविष्य अच्छा नहीं कहा जा सकता। अन्य जाति और क्षेत्र आधारित पार्टियां भी यदि जनादेश के मर्म को नहीं समझीं तब इतिहास का कूड़ेदान ही उनकी जगह होगी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 22 May 2019

विरोधाभास : एग्जिट पोल और ईवीएम दोनों पर अविश्वास

लोकसभा चुनाव के जो एग्जिट पोल आये उन्हें विपक्ष ने पूरी तरह से नकार दिया है। कांग्रेस के साथ ही भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दल भी उनका मजाक उड़ा रहे हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी और  रवीश कुमार जैसे मोदी विरोधी एंकर को तो एग्जिट पोल झूठ का पुलिंदा लग रहे हैं। इनकी वैज्ञानिकता को लेकर भी तरह-तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं। चूंकि अतीत में अनेक मर्तबा एग्जिट पोल पूरी तरह से गलत हुए है इसलिए भी उनके नतीजों पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन एक बात समझ से परे है कि जब विपक्ष को पूरा भरोसा है कि भाजपा हार रही है और मोदी सरकार जाने वाली है तब बीते दो दिनों से ईवीएम से छेड़छाड़ को लेकर आसमान सिर पर उठाने का क्या फायदा है? ईवीएम की सुरक्षा को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही अनधिकृत खबरों के कारण ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे उनको बदलना और उनमें हेराफेरी कर देना बच्चों का खेल हो। दिसम्बर 2018 में जिन तीन भाजपा शासित राज्यों में कांग्रेस जीतकर सत्तारूढ़ हुई उनके चुनाव परिणामों को लेकर उसने कभी शंका व्यक्त नहीं की। दो दिन पहले एक कांग्रेस नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि उन राज्यों में भाजपा जान बूझकर हारी ताकि ईवीएम पर अविश्वास दूर हो और लोकसभा चुनाव में हेराफेरी की जा सके। संदेह मिटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने हर बीट के पांच मतदान केन्द्रों की ईवीएम के नतीजों का मिलान वीवीपैट पर्चियों से करने का आदेश पूर्व में ही पारित कर  दिया था। दोनों में अंतर आने पर वीवीपैट की गणना सही मानी जावेगी। संदेह की स्थिति में आधी या सभी ईवीएम से निकली पर्चियां गिनने की याचिका न्यायालय ने गत दिवस खारिज कर दी। उसके बावजूद विपक्ष ने ऐसा माहौल बना रखा है जैसे केंद्र सरकार पूरे देश की ईवीएम में मनमाफिक  हेराफेरी कर देगी । चुनाव आयोग को भी पूरी तरह असहाय और अकर्मण्य बताने की प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। विपक्ष के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि अगर चुनाव नतीजे उसकी अपेक्षा के अनुरूप निकले तब भी क्या वह ईवीएम पर अपने संदेह जारी रखेगा? इन मशीनों को लेकर शक व्यक्त करने वालों में भाजपा के नेता भी रहे हैं। डा. सुब्रमण्यम स्वामी और जीवीएल नरसिम्हन का नाम प्रमुख तौर पर उभरता है। श्री नरसिम्हन ने तो ईवीएम में हेराफेरी पर किताब भी लिखी थी। लेकिन उसके बाद देश में दर्जनों चुनाव हुए जिनमें अलग-अलग पार्टियां जीत चुकी हैं। 2014 के जिस चुनाव में भाजपा को पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला वह कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार के कार्यकाल में हुआ था। उसके बाद दिल्ली और बिहार में क्रमश: आम आदमी पार्टी और नीतीश-लालू के गठबन्धन ने मोदी लहर को पूरी तरह से असरहीन कर दिया। तब तक ईवीएम को लेकर ज्यादा हल्ला नहीं मचा लेकिन उप्र में भाजपा की धमाकेदार जीत के बाद ईवीएम का जबर्दस्त विरोध शुरू हो गया जबकि पंजाब में कांग्रेस को मिली भारी सफलता  को पार्टी ने अपनी जीत के रूप में प्रचारित किया। उप्र के बाद भी गुजरात, कर्नाटक, मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव हुए जिनके नतीजे मिले जुले रहे ऐसे में ईवीएम को पूरी तरह संदिग्ध मान लेने की नीति मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू वाली मानसिकता का परिचायक ही कहा जाएगा। बहरहाल गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय की दो टूक मनाही के बावजूद भी विपक्ष का रोना जारी है। यदि अंतिम परिणामों में पराजय  के बाद चिल्लपुकार की जाती  तब तो उसका औचित्य भी था लेकिन जिन एग्जिट पोल पर धेले भर का भरोसा नहीं है उसे देखते ही छाती पीटने से विपक्ष की हताशा जाहिर हो रही है। आरएलएसपी अध्यक्ष और मोदी सरकार में मंत्री रह चुके उपेन्द्र कुशवाहा तो खून खराबे जैसी धमकी पर उतर आये। राजनीति की नब्ज पहिचानने वाले अनेक विश्लेषकों का मानना है कि इसी  नकारात्मक सोच के कारण विपक्ष की विश्वसनीयता जनता की नजर में कायम नहीं रह सकी और जैसे संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार मोदी सरकार की वापिसी के आसार हैं। ईवीएम में यदि कहीं गड़बड़ी है तब उसे तकनीकी विशेषज्ञ ही स्पष्ट कर सकते हैं। कोई भी मशीन 100 फीसदी दोषरहित और सुरक्षित हो ये मान लेना तो गलत होगा लेकिन लाखों मशीनों के साथ छेड़छाड़ जैसा आरोप पूरी तरह से अव्यवहारिक और बचकाना ही लगता है। बेहतर हो विपक्ष  आत्मावलोकन कर अपनी कमजोरियों को दूर करने का प्रयास करे। भारत जैसे विविधता भरे देश में जनता का विश्वास जीतना उतना आसान नहीं, जितना समझा जाता है। भाजपा और नरेंद्र मोदी ने यदि जनता के मन पर प्रभाव छोड़ा है तो उसके पीछे कुछ ठोस कारण होंगे। विपक्ष अपने दायित्व के सही निर्वहन की बजाय जिस तरह के सतही विरोध में उलझा रहा उससे उसकी छवि और विश्वसनीयता दोनों पर बुरा असर पड़ा। 2014 से 2019 के बीच का समय कम नहीं था। विपक्ष उसका समुचित उपयोग नहीं  कर सका तो ये उसकी गलती रही। ईवीएम को लेकर किये जा रहे  प्रलाप से साबित हो गया कि उसने हम नहीं सुधरेंगे की कसम खा रखी है। देखने वाली बात ये रहेगी कि जिन राज्यों या सीटों के नतीजे विपक्ष के अनुकूल रहे वहां भी क्या वह पुनर्मतदान करवाना चाहेगा? एग्जिट पोल और ईवीएम दोनों पर एक साथ अविश्वास को विरोधाभास नहीं तो और क्या कहा जाए?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 21 May 2019

विपक्षी एकता : जब चिड़िया चुग गई खेत

आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू चुनाव खत्म होने के साथ ही विपक्षी नेताओं को एकजुट करने के लिए भागदौड़ कर रहे हैं। इसे सोनिया गांधी द्वारा चुनाव परिणाम के दिन आमंत्रित बैठक से जोड़कर भी देखा जा रहा है क्योंकि एनडीए से नाता तोडऩे के बाद श्री नायडू ने कांग्रेस से गठबंधन कर लिया था। लोकसभा चुनाव के पहले विपक्षी एकता की अनेक कोशिशें की गईं जिनमें ममता बैनर्जी के साथ चंद्रबाबू भी आगे-आगे थे लेकिन बाद में ममता एकला चलो हो गईं। उप्र में अखिलेश यादव ने 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से हुए गठबन्धन को बिना सूचना तोड़ते हुए मायावती के साथ समझौता कर लिया। बिहार में लालू पुत्रों ने महागठबंधन बनाने की कोशिश तो की लेकिन सीटों के बंटवारे और प्रत्याशी चयन में गड़बड़ी के चलते वह अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सका। महाराष्ट्र में अवश्य कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी में ठीकठाक तालमेल बैठा और तमिलनाडु में भी कांग्रेस द्रमुक के साथ गठजोड़ कर सकी लेकिन शेष भारत में कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां राष्ट्रीय महागठबंधन जैसा कोई विकल्प नहीं खड़ा कर सकीं। यद्यपि इसके लिए तमाम छोटे दल कांग्रेस के अहंकार को कसूरवार ठहराते हैं लेकिन ये अर्धसत्य है। हालाँकि सबसे बड़े विपक्षी दल के साथ ही देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने की वजह से ये अपेक्षा की जाती थी कि वह समूचे विपक्ष को एक छतरी के नीचे लाकर चुनाव पूर्व गठबंधन करेगी जिससे भाजपा विरोधी मतों का बंटवारा रुक सके लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उप्र में कांग्रेस द्वारा अकेले चुनाव मैदान में उतरने के बाद से ही उस तथाकथित विपक्षी एकता की हवा निकल गयी जो कुछ महीने पहले विभिन्न अवसरों पर दिखाई दी थी। ममता बैनर्जी भाजपा के विरोध में सबसे ज्यादा आक्रामक और निर्मम रहीं लेकिन बंगाल में कांग्रेस के साथ उनकी भी पटरी नहीं बैठी। दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ तालमेल बिठाने की हरसंभव कोशिश की लेकिन वह भी सफलीभूत नहीं हुई। इस प्रकार विपक्ष भावनात्मक स्तर पर भले ही मोदी विरोधी माहौल बनाने के लिए एकस्वर में बोलता रहा लेकिन जमीनी स्तर पर मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाली स्थिति ही बनी रही। दूसरी तरफ  बीते पांच साल तक अपने सहयोगियों की नाराजगी झेलती रही भाजपा ने चुनाव आने के पहले नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे जैसे बड़े सहयोगियों को संतुष्ट कर दिया। इन पर विपक्ष भी डोरे डालता रहा किन्तु उसे निराशा हाथ लगी। उप्र में अपना दल (अनुप्रिया धड़ा) और निषाद पार्टी को साधने का उसका दांव भी काफी कारगार लग रहा है। बिहार में नीतीश और रामविलास पासवान के कारण उपेन्द्र कुशवाहा को छोडऩे में भाजपा ने तनिक भी परहेज नहीं किया। एग्जिट पोल से मिले संकेत इतने स्पष्ट हैं कि भाजपा विरोधी राजनीतिक विश्लेषक भी ये मानने के लिए मजबूर हो गये कि भले ही भाजपा स्पष्ट बहुमत से कुछ पीछे रह जाए लेकिन सरकार उसी के नेतृत्व में एनडीए बनायेगा जिसके प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ही बनेंगे। हालाँकि विपक्ष को अभी भी मरुस्थल में पानी की बूंद की तरह ये लग रहा है कि त्रिशंकु लोकसभा उबरने की हालत में यदि भाजपा 200 के आसपास सिमट गयी तब एनडीए के घटक दलों के अलावा बाहर से सम्भावित समर्थन देने वाले जगनमोहन रेड्डी और के. चन्द्रशेखर राव जैसे नेता चाहेंगे कि श्री मोदी की जगह भाजपा किसी और को प्रधानमन्त्री पद के लिए आगे बढ़ाये। लेकिन ये संभव नहीं होगा क्योंकि श्री मोदी और अमित शाह तब विपक्ष में बैठकर खिचड़ी सरकार के बनने और गिरने का इंतजार करना पसंद करेंगे। लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों के बाद ये स्थिति काल्पनिक ही लगती है। और उसी का कारण है कि त्रिशंकु की दशा में कर्नाटक वाली रणनीति के तहत सबसे बड़े दल के रूप में भाजपा को सरकार बनाने से रोकने का दबाव बनाने के उद्देश्य से ही सोनिया गांधी ने 23 मई को विपक्षी नेताओं की बैठक बुलवाई थी लेकिन ज्योंही एग्जिट पोल में मोदी मैजिक के कारगर होने की खबर आई त्योंही बैठक तो रद्द कर दी गयी लेकिन श्री नायडू ने बिखरे विपक्ष को एकजुट करने की कवायद जारी रखी। उन्होंने अखिलेश और मायावती को भी साधने की कोशिश की लेकिन इसी बीच ये खबर भी आ गयी कि वे मायावती को प्रधानमंत्री देखना चाहेंगे। सपा-बसपा दोनों को उम्मीद है कि महागठबंधन को उप्र में 50 से 55 सीटें जरुर मिल जायेंगी। यदि ममता भी बंगाल में अच्छी खासी सफलता हासिल कर लेती हैं उस सूरत में वे मायावती को प्रधानमन्त्री स्वीकार करेंगी इसमें भी संदेह है। और कहीं कांग्रेस 100 के करीब पहुँच गईं तब वह भी भाजपा और नरेंद्र मोदी का डर दिखाकर राहुल की ताजपोशी का प्रयास करेगी जिसका संकेत गुलाम नबी आजाद दे चुके हैं। ये सब देखते हुए ही भाजपा विरोधी राजनीतिक विश्लेषक भी ये कहने मजबूर हो गये हैं कि इतना दिशाहीन विपक्ष इसके पहले नहीं दिखा। ये कहना गलत नहीं है कि यदि विपक्ष वाकई भाजपा और श्री मोदी को हटाना चाहता था तब उसे चुनाव पूर्व गठबंधन करते हुए वोटों का बंटवारा रोकने के साथ एक साझा घोषणापत्र और नेता मतदाताओं के सामने रखना था। भाजपा के सहयोगी भी भले ही श्री मोदी को पूरी तरह से पचा नहीं पाते हों लेकिन एनडीए में नेता को लेकर किसी भी तरह का विवाद या अनिश्चितता नहीं रही। अमित शाह और श्री मोदी के नामांकन के अवसर पर एनडीए के सभी वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति से जो सकारात्मक सन्देश गया वैसा कुछ करने से कांग्रेस और अन्य भाजपा विरोधी दल चूक गये। यही वजह है कि एग्जिट पोल के बाद मोदी विरोधी तबका भी विपक्ष के एकजुट नहीं होने को मोदी की वापिसी के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है। एक बात और यहाँ उल्लेखनीय है कि यदि भाजपा 300 पार कर गई तब मोदी-शाह की जोड़ी विपक्ष को और कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। कल अमित शाह द्वारा उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को एनडीए में शांमिल होने का आमंत्रण देना उस दिशा में पहला कदम कहा जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी