Wednesday, 5 June 2019

पर्यावरण दिवस : जितनी आबादी उतने वृक्ष


इस वर्ष गर्मियों में तापमान जितना बढ़ा उसके बाद से ये सवाल हर समझदार भारतीय के मन में उठ रहा है कि क्या इस बारे में निर्लिप्त रहा जाये या फिर ऐसा कुछ किया जाए जिससे कि आने वाले समय में ग्लोबल वार्मिंग के प्रकोप से देश को बचाया जा सके। इस वर्ष मानसून में विलंब के चलते चिंता के बादल मंडराने लगे हैं। पूरे देश से जो खबरें मिल रही हैं उनके मुताबिक तापमान कई दशकों के कीर्तिमान को तोडऩे पर आमादा है। इसका कारण केवल और केवल पर्यावरण के प्रति बरती गई अनदेखी और प्रकृति के साथ किये गए अत्याचार ही हैं लेकिन इसके पीछे मनुष्यों, के मन में घर कर चुकी विकास की वासना भी है। अधो संरचना के नाम पर हो रहे कार्यों की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता किन्तु यदि उसके लिए वृक्षों का कत्लेआम और जल स्रोतों के अस्तित्व को खतरे में डालने जैसा अपराध किया जाए तो फिर उसे अपने हाथों अपनी मौत लिखना कहा जा सकता है। भारत सदृश देश में जहां प्रकृति और पर्यावरण के साथ समन्वय बनाकर चलने के संस्कार घुटी में पिला दिए जाते थे वहां निरंतर बढ़ती गर्मी सोचने के लिए बाध्य कर रही है। हमारे देश की भौगोलिक संरचना विविधताओं से भरी है। यही वजह है कि विभिन्न हिस्सों का प्राकृतिक माहौल भी अलग-अलग है। लेकिन जब आधुनिक विज्ञान विकसित नहीं हुआ था तब भी जल, जंगल और जमीन को लेकर हमारे ऋषि-मुनि, मनीषी से लेकर आम जन तक बेहद सतर्क और समर्पित था। लेकिन ज्यों-ज्यों शिक्षा का प्रसार होता गया त्यों-त्यों विकास का पश्चिमी मॉडल भी लोग अपनाते चले गए। एक सुनियोजित षडय़ंत्र के चलते भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रत्येक पहलू को पिछड़ेपन का प्रतीक बता दिया गया। उसी का दुष्परिणाम आज सामने है। ये बात पूरी तरह से हास्यास्पद है कि जिन देशों ने प्रकृति और पर्यावरण के साथ अमानवीय व्यवहार करने के लिए हमें बाध्य किया आज वही उसकी रक्षा का उपदेश बांटते फिर रहे हैं। लेकिन उसमें भी कई असमानता है। विकसित, विकासशील और अविकसित देशों के लिए अलग-अलग मापदंड इसका प्रमाण हैं। ऐसे में ये जरूरी लगता है कि भारत उधार में मिल रहे ज्ञान से परहेज करते हुए अपनी परंपरा और अनुभवों के आधार पर अपना रास्ता स्वयं चुने। आज के दिन चिंता से उबरकर इस बात पर चिंतन होना चाहिए कि जो नुकसान हो चुका उसे आगे होने से कैसे रोका जाए और जो रास्ता समझ आता है वह कोई नया नहीं है। बेहतर हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पहली पारी में शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन को और विस्तार देते हुए राष्ट्रीय वृक्षारोपण मिशन शुरू करवायें और जिस तरह खुद श्री मोदी ने झाड़ू उठाई उसी तरह उन्हें वृक्षारोपण की मुहिम भी अपने नेतृत्व में शुरू करनी चाहिए। ये कहना गलत नहीं होगा कि नेतृत्व के प्रति जैसा विश्वास पं नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल जी के दौर में था वह सब श्री मोदी में समाहित हो गया है। नेता जब लोकप्रियता के शिखर पर हो तब वह जनता को रचनात्मक और विध्वंसात्मक दोनों दिशाओं में मोडऩे में कामयाब हो सकता है। संयोगवश दो सप्ताह पूर्व ही प्रधानमंत्री ने चुनावी समर में ऐतिहासिक विजय हासिल कर जबर्दस्त बहुमत हासिल किया है। ये भी सुखद संयोग है कि देश के बड़े भूभाग में मोदी है तो मुमकिन है नारे का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। इस माहौल का फायदा उठाकर प्रधानमंत्री जितनी जनसंख्या उतने वृक्ष का आह्वान करें तो बड़ी बात नहीं उनका दूसरा कार्यकाल पूरा होते तक देश पर्यावरण संरक्षण में भी विश्व का नेतृत्व करने की स्थिति में आ जायेगा। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने गत दिवस ही प्रतिदिन 40 किलोमीटर सड़क बनाने के साथ ही 125 करोड़ वृक्ष लगाने की जो बात कही उसे लागू करने का सही वक्त यही है। नरेंद्र मोदी युवा पीढ़ी के मन में ये भरोसा जगाने में कामयाब हो गए हैं कि मजबूत इरादे और नेकनीयती से असम्भव भी सम्भव हो सकता है। शुरू-शुरू में स्वच्छता मिशन का भी खूब मजाक उड़ाया गया था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यहां तक कहा कि जिन बेरोजगारों के हाथों को काम दिया जाना था उन्हें मोदी जी ने झाड़ू पकड़ा दी। लेकिन छोटे-छोटे बच्चों तक में स्वच्छता के प्रति जो लगन पैदा हुई उसके बाद ये उम्मीद करना बेमानी नहीं होगा कि आबादी के बराबर वृक्षारोपण और उनका संरक्षण करने के आह्वान को राष्ट्रव्यापी समर्थन मिलेगा और विपक्ष भी इसका समर्थन करने बाध्य होगा। सबसे बड़ी बात ये है कि स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का चोली दामन का साथ है। नरेंद्र मोदी को इतिहास ने जो अवसर दिया है वे उसे अमरत्व प्रदान कर सकते हैं। उनके पास श्री गडकरी जैसे सपनों को साकार करने में सक्षम सहयोगी है। इस संयोग का लाभ लेकर पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय संस्कार के तौर पर पुनस्र्थापित करना सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सबसे सकारात्मक उदाहरण हो सकता है। वृक्षारोपण कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये जो भी जरूरी हो किया जाए वरना आर्थिक मोर्चे पर हासिल की जा रही सारी उपलब्धियां अर्थहीन होकर रह जाएंगी। विज्ञान के बलबूते भारत ने मंगल और चंद्रमा पर उतरने की क्षमता तो हासिल कर ली किन्तु उससे भी बड़ी जरूरत है इस देश की धरती को इंसानों के रहने लायक बनाये रखने की है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 4 June 2019

सपा-बसपा में टूट : जातिवादी राजनीति का उतार शुरू

लोकसभा चुनाव के दौरान जब नरेंद्र मोदी कहते थे कि उप्र में बसपा-सपा महागठबंधन 23 मई की शाम के बाद टूट जाएगा तब उसे सियासी दांव समझा जाता था। लेकिन गत दिवस वह बात सच साबित हुई। भले ही औपचारिक रूप से अभी दोनों पार्टियों ने अलगाव की घोषणा नहीं की और अखिलेश यादव अपने निर्वाचन क्षेत्र आजमगढ़ में बसपा कार्यकताओं के साथ मिलकर काम करने की बात कह रहे हों लेकिन दूसरी तरफ  मायावती ने निकट भविष्य में होने वाले विधानसभा के 11 उपचुनाव अकेले लडऩे की घोषणा करते हुए ये भी कह दिया कि बसपा को इस महागठबंधन से कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि सपा समर्थक यादव मतदाता उसके प्रत्याशियों के पक्ष में नहीं आये। मायावती ने अखिलेश पर ये तंज भी कसा कि वे अपनी पत्नी और भाई तक को नहीं जितवा सके। हालाँकि उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन की बात स्वीकार जरुर की। यद्यपि अभी तक सपा ने मायावती के फैसले पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की लेकिन मायावती के बाद जिस तरह से बसपा के दूसरे नेताओं ने भी सपा पर असहयोग का आरोप मढऩा शुरू कर दिया उससे गठबंधन में दरार चौड़ी होने की संभावना और भी बढ़ गई है। लोकसभा चुनाव में वैसे तो बसपा को 10 गुना लाभ हुआ क्योंकि 2014 में उसे एक भी सीट नहीं मिली थी और उस लिहाज से लोकसभा में बीते पांच साल से वह पूरी तरह से प्रतिनिधित्वविहीन रही। उस दृष्टि से देखें तो सपा का नुकसान ही हुआ। मुलायम सिंह यादव के साथ ही अखिलेश भले जीत गये लेकिन उनके भाई और पत्नी की हार बड़ा धक्का कही जायेगी। ऐसे में होना तो ये चाहिये था कि वे बसपा पर असहयोग का आरोप लगाते। परिणामों से स्पष्ट हो चुका है कि भले ही मायावाती और अखिलेश के बीच गठबंधन हुआ हो लेकिन दोनों पार्टियों में निचले स्तर पर उस फैसले को स्वीकार्यता नहीं मिली। रही-सही कसर पूरी कर दी कांग्रेस द्वारा अलग से मैदान में उतरने के फैसले ने। इससे बसपा और सपा दोनों की नाराजगी बढ़ी जिसका खामियाजा राहुल गांधी को अमेठी में भोगना पड़ गया। इस चुनाव ने उप्र ही नहीं बिहार में भी जातिवादी जमावड़े की हवा निकाल दी। पिछड़े के बाद अति पिछड़े और दलित के बाद अति दलित जैसे विशेषणों को जनता ने जिस तरह से दरकिनार किया वह एक सकारात्मक संकेत है। बसपा और सपा के बीच हुआ समझौता किसी विचारधारा से प्रेरित तो था नहीं। वैसे भी अब न तो सपा में समाजवाद बचा है और न ही बसपा में दलितों के उत्थान की सोच। दोनों विशुद्ध रूप से निजी जागीर बन चुकी हैं जिसके नेता जातिगत भावनाओं को भुनाकर अपना वर्चस्व कयाम रखना चाहते हैं। सपा जैसी पार्टी जब अनिल अम्बानी, जया बच्चन सहित बड़े-बड़े बिल्डरों को राज्यसभा में भेजती है तब उसके समाजवादी चेहरे पर पूंजीवाद की झलक साफ दिखाई देती है। इसी तरह बसपा को दलितों की बेहतरी से कुछ लेना देना नहीं है। जिस तरह से मायावती चुनावी टिकिटों की सौदेबाजी करती हैं वह सर्वविदित है। दूसरी पार्टियों की देखासीखी उन्होंने भी अपने भतीजे को उत्तराधिकारी के तौर पर स्थापित करने की शुरुवात की जिससे ये स्पष्ट हो गया कि उनकी सोच में स्व. कांशीराम जैसी दूरदर्शिता नहीं है। वैसे भी गेस्ट हाउस काण्ड जैसी अपमानजनक घटना को भुलाकर मायावती द्वारा सपा से गठबंधन किया जाना दलित स्वाभिमान पर बहुत बड़ी चोट थी। मैनपुरी में मुलायम सिंह के लिए मायावती का वोट मांगने जाना बसपा के सैद्धांतिक पलायन का प्रतीक बन गया। अब जब उन्होंने अपनी तरफ  से सपा का साथ लिए जाने को नुकसानदेह बताकर उससे पल्ला झाडऩे की शुरुवात कर दी और आगामी विधानसभा उपचुनाव अकेले लडऩे का ऐलान कर दिया तब अखिलेश के सामने बड़ी ही विकट स्थिति पैदा हो गयी। 2017 के उप्र विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने अचानक राहुल गांधी से गठबंधन कर लिया जो बुरी तरह पिटा। उसके बाद राज्य में हुए लोकसभा और विधानसभा के कुछ उपचुनावों में उन्होंने बसपा से गठजोड़ किया जिसे मिली सफलता ने बुआ-बबुआ नामक समीकरण को जन्म दिया लेकिन तात्कालिक लाभ को स्थायी मानकर महागठबंधन बनाने का प्रयोग मतदाताओं ने पूरी तरह से ठुकराकर जता दिया कि दो नेताओं द्वारा अपनी-अपनी जातियों के ठेकेदार बनने का जमाना लद चुका है। ये लगातार तीसरा अवसर है जब उप्र के मतदाताओं ने जातिवादी गठजोड़ के धुर्रे उड़ा दिए। इसे भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव के तौर पर देखा जाना चाहिए। पिछड़ी और दलित जातियों का सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान देश के विकास के लिए बड़ी प्राथमिकता है लेकिन उनके नाम पर कुछ नेता और उनके परिजनों का उत्थान होता रहे ये अब उनके अनुयायियों को मजूर नहीं रहा। नरेंद्र मोदी को इस बात के लिए बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने जाति के नाम पर होने वाले गठबंधन के खौफ  से राजनीति को काफी हद तक तो मुक्ति दिलवा दी। सपा-बसपा गठबंधन पूरी तरह से एक स्वार्थ आधारित समझौता होने से उसका यही हश्र अपेक्षित था। मायावती तो खैर कांशीराम की शिष्या रहीं इसलिए उनके सियासी पैंतरों से किसी को न आश्चर्य होता है न ही दु:ख लेकिन विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त और जाति से बाहर विवाह करने का साहस दिखा चुके अखिलेश जब लाल टोपी पहिनकर जातिवादी घेरे में कैद हो जाते हैं तब हैरानी होती है। यही वजह है कि 2019 का जनादेश सही मायनों में अखिलेश जैसे नेता की राजनीति के लिए बड़ा धक्का है जिनसे युवा पीढ़ी को काफी आशाएं थीं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 June 2019

मप्र : तबादलों में बाकी जरूरी काम छूटे


मप्र की कमलनाथ सरकार पर तबादलों का भूत सवार है। बीते साढ़े पांच महीने की कर्मपत्री खंगाली जाए तो सबसे ज्यादा सक्रियता तबादला उद्योग को लेकर देखी जा सकती है। सत्ता परिवर्तन के बाद प्रशासनिक ढांचे में बदलाव एक सहज और स्वाभाविक परम्परा है। यद्यपि इसका कुछ भी गुणात्मक लाभ नहीं है लेकिन कहे कोई कुछ भी किन्तु नौकरशाही के मुंह में सियासत का खून लगाने में सत्ताधारी नेताओं का ही हाथ है। इसके लिए प्राथमिक तौर पर कौन दोषी है कहना कठिन है लेकिन अब ये बीमारी संक्रामक होकर केंद्र से राज्यों तक पूरी तरह से फैल चुकी है। गत वर्ष के अंत में 15 साल बाद कमलनाथ के नेतृत्व में कांगे्रस सरकार का गठन हुआ। पदभार सँभालते ही श्री नाथ ने पूरे सरकारी अमले को हिलाकर रख दिया। चूँकि लोकसभा चुनाव करीब थे और आदर्श आचार संहिता लगने वाली थी इसलिए उन्होंने ताबड़तोड़ तबादलों की बौछार लगा दी। 10 दिन में किसानों के कर्जे माफ़  करने का वायदा तो अधर में लटक गया और पूरी ताकत लग गई नौकरशाहों को ताश के पत्तों की तरह फेंटने में। ऐसा लगा मानो कांग्रेस इस पूर्वाग्रह से  ग्रसित हो गई कि अधिकतर सरकारी अधिकारी भाजपा या रास्वसंघ से जुड़े हुए हों। बहरहाल प्रदेश भर में तबादलों की बहार आ गई। कलेक्टर और एसपी रातों-रात बदले गए। आपाधापी ऐसी मची कि एक ही जगह दो अधिकारी तक पदस्थ हो गए। आज तबादला सूची जारी हुई और दूसरे दिन उसमें संशोधन कर दिया गया जिसकी वजह से लेनदेन के आरोप भी नई सरकार पर खुलकर लगने लगे। इस गोरखधंधे में कमलनाथ अकेले शामिल रहे हों ऐसा नहीं है। प्रदेश कांग्रेस के सभी छत्रप मसलन दिग्ग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, अरुण यादव, अजय सिंह, विवेक तन्खा सहित लगभग सभी के बारे में कहा गया कि उन्होंने अपने चहेते अधिकारियों को मनमाफिक स्थानों पर तैनात करवा लिया। उद्देश्य मुख्य रूप से लोकसभा चुनाव हेतु रणभूमि सजाना था। हालाँकि कांग्रेस के नेता ये भूल गये कि उसी नौकरशाही के रहते वे विधानसभा चुनाव जीतकर आये थे। उच्च स्तर पर प्रशासनिक बदलाव तो अपेक्षित होता है लेकिन जिला और उससे भी नीचे के तबादलों के लिए यदि राज्य सरकार लोकसभा चुनाव तक प्रतीक्षा कर लेती तब शायद वह अपने चुनावी वायदों को पूरा करने के प्रति ज्यादा बेहतर प्रयास कर सकती थी। प्रशासनिक अमले में व्यापाक पैमाने पर किये गए बदलाव के बावजूद कांग्रेस लोकसभा चुनाव में औंधे मुंह गिरी। कमलनाथ खुद विधानसभा चुनाव कम अंतर से जीते वहीं उनके पुत्र छिंदवाड़ा से लोकसभा की सीट मात्र 38 हजार से जीत सके जिसके कारण उनकी राष्ट्रीय स्तर पर जबर्दस्त किरकिरी हुई। लोकसभा चुनाव के बाद ज्योंही आचार संहिता का बंधन हटा त्योंही राज्य सरकार ने दोबारा तबादलों का सिलसिला शुरू कर दिया। कुछ माह पूर्व हुए प्रशासनिक फेरबदल के बाद इतनी जल्दी फिर वही काम करने का औचित्य समझ से परे है। मुख्यमंत्री और उनके सलाहकारों को याद रखना चाहिए था कि विधानसभा चुनाव में सरकारी अमले ने कांग्रेस का काफी समर्थन किया था जिसका प्रमाण डाक मतपत्रों से मिला लेकिन लोकसभा चुनाव में एकदम उल्टा हुआ और सरकारी कर्मचारियों ने भाजपा को अभूतपूर्व समर्थन देकर पांच महीने पुरानी कमलनाथ सरकार के प्रति अपनी नाराजगी खुलकर व्यक्त कर दी। लोकसभा चुनाव के दौरान भोपाल और दिल्ली में पड़े आयकर छापों के तार भी मप्र के तबादला उद्योग से जोड़कर देखे गए। कहने वाले तो यहाँ तक कहने से बाज नहीं आ रहे कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव का खर्च तबादलों के जरिये वसूलने की जो कोशिश की उससे  उसकी मिट्टी और भी ज्यादा पलीत हो गई। कमलनाथ को सुलझा हुआ इंसान और सफल राजनेता मानने वाले भी इस बात पर हैरत में हैं कि उन्होंने  अपनी प्राथमिकताओं को दरकिनार रखते हुए सरकार की पूरी ताकत तबादलों में क्यों खर्च कर दी। हालाँकि इसके लिए उन्हें अकेले कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि कांग्रेस के लगभग सभी छोटे-बड़े नेता 15 साल के राजनीतिक सूखे की क्षतिपूर्ति के लिए तबादला कारोबार में शामिल हो गए बताये जा रहे हैं। अब जबकि लोकसभा चुनाव हो चुके हैं और कांग्रेस को उसमें अकल्पनीय पराजय झेलनी पड़ी तब तो उसे कम से कम ये बात समझ लेनी चाहिए कि प्रशासनिक अमला किसी का सगा नहीं होता। वह तो शासन में बैठी पार्टी और नेताओं के इशारे पर उठक-बैठक करता है बशर्ते वे प्रशासनिक क्षमता से संपन्न हों। एक अधिकारी को दूसरे जिले या विभाग में भेजना प्रशासन की जरूरी प्रथा है लेकिन उसके पीछे केवल राजनीतिक मन्तव्य हों तब वह नुकसानदेह हो जाती है क्योंकि स्थान और पदस्थापना बदलने से न तो किसी अधिकारी की मानसिकता बदलती है और न ही कार्यप्रणाली। उलटे वह अपने को प्रताडि़त मानकर कुंठाग्रसित होकर रह जाता है मप्र सरकार के स्थायित्व को लेकर भी आशंका बनी हुई है। जिन बाहरी विधायकों का समर्थन उसे हासिल है वे कब पाला बदल लें कहना कठिन है। भाजपा भले कहे कुछ भी लेकिन भीतर ही भीतर वह भी सरकार को अस्थिर करने के लिए प्रयासरत है।  ऐसी स्थिति में कमलनाथ को चाहिए कि वे अपनी सरकार को जनहित के कार्यों में लगायें। शिवराज सरकार के ज़माने के घपले-घोटालों की जाँच सामान्य रूप से चलने दी जाये लेकिन उसे सरकार का मुख्य एजेंडा बनाने से वही नुक्सान होगा जो 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार को इंदिरा जी की जाँच में पूरी ताकत लगा देने से उठाना पड़ा था। जैसी चर्चा है भाजपा की रणनीति कमलनाथ सरकार को गिराकर खुद लंगड़ी सरकार बनाने से ज्यादा मध्यावधि चुनाव करवाकर पूर्ण बहुमत लाने की है। ऐसे में कांग्रेस के लिए यही बेहतर रहेगा कि वह अपने चुनावी घोषणापत्र के वायदे जितना जल्दी हो सके पूरा करने पर जोर दे क्योंकि जैसा राजनीतिक माहौल है और लोकसभा चुनाव में भाजपा की जिस शानदार तरीके से वापिसी हुई है उसके मद्देनजर 15 साल बाद हाथ आई प्रदेश की सत्ता कब खिसक जाये कहना कठिन ही है। कमलनाथ को ये नहीं भूलना चाहिए कि उनके घर के भीतर बगावत की चिंगारी कभी भी भड़क सकती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 June 2019

जय श्री राम कहना कौन सा अपराध है

एक बात समझ से परे है कि सार्वजनिक रूप से जय श्री राम का उद्घोष करना भारतीय दंड विधान संहिता की किस धारा के अंतर्गत ऐसा अपराध है जिसमें किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की जा सके। लेकिन लगता है बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की खीझ भरी सनक अब चरमोत्कर्ष पर जा पहुँची है। लोकसभा चुनाव के दौरान सड़क पर जय श्री राम की नारे लगाते लोगों को देखकर ममता ने अपना वाहन रुकवाया और पास जाकर न सिर्फ उन्हें डांटा-फटकारा अपितु धमकाने से भी बाज नहीं आईं। चुनावी नतीजे विपरीत चले जाने के बाद तो सुश्री बैनर्जी और भी भन्नाई घूम रही हैं। गत दिवस उनके काफिले के सामने जय श्री राम के नारे लगा रहे आठ व्यक्तियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। लगे हाथ मुख्यमंत्री ने ऐसे लोगों को देख लेने की धमकी भी दे डाली। ममता के मुताबिक ये बाहरी तत्व हैं। प्राप्त समाचारों के मुताबिक जय श्री राम के नारे से ममता की चिढ़ की प्रतिक्रियास्वरूप अब वहां आम लोग भी ऐसा करने लगे हैं। दरअसल बंगाल में बड़ी संख्या में राजस्थान, बिहार और उप्र के लोग बसे हुए हैं। इन प्रान्तों में राम नाम लेना बेहद सामान्य बात होती है। ये भी सही है कि बंगाल में भाजपा के पाँव जिस तरह मजबूत होते जा रहे हैं उसके पीछे इन उत्तर भारतीयों का समर्थन प्रमुख कारण है। लोकसभा की 18 सीटों पर भाजपा की विजय को पहले अकल्पनीय समझा जाता था लेकिन 23 मई की दोपहर तक ये वास्तविकता बन गयी। यही नहीं तो विधानसभा की जिन 8 सीटों के उपचुनाव लोकसभा के साथ हुए उनमें से भी भाजपा ने चार जीतकर ममता को आने वाले खतरे का एहसास करवा दिया। ज्यादा समय नहीं बीता जब कुछ उपचुनावों में भाजपा को तृणमूल कांग्रेस के बाद दूसरा स्थान मिला लेकिन दोनों के बीच मतों का अंतर इतना बड़ा था जिसे देखकर राजनीतिक प्रेक्षक मान बैठे थे कि भाजपा को बंगाल में जमने में कम से कम एक दशक लग जाएगा। लेकिन वह आकलन उस समय गलत होता लगा जब ग्राम पंचायतों सहित स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की। बावजूद इसके कि तृणमूल के गुंडों ने उसके उम्मीदवारों को नामांकन करने तक से रोका और तब उच्च न्यायालय के निर्देश पर व्हाट्स एप से उन्हें नामांकन करने की सुविधा दी गई। उसके पहले ममता ने दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर रोक लगाने जैसे निर्णय भी किये जिन्हें अदालत ने रद्द कर दिया। उनके ऐसे ही फैसलों से ये बात जनमानस में पैठ कर गई कि सुश्री बैनर्जी को केवल 27 फीसदी मुस्लिम मतों की फिक्र  रहती है और हिन्दुओं को तो वो अपनी जेब में समझती हैं। चूंकि वामपंथी बंगाल में पूरी तरह हाशिये पर जा पहुंचे हैं और कांग्रेस घुटनों के बल पर चलने को मजबूर है इसलिए ममता का ये सोचना स्वाभाविक था कि वे चुनौतीविहीन हैं लेकिन वे जितना मुस्लिम परस्त होती गईं भाजपा को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर भी आसानी से मिलता गया। लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी को एक्सपायरी दवा की तरह बताकर उन्हें प्रधानमंत्री नहीं मानने और प्राकृतिक आपदा के समय आये उनके फोन का जवाब नहीं देने जैसे कदमों से ममता ने अपनी छवि पूरी तरह से खराब कर ली। होना तो ये चाहिए था कि चुनाव परिणाम आने के बाद वे सामान्य शिष्टाचार का पालन करते हुए मोदी सरकार के शपथ ग्रहण में शामिल होकर केंद्र - राज्य सम्बन्धों को नए सिरे से मधुर बनाने की पहल करतीं लेकिन उन्होंने वह अवसर भी गंवा दिया। गत दिवस जय श्री राम का नारा लगा रहे लोगों को गिरफ्तार करवाकर देख लेने की धमकी देने जैसा उनका कृत्य निश्चित रूप से ये साबित करता है कि सुश्री बैनर्जी पूरी तरह अपना संतुलन खोती जा रही हैं। आगामी विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं लेकिन उन्हें ये डर लग रहा है कि उनकी राजनीति अब ढलान पर आ चुकी है और बंगाल की जनता भाजपा को उनके विकल्प के तौर पर स्वीकार करने की मानसिकता बना चुकी है। बीते एक साप्ताह में ही तृणमूल के तीन विधायक टूटकर भाजपा में आ गये जिनमें एक मुस्लिम भी है। बड़ी संख्या में पार्षद भी तृणमूल छोड़कर भाजपा का दामन थाम रहे हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान ही प्रधानमन्त्री ने अपनी एक रैली में कहा था कि तृणमूल के दर्जनों विधायक उनके सम्पर्क में हैं। हो सकता है उनका वैसा कहना ममता पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का प्रयास रहा हो लेकिन लोकसभा की 18 सीटें जीतने के बाद भाजपा बंगाल में तृणमूल की टक्कर में खड़ी हो गई है और यही ममता के बौखलाने की असली वजह है। जय श्री राम का नारा लगाने वालों की गिरफ्तारी से न केवल बंगाल अपितु अन्य राज्यों में भी हिन्दू समाज आक्रोशित हो सकता है। बेहतर हो सौम्य हिंदुत्व को अपनाने वाली कांग्रेस ममता के इस सनकीपन की आलोचना करे वरना जनेऊ, गोत्र और मन्दिर-मठ में जा-जाकर पूजा-पाठ पाखंड की श्रेणी में ही माना जाएगा। ममता एक संघर्षशील राजनेता मानी जाती हैं लेकिन सत्ता में आने के बाद वे जिस तरह की निरंकुशता का परिचय दे रही हैं उसकी वजह से ही पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी भाजपा का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। 23 मई के पहले तक 30-32 सांसदों के बल पर प्रधानमन्त्री बनने का ख्वाब देखने वाली ममता को अब अपना मुख्यमंत्री पद भी खतरे में लगने लगा है और इसीलिये वे बेहद बचकानी और काफी हद तक मूर्खतापूर्ण हरकतों पर उतर आई हैं। इससे उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता भी उजागर हो रही है। हो सकता है अमित शाह के गृहमंत्री बन जाने से भी वे भयाक्रांत हो उठी हों जिनके हेलीकाप्टर को उतरने की अनुमति एन वक्त पर रद्द करने जैसी हरकत चुनाव के दौरान उनकी सरकार ने कई मर्तबा की।

-रवीन्द्र वाजपेयी