Tuesday, 11 June 2019

ममता भी केजरीवाल जैसे हश्र की ओर बढ़ रहीं

बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगने के सवाल पर तो विवाद हो सकता है लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद भी वहां जिस बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा जारी है वह एक गम्भीर मसला है। भाजपा तो ऐसा कह ही रही है लेकिन प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी ये मान रहे हैं कि ममता बैनर्जी की सरकार कानून व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पा रही। चौंकाने वाली बात ये है कि सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी वहां राष्ट्रपति शासन के पक्ष में नहीं हैं। इसकी वजह शायद ये हो सकती है कि मौजूदा हालात में तृणमूल कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा खतरा महसूस हो रहा है। वैसे भी बंगाल में वामपंथी अब मैदानी तौर पर भी बेहद कमजोर हो चले हैं। उनका समर्थक वर्ग पहले ही तृणमूल में चला गया था और अब बचे खुचे को भाजपा में संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में ममता बैनर्जी के किले को भाजपा ने जिस तरह से ध्वस्त किया उसके बाद ये सुनिश्चित हो गया है कि आने वाले समय में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ही राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकतें रहेंगीं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव के दौरान शुरू हुई हिंसा परिणाम आने के दो हफ्ते बाद भी यथावत चल रही है। इसका दुखदायी पहलू ये है कि इसमें साधारण कार्यकर्ता मारे जा रहे हैं। भाजपा इसके लिए ममता बैनर्जी को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहरा रही है जबकि ममता का आरोप है कि बाहरी तत्वों को बुलाकर भाजपा प्रायोजित हिंसा करवा रही है। राजनीति में इस तरह के आरोप-प्रात्यारोप सामान्य बात है लेकिन दो दलों की प्रतिद्वंदिता में निरीह कार्यकर्ताओं का मारा जाना औचित्यहीन है। निश्चित रूप से बंगाल का वर्तमान राजनीतिक माहौल पूरी तरह से अशांत है जिसका असर वहां के आम नागरिकों पर भी पड़ रहा है। विगत दिवस राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने दिल्ली आकर गृहमंत्री अमित शाह से जो भेंट की उसे बंगाल के राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है। यद्यपि श्री त्रिपाठी ने उसे मात्र एक सौजन्य भेंट बताया लेकिन जानकार सूत्रों के अनुसार उन्होंने श्री शाह को राज्य में कानून के राज की बिगड़ती स्थिति से अवगत करवाते हुए अपने सुझाव दिए। चूंकि बंगाल विधानसभा का कार्यकाल अभी दो वर्ष बाकी है और मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के पास सदन में पर्याप्त बहुमत भी है इसलिए विधानसभा भंग करने की स्थिति तो कहीं से बनती नहीं और बड़े पैमाने पर दलबदल करवाकर सत्ता पर कब्जा कर लेना भाजपा के लिए भी नामुमकिन नजर आता है। यदि किसी भी तरह से वह ऐसा करने में कामयाब हो जाती है तब भी उसके समक्ष नैतिकता का संकट आ खड़ा होगा तथा अन्य विपक्षी दल उसको कठघरे में खड़ा करने में जुट जायेंगे। यही वजह है कि पार्टी ममता सरकार पर पूरी तरह विफल होने का आरोप लगाने के बाद भी ये कह रही है कि वह सैद्धान्त्तिक त्तौर पर राष्ट्रपति शासन की विरोधी है। लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तब विधानसभा को निलम्बित रखते हुए राज्यपाल की रिपोर्ट पर राष्ट्रपति शासन लगाने का विकल्प तलाशा जा सकता है जैसा मोदी सरकार अपने पिछले कार्यकाल में जम्मू कश्मीर में कर चुकी है। विधानसभा भंग नहीं होने से विधायकों को वेतन भत्ते तथा अन्य सुविधाएं जारी रहेंगी जिससे वे भी ज्यादा चिल्ला पुकार नहीं करेंगे। राष्ट्रपति शासन में राज्य की सत्ता का संचालन राज्यपाल के हाथों होगा जो कि विशुद्ध भाजपाई मानसिकता के हैं। इस तरह भाजपा ही अप्रत्यक्ष रूप से बंगाल की सरकार का संचालन करेगी। ये दांव दरअसल पानी की मार जैसा होता है जिसमें पिटाई के निशान भी नहीं आते लेकिन पिटने वाले को दर्द भी खूब होता है। राष्ट्रपति शासन लगने के बाद ममता बैनर्जी भी साधारण विधायक रह जायेंगी। उनके साथ जुड़ा सत्ता नामक आकर्षण ज्योंही समाप्त होगा त्योंही तृणमूल में स्वाभाविक तौर पर भगदड़ मच जायेगी जिसका प्रत्यक्ष लाभ मौजूदा हालात में भाजपा को ही मिलना सुनिश्चित है। हालाँकि जो विरोधी दल ममता के रवैये से त्रस्त हैं वे भी भाजपा को इस मामले में समर्थन शायद ही दें लेकिन बंगाल को हिंसा की आग में धकेलने की गलती सुश्री बैनर्जी जिस तरह दोहराती जा रही हैं उसकी वजह से केंद्र सरकार भी ज्यादा दिनों तक धैर्य नहीं रख सकेगी। चुनाव परिणाम उम्मीद के सर्वथा विपरीत जाने के बाद मुख्यमंत्री को चाहिए था कि वे बीती ताहि बिसार दे वाली उक्ति का पालन करतीं। लेकिन हठधर्मिता के लिए विख्यात ममता पहले से ज्यादा बौखलाहट में नजर आने लगीं। उन्हें भावी खतरों का एहसास हो चुका है। बावजूद उसके वे अभी भी जली हुई रस्सी की तरह से ऐठीं रहीं तब ये मानकर चलना गलत नहीं होगा कि उनमें गलतियों से सीखने की प्रवृत्ति नहीं है। और उनका यही स्वभाव अंतत: उनके राजनीतिक पराभव का कारण बनेगा। अभी भी समय है राजनीतिक द्वेष से उपर उठकर उन्हें केंद्र से अपने सम्बन्ध सामान्य करना चाहिए। चुनाव के दौरान भले ही उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मानने से इंकार कर दिया हो लेकिन 23 मई को आया जनादेश बहुत स्पष्ट है। ममता बैनर्जी को अब  भी दीवार पर लिखी इबारत नहीं दिख रही तो उनका जिद्दीपन उन्हें अरविन्द केजरीवाल जैसे हश्र की ओर ले जाए बिना नहीं रहेगा। सत्ता में आने से पहले जुझारूपन, सादगी और ईमानदारी उनकी पहिचान हुआ करती थी। लेकिन बतौर मुख्यमंत्री आज की तारीख में उनके बारे में पूरे देश की क्या राय बनी है ये बताने की जरूरत नहीं है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 June 2019

गांव-मोहल्ले की बेटी सबकी बेटी के दौर को लौटाना होगा

नन्हीं बच्चियों के साथ हैवानियत के बढ़ते मामले समाज में धीरे-धीरे विकसित होती गई मानसिक विकृति का परिणाम है। इसके लिए हमारे वे साहित्यकार, फिल्मकार, पत्रकार और मनोरंजन के नाम अपसंस्कृति फैला रहे ग्लैमर की दुनिया के कुछ लोग भी जिम्मेदार हैं जो खुलेपन के नाम पर नग्नता को परोसकर खुद को प्रगतिशील और अभिव्यक्ति की आज़ादी का संरक्षक बताते नहीं थकते। भारतीय समाज में बेटियों के प्रति पवित्रता का जो भाव था वह आधुनिकता के फेर में कहां लुप्त हो गया, यह विचारणीय है। जिस समाज में पराई महिलाओं को माँ, बहिन और बेटी की नजर से ही देखा जाता रहा वहां मैडम और मेम जैसे सम्बोधनों ने पूरा नजरिया बदल दिया। कानून तो बेहद सख्त बन गया लेकिन यदि निर्भया कांड के बाद भी हैवानों के हौसले पस्त नहीं हुए तब ये समूचे समाज के लिए चिंता और चिंतन का विषय होना चाहिए क्योंकि कानून केवल अपराधी को दंडित कर सकता है, वह समाज को संस्कारित नहीं बना सकता। सच कहें तो ये सब केवल सरकार के भरोसे होकर बैठ जाने का दुष्परिणाम है। ये मान लेना कि सत्ता में बैठे लोग पूरी तरह से गैर जिम्मेदार या निर्लिप्त हैं, सही नहीं होगा लेकिन ये अवधारणा भी गलत नहीं है कि राजनीति ऐसे विषयों के प्रति उदासीन है। लोकसभा चुनाव में तमाम मुद्दे गरमाये लेकिन एक भी नेता या पार्टी ने अबोध बालिकाओं के साथ दुराचार करने वाले नर पिशाचों को लेकर नहीं कहा कि उनकी सरकार आने पर वे ऐसा कौन सा दंड देंगे जिससे भयभीत होकर और कोई वैसा करने का दुस्साहस नहीं कर सके। पूरे चुनाव अभियान में महिलाओं पर अत्याचार को तो खूब उछाला गया किन्तु वह मुख्य मुद्दों के पीछे ही रहा। यहां तक कि चुनाव लड़ रहीं चर्चित महिला नेत्रियों तक ने दुष्कर्म की बात करने से परहेज किया। ये स्थिति सोचने के लिए बाध्य करती है क्योंकि जिस पश्चिम की संस्कृति और सामाजिक मान्यताओं को एक तबके ने आधुनिकता और प्रगतिशीलता का प्रतीक मान लिया है, वहां के वर्जनाहीन समाज में महिला के सम्मान के प्रति विशेष सतर्कता बरती जाती है। लेकिन हमारे देश में केवल वहां के सामाजिक खुलेपन को स्वीकार कर लिया  गया जिसमें महिला और पुरुष के बीच के रिश्ते बेहद सहज होते हैं। उप्र की एक घटना को लेकर पूरा देश दुखी है। अबोध बालिका के साथ जो हुआ उसे सोचकर ही मन भारी हो उठता है। उस हादसे को अंजाम देने वाले को कड़े से कड़ा दंड देने की मांग भी हमेशा की तरह उछल रही है। लेकिन उस घटना के बाद भी दुष्कर्म के अन्य मामले सामने आ रहे हैं। गत दिवस भोपाल से भी दुष्कर्म के बाद हत्या का प्रकरण सार्वजनिक हुआ। पुलिस और प्रशासन हरकत में आ गए और दो-चार खाकी वाले निलंबित कर दिए गए। लेकिन ये कोई स्थायी इलाज नहीं है। जैसा पूर्व में कहा गया सरकार या कानून की एक सीमा है जिसे वे लांघ नहीं सकते। जब तक समाज के भीतर से ऐसी प्रवृत्तियों के विरुद्ध आवाज नहीं उठती तब तक उनकी पुनरावृत्ति रोक पाना असम्भव ही रहेगा। अपराधी की जाति या धर्म मायने नहीं रखता। समूचे समाज को सामूहिक होकर इस बारे में सोचना और करना पड़ेगा क्योंकि नारी के प्रति श्रद्धा और सम्मान केवल कानून से पैदा नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से परिवारों को ये चाहिए कि वे बच्चों के मन में ऐसे संस्कार अंकुरित करें जिससे वे लड़कियों के प्रति संवेदनशील रहें। आधुनिकता के चलते किशोर और युवा पीढ़ी के बीच अब गुजरे जमाने जैसी बंदिशें लगाना तो असम्भव भी होगा और अव्यवहारिक भी किन्तु उनको विकृत होने बचाने का गम्भीर प्रयास समय की मांग है। ये भी देखने में आया है कि आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग में यौन अपराधों में वृद्धि हुई है। सोशल मीडिया पर उपलब्ध अश्लील सामग्री भी विकृत मानसिकता को बढ़ावा देने में मददगार बन रही है। यहां जरूर सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि टेलीविजन और सोशल मीडिया के विभिन्न संस्करणों पर अवांछित सामग्री के प्रस्तुतिकरण को वह चाहे तो रोक सकती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जावे तो यौन आकर्षण और यौन विकृति से उपजी वीभत्स सोच के बीच का जो अंतर है वह कम होते जाने की वजह से भी इस तरह की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी अनुभव की जा रही है। इस दिशा में सरकार को प्रभावी कदम उठाने होंगे। भारतीय समाज में दुष्कर्म और उसके बाद हत्या की घटनाओं पर समाज की सामूहिक चेतना जाग्रत तो होती है लेकिन क्षणिक उन्माद में बदलकर थोड़े समय बाद बुलबुलों की तरह खत्म भी हो जाती है। जरूरत यहां भी सुधार की है जिससे कि दुष्कर्म विरोधी आक्रोश बना रहे। यद्यपि अदालतें आजकल ऐसे मामलों में जल्दी और सख्त फैसला सुनाने लगी हैं किंतु निचली अदालत से सर्वोच्च न्यायालय और फिर राष्ट्रपति के पास दया याचिका के निपटारे तक इतना लंबा समय व्यतीत हो जाता है कि जनमानस से वह घटना लुप्त हो चुकी होती है। समय आ गया है जब दुष्कर्म रोकने को लेकर एक ठोस नीति सरकार बनाये वहीं एक सभ्य समाज की स्थापना के प्रति सामाजिक स्तर पर भी सार्थक उपाय किये जाएं। काम कठिन है लेकिन इसलिए उसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता। पीछे लौटना पिछड़ेपन की निशानी मानी जा सकती है किंतु गांव और मोहल्ले की बेटी सबकी बेटी वाला वातावरण पुनस्र्थापित किये बिना दुष्कर्मों को रोकना सम्भव नहीं होगा। समाज को संस्कारों का सृजन करने और उनका पालन करवाने के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना ही होगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 8 June 2019

मानसून की दगाबाजी का खात्मा होना चाहिए

मानसून। ये शब्द कहां से आया। इसका मतलब क्या है। यह कौन सी भाषा का है। कोई नहीं जानता। फिर भी भारतीय जनजीवन में इसका महत्व बहुत ज्यादा है। यह भी कह सकते हैं कि इसके बिना यह देश अधूरा है। आमतौर पर मई जाते-जाते मानसून की हलचल तेज हो जाती है। 25 मई के बाद दक्षिणी हिस्से से मानसून भारत में प्रवेश करता है और जून के पहले सप्ताह में केरल तक फैल जाता है। यह विडम्बना ही है कि आजादी के इतने साल बाद भी मौसम के बारे में कोई सटीक सिस्टम हमारे पास नहीं है। यहां तक कि कई उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे जाने के बाद भी हम मौसम के बारे में अंदाज पर निर्भर रहते हैं। सरकारी एजेन्सी भी इस मामले में ढुलमुल साबित हो रही है। अभी कुछ दिन पहले दावा किया गया था कि इस दफा मानसून सामान्य रहेगा। पहले इसके वक्त पर आने का दावा भी रहा। अब इसे विलंबित बताया जा रहा है। यह भी कि मानसून अबके कुछ कम रह सकता है। प्री मानसून तो पूरी तरह चौपट हो गया है। 65 साल में यह दूसरा प्री मानसून है जो दगा दे गया। ऊपर से भीषण गर्मी ने  जनजीवन को बेहाल कर दिया है। थोड़े दिन पहले तक इस तरह का संकेत किसी ने नहीं दिया था। यही वजह है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूरब से लेकर पश्चिम तक पानी की त्राहि-त्राहि मची हुई है। पानी की एक बूंद खून से ज्यादा महंगी है। लाखों-करोड़ों लोग गंदा पानी पीने मजबूर हैं। मध्यप्रदेश की ही बात करें तो 60 से 70 फीसदी आबादी हाय-हाय कर रही है। इस राज्य के कुछ ही शहर छोड़कर ज्यादातर में दो दिन में या तीन दिन में या सप्ताह में एक बार पानी दिया जा रहा है। चूंकि प्री मानसून विफल होने की जानकारी किसी के पास नहीं रही इसीलिए आपदा प्रबंधन  हो नहीं पाया। महाराष्ट्र के एक-दो जिले में ट्रेन से पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जा सकी है। बाकी जगह पानी ने लोगों का जीना हराम कर दिया है। अभी जो स्थिति है उससे तो यह भी आशंका हो रही है कि कहीं मानसून ऊपर-नीचे न हो जाये। स्काई नेट नामक निजी एजेन्सी ने देश के कुछ भाग में सूखे का इशारा किया है। कुल मिलाकर हालात संगीन हैं। नई नवेली मोदी सरकार के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती मुंह फाड़कर खड़ी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम का तमामतर कौशल इम्तिहान की जद में है। जरा सी भी देर हुई तो मामला हाथ से निकल जायेगा। दो केन्द्रीय मंत्री ने भी अपने राज्य को लेकर प्रधानमंत्री से मदद मांगी है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी केन्द्र सरकार से राशि चाह रहे हैं। उम्मीद पर दुनिया कायम है परंतु विगत कई साल से सूखे की मार झेल-झेल कर बहुत बड़ा किसान वर्ग हताश हो चुका है। पिछले कुछ साल से किसान आत्महत्या ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। यह ठीक है कि लोकसभा चुनाव में किसान मुद्दा नहीं बन पाया। ऐसा होता तो काफी कुछ नजारा बदला हुआ होता। वर्तमान सरकार को दो-तीन काम प्राथमिकता के आधार पर करने पड़ेंगे। सबसे पहले तो मौसम विज्ञान को पूर्ण रूपेण सक्षम तथा त्रुटिरहित बनाया जाये। चाहे ठंड हो या बरसात पहले से बताया जाये कि आने वाले दिनों में ऐसा-ऐसा होगा। सही-सही जानकारी होती तो प्री मानसून की दगाबाजी इतनी विकराल नहीं होती। संबंधित राज्य सरकार इस मुसीबत का सामना करने के लिए पहले से तैयार होती। कई राज्य में लगातार सूखा पड़ रहा है किन्तु न जाने क्यों वहां की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है।  एक-दो रोज में मानसून सक्रिय नहीं होता तो प्रधानमंत्री को सभी मुख्यमंत्री की बैठक बुलानी चाहिए। खास कर जिन राज्य में ज्यादा कोहराम है वहां पर विशेष ध्यान दिया जाये। कृत्रिम बारिश के साथ-साथ जलस्रोत संरक्षण की नीति बनानी चाहिए। श्री मोदी ने अलग से जल विभाग बनाने का वादा किया था। अब टाइम आ गया है जब इस विभाग के बारे में तत्परता बरती जाये। कोशिश बरसात में ज्यादा से ज्यादा पानी बचाने की भी होना चाहिए। पानी बचाओ अभियान पूरे देश में एक साथ शुरू किया जाये। जल परिवहन की भी एक सी राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए। नदी जल बंटवारे को लेकर कुछ प्रदेश अभी भी लड़ रहे हैं। दूसरे कार्यकाल के शुभारंभ पर मौसम ने आंख तरेर दी है। रिकार्ड तोड़ गर्मी ने सारे देश को हिलाकर रख दिया है। इसका भी उपाय मोदी सरकार को गंभीरता से करना पड़ेगा। ईश्वर करे कि देर-सबेर से ही सही वर्षा रानी अपनी मेहरबानी बरकरार रखें। जल्द से जल्द गर्मी का यह दौर खत्म हो और झमाझम बारिश धरती की जलन पर मरहम लगाये।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 June 2019

आर्थिक मोर्चा : लोगों के चेहरे पर खुशी लाने का प्रयास हो

मोदी सरकार पर बीते दो सालों से ये आरोप लगता रहा कि वह देश के सबसे बड़े वित्तीय संस्थान भारतीय रिजर्व बैंक  की स्वायत्तता पर हमले कर रही है। उसके पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के साथ तो सरकार के रिश्ते बेहद तल्खी भरे हो गए थे। लेकिन इस सम्बन्ध में उठे विवादों के बीच ये कहना भी गलत नहीं होगा कि श्री राजन ने अर्थव्यवस्था की मजबूरियों को समझकर सामंजस्य बनाने की बजाय टकराव का रास्ता अपनाया जिससे ये आरोप भी लगा कि वे विपक्ष के हाथों खेलते हुए चुनावी वर्ष में सत्तारूढ़ पार्टी के लिये मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं जो नोटबन्दी और जीएसटी से उत्पन्न परिस्थितियों से वैसे भी रक्षात्मक बनी हुई थी। रिजर्व बैंक के पास चूंकि बैंक ऋणों की दरें निश्चित करने के साथ ही नगदी उपलब्धता की सीमा तय करने का अधिकार होता है इसलिए हर तीन माह में मौद्रिक समीक्षा बैठक पर सरकार के साथ ही बैंकिंग और उद्योग-व्यापार जगत की निगाहें लगी रहती हैं । श्री राजन के हटते ही उनके जो उत्तराधिकारी आए उनके बारे में कहा गया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कृपापात्र हैं और उनके जरिये सरकार रिज़र्व बैंक में बेजा हस्तक्षेप करते हुए उसका राजनीतिकरण करेगी। विपक्ष ने भी तरह-तरह के आरोप लगाकर उनके चयन को कठघरे में खड़ा करने की खूब कोशिश की। रिजर्व बैंक से जो सालाना लाभांश केंद्र सरकार को मिलता है उसकी राशि बढ़ाने के सरकारी आग्रह पर भी तनातनी हुई। बहरहाल लोकसभा चुनाव के छह महीने पहले से रिजर्व बैंक ने दो मर्तबा रेपो रेट में .25 फीसदी की कमी करते हुए केंद्र सरकार के लिए राहत का इंतजाम किया। अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार ऋण सस्ते होने से बाजार में मुद्रा का प्रवाह बढ़ता है जिसकी वजह से मांग बढ़ती है और उसका परिणाम महंगाई बढऩे के रूप में सामने आता है। मोदी सरकार पर ये आरोप लगातार लगता रहा है कि उसने भले ही महंगाई पर लगाम लगाए रखी हो लेकिन वह बाजार में मांग बढ़ाने में विफल रही। ऐसा कहा जाता है कि नोटबन्दी से पैदा हुए असामान्य हालातों से बाजार आज तक नहीं उबर सका। उद्योग-व्यापार में छाई मंदी ने रोजगार के क्षेत्र में अत्यंत ही निराशाजनक चित्र प्रस्तुत कर दिया जिसे छिपाने की कोशिशों को लेकर सरकार की जबरदस्त फजीहत भी हुई। लोकसभा चुनाव के पहले तक सरकार बेरोजगारी पर ज्यादा बात करने को तैयार नहीं थी। चुनाव बाद उसकी अधिकृत जानकारी आ जाने से सही स्थिति पता लग गई। प्रधानमंत्री द्वारा बेरोजगारी की समस्या दूर करने के लिए मंत्री स्तर की समिति बनाये जाने से ये स्पष्ट हो गया कि दूसरी पारी में श्री मोदी इस समस्या के हल के प्रति चिंतित हैं। उन्हें पता है कि बरसात बाद कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को यदि लोकसभा जैसी सफलता चाहिए तब आर्थिक मोर्चे पर कुछ न कुछ ऐसा करना पड़ेगा जो अर्थव्यवस्था में महसूस किए जा रहे ठहराव को दूर करे। रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में .25 प्रतिशत की जो कमी की गई उससे ऋण सस्ते होंगे तथा बाजार में अधिक धन उपलब्ध होने से मांग में वृद्धि का नतीजा उद्योग-व्यापार के अच्छे दिन के तौर पर देखने मिलेगा। हालांकि उसकी गारंटी इतनी जल्दी देना सम्भव नहीं है लेकिन मोदी सरकार अब कड़े वित्तीय अनुशासन को ज्यादा समय तक जारी रखने का जोखिम भी नहीं उठा सकती। बीते वित्तीय वर्ष में विकास दर का अपेक्षित 7 फीसदी से नीचे रहना चिंता के कारण उत्पन्न करने वाला बन गया क्योंकि भारत चीन से भी पीछे रह गया जिससे उसकी विश्व रेटिंग प्रभावित हुई जो विदेशी निवेश की आवक घटा सकती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के जानकारों के मुताबिक तो 2019-20 और उसके बाद के सालों में भारत की वार्षिक विकास दर 7 फीसदी से ज्यादा रहेगी औऱ दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था का उसका दावा और मजबूत होगा। लेकिन उसके लिए जरूरी है केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियां विकासमूलक हों तथा कारोबार में जटिलता दूर की जाए। ये तभी सम्भव है जब रिजर्व बैंक की भूमिका सहयोगात्मक रहे। सुखद संयोग है कि प्रधानमंत्री 2014 के पहले नियुक्त किये गए नौकरशाहों और सलाहकारों से पूरी तरह मुक्त हैं। संवैधानिक पदों पर बैठे अधिक़तर लोग भी उनके अनुकूल हैं। ऐसी ही परिस्थितियां स्व. इंदिरा गांधी के दौर में में थी। उस दृष्टि से प्रधानमंत्री के पास स्वर्णिम अवसर है आर्थिक मोर्चे पर खुलकर खेलने का। रिजर्व बैंक लगातार सहयोगात्मक बना हुआ है। राजनीतिक तौर पर भी श्री मोदी बेहद सुविधाजनक और चिंतारहित हैं। 2020 के शुरुवाती महीनों में एनडीए को राज्यसभा में भी बहुमत मिल जाएगा। पूरे परिदृश्य का सूक्ष्म अवलोकन करने के बाद ये अपेक्षा करना गलत नहीं होगा कि दूसरी पारी की शुरूवात कर ढांचे को युक्तिसंगत बनाने से की जावे। प्रत्यक्ष कर (आयकर) की दरों में कमी के अलावा जीएसटी के अनेक स्तर घटाकर ज्यादा से ज्यादा दो किये जायें तथा उसकी प्रक्रिया में बची-खुची खामियां दूर कर उसे आकर्षक बनाया जावे। पिछले कार्यकाल में नोटबन्दी और जीएसटी को लागू करने का फैसला काफी देर से लिया गया था। उसकी वजह सरकार का अनुभवहीन रहना भी माना जा सकता है लेकिन इस बार प्रधानमंत्री के पास पांच वर्ष के अच्छे-बुरे अनुभव हैं जो उन्हें तेजी से कदम बढ़ाने में सहायक बन सकते हैं। 2014 के चुनाव में अच्छे दिन आने वाले हैं का आश्वासन जनमानस को लुभा गया। वैसे वह जमीनी हकीकत नहीं बन सका बावजूद उसके जनता ने मोदी है तो मुमकिन है पर भरोसा जताते हुए अपनी तरफ  से पूरी दरियादिली दिखा दी। प्रधानमंत्री को चाहिए वे बिना समय गंवाए विश्व के अनेक देशों द्वारा अपनाए राष्ट्रीय प्रसन्नता सूचकांक जैसी व्यवस्था भारत में भी लागू करते हुए लोगों के चेहरे से उदासी दूर करने के कदम उठाएं। अर्थव्यवस्था का कुशल संचालन इसमें सहायक बन सकता है। लोकसभा के पहले सत्र में पेश होने वाला बजट इस सरकार के इरादों का संकेत देगा जिसकी अच्छी शुरूवात रिजर्व बैंक द्वारा कर दी गई है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 6 June 2019

कश्मीर का परिसीमन : सिरदर्द के स्थायी इलाज की पहल

दूसरी बार मोदी सरकार बने हफ्ता भर बीतने जा रहा है। सभी मंत्रियों ने पदभार भी ग्रहण कर लिया। प्रधानमंत्री के साथ अमित शाह के भी सरकार का हिस्सा बन जाने से उसकी निर्णय क्षमता में निश्चित तौर पर वृद्धि हुई है। ये भी स्पष्ट है कि श्री शाह गृह विभाग के साथ ही अन्य मंत्रियों के भी सम्पर्क में रहकर प्रधानमंत्री का बोझ थोड़ा हल्का करेंगे। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने अपने विभागीय अधिकारियों के साथ ही मंत्रियों की जो बैठक ली उससे काफी कुछ संकेत मिल गए हैं। कश्मीर समस्या को लेकर की गई पहल से भी काफी आशाएं बंधी है। चूंकि श्री शाह और प्रधानमंत्री के बीच काफी अच्छा समन्वय है इसलिये ये माना जा रहा है कि कश्मीर अब प्रयोग नहीं परिणाम की तरफ  आगे बढ़ेगा। गृहमंत्री द्वारा घाटी में सक्रिय बचे-खुचे आतंकवादियों को ठिकाने लगाने की जो पहल की वह उनके दृढ़ इरादों को व्यक्त करती है किन्तु उन्होंने जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन को ठीक करने की दिशा में जो कदम उठाने की शुरुवात की है  यदि वह मूर्तरूप ले सकी तब ये मानकर चला जा सकता है कि उन्होंने बीमारी की नब्ज पर हाथ रख दिया है। अलगाववाद की समस्या से जूझ रहा ये राज्य तीन अंचलों में बंटा है। जम्मू जहां हिन्दू बहुल क्षेत्र है वहीं कश्मीर घाटी में लगभग 95 प्रतिशत मुस्लिम हैं। सबसे कम आबादी वाले लद्दाख में बौद्ध और हिन्दू मिलाकर 52 फीसदी होते हैं। विधानसभा की सीटों के हिसाब से देखें तो जम्मू संभाग में 37, कश्मीर घाटी में 46 तथा लद्दाख में महज 4 सीटें हैं। इस हिसाब से राजनीतिक दृष्टि से घाटी शेष दोनों अंचलों पर भारी पड़ जाती है। पाक अधिकृत कश्मीर की 24 सीटें रिक्त रखी जाती हैं। जम्मू-कश्मीर में अब तक नेशनल कांफे्रंस और पीडीपी ही मुख्य राजनीतिक ताकतें रहीं। कांग्रेस का थोड़ा बहुत आधार कश्मीर और लद्दाख में  रहा है जबकि भाजपा जम्मू तक सिमटी थी। लेकिन 2014 में कश्मीर की राजनीति में बड़ा बदलाव आया जब भाजपा ने जम्मू अंचल में अधिकांश सीटें जीत लीं जबकि घाटी में दोनों क्षेत्रीय पार्टियों में बंटवारा होने से त्रिशंकु विधानसभा उभरी जिसके बाद भाजपा ने पीडीपी से मिलकर सरकार बना ली जो पूरी तरह से बेमेल विवाह जैसा था। वह सरकार कैसे चली और उसका क्या फायदा-नुकसान देश और भाजपा को हुआ ये सारी दुनिया के सामने है। लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद भाजपा के ऊपर ये दबाव आ गया है कि वह किसी भी तरह से कश्मीर की समस्या को हल करे। जहां तक बात धारा 370 हटाने की है तो वह इतना आसान नहीं है। शायद इसीलिए अमित शाह ने गृहमंत्री बनते ही इस राज्य के सियासी पलड़े का इकतरफा झुकाव खत्म करने का दांव चलने का संकेत दिया जिसके तहत विधानसभा की सीटों का परिसीमन नए सिरे से करने के बाद विधानसभा चुनाव कराया जावेगा। ऐसा करने के पीछे  निश्चित रूप से भाजपा की सोच जम्मू-कश्मीर की सियासत से अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार का वर्चस्व समाप्त करने की हो सकती है और तभी यह सम्भव है जब जम्मू अंचल के हाथ में राज्य का सियासी संतुलन आ जाए और वहां घाटी से ज्यादा सीटें हों। मोदी सरकार जिस धमाकेदार अंदाज में लौटी है उससे न सिर्फ  समर्थकों अपितु विरोधी भी मन ही मन चाहते हैं कि कश्मीर में अलगाववाद की जड़ों में मठा डाल दिया जाए। अमित शाह की प्रचलित छवि  लक्ष्य आधारित कार्य करने की रही है। चुनावी चाणक्य के तौर पर विख्यात श्री शाह ने एक बात तो साबित कर दी है कि वे चुनौतियों से घबराते नहीं वरन सामना करते हुए उन पर विजय हासिल करने का भरपूर प्रयास करते हैं। इससे भी बड़ी बात ये है कि वे सफलता और विफलता दोनों में एक जैसे रहकर अगली कार्ययोजना में जुट जाते हैं। जम्मू कश्मीर विधानसभा की सीटों का नए सिरे से  परिसीमन भारी राजनीतिक उथलपुथल का कारण बने बिना नहीं रहेगा जिसकी बानगी उमर अब्दुल्ला और मेहबूबा मुफ्ती के नाराजगी और चेतावनी भरे बयानों से मिलने भी लगी है। यदि श्री शाह ने वाकई इस दिशा में कदम आगे बढ़ाए तब मुमकिन है घाटी के भीतर आग लगाने का खेल हो लेकिन पूरा देश ये मानकर चल रहा है कि मोदी और शाह की जोड़ी ने जिस तरह से देश के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह अपने रंग में रंग दिया ठीक वैसा ही करिश्मा वे जम्मू-कश्मीर में भी कर दिखाएंगे। बीते पांच वर्ष के दौरान कश्मीर को लेकर मोदी सरकार और भाजपा को इतना शर्मसार होना पड़ा कि उसके परंपरागत समर्थक भी मन ही मन भन्नाए हुए थे। पीडीपी के साथ गठजोड़ के चलते भाजपा की पूरी पुण्याई सवालों के घेरे में आ गई थी। ऐसा लगता है नरेंद्र मोदी अपने इस कार्यकाल में कश्मीर की समस्या के स्थायी हल की तरफ ठोस कदम उठाएंगे। परिसीमन एक जोखिम भरा दांव हो सकता है लेकिन अमित शाह ने जब इसका जिक्र छेड़ा है तब पूरे देश में ये भरोसा जागा है कि जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुए कश्मीर की समस्या का स्थायी हल सम्भव होगा और  भारत के सिर का दर्द स्थायी रूप से दूर हो सकेगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी