Saturday, 15 June 2019

डाक्टरों की सुरक्षा और सम्मान जरूरी लेकिन .......

सरकारी अस्पताल में मरीज की मौत, परिजनों का डाक्टर पर लापरवाही का आरोप, मारपीट, तोडफ़ोड़ और उससे मिलती-जुलती घटनाएं हमारे देश के किसी न किसी शहर में आये दिन हुआ करती हैं। उसके बाद डाक्टर हड़ताल पर चले जाते हैं। दो चार दिन तक स्वास्थ्य सेवाएँ अस्त-व्यस्त रहती हैं। मरीज बेहाल होकर यहाँ-वहां भटकते हैं। जो साधन संपन्न हैं वे तो सरकारी अस्पतालों में जाते भी नहीं हैं लेकिन जिनके पास और कोई विकल्प नहीं होता वे मजबूरी में उन्हीं पर निर्भर हैं। डाक्टरों के काम बंद कर देने से उत्पन्न हालातों में कुछ मरीज बिना इलाज के मर भी जाते हैं। चारों तरफ  हल्ला मचता है, समाचार माध्यम भी अपने कर्तव्य के निर्वहन में जुट जाते हैं तब जाकर शासन-प्रशासन हरकत में आता है। कभी-कभी आवश्यक सेवा संबंधी कानून का उपयोग करते हुए डाक्टरों पर कार्रवार्ई होती है जो विवाद शांत होने पर रद्द कर दी जाती है। न्यायालय भी यदाकदा जनहित के प्रति अपनी चिंताएं व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते। डाक्टरों की मांग है कि उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। कुछ राज्यों में इस बारे में कानून बन भी गया है जिसमें डाक्टरों की पिटाई को दंडनीय अपराध बना दिया गया है। कोलकाता के  एक सरकारी अस्पताल में बीते दिनों उक्त वृत्तांत दोहराए जाने के बाद सरकारी डाक्टरों ने हड़ताल कर दी। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपने स्वभाव के अनुसार कड़क रवैया अपनाया तो बात और बिगड़ गई। बात बढ़ते-बढ़ते दिल्ली तक आ गई और अब इन्डियन मेडिकल एसोसियेशन भी बंगाल के डाक्टरों के समर्थन में कूद पड़ा। वहां के सरकारी डाक्टर सामूहिक इस्तीफा देने की हद तक चले गये। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन खुद भी एक डाक्टर हैं इसलिये वे भी ममता सरकार के रवैये को अनुचित ठहराने में जुट गये। और फिर राजनीति भी शुरू हो गई और ये कहा जाने लगा कि ममता बैनर्जी से राजनीतिक खुन्नस के कारण भाजपा कोलकाता की लड़ाई को दिल्ली ले आई। सत्यता जो भी हो लेकिन कोलकाता के सरकारी डाक्टरों की नाराजगी गलत नहीं है। सुरक्षा की मांग करना भी जायज है। डाक्टरी एक सम्मानजनक पेशा ही नहीं अपितु उसमें मानवीय संवेदनाएं निहित होती हैं। ये उक्ति इस बारे में बेहद प्रासंगिक है कि हमने ईश्वर में भरोसा नहीं खोया है अपितु उसे डाक्टर में स्थानांतरित कर दिया है। ईश्वर जहां जीवनदाता कहलाता है उसी तरह डाक्टर को जीवनरक्षक मानकर समाज में अतिरिक्त सम्मान प्राप्त होता रहा है। डाक्टर के संबोधन में साहब का जुड़ा होना इसी बात का प्रमाण है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में डाक्टरों और मरीजों के बीच की सौजन्यता में जबरदस्त कमी आई है जिसकी वजह इस पवित्र पेशे पर हावी हो गयी व्यवसायिकता है। चिकित्सा अब पहले जैसी सरल और सस्ती नहीं रही। सरकारी अस्पताल खुद बीमार होने से आम जनता की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते जिस वजह से निजी अस्पतालों में मरीजों का अम्बार लगने लगा। और यहीं से शुरू हुआ पैसे का खेल जिसने इस पवित्र पेशे की मूल भावना को पीछे धकेलकर किसी भी कीमत पर पैसा कमाने की प्रवृत्ति को जन्म दिया जो आज के दौर में अपने चरम पर जा पहुँची है। कोलकाता की घटना सरकारी अस्पताल की है लेकिन निजी अस्पतालों में भी आए दिन तोडफ़ोड़ की खबरें आम हैं। यद्यपि ये मान लेना भी गलत है कि सभी डाक्टर पैसे के पीछे भागने वाले हैं और निजी अस्पतालों में केवल लूटमार होती है लेकिन ये बात तो अक्षरश: सही है कि डाक्टर के प्रति विश्वास और सम्मान में उम्मीद से भी ज्यादा कमी आ गई है। निजी अस्पतालों को लूट का अड्डा मानने की धारणा भी बेहद सामान्य हो चुकी है किन्तु इसका ये अर्थ कदापि नहीं कि डाक्टर के साथ मारपीट की जाए। कोलकाता की घटना की राष्ट्रीय स्तर पर जो प्रतिक्रिया हो रही है उसके राजनीतिक निहितार्थ से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन डाक्टरों को भी ये सोचना चाहिए कि जिसे इस देश का आम इंसान भगवान मानकर इज्जत बख्शता रहा उसके प्रति इतनी घृणा और आक्रोश आखिरकार क्यों पनप गया? जिस मरीज की मौत अस्पताल में हो जाती है उसके परिजनों का दुखी होना स्वाभाविक है और कहीं इलाज में लापरवाही की बात उठ जाए तब दु:ख के साथ गुस्सा भी बाहर आ जाता है। हालाँकि इसकी वजह समाज में बढ़ रही उद्द्ंडता भी है। वैसे डाक्टरों की छवि खराब करने के पीछे केवल पैसे की हवस ही नही अपितु सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का चरमराना भी एक कारण माना जा सकता है। बीते 70 सालों में चिकित्सा विज्ञान ने तो अकल्पनीय प्रगति की लेकिन हमारे देश में सरकारी अस्पतालों के उन्नयन पर या तो ध्यान नहीं दिया गया या फिर वे सरकारी कार्यशैली के चलते बीमार होते गये जिसकी वजह से निजी अस्पतालों में भीड़ बढ़ी और उसके बाद मांग और पूर्ति का अर्थशास्त्रीय सिद्धांत लागू होने लगा। धीरे-धीरे चिकित्सा एक उद्योग बनती गई जिसमें पूंजी निवेश और अधिकाधिक लाभ की हवस हावी होने से उसकी पवित्रता भंग हो गई। डाक्टरों की सुरक्षा और सम्मान दोनों पूरी तरह से जरूरी हैं लेकिन आम जनता का स्वास्थ्य और जीवन रक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन ये तब ही सम्भव है जब सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति ईमानदार प्रयास करे। जब तक सरकारी अस्पतालों की दशा नहीं सुधरती तब तक चिकित्सा जगत में अव्यवस्था और अराजकता को रोक पाना असम्भव होगा। जहां तक डाक्टरों पर पैसे के फेर में पडऩे के आरोप हैं तो वे अकेले दोषी नहीं हैं क्योंकि वकील, पुलिस, सरकारी आधिकारी और नेतागण सभी तो कमोबेश उसी दिशा में दौड़ रहे हैं। लेकिन इन सबसे डाक्टर केवल इसलिए अलग हैं क्योंकि वे इंसानी जिन्दगी की रक्षा के कार्य से जुड़े हैं। डाक्टरों के अखिल भारतीय आन्दोलन के संदर्भ में केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि अपनी छवि सुधारने की जिम्मेदारी भी उन्हीं के ऊपर है क्योंकि उसका सत्यानाश भी उन्हीं की बिरादरी के धनलोलुप लोगों ने किया है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 14 June 2019

मोदी के साथ डोभाल : पाकिस्तान को साफ़ संकेत

बड़ा ही विचित्र संयोग है कि किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में शामिल होने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रस्थान और कश्मीर के अनन्तनाग में सीमा सुरक्षा बल के काफिले पर आतंकवादी हमले का समय बेहद नजदीकी था। इस सम्मलेन में पकिस्तान भी हिस्सा ले रहा है। श्री मोदी को बिश्केक जाने के लिए पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र का उपयोग करने का प्रस्ताव इमरान सरकार ने किया जिसे भारत ने ठुकरा दिया और श्री मोदी का विमान लम्बा चक्कर काटकर बिश्केक पहुँचा। दरअसल पुलवामा हमले और बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर जिस तरह निन्दित हुआ उसके बाद वहां के प्रधानमन्त्री इमरान खान ने भारत के साथ बातचीत के काफी प्रयास किये लेकिन मोदी सरकार ने पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद पर नियंत्रण किये बिना किसी भी प्रकार की वार्ता से इंकार कर दिया। कूटनीति के जानकारों को लग रहा था कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर श्री मोदी पाकिस्तान के प्रति कठोर रुख दर्शा रहे थे जो बाद में बदल जाएगा। लेकिन ताजा घटनाक्रम देखते हुए लगता है कि पुलवामा के घाव अभी भरे नहीं हैं क्योंकि पाकिस्तान ने विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई के अलावा ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे लगता कि वह रिश्ते सुधारने के बारे में ईमानदार सोच रखता है। बहरहाल चुनाव में शानदार जीत के बाद प्रधानमन्त्री श्री मोदी का आत्मविश्वास और बढ़ गया। उन्हें ये विश्वास हो गया कि देश का जनमानस पाकिस्तान के प्रति उनकी नीति से खुश है। शायद यही वजह रही कि अपने शपथ ग्रहण समारोह में श्री मोदी द्वारा छोटे - छोटे अनेक पड़ोसी देशो के प्रमुखों को बुलाया गया लेकिन इमरान खान को ठेंगा दिखा दिया जबकि 2014 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ आमंत्रित थे। इमरान खान द्वारा फोन पर दी गई बधाई के दौरान भी श्री मोदी ने उनसे दो टूक कहा कि जब तक उनका देश आतंकवाद को पालता - पोसता रहेगा तब तक रिश्ते सामान्य होने की बात भूल जाओ। उसके बाद आ गया बिश्केक सम्मलेन जिसमें ये उम्मीद लगाई जा रही थी कि आपसी सम्बन्ध सुधारने पर विचार होगा लेकिन पहले श्री मोदी द्वारा पकिस्तान के वायु क्षेत्र के उपयोग से मनाही और फिर बिश्केक में इमरान खान की पूरी तरह से अनदेखी कर देना इस बात का संकेत है कि श्री मोदी दूसरी पारी में पाकिस्तान के प्रति वैसी सौजन्यता दिखाने की गलती नहीं करेंगे जैसी उन्होंने पिछले कार्यकाल में की थी। उल्लेखनीय है अपनी विदेश यात्रा के दौरान काबुल से वे बिना किसी औपचारिक आमंत्रण अथवा पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के नवाज शरीफ  को जन्मदिन की बधाई देने सीधे लाहौर पहुंच गये और उनके परिवार में चल रहे विवाह कार्यक्रम में भी शामिल हुए। पहले - पहल तो उसे एक बड़ा कूटनीतिक कदम माना गया जिसकी पूरी दुनिया में तारीफ  हुई लेकिन बाद में हुए कुछ आतंकवादी हमलों के बाद उस यात्रा को लेकर प्रधानमन्त्री को काफी आलोचनाएं झेलनी पडीं। उसे स्व. अटलबिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा के बाद हुए कारगिल हमले की पुनरावृत्ति बताते हुए श्री मोदी को विदेश नीति का नौसिखिया तक कहा गया। यद्यपि दुनिया की बड़ी ताकतों के साथ रिश्ते मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री ने प्रशंसा भी खूब बटोरी लेकिन पुलवामा के बाद उनके 56 इंची सीने के दावे का मखौल भी खूब उड़ा। हो सकता है उसी से बचने के लिए उन्होंने बालाकोट जैसा कारनामा रचा हो लेकिन कश्मीर में आतंकवादियों के लगातार सफाये के बावजूद मोदी सरकार पाकिस्तान को पूरी तरह सुधार नहीं सकी ये कहना गलत नहीं होगा। बलूचिस्तान की आज़ादी का समर्थन भी उतना खुलकर नहीं किया जा सका जितना अपेक्षित था। शायद यही वजह रही होगी कि दूसरे कार्यकाल की शुरुवात से ही श्री मोदी पाकिस्तान को लेकर बेहद सतर्क हैं और बीते कुछ दिनों से इस्लामाबाद से बातचीत की जितनी भी कोशिशें हुईं उनको नजरअंदाज कर दिया गया। बिश्केक में इमरान खान की उपेक्षा के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जब श्री मोदी के साथ एकांत में वार्ता के दौरान पाकिस्तान से रिश्ते सामान्य करने का मुद्दा छेड़ा तब भी प्रधानमन्त्री ने उन्हें बिना किसी लिहाज के कह दिया कि आतंकवाद के चलते वैसा नामुमकिन है। बिश्केक में श्री मोदी रूस के राष्ट्रपति पुतिन सहित अन्य राष्ट्राध्यक्षों से तो बेहद गर्मजोशी की साथ मिले लेकिन इमरान खान से दुआ सलाम तक नहीं किया। हो सकता है कूटनीतिक शिष्टाचार के तहत दिखावे के तौर पर दोनों नेताओं के बीच रस्म अदायगी हो भी जाए लेकिन अभी तक जो संकेत  मिले हैं उनसे लगता है इस बार श्री मोदी पाकिस्तान को लेकर तात्कालिक उपायों की बजाय दूरगामी नीति पर चलना चाहते हैं। पिछली पारी में वे पकिस्तान को कूटनीतिक मोर्चे पर विश्व बिरादरी में अलग - थलग करने के साथ ही सैन्य क्षेत्र में भी करारी मात दे चुके हैं। यहाँ तक कि अनेक मामलों में चीन तक को अपने पक्के दोस्त की सहायता करने में आगे - पीछे होना पडा। हाफिज सईद को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के बारे में चीन ने खूब अड़ंगे लगाये लेकिन अंतत: उसे झुकना पड़ा। वैसे भी दूसरी बार सत्ता सँभालने के बाद श्री मोदी का आत्मविश्वास चरम पर है। कूटनीतिक मोर्चे पर किसी राष्ट्रप्रमुख की दृढ़ता उसके साथ जुड़े जनसमर्थन पर निर्भर होती है। श्री मोदी इस बारे में काफी भाग्यवान हैं। बिश्केक सम्मलेन में वार्ता की टेबिल पर उनके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का बैठा होना भी पकिस्तान को एक संकेत हैं। उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देना भी शायद कूटनीतिक कार्ययोजना का हिस्सा कहा जा सकता है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 13 June 2019

म.प्र. में बिजली संकट : बहाने गले नहीं उतर रहे

मप्र में इन दिनों बिजली संकट जनचर्चा का विषय है। कमलनाथ सरकार के सत्ता में आते ही अघोषित बिजली कटौती की स्थिति बनी तब ये माना गया कि नई-नई सरकार को स्थितियां समझने में थोड़ा वक्त लगेगा। श्री नाथ वैसे भी मप्र के राज्य विद्युतA मंडल में काफी रूचि लेते रहे हैं। दिग्विजय सिंह के दस वर्षीय कार्यकाल में ये कहा जाता था कि भोपाल स्थित मंत्रालय वल्लभ भवन में दिग्विजय का शासन चलता है लेकिन विद्युत मंडल का जबलपुर स्थित मुख्यालय शक्तिभवन कमलनाथ की सल्तनत है जिन्हें श्री सिंह अपना बड़ा भाई मानते थे। उस दौर में राज्य विद्युत संकट में बुरी तरह फंस गया। दिग्विजय सरकार के पतन की बड़ी वजहों में से एक बिजली की किल्लत भी थी। भाजपा ने उसे इनवर्टर/जनरेटर युग का नाम दिया था। उसके बाद आई भाजपा की सरकारों में शिवराज सिंह चौहान ने 12 वर्ष से भी ज्यादा राज किया और ये कहना गलत नहीं होगा चाहे बाहर से खरीदी गई हो या फिर राज्य में ही उत्पादित की गई लेकिन भाजपा के 15 साल के शासन में बिजली की आपूर्ति बहुत संतोषजनक रही। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के फीडर अलग करने का भी बड़ा लाभ हुआ। घरों को भरपूर निर्बाध विद्युत आपूर्ति होने से ग्रामीण इलाकों में भी रातों का अन्धेरा दूर हुआ। हालाँकि शिवराज सरकार पर महंगी दरों पर निजी कंपनियों से बिजली खरीदने के आरोप भी खूब लगे किन्तु आम जनता के नजरिये से देखें तो भाजपा के डेढ़ दशक के शासनकाल में मप्र का बिजली संकट हल हो गया था। ऐसे में जब कमलनाथ सरकार के आते ही बिजली की आंख मिचौनी शुरू हुई तब लोगों ने दिग्विजय सिंह के शासनकाल की याद करते हुए कांग्रेस पर तंज कसना शुरू कर दिया जो सामान्य तौर पर गलत भी नहीं कहा जा सकता। इस अप्रत्याशित हमले से प्रदेश सरकार हतप्रभ रह गई। उसे समझ में नहीं आया कि आत्मनिर्भरता के बावजूद बिजली की किल्लत का कारण क्या है? लोकसभा चुनाव यद्यपि राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा गया किन्तु भाजपा ने बिजली कटौती का उल्लेख करते हुए मतदाताओं को कांग्रेस से नाराज होने के लिए प्रेरित किया जिसका असर भी नजर आया। तमाम चुनाव सर्वेक्षण मप्र में भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान तो लगा रहे थे लेकिन नतीजों ने कांग्रेस को पूरी तरह साफ कर दिया। चुनाव के पहले राज्य सरकार ने बिजली विभाग के तमाम अधिकारियों और कर्मचारियों को इसके लिए दोषी मानते हुए निलम्बित भी किया। लेकिन उससे भी हालात नहीं सुधरे तब ये प्रचारित करना शुरू किया गया कि भाजपा सुनियोजित तरीके से बिजली संकट उत्पन्न कर जनता के मन में कांग्रेस के प्रति नाराजगी बढ़ाने में जुटी है। गत दिवस विद्युत मंडल के जबलपुर स्थित मुख्यालय में हुई एक बड़ी बैठक में कांग्रेस के कतिपय विधायक यहाँ तक कहते सुने गए कि भाजपा कार्यकर्ता बिजली के तारों पर लंगर डालकर आपूर्ति बाधित कर रहे हैं। बिजली विभाग में भाजपा समर्थक अमले की बहुलता को भी बिजली संकट की वजह प्रचारित करने में राज्य सरकार और कांग्रेस लगी हुई है। दूसरी ओर लोकसभा चुनाव से फुर्सत पाते ही बजाय आराम करने के भीषण गर्मी से झुलस रहे लोगों की मुसीबतें बढ़ा रहे बिजली संकट के विरोध में भाजपा ने प्रदेशव्यापी आन्दोलन भी शुरू कर दिया। मानसून में विलम्ब होने से अभी बिजली की मांग कम से कम जून के अंत तक चरमोत्कर्ष पर रहेगी। ऐसे में कमलनाथ सरकार के प्रति जनता की नाराजगी बढऩा स्वाभाविक है। बरसात के बाद प्रदेश में नगर निगम चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस के लिए इनमें जीतना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि लोकसभा के बाद अगर नगर निगम चुनाव में भी उसका खराब प्रदर्शन रहा तब विधानसभा चुनाव की जीत वाकई तुक्का साबित हो जायेगी। कमलनाथ सरकार बने हुए छह माह होने जा रहे हैं लेकिन अभी भी वह पूरी तरह से शासन-प्रशासन पर अपनी पकड़ नहीं बना पा रही। सिवाय स्थानान्तरण के ऐसा कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं है जिसे बताया जा सके और उसमें भी दिल्ली से दौलताबाद वाली कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। जिस तेजी से स्थानान्तरण होते हैं उसी तेजी से रद्द भी किये जा रहे हैं। वरिष्ठ अधिकारियों को महत्वहीन पदों पर भेजा जाता है और हल्ला मचने पर भूल सुधारी जाती है। सही कहें तो स्थानान्तरण को लेकर कमलनाथ सरकार की छवि बंदर के हाथ में उस्तरा आने जैसी बन गई है। जहाँ तक विद्युत संकट की बात है तो जब सरकार ये मान रही है कि उसकी कमी नहीं है तब प्रदेश की जनता भीषण गर्मी में भी उससे वंचित क्यों रखी जा रही है ये बड़ा सवाल है। ऐसे में राज्य सरकार भाजपा समर्थक कार्मचारियों के मत्थे दोष मढ़कर बरी नहीं हो सकती। लोकसभा चुनाव हुए भी तीन सप्ताह बीत चुके हैं। इतने दिनों में राज्य सरकार को समस्या की तह तक पहुंचकर समाधान तलाश लेना चाहिए था। लेकिन वह भाजपा को कठघरे में खड़ा करने की मूर्खता दोहरा रही है। वैसे सही बात ये है कि विद्युत मंडल का सत्यानाश करने का काम कांग्रेस के शासनकाल में ही हुआ था। शिवराज सिंह ने उसे किस तरह ठीक-ठाक रखा ये तो वे ही बता सकेंगे लेकिन कमलनाथ के आते ही बिजली की गाड़ी जिस तरह पटरी से उतरी वह चौंकाने वाला है। फिलहाल तो कांग्रेस और कमलनाथ दोनों नाच न आवे आँगन टेढ़ा का उदाहरण बने हुए हैं जिसका लाभ लेकर भाजपा जनमानस में ये बात बिठाने में सफल होती दिख रही है कि विधानसभा चुनाव में शिवराज सरकार को हरवाना उसकी भूल थी।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 12 June 2019

विजयवर्गीय का बड़बोलापन पार्टी के लिए नुकसानदेह

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अत्यंत वरिष्ठ और अनुभवी नेता हैं। मप्र की राजनीति में लम्बा समय गुजारने के बाद वे राष्ट्रीय राजनीति में उतरे और बंगाल के प्रभारी बनकर पार्टी को चमत्कारिक सफलता दिलवाई। इन्दौर को विकास की ऊँचाइयों पर ले जाने में श्री विजयवर्गीय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रदेश शासन में बतौर मंत्री भी वे काफी प्रभावशाली रहे और अक्सर मुख्यमंत्री के लिए उनके नाम की चर्चा भी होती रही। लेकिन कभी-कभी वे ऐसा कुछ बोल जाते हैं जो उनके सियासी कद के लिहाज से बेहद गैर जिम्मेदाराना लगता है। गत दिवस इन्दौर की एक रैली में उन्होंने कह दिया कि दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुरेश पचौरी के लोग उन्हें फोन करके कमलनाथ सरकार गिराने के लिए कहते हैं। राजनीति में विभिन्न दलों के लोगों के बीच तरह-तरह की बातीं होती रहती हैं। वैसे भी आज के दौर में किसी नेता का कोई ईमान धरम नहीं बचा है। कौन, कब पाला बदल ले इसका अनुमान लगाना कठिन है। लेकिन एक परिपक्व नेता से ये आशा रहती है कि वह सार्वजानिक रूप से कुछ भी बोलने के पहले उसके निहितार्थ को समझे। श्री विजयवर्गीय ने ये दावा भी किया कि वे चाहें तो कभी भी प्रदेश सरकार गिरा सकते हैं। यदि उनकी ये बात मान भी लें कि प्रदेश कांग्रेस के कतिपय वरिष्ठ नेताओं से जुड़े लोग उनसे कमलनाथ सरकार को गिराने की गुजारिश कर रहे हैं तब भी एक वरिष्ठ नेता की तरह उनका ये फर्ज था कि वे उस बात को गोपनीय रखते। उनके सार्वजनिक बयान के बाद कांग्रेस उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए उन लोगों का नाम बताने को कहे तब श्री विजयवर्गीय क्या करेंगे? लगता है वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा चुनाव के दौरान बंगाल में दिए उस बयान की नकल करना चाह रहे हैं जिसके अनुसार तृणमूल के 40 विधायक भाजपा के संपर्क में होने का दावा किया गया था। लेकिन वहां तो ममता बैनर्जी के दो चार विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में आ भी गये जबकि मप्र में कांग्रेस तो क्या उसे बाहर से समर्थन दे रहे सपा-बसपा और निर्दलीय विधायक तक भाजपा की तरफ  देखने का संकेत तक नहीं दे रहे। उस दृष्टि से श्री विजयवर्गीय का बयान सिवाय आत्मप्रशंसा के और कुछ भी नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा भी अनेक भाजपा नेता आये दिन इस तरह की बयानबाजी करते रहते हैं। राजनीतिक दांवपेंच के अनुसार ऐसा करके वे कमलनाथ सरकार पर मनोवैज्ञानिक दबाव जरुर बना देते हैं लेकिन केवल हवा में ल_ घुमाते रहने से भाजपा की विश्वसनीयता भी कम होती है। मप्र में कांग्रेस की सरकार निश्चित रूप से बैसाखियों पर है। मुख्यमंत्री बनने के पहले कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता थे लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद उनका कद एक झटके में घट गया। पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता उनसे भन्नाए हुए हैं क्योंकि वे सभी तो हार गये लेकिन मुख्यमंत्री अपने पुत्र को जितवा लाये। खबर ये भी है कि मंत्रीमंडल की बैठकों में भी गुटीय मतभेद उभरकर सामने आने लगे हैं। बावजूद इसके सरकार गिराने की पहल पार्टी के भीतर से होने का कोई संकेत दूरदराज तक नहीं दिख रहा। इसकी एक वजह ये है कि 15 वर्ष तक सत्ता से वंचित रहे कांग्रेस विधायक और शेष नेता नहीं चाहेंगे कि वे फिर से सड़क पर आ जाएँ। ये देखते हुए श्री विजयवर्गीय का बयान अनावश्यक और अविश्वसनीय ही लगता है। हो सकता है भाजपा कार्यकर्ताओं को खुश करने के लिए उन्होंने बड़बोलापन दिखाया हो लेकिन ऐसा करने से उनकी अपनी प्रतिष्ठा घटती है। बेहतर हो भाजपा विपक्ष की भूमिका का निर्वहन अच्छे से करे। ये कहना गलत नहीं होगा कि सत्ता सुन्दरी के लम्बे सान्निध्य ने भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को सुविधाभोगी बना दिया है। मप्र में कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खन्डेलवाल और नारायण प्रसाद गुप्ता जैसे नेताओं ने अपना समूचा जीवन पार्टी को खड़ा करने में खफा दिया लेकिन आज के भाजपा नेता चाहे वे रास्वसंघ से आये हुए संगठन मंत्री ही क्यों न हों उन नींव के पत्थरों के विपरीत विलासितापूर्ण जीवनशैली के अभ्यस्त हो चले हैं। पार्टी के कार्यालय बेहद आधुनिक और आरामदेह बन गये हैं। इसके कारण नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद और सम्बन्ध कमजोर होता जा रहा है। तपे-तपाये ध्येयनिष्ठ लोगों की जगह अवसरवादी और व्यापारिक किस्म के लोगों ने ले ली है। भाजपा, दावा कितने भी करे और उसके सिद्धांत कितने भी अच्छे हों लेकिन सत्ता प्राप्त करने और उसमें बने रहने के लिए वह भी अन्य राजनीतिक दलों की तरह ही आचरण करती है। चूँकि नैतिकता से किसी भी दल का कोई वास्ता नहीं है इसलिए भाजपा के दोष भी छिप जाते हैं। लेकिन श्री विजयवर्गीय जैसे नेताओं द्वारा समय-समय पर दिए जाने वाले अंट-शंट बयानों से पार्टी के उन समर्थकों को दु:ख होता है जो उसकी नीतियों से आकर्षित होकर प्रशंसक बने। मप्र की सरकार अपनी विसंगतियों और अंतर्निहित विरोधाभासों की वजह से गिर जाए तब भाजपा का सत्ता में आने का दावा स्वाभाविक रूप से मजबूत होगा लेकिन सरकार को गिराने के अनुचित प्रयास हुए तब ये मानकर चलना चाहिए कि भाजपा की प्रतिष्ठा गिरेगी। बेहतर हो भाजपा हाईकमान श्री विजयवर्गीय और उन जैसे ही दूसरे बड़बोले नेताओं पर लगाम लगाये जो अपनी शान बघारने के फेर में पार्टी को शर्मसार किया करते हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी