Thursday, 5 September 2019

कश्मीर : भारतीय जनमत का दबाव काम आया

जम्मू कश्मीर संबंधी ऐतिहासिक फैसला हुए एक माह बीत गया। इस दौरान वहां लगे प्रतिबंधों के कारण विस्तृत खबरें तो नहीं आ पाईं लेकिन जो कुछ भी छन - छनकर बाहर आ सका उसके अनुसार ऐसी एक भी अलगाववादी या आतंकवादी घटना नहीं हुई जिससे ये लगता कि कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाये जाने के साथ ही राज्य को दो टुकड़ों में बांटें जाने के विरोध में जनता मरने - मरने पर उतारू हो गयी हो। इसके पहले जब भी कभी घाटी में कफ्र्यू लगा तब वहां के लोगों ने उस दौरान भी उपद्रव करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सुरक्षा बलों पर हमले भी होते रहे। सड़कों पर निषेधाज्ञा तोडऩा और आगजनी भी साधारण बात थी। सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में लोग मारे भी जाते थे। बुरहान बानी के मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी के अनेक जिलों में कई महीनों तक कफ्र्यू लगा रहा था। हालात पूरी तरह बेकाबू थे। कई बार तो ऐसा लगा कि घाटी हाथ से निकल जायेगी। बीते 5 और 6 अगस्त को जब संसद ने जम्मू कश्मीर को लेकर अप्रत्याशित फैसला लिया तब एक बड़े वर्ग ने ये आशंका जताई थी कि मोदी सरकार ने बर्र के छत्ते में पत्थर मार दिया। जिस तरह से कांग्रेस सहित वामपंथियों के अलावा देश के अनेक विधि विशेषज्ञों तक ने केंद्र सरकार के निर्णय की वैधानिकता पर सवाल उठाये उससे ये संदेह होने लगा कि कहीं नतीजा उलटा न हो जाए। सरकार के सहयोगी जनता दल (यू ) ने भी सैद्धान्तिक विरोध दर्ज करवा दिया। प्रारंभिक जो भी प्रतिक्रियाएं कश्मीर घाटी से आईं वे सभी गुस्से भरी थीं जिन्हें सुन और पढ़कर ये संदेह और पुख्ता होने लगा कि आग से खेलने के प्रयास में मोदी सरकार अपने हाथ जला बैठेगी। बीबीसी जैसे चैनलों ने ऐसी अनेक खबरें प्रसारित कीं जिनसे ये एहसास फैला जैसे घाटी के अंदर भारत के विरुद्ध बगावत के आसार हैं। लेकिन एक महीना बीत जाने के बाद ये कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार द्वारा की गई मोर्चेबंदी पूरी तरह से सफल रही। अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले नेताओं की गिरफ्तारी के साथ ही राजनीतिक पार्टियों के कर्ताधर्ता भी नजरबंद कर दिए गए। इसका परिणाम ये हुआ कि पैसा लेकर भारत विरोधी नारे लगाने और सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वाले पेशेवर युवक/युवतियां घर बैठ गए। फोन , मोबाईल और इंटरनेट पर प्रतिबन्ध लगाये जाने से घाटी के भीतर रह रह लोगों के अलावा बाहर बसे उनके परिजनों को भारी दिक्क्तें हुईं किन्तु उसका लाभ ये हुआ कि उपद्रव करने वालों के संपर्क सूत्र टूट गए। इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया गया तथा मानवाधिकार की भी खूब माला जपी गई लेकिन न्यायालय ने सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए सरकार को और समय दिए जाने की बात कहकर विघ्नसंतोषियों को निराश किया। सबसे बड़ी बात ये हुई कि भारत सरकार विश्व जनमत को अपने पक्ष में करने में कामयाब हो गयी जिससे पाकिस्तान की हिम्मत भी टूटने लगी। जिसका असर घुसपैठ रुकने की तौर पर भी सामने आया। यद्यपि बौखलाहट में सीमा पर उसका हमलावर रुख जारी है लेकिन भारत की सेना भी दोगुनी ताकत से जवाब देने में जुटी है। विश्व बिरादरी में पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ जाने के कारण भी घाटी में बैठे अलगाववादी संगठनों का हौसला पस्त हो गया। विपक्षी नेताओं द्वारा वहां जाकर हालात का जायजा लेने के जो प्रयास किये उन्हें केंद्र सरकार ने सख्ती से रोककर बुद्धिमत्ता दिखाई वरना वे घाटी में बैठे भारत विरोधी तत्वों के दर्द का बखान कर देश का माहौल खराब ही करते। भले ही घाटी में कफ्र्यू के हालात हों लेकिन लोगों के खाने-पीने जैसी व्यवस्थाएं सरकार की तरफ से हो रही हैं। अभी तक एक भी जान इस दौरान न आतंकवादियों के कारण गयी और न ही सुरक्षा बलों की कार्रवाई में। कुल मिलाकर एक माह बाद जो भी जानकारी आई है उसके अनुसार जम्मू और लद्दाख में तो पूरी तरह से स्थिति सामान्य है लेकिन कश्मीर घाटी में अभी देर लगेगी। और उसके लिए जल्दबाजी भी नहीं करनी चाहिए क्योंकि मर्ज जितना पुराना होता है दवा का असर भी उतनी ही देर से होता है। और फिर दवाई कड़वी हो तब तो कठिनाई और भी बढ़ जाती है। लेकिन केंद्र सरकार ने जिस तरह की इच्छा शक्ति इस दौरान प्रदर्शित की वह आगे भी जारी रहनी चाहिए क्योंकि हताशा में आतंकवादी संगठन और उनका सरपरस्त पाकिस्तान मरता क्या न करता वाली मन:स्थिति के वशीभूत होकर किसी भी हद तक जा सकता है। सबसे बड़ी बात जो हुई वह पूरे देश में केंद्र सरकार को मिला अभूतपूर्व जनसमर्थन है। कश्मीर घाटी में भी किसी न किसी तरह से ये खबर तो पहुँची ही होगी कि पूरा भारत इस मसले पर एकजुट खड़ा है। यदि ऐसा नहीं होता तब अलगाववादी तो सिर उठाते ही विपक्षी दल भी सरकार की नींद हराम कर देते। सरकार के साहसिक कदम को मिली जनता की सकारात्मक स्वीकृति के कारण ही समूची दुनिया ने भारत के समर्थन का फैसला लिया क्योंकि भारत के 130 करोड़ लोगों की राय भी विश्व जनमत को प्रभावित रखने की ताकत रखती हैं। इस प्रकार एक माह के दौरान घाटी में व्याप्त शांति भले ही सुरक्षा बलों की भारी-भरकम तैनाती के कारण ही क्यों न हो । कहने वाले कुछ भी कहते रहें लेकिन कश्मीर समस्या का इसके अलावा और इससे बेहतर हल और कोई हो ही नहीं सकता था।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 4 September 2019

मोटर व्हीकल एक्ट : व्यवहारिक सुधार जरूरी

देश के अधिकतर पुलिस थानों के परिसरों में पुराने वाहनों का ढेर नजर आता है। इनमें दुर्घटना के बाद जप्त हुए वाहनों के अलावा लावारिस भी होते हैं। आने वाले दिनों में इनकी भीड़ में बेतहाशा वृद्धि होने वाली है। नये मोटर व्हीकल एक्ट के लागू होने के बाद जुर्माने की राशि में की गयी आसमानी वृद्धि की वजह से पुराने दोपहिया वाहन चलाने वाले पकड़े जाने पर जुर्माने की राशि की बजाय वाहन जप्त करवाना पसंद करेंगे। इसका प्रमाण गत दिवस गुडग़ांव में देखने मिला जहां एक स्कूटी चालक के पास न तो जरूरी कागजात थे और न ही वह उक्त कानून के बाकी प्रावधानों का पालन कर रहा था। पकड़े जाने पर पुलिस वालों ने उसका 23 हजार का चालान बना दिया। इस पर वह हाथ जोड़कर बोला कि उसका वाहन ही 15 हजार से ज्यादा का नहीं है तब 23 हजार का जुर्माना वह कैसे चुकाएगा? पुलिस ने उसे थाने आकर कागजात दिखाने पर जुर्माना कम करने का आश्वासन भी दिया और स्कूटी जप्त कर ली। ऐसे किस्से अब रोज सुनाई दे सकते हैं क्योंकि देश में लाखों ऐसे लोग होंगे जिनके वाहनों का पंजीयन, बीमा, नम्बर प्लेट सभी गायब होंगे। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने जिस नये कनून को संसद से पारित करवाया उसका उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के साथ ही वाहन चालकों को कानून का पालन करने के लिए प्रेरित कर यातायात सुधारना है। जैसा उन्होंने संसद में कहा उसके अनुसार विभिन्न राज्यों के परिवहन मंत्रियों की समिति द्वारा की गयी सिफारिशों और उसके आधार पर हुई लम्बी कवायद के बाद उक्त क़ानून का मसौदा तैयार हुआ जिसमें यातायात संबंधी नियम तोडऩे पर भारी जुर्माने और सजा तक का प्रावधान किया गया। प्रारम्भ में तो कोई कुछ समझ नहीं पाया लेकिन जब कानून अस्तित्व में आने के बाद अमल में आया तब हाय तौबा मचने लगी। गुडग़ांव की तरह से ही कुछ और जगहों से भी मिलती-जुलती खबरें आई हैं। मप्र, छतीसगढ़ और बंगाल ने इस कानून को लागू करने से इंकार कर दिया वहीं राजस्थान जुर्माने की राशि कम करने के लिए कानूनी रास्ता निकाल रहा है। उधर सोशल मीडिया पर इस कानून का विरोध करते हुए तीखे कटाक्ष होने लगे। कुछ लोग इसे पुलिस वालों का आठवां वेतन आयोग तक बताने से नहीं चूके। ये तर्क भी दिया जा रहा है कि रेल गाड़ी के साधारण श्रेणी के डिब्बे में निर्धारित संख्या से कई गुनी सवारियां भरी होने पर भी चालान होना चाहिए। और भी मजाकनुमा टिप्पणियाँ सुनने और पढऩे मिल रही हैं। सड़कों के गड्ढे दिखाकर पूछा जा रहा है कि रोड टैक्स वसूलने के बाद भी खस्ता सड़कें क्या दंडनीय नहीं होना चाहिए। सवाल और भी हैं लेकिन उन पर सरकार खामोश है। चूंकि आम जनता के पास अपनी बात कहने का कोई संगठित माध्यम नहीं है इसलिए उसके सामने पुलिस वालों का रौब सहते हुए भारी-भरकम जुर्माना भरने या फिर वर्दी वालों की जेब गर्म करने के बाद पिंड छुड़ाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बच रहता। नया कानून लागू होने के पहले भी ये सब होता था लेकिन जुर्माने की रकम कम होने से बहुत से लोग बाकायदा उसे चुकाते थे। लेकिन जब बात 20 और 25 तो क्या 2 और 5 हजार तक भी पहुँच जाए तब अच्छे-अच्छे को सोचना पड़ेगा कि वह कानून के मुताबिक अर्थदंड भरे या ले देकर बचता हुआ निकल जाए। नितिन गडकरी वैसे तो बहुत ही व्यवहारिक और होशियार व्यक्ति हैं। मोदी सरकार के सबसे सक्षम और सफल मंत्रियों में उनकी गिनती होती है। लक्ष्य बनाकर उसे समय में पूरा करने का उनका जुनून काबिले तारीफ है। सड़क दुर्घटनाओं में प्रति वर्ष होने वाली मौतों पर वे सदैव सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त करते रहे हैं। नया मोटर व्हीकल एक्ट बनाने के पीछे भी उनकी सोच बहुत ही स्पष्ट है। यातायात नियमों का सख्ती से पालन करवाने की जरूरत सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति महसूस करता है लेकिन जब बात खुद पर आती है तब उसे वह सब ज्यादती लगती है। मसलन हेलमेट लगाने का आदेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी किये जाने के बाद भी उसका पालन कितने लोग करते हैं ये बताने की जरूरत नहीं है। यातायात सिग्नलों पर रुकने को कुछ लोग अपनी प्रतिष्ठा के विरुद्ध समझते हैं। वाहन के कागजात मांगने पर पुलिस वाले को वर्दी उतरवाने की धौंस देने वालों का भी एक बड़ा वर्ग समाज में है। टोल नाकों पर होने वाली मारपीट की घटनाओं में ज्यादातर में नामचीन हस्तियों की भागीदारी ही होती है। ऐसे में श्री गडकरी द्वारा लाये गये नए कानून की मूल भावना भले ही कितनी भी अच्छी क्यों न हो लेकिन उसका व्यवाहरिक पक्ष बेहद कमजोर है। भारत जैसे देश में जहां निम्न आय वर्ग के लोग भी दोपहिया वाहन का उपयोग करने लगे हैं तब बतौर जुर्माना 20-25 हजार की रकम अकल्पनीय और असहनीय बोझ लगती है। हालाँकि ये भी सही है कि कानून के पालन के प्रति सख्ती होनी चाहिए। नाबालिग बच्चों को वाहन देने वाले अभिभावकों में दायित्व बोध जगाना भी जरूरी है लेकिन श्री गडकरी को ये भी समझना चाहिए कि जुर्माने की भारी दरें पुलिस वालों की कमाई में वृद्धि का साधन बने बिना नहीं रहेंगीं। यातायात व्यवस्थित और सुरक्षित हो, सड़क दुर्घटनाओं पर रोक लगे और लोगों में कानून का पालन करने का आत्मप्रेरित भाव हो, ये हर कोई चाहता है लेकिन नया मोटर व्हीकल एक्ट सैद्धांतिक तौर पर स्वागतयोग्य होने के बाद भी व्यवहारिक स्तर पर विसंगतियों से भरा है। बेहतर होगा श्री गडकरी उसकी समीक्षा करते हुए उसमें इस तरह के संशोधन लाएं जिनसे कि वह सरल, सहज और भ्रष्टाचार को रोकने में सहायक साबित हो वरना उसका हश्र भी हेलमेट जैसा होकर रह जाएगा।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 September 2019

वैदिक और पौराणिक प्रमाणों को नकारना गलत

राम जन्मभूमि मामले पर सर्वोच्च न्यायालय में हो रही सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने गत दिवस जो तर्क  दिए उनके मुताबिक तो मंदिर सम्बन्धी ऐतिहासिक और पौराणिक प्रमाणों का कोई महत्व ही नहीं है। बकौल श्री धवन आधुनिक न्यायिक व्यवस्था 1858 से प्रारंभ हुई इसलिये इस मामले में वैदिक संदर्भों को प्रमाण नहीं माना जा सकता। यही नहीं उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि विवादित स्थल पर हुई खुदाई के दौरान मिली कमल और मोर की आकृतियों से वहां राम मन्दिर होने की पुष्टि नहीं की जा सकती। पौराणिक काल में मन्दिर और मूर्ति पूजा को लेकर भी श्री धवन ने शंका व्यक्त की। यहाँ तक कि हिन्दुओं की तरफ  से बहस करने वालों को वे नौसिखिया इतिहासकार बताने तक से नहीं चूके। कुल मिलाकर उनका दावा है कि जो भी तर्क पेश करने हैं वे 1858 के बाद के होने चाहिए, जबसे आधुनिक न्यायिक व्यवस्था लागू हुई। उनका पूरा जोर इस बात पर था कि राम जन्मभूमि सम्बन्धी विवाद का आधार केवल भूस्वामित्व का दीवानी मुकदमा है और इस बारे में किसी भी तरह की धार्मिक और पौराणिक अवधारणाओं की कोई भी प्रासंगिकता नहीं है। उनकी तमाम दलीलों का निचोड़ ये है कि वहां खड़ा ढांचा मस्जिद ही थी जिसमें 1934 में तोडफ़ोड़ हुई, 1949 में मूर्तियाँ रखकर घुसपैठ हुई और 1992 में उसे ढहा दिया गया। इस तरह मुस्लिम पक्ष की ओर से जमीन के दावे को ही आधार बनाया गया जबकि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा भी कि उन्हें पहले बहस कर चुके पक्षों द्वारा प्रस्तुत किये गए ऐतिहासिक दस्तावेज और साक्ष्यों को भी आधार बनाना होगा। इस प्रकार एक बात स्पष्ट हो गई कि मुस्लिम पक्ष मामले को जमीन के कब्जे तक सीमित रखना चाहता है क्योंकि बात यदि पौराणिक प्रमाणों तक गई तब उसका दावा कमजोर पड़ जाएगा। इस बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि शिया मुस्लिमों ने विवादित भूमि पर अपना कब्जा बताते हुए उसे हिन्दुओं को देने की सहमति सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दे दी है। उसका कहना है कि बाबर और मीर बाकी नामक जिस व्यक्ति ने कथित मस्जिद का निर्माण करवाया दोनों शिया थे लिहाजा वह शिया मुसलमानों की संपत्ति थी जिस पर सुन्नी पक्ष ने अपना नाम कालान्तर में चढ़वा लिया। यदि भूस्वामित्व को ही अदालत आधारभूत मुद्दा माने तब भी ये तो कहा ही जाएगा कि शियाओं का दावा भी विचारयोग्य है और यदि उनकी बात सही साबित होती है तब तो हिन्दुओं के पक्ष में फैसला लेते न्यायालय को परेशानी नहीं होगी क्योंकि शियाओं ने हिन्दुओं को भूमि देने की बात स्वीकार कर ली है। संभवत: श्री धवन समझ गये हैं कि विवादित भूमि पर प्राचीन मंदिर होने की बात को वे नकार नहीं सकते और इसीलिये वे 1858 के बाद की माला जप रहे हैं। भले ही सभी पक्ष अदालत के फैसले को मानने की हामी भर चुके हों लेकिन क्या इस तरह के तर्कों से देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं की भावनाएं आहत नहीं होतीं जिनमें कहा जा रहा है कि 1858 से लागू आधुनिक न्यायिक व्यवस्था के बाद की स्थिति को ही आधार माना जाना चाहिए। यदि ऐसा हुआ तब तो भगवान राम और हिंदुओं की प्राचीन संस्कृति की प्रामाणिकता पर भी वैसे ही सवाल उठाये जाने लगेंगे जैसे बरसों पहले द्रमुक नेता स्व. करूणानिधि ने राम सेतु को लेकर उठाये थे और सेतु समुद्रम परियोजना लागू करने के लिए उसे तोडऩे की साजिश रची थी। श्री धवन अपने पक्षकार की पैरवी करते हुए हिन्दुओं के वकीलों को नौसिखिया इतिहासकार कहकर भले ही उनका मखौल उड़ायें लेकिन वे पौराणिक तथ्यों और प्रमाणों को पूरी तरह नकार दें ये सही सोच नहीं है। आधुनिक न्यायिक व्यवस्था 1858 में चाहे अस्तित्व में आई हो लेकिन उसके पहले भी भारत और उसकी संस्कृति थी और यदि श्री धवन की बात को मान लिया जावे तब तो फिर पुरातत्व जैसे विभागों का औचित्य ही क्या है? कल को कोई वेद, पुराण, गीता, रामायण ही नहीं अपितु कुरान और बाइबिल को भी कपोल कल्पित बताने लगे तो उसकी बात को केवल इसलिए मान लिया जाएगा कि वे सब 1858 से पहले की होने से कानून की नजर में संज्ञान योग्य नहीं हैं। बाबरी ढांचा जब भी बना हो और जिसने भी बनाया हो उससे भी बड़ा सवाल ये है कि अयोध्या और श्री राम का जुड़ाव असंदिग्ध है और इस्लाम को जन्मे अभी 1500 साल भी नहीं हुए। ये बात भी पूरी तरह से सही है कि अयोध्या में बाबरी ढांचा मुगल शासन के भारत में आने के बाद ही बनाया गया था। ये भी प्रमाणित सत्य है कि अयोध्या कभी ही इस्लामिक धार्मिक या शैक्षणिक केंद्र नहीं रहा। यही हाल मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि और वाराणसी के बाबा विश्वनाथ मन्दिर से सटाकर बनई गयी मस्जिद का भी रहा जो तत्कालीन मुगल शासकों ने हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं की उपेक्षा करते हुए बनाईं थी। इसीलिये श्री धवन के तर्क  गले नहीं उतरते। भले ही वे अपने पक्षकार की ओर से वह सब कह रहे हों लेकिन एक सुशिक्षित व्यक्ति प्राचीन इतिहास और पौराणिक काल को पूरी तरह अस्वीकार कर दे, ये बात समझ से परे है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने श्री धवन के तर्कों पर जो टिप्पणी की वह काफी गहरी सोच का प्रमाण है। जिस प्रकरण का सीधा सम्बन्ध एक पौराणिक चरित्र से जुड़ा हो उसे इस तरह सस्ते में उपेक्षित कर देना दिन के समय आँखें बंद करने के बाद सूरज की रोशनी को नकारने जैसा ही बचकानापन नहीं तो और क्या है?

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 September 2019

दिग्विजय का हश्र भी उनके गुरु जैसा हो सकता है

मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को सोशल मीडिया पर अनेक लोग भाजपा का स्टार प्रचारक  बताने से नहीं चूकते। इसका कारण समय-समय पर उनके द्वारा दिए जाने वाले विवादास्पद बयान हैं। गत दिवस वे बोल  गए कि भाजपा और बजरंग दल आईएसआई से पैसा लेते हैं और आईएसआई के लिए जासूसी करने वालों में मुसलमानों से ज्यादा गैर मुसलमान हैं। यद्यपि बाद में उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि मप्र पुलिस द्वारा बजरंग दल और भाजपा की आईटी सेल के कुछ लोगों को जासूसी करते पकड़ा गया था, उनका आशय उससे था। लेकिन तब तक तो जो कुछ होना था वह हो चुका था। दिग्विजय सिंह पर चौतरफा हमले होने लगे।  बहुत लोगों का ये मानना रहा कि उनके इस बयान से कांग्रेस को हमेशा की तरह नुकसान हो गया। ये पहला अवसर नहीं है जब श्री सिंह ने हिन्दू संगठनों के बारे में इस तरह की टिप्पणी करते हुए स्वयं और अपनी पार्टी दोनों को विवाद में फंसाया हो। यही वजह रही है कि उनकी  बातों से कांग्रेस भी पल्ला झाड़ती रही है। वैसे भी राज्यसभा सदस्य होने के अलावा उनके पास पार्टी का कोई महत्वपूर्ण दायित्व नहीं है। लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने की वजह से भी उनकी वजनदारी कम हुई है। दिग्विजय सिंह की सबसे बड़ी पीड़ा मप्र की राजनीति में किनारे की तरफ  सरकना है। भले ही कमलनाथ उनके समर्थन से ज्योतिरादित्य सिंधिया को धकेलकर मुख्यमंत्री बन गए हों लेकिन सरकार के संचालन में श्री सिंह की दखल शुरुवात में भले रही हो लेकिन धीरे-धीरे उसमें कमी आती जा रही है जिससे पूर्व मुख्यमंत्री काफी नाराज हैं। दो दिन पहले ही उनका एक पत्र सार्वजानिक हो गया जिसमें उन्होंने मंत्रियों से समय देने की बात कहते हुए तबादलों के अलावा अन्य विषयों पर उनके द्वारा लिखी गई चि_ियों पर हुई कार्रवाई की जानकारी देने की मांग की थी। कुछ मंत्रियों ने तो उनसे मुलाकात कर उन्हें संतुष्ट कर दिया लेकिन उमंग सिंगार नामक मंत्री ने दिग्विजय सिंह पर पर्दे के पीछे  रहकर सरकार चलाने का आरोप लगाते हुए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि वे कमलनाथ सरकार को अस्थिर करने का प्रयास कर रहे हैं। श्री सिंगार ने कटाक्ष किया कि जब पृष्ठभूमि में रहते हुए श्री  सिंह ही  सरकार चला रहे हैं , तब उन्हें मंत्रियों को पत्र लिखने की क्या जरूरत पड़ गई। श्री सिंगार ने ये आरोप भी लगाया कि दिग्विजय खुद को सत्ता के शक्ति केंद्र के तौर पर स्थापित करने प्रयासरत हैं। ये पहला मौका नहीं है जब उमंग सिंगार ने पूर्व मुख्यमंत्री को लपेटा हो। पूर्व में भी वे ऐसा कर चुके हैं। गौरतलब है कि वे राज्य की दिग्गज आदिवासी कांग्रेस नेता स्व. जमुना देवी के भतीजे हैं और दिग्विजय विरोधी खेमे के माने जाते हैं। उन्होंने ये कहने में भी कोई संकोच नहीं किया कि श्री सिंह अन्य मंत्रियों के विभागों से संबंधित मसले तो उठाते  हैं लेकिन अपने बेटे जयवर्धन सिंह के विभागों पर चुप्पी साध लेते हैं। उल्लेखनीय है मप्र में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद पर कब्जे को लेकर पार्टी के भीतर जबर्दस्त शीतयुद्ध जारी है। कमलनाथ अपना इस्तीफा आलाकमान को दे चुके हैं और  खुलकर कुछ भी नहीं बोल रहे लेकिन दिग्विजय और सिंधिया खेमा खुलकर आमने-सामने है। भोपाल से दिल्ली तक बिसात बिछ रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हाल ही में जो ट्वीट किये उनसे लगा कि वे भी मन ही मन दुखी हैं। राहुल गांधी से निकटता के बावजूद भी उन्हें अब तक मनमाफिक पद नहीं मिल पाया। मुख्यमंत्री की कुर्सी हाथ से आते-आते रह गयी और बची खुची भद्द पिट गयी गुना लोकसभा सीट पर  मिली लम्बी हार से। ऐसे समय जब लोकसभा में कांग्रेस के पास प्रभावशाली वक्ताओं का अभाव हो गया है तब श्री सिंधिया यदि  वहां होते तो निश्चित रूप से लोकसभा में अधीर रंजन चौधरी की जगह पार्टी के नेता बन जाते। ऐसे में अब उनके पास केवल मप्र में प्रदेश अध्यक्ष बनने की गुंजाईश बची है। लेकिन दिग्विजय सिंह उनकी राह में रोड़े ही नहीं बड़ी-बड़ी चट्टानें अड़ाने पर आमादा हैं। परसों उन्होंने 25 वर्ष के नौजवान को प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपने की बात कहकर नई सुरसुरी छोड़ दी जिसका उद्देश्य श्री  सिंधिया को दौड़ से बाहर करना ही था। गत दिवस भाजपा और बजरंग दल को लेकर दिए गये बयान के जरिये उन्होंने कांग्रेस आलाकमान को ये संदेश देने का प्रयास किया है कि भाजपा से वैचारिक स्तर पर लडऩे की क्षमता केवल उनकी ही है। इस समूची कवायद के पीछे उनका असली मकसद क्या है इसे लेकर भी अलाग-अलग चर्चाएँ हैं। ये मानने वाले भी कम नहीं हैं कि वे स्वयं प्रदेश अध्यक्ष बनना चाह रहे हैं लेकिन अंदरखाने की खबर ये है कि कमलनाथ एक बार श्री सिंधिया को तो सहन कर लेंगे लेकिन वे भी नहीं चाहते कि दिग्विजय किसी भी तरह से ताकतवर हों। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि दिग्विजय सिंह की तमाम बयानबाजी प्रासंगिक बने रहने के लिए ही की जाती है। उनकी राजनीति अब कांग्रेस में भी उतनी पसंद नहीं की जाती जिसे देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि यदि वे इसी तरह से व्यवहार करते रहे तब उनका हश्र भी उनके राजनीतिक गुरु स्व.अर्जुन सिंह जैसा होकर रह जाएगा जिन्हें जीवन के आखिरी दौर में पार्टी द्वारा पूरी तरह उपेक्षित और अपमानित करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं किया गया। अनेक विश्लेषकों का मानना है कि कमलनाथ सरकार यदि गिरती है तो उसके लिए भी श्री सिंह ही जिम्मेदार होंगे।

-रवीन्द्र वाजपेयी