Tuesday, 10 September 2019

जाति से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत

रास्वसंघ ने गत दिवस स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए जब तक कि उसका उद्देश्य पूरा न हो जाए। संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा समय-समय पर आरक्षण की समीक्षा किये जाने संबंधी सुझाव दिए जाने के कारण ये धारणा बनती रही है कि संघ इस व्यवस्था का विरोधी है। स्मरणीय है 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान श्री भागवत द्वारा आरक्षण की समीक्षा को लेकर जो बयान दिया उसको लालू प्रसाद यादव ने बड़ा मुद्दा बना लिया और भाजपा को उसका जबर्दस्त नुकसान भी हुआ। बहरहाल उसके बाद संघ प्रमुख ने अनेक मर्तबा ये स्पष्ट किया कि समाज में आर्थिक बराबरी लाने के लिए आरक्षण नामक उपाय की जरूरत है। डा. आम्बेडकर को केंद्र में रखते हुए संघ ने पूरे देश में सामजिक समरसता के कार्यक्रम भी बड़े पैमाने पर किये और दलित वर्ग के बीच हिंदुत्व का संदेश फैलाने की कोशिश की। लोग मानें या नहीं मानें लेकिन उप्र विधानसभा और उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में जिस तरह का सर्वव्यापी समर्थन आया उसके पीछे जातिगत समीकरणों का ध्वस्त होना बड़ा कारण था और उसका काफी कुछ श्रेय संघ संचालित सामाजिक समरसता के आयोजनों को जाता है। समीक्षा संबंधी सुझाव का सही आशय समझे बिना ही ये कह दिया जाता है कि संघ आरक्षण का विरोधी है। जबकि श्री भागवत सहित संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सदैव ये कहते आये हैं कि इस बात का परीक्षण होना चाहिए कि आखिर 70 साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी आरक्षण अपने उद्देश्य को क्यों प्राप्त नहीं कर सका और समाज में जातिगत भेदभाव के अलावा आर्थिक विषमता यथावत विद्यमान है। ये बात और भी लोग कहते आये हैं लेकिन संघ चूंकि भाजपा समर्थक माना जाता है इसलिए उसकी बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती। यहाँ उल्लेखनीय है कि आरक्षण के पक्ष में जब भी प्रधानमन्त्री या कोई अन्य भाजपा नेता बयान देता है तब उसकी सवर्ण जातियों में रोषपूर्ण प्रतिक्रिया होती है। मप्र विधानसभा के पिछले चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह द्वारा दिया गया कोई माई का लाल आरक्षण नहीं हटा सकता वाला बयान भाजपा की लुटिया डुबोने वाला साबित हुआ। राजस्थान में भी उसका असर हुआ। सवर्ण जातियों में उसके परंपरागत मतदाताओं में से हजारों ने नोटा का बटन दबाकर अपनी नाराजगी दिखाई जिससे बेहद कम अंतर से पार्टी अनेक सीटें हारकर सरकार से बाहर हो गयी। सवर्ण जातियों को लुभाने के लिए राहुल गांधी ने ब्राह्मण होने और जनेऊ धारण करने जैसे स्वांग भी रचे और मन्दिर-मठों में मत्था टेका लेकिन लोकसभा चुनाव के पहले मोदी सरकार ने 10 फीसदी आरक्षण आर्थिक आधार पर देने का दांव खेलकर पिछले नुकसान की भरपाई कर ली। फिलहाल देश में जातिवादी राजनीति ठंडी है। नरेंद्र मोदी खुद पिछड़ी जाति के होने के बाद भी हर वर्ग में अपनी लोकप्रियता साबित और स्थापित कर चुके हैं। हालाँकि ये कहना गलत होगा कि समाज में जातिगत भेदभाव पूरी तरह खत्म हो चुका है लेकिन श्री मोदी ने चुनावी राजनीति को जातिगत समीकरणों से मुक्त करने का कारनामा कर दिखाया है। ऐसे में संघ द्वारा आर्थिक विषमता के रहने तक आरक्षण जारी रखने की बात कहने के पीछे भी आशय ये है कि जातिगत भेदभाव तब तक नहीं मिट सकेगा जब तक समाज के सभी वर्गों में आर्थिक दृष्टि से व्याप्त विषमता का अंतर कम नहीं होता। मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर दिए गए 10 प्रतिशत आरक्षण का इसीलिये न ओबीसी नेता विरोध कर सके और न ही दलित जातियों के भीतर इसकी मुखालफत हुई। इस बारे में सकारात्मक बात ये है कि आरक्षण प्राप्त पिछड़ी और दलित जातियों के नेता भी सवर्णों को सीमित आरक्षण देने की मांग करने लगे हैं। इसी आधार पर ये भी कहा जाने लगा कि आरक्षण, जाति की बजाय आर्थिक स्थिति के आधार पर दिया जाना चाहिये। जो लोग दशकों पहले जातिगत आधार पर आरक्षण का लाभ लेकर अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति सुधार चुके हैं उनकी संतानों को अब उस दायरे से बाहर किये जाने की मांग भी उठती रही है। सर्वोच्च न्यायालय तक क्रीमी लेयर को लेकर टिप्पणी कर चुका है। ये सब देखते हुए रास्वसंघ द्वारा आर्थिक विषमता के रहते तक आरक्षण को जारी रखने की बात कहना काफी अर्थपूर्ण है। इसका आशय यही लगाया जाना चाहिए कि जाति जैसी संकुचित सोच से ऊपर उठते हुए हर व्यक्ति की आर्थिक उन्नति का लक्ष्य बनाकर समाज को समतामूलक बनाने पर जोर देना चाहिए। ये बात स्वयंसिद्ध है कि गरीबी एक अभिशाप है और अपने देश में तो गरीबी से भी नीचे जीवनयापन करने वाले करोड़ों में हैं। ये आंकड़ा हमारी तमाम उपलब्धियों पर पानी फेरने के लिए पर्याप्त है। ये बात भी सभी जानते हैं कि आज के युग में आर्थिक स्तर ही व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का मापदंड बन गया है। इस बात को मायावती, मुलायम सिंह, रामविलास पासवान और लालू प्रसाद जैसे नेता भी जानते और समझते हैं लेकिन वे इसकी मांग इसलिए नहीं करते क्योंकि ऐसा होने पर उनका वोट बैंक हाथ से निकल जाएगा। संघ द्वारा आरक्षण को आर्थिक विषमता से जोडऩे की सोच भविष्य में झाँकने का प्रयास है। अंतत: सभी को इसे स्वीकार करना होगा वरना जातिगत आरक्षण के रहते तक तक जाति के नाम पर समाज को टुकड़ों में बांटने का षडयंत्र सफल होता रहेगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 September 2019

लोग साथ हैं लेकिन बिन पैसा सब सून

दूसरी पारी के 100  दिन पूरे करने पर मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों का बखान कर  रही है वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकारी दावों को सिरे से नकार दिया है ।  जिन सफलताओं को लेकर भाजपा अपनी सरकार को 100 में से 101  अंक दे रही है उनमें  3।0  और    तीन तलाक पर रोक के साथ ही यातायात सुधार और दुर्घटनाएं रोकने के लिए  बनाया गया नया नियम है । गत सप्ताह यदि चन्द्रमा के धरातल पर विक्रम नामक लैंडर सफलतापूर्वक उतर जाता तब शायद केंद्र सरकार उसे भी अपनी उपलब्धियों में शामिल कर लेती । प्रचार के इस युग में किसी भी सत्ताधारी नेता और उसकी पार्टी के लिए अपनी कारगुजारियों का ढोल पीटना आवश्यक हो गया है क्योंकि बाजारवादी व्यवस्था के इस दौर में राजनीति भी मार्केटिंग के मकडज़ालज में फंसकर रह गई है । जहां तक बात सरकार द्वारा  किये जा रहे दावों के परीक्षण की है तो ये कहना गलत नहीं है कि नई लोकसभा के प्रथम सत्र में सरकार ने जिस ताबड़तोड़ तरीके से विधायी कार्य संपन्न करवाए उससे संसद के  बेशकीमती समय का सामुचित उपयोग हो सका । लोकसभा में तो खैर , सरकार भारी बहुमत में थी ही लेकिन राज्यसभा में भी उसने अल्पमत के बावजूद जिस तरह से विपक्ष की एकता  को छिन्न - भिन्न किया वह निश्चित रूप से उसकी रणनीतिक सफलता कही जायेगी । वरना तीन तलाक और जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 3।0 और 35 ए हटाने जैसे विधेयक पारित करवाना आसान नहीं होता । यातायात नियमों के प्रति लोगों को जिम्मेदार बनाने हेतु लागू की गईं  भारी - भरकम अर्थदंड की दरों का यद्यपि शुरुवाती दौर में जबरदस्त विरोध हुआ लेकिन समाज के एक बड़े तबके ने उसे रचनात्मक और जरूरी मानकर उसका समर्थन किया तो आम जनता को भी ये लगने लगा कि नियमों का पालन उसके हित में है । ये जाहिर तौर पर एक सकारात्मक बदलाव है । जहां तक बात तीन तलाक और जम्मू कश्मीर संबंधी निर्णयों की है तो वे भी मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धियों में शुमार हो गए क्योंकि देश के अधिकतर लोग उसके समर्थन में खुलकर सामने आ गये जिससे विरोध करने वाले ठंडे पड़ गये लेकिन इस सबके बाद ज्योंही चर्चा  अर्थव्यवस्था की शुरू हुई त्योंही सत्ता पक्ष के सामने मुंह छुपाने की स्थिति बन गयी । आर्थिक मंदी की  आशंका तो काफी  समय से थी लेकिन ये माना जाता था कि विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत इस झटके को आसानी से झेल जाएगा किन्तु  ज्योंही  ये खबर आई कि मौजूदा वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर घटकर 5 फीसदी तक आ गयी त्योंही चिंता की लकीरें गहरी होने लगीं । बेरोजगारी के आंकड़े तो पहले से ही सरकार के लिए मुसीबत थे ऊपर से औद्योगिक इकाइयों में छटनी की खबरों ने दूबरे में दो आसाढ़  वाले हालात  बना दिए । कपड़ा , ऑटोमोबाइल , निर्माण और यहाँ तक कि सेवा क्षेत्र तक में वृद्धि की बजाय गिरावट का दौर शुरू हो गया जिससे सरकार की हालिया उपलब्धियों से हटकर लोगों का ध्यान अर्थव्यवस्था की चिंताजनक हालत पर केन्द्रित हो गया । मांग नहीं होने के कारण बाजारों में रौनक नजर नहीं आ रही । बैंकों तक के पास नगदी का अभाव होने लगा । विदेशी निवेशकों ने पैसा निकालना शुरू कर दिया । डालर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार नीचे लुढ़कता जा रहा है । सोने और चांदी  की कीमतों में उछाल का  मतलब  है कि निवेशक व्यापार और उद्योग को लेकर निराश हैं । जैसी खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक़ तो बहुत जल्द इससे उबरने की सम्भावना नहीं लगती । हालाँकि अर्थशास्त्रियों का एक तबका ये भी मानता है कि इस वर्ष अच्छी मानसूनी वर्षा ने  कृषि क्षेत्र से अच्छी खबरें आने की उम्मीदें बढ़ा दी हैं जिसका असर आगामी त्यौहारी मौसम से दिखाई देने लगेगा ।  यदि ऐसा होता है तब उपभोक्ता बाजार में रौनक तो आयेगी लेकिन उसका असर औद्योगिक क्षेत्र पर पडऩे में  समय लगेगा क्योंकि उसके पास अभी भी बिना बिका माल काफी जमा  है । यद्यपि केंद्र सरकार ने कुछ कदम उठाकर मंदी नामक संकट को हल करने का प्रयास किया है लेकिन उनका बहुत ज्यादा असर अभी तक दिखाई नहीं दिया जिसकी वजह आम जनता के मन में बैठ गया डर  भी है । कमोबेश यही हालात व्यापार और उद्योग जगत की भी है जो झटके से उबर नहीं पा रहा । भले ही मोदी सरकार अधिकृत तौर पर स्वीकार नहीं कर  रही हो लेकिन उसे ये समझ में आ चुका है कि अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये बिना वह उस जनसमर्थन को बरकरार नहीं रख सकेगी जो उसे पिछली गर्मियों में लोकसभा चुनाव के दौरान मिला था । तीन तलाक और कश्मीर संबंधी उसके साहसिक फैसलों को भी इसीलिये लोगों का ध्यान आर्थिक संकट से हटाने का प्रयास कहा जा रहा है । अर्थव्यस्था को 5  ट्रिलियन तक ले जाने का लक्ष्य हंसी का पात्र न बने उसके लिए आर्थिक मोर्चे पर देश के आत्मविश्वास को दोबारा कायम करने की जरूरत है । नोटबंदी  और जीएसटी से उत्पन्न समस्याओं के  बाद भी देश की जनता ने नरेंद्र मोदी में जबरदस्त विश्वास व्यक्त किया है ।  अर्थशास्त्र कहता है कि मनुष्य की सभी क्रियाएं आर्थिक कारणों और हालातों से प्रभावित होती हैं । यद्यपि अभी भी जनमत उनके साथ है लेकिन लोगों का मन बदलते देर नहीं लगती । प्रधानमंत्री और उनकी टीम को ये नहीं भूलना चाहिए कि आज के भौतिकतावादी युग में बिन पैसा सब सून की कहावत एक वास्तविकता  बन चुकी है । और भावनात्मक मुद्दे भी एक हद तक ही कारगर होते हैं । स्व. राजीव गांधी ऐतिहासिक बहुमत के बावजूद महज पांच साल बाद ही सत्ता गंवा बैठे थे ।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 September 2019

पूरा है विश्वास , हम होंगे कामयाब एक दिन ....

विज्ञान का अर्थ है प्रयास, प्रयास और प्रयास। आप लोग मक्खन पर नहीं, पत्थर पर लकीर खींचने वाले लोग हैं। मैं सुबह-सुबह आपको उपदेश देने नहीं अपितु आप सभी से प्रेरणा लेने आया हूँ। मैं आपके साथ हूँ, ये देश आपके साथ है। विज्ञान विफलताओं से सीखकर कामयाबी की मंजिल छूने की प्रक्रिया है और हम भी इस विफलता से सीखकर सफलता के मुकाम पर जरुर पहुंचेंगे। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने उक्त विचार आज सुबह इसरो के बेंगलुरु मुख्यलाय में उन वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कहे जो बीते एक दशक से भी ज्यादा चंद्रमा के दक्षिणी धु्रव पर भारत का यान उतारने के मिशन में जुटे थे। बीती रात लगभग पूरा भारत ही नहीं दुनिया भर के वैज्ञनिक एवं अन्तरिक्ष केंद्र भारत के इस महत्वाकांक्षी अभियान पर नजरें  लगाये हुए थे।  लेकिन चंद्रयान-2 अभियान अंतिम चरण आखिरी क्षणों में जब विफल हो गया तब इसरो के बेंगुलुरु मुख्यालय में कार्यरत सैकड़ों वैज्ञानिकों के चेहरे मुरझा गए। चंद्रमा पर उतरने चले  विक्रम नामक लैंडर ने सतह से मात्र 2.1 किलोमीटर पहले संकेत भेजने बंद कर दिए। इसरो प्रमुख ने पहले ही आगाह किया था कि अभियान की सफलता आखिऱी 15 मिनिटों पर निर्भर करेगी जब विक्रम को चन्द्रमा की धरती पर साफ्ट लैंडिंग करवाई जावेगी। यह बेहद मुश्किल काम था। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था । लैंडर की गति भी योजनानुसार कम होती चली गई। लेकिन अंतत: वही हुआ जिसकी आशंका थी और विक्रम से आने वाले संकेत ज्योंही रुके त्योंही अनुभवी वैज्ञनिकों ने समझ लिया कि मानव निर्मित वह नन्हा  सा उपकरण और उसके भीतर रखा गया प्रज्ञान नामक रोबोट अन्तरिक्ष के उस रहस्यमय आगोश में गुम होकर रह गए जिसका पता लगाना आज भी एक पहेली  बना हुआ है। विक्रम चंद्रमा की धरती पर निर्धारित योजनानुसार उतरा या फिर नियन्त्रण से बाहर होने के कारण धड़ाम से गिरकर टूट-फूट गया इसका पता लगना संभव नहीं है। हाँ, एक धूमिल  सी सम्भावना ये जरुर है कि अभी भी चन्द्रमा की कक्षा में मंडरा रहा चंद्रयान - 2 लैंडर के उतरने या गिरने के कुछ चित्र यदि भेज सके तब इसरो के वैज्ञानिक यह अभियान किस सीमा तक सफल और किस कारण से विफल रहा इसका समुचित्त विश्लेषण कर सकेंगे। निश्वित रूप से इसरो के उन अनगिनत वैज्ञनिकों, अभियंताओं और तकनीशियनों के लिए कल की रात कई बरस से भी ज्यादा लम्बी साबित हुई लेकिन जब ये मान लिया गया कि विक्रम इसरो के नियंत्रण से बाहर निकल गया और उसकी अधिकृत घोषणा हो गई तब प्रधानमन्त्री ने वैज्ञनिकों के बीच जाकर पूरे देश की ओर से उनका अभिनन्दन करते हुए कहा कि जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं लेकिन आपकी उपलब्धि पर पूरे देश को गर्व है। आज सुबह जब प्रधानमन्त्री दोबारा इसरो पहुंचे तब उसके प्रमुख के. सिवन रोने लगे। श्री मोदी ने उन्हें गले लगाकर जिस तरह उन्हें ढाढ़स बंधाया वह पूरे देश की तरफ  से अपने अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को दिया गया समर्थन था। अपने उद्बोधन के जरिये उन्होंने न सिर्फ  वैज्ञानिकों वरन पूरी दुनिया को ये सन्देश दे दिया कि भारत की नजर मंजिल पर है और सफर के दौरान उसने मील के पत्थर गिनना बंद कर दिया है। ये मान लेना गलत नहीं होगा कि एक दशक की मेहनत अंतिम चरण में आकर बेकार चली गई लेकिन इस विफलता में भी  किसी बड़ी सफलता का बीज छिपा हुआ है। चंद्रमा का दक्षिणी हिस्सा अभी तक विज्ञान की नजरों से ओझल रहा है। अमेरिका, रूस और चीन सभी ने उसकी दूसरी और आसान समझी जाने वाले जगहों पर अपने यान उतारे हैं। हाल ही में भारत जैसा प्रयास इस्रायल ने भी किया जो  नाकामयाब रहा। दरअसल इस स्थान पर जाने की वजह वहां जल की सम्भावनाएं तलाशना है। भारत का यह अभियान मंगलयान  की तरह से ही बहुत ही कम खर्च में तैयार किया गया। हालीवुड की अनेक बड़े बजट की फिल्में इससे ज्यादा की लगात पर बनी हैं। लेकिन भारत में ही अनेक लोग ऐसे हैं जिन्होंने इस अभियान को पैसे की बर्बादी बताया। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तो कल भी यहाँ तक कहा कि देश की वर्तमान समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए ये सब किया गया। लेकिन कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है  कहना वाली उक्ति को ध्यान में रखते हुए इस अभियान की तारीफ  करनी चाहिए। चन्द्रमा की सतह से मात्र 2.1 किलोमीटर की दूरी तक विक्रम लैंडर का पहुँच जाना भी ये साबित कर गया कि इसरो ने चंद्रमा के उस अनजान स्थान पर उतरने के लिए काफी शोध और अध्ययन किया था। इस अभियान पर खर्च हुए धन से ज्यादा नुक्सान उस समय का हुआ जो इस अभियान की तैयारी में लगा। अगले अभियान में शायद इतना समय नहीं लगेगा क्योंकि इसरो के पास तकनीक और सूचना का काफी संग्रह बीते एक दशक में आ चुका है। अन्तरिक्ष अभियानों में विफलता नई बात नहीं है। अमेरिका और रूस भी इसका स्वाद चखते रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देश में इस तरह के अभियानों की उपयोगिता और सार्थकता पर सवाल उठ सकते हैं। कहते हैं शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका से प्रतिस्पर्धा के चलते तत्कालीन सोवियत संघ ने जो अनाप-शनाप पैसा अन्तरिक्ष कार्यक्रम पर खर्च किया उसकी वजह से उसकी अर्थव्यवस्था प्रभावित हो गयी जो अंतत: उसके विघटन का एक बड़ा कारण बन गया। लेकिन भारत का अन्तरिक्ष कार्यक्रम शुरू से ही किसी अन्य देश  के साथ प्रतिस्पर्धा की बजाय अपनी क्षमताओं और आवश्यकताओं तक ही केन्द्रित रहा और हमारे वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीक  विकसित कर बेहद कम खर्च में अन्तरिक्ष की ऊँचाइयों को छूने में सफलता हासिल की। ये अभियान  यदि सफल हो जाता तो अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की छवि और क्षमता विश्व के विकसित देशों तक से कई मामलों में ऊपर हो जाती। अंतिम क्षणों में सफलता से वंचित होने के बावजूद इसरो का ये प्रयास सार्थक  ही कहा जाएगा क्योंकि इससे मिला अनुभव अन्यथा हमें नहीं मिल सकता था। संतोष की बात ये है कि चंद्रयान एक वर्ष तक चन्द्रमा के ऊपर मंडराते हुए संकेत और चित्र भेजता रहेगा जो भावी अभियान के लिए मददगार हो सकेंगे। इन पंक्तियों के साथ कि :-
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन, इसरो से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति का हार्दिक अभिनंदन।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 September 2019

मप्र : कांग्रेस की साख और सरकार की धाक को धक्का

वैसे तो जब से मप्र में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी है तभी से उसके स्थायित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भाजपा के नेता लगातार डींग हांकते रहे कि वे जब चाहें सरकार गिरा सकते हैं। हालाँकि उनके बड़बोलेपन का उस समय मजाक बन गया जब उनके अपने दो विधायक ही टूटकर कांग्रेस की गोद में जा बैठे। बावजूद उसके सरकार के गिरने की अटकलें समाप्त नहीं हुईं।  लेकिन बीते कुछ दिनों से मप्र के कांग्रेस नेता आपस में जिस तरह से तलवारें भांज रहे हैं उससे लगता है कि 15 साल बाद आई सत्ता को पार्टी के नेता हजम नहीं कर पा रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर शुरू हुई रस्साखींच तो खैर अपनी जगह ठीक थी लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा मंत्रियों को लिखी गई चि_ियों से नया बवाल मच गया। उमंग सिंगार नामक एक युवा मंत्री ने श्री सिंह पर तीखे आरोप लगाते हुए ब्लैकमेल करने और बाहर से सरकार चलाने जैसा आरोप तो लगाया ही उसे अस्थिर करने की तोहमत भी थोप दी। उमंग के इस पैंतरे से सूबे की सियासत उबल पड़ी। सरकार के अंतर्विरोध सामने आने लगे। ये भी साफ नजर आने लगा कि मंत्रियों की निष्ठा मुख्यमंत्री से ज्यादा उनके गुटीय नेता के प्रति अधिक है। उमंग के पुतले जलाने दिग्विजय खेमा मैदान में उतरा तो पीछे से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में उनका समर्थन करते हुए रेत के अवैध खनन पर सरकार को घेर दिया। इसे इशारा मानकर उनके गुट के बाकी विधायक भी दाना-पानी लेकर चढ़ाई करने पर आमादा हो उठे। मंत्रियों पर लिफाफे लेने जैसे आरोप सत्तारूढ़ पार्टी के विधायकों द्वारा लगाये जाने से भाजपा को तो मुखर होने का अवसर मिला ही लेकिन आम जनता में भी प्रदेश सरकार के स्थायित्व को लेकर संदेह और गहराने लगा। सरकार की छवि और साख दोनों उसके अपने ही लोगों द्वारा खराब किया जाना हर किसी को अटपटा लग रहा है। कमलनाथ ने उमंग को बुलाकर समझा दिया तो वे बजाय बोलने के ट्विटर पर अपनी भड़ास निकालने लगे। जिसे देखो वह सरकार के विरोध में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखने की हिमाकत करने लगा है। गत दिवस अचानक जिस तरह से सिंधिया समर्थक विधायकों ने सामने आकर मंत्रियों के विरुद्ध मोर्चा खोला उसके बाद ये कहने में कोई संकोच नहीं रहा कि कांग्रेसी ही अपनी सरकार को कमजोर करने में जुट गये हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि पार्टी का आलाकमान इस गृहकलह को रोकने में असहाय बना हुआ है। इसके पीछे असली कसूरवार कौन है ये सीधे-सीधे कह पाना कठिन है क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष पद पर श्री सिंधिया की ताजपोशी की सम्भावना बनते ही दिग्विजय सिंह ने जिस तरह से चि_ी लिखकर ठहरे हुए पानी को हिलाकर तलहटी में दबी गंदगी को सतह पर लाने की चालाकी दिखाई उसके बाद से मामला दूसरी तरफ  घूम गया। उमंग सिंगार का ये कहना गलत नहीं था कि पूर्व मुख्यमंत्री समानांतर शक्ति केंद्र बनकर बाहर से सरकार चलाना चाहते हैं। इस पूरे विवाद में कमलनाथ की खमोशी भी चौंकाती है। दिग्विजय और सिंधिया गुट के बीच हो रही सड़क छाप लड़ाई का बुरा असर उनकी सरकार की प्रतिष्ठा पर भी पड़ रहा है। यहाँ तक कि नौकरशाही भी कांग्रेस की गुटबाजी में उलझकर रह गई है। इस वजह से सरकार का कामकाज प्रभावित होने लगा है। लगातार स्थानान्तरण होने से प्रशासनिक अमला पहले से ही अनिश्चितता में जी रहा है। भाजपा को कांग्रेस की इस अंतर्कलह में अपने लिए दोहरा लाभ नजर आने लगा है। उसका मानना है कि देर सवेर ज्योतिरादित्य बगावत कर उसके साथ आ जायेंगे। वैसे भी भाजपा इस फिराक में है कि गोवा और कर्नाटक में अपनाई गई रणनीति को दोहराते हुए मप्र में भी कांग्रेस को झटका दे लेकिन अभी तक श्री सिंधिया की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला जिससे वह आश्वस्त हो सके। लेकिन भोपाल में चल रही चर्चाओं के अनुसार 12 से 15 विधायक कभी भी बगावत की राह पकड़ सकते हैं। अनेक भाजपा नेता ये स्वीकार कर रहे हैं कि महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनाव खत्म होते ही अमित शाह मिशन मप्र शुरू करेंगे। खैर, भाजपा तो जब करेगी तब करेगी लेकिन कांग्रेस के अपने दिग्गज नेता ही एक दूसरे को नीचा दिखाने और पटकनी देने पर आमादा हों तब भाजपा को अकेले जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता। कमलनाथ की समझाइश और श्रीमती गांधी की फटकार के बाद भी मप्र के कांग्रेसी नेता और कतिपय विधायक अपनी तलवारें वापिस म्यान में रखने त्तैयार नहीं दिख रहे। जिसे डांट पड़ती है वह भले चुप हो जाए लेकिन उसका स्थान भरने दूसरे टपक पड़ते हैं। कभी-कभी तो ये भी लगता है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ही परदे के पीछे कठपुतलियाँ नचाने का खेल कर रहे हैं। फिलहाल उनके पास पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पद भी है। ऐसे में अनुशासन तार-तार होने के बावजूद उनके द्वारा किसी पर कोई भी कार्रवाई नहीं होना साबित करता है कि या तो वे सोचकर बैठे हैं कि जब तक गद्दी है उसका सुख लेते रहो या फिर वे ही दोनों तरफ  के लोगों की पीठ पर हाथ रखकर मुर्गे लड़वा रहे हैं। असलियत जो भी हो लेकिन इस पगड़ी उछाल प्रतियोगिता में कांग्रेस की छवि और ताकत दोनों गिर रही हैं। प्रदेश भर में फैले उसके कार्यकर्ता हतप्रभ हैं। पिछले चुनाव में उसे मत देने वाले भी ठगा सा महसूस करने लगे हैं। पार्टी संगठन में झगड़े तो इस पार्टी के लिए नई बात नहीं लेकिन सरकार में बैठे मंत्री और सत्तारूढ़ दल के अपने विधायक ही जब मंत्रियों की रूचि लिफाफों में होने जैसी बातें करने लगें तब विपक्ष या अन्य किसी के कहने के लिए कुछ बचता ही नहीं है। क्या होगा क्या नहीं ये तो आने वाले दिन ही बताएँगे लेकिन प्रदेश कांग्रेस में हो रही कुत्ताघसीटी के कारण पार्टी की साख और सरकार की धाक दोनों को जबर्दस्त धक्का लग रहा है।

- रवीन्द्र वाजपेयी